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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

मुख्य वीर मारे गये, सैनिकोंने पीठ दिखा दी, सभी भयसे पीड़ित हो रणभूमिसे भाग निकले, प्रायः समस्त योद्धा साहस अथवा धृष्टता खो बैठे तथा भीमसेनके अस्त्र-शस्त्रोंकी आगसे सब कुछ स्वाहा हो गया; उस समय उसे युद्धके लिये बड़ा पछतावा होगा ॥ २२-२३ ॥

उपासंगानाचरेद् दक्षिणेन वराङ्गनानां नकुलश्चित्रयोधी । यदा रथाग्र्यो रथिनः प्रणेता तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २४ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले नकुल जब दाहिने हाथमें लिये हुए खड्गसे तुम्हारे सैनिकोंके मस्तक काट-काटकर धरतीपर उनके ढेर लगाने लगेंगे और रथी योद्धाओंको यमलोक भेजना प्रारम्भ करेंगे, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धका परिणाम सोचकर शोकसे संतप्त हो उठेगा ॥ २४ ॥

सुखोचितो दुःखशय्यां वनेषु दीर्घं कालं नकुलो यामशेत । आशीविषः क्रुद्ध इवोद्वमन् विषं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २५ ॥

सुख भोगनेके योग्य वीरवर नकुलने दीर्घकाल-तक वनोंमें रहकर जिस दुःख-शय्यापर शयन किया है, उसका स्मरण करके जब वह क्रोधमें भरे हुए विषैले सर्पकी भाँति विष उगलने लगेगा, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको युद्ध छेड़नेके कारण पछताना पड़ेगा ॥ २५ ॥

त्यक्तात्मानः पार्थिवा योधनाय समादिष्टा धर्मराजेन सूत । रथैः शुभ्रैः सैन्यमभिद्रवन्तो दृष्ट्वा पश्चात् तप्स्यते धार्तराष्ट्रः ॥ २६ ॥

संजय! धर्मराज युधिष्ठिरके द्वारा युद्धके लिये आदेश पाकर उनके लिये प्राण देनेको उद्यत रहनेवाले भूमण्डलके नरेश जब तेजस्वी रथोंपर आरूढ़ होकर कौरव-सेनापर आक्रमण करेंगे, उस समय उन्हें देखकर दुर्योधनको युद्धके लिये अत्यन्त पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ २६ ॥

शिशून् कृतास्त्रानशिशुप्रकाशान् यदा द्रष्टा कौरवः पञ्च शूरान् । त्यक्त्वा प्राणान् कौरवानाद्रवन्त- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ २७ ॥

जो अवस्थामें बालक होते हुए भी अस्त्र-शस्त्रोंकी पूर्ण शिक्षा पाकर युद्धमें नवयुवकोंके समान पराक्रम प्रकाशित करते हैं, द्रौपदीके वे पाँचों शूरवीर पुत्र प्राणोंका मोह छोड़कर जब कौरव-सेनापर टूट पड़ेंगे और कुरुराज दुर्योधन जब उन्हें उस अवस्थामें देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेकी भूलके कारण भारी पश्चात्ताप होगा ।। २७ ।।

यदा गतोद्वाहमकूजनाक्षं सुवर्णतारं रथमुत्तमाश्वैः । दान्तैर्युक्तं सहदेवोऽधिरूढः शिरांसि राज्ञां क्षेप्स्यते मार्गणौघैः ।। २८ ।। महाभये सम्प्रवृत्ते रथस्थं विवर्तमानं समरे कृतास्त्रम् । सर्वा दिशः सम्पतन्तं समीक्ष्य तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। २९ ।।

जब सहदेव उत्तम जातिके सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अपनी इच्छाके अनुकूल चलनेवाले तथा पहियोंकी धुरीसे तनिक भी आवाज न करनेवाले रथपर, जो अलातचक्रकी भाँति घूमनेके कारण सोनेके गोलाकार तारके समान प्रतीत होता है, आरूढ़ हो अपने बाणसमूहोंद्वारा विपक्षी राजाओंके मस्तक काट-काटकर गिराने लगेंगे और इस प्रकार महान् भयका वातावरण छा जानेपर रथपर बैठे हुए अस्त्रवेत्ता सहदेव समरभूमिमें डटे रहकर जब सभी दिशाओंमें शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस दशामें उन्हें देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके मनमें युद्धका परिणाम सोचकर महान् पश्चात्ताप होगा ।। २८-२९ ।।

ह्रीनिषेवो निपुणः सत्यवादी
महाबलः सर्वधर्मोपपन्नः ।
गान्धारिमाच्छंस्तुमुले क्षिप्रकारी
क्षेप्ता जनान् सहदेवस्तरस्वी ॥ ३० ॥
यदा द्रष्टा द्रौपदेयान् महेषून्
शूरान् कृतास्त्रान् रथयुद्धकोविदान् ।
आशीविषान् घोरविषानिवायत-
स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३१ ॥

लज्जाशील, युद्धकुशल, सत्यवादी, महाबली, सर्वधर्मसम्पन्न, वेगवान् तथा शीघ्रतापूर्वक बाण चलानेवाले सहदेव जब घमासान युद्धमें शकुनिपर आक्रमण करके शत्रुओंके सैनिकोंका संहार करने लगेंगे तथा जब दुर्योधन महाधनुर्धर शूरवीर अस्त्रविद्यामें निपुण तथा रथयुद्धकी कलामें कुशल द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको भयंकर विषवाले विषधर सर्पोंकी भाँति आक्रमण करते देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेकी भूलपर भारी पश्चात्ताप होगा ॥ ३०-३१ ॥

यदाभिमन्युः परवीरघाती
शरैः परान् मेघ इवाभिवर्षन् ।
विगाहिता कृष्णसमः कृतास्त्र-

स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३२ ॥ अभिमन्यु साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान पराक्रमी तथा अस्त्रविद्यामें निपुण है, वह शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेमें समर्थ है। जिस समय वह मेघके समान बाणोंकी बौछार करता हुआ शत्रुओंकी सेनामें प्रवेश करेगा, उस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये मन-ही-मन बहुत ही संतप्त होगा ॥ ३२ ॥

यदा द्रष्टा बालमबालवीर्यं द्विषच्चमूं मृत्युमिवोत्पतन्तम् । सौभद्रमिन्द्रप्रतिमं कृतास्त्रं तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३३ ॥ सुभद्राकुमार अवस्थामें यद्यपि बालक है, तथापि उसका पराक्रम युवकोंके समान है। वह इन्द्रके समान शक्तिशाली तथा अस्त्रविद्यामें पारंगत है। जिस समय वह शत्रुसेनापर विकराल कालके समान आक्रमण करेगा, उस समय उसे देखकर दुर्योधनको युद्ध छेड़नेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ ३३ ॥

प्रभद्रकाः शीघ्रतरा युवानो विशारदाः सिंहसमानवीर्याः । यदा क्षेप्तारो धार्तराष्ट्रान् ससैन्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३४ ॥ अस्त्र-संचालनमें शीघ्रता दिखानेवाले, युद्धविशारद तथा सिंहके समान पराक्रमी प्रभद्रकदेशीय नवयुवक जब सेनासहित धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार भगायेंगे, उस समय दुर्योधनको यह सोचकर बड़ा पश्चात्ताप होगा कि मैंने क्यों युद्ध छेड़ा? ॥ ३४ ॥

वृद्धौ विराटद्रुपदौ महारथौ पृथक् चमूभ्यामभिवर्तमानौ । यदा द्रष्टारौ धार्तराष्ट्रान् ससैन्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३५ ॥ जिस समय वृद्ध महारथी राजा विराट और द्रुपद अपनी पृथक्-पृथक् सेनाओंके साथ आक्रमण करके सैनिकोंसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंपर दृष्टि डालेंगे, उस समय दुर्योधनको युद्धका परिणाम सोचकर महान् पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ ३५ ॥

यदा कृतास्त्रो द्रुपदः प्रचिन्वन् शिरांसि यूनां समरे रथस्थः । क्रुद्धः शरैश्छेत्स्यति चापमुक्तै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ३६ ॥ जब अस्त्रविद्यामें निपुण राजा द्रुपद कुपित हो रथपर बैठकर समरभूमिमें अपने धनुषसे छोड़े हुए बाणोंद्वारा विपक्षी युवकोंके मस्तकोंको चुन-चुनकर काटने लगेंगे, उस

समय दुर्योधनको इस युद्धके कारण भारी पछतावा होगा ।। ३६ ।। यदा विराटः परवीरघाती रणान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा । मत्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ३७ ।। जब शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले राजा विराट सौम्य स्वरूपवाले मत्स्यदेशीय योद्धाओंको साथ लेकर रणभूमिमें शत्रुसेनाके भीतर प्रवेश करेंगे, उस समय दुर्योधन युद्ध छेड़नेका परिणाम सोचकर शोकसे संतप्त हो उठेगा ।। ३७ ।। ज्येष्ठं मात्स्यमनृशंसार्यरूपं विराटपुत्रं रथिनं पुरस्तात् । यदा द्रष्टा दंशितं पाण्डवार्थे तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ३८ ।। सौम्य तथा श्रेष्ठ स्वरूपवाले राजा विराटके ज्येष्ठ पुत्र मत्स्यदेशीय महारथी श्वेतको जब दुर्योधन पाण्डवोंके हितके लिये कवच धारण किये देखेगा, तब उसे युद्धका परिणाम सोचकर मन-ही-मन बड़ा कष्ट होगा ।। ३८ ।। रणे हते कौरवाणां प्रवीरे शिखण्डिना सत्तमे शान्तनूजे । न जातु नः शत्रवो धारयेयु- रसंशयं सत्यमेतद् ब्रवीमि ।। ३९ ।। कौरववंशके प्रमुख वीर शान्तनुनन्दन साधुशिरो-मणि भीष्मजी जब युद्धमें शिखण्डीके हाथसे मार दिये जायँगे, उस समय हमारे शत्रु कौरव कभी हमलोगोंका वेग नहीं सह सकेंगे, यह मैं सत्य कहता हूँ, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। ३९ ।। यदा शिखण्डी रथिनः प्रचिन्वन् भीष्मं रथेनाभियाता वरूथी । दिव्यैर्हयैरवमृद्नन् रथौघां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ४० ।। जब शिखण्डी अपने रथकी रक्षाके साधनोंसे सम्पन्न हो रथियोंको चुन-चुनकर मारता तथा दिव्य अश्वोंद्वारा रथसमूहोंको रौंदता हुआ रथारूढ़ हो भीष्मपर आक्रमण करेगा, उस समय दुर्योधनको युद्ध छिड़ जानेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ४० ।। यदा द्रष्टा सृंजयानामनीके धृष्टद्युम्नं प्रमुखे रोचमानम् । अस्त्रं यस्मै गुह्यमुवाच धीमान् द्रोणस्तदा तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ।। ४१ ।।

जिसे परम बुद्धिमान् आचार्य द्रोणने अस्त्रविद्याके गोपनीय रहस्यकी भी शिक्षा दी है, वह धृष्टद्युम्न जब सृंजयवंशी वीरोंकी सेनाके अग्रभागमें प्रकाशित होगा और उसे उस दशामें दुर्योधन देखेगा, तब वह अत्यन्त संतप्त हो उठेगा ।। ४१ ।।

यदा स सेनापतिरप्रमेयः परामृदन्निषुभिर्धार्तराष्ट्रान् । द्रोणं रणे शत्रुसहोऽभियाता तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ४२ ।।

जब शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ अपरिमित शक्तिशाली सेनापति धृष्टद्युम्न अपने बाणोंद्वारा धृतराष्ट्र-पुत्रोंको कुचलता हुआ आचार्य द्रोणपर आक्रमण करेगा, उस समय युद्धका परिणाम सोचकर दुर्योधन बहुत पछतायेगा ।। ४२ ।।

ह्रीमान् मनीषी बलवान् मनस्वी स लक्ष्मीवान् सोमकानां प्रबर्हः । न जातु तं शत्रवोऽन्ये सहेरन् येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः ।। ४३ ।।

सोमकवंशका वह प्रमुख वीर धृष्टद्युम्न लज्जाशील, बलवान्, बुद्धिमान्, मनस्वी तथा वीरोचित शोभासे सम्पन्न है। इसी प्रकार वृष्णिवंशमें सिंहके समान पराक्रमी वीरवर सात्यकि जिनके अगुआ हैं, उनके वेगको दूसरे शत्रु कदापि नहीं सह सकते ।। ४३ ।।

इदं च ब्रूया मा वृणीष्वेति लोके युद्धेऽद्वितीयं सचिवं रथस्थम् । शिनेर्नप्तारं प्रवृणीम सात्यकिं महाबलं वीतभयं कृतास्त्रम् ।। ४४ ।।

तुम दुर्योधनसे यह भी कह देना कि अब संसारमें जीवित रहकर तुम राज्य भोगनेकी इच्छा न करो। हमने युद्धके लिये अद्वितीय वीर, महान् बलवान्, निर्भय तथा अस्त्रविद्यामें निपुण शिनिपौत्र रथारूढ़ सात्यकिको अपना सहायक चुन लिया है ।। ४४ ।।

महोरस्को दीर्घबाहुः प्रमाथी युद्धेऽद्वितीयः परमास्त्रवेदी । शिनेर्नप्ता तालमात्रायुधोऽयं महारथो वीतभयः कृतास्त्रः ।। ४५ ।।

शिनिके पौत्र महारथी सात्यकि चार हाथ लंबा धनुष धारण करते हैं। उनकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी हैं। वे अद्वितीय वीर हैं और युद्धमें शत्रुओंको मथ डालते हैं। उन्हें उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान है। वे निर्भय तथा अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् हैं ।। ४५ ।।

यदा शिनीनामधिपो मयोक्तः शरैः परान् मेघ इव प्रवर्षन् ।

प्रच्छादयिष्यत्यरिहा योधमुख्यां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ४६ ॥ जब मेरे कहनेसे शिनिप्रवर शत्रुमर्दन सात्यकि शत्रुओंपर मेघकी भाँति बाणोंकी झड़ी लगाते हुए मुख्य-मुख्य योद्धाओंको आच्छादित कर देंगे, उस समय दुर्योधन युद्धका परिणाम सोचकर बहुत पछतायेगा ॥

यदा धृतिं कुरुते योत्स्यमानः स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा । सिंहस्येव गन्धमाघ्राय गावः संचेष्र्न्त शत्रवोऽस्माद् रणाग्रे ॥ ४७ ॥ सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले दीर्घबाहु महामना सात्यकि जब युद्धके लिये उत्सुक हो समरभूमिमें डट जाते हैं, उस समय जैसे सिंहकी गन्ध पाकर गौएँ इधर-उधर भागने लगती हैं, उसी प्रकार शत्रु युद्धके मुहानेपर इनके पास आकर तुरंत भाग खड़े होते हैं ॥ ४७ ॥

स दीर्घबाहुर्दृढधन्वा महात्मा भिन्द्याद् गिरीन् संहरेत् सवलोकान् । अस्त्रे कृती निपुणः क्षिप्रहस्तो दिवि स्थितः सूर्य इवाभिभाति ॥ ४८ ॥ ‘विशालबाहु, दृढ़ धनुर्धर, युद्धकुशल और हाथोंकी फुर्ती दिखानेवाले अस्त्रवेत्ता सात्यकि पर्वतोंको विदीर्ण कर सकते हैं और सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं। वे आकाशमें विद्यमान सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित होते हैं ॥ ४८ ॥

चित्रः सूक्ष्मः सुकृतो यादवस्य अस्त्रे योगो वृष्णिसिंहस्य भूयान् । यथाविधं योगमाहुः प्रशस्तं सर्वैर्गुणैः सात्यकिस्तैरुपेतः ॥ ४९ ॥ ‘युद्धनिपुण वीर पुरुष जैसे-जैसे अस्त्रोंकी उपलब्धिको प्रशंसाके योग्य मानते हैं, उन सबसे तथा समस्त वीरोचित गुणोंसे वृष्णिसिंह सात्यकि सम्पन्न हैं। उन यदुकुल-तिलकको बहुत-से उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त है। उनका वह अस्त्रयोग विचित्र, सूक्ष्म और भलीभाँति अभ्यासमें लाया हुआ है ॥ ४९ ॥

हिरण्मयं श्वेतहयैश्चतुर्भि- र्यदा युक्तं स्यन्दनं माधवस्य । द्रष्टा युद्धे सात्यकेर्धार्तराष्ट्र- स्तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥ ५० ॥ ‘जब युद्धमें मधुवंशी सात्यकिके चार श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथको पापात्मा मन्दबुद्धि दुर्योधन देखेगा, तब उसे अवश्य संताप होगा ॥ ५० ॥

यदा रथं हेममणिप्रकाशं श्वेताश्वयुक्तं वानरकेतुमुग्रम् । द्रष्टा ममाप्यास्थितं केशवेन तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ॥ ५१ ॥ 'जब सुवर्ण और मणियोंसे प्रकाशित होनेवाले मेरे भयंकर रथको जिसमें चार श्वेत अश्व जुते होंगे, जिसपर वानरध्वजा फहरा रही होगी तथा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण जिसपर बैठकर सारथिका कार्य सँभालते होंगे, अकृतात्मा मन्दबुद्धि दुर्योधन देखेगा, तब मन ही-मन संतप्त हो उठेगा ॥ ५१ ॥

यदा मौर्व्यास्तलनिष्पेषमुग्रं महाशब्दं वज्रनिष्पेषतुल्यम् । विधूयमानस्य महारणे मया स गाण्डिवस्य श्रोष्यति मन्दबुद्धिः ॥ ५२ ॥ तदा मूढो धृतराष्ट्रस्य पुत्र- स्तप्ता युद्धे दुर्मतिर्दुःसहायः । दृष्ट्वा सैन्यं बाणवर्षान्धकारे प्रभज्यन्तं गोकुलवद् रणाग्रे ॥ ५३ ॥ 'महान् संग्रामके समय जब मैं गाण्डीव धनुषकी डोरी खीचूँगा, उस समय मेरे हाथोंकी रगड़से वज्रपातके समान अत्यन्त भयंकर आवाज होगी, मन्दबुद्धि दुर्योधन जब गाण्डीवकी उस उग्र टंकारको सुनेगा तथा रणस्थलीके अग्रभागमें मेरी बाण-वर्षासे फैले हुए अन्धकारमें इधर-उधर भागती हुई गौओंकी भाँति अपनी सेनाको युद्धसे पलायन करती देखेगा, तब दुष्ट सहायकोंसे युक्त उस दुर्बुद्धि एवं मूढ़ धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें बड़ा संताप होगा ॥ ५२-५३ ॥

बलाहकादुच्चरतः सुभीमान् विद्युत्स्फुलिङ्गानिव घोररूपान् । सहस्रघ्नान् द्विषतां सङ्गरेषु अस्थिच्छिदो मर्मभिदः सुपुङ्खान् ॥ ५४ ॥ यदा द्रष्टा ज्यामुखाद् बाणसंघान् गाण्डीवमुक्तानापततः शिताग्रान् । हयान् गजान् वर्मिणश्चाददानां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ५५ ॥ 'मेरे गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचासे छोड़े हुए तीखी धारवाले सुन्दर पंखोंसे युक्त भयंकर बाणसमूह मेघसे निकली हुई अत्यन्त भयानक विद्युत्की चिनगारियोंके समान जब युद्धभूमिमें शत्रुओंपर पड़ेंगे और उनकी हड्डियोंको काटते तथा मर्मस्थानोंको विदीर्ण करते हुए सहस्र-सहस्र सैनिकोंको मौतके घाट उतारने लगेंगे, साथ ही कितने ही घोड़ों, हाथियों

तथा कवचधारी योद्धाओंके प्राण लेना प्रारम्भ करेंगे, उस समय जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन यह सब देखेगा, तब युद्ध छेड़नेकी भूलके कारण वह बहुत पछतायेगा ।। ५४-५५ ।।

यदा मन्दः परबाणान् विमुक्तान्
ममेषुभिर्ह्रियमाणान् प्रतीपम् ।
तिर्यग्विध्याच्छिद्यमानान् पृषत्कै-
स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ५६ ।।
‘युद्धमें दूसरे योद्धा जो बाण चलायेंगे, उन्हें मेरे बाण टक्कर लेकर पीछे लौटा देंगे। साथ ही मेरे दूसरे बाण शत्रुओंके शरसमूहको तिर्यग्भावसे विद्ध करके टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे। जब मन्दबुद्धि दुर्योधन यह सब देखेगा, तब उसे युद्ध छेड़नेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ५६ ।।

यदा विपाठा मद्भुजविप्रमुक्ता
द्विजाः फलानीव महीरुहाग्रात् ।
प्रचेतार उत्तमाङ्गानि यूनां
तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ५७ ।।
‘जब मेरे बाहुबलसे छूटे हुए विपाठ नामक बाण युवक योद्धाओंके मस्तकोंको उसी प्रकार काट-काटकर ढेर लगाने लगेंगे, जैसे पक्षी वृक्षोंके अग्रभागसे फल गिराकर उनके ढेर लगा देते हैं, उस समय यह सब देखकर दुर्योधनको बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ५७ ।।

यदा द्रष्टा पततः स्यन्दनेभ्यो
महागजेभ्योऽश्वगतान् सुयोधनान् ।
शरैर्हतान् पातितांश्चैव रङ्गे
तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ५८ ।।
‘जब दुर्योधन देखेगा कि उसके रथोंसे, बड़े-बड़े गजोंसे और घोड़ोंकी पीठपरसे भी असंख्य योद्धा मेरे बाणोंद्वारा मारे जाकर समरांगणमें गिरते चले जा रहे हैं, तब उसे युद्धके लिये भारी पछतावा होगा ।। ५८ ।।

असम्प्राप्तानस्त्रपथं परस्य
तदा द्रष्टा नश्यतो धार्तराष्ट्रान् ।
अकुर्वतः कर्म युद्धे समन्तात्
तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ५९ ।।
‘दुर्योधनको जब यह दिखायी देगा कि उसके दूसरे भाई शत्रुओंकी बाण-वर्षाके निकट न जाकर उसे दूरसे देखकर ही अदृश्य हो रहे हैं, युद्धमें कोई पराक्रम नहीं कर पा रहे हैं, तब वह लड़ाई छेड़नेके कारण मन-ही-मन बहुत पछतायेगा ।। ५९ ।।

पदातिसंघान् रथसंघान् समन्ताद्
ह्यात्ताननः काल इवाततेषुः ।

प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्बाणवर्षैः शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६० ॥ ‘जब मैं सायकोंकी अविच्छिन्न वर्षा करते हुए मुख फैलाये खड़े हुए कालकी भाँति अपने प्रज्वलित बाणोंकी बौछारोंसे शत्रुपक्षके झुंड-के-झुंड पैदलों तथा रथियोंके समूहोंको छिन्न-भिन्न करने लगूँगा, उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनको बड़ा संताप होगा ।। ६० ।।

सर्वा दिशः सम्पत्तता रथेन रजोध्वस्तं गाण्डिवेन प्रकृत्तम् । यदा द्रष्टा स्वबलं सम्प्रमूढं तदा पश्चात् तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६१ ॥ ‘मन्दबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र जब यह देखेगा कि सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़नेवाले मेरे रथके द्वारा उड़ायी हुई धूलिसे आच्छादित हो उसकी सारी सेना धराशायी हो रही है और मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उसके समस्त सैनिक छिन्न-भिन्न होते चले जा रहे हैं, तब उसे बड़ा पछतावा होगा ।। ६१ ।।

कान्दिग्भूतं छिन्नगात्रं विसंज्ञं दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् । हताश्ववीराग्रयनरेन्द्रनागं पिपासितं श्रान्तपत्रं भयार्तम् ॥ ६२ ॥ आर्तस्वरं हन्यमानं हतं च विकीर्णकेशास्थिकपालसंघम् । प्रजापतेः कर्म यथार्थनिश्चितं तदा दृष्ट्वा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६३ ॥ ‘दुर्योधन अपनी आँखों यह देखेगा कि उसकी सारी सेना (भयसे भागने लगी है और उस)-को यह भी नहीं सूझता है कि किस दिशाकी ओर जाऊँ? कितने ही योद्धाओंके अंग-प्रत्यंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं। समस्त सैनिक अचेत हो रहे हैं। हाथी, घोड़े तथा वीराग्रगण्य नरेश मार डाले गये हैं। सारे वाहन थक गये हैं और सभी योद्धा प्यास तथा भयसे पीड़ित हो रहे हैं। बहुतेरे सैनिक आर्त स्वरसे रो रहे हैं, कितने ही मारे गये और मारे जा रहे हैं। बहुतोंके केश, अस्थि तथा कपालसमूह सब ओर बिखरे पड़े हैं। मानो विधाताका यथार्थ निश्चित विधान हो, इस प्रकार यह सब कुछ होकर ही रहेगा। यह सब देखकर उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनके मनमें बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ६२-६३ ।।

यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हयांश्च । तूणावक्षय्यौ देवदत्तं च मां च द्रष्टा युद्धे धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ६४ ॥

‘जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन रथपर मेरे गाण्डीव धनुषको, सारथि भगवान् श्रीकृष्णको, उनके दिव्य पांचजन्य शंखको, रथमें जुते हुए दिव्य घोड़ोंको, बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय तूणीरोंको, मेरे देवदत्त नामक शंखको और मुझको भी देखेगा, उस समय युद्धका परिणाम सोचकर उसे बड़ा संताप होगा ।। ६४ ।।

उद्धर्तयन् दस्युसङ्घान् समेतान् प्रवर्तयन् युगमन्यद् युगान्ते । यदा धक्ष्याम्यग्निवत् कौरवेयां- स्तदा तप्ता धृतराष्ट्रः सपुत्रः ।। ६५ ।।

‘जिस समय युद्धके लिये एकत्र हुए इन डाकुओंके दलोंका संहार करके प्रलयकालके पश्चात् युगान्तर उपस्थित करता हुआ मैं अग्निके समान प्रज्वलित होकर कौरवोंको भस्म करने लगूँगा, उस समय पुत्रोंसहित महाराज धृतराष्ट्रको बड़ा संताप होगा ।। ६५ ।।

सभ्राता वै सहसैन्यः सभृत्यो भ्रष्टैश्वर्यः क्रोधवशोऽल्पचेताः । दर्पस्यान्ते निहतो वेपमानः पश्चान्मन्दस्तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ।। ६६ ।।

‘सदा क्रोधके वशमें रहनेवाला अल्पबुद्धि मूढ़ दुर्योधन जब भाई, भृत्यगण तथा सेनाओंसहित ऐश्वर्यसे भ्रष्ट एवं आहत होकर काँपने लगेगा, उस समय सारा घमंड चूर-चूर हो जानेपर उसे (अपने कुकृत्योंके लिये) बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ६६ ।।

पूर्वाह्ने मां कृतजप्यं कदाचिद् विप्रः प्रोवाचोदकान्ते मनोज्ञम् । कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ योद्धव्यं ते शत्रुभिः सव्यसाचिन् ।। ६७ ।।

इन्द्रो वा ते हरिमान् वज्रहस्तः पुरस्ताद् यातु समरेऽरीन् विनिघ्नन् । सुग्रीवयुक्तेन रथेन वा ते पश्चात् कृष्णो रक्षतु वासुदेवः ।। ६८ ।।

‘एक दिनकी बात है, मैं पूर्वाह्नकालमें संध्या-वन्दन एवं गायत्रीजप करके आचमनके पश्चात् बैठा हुआ था, उस समय एक ब्राह्मणने आकर एकान्तमें मुझसे यह मधुर वचन कहा—‘कुन्तीनन्दन! तुम्हें दुष्कर कर्म करना है। सव्यसाचिन्! तुम्हें अपने शत्रुओंके साथ युद्ध करना होगा। बोलो, क्या चाहते हो? इन्द्र उच्चैःश्रवा घोड़ेपर बैठकर वज्र हाथमें लिये तुम्हारे आगे-आगे समरभूमिमें शत्रुओंका नाश करते हुए चलें अथवा सुग्रीव आदि अश्वोंसे जुते हुए रथपर बैठकर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण पीछेकी ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ।। ६७-६८ ।।

वव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा- दस्मिन् युद्धे वासुदेवं सहायम्। स मे लब्धो दस्युवधाय कृष्णो मन्ये चैतद् विहितं दैवतैर्मे ॥ ६९ ॥ ‘उस समय मैंने वज्रपाणि इन्द्रको छोड़कर इस युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक चुना था, इस प्रकार इन डाकुओंके वधके लिये मुझे श्रीकृष्ण मिल गये हैं। मालूम होता है, देवताओंने ही मेरे लिये ऐसी व्यवस्था कर रखी है ।। ६९ ।।

अयुद्ध्यमानो मनसापि यस्य जयं कृष्णः पुरुषस्याभिनन्देत्। एवं सर्वान् स व्यतीयादमित्रान् सेन्द्रान् देवान् मानुषे नास्ति चिन्ता ॥ ७० ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध न करके मनसे भी जिस पुरुषकी विजयका अभिनन्दन करेंगे, वह अपने समस्त शत्रुओंको, भले ही वे इन्द्र आदि देवता ही क्यों न हों, पराजित कर देता है, फिर मनुष्य-शत्रुके लिये तो चिन्ता ही क्या है? ।। ७० ।।

स बाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे- न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेयम्।

तेजस्विनं कृष्णमत्यन्तशूरं युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७१ ॥ ‘जो युद्धके द्वारा अत्यन्त शौर्यसम्पन्न तेजस्वी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको जीतनेकी इच्छा करता है, वह अनन्त अपार जलनिधि समुद्रको दोनों बाँहोंसे तैरकर पार करना चाहता है ॥ ७१ ॥

गिरिं य इच्छेत् तु तलेन भेत्तुं शिलोच्चयं श्वेतमतिप्रमाणम् । तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये- न्न चापि किंचित् स गिरेस्तु कुर्यात् ॥ ७२ ॥ ‘जो अत्यन्त विशाल प्रस्तरराशिपूर्ण श्वेत कैलास-पर्वतको हथेलीसे मारकर विदीर्ण करना चाहता है, उस मनुष्यका नखसहित हाथ ही छिन्न-भिन्न हो जायगा। वह उस पर्वतका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकता ॥ ७२ ॥

अग्निं समिद्धं शमयेद् भुजाभ्यां चन्द्रं च सूर्यं च निवारयेत । हरेद् देवानाममृतं प्रसह्य युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७३ ॥ ‘जो युद्धके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको जीतना चाहता है, वह प्रज्वलित अग्निको दोनों हाथोंसे बुझानेकी चेष्टा करता है, चन्द्रमा और सूर्यकी गतिको रोकना चाहता है तथा हठपूर्वक देवताओंका अमृत हर लानेका प्रयत्न करता है ॥ ७३ ॥

यो रुक्मिणीमेकरथेन भोजा- नुत्साद्य राज्ञः समरे प्रसह्य । उवाह भार्यां यशसा ज्वलन्तीं यस्यां जज्ञे रौक्मिणेयो महात्मा ॥ ७४ ॥ ‘जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे युद्धमें भोजवंशी राजाओंको बलपूर्वक पराजित करके (रूप, सौन्दर्य और) सुयशके द्वारा प्रकाशित होनेवाली उस परम सुन्दरी रुक्मिणीको पत्नीरूपसे ग्रहण किया, जिसके गर्भसे महामना प्रद्युम्नका जन्म हुआ है ॥ ७४ ॥

अयं गान्धारांस्तरसा सम्प्रमथ्य जित्वा पुत्रान् नग्नजितः समग्रान् । बद्धं मुमोच विनदन्तं प्रसह्य सुदर्शनं वै देवतानां ललामम् ॥ ७५ ॥ ‘इन श्रीकृष्णने ही गान्धारदेशीय योद्धाओंको अपने वेगसे कुचलकर राजा नग्नजित्‌के समस्त पुत्रोंको पराजित किया और वहाँ कैदमें पड़कर क्रन्दन करते हुए राजा सुदर्शनको, जो देवताओंके भी आदरणीय हैं, बन्धनमुक्त किया ॥ ७५ ॥

अयं कपाटेन जघान पाण्ड्यं तथा कलिङ्गान् दन्तकूरे ममर्द । अनेन दग्धा वर्षपूगान् विनाथा वाराणसी नगरी सम्बभूव ॥ ७६ ॥ ‘इन्होंने पाण्ड्यनरेशको किंवाड़के पल्लेसे मार डाला, भयंकर युद्धमें कलिंगदेशीय योद्धाओंको कुचल डाला तथा इन्होंने ही काशीपुरीको इस प्रकार जलाया था कि वह बहुत वर्षोंतक अनाथ पड़ी रही ॥ ७६ ॥

अयं स्म युद्धे मन्यतेऽन्यैरजेयं तमेकलव्यं नाम निषादराजम् । वेगेनैव शैलमभिहत्य जम्भः शेते स कृष्णेन हतः परासुः ॥ ७७ ॥ ‘ये भगवान् श्रीकृष्ण उस निषादराज एकलव्यको सदा युद्धके लिये ललकारा करते थे, जो दूसरोंके लिये अजेय था; परंतु वह श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर प्राणशून्य हो सदाके लिये रणशय्यामें सो रहा है, ठीक उसी तरह, जैसे जम्भ नामक दैत्य स्वयं ही वेगपूर्वक पर्वतपर आघात करके प्राणशून्य हो महानिद्रामें निमग्न हो गया था ॥ ७७ ॥

तथोग्रसेनस्य सुतं सुदुष्टं वृष्ण्यन्धकानां मध्यगतं सभास्थम् । अपातयद् बलदेवद्वितीयो हत्वा ददौ चोग्रसेनाय राज्यम् ॥ ७८ ॥ ‘उग्रसेनका पुत्र कंस बड़ा दुष्ट था। वह जब भरी सभामें वृष्णि और अन्धकवंशी क्षत्रियोंके बीचमें बैठा हुआ था, श्रीकृष्णने बलदेवजीके साथ वहाँ जाकर उसे मार गिराया। इस प्रकार कंसका वध करके इन्होंने मथुराका राज्य उग्रसेनको दे दिया ॥ ७८ ॥

अयं सौभं योधयामास खस्थं विभीषणं मायया शाल्वराजम् । सौभद्वारि प्रत्यगृह्णाच्छतघ्नीं दोर्भ्यां क एनं विषहेत मर्त्यः ॥ ७९ ॥ ‘इन्होंने सौभ नामक विमानपर बैठे हुए तथा मायाके द्वारा अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके आये हुए आकाशमें स्थित शाल्वराजके साथ युद्ध किया और सौभ विमानके द्वारपर लगी हुई शतघ्नीको अपने दोनों हाथोंसे पकड़ लिया था। फिर इनका वेग कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ ७९ ॥

प्राग्ज्योतिषं नाम बभूव दुर्गं पुरं घोरमसुराणामसह्यम् । महाबलो नरकस्तत्र भौमो

जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ॥ ८० ॥ ‘असुरोंका प्राग्ज्योतिषपुर नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर किला था, जो शत्रुओंके लिये सर्वथा अजेय था। वहाँ भूमिपुत्र महाबली नरकासुर निवास करता था, जिसने देवमाता अदितिके सुन्दर मणिमय कुण्डल हर लिये थे॥ न तं देवाः सह शक्रेण शेकुः समागता युधि मृत्योरभीताः । दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य बलं तथैवास्त्रमवारणीयम् ॥ ८१ ॥ जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य न्ययोजयन् दस्युवधाय कृष्णम् । स तत् कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर- मैश्वर्यवान् सिद्धिषु वासुदेवः ॥ ८२ ॥ ‘मृत्युके भयसे रहित देवता इन्द्रके साथ उसका सामना करनेके लिये आये, परंतु नरकासुरको युद्धमें पराजित न कर सके। तब देवताओंने भगवान् श्रीकृष्णके अनिवार्य बल, पराक्रम और अस्त्रको देखकर तथा इनकी दयालु एवं दुष्टदमनकारिणी प्रकृतिको जानकर इन्हींसे पूर्वोक्त डाकू नरकासुरका वध करनेकी प्रार्थना की, तब समस्त कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णने वह दुष्कर कार्य पूर्ण करना स्वीकार किया ।। ८१-८२ ।। निर्मोचने षट् सहस्राणि हत्वा संच्छिद्य पाशान् सहसा क्षुरान्तान् । मुरं हत्वा विनिहत्यौघरक्षो निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ॥ ८३ ॥ ‘फिर वीरवर श्रीकृष्णने निर्मोचन नगरकी सीमापर जाकर सहसा छः हजार लोहमय पाश काट दिये, जो तीखी धारवाले थे। फिर मुर दैत्यका वध और राक्षस-समूहका नाश करके निर्मोचन नगरमें प्रवेश किया ।। ८३ ।। तत्रैव तेनास्य बभूव युद्धं महाबलेनातिबलस्य विष्णोः । शेते स कृष्णेन हतः परासु- र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ॥ ८४ ॥ ‘वहीं उस महाबली नरकासुरके साथ अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध हुआ। श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा और आँधीके उखाड़े हुए कनेरवृक्षकी भाँति सदाके लिये रणभूमिमें सो गया ।। ८४ ।। आहृत्य कृष्णो मणिकुण्डले ते हत्वा च भौमं नरकं मुरं च ।

श्रिया वृतो यशसा चैव विद्वान् प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ॥ ८५ ॥ 'इस प्रकार अनुपम प्रभावशाली विद्वान् श्रीकृष्ण भूमिपुत्र नरकासुर तथा मुरका वध करके देवी अदितिके वे दोनों मणिमय कुण्डल वहाँसे लेकर विजयलक्ष्मी और उज्ज्वल यशसे सुशोभित हो अपनी पुरीमें लौट आये ॥ ८५ ॥ अस्मै वराणयददंस्तत्र देवा दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत् । श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या- दाकाशे चाप्सु च ते क्रमः स्यात् ॥ ८६ ॥ शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर- न्नित्येव कृष्णश्च ततः कृतार्थः । एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेये महाबले गुणसम्पत् सदैव ॥ ८७ ॥ 'युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णका वह भयंकर पराक्रम देखकर देवताओंने वहाँ इन्हें इस प्रकार वर दिये—‘केशव! युद्ध करते समय आपको कभी थकावट न हो, आकाश और जलमें भी आप अप्रतिहत गतिसे विचरें और आपके अंगोंमें कोई भी अस्त्र-शस्त्र चोट न पहुँचा सके।' इस प्रकार वर पाकर श्रीकृष्ण पूर्णतः कृतकार्य हो गये हैं। इन असीम शक्तिशाली महाबली वासुदेवमें समस्त गुण-सम्पत्ति सदैव विद्यमान है ॥ ८६-८७ ॥ तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य- माशंसते धार्तराष्ट्रो विजेतुम् । सदा ह्येनं तर्कयते दुरात्मा तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान् समीक्ष्य ॥ ८८ ॥ 'ऐसे अनन्त पराक्रमी और अजेय श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जीत लेनेकी आशा करता है। वह दुरात्मा सदैव इनका अनिष्ट करनेके विषयमें सोचता रहता है, परंतु हमलोगोंकी ओर देखकर उसके इस अपराधको भी ये भगवान् सहते चले जा रहे हैं ॥ ८८ ॥ पर्यागतं मम कृष्णस्य चैव यो मन्यते कलहं सम्प्रसह्य । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं तद् वेदिता संयुगं तत्र गत्वा ॥ ८९ ॥ 'दुर्योधन मानता है कि मुझमें और श्रीकृष्णमें हठात् कलह करा दिया जा सकता है। पाण्डवोंका श्रीकृष्णके प्रति जो ममत्व (अपनापन) है, उसे मिटा दिया जा सकता है; परंतु

कुरुक्षेत्रकी युद्धभूमिमें पहुँचनेपर उसे इन सब बातोंका ठीक-ठीक पता चल जायगा ॥ ८९ ॥

नमस्कृत्य शान्तनवाय राज्ञे द्रोणायाथो सहपुत्राय चैव । शारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ॥ ९० ॥

'मैं शान्तनुनन्दन महाराज भीष्मको, आचार्य द्रोणको, गुरुभाई अश्वत्थामाको और जिनका सामना कोई नहीं कर सकता, उन वीरवर कृपाचार्यको भी प्रणाम करके राज्य पानेकी इच्छा लेकर अवश्य युद्ध करूँगा ॥ ९० ॥

धर्मेणाप्तं निधनं तस्य मन्ये यो योत्स्यते पाण्डवैः पापबुद्धिः । मिथ्या ग्लहे निर्जिता वै नृशंसैः संवत्सरान् वै द्वादश राजपुत्राः ॥ ९१ ॥

'जो पापबुद्धि मानव पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा, धर्मकी दृष्टिसे उसकी मृत्यु निकट आ गयी है, ऐसा मेरा विश्वास है। कारण कि इन क्रूर स्वभाववाले कौरवोंने हम सब लोगोंको कपटद्यूतमें जीतकर बारह वर्षोंके लिये वनमें निर्वासित कर दिया था; यद्यपि हम भी राजाके ही पुत्र थे ॥ ९१ ॥

वासः कृच्छ्रो विहितश्चाप्यरण्ये दीर्घं कालं चैकमज्ञातवर्षम् । ते हि कस्माज्जीवतां पाण्डवानां नन्दिष्यन्ते धार्तराष्ट्राः पदस्थाः ॥ ९२ ॥

'हम वनमें दीर्घकालतक बड़े कष्ट सहकर रहे हैं और एक वर्षतक हमें अज्ञातवास करना पड़ा है। ऐसी दशामें पाण्डवोंके जीते-जी वे कौरव अपने पदोंपर प्रतिष्ठित रहकर कैसे आनन्द भोगते रहेंगे? ॥ ९२ ॥

ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयु- र्देवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः । धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां- स्ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥ ९३ ॥

'यदि इन्द्र आदि देवताओंकी सहायता पाकर भी धृतराष्ट्रपुत्र हमें युद्धमें जीत लेंगे तो यह मानना पड़ेगा कि धर्मकी अपेक्षा पापाचारका ही महत्त्व अधिक है और संसारसे पुण्यकर्मका अस्तित्व निश्चय ही उठ गया ॥ ९३ ॥

न चेदिमं पुरुषं कर्मबद्धं न चेदस्मान् मन्यतेऽसौ विशिष्टान् ।

आशांसेऽहं वासुदेवद्वितीयो
दुर्योधनं सानुबन्धं निहन्तुम् ॥ ९४ ॥
‘यदि दुर्योधन मनुष्यको कर्मोंके बन्धनसे बँधा हुआ नहीं मानता है अथवा यदि वह हमलोगोंको अपनेसे श्रेष्ठ तथा प्रबल नहीं समझता है, तो भी मैं यह आशा करता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक बनाकर मैं दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालूँगा ॥ ९४ ॥
न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं
न चेद् भवेत् सुकृतं निष्फलं वा ।
इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं
पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ॥ ९५ ॥
‘राजन्! यदि मनुष्यका किया हुआ यह पापकर्म निष्फल नहीं होता अथवा पुण्यकर्मोंका फल मिले बिना नहीं रहता तो मैं दुर्योधनके वर्तमान और पहलेके किये हुए पापकर्मका विचार करके निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्रकी पराजय अनिवार्य है और इसीमें जगत्की भलाई है ॥ ९५ ॥
प्रत्यक्षं वः कुरवो यद् ब्रवीमि
युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।
अन्यत्र युद्धात् कुरवो यदि स्यु-
र्न युद्धे वै शेष इहास्ति कश्चित् ॥ ९६ ॥
‘कौरवो! मैं तुमलोगोंके समक्ष यह स्पष्टरूपसे बता देना चाहता हूँ कि धृतराष्ट्रके पुत्र यदि युद्धभूमिमें उतरे तो जीवित नहीं बचेंगे। कौरवोंके जीवनकी रक्षा तभी हो सकती है, जब वे युद्धसे दूर रहें। युद्ध छिड़ जानेपर तो उनमेंसे कोई भी यहाँ शेष नहीं रहेगा ॥ ९६ ॥
हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान् सकर्णान्
राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् ।
यद् वः कार्यं तत् कुरुध्वं यथास्व-
मिष्टान् दारानात्मभोगान् भजध्वम् ॥ ९७ ॥
‘मैं कर्णसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंका वध करके कुरुदेशका सम्पूर्ण राज्य जीत लूँगा, अतः तुम्हारा जो-जो कर्तव्य शेष हो, उसे पूरा कर लो। अपने वैभवके अनुसार प्रियतमा पत्नियोंके साथ सुख भोग लो और अपने शरीरके लिये भी जो अभीष्ट भोग हों, उनका उपभोग कर लो ॥ ९७ ॥
अप्येवं नो ब्राह्मणाः सन्ति वृद्धा
बहुश्रुताः शीलवन्तः कुलीनाः ।
सांवत्सरा ज्योतिषि चाभियुक्ता
नक्षत्रयोगेषु च निश्चयज्ञाः ॥ ९८ ॥

‘हमारे पास कितने ही ऐसे वृद्ध ब्राह्मण विद्यमान हैं, जो अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, सुशील, उत्तम कुलमें उत्पन्न, वर्षके शुभाशुभ फलोंको जाननेवाले, ज्योतिष-शास्त्रके मर्मज्ञ तथा ग्रह-नक्षत्रोंके योगफलका निश्चित-रूपसे ज्ञान रखनेवाले हैं ।। ९८ ।।

उच्चावचं दैवयुक्तं रहस्यं दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः । क्षयं महान्तं कुरुसृंजयानां निवेदयन्ते पाण्डवानां जयं च ।। ९९ ।।

‘वे दैवसम्बन्धी उन्नति एवं अवनतिके फलदायक रहस्य बता सकते हैं। प्रश्नोंके अलौकिक ढंगसे उत्तर देते हैं, जिससे भविष्य घटनाओंका ज्ञान हो जाता है। वे शुभाशुभ फलोंका वर्णन करनेके लिये सर्वतोभद्र आदि चक्रोंका भी अनुसंधान करते हैं और मुहूर्तशास्त्रके तो वे पण्डित ही हैं। वे सब लोग निश्चितरूपसे यह निवेदन करते हैं कि कौरवों और सृंजयवंशके लोगोंका बड़ा भारी संहार होनेवाला है और इस महायुद्धमें पाण्डवोंकी विजय होगी ।। ९९ ।।

यथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय । जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो न संशयं पश्यति वृष्णिसिंहः ।। १०० ।।

‘अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिर मानते हैं, मैं अपने शत्रुओंका दमन करनेमें निश्चय सफल होऊँगा। वृष्णिवंशके पराक्रमी वीर भगवान् श्रीकृष्णको भी सारी विद्याओंका अपरोक्ष ज्ञान है। वे भी हमारे इस मनोरथके सिद्ध होनेमें कोई संदेह नहीं देखते हैं ।। १०० ।।

अहं तथैवं खलु भाविरूपं पश्यामि बुद्ध्या स्वयमप्रमत्तः । दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।। १०१ ।।

‘मैं भी स्वयं प्रमादशून्य होकर अपनी बुद्धिसे भावीका ऐसा ही स्वरूप देखता हूँ। मेरी चिरंतन दृष्टि कभी तिरोहित नहीं होती। उसके अनुसार मैं यह निश्चितरूपसे कह सकता हूँ कि युद्धभूमिमें उतरनेपर धृतराष्ट्रके पुत्र जीवित नहीं रह सकते ।। १०१ ।।

अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु- रनाहता कम्पति मे धनुर्ज्या । बाणाश्च मे तूणमुखाद् विसृत्य मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ।। १०२ ।।

'गाण्डीव धनुष बिना स्पर्श किये ही तना जा रहा है, मेरे धनुषकी डोरी बिना खींचे ही हिलने लगी है और मेरे बाण बार-बार तरकससे निकलकर शत्रुओंकी ओर जानेके लिये उतावले हो रहे हैं ।। १०२ ।।

खड्गः कोशान्निःसरति प्रसन्नो
हित्वेव जीर्णामुरगस्त्वचं स्वाम् ।
ध्वजे वाचो रौद्ररूपा भवन्ति
कदा रथो योक्ष्यते ते किरीटिन् ।। १०३ ।।

'चमचमाती हुई तलवार म्यानसे इस प्रकार निकल रही है, मानो सर्प अपनी पुरानी केंचुल छोड़कर चमकने लगा हो तथा मेरी ध्वजापर यह भयंकर वाणी गूँजती रहती है कि अर्जुन! तुम्हारा रथ युद्धके लिये कब जोता जायगा ।। १०३ ।।

गोमायुसंघाश्च नदन्ति रात्रौ
रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् ।
मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका
गृध्रा बकाश्र्चैव तरक्षवश्च ।। १०४ ।।

'रातमें गीदड़ोंके दल कोलाहल मचाते हैं, राक्षस आकाशसे पृथिवीपर टूटे पड़ते हैं तथा हिरण, सियार, मोर, कौआ, गीध, बगुला और चीते मेरे रथके समीप दौड़े आते हैं ।। १०४ ।।

सुवर्णपत्राश्च पतन्ति पश्चाद्
दृष्ट्वा रथं श्वेतहयप्रयुक्तम् ।
अहं ह्येकः पार्थिवान् सर्वयोधान्
शरान् वर्षन् मृत्युलोकं नयेयम् ।। १०५ ।।

'श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए मेरे रथको देखकर सुवर्ण-पत्र नामक पक्षी पीछेसे टूटे पड़ते हैं। इससे जान पड़ता है, मैं अकेला बाणोंकी वर्षा करके समस्त राजाओं और योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दूँगा ।। १०५ ।।

समाददानः पृथगस्त्रमार्गान्
यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे ।
स्थूणाकर्णं पाशुपतं महास्त्रं
ब्राह्मं चास्त्रं यच्च शक्रोऽप्यदान्मे ।। १०६ ।।
वधे धृतो वेगवतः प्रमुञ्चन्
नाहं प्रजाः किंचिदिहावशिष्ये ।
शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भावः
स्थिरो मम ब्रूहि गावलगणे तान् ।। १०७ ।।