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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे । पताकयावधूताश्च हताः केचित् सुरद्विषः ॥ ७९ ॥ सहस्रों दैत्य उस शक्तिकी आगमें जलकर भस्म हो गये। कितने ही स्कन्दके सिंहनादोंसे ही डरकर अपने प्राण खो बैठे तथा कुछ देवद्रोही उनकी पताकासे ही कम्पित होकर मर गये ॥ ७९ ॥

केचिद् घण्टारवत्रस्ता निषेदुर्वसुधातले । केचित् प्रहरणैश्छिन्ना विनिष्पेतुर्गतायुषः ॥ ८० ॥ कुछ दैत्य उनके घण्टानादसे संत्रस्त होकर धरतीपर बैठ गये और कुछ उनके आयुधोंसे छिन्न-भिन्न हो गतायु होकर पृथ्‍वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥

एवं सुरद्विषोऽनेकान् बलवानातातयिनः । जघान समरे वीरः कार्तिकेयो महाबलः ॥ ८१ ॥ इस प्रकार महाबली शक्तिशाली वीर कार्तिकेयने समरांगणमें अनेक आततायी देवद्रोहियोंका संहार कर डाला ॥

बाणो नामाथ दैतेयो बलेः पुत्रो महाबलः । क्रौञ्चं पर्वतमाश्रित्य देवसंघानबाधत ॥ ८२ ॥ राजा बलिका महाबली पुत्र बाणासुर क्रौंच पर्वतका आश्रय लेकर देवसमूहोंको कष्ट पहुँचाया करता था ॥ ८२ ॥

तमभ्यायान्महासेनः सुरशत्रुमुदारधीः । स कार्तिकेयस्य भयात् क्रौञ्चं शरणमीयिवान् ॥ ८३ ॥ उदारबुद्धि महासेनने उस दैत्यपर भी आक्रमण किया। तब वह कार्तिकेयके भयसे क्रौंच पर्वतकी शरणमें जा छिपा ॥

ततः क्रौञ्चं महामन्युः क्रौञ्चनादनिनादितम् । शक्त्या बिभेद भगवान् कार्तिकेयोऽग्निदत्तया ॥ ८४ ॥ इससे भगवान् कार्तिकेयको महान् क्रोध हुआ। उन्होंने अग्निकी दी हुई शक्तिसे क्रौंच पक्षियोंके कोलाहलसे गूँजते हुए क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ॥ ८४ ॥

स शालस्कन्धशबलं त्रस्तवानरवारणम् । प्रोड्डीनोद्भ्रान्तविहगं विनिष्पतितपन्नगम् ॥ ८५ ॥ गोलाङ्गूलर्क्षसंघैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् । कुरङ्गमविनिर्घोषनिनादितवनान्तरम् ॥ ८६ ॥ विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः । शोच्यामपि दशां प्राप्तो राजेव स पर्वतः ॥ ८७ ॥ क्रौंच पर्वत शालवृक्षके तनोंसे भरा हुआ था। वहाँके वानर और हाथी संत्रस्त हो उठे थे, पक्षी भयसे व्याकुल होकर उड़ चले थे, सर्प धराशायी हो गये थे, गोलांगूल जातिके वानरों

और रीछोंके समुदाय भाग रहे थे तथा उनके चीत्कारसे वह पर्वत गूँज उठा था, हरिणोंके आर्तनादसे उस पर्वतका वनप्रान्त प्रतिध्वनित हो रहा था, गुफासे निकलकर सहसा भागनेवाले सिंहों और शरभोंके कारण वह पर्वत बड़ी शोचनीय दशामें पड़ गया था तो भी वह सुशोभित-सा ही हो रहा था ।। विद्याधराः समुत्पेतुस्तस्य शृङ्गनिवासिनः । किन्नराश्च समुद्विग्नाः शक्तिपातरवोद्धताः ।। ८८ ।। उस पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले विद्याधर और किन्नर शक्तिके आघातजनित शब्दसे उद्विग्न होकर आकाशमें उड़ गये ।। ८८ ।। ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः । प्रदीप्तात् पर्वतश्रेष्ठाद् विचित्राभरणस्रजः ।। ८९ ।। तत्पश्चात् उस जलते हुए श्रेष्ठ पर्वतसे विचित्र आभूषण और माला धारण करनेवाले सैकड़ों और हजारों दैत्य निकल पड़े ।। ८९ ।। तान् निजघ्नुरतिक्रम्य कुमारानुचरा मृधे । स चैव भगवान् क्रुद्धो दैत्येन्द्रस्य सुतं तदा ।। ९० ।। सहानुजं जघानाशु वृत्रं देवपतिर्यथा । कुमारके पार्षदोंने युद्धमें आक्रमण करके उन सब दैत्योंको मार गिराया। साथ ही भगवान् कार्तिकेयने कुपित होकर वृत्रासुरको मारनेवाले देवराज इन्द्रके समान दैत्यराजके उस पुत्रको उसके छोटे भाईसहित शीघ्र ही मार डाला ।। बिभेद क्रौञ्चं शक्त्या च पावकिः परवीरहा ।। ९१ ।। बहुधा चैकधा चैव कृत्वाऽऽत्मानं महाबलः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली अग्निपुत्र कार्तिकेयने अपने-आपको एक और अनेक रूपोंमें प्रकट करके शक्तिद्वारा क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ।। शक्तिः क्षिप्ता रणे तस्य पाणिमेति पुनः पुनः ।। ९२ ।। एवंप्रभावो भगवांस्ततो भूयश्च पावकिः । शौर्यादिगुणयोगेन तेजसा यशसा श्रिया ।। ९३ ।। क्रौञ्चस्तेन विनिर्भिन्नो दैत्याश्च शतशो हताः । रणभूमिमें बार-बार चलायी हुई उनकी शक्ति शत्रुका संहार करके पुनः उनके हाथमें लौट आती थी। अग्निपुत्र कार्तिकेयका ऐसा ही प्रभाव है, बल्कि इससे भी बढ़कर है। वे शौर्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दुगुने तेज, यश और श्रीसे सम्पन्न हैं। उन्होंने क्रौंच पर्वतको विदीर्ण करके सैकड़ों दैत्योंको मार गिराया ।। ९२-९३ १/२ ।। ततः स भगवान् देवो निहत्य विबुधद्विषः ।। ९४ ।। सभाज्यमानो विबुधैः परं हर्षमवाप ह ।

तदनन्तर भगवान् स्कन्ददेव देवशत्रुओंका संहार करके देवताओंसे सेवित हो अत्यन्त आनन्दित हुए ।। ततो दुन्दुभयो राजन् नेदुः शङ्खाश्च भारत ।। ९५ ।। मुमुचुर्देवयोषाश्च पुष्पवर्षमनुत्तमम् । योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ।। ९६ ।। भरतवंशी नरेश! तत्पश्चात् दुन्दुभियाँ बज उठीं, शंखोंकी ध्वनि होने लगी, सैकड़ों और हजारों देवांगनाएँ योगीश्वर स्कन्ददेवपर उत्तम फूलोंकी वर्षा करने लगीं ।। दिव्यगन्धमुपादाय ववौ पुण्यश्च मारुतः । गन्धर्वास्तुष्टुवुश्चैनं यज्वानश्च महर्षयः ।। ९७ ।। दिव्य फूलोंकी सुगन्ध लेकर पवित्र वायु चलने लगी। गन्धर्व और यज्ञपरायण महर्षि उनकी स्तुति करने लगे ।। केचिदेनं व्यवस्यन्ति पितामहसुतं प्रभुम् । सनत्कुमारं सर्वेषां ब्रह्मयोनिं तमग्रजम् ।। ९८ ।। कोई उनके विषयमें यह निश्चय करने लगे कि ‘ये ब्रह्माजीके पुत्र, सबके अग्रज एवं ब्रह्मयोनि सनत्कुमार हैं’ ।। केचिन्महेश्वरसुतं केचित् पुत्रं विभावसोः । उमायाः कृत्तिकानां च गङ्गायाश्च वदन्त्युत ।। ९९ ।। कोई उन्हें महादेवजीका, कोई अग्निका, कोई पार्वतीका, कोई कृत्तिकाओंका और कोई गंगाजीका पुत्र बताने लगे ।। ९९ ।। एकधा च द्विधा चैव चतुर्धा च महाबलम् । योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ।। १०० ।। उन महाबली योगेश्वर स्कन्ददेवको लोग एक, दो, चार, सौ तथा सहस्रों रूपोंमें देखते और जानते हैं ।। एतत् ते कथितं राजन् कार्तिकेयाभिषेचनम् । शृणु चैव सरस्वत्यास्तीर्थवर्यस्य पुण्यताम् ।। १०१ ।। राजन्! यह मैंने तुम्हें कार्तिकेयके अभिषेकका प्रसंग सुनाया है। अब तुम सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थकी पावनताका वर्णन सुनो ।। १०१ ।। बभूव तीर्थप्रवरं हतेषु सुरशत्रुषु । कुमारेण महाराज त्रिविष्टपमिवापरम् ।। १०२ ।। महाराज! कुमार कार्तिकेयके द्वारा देवशत्रुओंके मारे जानेपर वह श्रेष्ठ तीर्थ दूसरे स्वर्गके समान सुखदायक हो गया ।। १०२ ।। ऐश्वर्याणि च तत्रस्थो ददावीशः पृथक् पृथक् । ददौ नैर्ऋतमुख्येभ्यस्त्रैलोक्यं पावकात्मजः ।। १०३ ।।

वहीं रहकर स्वामी स्कन्दने पृथक्-पृथक् ऐश्वर्य प्रदान किये। अग्निकुमारने अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य अधिकारियोंको तीनों लोक सौंप दिये ॥ १०३ ॥ एवं स भगवांस्तस्मिंस्तीर्थे दैत्यकुलान्तकः । अभिषिक्तो महाराज देवसेनापतिः सुरैः ॥ १०४ ॥ महाराज! इस प्रकार दैत्यकुलविनाशक देवसेनापति भगवान् स्कन्दका उस तीर्थमें देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया ॥ १०४ ॥ तैजसं नाम तत् तीर्थं यत्र पूर्वमपां पतिः । अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ॥ १०५ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह तैजस नामका तीर्थ है, जहाँ पहले जलके स्वामी वरुणदेवका देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया था ॥ १०५ ॥ अस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा स्कन्दं चाभ्यर्च्य लाङ्गली । ब्राह्मणेभ्यो ददौ रुक्मं वासांस्याभरणानि च ॥ १०६ ॥ उस श्रेष्ठ तीर्थमें हलधारी बलरामने स्नान करके स्कन्ददेवका पूजन किया और ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र एवं आभूषण दिये ॥ १०६ ॥ उषित्वा रजनीं तत्र माधवः परवीरहा । पूज्य तीर्थवरं तच्च स्पृष्ट्वा तोयं च लाङ्गली ॥ १०७ ॥ हृष्टः प्रीतमनाश्चैव ह्यभवन्माधवोत्तमः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी हलधर वहाँ रातभर रहे और उस श्रेष्ठ तीर्थका पूजन एवं उसके जलमें स्नान करके हर्षसे खिल उठे। उन यदुश्रेष्ठ बलरामका मन वहाँ प्रसन्न हो गया था ॥ १०७१/२ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । यथाभिषिक्तो भगवान् स्कन्दो देवैः समागतैः ॥ १०८ ॥ (सेनानीश्च कृतो राजन् बाल एव महाबलः ।) राजन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। समागत देवताओंद्वारा किस प्रकार भगवान् स्कन्दका अभिषेक हुआ और किस प्रकार बाल्यावस्थामें ही वे महाबली कुमार सेनापति बना दिये गये, यह सब कुछ बता दिया गया ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने तारकवधे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा एवं सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें तारकासुरका वधविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०८ १/२ श्लोक हैं।)


अध्याय (पृष्ठ 2829)

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

वरुणका अभिषेक तथा अग्नितीर्थ, ब्रह्मयोनि और कुबेरतीर्थकी उत्पत्तिका प्रसंग

जनमेजय उवाच

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् श्रुतवानस्मि तत्त्वतः ।
अभिषेकं कुमारस्य विस्तरेण यथाविधि ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! आज मैंने आपके मुखसे कुमारके विधिपूर्वक अभिषेकका यह अद्भुत वृत्तान्त यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक सुना है ॥ १ ॥

यच्छ्रुत्वा पूतमात्मानं विजानामि तपोधन ।
प्रहृष्टानि च रोमाणि प्रसन्नं च मनो मम ॥ २ ॥
तपोधन! उसे सुनकर मैं अपने-आपको पवित्र हुआ समझता हूँ। हर्षसे मेरे रोयें खड़े हो गये हैं और मेरा मन प्रसन्नतासे भर गया है ॥ २ ॥

अभिषेकं कुमारस्य दैत्यानां च वधं तथा ।
श्रुत्वा मे परमा प्रीतिर्भूयः कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
कुमारके अभिषेक और उनके द्वारा दैत्योंके वधका वृत्तान्त सुनकर मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है और पुनः मेरे मनमें इस विषयको सुननेकी उत्कण्ठा जागृत् हो गयी है ॥

अपां पतिः कथं ह्यस्मिन्नभिषिक्तः पुरा सुरैः ।
तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ कुशलो ह्यसि सत्तम ॥ ४ ॥
साधुशिरोमणे! महाप्राज्ञ! इस तीर्थमें देवताओंने पहले जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किस प्रकार किया था, वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वकल्पे यथातथम् ।
आदौ कृतयुगे राजन् वर्तमाने यथाविधि ॥ ५ ॥
वरुणं देवताः सर्वा यमेत्येदमथाब्रुवन् ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! इस विचित्र प्रसंगको यथार्थरूपसे सुनो। पूर्वकल्पकी बात है, जब आदि कृतयुग चल रहा था, उस समय सम्पूर्ण देवताओंने वरुणके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ५ १/२ ॥

यथास्मान् सुरराट् शक्रो भयेभ्यः पाति सर्वदा ॥ ६ ॥
तथा त्वमपि सर्वासां सरितां वै पतिर्भव ।

‘जैसे देवराज इन्द्र सदा भयसे हमलोगोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी समस्त सरिताओंके अधिपति हो जाइये (और हमारी रक्षा कीजिये) ।। ६ १/२ ।।
वासश्च ते सदा देव सागरे मकरालये ।। ७ ।।
समुद्रोऽयं तव वशे भविष्यति नदीपतिः ।
सोमेन सार्धं च तव हानिवृद्धी भविष्यतः ।। ८ ।।
‘देव! मकरालय समुद्रमें आपका सदा निवासस्थान होगा और यह नदीपति समुद्र सदा आपके वशमें रहेगा। चन्द्रमाके साथ आपकी भी हानि और वृद्धि होगी’ ।।
एवमस्त्विति तान् देवान् वरुणो वाक्यमब्रवीत् ।
समागम्य ततः सर्वे वरुणं सागरालयम् ।। ९ ।।
अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
तब वरुणने उन देवताओंसे कहा—‘एवमस्तु’। इस प्रकार उनकी अनुमति पाकर सब देवता इकट्ठे होकर उन्होंने समुद्रनिवासी वरुणको शास्त्रीय विधिके अनुसार जलका राजा बना दिया ।। ९ १/२ ।।
अभिषिच्य ततो देवा वरुणं यादसां पतिम् ।। १० ।।
जग्मुः स्वान्येव स्थानानि पूजयित्वा जलेश्वरम् ।
जलजन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणका अभिषेक और पूजन करके सम्पूर्ण देवता अपने-अपने स्थानको ही चले गये ।। १० १/२ ।।
अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महायशाः ।। ११ ।।
सरितः सागरांश्चैव नदांश्चापि सरांसि च ।
पालयामास विधिना यथा देवान् शतक्रतुः ।। १२ ।।
देवताओंद्वारा अभिषिक्त होकर महायशस्वी वरुण देवगणोंकी रक्षा करनेवाले इन्द्रके समान सरिताओं, सागरों, नदों और सरोवरोंका भी विधिपूर्वक पालन करने लगे ।।
ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु ।
अग्नितीर्थं महाप्राज्ञो जगामाथ प्रलम्बहा ।। १३ ।।
प्रलम्बासुरका वध करनेवाले महाज्ञानी बलरामजी उस तीर्थमें स्नान और भाँति-भाँतिके धनका दान करके अग्नितीर्थमें गये ।। १३ ।।
नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ।
लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ ।। १४ ।।
उपतस्थुः सुरा यत्र सर्वलोकपितामहम् ।
अग्निः प्रणष्टो भगवान् कारणं च न विद्महे ।। १५ ।।
सर्वभूतक्षयो मा भूत् सम्पादय विभोऽनलम् ।

निष्पाप नरेश! जब शमीके गर्भमें छिप जानेके कारण कहीं अग्निदेवका दर्शन नहीं हो रहा था और सम्पूर्ण जगत्के प्रकाश अथवा दृष्टिशक्तिके विनाशकी घड़ी उपस्थित हो गयी, तब सब देवता सर्वलोक-पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले—‘प्रभो! भगवान् अग्निदेव अदृश्य हो गये हैं। इसका क्या कारण है, यह हमारी समझमें नहीं आता। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश न हो जाय, इसके लिये अग्निदेवको प्रकट कीजिये’ ॥ १४-१५ १/२ ॥

जनमेजय उवाच

किमर्थं भगवानग्निः प्रणष्टो लोकभावनः ॥ १६ ॥
विज्ञातश्च कथं देवैस्तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ।
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! लोकभावन भगवान् अग्नि क्यों अदृश्य हो गये थे और देवताओंने कैसे उनका पता लगाया? यह यथार्थरूपसे बताइये ॥ १६ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

भृगोः शापाद् भृशं भीतो जातवेदाः प्रतापवान् ॥ १७ ॥
शमीगर्भमथासाद्य ननाश भगवांस्ततः ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! एक समयकी बात है कि प्रतापी भगवान् अग्निदेव महर्षि भृगुके शापसे अत्यन्त भयभीत हो शमीके भीतर जाकर अदृश्य हो गये ॥ १७ १/२ ॥
प्रणष्टे तु तदा वह्नौ देवाः सर्वे सवासवाः ॥ १८ ॥
अन्वैषन्त तदा नष्टं ज्वलनं भृशदुःखिताः ।
उस समय अग्निदेवके दिखायी न देनेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बहुत दुःखी हो उनकी खोज करने लगे ॥
ततोऽग्नितीर्थमासाद्य शमीगर्भस्थमेव हि ॥ १९ ॥
ददृशुर्ज्वलनं तत्र वसमानं यथाविधि ।
तत्पश्चात् अग्नितीर्थमें आकर देवताओंने अग्निको शमीके गर्भमें विधिपूर्वक निवास करते देखा ॥ १९ १/२ ॥
देवाः सर्वे नरव्याघ्र बृहस्पतिपुरोगमाः ॥ २० ॥
ज्वलनं तं समासाद्य प्रीताभूवन् सवासवाः ।
नरव्याघ्र! इन्द्रसहित सब देवता बृहस्पतिको आगे करके अग्निदेवके समीप आये और उन्हें देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ २० १/२ ॥
पुनर्यथागतं जग्मुः सर्वभक्षश्च सोऽभवत् ॥ २१ ॥
भृगोः शापान्महाभाग यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।
महाभाग! फिर वे जैसे आये थे, वैसे लौट गये और अग्निदेव महर्षि भृगुके शापसे सर्वभक्षी हो गये। उन ब्रह्मवादी मुनिने जैसा कहा था, वैसा ही हुआ ॥

तत्राप्याप्लुत्य मतिमान् ब्रह्मयोनिं जगाम ह ॥ २२ ॥ ससर्ज भगवान् यत्र सर्वलोकपितामहः । उस तीर्थमें गोता लगाकर बुद्धिमान् बलरामजी ब्रह्मयोनि तीर्थमें गये, जहाँ सर्वलोकपितामह ब्रह्माने सृष्टि की थी ॥ २२ १/२ ॥

तत्राप्लुत्य ततो ब्रह्मा सह देवैः प्रभुः पुरा ॥ २३ ॥ ससर्ज तीर्थानि तथा देवतानां यथाविधि । पूर्वकालमें देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माने वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक देवतीर्थोंकी रचना की थी ॥ २३ १/२ ॥

तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसूनि विविधानि च ॥ २४ ॥ कौबेरं प्रययौ तीर्थं तत्र तप्त्वा महत्तपः । धनाधिपत्यं सम्प्राप्तो राजन्नैलविलः प्रभुः ॥ २५ ॥ राजन्! उस तीर्थमें स्नान और नाना प्रकारके धनका दान करके बलरामजी कुबेरतीर्थमें गये, जहाँ बड़ी भारी तपस्या करके भगवान् कुबेरने धनाध्यक्षका पद प्राप्त किया था ॥ २५ ॥

तत्रस्थमेव तं राजन् धनानि निधयस्तथा । उपतस्थुर्नरश्रेष्ठ तत् तीर्थं लाङ्गली बलः ॥ २६ ॥ गत्वा स्नात्वा च विधिवद् ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ । नरेश्वर! वहीं उनके पास धन और निधियाँ पहुँच गयी थीं। नरश्रेष्ठ! हलधारी बलरामने उस तीर्थमें जाकर स्नानके पश्चात् ब्राह्मणोंके लिये विधिपूर्वक धनका दान किया ॥ २६ १/२ ॥

ददृशे तत्र तत् स्थानं कौबेरे काननोत्तमे ॥ २७ ॥ पुरा यत्र तपस्तप्तं विपुलं सुमहात्मना । यक्षराज्ञा कुबेरेण वरा लब्धाश्च पुष्कलाः ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने वहाँके एक उत्तम वनमें कुबेरके उस स्थानका दर्शन किया, जहाँ पूर्वकालमें महात्मा यक्षराज कुबेरने बड़ी भारी तपस्या की और बहुत-से वर प्राप्त किये ॥ २७-२८ ॥

धनाधिपत्यं सख्यं च रुद्रेणामिततेजसा । सुरत्वं लोकपालत्वं पुत्रं च नलकूबरम् ॥ २९ ॥ यत्र लेभे महाबाहो धनाधिपतिरञ्जसा । महाबाहो! धनपति कुबेरने वहाँ अमिततेजस्वी रुद्रके साथ मित्रता, धनका स्वामित्व, देवत्व, लोकपालत्व और नलकूबर नामक पुत्र अनायास ही प्राप्त कर लिये ॥

अभिषिक्तश्च तत्रैव समागम्य मरुद्गणैः ॥ ३० ॥ वाहनं चास्य तद् दत्तं हंसयुक्तं मनोजवम् ।

विमानं पुष्पकं दिव्यं नैर्ऋतैश्वर्यमेव च ॥ ३१ ॥
वहीं आकर देवताओंने उनका अभिषेक किया तथा उनके लिये हंसोंसे जुता हुआ और मनके समान वेगशाली वाहन दिव्य पुष्पक विमान दिया। साथ ही उन्हें यक्षोंका राजा बना दिया ॥ ३०-३१ ॥

तत्राप्लुत्य बलो राजन् दत्त्वा दायांश्च पुष्कलान् ।
जगाम त्वरितो रामस्तीर्थं श्वेतानुलेपनः ॥ ३२ ॥
निषेवितं सर्वसत्त्वैर्नाम्ना बदरपाचनम् ।
नानर्तुकवनोपेतं सदापुष्पफलं शुभम् ॥ ३३ ॥
राजन्! उस तीर्थमें स्नान और प्रचुर दान करके श्वेत चन्दनधारी बलरामजी शीघ्रतापूर्वक बदरपाचन नामक शुभ तीर्थमें गये, जो सब प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित, नाना ऋतुओंकी शोभासे सम्पन्न वनस्थलियोंसे युक्त तथा निरन्तर फूलों और फलोंसे भरा रहनेवाला था ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा

वैशम्पायन उवाच

ततस्तीर्थवरं रामो ययौ बदरपाचनम् ।
तपस्विसिद्धचरितं यत्र कन्या धृतव्रता ॥ १ ॥
भरद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! पहले कहा गया है कि वहाँसे बलरामजी बदरपाचन नामक श्रेष्ठ तीर्थमें गये, जहाँ तपस्वी और सिद्ध पुरुष विचरण करते हैं तथा जहाँ पूर्वकालमें उत्तम व्रत धारण करनेवाली भरद्वाजकी ब्रह्मचारिणी पुत्री कुमारी कन्या श्रुतावती, जिसके रूप और सौन्दर्यकी भूमण्डलमें कहीं तुलना नहीं थी, निवास करती थी ॥ १-२ ॥

तपश्चचार सात्युग्रं नियमैर्बहुभिर्वृता ।
भर्ता मे देवराजः स्यादिति निश्चित्य भामिनी ॥ ३ ॥
वह भामिनी बहुत-से नियमोंको धारण करके वहाँ अत्यन्त उग्र तपस्या कर रही थी। उसने अपनी तपस्याका यही उद्देश्य निश्चित कर लिया था कि देवराज इन्द्र मेरे पति हों ॥ ३ ॥

समास्तस्या व्यतिक्रान्ता बह्व्यः कुरुकुलोद्वह ।
चरन्त्या नियमांस्तांस्तान् स्त्रीभिस्तीव्रान् सुदुश्चरान् ॥ ४ ॥
कुरुकुलभूषण! स्त्रियोंके लिये जिनका पालन अत्यन्त दुष्कर और दुःसह है, उन-उन कठोर नियमोंका पालन करती हुई श्रुतावतीके वहाँ अनेक वर्ष व्यतीत हो गये ॥

तस्यास्तु तेन वृत्तेन तमसा च विशाम्पते ।
भक्त्या च भगवान् प्रीतः परया पाकशासनः ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! उसके उस आचरण, तपस्या तथा पराभक्तिसे भगवान् पाकशासन (इन्द्र) बड़े प्रसन्न हुए ॥

आजगामाश्रमं तस्यास्त्रिदशाधिपतिः प्रभुः ।
आस्थाय रूपं विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
वे शक्तिशाली देवराज ब्रह्मर्षि महात्मा वसिष्ठका रूप धारण करके उसके आश्रमपर आये ॥ ६ ॥

सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम् ।
आचारैर्मुनिभिर्हृष्टैः पूजयामास भारत ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! उसने तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ और उग्र तपस्यापरायण वसिष्ठको देखकर मुनिजनोचित आचारोंद्वारा उनका पूजन किया ॥ ७ ॥
उवाच नियमज्ञा च कल्याणी सा प्रियंवदा ।
भगवन् मुनिशार्दूल किमाज्ञापयसि प्रभो ॥ ८ ॥
सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत ।
शक्रभक्त्या च ते पाणिं न दास्यामि कथंचन ॥ ९ ॥
फिर नियमोंका ज्ञान रखनेवाली और मधुर एवं प्रिय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी श्रुतावतीने इस प्रकार कहा—'भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! प्रभो! मेरे लिये क्या आज्ञा है? सुव्रत! आज मैं यथाशक्ति आपको सब कुछ दूँगी; परंतु इन्द्रके प्रति अनुराग रखनेके कारण अपना हाथ आपको किसी प्रकार नहीं दे सकूँगी ॥ ८-९ ॥
व्रतैश्च नियमैश्चैव तपसा च तपोधन ।
शक्रस्तोषयितव्यो वै मया त्रिभुवनेश्वरः ॥ १० ॥
'तपोधन! मुझे अपने व्रतों, नियमों तथा तपस्याद्वारा त्रिभुवनसम्राट् भगवान् इन्द्रको ही संतुष्ट करना है' ॥ १० ॥
इत्युक्तो भगवान् देवः स्मयन्निव निरीक्ष्य ताम् ।
उवाच नियमं ज्ञात्वा सांत्वयन्निव भारत ॥ ११ ॥
भारत! श्रुतावतीके ऐसा कहनेपर भगवान् इन्द्रने मुसकराते हुए-से उसकी ओर देखा और उसके नियमको जानकर उसे सान्त्वना देते हुए-से कहा— ॥ ११ ॥
उग्रं तपश्चरसि वै विदिता मेऽसि सुव्रते ।
यदर्थमयमारम्भस्तव कल्याणि हृद्गतः ॥ १२ ॥
तच्च सर्वं यथाभूतं भविष्यति वरानने ।
'सुव्रते! मैं जानता हूँ तुम बड़ी उग्र तपस्या कर रही हो। कल्याणि! सुमुखि! जिस उद्देश्यसे तुमने यह अनुष्ठान आरम्भ किया है और तुम्हारे हृदयमें जो संकल्प है, वह सब यथार्थरूपसे सफल होगा ॥ १२ १/२ ॥
तपसा लभ्यते सर्वं यथाभूतं भविष्यति ॥ १३ ॥
यथा स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने ।
तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत् सुखम् ॥ १४ ॥
'शुभानने! तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तुम्हारा मनोरथ भी यथावत् रूपसे सिद्ध होगा। देवताओंके जो दिव्य स्थान हैं, वे तपस्यासे प्राप्त होनेवाले हैं। महान् सुखका मूल कारण तपस्या ही है ॥ १३-१४ ॥
इति कृत्वा तपो घोरं देहं संन्यस्य मानवाः ।

देवत्वं यान्ति कल्याणि शृणुष्वैकं वचो मम ॥ १५ ॥
'कल्याणि! इस उद्देश्यसे मनुष्य घोर तपस्या करके अपने शरीरको त्यागकर देवत्व प्राप्त कर लेते हैं। अच्छा, अब तुम मेरी एक बात सुनो ॥ १५ ॥
पञ्च चैतानि सुभगे बदराणि शुभव्रते ।
पचेत्युक्त्वा तु भगवाञ्जगाम बलसूदनः ॥ १६ ॥
आमन्त्र्यतां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः ।
अविदूरे ततस्तस्मादाश्रमात् तीर्थमुत्तमम् ॥ १७ ॥
'सुभगे! शुभव्रते! ये पाँच बेरके फल हैं। तुम इन्हें पका दो।' ऐसा कहकर भगवान् इन्द्र कल्याणी श्रुतावतीसे पूछकर उस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर स्थित उत्तम तीर्थमें गये और वहाँ स्नान करके जप करने लगे ॥ १६-१७ ॥
इन्द्रतीर्थेति विख्यातं त्रिषु लोकेषु मानद ।
तस्या जिज्ञासनार्थं स भगवान् पाकशासनः ॥ १८ ॥
बदराणामपचनं चकार विबुधाधिपः ।
मानद! वह तीर्थ तीनों लोकोंमें इन्द्रतीर्थके नामसे विख्यात है। देवराज भगवान् पाकशासनने उस कन्याके मनोभावकी परीक्षा लेनेके लिये उन बेरके फलोंको पकने नहीं दिया ॥ १८ १/२ ॥
ततः प्रतप्ता सा राजन् वाग्यता विगतक्लमा ॥ १९ ॥
तत्परा शुचिसंवीता पावके समधिश्रयत् ।
अपचद् राजशार्दूल बदराणि महाव्रता ॥ २० ॥
राजन्! तदनन्तर शौचाचारसे सम्पन्न उस तपस्विनीने थकावटसे रहित हो मौनभावसे उन फलोंको आगपर चढ़ा दिया। नृपश्रेष्ठ! फिर वह महाव्रता कुमारी बड़ी तत्परताके साथ उन बेरके फलोंको पकाने लगी ॥ १९-२० ॥
तस्याः पचन्त्याः सुमहान् कालोऽगात् पुरुषर्षभ ।
न च स्म तान्यपच्यन्त दिनं च क्षयमभ्यगात् ॥ २१ ॥
पुरुषप्रवर! उन फलोंको पकाते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु वे फल पक न सके। इतनेमें ही दिन समाप्त हो गया ॥ २१ ॥
हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्याः काष्ठसंचयः ।
अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत् ॥ २२ ॥
उसने जो ईंधन जमा कर रखे थे, वे सब आगमें जल गये। तब अग्निको ईंधनरहित देख उसने अपने शरीरको जलाना आरम्भ किया ॥ २२ ॥
पादौ प्रक्षिप्य सा पूर्वं पावके चारुदर्शना ।
दग्धौ दग्धौ पुनः पादावुपावर्तयतानघ ॥ २३ ॥

निष्पाप नरेश! मनोहर दिखायी देनेवाली उस कन्याने पहले अपने दोनों पैर आगमें डाल दिये। वे ज्यों-ज्यों जलने लगे, त्यों-ही-त्यों वह उन्हें आगके भीतर बढ़ाती गयी॥ २३॥

चरणौ दह्यमानौ च नाचिन्तयदनिन्दिता ।
कुर्वाणा दुष्करं कर्म महर्षिप्रियकाम्यया ॥ २४ ॥
उस साध्वीने अपने जलते हुए चरणोंकी कुछ भी परवा नहीं की। वह महर्षिका प्रिय करनेकी इच्छासे दुष्कर कार्य कर रही थी॥ २४॥

न वैमनस्यं तस्यास्तु मुखभेदोऽथवाभवत् ।
शरीरमग्निनाऽऽदीप्य जलमध्ये यथा स्थिता ॥ २५ ॥
उसके मनमें तनिक भी उदासी नहीं आयी। मुखकी कान्तिमें भी कोई अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने शरीरको आगमें जलाकर भी ऐसी प्रसन्न थी, मानो जलके भीतर खड़ी हो॥ २५॥

तच्चास्या वचनं नित्यमवर्तद्धृदि भारत ।
सर्वथा बदराण्येव पक्तव्यानीति कन्यका ॥ २६ ॥
भारत! उसके मनमें निरन्तर इसी बातका चिन्तन होता रहता था कि ‘इन बेरके फलोंको हर तरहसे पकाना है’॥

सा तन्मनसि कृत्वैव महर्षेर्वचनं शुभा ।
अपचद् बदराण्येव न चापच्यन्त भारत ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! महर्षिके वचनको मनमें रखकर वह शुभलक्षणा कन्या उन बेरोंको पकाती ही रही, परंतु वे पक न सके॥ २७॥

तस्यास्तु चरणौ वह्निर्ददाह भगवान् स्वयम् ।
न च तस्या मनोदुःखं स्वल्पमप्यभवत् तदा ॥ २८ ॥
भगवान् अग्निने स्वयं ही उसके दोनों पैरोंको जला दिया, तथापि उस समय उसके मनमें थोड़ा-सा भी दुःख नहीं हुआ॥ २८॥

अथ तत् कर्म दृष्ट्वास्याः प्रीतस्त्रिभुवनेश्वरः ।
ततः संदर्शयामास कन्यायै रूपमात्मनः ॥ २९ ॥
उसका वह कर्म देखकर त्रिभुवनके स्वामी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने उस कन्याको अपना यथार्थ रूप दिखाया॥ २९॥

उवाच च सुरश्रेष्ठस्तां कन्यां सुदृढव्रताम् ।
प्रीतोऽस्मि ते शुभे भक्त्या तपसा नियमेन च ॥ ३० ॥
तस्माद् योऽभिमतः कामः स ते सम्पत्स्यते शुभे ।
देहं त्यक्त्वा महाभागे त्रिदिवे मयि वत्स्यसि ॥ ३१ ॥

इसके बाद सुरश्रेष्ठ इन्द्रने दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा—'शुभे! मैं तुम्हारी तपस्या, नियमपालन और भक्तिसे बहुत संतुष्ट हूँ। अतः कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट मनोरथ है, वह पूर्ण होगा। महाभागे! तुम इस शरीरका परित्याग करके स्वर्गलोकमें मेरे पास रहोगी॥ ३०-३१॥

इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति। सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना बदरपाचनम्॥ ३२॥ 'सुभ्रु! तुम्हारा यह श्रेष्ठ तीर्थ इस जगत्में सुस्थिर होगा, बदरपाचन नामसे प्रसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला होगा॥ ३२॥

विख्यातं त्रिषु लोकेषु ब्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम्। अस्मिन् खलु महाभागे शुभे तीर्थवरेऽनघे॥ ३३॥ त्यक्त्वा सप्तर्षयो जग्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम्। 'यह तीनों लोकोंमें विख्यात है। बहुत-से ब्रह्मर्षियोंने इसमें स्नान किया है। पापरहित महाभागे! एक समय सप्तर्षिगण इस मंगलमय श्रेष्ठ तीर्थमें अरुन्धतीको छोड़कर हिमालय पर्वतपर गये थे॥ ३३ १/२॥

ततस्ते वै महाभागा गत्वा तत्र सुसंशिताः॥ ३४॥ वृत्त्यर्थं फलमूलानि समाहर्तुं ययुः किल। 'वहाँ पहुँचकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे महाभाग महर्षि जीवन-निर्वाहके निमित्त फल-मूल लानेके लिये वनमें गये॥ ३४ १/२॥

तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने॥ ३५॥ अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी। 'जीविकाकी इच्छासे जब वे हिमालयके वनमें निवास करते थे, उन्हीं दिनों बारह वर्षोंतक इस देशमें वर्षा ही नहीं हुई॥ ३५ १/२॥

ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विनः॥ ३६॥ अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याभवत् तदा। 'वे तपस्वी मुनि वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय कल्याणी अरुन्धती भी प्रतिदिन तपस्यामें ही लगी रही॥ ३६ १/२॥

अरुन्धतीं ततो दृष्ट्वा तीव्रं नियममास्थिताम्॥ ३७॥ अथागमत् त्रिनयनः सुप्रीतो वरदस्तदा। 'अरुन्धतीको कठोर नियमका आश्रय लेकर तपस्या करती देख त्रिनेत्रधारी वरदायक भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए॥ ३७ १/२॥

ब्राह्मं रूपं ततः कृत्वा महादेवो महायशाः॥ ३८॥ तामभ्येत्याब्रवीद् देवो भिक्षामिच्छाम्यहं शुभे।

'फिर वे महायशस्वी महादेवजी ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास गये और बोले—'शुभे! मैं भिक्षा चाहता हूँ' ।। ३८ १/२ ।।
प्रत्युवाच ततः सा तं ब्राह्मणं चारुदर्शना ।। ३९ ।।
क्षीणोऽन्नसंचयो विप्र बदराणीह भक्षय ।
'तब परम सुन्दरी अरुन्धतीने उन ब्राह्मण देवतासे कहा—'विप्रवर! अन्नका संग्रह तो समाप्त हो गया। अब यहाँ ये बेर हैं, इन्हींको खाइये' ।। ३९ १/२ ।।
ततोऽब्रवीन्महादेवः पचस्वैतानि सुव्रते ।। ४० ।।
इत्युक्ता सापचत् तानि ब्राह्मणप्रियकाम्यया ।
अधिश्रित्य समिद्धेऽग्नौ बदराणि यशस्विनी ।। ४१ ।।
'तब महादेवजीने कहा—'सुव्रते! इन बेरोंको पका दो।' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर यशस्विनी अरुन्धतीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उन बेरोंको प्रज्वलित अग्निपर रखकर पकाना आरम्भ किया ।। ४०-४१ ।।
दिव्या मनोरमाः पुण्याः कथाः शुश्राव सा तदा ।
अतीता सा त्वनावृष्टिर्घोरा द्वादशवार्षिकी ।। ४२ ।।
अनश्नन्त्याः पचन्त्याश्च शृण्वन्त्याश्च कथाः शुभाः ।
दिनोपमः स तस्याथ कालोऽतीतः सुदारुणः ।। ४३ ।।
'उस समय उसे परम पवित्र मनोहर एवं दिव्य कथाएँ सुनायी देने लगीं। वह बिना खाये ही बेर पकाती और मंगलमयी कथाएँ सुनती रही। इतनेमें ही बारह वर्षोंकी वह भयंकर अनावृष्टि समाप्त हो गयी। वह अत्यन्त दारुण समय उसके लिये एक दिनके समान व्यतीत हो गया ।। ४२-४३ ।।
ततस्तु मुनयः प्राप्ताः फलान्यादाय पर्वतात् ।
ततः स भगवान् प्रीतः प्रोवाचारुन्धतीं ततः ।। ४४ ।।
उपसर्पस्व धर्मज्ञे यथापूर्वमिमानृषीन् ।
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञे तपसा नियमेन च ।। ४५ ।।
'तदनन्तर सप्तर्षिगण हिमालय पर्वतसे फल लेकर वहाँ आये। उस समय भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर अरुन्धतीसे कहा—'धर्मज्ञे! अब तुम पहलेके समान इन ऋषियोंके पास जाओ! धर्मको जाननेवाली देवि! मैं तुम्हारी तपस्या और नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ ।। ४४-४५ ।।
ततः संदर्शयामास स्वरूपं भगवान् हरः ।
ततोऽब्रवीत् तदा तेभ्यस्तस्याश्च चरितं महत् ।। ४६ ।।
'ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अपने स्वरूपका दर्शन कराया और उन सप्तर्षियोंसे अरुन्धतीके महान् चरित्रका वर्णन किया ।। ४६ ।।
भवद्भिर्हिमवत्पृष्ठे यत् तपः समुपार्जितम् ।

अस्याश्च यत् तपो विप्रा न समं सन्मतं मम ॥ ४७ ॥
‘वे बोले—‘विप्रवरो! आपलोगोंने हिमालयके शिखरपर रहकर जो तपस्या की है और अरुन्धतीने यहीं रहकर जो तप किया है, इन दोनोंमें कोई समानता नहीं है (अरुन्धतीका ही तप श्रेष्ठ है) ॥ ४७ ॥

अनया हि तपस्विन्या तपस्तप्तं सुदुश्चरम् ।
अनश्नन्या पचन्त्या च समा द्वादश पारिताः ॥ ४८ ॥
‘इस तपस्विनीने बिना कुछ खाये-पीये बेर पकाते हुए बारह वर्ष बिता दिये हैं। इस प्रकार इसने दुष्कर तपका उपार्जन कर लिया है’ ॥ ४८ ॥

ततः प्रोवाच भगवांस्तामेवारुन्धतीं पुनः ।
वरं वृणीष्व कल्याणि यत् तेऽभिलषितं हृदि ॥ ४९ ॥
‘इसके बाद भगवान् शंकरने पुनः अरुन्धतीसे कहा—‘कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँग लो’ ॥ ४९ ॥

साब्रवीत् पृथुताम्राक्षी देवं सप्तर्षिसंसदि ।
भगवान् यदि मे प्रीतस्तीर्थं स्यादिदमद्भुतम् ॥ ५० ॥
सिद्धदेवर्षिदयितं नाम्ना बदरपाचनम् ।
‘तब विशाल एवं अरुण नेत्रोंवाली अरुन्धतीने सप्तर्षियोंकी सभामें महादेवजीसे कहा—‘भगवान् यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो यह स्थान बदरपाचन नामसे प्रसिद्ध होकर सिद्धों और देवर्षियोंका प्रिय एवं अद्भुत तीर्थ हो जाय ।।

तथास्मिन् देवदेवेश त्रिरात्रमुषितः शुचिः ॥ ५१ ॥
प्राप्नुयादुपवासेन फलं द्वादशवार्षिकम् ।
‘देवदेवेश्वर! इस तीर्थमें तीन राततक पवित्र भावसे रहकर वास करनेसे मनुष्यको बारह वर्षोंके उपवासका फल प्राप्त हो’ ॥ ५१ ½ ॥

एवमस्त्विति तां देवः प्रत्युवाच तपस्विनीम् ॥ ५२ ॥
सप्तर्षिभिः स्तुतो देवस्ततो लोकं ययौ तदा ।
‘तब महादेवजीने उस तपस्विनीसे कहा—‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)। फिर सप्तर्षियोंने उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् महादेवजी अपने लोकमें चले गये ॥ ५२ ½ ॥

ऋषयो विस्मयं जग्मुस्तां दृष्ट्वा चाप्यरुन्धतीम् ॥ ५३ ॥
अश्रान्तां चाविवर्णां च क्षुत्पिपासासमायुताम् ।
‘अरुन्धती भूख-प्याससे युक्त होनेपर भी न तो थकी थी और न उसकी अंगकान्ति ही फीकी पड़ी थी। उसे देखकर ऋषियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५३ ½ ॥

एवं सिद्धिः परा प्राप्ता अरुन्धत्या विशुद्धया ॥ ५४ ॥
यथा त्वया महाभागे मदर्थं संशितव्रते ।
विशेषो हि त्वया भद्रे व्रते ह्यस्मिन् समर्पितः ॥ ५५ ॥

‘कठोर व्रतका पालन करनेवाली महाभागे! इस प्रकार विशुद्धहृदया अरुन्धती देवीने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी कि तुमने मेरे लिये तप करके सिद्धि पायी है। भद्रे! तुमने इस व्रतमें विशेष आत्मसमर्पण किया है ।। ५४-५५ ।। तथा चेदं ददाम्यद्य नियमेन सुतोषितः । विशेषं तव कल्याणि प्रयच्छामि वरं वरे ।। ५६ ।। ‘सती कल्याणि! मैं तुम्हारे नियमसे संतुष्ट होकर यह विशेष वर प्रदान करता हूँ ।। ५६ ।। अरुन्धत्या वरस्तस्या यो दत्तो वै महात्मना । तस्य चाहं प्रभावेण तव कल्याणि तेजसा ।। ५७ ।। प्रवक्ष्यामि परं भूयो वरमत्र यथाविधि । ‘कल्याणि! महात्मा भगवान् शंकरने अरुन्धती देवीको जो वर दिया था, तुम्हारे तेज और प्रभावसे मैं उससे भी बढ़कर उत्तम वर देता हूँ ।। ५७ १/२ ।। यस्त्वेकां रजनीं तीर्थे वत्स्यते सुसमाहितः ।। ५८ ।। स स्नात्वा प्राप्स्यते लोकान् देहन्यासात् सुदुर्लभान् । ‘जो इस तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर एक रात निवास करेगा, वह यहाँ स्नान करके देह-त्यागके पश्चात् उन पुण्यलोकोंमें जायगा, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं’ ।। ५८ १/२ ।। इत्युक्त्वा भगवान् देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् ।। ५९ ।। श्रुतावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः । पुण्यमयी श्रुतावतीसे ऐसा कहकर सहस्र नेत्रधारी प्रतापी भगवान् इन्द्रदेव पुनः स्वर्गलोकमें चले गये ।। ५९ १/२ ।। गते वज्रधरे राजंस्तत्र वर्षं पपात ह ।। ६० ।। पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां पुण्यगन्धिनाम् । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुस्तत्र महास्वनाः ।। ६१ ।। राजन्! भरतश्रेष्ठ! वज्रधारी इन्द्रके चले जानेपर वहाँ पवित्र सुगन्धवाले दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और महान् शब्द करनेवाली देवदुन्दुभियाँ बज उठीं ।। मारुतश्च ववौ पुण्यः पुण्यगन्धो विशाम्पते । उत्सृज्य तु शुभा देहं जगामास्य च भार्यताम् ।। ६२ ।। तपसोग्रेण तं लब्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत । प्रजानाथ! पावन सुगंधसे युक्त पवित्र वायु चलने लगी। शुभलक्षणा श्रुतावती अपने शरीरको त्यागकर इन्द्रकी भार्या हो गयी। अच्युत! वह अपनी उग्र तपस्यासे इन्द्रको पाकर उनके साथ रमण करने लगी ।। ६२ १/२ ।।

जनमेजय उवाच

का तस्या भगवन् माता क्व संवृद्धा च शोभना ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं विप्र परं कौतूहलं हि मे ॥ ६३ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! शोभामयी श्रुतावतीकी माता कौन थी और वह कहाँ पली थी? यह मैं सुनना चाहता हूँ। विप्रवर! इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है।

वैशम्पायन उवाच

भरद्वाजस्य विप्रर्षेः स्कन्नं रेतो महात्मनः ॥ ६४ ॥
दृष्ट्वाप्सरसमायान्तीं घृताचीं पृथुलोचनाम् ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! एक दिन विशाल नेत्रोंवाली घृताची अप्सरा कहींसे आ रही थी। उसे देखकर महात्मा महर्षि भरद्वाजका वीर्य स्खलित हो गया ॥
स तु जग्राह तद्रेतः करेण जपतां वरः ॥ ६५ ॥
तदापतत् पर्णपुटे तत्र सा संभवत् सुता ।
जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ऋषिने उस वीर्यको अपने हाथमें ले लिया, परंतु वह तत्काल ही एक पत्तेके दोनेमें गिर पड़ा। वहीं वह कन्या प्रकट हो गयी ॥ ६५ १/२ ॥
तस्यास्तु जातकर्मादि कृत्वा सर्वं तपोधनः ॥ ६६ ॥
नाम चास्याः स कृतवान् भरद्वाजो महामुनिः ।
श्रुतावतीति धर्मात्मा देवर्षिगणसंसदि ।
स्वे च तामाश्रमे न्यस्य जगाम हिमवद्वनम् ॥ ६७ ॥
तपस्याके धनी धर्मात्मा महामुनि भरद्वाजने उसके जातकर्म आदि सब संस्कार करके देवर्षियोंकी सभामें उसका नाम श्रुतावती रख दिया। फिर वे उस कन्याको अपने आश्रममें रखकर हिमालयके जंगलमें चले गये थे ॥
तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो
वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्यः ।
जगाम तीर्थं सुसमाहितात्मा
शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम् ॥ ६८ ॥
वृष्णिवंशावतंस महानुभाव बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धनका दान करके उस समय एकाग्रचित्त हो वहाँसे इन्द्र-तीर्थमें चले गये ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने बदरपाचनतीर्थकथने अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें बदरपाचनतीर्थका वर्णनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥