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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

अभिद्रुतं चास्त्रभृतां वरिष्ठं
धनंजयं वीक्ष्य शिखण्डिमुख्याः ॥ ९ ॥
अभ्युद्ययुस्ते शितशस्त्रहस्ता
रिरक्षिषन्तो रथमर्जुनस्य ।
अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनपर आक्रमण होता देख शिखण्डी आदि महारथी उनके रथकी रक्षा करनेके लिये तीखे अस्त्र-शस्त्र हाथमें लिये आगे बढ़े ॥ ९ १/२ ॥
पार्थोऽपि तानापततः समीक्ष्य
त्रिगर्तराज्ञा सहितान् नृवीरान् ॥ १० ॥
विध्वंसयित्वा समरे धनुष्मान्
गाण्डीवमुक्तैर्निशितैः पृषत्कैः ।
भीष्मं यियासुर्युधि संददर्श
दुर्योधनं सैन्धवादींश्च राज्ञः ॥ ११ ॥
इधर धनुर्धर अर्जुन भी त्रिगर्तराजके साथ उन नरवीरोंको आते देख संग्रामभूमिमें गाण्डीव धनुषसे छोड़े हुए तीखे बाणोंद्वारा उन्हें नष्ट करके भीष्मजीके पास जाना चाहते थे, इतनेहीमें उन्होंने युद्धस्थलमें राजा दुर्योधन और सिन्धुराज जयद्रथ आदिको देखा ॥ १०-११ ॥
संवारयिष्णूनभिवारयित्वा
मुहूर्तमायोध्य बलेन वीरः ।
उत्सृज्य राजानमनन्तवीर्यो
जयद्रथादींश्च नृपान् महौजाः ॥ १२ ॥
ययौ ततो भीमबलो मनस्वी
गाङ्गेयमाजौ शरचापपाणिः ।
दुर्योधन और जयद्रथ आदि योद्धा अर्जुनको रोकनेके प्रयत्नमें लगे थे; अतः उस समय अनन्त पराक्रमी एवं महातेजस्वी वीर अर्जुनने दो घड़ीतक बलपूर्वक युद्ध करके उन सबको रोक दिया। तत्पश्चात् राजा दुर्योधन और जयद्रथ आदि नरेशोंको वहीं छोड़कर भयंकर बलसे सम्पन्न एवं मनस्वी अर्जुन हाथमें धनुष-बाण ले युद्धस्थलमें गंगानन्दन भीष्मकी ओर चल दिये ॥ १२ १/२ ॥
(भीष्मोऽपि दृष्ट्वा समरे कृतास्त्रान्
स पाण्डवानां रथिनो ह्युदारान् ।
विहाय संग्राममुखे धनंजयं
जवेन पार्थं पुनराजगाम ॥)
भीष्म भी अस्त्र-विद्याके विद्वान् एवं उदार पाण्डवरथियोंको युद्धस्थलमें अपने सामने देखते हुए भी उन सबको वहीं छोड़कर बड़े वेगसे पुनः अर्जुनके पास आये।

युधिष्ठिरश्च प्रबलो महात्मा समाययौ त्वरितो जातकोपः ॥ १३ ॥ मद्राधिपं समभित्यज्य संख्ये स्वभागमाप्तं तमनन्तकीर्तिः । सार्धं स माद्रीसुतभीमसेनै- र्भीष्मं ययौ शान्तनवं रणाय ॥ १४ ॥ उस समय उत्कृष्ट बलशाली अनन्तकीर्ति महात्मा युधिष्ठिर भी युद्धमें अपने भागके रूपमें प्राप्त हुए मद्राज शल्यको छोड़कर नकुल, सहदेव और भीमसेनके साथ क्रोधपूर्वक तुरंत वहाँसे चल दिये और युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मके पास जा पहुँचे ॥ १३-१४ ॥ तैः सम्प्रयुक्तैः स महारथाग्र्यै- र्गङ्गासुतः समरे चित्रयोधी । न विव्यथे शान्तनवो महात्मा समागतैः पाण्डुसुतैः समस्तैः ॥ १५ ॥ महारथियोंमें श्रेष्ठ समस्त पाण्डव संगठित होकर वहाँ आ पहुँचे थे तो भी उनसे समरांगणमें विचित्र युद्ध करनेवाले गंगापुत्र शान्तनुनन्दन महात्मा भीष्मको व्यथा नहीं हुई ॥ १५ ॥ अथैत्य राजा युधि सत्यसंधो जयद्रथोऽत्युग्रबलो मनस्वी । चिच्छेद चापानि महारथानां प्रसह्य तेषां धनुषा वरेण ॥ १६ ॥ तत्पश्चात् सत्यप्रतिज्ञ अत्यन्त भयंकर शक्तिशाली मनस्वी राजा जयद्रथने रणमें सामने आकर उत्तम धनुषद्वारा बलपूर्वक उन महारथियोंके धनुष काट डाले ॥ १६ ॥ युधिष्ठिरं भीमसेनं यमौ च पार्थं कृष्णं युधि संजातकोपः । दुर्योधनः क्रोधविषो महात्मा जघान बाणैरनलप्रकाशैः ॥ १७ ॥ क्रोधरूपी विष उगलनेवाले महामनस्वी दुर्योधनने युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव, अर्जुन तथा श्रीकृष्णपर युद्धमें कुपित हो अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका प्रहार किया ॥ १७ ॥ कृपेण शल्येन शलेन चैव तथा विभो चित्रसेनेन चाजौ । विद्धाः शरैस्तेऽतिविवृद्धकोपै- र्देवा यथा दैत्यगणैः समेतैः ॥ १८ ॥

प्रभो! जैसे क्रोधमें भरे हुए दैत्यगण एकत्र हो देवताओंपर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार कृपाचार्य, शल्य, शल तथा चित्रसेनने युद्धस्थलमें अत्यन्त क्रोधमें भरकर समस्त पाण्डवोंको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १८ ॥

छिन्नायुधं शान्तनवेन राजा शिखण्डिनं प्रेक्ष्य च जातकोपः। अजातशत्रुः समरे महात्मा शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम् ॥ १९ ॥

शान्तनुनन्दन भीष्मने जब शिखण्डीका धनुष काट दिया,* तब समरांगणमें अजातशत्रु महात्मा युधिष्ठिर शिखण्डीकी ओर देखकर कुपित हो उठे और उससे क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ १९ ॥

उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा- महं हनिष्यामि महाव्रतं तम् । भीष्मं शरौघैर्विमलार्कवर्णैः सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा ॥ २० ॥ त्वया च नैनां सफलां करोषि देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे । मिथ्याप्रतिज्ञो भव मात्र वीर रक्ष स्वधर्मं स्वकुलं यशश्च ॥ २१ ॥

‘वीर! तुमने अपने पिताके सामने प्रतिज्ञापूर्वक मुझसे यह कहा था कि ‘मैं महान् व्रतधारी भीष्मको निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी बाणसमूहोंद्वारा अवश्य मार डालूँगा, यह बात मैं सत्य कहता हूँ।’ ऐसी प्रतिज्ञा तुमने की थी; परंतु तुम इस प्रतिज्ञाको सफल नहीं करते हो। कारण कि युद्धमें देवव्रत भीष्मका वध नहीं कर रहे हो। झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला न बनो। अपने धर्म, कुल और यशकी रक्षा करो ॥ २०-२१ ॥

प्रेक्षस्व भीष्मं युधि भीमवेगं सर्वांस्तपन्तं मम सैन्यसंघान् । शरौघजालैरतितिग्मवेगैः कालं यथा कालकृतं क्षणेन ॥ २२ ॥

‘देखो! जैसे यमराज समयानुसार उपस्थित होकर क्षणभरमें देहधारीका विनाश कर देते हैं, उसी प्रकार ये युद्धमें भयंकर वेगशाली भीष्म अत्यन्त प्रचण्ड वेगवाले बाणसमूहोंके द्वारा मेरी समस्त सेनाओंको कितना संताप दे रहे हैं ॥ २२ ॥

निकृत्तचापः समरेऽनपेक्षः पराजितः शान्तनवेन चाजौ । विहाय बन्धूनथ सोदरांश्च

क्व यास्यसे नानुरूपं तवेदम् ॥ २३ ॥
‘युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मने तुम्हारा धनुष काटकर तुम्हें पराजित कर दिया; फिर भी तुम उनकी ओरसे निरपेक्ष हो रहे हो। अपने सगे भाइयोंको छोड़कर कहाँ जाओगे? यह कायदा तुम्हारे अनुरूप नहीं है ।। २३ ।।
दृष्ट्वा हि भीष्मं तमनन्तवीर्यं
भग्नं च सैन्यं द्रवमाणमेवम् ।
भीतोऽसि नूनं द्रुपदस्य पुत्र
तथा हि ते मुखवर्णोऽप्रहृष्टः ॥ २४ ॥
‘द्रुपदकुमार! अनन्त पराक्रमी भीष्मको तथा उनके डरसे इस प्रकार हतोत्साह होकर भागती हुई मेरी इस सेनाको देखकर निश्चय ही तुम डर गये हो; क्योंकि तुम्हारे मुखकी कान्ति कुछ ऐसी ही अप्रसन्न दिखायी देती है ॥ २४ ॥
अज्ञायमाने च धनंजयेऽपि
महाहवे सम्प्रसक्ते नृवीरे ।
कथं हि भीष्मात् प्रथितः पृथिव्यां
भयं त्वमद्य प्रकरोषि वीर ॥ २५ ॥
‘वीर! नरवीर अर्जुन कहीं महायुद्धमें फँसे हुए हैं। उनका इस समय पता नहीं है। ऐसे समयमें तुम आज भूमण्डलके विख्यात वीर होकर भीष्मसे भय कैसे कर रहे हो?’ ।। २५ ।।
स धर्मराजस्य वचो निशम्य
रूक्षाक्षरं विप्रलापानुबद्धम् ।
प्रत्यादेशं मन्यमानो महात्मा
प्रतत्वरे भीष्मवधाय राजन् ॥ २६ ॥
राजन्! धर्मराजके इस वचनमें प्रत्येक अक्षर रूखेपनसे भरा हुआ था। उसके द्वारा उन्होंने कितनी ही मनके विपरीत बातें कही थीं, तथापि उस वचनको सुनकर महामना शिखण्डीने इसे अपने लिये आदेश माना और तुरंत ही भीष्मका वध करनेके लिये सचेष्ट हो गया ।। २६ ।।
तमापतन्तं महता जवेन
शिखण्डिनं भीष्ममभिद्रवन्तम् ।
निवारयामास हि शल्य एन-
मस्त्रेण घोरेण सुदुर्जयेन ॥ २७ ॥
शिखण्डीको बड़े वेगसे आते और भीष्मपर धावा करते देख शल्यने अत्यन्त दुर्जय एवं भयंकर अस्त्रसे उसे रोक दिया! ।। २७ ।।
स चापि दृष्ट्वा समुदीर्यमाण-

मस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रकाशम् । न सम्मुमोह द्रुपदस्य पुत्रो राजन् महेन्द्रप्रतिमप्रभावः ॥ २८ ॥ राजन्! प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी उस अस्त्रको प्रकट हुआ देखकर देवराज इन्द्रके समान प्रभावशाली द्रुपदकुमार शिखण्डी घबराया नहीं ॥ २८ ॥ तस्थौ च तत्रैव महाधनुष्मान्- शरैस्तदस्त्रं प्रतिबाधमानः । अथाददे वारुणमन्यदस्त्रं शिखण्ड्यथोग्रं प्रतिघातमस्य ॥ २९ ॥ वह महाधनुर्धर वीर अपने बाणोंद्वारा शल्यके अस्त्रका निवारण करता हुआ वहीं डटा रहा। फिर शिखण्डीने शल्यके अस्त्रका प्रतिघात करनेवाले अन्य भयंकर वारुणास्त्रको हाथमें लिया ॥ २९ ॥ तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च । भीष्मस्तु राजन् समरे महात्मा धनुश्च चित्रं ध्वजमेव चापि ॥ ३० ॥ छित्त्वानदत् पाण्डुसुतस्य वीरो युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः । आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा रणक्षेत्रमें आये हुए राजाओंने देखा, शिखण्डीके दिव्यास्त्रसे शल्यका अस्त्र विदीर्ण हो रहा है। राजन्! महात्मा एवं वीर भीष्म युद्धस्थलमें अजमीढ़कुलनन्दन पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके विचित्र धनुष और ध्वजको काटकर गर्जना करने लगे ॥ ३० १/२ ॥ ततः समुत्सृज्य धनुः सबाणं युधिष्ठिरं वीक्ष्य भयाभिभूतम् ॥ ३१ ॥ गदां प्रगृह्याभिपपात संख्ये जयद्रथं भीमसेनः पदातिः । तब धनुष-बाण फेंककर भयसे दबे हुए युधिष्ठिरको देखकर भीमसेन गदा लेकर युद्धमें पैदल ही राजा जयद्रथपर टूट पड़े ॥ ३१ १/२ ॥ तमापतन्तं सहसा जवेन जयद्रथः सगदं भीमसेनम् ॥ ३२ ॥ विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः शितैःशरैः पञ्चशतैः समन्तात् ।

इस प्रकार सहसा हाथमें गदा लिये भीमसेनको वेगपूर्वक आते देख जयद्रथने यमदण्डके समान भयंकर पाँच सौ तीखे बाणोंद्वारा सब ओरसे उन्हें घायल कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥

अचिन्तयित्वा स शरांस्तरस्वी वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः ॥ ३३ ॥ जघान वाहान् समरे समन्तात् पारावतान् सिन्धुराजस्य संख्ये । वेगशाली भीमसेन उसके बाणोंकी कोई परवा न करते हुए मन-ही-मन क्रोधसे जल उठे। तत्पश्चात् उन्होंने समरभूमिमें सिन्धुराजके कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंको मार डाला ॥ ३३ १/२ ॥

ततोऽभिवीक्ष्याप्रतिमप्रभाव- स्तवात्मजस्त्वरमाणो रथेन ॥ ३४ ॥ अभ्याययौ भीमसेनं निहन्तुं समुद्यतास्त्रः सुरराजकल्पः । यह देखकर आपका अनुपम प्रभावशाली पुत्र देवराजसदृश दुर्योधन भीमसेनको मारनेके लिये हथियार उठाये बड़ी उतावलीके साथ रथके द्वारा वहाँ आ पहुँचा ॥ ३४ १/२ ॥

भीमोऽप्यथैनं सहसा विनद्य प्रत्युद्ययौ गदया तर्जयन्: ॥ ३५ ॥ तब भीमसेन भी सहसा सिंहनाद करके गदाद्वारा गर्जन-तर्जन करते हुए जयद्रथकी ओर बढ़े ॥ ३५ ॥

(जयद्रथो भग्नवाहो रथं तं त्यक्त्वा ययौ यत्र राजा कुरूणाम् । स सौबलः सानुगः सानुजश्च दृष्ट्वा भीमं मूढचेता भयार्तः ॥ घोड़ोंके मारे जानेपर जयद्रथ उस रथको छोड़कर जहाँ शकुनि, सेवकवृन्द तथा छोटे भाइयोंसहित कुरुराज दुर्योधन था, वहीं चला गया। भीमसेनको देखकर जयद्रथका मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था। वह भयसे पीड़ित हो रहा था।

भीमोऽप्यथैनं सहसा विनद्य प्रत्युद्ययौ गदया हन्तुकामः । स सौबलं तव पुत्रं निरीक्ष्य दुर्योधनं सानुजं रोषयुक्तः ॥) भीमसेन भी शकुनि और भाइयोंसहित आपके पुत्र दुर्योधनको देखकर रोषमें भर गये और सहसा गर्जना करके गदाद्वारा जयद्रथको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़े।

समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां दृष्ट्वा गदां ते कुरवः समन्तात् । विहाय सर्वे तव पुत्रमुग्रं पातं गदायाः परिहर्तुकामाः ॥ ३६ ॥ अपक्रान्तास्तुमुले सम्प्रमर्दे सुदारुणे भारत मोहनीये । अमूढचेतास्त्वथ चित्रसेनो महागदामापतन्तीं निरीक्ष्य ॥ ३७ ॥ यमदण्डके समान भयंकर उस गदाको उठी हुई देख समस्त कौरव आपके पुत्रको वहीं छोड़कर गदाके उग्र आघातसे बचनेके लिये चारों ओर भाग गये। भारत! मोहमें डालनेवाले उस अत्यन्त दारुण एवं भयंकर जनसंहारमें उस महागदाको आती देख केवल चित्रसेनका चित्त किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हुआ था ॥ ३६-३७ ॥

रथं स्वमुत्सृज्य पदातिराजौ प्रगृह्य खड्गं विपुलं च चर्म । अवप्लुतः सिंह इवाचलाग्रा- ज्जगामान्यं भूमिप भूमिदेशम् ॥ ३८ ॥ राजन्! वह अपने रथको छोड़कर हाथमें बहुत बड़ी ढाल और तलवार ले पर्वतके शिखरसे सिंहकी भाँति कूद पड़ा और पैदल ही विचरता हुआ युद्धस्थलके दूसरे प्रदेशमें चला गया ॥ ३८ ॥

गदापि सा प्राप्य रथं सुचित्रं साश्वं ससूतं विनिहत्य संख्ये । जगाम भूमिं ज्वलिता महोल्का भ्रष्टाम्बराद् गामिव सम्पतन्ती ॥ ३९ ॥ वह गदा भी चित्रसेनके विचित्र रथपर पहुँचकर उसे घोड़े और सारथिसहित चूर-चूर करके आकाशसे टूटकर पृथ्वीपर गिरनेवाली जलती हुई विशाल उल्काके समान रणभूमिमें जा गिरी ॥ ३९ ॥

आश्चर्यभूतं समहत् त्वदीया दृष्ट्वैव तद् भारत सम्प्रहृष्टाः । सर्वे विनेदुः सहिताः समन्तात् पुपूजिरे तव पुत्रस्य शौर्यम् ॥ ४० ॥ भारत! इस समय आपके समस्त सैनिक चित्रसेनका वह महान् आश्चर्यमय कार्य देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वे सभी सब ओरसे एक साथ आपके पुत्रके शौर्यकी प्रशंसा और गर्जना करने लगे ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमयुद्धदिवसे
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सातवें दिनके युद्धसे सम्बन्ध
रखनेवाला पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके तीन श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं।]


$\underline{*}$ भीष्मपितामहने शिखण्डीको अपने ऊपर प्रहार करनेके लिये आया देखकर ही उसके धनुषको काट दिया था, उसके शरीरपर कोई प्रहार नहीं किया। अतः कोई दोष नहीं है।

अध्याय (पृष्ठ 2036)

⬅ विषय-सूची (TOC)

षडशीतितमोऽध्यायः

भीष्म और युधिष्ठिरका युद्ध, धृष्टद्युम्न और सात्यकिके साथ विन्द और अनुविन्दका संग्राम, द्रोण आदिका पराक्रम और सातवें दिनके युद्धकी समाप्ति

संजय उवाच

विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं यशस्विनम् ।
रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तव ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! रथहीन हुए अपने यशस्वी भाई चित्रसेनके पास जाकर आपके पुत्र विकर्णने उसे अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ १ ॥

तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भृशम् ।
भीष्मः शान्तनवस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ २ ॥
जब इस प्रकार भयंकर और घमासान युद्ध होने लगा, उसी समय शान्तनुनन्दन भीष्मने तुरंत ही राजा युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ २ ॥

ततः सरथनागाश्वाः समकम्पन्त सृंजयाः ।
मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥
यह देख सृंजयवीर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित काँप उठे। उन्होंने युधिष्ठिरको मौतके मुखमें पड़ा हुआ ही समझा ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो यमाभ्यां सहितः प्रभुः ।
महेष्वासं नरव्याघ्रं भीष्मं शान्तनवं ययौ ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन राजा युधिष्ठिर भी नकुल और सहदेवके साथ महाधनुर्धर पुरुषसिंह शान्तनुनन्दन भीष्मका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ४ ॥

ततः शरसहस्राणि प्रमुञ्चन् पाण्डवो युधि ।
भीष्मं संछादयामास यथा मेघो दिवाकरम् ॥ ५ ॥
जैसे मेघ सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें हजारों बाणोंकी वर्षा करते हुए पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने भीष्मको आच्छादित कर दिया ॥ ५ ॥

तेन सम्यक् प्रणीतानि शरजालानि मारिष ।
प्रतिजग्राह गाङ्गेयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६ ॥
आर्य! उनके द्वारा अच्छी तरह चलाये हुए सैकड़ों और हजारों बाणोंके समूहको गंगानन्दन भीष्मने ग्रहण कर लिया (अपने बाणोंद्वारा विफल कर दिया) ॥ ६ ॥

तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष ।

आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव ।। ७ ।। आर्य! इसी प्रकार भीष्मके चलाये हुए बाणसमूह भी आकाशमें पक्षियोंके झुंडके समान दिखायी देने लगे ।। ७ ।। निमेषार्धेन कौन्तेयं भीष्मः शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः ।। ८ ।। शान्तनुनन्दन भीष्मने युद्धस्थलमें आधे निमेषमें ही पृथक्-पृथक् बाणोंका जाल-सा बिछाकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको अदृश्य कर दिया ।। ८ ।। ततो युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्य महात्मनः । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम् ।। ९ ।। तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने कुरुवंशी महात्मा भीष्मपर विषधर सर्पके समान नाराचका प्रहार किया ।। ९ ।। असम्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः । चिच्छेद समरे राजन् भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम् ।। १० ।। राजन्! परंतु महारथी भीष्मने युधिष्ठिरके धनुषसे छूटे हुए उस नाराचको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही समरभूमिमें एक क्षुरप्रद्वारा काट गिराया ।। १० ।। तं तु छित्त्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसम्मितम् । निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान् काञ्चनभूषणान् ।। ११ ।। इस प्रकार रणभूमिमें कालके समान भयंकर उस नाराचको काटकर भीष्मने कौरवराज युधिष्ठिरके सुवर्णाभूषणोंसे युक्त घोड़ोंको मार डाला ।। ११ ।। (हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शक्तिं चिक्षेप धर्मराट् । तामापतन्तीं सहसा कालपाशोपमां शिताम् ।। चिच्छेद समरे भीष्मः शरैः संनतपर्वभिः ।।) घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथमें खड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरने भीष्मपर शक्ति चलायी। कालपाशके समान तीखी एवं भयंकर उस शक्तिको सहसा अपनी ओर आती देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसे रणभूमिमें काट गिराया। हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । आरुरोह रथं तूर्णं नकुलस्य महात्मनः ।। १२ ।। तदनन्तर जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथको त्यागकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर तुरंत ही महामना नकुलके रथपर आरूढ़ हो गये ।। १२ ।। यमावपि हि संक्रुद्धः समासाद्य रणे तदा । शरैः संछादयामास भीष्मः परपुरंजयः ।। १३ ।। उस समय रणक्षेत्रमें नकुल और सहदेवको पाकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मने अत्यन्त कुपित हो उन्हें बाणोंसे आच्छादित कर दिया ।। १३ ।।

तौ तु दृष्ट्वा महाराज भीष्मबाणप्रपीडितौ । जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य वधकाङ्क्षया ॥ १४ ॥ महाराज! नकुल और सहदेवको भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित देख युधिष्ठिर अपने मनमें भीष्मके वधकी इच्छा लेकर गहन विचार करने लगे ॥ १४ ॥

ततो युधिष्ठिरो वश्यान् राज्ञस्तान् समचोदयत् । भीष्मं शान्तनवं सर्वे निहतेति सुहृद्गणान् ॥ १५ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने वशवर्ती नरेशों तथा सुहृद्गणोंको यह आदेश दिया कि सब लोग मिलकर शान्तनुनन्दन भीष्मको मार डालो ॥ १५ ॥

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् । महता रथवंशेन परिवव्रुः पितामहम् ॥ १६ ॥ तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरका यह कथन सुनकर समस्त राजाओंने विशाल रथसमूहके द्वारा पितामह भीष्मको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १६ ॥

स समन्तात् परिवृतः पिता देवव्रतस्तव । चिक्रीड धनुषा राजन् पातयानो महारथान् ॥ १७ ॥ राजन्! सब ओरसे घिरे हुए आपके ताऊ देवव्रत सब महारथियोंको धराशायी करते हुए अपने धनुषके द्वारा क्रीड़ा करने लगे ॥ १७ ॥

तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि । मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने ॥ १८ ॥ जैसे सिंहका बच्चा वनके भीतर मृगोंके झुंडमें घुसकर खेल कर रहा हो, उसी प्रकार कुन्तीकुमारोंने युद्धमें विचरते हुए कुरुवंशी भीष्मको वहाँ देखा ॥ १८ ॥

तर्जयानं रणे वीरांस्त्रासयानं च सायकैः । दृष्ट्वा त्रेसुर्महाराज सिंहं मृगगणा इव ॥ १९ ॥ महाराज! वे रणभूमिमें वीरोंको डाँटते और बाणोंके द्वारा उन्हें त्रास देते थे। जैसे मृगोंके समूह सिंहको देखकर डर जाते हैं, उसी प्रकार सब राजा भीष्मको देखकर भयभीत हो गये ॥ १९ ॥

रणे भारतसिंहस्य ददृशुः क्षत्रिया गतिम् । अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्षं दिधक्षतः ॥ २० ॥ जैसे वायुकी सहायतासे घास-फूसको जलानेकी इच्छावाली अग्नि अत्यन्त प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार भरतवंशके सिंह भीष्मके स्वरूपको रणक्षेत्रमें क्षत्रियोंने अत्यन्त तेजस्वी देखा ॥ २० ॥

शिरांसि रथिनां भीष्मः पातयामास संयुगे । तालेभ्यः परिपक्वानि फलानि कुशलो नरः ॥ २१ ॥

भीष्म उस युद्धस्थलमें रथियोंके मस्तक काट-काटकर उसी प्रकार गिराने लगे, जैसे कोई कुशल मनुष्य ताड़के वृक्षोंसे पके हुए फलोंको गिरा रहा हो ॥ २१ ॥ पतद्भिश्च महाराज शिरोभिर्धरणीतले । बभूव तुमुलः शब्दः पततामश्मनामिव ॥ २२ ॥ महाराज! भूतलपर पटापट गिरते हुए मस्तकोंका आकाशसे पृथ्वीपर पड़नेवाले पत्थरोंके समान भयंकर शब्द हो रहा था ॥ २२ ॥ तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान् ॥ २३ ॥ उस भयानक तुमुल युद्धके होते समय सभी सेनाओंका आपसमें भारी संघर्ष हो गया ॥ २३ ॥ भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् । एकमेकं समाहूय युद्धायैवावतस्थिरे ॥ २४ ॥ उन सबका व्यूह भंग हो जानेपर भी सम्पूर्ण क्षत्रिय परस्पर एक-एकको ललकारते हुए युद्धके लिये डटे ही रहे ॥ २४ ॥ शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २५ ॥ शिखण्डी भरतवंशके पितामह भीष्मके पास पहुँचकर उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २५ ॥ अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे । प्रययौ सृंजयान् क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिनः ॥ २६ ॥ किंतु भीष्मने शिखण्डीके स्त्रीत्वका चिन्तन करके युद्धमें उसकी अवहेलना कर दी और सृंजयवंशी क्षत्रियोंपर क्रोधपूर्वक आक्रमण किया ॥ २६ ॥ सृंजयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे । सिंहनादांश्च विविधांश्चक्रुः शङ्खविमिश्रितान् ॥ २७ ॥ तब सृंजयगण उस महायुद्धमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए भीष्मको देखकर शंखध्वनिके साथ नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे ॥ २७ ॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् । पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो ॥ २८ ॥ प्रभो! जब सूर्य पश्चिम दिशामें ढलने लगे, उस समय युद्धका रूप और भी भयंकर हो गया। रथ-से-रथ और हाथी-से-हाथी भिड़ गये ॥ २८ ॥ धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च महारथः । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभिः ॥ २९ ॥

पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न तथा महारथी सात्यकि—ये दोनों शक्ति और तोमरोंकी वर्षासे कौरव-सेनाको अत्यन्त पीड़ा देने लगे ॥ २९ ॥ शस्त्रैश्च बहुभी राजन् जघ्नुस्तावकान् रणे । ते हन्यमानाः समरे तावका भरतर्षभ ॥ ३० ॥ आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति स्म संयुगम् । यथोत्साहं तु समरे निजघ्नुस्तावका रणे ॥ ३१ ॥ राजन्! उन दोनोंने युद्धमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा आपके सैनिकोंका संहार करना आरम्भ किया। भरतश्रेष्ठ! उनके द्वारा समरमें मारे जाते हुए आपके सैनिक युद्धविषयक श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर ही संग्राम छोड़कर भाग नहीं रहे थे। आपके योद्धा भी रणक्षेत्रमें पूर्ण उत्साहके साथ शत्रुओंका संहार करते थे ॥ ३०-३१ ॥ तत्राक्रन्दो महानासीत् तावकानां महात्मनाम् । वध्यतां समरे राजन् पार्षतेन महात्मना ॥ ३२ ॥ राजन्! महामना धृष्टद्युम्न समरांगणमें जब आपके योद्धाओंका वध कर रहे थे, उस समय उन महामनस्वी वीरोंका आर्तक्रन्दन बड़े जोरसे सुनायी देता था ॥ ३२ ॥ तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं प्रत्युपस्थितौ ॥ ३३ ॥ आपके सैनिकोंका वह घोर आर्तनाद सुनकर अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द धृष्टद्युम्नका सामना करनेके लिये उपस्थित हुए ॥ ३३ ॥ तौ तस्य तुरगान् हत्वा त्वरमाणौ महारथौ । छादयामासतुर्भो शरवर्षेण पार्षतम् ॥ ३४ ॥ उन दोनों महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ धृष्टद्युम्नके घोड़ोंको मारकर उन्हें भी अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ अवप्लुत्याथ पाञ्चाल्यो रथात् तूर्णं महाबलः । आरुरोह रथं तूर्णं सात्यकेस्तु महात्मनः ॥ ३५ ॥ तब महाबली धृष्टद्युम्न तुरंत ही अपने रथसे कूदकर महामना सात्यकिके रथपर शीघ्रतापूर्वक चढ़ गये ॥ ३५ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा महत्या सेनया वृतः । आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात् स परंतपौ ॥ ३६ ॥ तदनन्तर विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंको तपानेवाले और क्रोधमें भरे हुए विन्द-अनुविन्दपर आक्रमण किया ॥ ३६ ॥ तथैव तव पुत्रोऽपि सर्वोद्योगेन मारिष । विन्दानुविन्दौ समरे परिवार्यावतस्थिवान् ॥ ३७ ॥

आर्य! इसी प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन भी सम्पूर्ण उद्योगसे समरभूमिमें विन्द और अनुविन्दकी रक्षाके लिये उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ा हो गया॥ ३७॥ अर्जुनश्चापि संक्रुद्धः क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः। अयोधयत संग्रामे वज्रपाणिरिवासुरान्॥ ३८॥ क्षत्रियशिरोमणि अर्जुन भी अत्यन्त कुपित होकर क्षत्रियोंके साथ संग्रामभूमिमें उसी प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंके साथ करते हैं॥ ३८॥ द्रोणस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत् तव। व्यधमत् सर्वपञ्चालांस्तूलराशिमिवानलः॥ ३९॥ आपके पुत्रका प्रिय करनेवाले द्रोणाचार्य भी युद्धमें कुपित होकर समस्त पांचालोंका विनाश करने लगे, मानो आग रूईके ढेरको जला रही हो॥ ३९॥ दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशाम्पते। परिवार्य रणे भीष्मं युयुधुः पाण्डवैः सह॥ ४०॥ प्रजानाथ! आपके दुर्योधन आदि पुत्र रणक्षेत्रमें भीष्मको घेरकर पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ४०॥ ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे। अब्रवीत् तावकान् सर्वांस्त्वरध्वमिति भारत॥ ४१॥ भारत! तदनन्तर जब सूर्यदेवपर संध्याकी लाली छाने लगी, तब राजा दुर्योधनने आपके सभी योद्धाओंसे कहा—जल्दी करो॥ ४१॥ युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम्। अस्तं गिरिमथारूढे अप्रकाशति भास्करे॥ ४२॥ प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी। गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन क्षणदामुखे॥ ४३॥ फिर तो वे सब योद्धा वेगसे युद्ध करते हुए दुष्कर पराक्रम प्रकट करने लगे। उसी समय सूर्य अस्ताचलको चले गये और उनका प्रकाश लुप्त हो गया। इस प्रकार संध्या होते-होते क्षणभरमें रक्तके प्रवाहसे परिपूर्ण भयानक नदी बह चली और उसके तटपर गीदड़ोंकी भीड़ जमा हो गयी॥ ४२-४३॥ शिवाभिरशिवाभिश्च रुवद्भिर्भैरवं रवम्। घोरमायोधनं जज्ञे भूतसंघैः समाकुलम्॥ ४४॥ भैरव रव फैलानेवाली अमंगलमयी सियारिनों तथा भूतगणोंसे व्याप्त होकर वह युद्धका मैदान अत्यन्त भयानक हो गया॥ ४४॥ राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथान्ये पिशिताशिनः। समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः॥ ४५॥

चारों ओर राक्षस, पिशाच तथा अन्य मांसाहारी जन्तु सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दिखायी देने लगे ॥ ४५ ॥ अर्जुनोऽथ सुशर्माणं राज्ञस्तान् सपदानुगान् । विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिविरं प्रति ॥ ४६ ॥ तदनन्तर अर्जुन राजा दुर्योधनके पीछे चलनेवाले सुशर्मा आदिको सेनामें पराजित करके अपने शिविरको चले गये ॥ युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तथा । ययौ स्वशिविरं राजा निशायां सेनया वृतः ॥ ४७ ॥ तथा सेनासे घिरे हुए कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिर भी दोनों भाई नकुल-सहदेवके साथ रातमें अपने शिविरमें पधारे ॥ ४७ ॥ भीमसेनोऽपि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान् रथान् । अवजित्य ततः संख्ये ययौ स्वशिविरं प्रति ॥ ४८ ॥ राजेन्द्र! तब भीमसेन भी दुर्योधन आदि रथियोंको युद्धमें जीतकर अपने शिविरको लौट गये ॥ ४८ ॥ दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे । भीष्मं शान्तनवं तूर्णं प्रयातः शिविरं प्रति ॥ ४९ ॥ राजा दुर्योधन भी महायुद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको घेरकर तुरंत ही अपने शिविरको लौट गया ॥ ४९ ॥ द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्मा च सात्वतः । परिवार्य चमूं सर्वां प्रययुः शिविरं प्रति ॥ ५० ॥ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य तथा यदुवंशी कृतवर्मा—ये सारी सेनाको घेरकर अपने शिविरकी ओर चल दिये ॥ ५० ॥ तथैव सात्यकी राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । परिवार्य रणे योधान् ययतुः शिविरं प्रति ॥ ५१ ॥ राजन्! इसी प्रकार सात्यकि और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी युद्धमें अपने योद्धाओंको घेरकर शिविरकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ५१ ॥ एवमेते महाराज तावकाः पाण्डवैः सह । पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतप ॥ ५२ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! इस प्रकार रातके समय आपके योद्धा पाण्डवोंके साथ अपने-अपने शिविरमें लौट आये ॥ ५२ ॥ ततः स्वशिविरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा । न्यवसन्त महाराज पूजयन्तः परस्परम् ॥ ५३ ॥

महाराज! तत्पश्चात् पाण्डव तथा कौरव अपने शिविरमें जाकर आपसमें एक-दूसरेकी प्रशंसा करते हुए विश्राम करने लगे ॥ ५३ ॥

रक्षां कृत्वा ततः शूरान्यस्य गुल्मान् यथाविधि ।
अपनीय च शल्यानि स्नात्वा च विविधैर्जलैः ॥ ५४ ॥
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे संस्तूयन्तश्च वन्दिभिः ।
गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विनः ॥ ५५ ॥

तदनन्तर उभय पक्षके शूरवीरोंने सब ओर सैनिक गुल्मोंको* नियुक्त करके विधिपूर्वक अपने-अपने शिविरोंकी रक्षाकी व्यवस्था की। फिर अपने शरीरसे बाणोंको निकालकर भाँति-भाँतिके जलसे स्नान करके स्वस्तिवाचन करानेके अनन्तर बन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे सभी यशस्वी वीर गीत और वाद्योंके शब्दोंसे क्रीड़ा-विनोद करने लगे ॥ ५४-५५ ॥

मुहूर्तादिव तत् सर्वमभवत् स्वर्गसंनिभम् ।
न हि युद्धकथां कांचिद् तत्राकुर्वन् महारथाः ॥ ५६ ॥

दो घड़ीतक वहाँका सब कुछ स्वर्गसदृश जान पड़ा। उस समय वहाँ महारथियोंने युद्धकी कोई बातचीत नहीं की ॥ ५६ ॥

ते प्रसुप्ते बले तत्र परिश्रान्तजने नृप ।
हस्त्यश्वबहुले रात्रौ प्रेक्षणीये बभूवतुः ॥ ५७ ॥

नरेश्वर! जिनमें हाथी और घोड़ोंकी अधिकता थी, उन दोनों पक्षकी सेनाओंमें सब लोग परिश्रमसे चूर-चूर हो रहे थे। रातके समय जब दोनों सेनाएँ सो गयीं, उस समय वे देखनेयोग्य हो गयीं ॥ ५७ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमदिवसयुद्धावहारे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सातवें दिनके युद्धका विरामविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/३ श्लोक हैं।]


* गुल्मका अर्थ है—प्रधान पुरुषोंसे युक्त रक्षकदल, जिसमें ९ हाथी, ९ रथ, २७ घुड़सवार और ४५ पैदल सैनिक होते हैं।

अध्याय (पृष्ठ 2044)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

आठवें दिन व्यूहबद्ध कौरव-पाण्डव-सेनाओंकी रणयात्रा और उनका परस्पर घमासान युद्ध

संजय उवाच

परिणाम्य निशां तां तु सुखं प्राप्ता जनेश्वराः ।
कुरवः पाण्डवाश्चैव पुनर्युद्धाय निर्ययुः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! नरेश्वर कौरव और पाण्डव निद्रासुखका अनुभव करके वह रात बिताकर पुनः युद्धके लिये निकले ॥ १ ॥

ततः शब्दो महानासीत् सैन्ययोरुभयोर्नृप ।
निर्गच्छमानयोः संख्ये सागरप्रतिमो महान् ॥ २ ॥
महाराज! वे दोनों सेनाएँ जब युद्धके लिये शिविरसे बाहर निकलने लगीं, उस समय संग्रामभूमिमें महासागरकी गर्जनाके समान महान् घोष होने लगा ॥ २ ॥

ततो दुर्योधनो राजा चित्रसेनो विविंशतिः ।
भीष्मश्च रथिनां श्रेष्ठो भारद्वाजश्च वै नृप ॥ ३ ॥
एकीभूताः सुसंयत्ताः कौरवाणां महाचमूम् ।
व्यूहाय विदधू राजन् पाण्डवान् प्रति दंशिताः ॥ ४ ॥
नरेश्वर! तत्पश्चात् राजा दुर्योधन, चित्रसेन, विविंशति, रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्म तथा द्रोणाचार्य—ये सब संगठित एवं सावधान होकर पाण्डवोंसे युद्ध करनेके लिये कवच बाँधकर कौरवोंके विशाल सैन्यकी व्यूह-रचना करने लगे ॥ ३-४ ॥

भीष्मः कृत्वा महाव्यूहं पिता तव विशाम्पते ।
सागरप्रतिमं घोरं वाहनोर्मितरङ्गितम् ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! आपके ताऊ भीष्मने समुद्रके समान विशाल एवं भयंकर महाव्यूहका निर्माण किया, जिसमें हाथी, घोड़े आदि वाहन उत्ताल तरंगोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥

अग्रतः सर्वसैन्यानां भीष्मः शान्तनवो ययौ ।
मालवैर्दाक्षिणात्यैश्च आवन्त्यैश्च समन्वितः ॥ ६ ॥
शान्तनुनन्दन भीष्म सम्पूर्ण सेनाओंके आगे-आगे चले। उनके साथ मालवा, दक्षिण प्रान्त तथा अवन्तीदेशके योद्धा थे ॥ ६ ॥

ततोऽनन्तरमेवासीद् भारद्वाजः प्रतापवान् ।
पुलिन्दैः पारदैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः ॥ ७ ॥

उनके पीछे पुलिन्द, पारद, क्षुद्रक तथा मालवदेशीय वीरोंके साथ प्रतापी द्रोणाचार्य थे ॥ ७ ॥
द्रोणादनन्तरं यत्तो भगदत्तः प्रतापवान् ।
मगधैश्च कलिङ्गैश्च पिशाचैश्च विशाम्पते ॥ ८ ॥
प्रजेश्वर! द्रोणके पीछे मागध, कलिंग और पिशाच सैनिकोंके साथ प्रतापी राजा भगदत्त जा रहे थे, जो बड़े सावधान थे ॥ ८ ॥
प्राग्ज्योतिषादनु नृपः कौसल्योऽथ बृहद्बलः ।
मेकलैः कुरुविन्दैश्च त्रैपुरैश्च समन्वितः ॥ ९ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरनरेशके पीछे कोसलदेशके राजा बृहद्बल थे, जो मेकल, कुरुविन्द तथा त्रिपुराके सैनिकोंके साथ थे ॥ ९ ॥
बृहद्बलात् ततः शूरस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः ।
काम्बोजैर्बहुभिः सार्धं यवनैश्च सहस्रशः ॥ १० ॥
बृहद्बलके बाद शूरवीर त्रिगर्त थे, जो प्रस्थलाके अधिपति थे। उनके साथ बहुत-से काम्बोज और सहस्रों यवन योद्धा थे ॥ १० ॥
द्रौणिस्तु रभसः शूरस्त्रैगर्तादनु भारत ।
प्रययौ सिंहनादेन नादयन्नो धरातलम् ॥ ११ ॥
भारत! त्रिगर्तके पीछे वेगशाली वीर अश्वत्थामा चल रहे थे, जो अपने सिंहनादसे समस्त धरातलको निनादित कर रहे थे ॥ ११ ॥
तथा सर्वेण सैन्येन राजा दुर्योधनस्तदा ।
द्रौणेरनन्तरं प्रायात् सौदर्यैः परिवारितः ॥ १२ ॥
अश्वत्थामाके पीछे सम्पूर्ण सेना तथा भाइयोंसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन चल रहा था ॥ १२ ॥
दुर्योधनादनु ततः कृपः शारद्वतो ययौ ।
एवमेष महाव्यूहः प्रययौ सागरोपमः ॥ १३ ॥
दुर्योधनके पीछे शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य चल रहे थे। इस प्रकार यह सागरके समान महाव्यूह युद्धके लिये प्रस्थान कर रहा था ॥ १३ ॥
रेजुरत्र पताकाश्च श्वेतच्छत्राणि वा विभो ।
अंगदान्यत्र चित्राणि महार्हाणि धनूंषि च ॥ १४ ॥
प्रभो! उस सेनामें बहुत-सी पताकाएँ और श्वेतच्छत्र शोभा पा रहे थे। विचित्र रंगके बहुमूल्य बाजूबन्द और धनुष सुशोभित होते थे ॥ १४ ॥
तं तु दृष्ट्वा महाव्यूहं तावकानां महारथः ।
युधिष्ठिरोऽब्रवीत् तूर्णं पार्षतं पृतनापतिम् ॥ १५ ॥

राजन्! आपके सैनिकोंका वह महाव्यूह देखकर महारथी युधिष्ठिरने तुरंत ही सेनापति धृष्टद्युम्नसे कहा— ॥ १५ ॥
पश्य व्यूहं महेष्वास निर्मितं सागरोपमम् ।
प्रतिव्यूहं त्वमपि हि कुरु पार्षत सत्वरम् ॥ १६ ॥
‘महाधनुर्धर द्रुपदकुमार! देखो, शत्रुसेनाका व्यूह सागरके समान बनाया गया है। तुम भी उसके मुकाबलेमें शीघ्र ही अपनी सेनाका व्यूह बना लो’ ॥ १६ ॥
ततः स पार्षतः क्रूरो व्यूहं चक्रे सुदारुणम् ।
शृङ्गाटकं महाराज परव्यूहविनाशनम् ॥ १७ ॥
महाराज! तदनन्तर क्रूर स्वभाववाले धृष्टद्युम्नने अत्यन्त दारुण शृंगाटक (सिंघाड़े)-के आकारवाला व्यूह बनाया, जो शत्रुके व्यूहका विनाश करनेवाला था ॥ १७ ॥
शृङ्गाभ्यां भीमसेनश्च सात्यकिश्च महारथः ।
रथैरनेकसाहस्रैस्तथा हयपदातभिः ॥ १८ ॥
उसके दोनों शृंगोंके स्थानमें भीमसेन और महारथी सात्यकि कई हजार रथियों, घुड़सवारों और पैदलोंके साथ मौजूद थे ॥ १८ ॥
ताभ्यां बभौ नरश्रेष्ठः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
मध्ये युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १९ ॥
भीमसेन और सात्यकिके बीचमें यानी उस व्यूहके अग्रभागमें नरश्रेष्ठ श्वेतवाहन अर्जुन खड़े हुए, जिनके सारथि साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण थे। मध्य-देशमें राजा युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव थे ॥ १९ ॥
अथोत्तरे महेष्वासाः सहसैन्या नराधिपाः ।
व्यूहं तं पूरयामासुर्व्यूहशास्त्रविशारदाः ॥ २० ॥
इनके बाद सेनासहित अनेक महाधनुर्धर नरेश खड़े थे, जो व्यूहशास्त्रके पूर्ण विद्वान् थे। उन्होंने उस व्यूहको प्रत्येक अंग और उपांगसे परिपूर्ण किया था ॥ २० ॥
अभिमन्युस्ततः पश्चाद् विराटश्च महारथः ।
द्रौपदेयाश्च संहृष्टा राक्षसश्च घटोत्कचः ॥ २१ ॥
उस व्यूहके पिछले भागमें अभिमन्यु, महारथी विराट, हर्षमें भरे हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच विद्यमान थे ॥ २१ ॥
एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ।
अतिष्ठन् समरे शूरा योद्धुकामा जयैषिणः ॥ २२ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार अपनी सेनाके इस महाव्यूहका निर्माण करके युद्धकी कामना और विजयकी अभिलाषा रखनेवाले शूरवीर पाण्डव समरभूमिमें खड़े थे ॥ २२ ॥
भेरीशब्दैश्च विमलैर्विमिश्रैः शङ्खनिःस्वनैः ।
क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैर्नादिताः सर्वतो दिशः ॥ २३ ॥

उस समय रणभेरियाँ बज रही थीं। उनके निर्मल शब्दोंसे मिली हुई शंख-ध्वनियों तथा गर्जनसे, ताल ठोंकने और उच्चस्वरसे पुकारने आदिके शब्दोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं॥ २३॥

ततः शूराः समासाद्य समरे ते परस्परम्।
नेत्रैरनिमिषै राजन्नवैक्षन्त परस्परम्॥ २४॥
राजन्! तदनन्तर समस्त शूरवीर समरभूमिमें पहुँचकर परस्पर एक-दूसरेको एकटक नेत्रोंसे देखने लगे॥ २४॥

नामभिस्ते मनुष्येन्द्र पूर्वं योधाः परस्परम्।
युद्धाय समवर्तन्त समाहूयेतरेतरम्॥ २५॥
नरेन्द्र! पहले उन योद्धाओंने एक-दूसरेके नाम ले-लेकर पुकार-पुकारकर युद्धके लिये परस्पर आक्रमण किया॥ २५॥

ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम्।
तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम्॥ २६॥
तत्पश्चात् आपके और पाण्डवोंके सैनिक एक-दूसरेपर अस्त्रोंद्वारा आघात-प्रत्याघात करने लगे। उस समय उनमें अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध होने लगा॥ २६॥

नाराचा निशिताः संख्ये सम्पतन्ति स्म भारत।
व्यात्तानना भयंकरा उरगा इव संघशः॥ २७॥
भारत! उस समय युद्धमें तीखे नाराच नामक बाण इस प्रकार पड़ते थे, मानो मुख फैलाये हुए भयंकर नाग झुंड-के-झुंड गिर रहे हों॥ २७॥

निष्पेतुर्विमलाः शक्त्यस्तैलधौताः सुतेजनाः।
अम्बुदेभ्यो यथा राजन् भ्राजमानाः शतह्रदाः॥ २८॥
राजन्! तेलकी धोयी चमचमाती हुई तीखी शक्तियाँ बादलोंसे गिरनेवाली कान्तिमती बिजलियोंके समान सब ओर गिर रही थीं॥ २८॥

गदाश्च विमलैः पट्टैः पिनद्धाः स्वर्णभूषितैः।
पतन्त्यस्तत्र दृश्यन्ते गिरिशृङ्गोपमाः शुभाः॥ २९॥
सुवर्णभूषित निर्मल लोहपत्रसे जड़ी हुई सुन्दर गदाएँ पर्वत-शिखरोंके समान वहाँ गिरती दिखायी देती थीं॥ २९॥

निस्त्रिंशाश्च व्यदृश्यन्त विमलाम्बरसंनिभाः।
आर्षभाणि विचित्राणि शतचन्द्राणि भारत॥ ३०॥
अशोभन्त रणे राजन् पात्यमानानि सर्वशः।
भारत! स्वच्छ आकाशके सदृश खड्ग और सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे विभूषित ऋषभचर्मकी विचित्र ढालें दृष्टिगोचर हो रही थीं। राजन्! रणभूमिमें गिरायी जाती हुई वे सब-की-सब तलवारें और ढालें बड़ी शोभा पा रही थीं॥ ३० १/२॥