महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
आपके पुत्र दुर्योधनके उधर लौटनेपर कौरव-पक्षके सभी नरेशोंने विशाल रथ-सेनाके द्वारा अर्जुनकुमार अभिमन्युको सब ओरसे घेर लिया ।। १५ ।।
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो युधि सुदुर्जयैः ।
न स्म प्रव्यथते राजन् कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥ १६ ॥
राजन्! अभिमन्युका पराक्रम भगवान् श्रीकृष्णके समान था। वह युद्धमें अत्यन्त दुर्जय उन शूरवीरोंसे घिर जानेपर भी व्यथित या चिन्तित नहीं हुआ ।। १६ ।।
सौभद्रमथ संसक्तं दृष्ट्वा तत्र धनंजयः ।
अभिदुद्राव वेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ।। १७ ।।
इसी समय अर्जुन सुभद्रकुमारको वहाँ युद्धमें संलग्न देख अपने पुत्रकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे दौड़े आये ।। १७ ।।
ततः सरथनागाश्वा भीष्मद्रोणपुरोगमाः ।
अभ्यवर्तन्त राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् ।। १८ ।।
यह देख भीष्म और द्रोण आदि सभी कौरव-पक्षीय नरेश रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासहित एक साथ अर्जुनपर चढ़ आये ।। १८ ।।
उद्भूतं सहसा भौमं नागाश्वरथपत्तिभिः ।
दिवाकररथं प्राप्य रजस्तीव्रमदृश्यत ।। १९ ।।
उस समय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धरतीकी तीव्र धूल सहसा सूर्यके रथतक पहुँचकर सब ओर व्याप्त दिखायी देने लगी ।। १९ ।।
तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च ।
तस्य बाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्तन्त सर्वशः ।। २० ।।
प्रणेदुः सर्वभूतानि बभूवुस्तिमिरा दिशः ।
इधर सहस्रों हाथी और सैकड़ों भूमिपाल अर्जुनके बाणोंके पथमें आकर किसी प्रकार आगे न बढ़ सके। समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया ।। २० १/२ ।।
कुरूणां चानयस्तीव्रः समदृश्यत दारुणः ।। २१ ।।
नाप्यन्तरिक्षं न दिशो न भूमिर्न च भास्करः ।
प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शस्त्रसङ्घैः किरीटिनः ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समय कौरवोंको अपने दुःसह एवं भयंकर अन्यायका परिणाम प्रत्यक्ष दिखायी देने लगा। किरीटधारी अर्जुनके शस्त्रसमूहोंसे सब कुछ आच्छादित हो जानेके कारण आकाश, दिशा, पृथ्वी और सूर्य किसीका भी भान नहीं होता था ।। २१-२२ ।।
सादिता रथनागाश्वा हताश्वा रथिनो रणे ।
विप्रद्रुतरथाः केचिद् दृश्यन्ते रथयूथपाः ।। २३ ।।
उस रणभूमिमें कितने ही रथ टूट गये, बहुतेरे हाथी नष्ट हो गये, कितने ही रथियोंके घोड़े मार डाले गये और कितने ही रथ-यूथपतियोंके रथ भागते दिखायी दिये ॥ २३ ॥ विरथा रथिनश्चान्ये धावमानाः समन्ततः । तत्र तत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदैर्भुजैः ॥ २४ ॥ अन्यान्य बहुत-से रथी रथहीन होकर अंगदभूषित भुजाओंमें आयुध धारण किये जहाँ-तहाँ चारों ओर दौड़ते देखे जाते थे ॥ २४ ॥ हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः । अर्जुनस्य भयाद् राजन् समन्ताद् विप्रदुद्रुवुः ॥ २५ ॥ महाराज! अर्जुनके भयसे घुड़सवार घोड़ोंको और हाथीसवार हाथियोंको छोड़कर सब ओर भाग चले ॥ २५ ॥ रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥ वहाँ बहुत-से नरेश अर्जुनके सायकोंसे कटकर रथों, हाथियों और घोड़ोंसे गिरे और गिराये जाते हुए दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥ सगदानुद्यतान् बाहून् सखड्गांश्च विशाम्पते । सप्रासांश्च सतूणीरान् सशरान् सशरासनान् ॥ २७ ॥ साङ्कुशान् सपताकांश्च तत्र तत्रार्जुनो नृणाम् । निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं वपुर्धारयन् ॥ २८ ॥ प्रजानाथ! अर्जुनने उस रणक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर रूप धारण किया था। उन्होंने अपने उग्र बाणोंद्वारा योद्धाओंकी ऊपर उठी हुई भुजाओंको, जिनमें गदा, खड्ग, प्रास, तूणीर, धनुष-बाण, अंकुश और ध्वजा-पताका आदि शोभा पा रहे थे, काट गिराया ॥ २७-२८ ॥ परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्गराणां च मारिष । प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥ २९ ॥ परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत । वर्मणां चापविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥ ३० ॥ ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः । छत्राणां हेमदण्डानां तोमराणां च भारत ॥ ३१ ॥ प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष । राशयः स्मात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥ ३२ ॥ आर्य! भरतनन्दन! भूपाल! उस रणभूमिमें गिरे हुए उद्दीप्त परिघ, मुद्गर, प्रास, भिन्दिपाल, खड्ग, फरसे, तीखे तोमर, सुवर्णमय कवच, ध्वज, ढाल, सोनेके डंडोंसे विभूषित छत्र, व्यजन, चाबुक, जोते, कोड़े और अंकुश ढेर-के-ढेर बिखरे दिखायी देते थे ॥ २९—३२ ॥
नासीत् तत्र पुमान् कश्चित् तव सैन्यस्य भारत । योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायात् कथंचन ॥ ३३ ॥ भारत! उस समय आपकी सेनामें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो समरमें शूरवीर अर्जुनका सामना करनेके लिये किसी प्रकार आगे बढ़ सके ॥ ३३ ॥
यो यो हि समरे पार्थं प्रत्युद्याति विशाम्पते । स संख्ये विशिखैस्तीक्ष्णैः परलोकाय नीयते ॥ ३४ ॥ प्रजानाथ! उस युद्धभूमिमें जो-जो वीर अर्जुनकी ओर बढ़ता था, वही-वही उनके पैने बाणोंद्वारा परलोक पहुँचा दिया जाता था ॥ ३४ ॥
तेषु विद्रवमाणेषु तव योधेषु सर्वशः । अर्जुनो वासुदेवश्च दध्मतुर्वारिजोत्तमौ ॥ ३५ ॥ तदनन्तर आपके सब योद्धा सब ओर भागने लगे। यह देख अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णने अपने श्रेष्ठ शंख बजाये ॥ ३५ ॥
तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव । अब्रवीत् समरे शूरं भारद्वाजं स्मयन्निव ॥ ३६ ॥ कौरव-सेनाको इस प्रकार भागती देख समरभूमिमें खड़े हुए आपके ताऊ भीष्मने वीरवर आचार्य द्रोणसे मुसकराते हुए-से कहा— ॥ ३६ ॥
एष पाण्डुसुतो वीरः कृष्णेन सहितो बली । तथा करोति सैन्यानि यथा कुर्याद् धनंजयः ॥ ३७ ॥ ‘यह श्रीकृष्णसहित बलवान् वीर पाण्डुकुमार अर्जुन कौरव-सेनाकी वही दशा कर रहा है, जैसी उसे करनी चाहिये ॥ ३७ ॥
न ह्येष समरे शक्यो विजेतुं हि कथंचन । यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥ ३८ ॥ ‘यह किसी प्रकार भी समरभूमिमें जीता नहीं जा सकता; क्योंकि इसका रूप इस समय प्रलयकालके यमराज-सा दिखायी दे रहा है ॥ ३८ ॥
न निवर्तयितुं चापि शक्येयं महती चमूः । अन्योन्यप्रेक्षया पश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥ ३९ ॥ ‘यह विशाल सेना इस समय पीछे नहीं लौटायी जा सकती। देखिये, सारे सैनिक एक-दूसरेकी देखा-देखी भागे जा रहे हैं ॥ ३९ ॥
एष चास्तं गिरिश्रेष्ठं भानुमान् प्रतिपद्यते । चक्षूंषि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा ॥ ४० ॥ ‘इधर ये भगवान् सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्रोंकी ज्योति सर्वथा समेटते हुए-से गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलको जा पहुँचे हैं ॥ ४० ॥
तत्रावहारं सम्प्राप्तं मन्येऽहं पुरुषर्षभ ।
श्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथंचन ॥ ४१ ॥ ‘अतः नरश्रेष्ठ! मैं इस समय समस्त सैनिकोंको युद्धसे हटा लेना ही उचित समझता हूँ। हमारे सभी योद्धा थके-माँदे और डरे हुए हैं; अतः इस समय किसी तरह युद्ध नहीं कर सकेंगे' ॥ ४१ ॥
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् । अवहारमथो चक्रे तावकानां महारथः ॥ ४२ ॥ आचार्यप्रवर द्रोणसे ऐसा कहकर महारथी भीष्मने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धभूमिसे लौटा लिया ॥ ४२ ॥
(ततः सरथनागाश्च जयं प्राप्य ससोमकाः । पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव प्रणेदुश्च पुनः पुनः ॥ प्रययुः शिबिरायैव धनंजयपुरस्कृताः । वादित्रघोषैः संहृष्टाः प्रनृत्यन्तो महारथाः ॥) तदनन्तर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित सोमक, पांचाल तथा पाण्डववीर विजय पाकर बारंबार सिंहनाद करने लगे। वे सभी महारथी विजयसूचक वाद्योंकी ध्वनिके साथ अत्यन्त हर्षमें भरकर नाचने लगे और अर्जुनको आगे करके शिविरकी ओर चल दिये।
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत । अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥ ४३ ॥ भारत! इस प्रकार सूर्यके अस्ताचलको चले जानेपर संध्याके समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाएँ लौट आयीं ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसावहारे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वितीय युद्धदिवसमें सेनाको लौटानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४५ श्लोक हैं।]
अध्याय (पृष्ठ 1810)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तीसरे दिन—कौरव-पाण्डवोंकी व्यूह-रचना तथा युद्धका आरम्भ
संजय उवाच
प्रभातायां च शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाथ भारत ॥ १ ॥
**संजयने कहा—**भारत! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी सेनाओंको युद्धभूमिमें चलनेका आदेश दिया ॥ १ ॥
गारुडं च महाव्यूहं चक्रे शान्तनवस्तदा ।
पुत्राणां ते जयाकाङ्क्षी भीष्मः कुरुपितामहः ॥ २ ॥
उस समय कुरुकुलके पितामह शान्तनुकुमार भीष्मने आपके पुत्रोंको विजय दिलानेकी इच्छासे महान् गरुड़व्यूहकी रचना की ॥ २ ॥
गरुडस्य स्वयं तुण्डे पिता देवव्रतस्तव ।
चक्षुषी च भरद्वाजः कृतवर्मा च सात्वतः ॥ ३ ॥
स्वयं आपके ताऊ भीष्म उस व्यूहके अग्रभागमें चोंचके स्थानपर खड़े हुए। आचार्य द्रोण और यदुवंशी कृतवर्मा दोनों नेत्रोंके स्थानपर स्थित हुए ॥ ३ ॥
अश्वत्थामा कृपश्चैव शीर्षमास्तां यशस्विनौ ।
त्रैगर्तैरथ कैकेयैर्वाटधानैश्च संयुगे ॥ ४ ॥
यशस्वी वीर अश्वत्थामा और कृपाचार्य शिरोभागमें खड़े हुए। इनके साथ त्रिगर्त, केकय और वाटधान भी युद्धभूमिमें उपस्थित थे ॥ ४ ॥
भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तश्च मारिष ।
मद्रकाः सिन्धुसौवीरास्तथा पाञ्चनदाश्च ये ॥ ५ ॥
जयद्रथेन सहिता ग्रीवायां संनिवेशिताः ।
आर्य! भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त—ये जयद्रथके साथ ग्रीवाभागमें खड़े किये गये। इन्हींके साथ मद्र, सिंधु, सौवीर तथा पंचनद देशके योद्धा भी थे ॥ ५ ½ ॥
पृष्ठे दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ॥ ६ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजाश्च शकैः सह ।
पुच्छमासन् महाराज शूरसेनाश्च सर्वशः ॥ ७ ॥
अपने सहोदर भाइयों और अनुचरोंके साथ राजा दुर्योधन पृष्ठभागमें स्थित हुआ। महाराज! अवन्तिदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा कम्बोज, शक एवं
शूरसेनदेशके योद्धा उस महाव्यूहके पुच्छ भागमें खड़े हुए ॥ ६-७ ॥ मागधाश्च कलिङ्गाश्च दासेरकगणैः सह । दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ॥ ८ ॥ मगध और कलिंगदेशके योद्धा दासेरकगणोंके साथ कवच धारण करके व्यूहके दायें पंखके स्थानमें स्थित हुए ॥ ८ ॥ कारूषाश्च विकुञ्जाश्च मुण्डाः कुण्डीवृषास्तथा । बृहद्बलेन सहिता वामं पार्श्वमवस्थिताः ॥ ९ ॥ कारूष, विकुंज, मुण्ड और कुण्डीवृष आदि योद्धा राजा बृहद्बलके साथ बायें पंखके स्थानमें खड़े हुए ॥ व्यूढं दृष्ट्वा तु तत् सैन्यं सव्यसाची परंतपः । धृष्टद्युम्नेन सहितः प्रत्यव्यूहत संयुगे ॥ १० ॥ अर्धचन्द्रेण व्यूहेन व्यूहं तमतिदारुणम् । दक्षिणं शृङ्गमस्थाय भीमसेनो व्यरोचत ॥ ११ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने कौरव-सेनाकी वह व्यूह-रचना देखकर युद्धभूमिमें उसका सामना करनेके लिये धृष्टद्युम्नको साथ लेकर अपनी सेनाका अत्यन्त भयंकर अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया। उसके दक्षिण शिखरपर भीमसेन सुशोभित हुए ॥ १०-११ ॥ नानाशस्त्रौघसम्पन्नैर्नानादेश्यैर्नृपैर्वृतः । तदन्वेव विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ १२ ॥ उनके साथ नाना प्रकारके शस्त्रसमुदायोंसे सम्पन्न विभिन्न देशोंके नरेश भी थे। भीमसेनके पीछे ही राजा विराट और महारथी द्रुपद खड़े हुए ॥ १२ ॥ तदनन्तरमेवासीन्नीलो नीलायुधैः सह । नीलादनन्तरश्चैव धृष्टकेतुर्महाबलः ॥ १३ ॥ उनके बाद नील आयुधधारी सैनिकोंके साथ राजा नील और नीलके बाद महाबली धृष्टकेतु खड़े हुए ॥ १३ ॥ चेदिकाशिकरूषैश्च पौरवैरपि संवृतः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ॥ १४ ॥ मध्ये सैन्यस्य महतः स्थिता युद्धाय भारत । तत्रैव धर्मराजोऽपि गजानीकेन संवृतः ॥ १५ ॥ भारत! धृष्टकेतुके साथ चेदि, काशी, करूष और पौरव आदि देशोंके सैनिक भी थे। धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा पांचाल और प्रभद्रकगण उस विशाल सेनाके मध्यभागमें युद्धके लिये खड़े हुए। हाथियोंकी सेनासे घिरे हुए धर्मराज युधिष्ठिर भी वहीं थे ॥ १४-१५ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।
अभिमन्युस्ततः शूर इरावांश्च ततः परम् ।। १६ ।। राजन्! तदनन्तर सात्यकि और द्रौपदीके पाँचों पुत्र खड़े हुए। इनके बाद शूरवीर अभिमन्यु और अभिमन्युके बाद इरावान् थे ।। १६ ।। भैमसेनिस्ततो राजन् केकयाश्च महारथाः । ततोऽभूद् द्विपदां श्रेष्ठो वामं पार्श्वमुपाश्रितः ।। १७ ।। सर्वस्य जगतो गोप्ता गोप्ता यस्य जनार्दनः । नरेश्वर! इरावान्के बाद भीमसेनपुत्र घटोत्कच तथा महारथी केकय खड़े हुए। तत्पश्चात् मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुन उस व्यूहके बायें पार्श्व या शिखरके स्थानमें खड़े हुए, जिनके रक्षक सम्पूर्ण जगत्का पालन करनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।। १७ १/२ ।। एवमेतं महाव्यूहं प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः ।। १८ ।। वधार्थं तव पुत्राणां तत्पक्षं ये च सङ्गताः । इस प्रकार पाण्डवोंने आपके पुत्रों तथा उनके पक्षमें आये हुए अन्यान्य भूपालोंके वधके लिये इस महाव्यूहकी रचना की ।। १८ १/२ ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ।। १९ ।। तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम् । तदनन्तर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जिसमें रथसे रथ और हाथीसे हाथी भिड़ गये थे ।। १९ १/२ ।। ह्यौघाश्च रथौघाश्च तत्र तत्र विशाम्पते ।। २० ।। सम्पतन्तो व्यदृश्यन्त निघ्नन्तस्ते परस्परम् । प्रजानाथ! जहाँ-तहाँ सब ओर घोड़ों और रथोंके समुदाय एक-दूसरेपर टूटते और प्रहार करते दिखायी दे रहे थे ।। २० १/२ ।। धावतां च रथौघानां निघ्नतां च पृथक् पृथक् ।। २१ ।। बभूव तुमुलः शब्दो विमिश्रो दुन्दुभिस्वनैः । दिवस्पृङ् नरवीराणां निघ्नतामितरेतरम् । सम्प्रहारे सुतुमुले तव तेषां च भारत ।। २२ ।। भारत! दौड़ते तथा पृथक्-पृथक् प्रहार करते हुए रथसमूहोंका शब्द दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिलकर और भी भयंकर हो गया। आपके और पाण्डवोंके घमासान युद्धमें परस्पर आघात-प्रत्याघात करनेवाले नरवीरोंका भयानक शब्द आकाशमें व्याप्त हो रहा था ।। २१-२२ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीये युद्धदिवसे परस्परव्यूहरचनायां षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तीसरे दिनके युद्धमें परस्पर व्यूह-रचनाविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1814)
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध
संजय उवाच
ततो व्यूढेष्वनीकेषु तावकेषु परेषु च ।
धनंजयो रथानीकमवधीत् तव भारत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**भारत! आपकी और पाण्डवोंकी पूर्वोक्तरूपसे व्यूह-रचना सम्पन्न हो जानेपर अर्जुनने आपके रथियोंकी सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ १ ॥
शरैरतिरथो युद्धे दारयन् रथयूथपान् ।
ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये ॥ २ ॥
धार्तराष्ट्रा रणे यत्नात् पाण्डवान् प्रत्ययोधयन् ।
वे अतिरथी वीर थे। उन्होंने अपने बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें रथयूथपतियोंको विदीर्ण करके यमलोक भेज दिया। युगान्तमें कालके समान उस युद्धमें कुन्ती-कुमार अर्जुनके द्वारा आपके सैनिकोंका भयंकर विनाश हो रहा था, तो भी वे यत्नपूर्वक पाण्डवोंके साथ युद्ध करते रहे ॥ २ १/२ ॥
प्रार्थयाना यशो दीप्तं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ३ ॥
एकाग्रमनसो भूत्वा पाण्डवानां वरूथिनीम् ।
बभञ्जुर्बहुशो राजंस्ते चासज्जन्त संयुगे ॥ ४ ॥
वे उज्ज्वल यश प्राप्त करना चाहते थे। अतः यह निश्चय करके कि अब मृत्यु ही हमें युद्धसे निवृत्त कर सकती है, एकाग्रचित्त होकर युद्धमें डटे रहे। राजन्! उन्होंने युद्धमें ऐसी तत्परता दिखायी कि बार-बार पाण्डव-सेनाको तितर-बितर कर दिया ॥ ३-४ ॥
द्रवद्भिरथ भग्नैश्च परिवर्तद्भिरेव च ।
पाण्डवैः कौरवेयैश्च न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५ ॥
तदनन्तर क्षत-विक्षत होकर भागते और पुनः लौटकर सामना करते हुए पाण्डवों तथा कौरवोंके सैनिकोंको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५ ॥
उदतिष्ठद् रजो भौमं छादयानं दिवाकरम् ।
न दिशः प्रदिशो वापि तत्र हन्युः कथं नराः ॥ ६ ॥
भूतलसे इतनी धूल उड़ी कि सूर्यदेव आच्छादित हो गये। दिशा और प्रदिशाका कुछ भी पता नहीं चलता था। वैसी दशामें वहाँ युद्ध करनेवाले लोग कैसे किसीपर प्रहार करें ॥ ६ ॥
अनुमानेन संज्ञाभिर्नामगोत्रैश्च संयुगे ।
वर्तते च तथा युद्धं तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ७ ॥
प्रजानाथ! उस रणक्षेत्रमें अनुमानसे, संकेतोंसे तथा नाम और गोत्रोंके उच्चारणसे अपने या पराये पक्षका निश्चय करके जहाँ-तहाँ युद्ध हो रहा था ॥ ७ ॥ न व्यूहो भिद्यते तत्र कौरवाणां कथंचन । रक्षितः सत्यसंधेन भारद्वाजेन संयुगे ॥ ८ ॥ सत्यप्रतिज्ञ भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित होनेके कारण कौरव-सेनाका व्यूह किसी प्रकार भंग न हो सका ॥ ८ ॥ तथैव पाण्डवानां च रक्षितः सव्यसाचिना । नाभिद्यत महाव्यूहो भीमेन च सुरक्षितः ॥ ९ ॥ इसी तरह सव्यसाची अर्जुन और भीमसे सुरक्षित पाण्डवोंके महाव्यूहका भी भेदन न हो सका ॥ ९ ॥ सेनाग्रादपि निष्पत्य प्रायुध्यंस्तत्र मानवाः । उभयोः सेनयो राजन् व्यतिषक्तरथद्विपाः ॥ १० ॥ वहाँ सेनाके अग्रभागसे भी निकलकर (व्यूह छोड़कर) वीर सैनिक युद्ध करते थे। राजन्! दोनों सेनाओंके रथ और हाथी परस्पर भिड़ गये ॥ १० ॥ हयारोहैर्हयारोहाः पात्यन्ते स्म महाहवे । ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च प्रासैरपि च संयुगे ॥ ११ ॥ उस महासमरमें घुड़सवार घुड़सवारोंको चमकीली ऋष्टियों और प्रासोंद्वारा मार गिराते थे ॥ ११ ॥ रथी रथिनमासाद्य शरैः कनकभूषणैः । पातयामास समरे तस्मिन्नतिभयङ्करे ॥ १२ ॥ वह संग्राम अत्यन्त भयानक हो रहा था। उसमें रथी रथियोंके सामने जाकर उन्हें स्वर्णभूषित बाणोंसे मार गिराते थे ॥ १२ ॥ गजारोहा गजारोहान् नाराचशरतोमरैः । संसक्तान् पातयामासुस्तव तेषां च सर्वशः ॥ १३ ॥ आपके और पाण्डव-पक्षके हाथीसवार अपनेसे भिड़े हुए विपक्षी हाथीसवारोंको सब ओरसे नाराच, बाण और तोमरोंकी मारसे धराशायी कर देते थे ॥ १३ ॥ कश्चिदुत्पत्य समरे वरवारणमास्थितः । केशपक्षे परामृश्य जहार समरे शिरः ॥ १४ ॥ कोई योद्धा रणक्षेत्रमें उछलकर बड़े-बड़े हाथियोंपर चढ़ जाता और विपक्षी योद्धाके केशोंको पकड़कर उसका सिर काट लेता था ॥ १४ ॥ अन्ये द्विरददन्ताग्रनिर्भिन्नहृदया रणे । वेमुश्च रुधिरं वीरा निःश्वसन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥
बहुत-से वीर युद्धस्थलमें हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागसे अपना हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण सब ओर लंबी साँस खींचते हुए मुखसे रक्त वमन कर रहे थे ॥ १५ ॥
कश्चित् करिविषाणस्थो वीरो रणविशारदः ।
प्रावेपच्छक्तिनिर्भिन्नो गजशिक्षास्त्रवेदिना ॥ १६ ॥
कोई रणविशारद वीर हाथीके दाँतोंपर खड़ा होकर युद्ध कर रहा था। इतनेहीमें गजशिक्षा और अस्त्रविद्याके ज्ञाता किसी विपक्षी योद्धाने उसके ऊपर शक्ति चला दी। उस शक्तिके आघातसे वक्षःस्थल विदीर्ण हो जानेके कारण वह मरणोन्मुख वीर वहीं काँपने लगा ॥ १६ ॥
पत्तिसङ्घा रणे पत्तीन् भिन्दिपालपरश्वधैः ।
न्यपातयन्त संहृष्टाः परस्परकृतागसः ॥ १७ ॥
हर्ष और उल्लासमें भरकर एक-दूसरेका अपराध करनेवाले पैदलसमूह विपक्षके पैदल सैनिकोंको भिन्दिपाल और फरसोंसे मार-मारकर रणभूमिमें गिरा रहे थे ॥ १७ ॥
रथी च समरे राजन्नासाद्य गजयूथपम् ।
सगजं पातयामास गजी स रथिनां वरम् ॥ १८ ॥
राजन्! उस समरभूमिमें कोई रथी किसी गजयूथ-पतिसे भिड़ जाता और सवार तथा हाथी दोनोंको मार गिराता था। उसी प्रकार गजारोही भी रथियोंमें श्रेष्ठ वीरका वध कर देता था ॥ १८ ॥
रथिनं च हयारोहः प्रासेन भरतर्षभ ।
पातयामास समरे रथी च हयसादिनम् ॥ १९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस संग्राममें घुड़सवार रथीको तथा रथी घुड़सवारको प्रासद्वारा मारकर धराशायी कर देता था ॥ १९ ॥
पदाती रथिनं संख्ये रथी चापि पदातिनम् ।
न्यपातयच्छितैः शस्त्रैः सेनयोरुभयोरपि ॥ २० ॥
दोनों ही सेनाओंमें पैदल वीर रथीको और रथी योद्धा पैदल सैनिकको अपने तीखे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा रणभूमिमें मार गिराता था ॥ २० ॥
गजारोहा हयारोहान् पातयाञ्चक्रिरे तदा ।
हयारोहा गजस्थांश्च तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २१ ॥
हाथीसवार घुड़सवारोंको और घुड़सवार हाथी-सवारोंको युद्धस्थलमें गिरा देते थे। ये घटनाएँ आश्चर्यजनक-सी प्रतीत होती थीं ॥ २१ ॥
गजारोहवरैश्चापि तत्र तत्र पदातयः ।
पातिताः समदृश्यन्त तैश्चापि गजयोधिनः ॥ २२ ॥
उस रणक्षेत्रमें जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ गजारोहियोंद्वारा गिराये हुए पैदल और पैदलोंद्वारा गिराये हुए हाथीसवार दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २२ ॥
पत्तिसङ्घा हयारोहैः सादिसङ्घाश्च पत्तिभिः । पात्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २३ ॥ घुड़सवारोंद्वारा पैदलोंके समूह और पैदलोंद्वारा घुड़सवारोंके समूह सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें गिराये जाते हुए दिखायी देते थे ॥ २३ ॥ ध्वजैस्तत्रापविद्धैश्च कार्मुकैस्तोमरैस्तथा । प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिघैः कम्पनैस्तथा ॥ २४ ॥ शक्तिभिः कवचैश्चित्रैः कणपैरङ्कुशैरपि । निस्त्रिंशैर्विमलैश्चापि स्वर्णपुङ्खैः शरैस्तथा ॥ २५ ॥ परस्तोमैः कुथाभिश्च कम्बलैश्च महाधनैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ स्रग्दामैरिव चित्रिता ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ इधर-उधर गिरे हुए ध्वज, धनुष, तोमर, प्रास, गदा, परिघ, कम्पन, शक्ति, विचित्र कवच, कणप, अंकुश, चमचमाते हुए खड्ग, सुवर्णमय पाँखवाले बाण, शूल, गद्दी और बहुमूल्य कम्बलोंद्वारा आच्छादित हुई वहाँकी भूमि भाँति-भाँतिके पुष्पहारोंसे चित्रित हुई-सी जान पड़ती थी ॥ २४—२६ ॥ नराश्वकायैः पतितैर्दन्तिभिश्च महाहवे । अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ २७ ॥ उस महासमरमें मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशें पड़ी हुई थीं। मांस और रक्तकी कीचड़ जम गयी थी। वहाँकी भूमिमें जाना असम्भव हो गया था ॥ २७ ॥ प्रशशाम रजो भौमं व्युक्षितं रणशोणितैः । दिशश्च विमलाः सर्वाः सम्बभूवुर्जनेश्वर ॥ २८ ॥ जनेश्वर! रणभूमिमें बहे हुए रक्तसे सिंचकर धरतीकी धूल बैठ गयी और सारी दिशाएँ साफ हो गयीं ॥ उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । चिह्नभूतानि जगतो विनाशार्थाय भारत ॥ २९ ॥ भारत! उस समय जगत्के विनाशको सूचित करनेवाले असंख्य कबन्ध चारों ओर उठने लगे ॥ २९ ॥ तस्मिन् युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे । प्रत्यदृश्यन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ॥ ३० ॥ उस अत्यन्त दारुण और महाभयंकर युद्धमें रथी योद्धा चारों ओर दौड़ते दिखायी देते थे ॥ ३० ॥ ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्धवश्च जयद्रथः । पुरुमित्रो जयो भोजः शल्यश्चापि ससौबलः ॥ ३१ ॥ एते समरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः ।
पाण्डवानामनीकानि बभञ्जुः स्म पुनः पुनः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर भीष्म, द्रोण, सिन्धुराज जयद्रथ, पुरुमित्र, जय, भोज, शल्य और शकुनि—ये सिंहतुल्य पराक्रमी रणदुर्जय वीर पाण्डवोंकी सेनाको बार-बार भंग करने लगे ॥ ३१-३२ ॥
तथैव भीमसेनोऽपि राक्षसश्च घटोत्कचः ।
सात्यकिश्चेकितानश्च द्रौपदेयाश्च भारत ॥ ३३ ॥
तावकांस्तव पुत्रांश्च सहितान् सर्वराजभिः ।
द्रावयामासुराजौ ते त्रिदशा दानवानिव ॥ ३४ ॥
भरतनन्दन! इसी प्रकार भीमसेन, राक्षस घटोत्कच, सात्यकि, चेकितान तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र—ये सब मिलकर जैसे देवता दानवोंको खदेड़ते हैं, उसी प्रकार समस्त राजाओंसहित आपके पुत्रों और सैनिकोंको रणभूमिमें भगाने लगे ॥ ३३-३४ ॥
तथा ते समरेऽन्योन्यं निघ्नन्तः क्षत्रियर्षभाः ।
रक्तोक्षिता घोररूपा विरेजुर्दानवा इव ॥ ३५ ॥
संग्रामभूमिमें एक-दूसरेको मारते हुए श्रेष्ठ क्षत्रिय वीर रक्तरंजित हो भयानक रूपधारी दानवोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ३५ ॥
विनिर्जित्य रिपून् वीराः सेनयोरुभयोरपि ।
व्यदृश्यन्त महामात्रा ग्रहा इव नभस्तले ॥ ३६ ॥
दोनों सेनाओंके वीर शत्रुओंको जीतकर आकाशमें फैले हुए विशाल ग्रहोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३६ ॥
ततो रथसहस्रेण पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
अभ्ययात् पाण्डवं युद्धे राक्षसं च घटोत्कचम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर आपका पुत्र दुर्योधन सहस्रों रथियोंके साथ पाण्डववंशी राक्षस घटोत्कचके साथ युद्ध करनेके लिये वहाँ आया ॥ ३७ ॥
तथैव पाण्डवाः सर्वे महत्या सेनया सह ।
द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ प्रत्युद्ययुररिंदमौ ॥ ३८ ॥
इसी प्रकार विशाल सेनाके साथ समस्त पाण्डव भी युद्धके लिये तैयार खड़े हुए शत्रुदमन द्रोणाचार्य और भीष्मसे भिड़नेके लिये आगे बढ़े ॥ ३८ ॥
किरीटी च ययौ क्रुद्धः समन्तात् पार्थिवोत्तमान् ।
आर्जुनिः सात्यकिश्चैव ययतुः सौबलं बलम् ॥ ३९ ॥
क्रोधमें भरे हुए किरीटधारी अर्जुन सब ओर खड़े हुए श्रेष्ठ राजाओंका सामना करनेके लिये चले। अभिमन्यु और सात्यकिने शकुनिकी सेनापर आक्रमण किया ॥ ३९ ॥
ततः प्रवृत्ते भूयः संग्रामो लोमहर्षणः ।
तावकानां परेषां च समरे विजयैषिणाम् ॥ ४० ॥
इस प्रकार युद्धमें विजय चाहनेवाले आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें पुन: रोमांचकारी संग्राम छिड़ गया ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीये युद्धदिवसे संकुलयुद्धे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें युद्धसम्बन्धी तीसरे दिनका घमासान युद्धविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
पाण्डव-वीरोंका पराक्रम, कौरव-सेनामें भगदड़ तथा दुर्योधन और भीष्मका संवाद
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
पाण्डव-वीरोंका पराक्रम, कौरव-सेनामें भगदड़ तथा दुर्योधन और भीष्मका संवाद
संजय उवाच
ततस्ते पार्थिवाः क्रुद्धाः फाल्गुनं वीक्ष्य संयुगे ।
रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! तदनन्तर वे समस्त भूपाल समरभूमिमें अर्जुनको देखते ही कुपित हो उठे और उन्होंने अनेक सहस्र रथियोंके साथ उन्हें सब ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥
अथैनं रथवृन्देन कोष्ठकीकृत्य भारत ।
शरैः सुबहुसाहस्रैः समन्तादभ्यवारयन् ॥ २ ॥
भरतनन्दन! उन राजाओंने रथसमूहद्वारा अर्जुनको सब ओरसे वेष्टित करके उनके ऊपर अनेक सहस्र बाणोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ २ ॥
शक्तिंश्च विमलास्तीक्ष्णा गदांश्च परिघैः सह ।
प्रासान् परश्वधांश्चैव मुद्गरान् मुसलानपि ॥ ३ ॥
चिक्षिपुः समरे क्रुद्धाः फाल्गुनस्य रथं प्रति ।
वे क्रोधमें भरकर युद्धमें अर्जुनके रथपर चमचमाती हुई शक्ति, दुःसह गदा, परिघ, प्रास, फरसे, मुद्गर और मूसल आदि अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३ ½ ॥
शस्त्राणामथ तां वृष्टिं शलभानामिवायतीम् ॥ ४ ॥
रुरोध सर्वतः पार्थः शरैः कनकभूषणैः ।
शलभोंकी श्रेणीके समान अस्त्र-शस्त्रोंकी उस वर्षाको अर्जुनने स्वर्णभूषित बाणोंद्वारा सब ओरसे रोक दिया ॥
तत्र तल्लाघवं दृष्ट्वा बीभत्सोरतिमानुषम् ॥ ५ ॥
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ।
साधु साध्विति राजेन्द्र फाल्गुनं प्रत्यपूजयन् ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! अर्जुनकी वह अलौकिक फुर्ती देख देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस साधु-साधु (वाह-वाह) कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५-६ ॥
सात्यकिश्चाभिमन्युश्च महत्या सेनया वृतौ ।
गान्धारान् समरे शूराञ्जग्मतुः सहसौबलान् ॥ ७ ॥
उधर विशाल सेनासे घिरे हुए सात्यकि और अभिमन्युने समरभूमिमें सुबलके पुत्रोंसहित गान्धारदेशीय शूरवीरोंपर आक्रमण किया ॥ ७ ॥
तत्र सौबलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेयस्य रथोत्तमम् । तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि ॥ ८ ॥ वहाँ जाते ही क्रोधमें भरे हुए सुबलपुत्रोंने युद्ध-स्थलमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सात्यकिके श्रेष्ठ रथको रोषपूर्वक तिल-तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
सात्यकिस्तु रथं त्यक्त्वा वर्तमाने भयावहे । अभिमन्यो रथं तूर्णमारुरोह परंतपः ॥ ९ ॥ तब शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि उस समय छिड़े हुए भयंकर संग्राममें अपने टूटे हुए रथको त्यागकर तुरंत ही अभिमन्युके रथपर जा बैठे ॥ ९ ॥
तावेकरथसंयुक्तौ सौबलेयस्य वाहिनीम् । व्यधमेतां शितैस्तूर्णं शरैः संनतपर्वभिः ॥ १० ॥ फिर एक ही रथपर बैठे हुए वे दोनों वीर झुकी हुई गाँठवाले पैने बाणोंसे तुरंत ही सुबलपुत्र शकुनिकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १० ॥
द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ धर्मराजस्य वाहिनीम् । नाशयेतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार एक ओरसे आकर युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले द्रोणाचार्य और भीष्मने कंकपक्षीके पंखोंसे युक्त तीखे बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ॥ ११ ॥
ततो धर्मसुतो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । मिषतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपादद्रवन् ॥ १२ ॥ तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेवने समस्त सेनाओंके देखते-देखते द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा किया ॥ १२ ॥
तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत् सुदारुणम् ॥ १३ ॥ जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त भयंकर देवासुर-संग्राम हुआ था, उसी प्रकार वहाँ अत्यन्त भयानक रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ १३ ॥
कुर्वाणौ सुमहत् कर्म भीमसेनघटोत्कचौ । (दुर्योधनस्य महतीं द्रावयामास वाहिनीम् ।) दुर्योधनस्ततोऽभ्येत्य तावुभावप्यवारयत् ॥ १४ ॥ दूसरी ओर भीमसेनने और घटोत्कचने महान् पराक्रमका परिचय देते हुए दुर्योधनकी विशाल वाहिनीको खदेड़ना आरम्भ किया। उस समय दुर्योधनने सामने आकर उन दोनोंको रोक दिया ॥ १४ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम हैडिम्बस्य पराक्रमम् । अतीत्य पितरं युद्धे यदयुध्यत भारत ॥ १५ ॥
भारत! वहाँ हमने हिडिम्बापुत्र घटोत्कचका अद्भुत पराक्रम देखा। वह रणक्षेत्रमें पितासे भी बढ़कर पुरुषार्थ प्रकट करते हुए युद्ध कर रहा था ॥ १५ ॥
भीमसेनस्तु संक्रुद्धो दुर्योधनममर्षणम् ।
हृद्यविध्यत् पृषत्केन प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ १६ ॥
क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनने हँसते हुए-से एक बाण मारकर अमर्षशील दुर्योधनकी छाती छेद डाली ॥ १६ ॥
ततो दुर्योधनो राजा प्रहारवरपीडितः ।
निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ॥ १७ ॥
तब उस बाणके गहरे आघातसे पीड़ित हो राजा दुर्योधन रथकी बैठकमें बैठ गया और उसे मूर्च्छा आ गयी ॥ १७ ॥
तं विसंज्ञं विदित्वा तु त्वरमाणोऽस्य सारथिः ।
अपोवाह रणाद् राजंस्ततः सैन्यमभज्यत ॥ १८ ॥
राजन्! उसे संज्ञाशून्य जानकर उसका सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया। फिर तो उसकी सेनामें भगदड़ मच गयी ॥ १८ ॥
ततस्तां कौरवीं सेनां द्रवमाणां समन्ततः ।
निघ्नन् भीमः शरैस्तीक्ष्णैरनुवव्राज पृष्ठतः ॥ १९ ॥
तब चारों ओर भागती हुई उस कौरव-सेनापर तीखे बाणोंका प्रहार करते हुए भीमसेन उसे पीछे-से खदेड़ने लगे ॥ १९ ॥
पार्षतश्च रथश्रेष्ठो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः ।
द्रोणस्य पश्यतः सैन्यं गाङ्गेयस्य च पश्यतः ॥ २० ॥
जघ्नतुर्विशिखैस्तीक्ष्णैः परानीकविनाशनैः ।
दूसरी ओरसे रथियोंमें श्रेष्ठ द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा धर्मपुत्र युधिष्ठिर शत्रु-सेनाका विनाश करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा द्रोणाचार्य और भीष्मके देखते-देखते कौरव-सेनाको पीड़ित करते हुए उसका पीछा करने लगे ॥ २० १/२ ॥
द्रवमाणं तु तत् सैन्यं तव पुत्रस्य संयुगे ॥ २१ ॥
नाशक्नुतां वारयितुं भीष्मद्रोणौ महारथौ ।
महाराज! उस युद्धस्थलमें आपके पुत्रकी भागती हुई सेनाको महारथी द्रोण और भीष्म भी रोक न सके ॥ २१ १/२ ॥
वार्यमाणं च भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २२ ॥
विद्रवत्येव तत् सैन्यं पश्यतोद्रोणभीष्मयोः ।
महामना भीष्म और द्रोणके रोकनेपर भी उनके सामने ही वह सेना भागती ही चली जा रही थी ॥ २२ १/२ ॥
ततो रथसहस्रेषु विद्रवत्सु ततस्ततः ॥ २३ ॥
तावास्थितावेकरथं सौभद्रशिनिपुङ्गवौ । सौबलीं समरे सेनां शातयेतां समन्ततः ॥ २४ ॥ उधर सहस्रों रथी जब इधर-उधर भाग रहे थे, उसी समय एक रथपर बैठे हुए अभिमन्यु और सात्यकि सुबलपुत्रकी सेनाका संग्रामभूमिमें सब ओरसे संहार करने लगे ॥ २३-२४ ॥ शुशुभाते तदा तौ तु शैनेयकुरुपुङ्गवौ । अमावास्यां गतौ यद्वत् सोमसूर्यौ नभस्तले ॥ २५ ॥ उस अवसरपर (एक रथमें बैठे हुए) सात्यकि और अभिमन्यु उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, जैसे अमावास्या तिथिको आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा एक ही स्थानमें सुशोभित होते हैं ॥ २५ ॥ अर्जुनस्तु ततः क्रुद्धस्तव सैन्यं विशाम्पते । ववर्ष शरवर्षेण धाराभिरिव तोयदः ॥ २६ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए अर्जुन आपकी सेनापर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, जैसे बादल पानीकी धारा बरसाता है ॥ २६ ॥ वध्यमानं ततस्तत्र शरैः पार्थस्य संयुगे । दुद्राव कौरवं सैन्यं विषादभयकम्पितम् ॥ २७ ॥ तब पार्थके बाणोंसे संग्रामभूमिमें पीड़ित हुई कौरव-सेना विषाद और भयसे काँपती हुई इधर-उधर भाग चली ॥ २७ ॥ द्रवतस्तान् समालक्ष्य भीष्मद्रोणौ महारथौ । न्यवारयेतां संरब्धौ दुर्योधनहितैषिणौ ॥ २८ ॥ उन योद्धाओंको भागते देख दुर्योधनका हित चाहनेवाले महारथी भीष्म और द्रोण क्रोधपूर्वक उन्हें रोकने लगे ॥ २८ ॥ ततो दुर्योधनो राजा समाश्वस्य विशाम्पते । न्यवर्तयत तत् सैन्यं द्रवमाणं समन्ततः ॥ २९ ॥ प्रजानाथ! इसी बीचमें राजा दुर्योधनकी मूर्च्छा दूर हो गयी और उसने आश्वस्त होकर चारों ओर भागती हुई सेनाको पुनः लौटाया ॥ २९ ॥ यत्र यत्र सुतस्तुभ्यं यं यं पश्यति भारत । तत्र तत्र न्यवर्तन्त क्षत्रियाणां महारथाः ॥ ३० ॥ भारत! आपका पुत्र दुर्योधन जहाँ-जहाँ जिस-जिसकी ओर दृष्टिपात करता, वहीं-वहींसे ऐसे योद्धा भी लौट आते थे जो क्षत्रियोंमें महारथी थे ॥ ३० ॥ तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव ततोऽन्येऽपीतरे जनाः । अन्योन्यस्पर्धया राजल्लँज्जया चावतस्थिरे ॥ ३१ ॥ राजन्! उन सबको लौटते देख दूसरे लोग भी एक-दूसरेकी स्पर्धा तथा लज्जाके कारण ठहर गये ॥ ३१ ॥
पुनरावर्ततां तेषां वेग आसीद् विशाम्पते । पूर्वतः सागरस्येव चन्द्रस्योदयनं प्रति ।। ३२ ।। महाराज! पुनः लौटते हुए उन योद्धाओंका महान् वेग चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए महासागरके समान जान पड़ता था ।। ३२ ।। संनिवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुयोधनः । अब्रवीत् त्वरितो गत्वा भीष्मं शान्तनवं वचः ।। ३३ ।। तब उन सबको लौटा हुआ देख राजा दुर्योधन तुरंत ही शान्तनुनन्दन भीष्मके पास जाकर बोला— ।। ३३ ।।
पितामह निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि भारत । नानुरूपमहं मन्ये त्वयि जीवति कौरव ।। ३४ ।। द्रोणे चास्त्रविदां श्रेष्ठे सपुत्रे ससुहृज्जने । कृपे चैव महेष्वासे द्रवते यद् वरूथिनी ।। ३५ ।। ‘पितामह भरतनन्दन! मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनिये। कुरुनन्दन! आपके, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यके और महाधनुर्धर कृपाचार्यके पुत्रों और सुहृदोंसहित जीते-जी जो मेरी सेना भाग रही है, इसे मैं आपलोगोंके योग्य नहीं मानता हूँ ।। ३४-३५ ।। न पाण्डवान् प्रतिबलांस्तव मन्ये कथंचन । तथा द्रोणस्य संग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ।। ३६ ।।
'मैं किसी तरह यह नहीं मान सकता कि पाण्डव संग्राममें आपके, द्रोणाचार्यके, कृपाचार्यके और अश्वत्थामाके समान बलवान् हैं ।। ३६ ।।
अनुग्राह्याः पाण्डुसुतास्तव नूनं पितामह ।
यथेमां क्षमसे वीर वध्यमानां वरूथिनीम् ।। ३७ ।।
'वीर पितामह! निश्चय ही पाण्डव आपके कृपापात्र हैं, तभी तो मेरी सेनाका वध हो रहा है और आप चुपचाप इसकी दुर्दशाको सहते चले जा रहे हैं ।।
सोऽस्मि वाच्यस्त्वया राजन् पूर्वमेव समागमे ।
न योत्स्ये पाण्डवान् संख्ये नापि पार्षतसात्यकी ।। ३८ ।।
'महाराज! यदि पाण्डवोंपर दया ही करनी थी तो आप युद्ध आरम्भ होनेके पहले ही मुझे यह बता देते कि मैं संग्रामभूमिमें पाण्डुपुत्रोंसे, धृष्टद्युम्नसे और सात्यकिसे भी युद्ध नहीं करूँगा ।। ३८ ।।
श्रुत्वा तु वचनं तुभ्यमाचार्यस्य कृपस्य च ।
कर्णेन सहितः कृत्यं चिन्तयानस्तदैव हि ।। ३९ ।।
'उस अवस्थामें आपका, आचार्यका तथा कृपका वचन सुनकर मैं कर्णके साथ उसी समय अपने कर्तव्यका निश्चय कर लेता ।। ३९ ।।
यदि नाहं परित्याज्यो युवाभ्यामिह संयुगे ।
विक्रमेणानुरूपेण युध्येतां पुरुषर्षभौ ।। ४० ।।
'यदि युद्धमें आप दोनोंको मेरा परित्याग करना उचित नहीं जान पड़ता हो तो द्रोणाचार्य और आप दोनों श्रेष्ठ पुरुष अपने योग्य पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध कीजिये' ।। ४० ।।
एतच्छ्रुत्वा वचो भीष्मः प्रहसन् वै मुहुर्मुहुः ।
अब्रवीत् तनयं तुभ्यं क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ।। ४१ ।।
यह सुनकर भीष्म बारंबार हँसकर क्रोधसे आँखें तरेरते हुए आपके पुत्रसे बोले — ।। ४१ ।।
बहुशोऽसि मया राजंस्तथ्यमुक्तो हितं वचः ।
अजेयाः पाण्डवा युद्धे देवैरपि सवासवैः ।। ४२ ।।
'राजन्! मैंने तुमसे अनेक बार यह सत्य और हितकी बात बतायी है कि युद्धमें पाण्डवोंको इन्द्र आदि देवता भी जीत नहीं सकते ।। ४२ ।।
यत् तु शक्यं मया कर्तुं वृद्धेनाद्य नृपोत्तम ।
करिष्यामि यथाशक्ति प्रेक्षेदानीं सबान्धवः ।। ४३ ।।
'नृपश्रेष्ठ! तो भी मुझ वृद्धके द्वारा जो कुछ किया जा सकता है, उसे आज यथाशक्ति करूँगा। तुम इस समय अपने भाइयोंसहित देखो ।। ४३ ।।
अद्य पाण्डुसुतानेकः ससैन्यान् सह बन्धुभिः ।