महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
यत्रेजिवानुडुपती राजसूयेन भारत ।
तस्मिंस्तीर्थे महानासीत् संग्रामस्तारकामयः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! वही सोम-तीर्थ है, जहाँ नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाने राजसूययज्ञ किया था। उसी तीर्थमें महान् तारकामय संग्राम हुआ था ।। १ ।।
तत्राप्युपस्पृश्य बले दत्त्वा दानानि चात्मवान् ।
सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ।। २ ।।
धर्मात्मा एवं मनस्वी बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान एवं दान करके सारस्वत मुनिके तीर्थमें गये ।। २ ।।
तत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ३ ।।
प्राचीनकालमें जब बारह वर्षोंतक अनावृष्टि हो गयी थी, सारस्वत मुनिने वहीं उत्तम ब्राह्मणोंको वेदाध्ययन कराया था ।। ३ ।।
जनमेजय उवाच
कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
ऋषीनध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ४ ।।
जनमेजयने पूछा—मुने! प्राचीनकालमें सारस्वत मुनिने बारह वर्षोंकी अनावृष्टिके समय उत्तम ब्राह्मणोंको किस प्रकार वेदोंका अध्ययन कराया था? ।। ४ ।।
वैशम्पायन उवाच
आसीत् पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान् महातपाः ।
दधीच इति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। ५ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—महाराज! पूर्वकालमें एक बुद्धिमान् महातपस्वी मुनि रहते थे, जो ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय थे। उनका नाम था दधीच ।। ५ ।।
तस्यातितपसः शक्रो बिभेति सततं विभो ।
न स लोभयितुं शक्यः फलैर्बहुविधैरपि ।। ६ ।।
प्रभो! उनकी भारी तपस्यासे इन्द्र सदा डरते रहते थे। नाना प्रकारके फलोंका प्रलोभन देनेपर भी उन्हें लुभाया नहीं जा सकता था ।। ६ ।।
प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत् पाकशासनः । दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुषाम् ॥ ७ ॥ तब इन्द्रने मुनिको लुभानेके लिये एक पवित्र दर्शनीय एवं दिव्य अप्सरा भेजी, जिसका नाम था अलम्बुषा ॥ ७ ॥ तस्य तर्पयतो देवान् सरस्वत्यां महात्मनः । समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भाविनी ॥ ८ ॥ महाराज! एक दिन, जब महात्मा दधीच सरस्वती नदीमें देवताओंका तर्पण कर रहे थे, वह माननीय अप्सरा उनके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ ८ ॥ तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः । रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत् सा जग्राह निम्नगा ॥ ९ ॥ उस दिव्यरूपधारिणी अप्सराको देखकर उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका वीर्य सरस्वतीके जलमें गिर पड़ा। उस वीर्यको सरस्वती नदीने स्वयं ग्रहण कर लिया ॥ ९ ॥ कुक्षौ चाप्यदधाद् हृष्टा तद् रेतः पुरुषर्षभ । सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महानदी ॥ १० ॥ पुरुषप्रवर! उस महानदीने हर्षमें भरकर पुत्रके लिये उस वीर्यको अपनी कुक्षिमें रख लिया और इस प्रकार वह गर्भवती हो गयी ॥ १० ॥ सुषुवे चापि समये पुत्रं सा सरितां वरा । जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥ ११ ॥ प्रभो! समय आनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने एक पुत्रको जन्म दिया और उसे लेकर वह ऋषिके पास गयी ॥ ११ ॥ ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् । ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! ऋषियोंकी सभामें बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ दधीचको देखकर उन्हें उनका वह पुत्र सौंपती हुई सरस्वती नदी इस प्रकार बोली— ॥ १२ ॥ ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया । दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत् स्कन्नं प्रागलम्बुषाम् ॥ १३ ॥ तत् कुक्षिणा वै ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् । न विनाशमिदं गच्छेत् त्वत्तेज इति निश्चयात् ॥ १४ ॥ प्रतिगृहीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ।
‘ब्रह्मर्षे! यह आपका पुत्र है। इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था। ब्रह्मर्षे! पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे। अतः आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये’ ।। १३-१४ १/२ ।।
इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ।। १५ ।।
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ।। १६ ।।
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। १७ ।।
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ।
उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए। भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ-कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया—‘सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति-लाभ करेंगे’ ।। १५-१७ १/२ ।।
इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् ।। १८ ।।
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ।
राजन्! ऐसा कहकर अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल हृदयसे मुनिने प्रेमपूर्वक उत्तम वाणीद्वारा सरस्वती देवीका स्तवन किया। उस स्तुतिको तुम यथार्थरूपसे सुनो ।। १८ १/२ ।।
प्रसुतासि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा ।। १९ ।।
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ।
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने ।। २० ।।
तस्मात् सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ।
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः ।। २१ ।।
‘महाभागे! तुम पूर्वकालमें ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो। सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि तुम्हारी महिमाको जानते हैं। प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा भी प्रिय करती रही हो; अतः वरवर्णिनि! तुम्हारा यह लोकभावन महान् पुत्र तुम्हारे ही नामपर ‘सारस्वत’ कहलायेगा ।। १९—२१ ।।
सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ।
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् ।। २२ ।।
सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ।
'यह सारस्वत नामसे विख्यात महातपस्वी होगा। महाभागे! इस संसारमें बारह वर्षोंतक जब वर्षा बंद हो जायगी, उस समय यह सारस्वत ही श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वेद पढ़ायेगा ।। २२ १/२ ।। पुण्याभ्यश्च सरिद्भ्यस्त्वं सदा पुण्यतमा शुभे ।। २३ ।। भविष्यसि महाभागे मत्प्रसादात् सरस्वति । 'शुभे! महासौभाग्यशालिनी सरस्वति! तुम मेरे प्रसादसे अन्य पवित्र सरिताओंकी अपेक्षा सदा ही अधिक पवित्र बनी रहोगी' ।। २३ १/२ ।। एवं सा संस्तुतानेन वरं लब्ध्वा महानदी ।। २४ ।। पुत्रमादाय मुदिता जगाम भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उनके द्वारा प्रशंसित हो वर पाकर वह महानदी पुत्रको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चली गयी ।। २४ १/२ ।। एतस्मिन्नेव काले तु विरोधे देवदानवैः ।। २५ ।। शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन् विचचार ह । इसी समय देवताओं और दानवोंमें विरोध होने-पर इन्द्र अस्त्र-शस्त्रोंकी खोजके लिये तीनों लोकोंमें विचरण करने लगे ।। २५ १/२ ।। न चोपलेभे भगवान् शक्रः प्रहरणं तदा ।। २६ ।। यद्धैतेषां भवेद् योग्यं वधाय विबुधद्विषाम् । परंतु भगवान् शक्र उस समय ऐसा कोई हथियार न पा सके, जो उन देवद्रोहियोंके वधके लिये उपयोगी हो सके ।। २६ १/२ ।। ततोऽब्रवीत् सुरान् शक्रो न मे शक्या महासुराः ।। २७ ।। ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः । तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—'दधीच मुनिकी अस्थियोंके सिवा और किसी अस्त्र-शस्त्रसे मेरे द्वारा देवद्रोही महान् असुर नहीं मारे जा सकते ।। २७ १/२ ।। तस्माद् गत्वा ऋषिश्रेष्ठो याच्यतां सुरसत्तमाः ।। २८ ।। दधीचास्थीनि देहीति तैर्वधिष्यामहे रिपून् । 'अतः सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग जाकर मुनिवर दधीचसे याचना करो कि आप अपनी हड्डियाँ हमें दे दें। हम उन्हींके द्वारा अपने शत्रुओंका वध करेंगे' ।। २८ १/२ ।। स च तैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा ।। २९ ।। प्राणत्यागं कुरुश्रेष्ठ चकारैवाविचारयन् । स लोकानक्षयान् प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा ।। ३० ।। कुरुश्रेष्ठ! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अस्थियोंके लिये याचना की जानेपर मुनिवर दधीचने बिना कोई विचार किये अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। उस समय देवताओंका
प्रिय करनेके कारण वे अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ २९-३० ॥ तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा । कारयामास दिव्यानि नानाप्रहरणानि च ॥ ३१ ॥ गदावज्राणि चक्राणि गुरून् दण्डांश्च पुष्कलान् । तब इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर दधीचकी हड्डियोंसे गदा, वज्र, चक्र और बहुसंख्यक भारी दण्ड आदि नाना प्रकारके दिव्य आयुध तैयार कराये ॥ ३१ १/२ ॥ स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा ॥ ३२ ॥ प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः । अतिकायः स तेजस्वी लोकसारो विनिर्मितः ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुने तीव्र तपस्यासे भरे हुए लोकमंगलकारी विशालकाय एवं तेजस्वी दधीचको उत्पन्न किया था। ऐसा जान पड़ता था, मानो सम्पूर्ण जगत्के सारतत्त्वसे उनका निर्माण किया गया हो ॥ ३२-३३ ॥ जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः । नित्यमुद्विजते चास्य तेजसः पाकशासनः ॥ ३४ ॥ वे पर्वतके समान भारी और ऊँचे थे। अपनी महत्ताके लिये वे सामर्थ्यशाली मुनि सर्वत्र विख्यात थे। पाकशासन इन्द्र उनके तेजसे सदा उद्विग्न रहते थे ॥ ३४ ॥ तेन वज्रेण भगवान् मन्त्रयुक्तेन भारत । भृशं क्रोधविसृष्टेन ब्रह्मतेजोद्भवेन च ॥ ३५ ॥ दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव । भरतनन्दन! ब्रह्मतेजसे प्रकट हुए उस वज्रको मन्त्रोच्चारणके साथ अत्यन्त क्रोधपूर्वक छोड़कर भगवान् इन्द्रने आठ सौ दस दैत्य-दानव वीरोंका वध कर डाला ॥ ३५ १/२ ॥ अथ काले व्यतिक्रान्ते महत्यतिभयंकरे ॥ ३६ ॥ अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन् द्वादशवार्षिकी । राजन्! तदनन्तर सुदीर्घ काल व्यतीत होनेपर जगत्में बारह वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अत्यन्त भयंकर अनावृष्टि प्राप्त हुई ॥ ३६ १/२ ॥ तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षयः ॥ ३७ ॥ वृत्त्यर्थं प्राद्रवन् राजन् क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् । नरेश्वर! बारह वर्षोंकी उस अनावृष्टिमें सब महर्षि भूखसे पीड़ित हो जीविकाके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ने लगे ॥ ३७ १/२ ॥ दिग्भ्यस्तान् प्रद्रुतान् दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा ॥ ३८ ॥ गमनाय मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती । सम्पूर्ण दिशाओंसे भागकर इधर-उधर जाते हुए उन महर्षियोंको देखकर सारस्वत मुनिने भी वहाँसे अन्यत्र जानेका विचार किया। तब सरस्वतीदेवीने उनसे कहा ।।
न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा ॥ ३९ ॥ दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत। भरतनन्दन! सरस्वती इस प्रकार बोलीं—‘बेटा! तुम्हें यहाँसे कहीं नहीं जाना चाहिये। मैं सदा तुम्हें भोजनके लिये उत्तमोत्तम मछलियाँ दूँगी; अतः तुम यहीं रहो’॥
इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन् देवतास्तथा ॥ ४० ॥ आहारमकरोन्नित्यं प्राणान् वेदांश्च धारयन्। सरस्वतीके ऐसा कहनेपर सारस्वत मुनि वहीं रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करने लगे। वे प्रतिदिन भोजन करते और अपने प्राणों तथा वेदोंकी रक्षा करते थे॥ ४० १/२ ॥
अथ तस्यामनावृष्ट्यामतीतायां महर्षयः ॥ ४१ ॥ अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्यायकारणात्। जब बारह वर्षोंकी वह अनावृष्टि प्रायः बीत गयी, तब महर्षि पुनः स्वाध्यायके लिये एक-दूसरेसे पूछने लगे॥ ४१ १/२ ॥
तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदाभिधावताम् ॥ ४२ ॥ सर्वेषामेव राजेन्द्र न कश्चित् प्रतिभानवान्। राजेन्द्र! उस समय भूखसे पीड़ित होकर इधर-उधर दौड़नेवाले सभी महर्षि वेद भूल गये थे। कोई भी ऐसा प्रतिभाशाली नहीं था, जिसे वेदोंका स्मरण रह गया हो॥ ४२ १/२ ॥
अथ कश्चिदृषिस्तेषां सारस्वतमुपेयिवान् ॥ ४३ ॥ कुर्वाणं संशितात्मानं स्वाध्यायमृषिसत्तमम्। तदनन्तर उनमेंसे कोई ऋषि प्रतिदिन स्वाध्याय करनेवाले शुद्धात्मा मुनिवर सारस्वतके पास आये॥
स गत्वाऽऽचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमतिप्रभम् ॥ ४४ ॥ स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने। फिर वहाँसे जाकर उन्होंने सब महर्षियोंको बताया कि ‘देवताओंके समान अत्यन्त कान्तिमान् एक सारस्वत मुनि हैं, जो निर्जन वनमें रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं’॥
ततः सर्वे समाजग्मुस्तत्र राजन् महर्षयः ॥ ४५ ॥ सारस्वतं मुनिश्रेष्ठमिदमूचुः समागताः। अस्मानध्यापयस्वेति तानुवाच ततो मुनिः ॥ ४६ ॥ शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवद्द्वि ममेत्युत। राजन्! यह सुनकर वे सब महर्षि वहाँ आये और आकर मुनिश्रेष्ठ सारस्वतसे इस प्रकार बोले—‘मुने! आप हम लोगोंको वेद पढ़ाइये।’ तब सारस्वतने उनसे कहा—‘आपलोग विधिपूर्वक मेरी शिष्यता ग्रहण करें’॥
तत्राब्रुवन् मुनिगणा बालस्त्वमसि पुत्रक ॥ ४७ ॥
स तानाह न मे धर्मो नश्येदिति पुनर्मुनीन् । यो ह्यधर्मेण वै ब्रूयाद् गृह्णीयाद् योऽप्यधर्मतः ॥ ४८ ॥ हीयेतां तावुभौ क्षिप्रं स्यातां वा वैरिणावुभौ । तब वहाँ उन मुनियोंने कहा—'बेटा! तुम तो अभी बालक हो' (हम तुम्हारे शिष्य कैसे हो सकते हैं?) तब सारस्वतने पुनः उन मुनियोंसे कहा—'मेरा धर्म नष्ट न हो, इसलिये मैं आपलोगोंको शिष्य बनाना चाहता हूँ; क्योंकि जो अधर्मपूर्वक वेदोंका प्रवचन करता है तथा जो अधर्मपूर्वक उन वेदमन्त्रोंको ग्रहण करता है, वे दोनों शीघ्र ही हीनावस्थाको प्राप्त होते हैं अथवा दोनों एक-दूसरेके वैरी हो जाते हैं ।। ४७-४८१/२ ।। न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ॥ ४९ ॥ ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् । 'न बहुत वर्षोंकी अवस्था होनेसे, न बाल पकनेसे, न धनसे और न अधिक भाई-बन्धुओंसे कोई बड़ा होता है। ऋषियोंने हमारे लिये यही धर्म निश्चित किया है कि हममेंसे जो वेदोंका प्रवचन कर सके, वही महान् है' ।। एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य मुनयस्ते विधानतः ॥ ५० ॥ तस्माद् वेदाननुप्राप्य पुनर्धर्मं प्रचक्रिरे । सारस्वतकी यह बात सुनकर वे मुनि उनसे विधिपूर्वक वेदोंका उपदेश पाकर पुनः धर्मका अनुष्ठान करने लगे ।। ५०१/२ ।। षष्टिर्मुनिसहस्राणि शिष्यत्वं प्रतिपेदिरे ॥ ५१ ॥ सारस्वतस्य विप्रर्षेर्वेदस्वाध्यायकारणात् । साठ हजार मुनियोंने स्वाध्यायके निमित्त ब्रह्मर्षि सारस्वतकी शिष्यता ग्रहण की थी ।। ५११/२ ।। मुष्टिं मुष्टिं ततः सर्वे दर्भाणां ते ह्युपाहरन् । तस्यासनार्थं विप्रर्षेर्बालस्यापि वशे स्थिताः ॥ ५२ ॥ वे ब्रह्मर्षि यद्यपि बालक थे तो भी वे सभी बड़े-बड़े महर्षि उनकी आज्ञाके अधीन रहकर उनके आसनके लिये एक-एक मुट्ठी कुश ले आया करते थे ।। तत्रापि दत्त्वा वसु रौहिणेयो महाबलः केशवपूर्वजोऽथ । जगाम तीर्थं मुदितः क्रमेण ख्यातं महद् वृद्धकन्या स्म यत्र ॥ ५३ ॥ श्रीकृष्णके बड़े भाई महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजी वहाँ भी स्नान और धन दान करके प्रसन्नतापूर्वक क्रमशः सब तीर्थोंमें विचरते हुए उस विख्यात महातीर्थमें गये, जहाँ कभी वृद्धा कुमारी कन्या निवास करती थी ।। ५३ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवान्के साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवान्के साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
कथं कुमारी भगवंस्तपोयुक्ता ह्यभूत् पुरा ।
किमर्थं च तपस्तेपे को वास्या नियमोऽभवत् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! पूर्वकालमें वह कुमारी तपस्यामें क्यों संलग्न हुई? उसने किसलिये तपस्या की और उसका कौन-सा नियम था? ॥ १ ॥
सुदुष्करमिदं ब्रह्मंस्त्वत्तः श्रुतमनुत्तमम् ।
आख्याहि तत्त्वमखिलं यथा तपसि सा स्थिता ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे यह अत्यन्त उत्तम तथा परम दुष्कर तपकी बात सुनी है। आप सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताइये; वह कन्या क्यों तपस्यामें प्रवृत्त हुई थी? ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
ऋषिरासीन्महावीर्यः कुणिर्गर्गो महायशाः ।
स तप्त्वा विपुलं राजंस्तपो वै तपतां वरः ॥ ३ ॥
मनसाथ सुतां सुभ्रू समुत्पादितवान् विभुः ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! प्राचीन कालमें एक महान् शक्तिशाली और महायशस्वी कुणिर्गर्ग नामक ऋषि रहते थे। तपस्या करनेवालोंमें श्रेष्ठ उन महर्षिने बड़ा भारी तप करके अपने मनसे एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ।।
तां च दृष्ट्वा मुनिः प्रीतः कुणिर्गर्गो महायशाः ॥ ४ ॥
जगाम त्रिदिवं राजन् संत्यज्येह कलेवरम् ।
नरेश्वर! उसे देखकर महायशस्वी मुनि कुणिर्गर्ग बड़े प्रसन्न हुए और कुछ कालके पश्चात् अपना यह शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ४ १/२ ॥
सुभ्रूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा ॥ ५ ॥
महता तपसोग्रेण कृत्वाऽऽश्रममनिन्दिता ।
उपवासैः पूजयन्ती पितॄन् देवांश्च सा पुरा ॥ ६ ॥
तदनन्तर कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी सती साध्वी सुन्दरी कन्या पूर्वकालमें अपने लिये आश्रम बनाकर बड़ी कठोर तपस्या तथा उपवासके साथ-साथ देवताओं और पितरोंका पूजन करती हुई वहाँ रहने लगी ॥ ५-६ ॥
तस्यास्तु तपसोग्रेण महान् कालोऽत्यगान्नृप ।
सा पित्रा दीयमानापि तत्र नैच्छदनिन्दिता ॥ ७ ॥
आत्मनः सदृशं सा तु भर्तारं नान्वपश्यत ।
राजन्! उग्र तपस्या करते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया। पिताने अपने जीवनकालमें उसका किसीके साथ ब्याह कर देनेका प्रयत्न किया; परंतु उस अनिन्द्य सुन्दरीने विवाहकी इच्छा नहीं की। उसे अपने योग्य कोई वर ही नहीं दिखायी देता था ॥ ७ १/२ ॥
ततः सा तपसोग्रेण पीडयित्वाऽऽत्मनस्तनुम् ॥ ८ ॥
पितृदेवार्चनरता बभूव विजने वने ।
तब वह उग्र तपस्याके द्वारा अपने शरीरको पीड़ा देकर निर्जन वनमें पितरों तथा देवताओंके पूजनमें तत्पर हो गयी ॥ ८ १/२ ॥
साऽऽत्मानं मन्यमानापि कृतकृत्यं श्रमान्विता ॥ ९ ॥
वार्धकेन च राजेन्द्र तपसा चैव कर्शिता ।
राजेन्द्र! परिश्रमसे थक जानेपर भी वह अपने-आपको कृतार्थ मानती रही। धीरे-धीरे बुढ़ापा और तपस्याने उसे दुर्बल बना दिया ॥ ९ १/२ ॥
सा नाशकद् यदा गन्तुं पदात् पदमपि स्वयम् ॥ १० ॥
चकार गमने बुद्धिं परलोकाय वै तदा ।
जब वह स्वयं एक पग भी चलनेमें असमर्थ हो गयी, तब उसने परलोकमें जानेका विचार किया ॥ १० १/२ ॥
मोक्तुकामां तु तां दृष्ट्वा शरीरं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥
असंस्कृतायाः कन्यायाः कुतो लोकास्तवानघे ।
एवं तु श्रुतमस्माभिर्देवलोके महाव्रते ॥ १२ ॥
तपः परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वया जिताः ।
उसकी देहत्यागकी इच्छा देख देवर्षि नारदने उससे कहा—'महान् व्रतका पालन करनेवाली निष्पाप नारी! तुम्हारा तो अभी विवाह-संस्कार भी नहीं हुआ, तुम तो अभी कन्या हो। फिर तुम्हें पुण्यलोक कैसे प्राप्त हो सकते हैं? तुम्हारे सम्बन्धमें ऐसी बात मैंने देवलोकमें सुनी है। तुमने तपस्या तो बहुत बड़ी की है; परंतु पुण्य-लोकोंपर अधिकार नहीं प्राप्त किया है' ॥ ११-१२ १/२ ॥
तन्नारदवचः श्रुत्वा साब्रवीदृषिसंसदि ॥ १३ ॥
तपसोऽर्धं प्रयच्छामि पाणिग्राहस्य सत्तम ।
नारदजीकी यह बात सुनकर वह ऋषियोंकी सभामें उपस्थित होकर बोली—'साधुशिरोमणे! आपमें-से जो कोई मेरा पाणिग्रहण करेगा, उसे मैं अपनी तपस्याका आधा भाग दे दूँगी' ॥ १३ १/२ ॥
इत्युक्ते चास्या जग्राह पाणिं गालवसम्भवः ।। १४ ।। ऋषिः प्राक् शृङ्गवान्नाम समयं चेममब्रवीत् । समयेन तवाद्याहं पाणिं स्प्रक्ष्यामि शोभने ।। १५ ।। यद्येकरात्रं वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह । उसके ऐसा कहनेपर सबसे पहले गालवके पुत्र शृंगवान् ऋषिने उसका पाणिग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की और सबसे पहले उसके सामने यह शर्त रखी—'शोभने! मैं एक शर्तके साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाहके बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ' ।। १४-१५ १/२ ।। तथेति सा प्रतिश्रुत्य तस्मै पाणिं ददौ तदा ।। १६ ।। यथादृष्टेन विधिना हुत्वा चाग्निं विधानतः । चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालविः ।। १७ ।। तब 'बहुत अच्छा' कहकर उसने मुनिके हाथमें अपना हाथ दे दिया। फिर गालवपुत्रने शास्त्रोक्त रीतिसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार किया ।। १६-१७ ।। सा रात्रावभवद् राजंस्तरुणी वरवर्णिनी । दिव्याभरणवस्त्रा च दिव्यगन्धानुलेपना ।। १८ ।। राजन्! रात्रिमें वह दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और दिव्य गन्धयुक्त अंगरागसे अलंकृत परम सुन्दरी तरुणी हो गयी ।। १८ ।। तां दृष्ट्वा गालविः प्रीतो दीपयन्तीमिव श्रिया । उवास च क्षपामेकां प्रभाते साब्रवीच्च तम् ।। १९ ।। उसे अपनी कान्तिसे सब ओर प्रकाश फैलाती देख गालवकुमार बड़े प्रसन्न हुए और उसके साथ एक रात निवास किया। सबेरा होते ही वह मुनिसे बोली— ।। १९ ।। यस्त्वया समयो विप्र कृतो मे तपतां वर । तेनोषितास्मि भद्रं ते स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।। २० ।। 'तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! आपने जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका मंगल हो, कल्याण हो। अब आज्ञा दीजिये, मैं जाती हूँ' ।। २० ।। सा निर्गताब्रवीद् भूयो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः । वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकसः ।। २१ ।। चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत् । यो ब्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः ।। २२ ।। यों कहकर वह वहाँसे चल दी। जाते-जाते उसने फिर कहा—'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षोंतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा' ।। २१-२२ ।।
एवमुक्त्वा ततः साध्वी देहं त्यक्त्वा दिवं गता ।
ऋषिरप्यभवद् दीनस्तस्या रूपं विचिन्तयन् ॥ २३ ॥
ऐसा कहकर वह साध्वी तपस्विनी देह त्यागकर स्वर्गलोकमें चली गयी और मुनि उसके दिव्यरूपका चिन्तन करते हुए बहुत दुःखी हो गये ॥ २३ ॥
समयेन तपोऽर्धं च कृच्छ्रात् प्रतिगृहीतवान् ।
साधयित्वा तदाऽऽत्मानं तस्याः स गतिमन्वियात् ॥ २४ ॥
दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपबलात्कृतः ।
उन्होंने शर्तके अनुसार उसकी तपस्याका आधा भाग बड़े कष्टसे स्वीकार किया। फिर वे भी अपने शरीरका परित्याग करके उसीके पथपर चले गये। भरतश्रेष्ठ! वे उसके रूपपर बलात् आकृष्ट होकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥
एतत्ते वृद्धकन्याया व्याख्यातं चरितं महत् ॥ २५ ॥
तथैव ब्रह्मचर्यं च स्वर्गस्य च गतिः शुभा ।
यह मैंने तुमसे वृद्ध कन्याके महान् चरित्र, ब्रह्मचर्य-पालन तथा स्वर्गलोककी प्राप्तिरूप सद्गतिका वर्णन किया ॥
तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ॥ २६ ॥
तत्रापि दत्त्वा दानानि द्विजातिभ्यः परंतपः ।
शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तदा ॥ २७ ॥
समन्तपञ्चकद्वारात् ततो निष्क्रम्य माधवः ।
पप्रच्छर्षिगणान् रामः कुरुक्षेत्रस्य यत् फलम् ॥ २८ ॥
वहीं रहकर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजीने शल्यके मारे जानेका समाचार सुना था। वहाँ भी मधुवंशी बलरामने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दे समन्तपंचक द्वारसे निकलकर ऋषियोंसे कुरुक्षेत्रके सेवनका फल पूछा ॥ २६—२८ ॥
ते पृष्टा यदुसिंहेन कुरुक्षेत्रफलं विभो ।
समाचख्युर्महात्मानस्तस्मै सर्वं यथातथम् ॥ २९ ॥
प्रभो! उस यदुसिंहके द्वारा कुरुक्षेत्रके फलके विषयमें पूछे जानेपर वहाँ रहनेवाले महात्माओंने उन्हें सब कुछ यथावत् रूपसे बताया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
ऋषियोंद्वारा कुरुक्षेत्रकी सीमा और महिमाका वर्णन
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
ऋषियोंद्वारा कुरुक्षेत्रकी सीमा और महिमाका वर्णन
ऋषय ऊचुः
प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते
सनातनं राम समन्तपञ्चकम् ।
समीजिरे यत्र पुरा दिवौकसो
वरेण सत्रेण महावरप्रदाः ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा— बलरामजी! समन्तपंचक क्षेत्र सनातन तीर्थ है। इसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी कहते हैं। वहाँ प्राचीनकालमें महान् वरदायक देवताओंने बहुत बड़े यज्ञका अनुष्ठान किया था ॥ १ ॥
पुरा च राजर्षिवरेण धीमता
बहूनि वर्षाण्यमितेन तेजसा ।
प्रकृष्टमेतत् कुरुणा महात्मना
ततः कुरुक्षेत्रमितीह पप्रथे ॥ २ ॥
पहले अमित तेजस्वी बुद्धिमान् राजर्षिप्रवर महात्मा कुरुने इस क्षेत्रको बहुत वर्षोंतक जोता था, इसलिये इस जगत्में इसका नाम कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हो गया ॥ २ ॥
राम उवाच
किमर्थं कुरुणा कृष्टं क्षेत्रमेतन्महात्मना ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथ्यमानं तपोधनाः ॥ ३ ॥
बलरामजीने पूछा— तपोधनो! महात्मा कुरुने इस क्षेत्रको किसलिये जोता था? मैं आपलोगोंके मुखसे यह कथा सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
ऋषय ऊचुः
पुरा किल कुरुं राम कर्षन्तं सततोत्थितम् ।
अभ्येत्य शक्रस्त्रिदिवात् पर्यपृच्छत कारणम् ॥ ४ ॥
ऋषि बोले— राम! सुना जाता है कि पूर्वकालमें सदा प्रत्येक शुभ कार्यके लिये उद्यत रहनेवाले कुरु जब इस क्षेत्रको जोत रहे थे, उस समय इन्द्रने स्वर्गसे आकर इसका कारण पूछा ॥ ४ ॥
इन्द्र उवाच
किमिदं वर्तते राजन् प्रयत्नेन परेण च ।
राजर्षे किमभिप्रेतं येनेयं कृष्यते क्षितिः ॥ ५ ॥
**इन्द्रने प्रश्न किया—**राजन्! यह महान् प्रयत्नके साथ क्या हो रहा है? राजर्षे! आप क्या चाहते हैं, जिसके कारण यह भूमि जोत रहे हैं? ॥ ५ ॥
कुरुरुवाच
इह ये पुरुषाः क्षेत्रे मरिष्यन्ति शतक्रतो ।
ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान् ॥ ६ ॥
**कुरुने कहा—**शतक्रतो! जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मरेंगे, वे पुण्यात्माओंके पापरहित लोकोंमें जायँगे ॥ ६ ॥
अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं पुनः ।
राजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुंधराम् ॥ ७ ॥
तब इन्द्र उनका उपहास करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजर्षि कुरु उस कार्यसे उदासीन न होकर वहाँकी भूमि जोतते ही रहे ॥ ७ ॥
आगम्यागम्य चैवैनं भूयोभूयोऽवहस्य च ।
शतक्रतुरनिर्विण्णं पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह ॥ ८ ॥
शतक्रतु इन्द्र अपने कार्यसे विरत न होनेवाले कुरुके पास बारंबार आते और उनसे पूछ-पूछकर प्रत्येक बार उनकी हँसी उड़ाकर स्वर्गलोकमें चले जाते थे ॥ ८ ॥
यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष वसुधां नृपः ।
ततः शक्रोऽब्रवीद् देवान् राजर्षैर्यच्चिकीर्षितम् ॥ ९ ॥
जब राजा कुरु कठोर तपस्यापूर्वक पृथ्वीको जोतते ही रह गये, तब इन्द्रने देवताओंसे राजर्षि कुरुकी वह चेष्टा बतायी ॥ ९ ॥
एतच्छ्रुत्वाब्रुवन् देवाः सहस्राक्षमिदं वचः ।
वरेण च्छन्द्यतां शक्र राजर्षैर्यदि शक्यते ॥ १० ॥
यह सुनकर देवताओंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे कहा—'शक्र! यदि सम्भव हो तो राजर्षि कुरुको वर देकर अपने अनुकूल किया जाय ॥ १० ॥
यदि ह्यत्र प्रमीता वै स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः ।
अस्माननिष्ट्वा क्रतुभिर्भागो नो न भविष्यति ॥ ११ ॥
'यदि यहाँ मरे हुए मानव यज्ञोंद्वारा हमारा पूजन किये बिना ही स्वर्गलोकमें चले जायँगे, तब तो हमलोगोंका भाग सर्वथा नष्ट हो जायगा' ॥ ११ ॥
आगम्य च ततः शक्रस्तदा राजर्षिमब्रवीत् ।
अलं खेदेन भवतः क्रियतां वचनं मम ॥ १२ ॥
मानवा ये निराहारा देहं त्यक्ष्यन्त्यतन्द्रिताः ।
युधि वा निहताः सम्यगपि तिर्यग्गता नृप ॥ १३ ॥
ते स्वर्गभाजो राजेन्द्र भविष्यन्ति महामते ।
तब इन्द्रने वहाँसे आकर राजर्षि कुरुसे कहा—‘नरेश्वर! आप व्यर्थ कष्ट क्यों उठाते हैं? मेरी बात मान लीजिये। महामते! राजेन्द्र! जो मनुष्य और पशु-पक्षी यहाँ निराहार रहकर देह त्याग करेंगे अथवा युद्धमें मारे जायँगे, वे स्वर्गलोकके भागी होंगे’ ॥ १२-१३ १/२ ॥
तथास्त्विति ततो राजा कुरुः शक्रमुवाच ह ॥ १४ ॥
ततस्तमभ्यनुज्ञाप्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
जगाम त्रिदिवं भूयः क्षिप्रं बलनिषूदनः ॥ १५ ॥
तब राजा कुरुने इन्द्रसे कहा—‘देवराज! ऐसा ही हो’ तदनन्तर कुरुसे विदा ले बलसूदन इन्द्र फिर शीघ्र ही प्रसन्नचित्तसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १४-१५ ॥
एवमेतद् यदुश्रेष्ठ कृष्टं राजर्षिणा पुरा ।
शक्रेण चाभ्यनुज्ञातं ब्रह्माद्यैश्च सुरैस्तथा ॥ १६ ॥
यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार प्राचीनकालमें राजर्षि कुरुने इस क्षेत्रको जोता और इन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवताओंने इसे वर देकर अनुगृहीत किया ॥ १६ ॥
नातः परतरं पुण्यं भूमेः स्थानं भविष्यति ।
इह तप्स्यन्ति ये केचित्तपः परमकं नराः ॥ १७ ॥
देहत्यागेन ते सर्वे यास्यन्ति ब्रह्मणः क्षयम् ।
भूतलका कोई भी स्थान इससे बढ़कर पुण्यदायक नहीं होगा। जो मनुष्य यहाँ रहकर बड़ी भारी तपस्या करेंगे, वे सब लोग देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जायँगे ॥
ये पुनः पुण्यभाजो वै दानं दास्यन्ति मानवाः ॥ १८ ॥
तेषां सहस्रगुणितं भविष्यत्यचिरेण वै ।
जो पुण्यात्मा मानव वहाँ दान देंगे, उनका वह दान शीघ्र ही सहस्रगुना हो जायगा ॥ १८ १/२ ॥
ये चेह नित्यं मनुजा निवत्स्यन्ति शुभैषिणः ॥ १९ ॥
यमस्य विषयं ते तु न द्रक्ष्यन्ति कदाचन ।
जो मानव शुभकी इच्छा रखकर यहाँ नित्य निवास करेंगे, उन्हें कभी यमका राज्य नहीं देखना पड़ेगा ॥ १९ १/२ ॥
यक्ष्यन्ति ये च क्रतुभिर्महद्भिर्मनुजेश्वराः ॥ २० ॥
तेषां त्रिविष्टपे वासो यावद्भूमिर्धरिष्यति ।
जो नरेश्वर यहाँ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, वे जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करेंगे ॥ २० १/२ ॥
अपि चात्र स्वयं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः ॥ २१ ॥
कुरुक्षेत्रनिबद्धां वै तां शृणुष्व हलायुध ।
हलायुध! स्वयं देवराज इन्द्रने कुरुक्षेत्रके सम्बन्धमें यहाँ जो गाथा गायी है, उसे आप सुनिये ॥ २१ १/२ ॥ पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः । अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥ २२ ॥ ‘कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूलियाँ भी यदि ऊपर पड़ जायँ तो वे पापी मनुष्यको भी परमपदकी प्राप्ति कराती हैं ॥ २२ ॥ सुरर्षभा ब्राह्मणसत्तमाश्च तथा नृगाद्या नरदेवमुख्याः । इष्ट्वा महाहैः क्रतुभिर्नृसिंहाः संत्यज्य देहान् सुगतिं प्रपन्नाः ॥ २३ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ! यहाँ ब्राह्मणशिरोमणि तथा नृप आदि मुख्य-मुख्य पुरुषसिंह नरेश महान् यज्ञोंका अनुष्ठान करके देहत्यागके पश्चात् उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते ॥ २४ ॥ ‘तरन्तुक, अरन्तुक, रामह्रद (परशुराम कुण्ड) तथा मचक्रुक—इनके बीचका जो भूभाग है, यही समन्तपंचक एवं कुरुक्षेत्र है। इसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी कहते हैं ॥ २४ ॥ शिवं महापुण्यमिदं दिवौकसां सुसम्मतं सर्वगुणैः समन्वितम् । अतश्च सर्वे निहता नृपा रणे यास्यन्ति पुण्यां गतिमक्षयां सदा ॥ २५ ॥ ‘यह महान् पुण्यप्रद, कल्याणकारी, देवताओंका प्रिय एवं सर्वगुणसम्पन्न तीर्थ है। अतः यहाँ रणभूमिमें मारे गये सम्पूर्ण नरेश सदा पुण्यमयी अक्षय गति प्राप्त करेंगे’ ॥ इत्युवाच स्वयं शक्रः सह ब्रह्मादिभिस्तदा । तच्चानुमोदितं सर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ २६ ॥ ब्रह्मा आदि देवताओंसहित साक्षात् इन्द्रने ऐसी बातें कही थीं तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीने इन सारी बातोंका अनुमोदन किया था ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुरुक्षेत्रकथने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुरुक्षेत्रकी महिमाका वर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा
हुआ ।। ५३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2875)
चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना
वैशम्पायन उवाच
कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा दायांश्च सात्वतः ।
आश्रमं सुमहद् दिव्यमगमज्जनमेजय ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सात्वतवंशी बलरामजी कुरुक्षेत्रका दर्शन कर वहाँ बहुत-सा धन दान करके उस स्थानसे एक महान् एवं दिव्य आश्रममें गये ॥ १ ॥
मधूकाम्रवणोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसंकुलम् ।
चिरबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसंकुलम् ॥ २ ॥
तं दृष्ट्वा यादवश्रेष्ठः प्रवरं पुण्यलक्षणम् ।
पप्रच्छ तानृषीन् सर्वान् कस्याश्रमवरस्त्वयम् ॥ ३ ॥
महुआ और आमके वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। पाकड़ और बरगदके वृक्ष वहाँ अपनी छाया फैला रहे थे। चिलबिल, कटहल और अर्जुन (समूह)-के पेड़ चारों ओर भरे हुए थे। पुण्यदायक लक्षणोंसे युक्त उस पुण्यमय श्रेष्ठ आश्रमका दर्शन करके यादवश्रेष्ठ बलरामजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा कि 'यह सुन्दर आश्रम किसका है?' ॥ २-३ ॥
ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन् हलायुधम् ।
शृणु विस्तरशो राम यस्यायं पूर्वमाश्रमः ॥ ४ ॥
राजन्! तब वे सभी ऋषि महात्मा हलधरसे बोले—'बलरामजी! पहले यह आश्रम जिसके अधिकारमें था, उसकी कथा विस्तारपूर्वक सुनिये— ॥ ४ ॥
अत्र विष्णुः पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम् ।
अत्रास्य विधिवद् यज्ञाः सर्वे वृत्ताः सनातनाः ॥ ५ ॥
'प्राचीनकालमें यहाँ भगवान् विष्णुने उत्तम तपस्या की है, यहीं उनके सभी सनातन यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥
अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमारब्रह्मचारिणी ।
योगयुक्ता दिवं याता तपःसिद्धा तपस्विनी ॥ ६ ॥
'यहीं कुमारावस्थासे ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाली एक सिद्ध ब्राह्मणी रहती थी, जो तपःसिद्ध तपस्विनी थी। वह योगयुक्त होकर स्वर्गलोकमें चली गयी ॥ ६ ॥
बभूव श्रीमती राजन् शाण्डिल्यस्य महात्मनः । सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ॥ ७ ॥ ‘राजन्! नियमपूर्वक व्रतधारण और ब्रह्मचर्यपालन करनेवाली वह तेजस्विनी साध्वी महात्मा शाण्डिल्यकी सुपुत्री थी’ ॥ ७ ॥ सा तु तप्त्वा तपो घोरं दुष्करं स्त्रीजनेन ह । गता स्वर्गं महाभागा देवब्राह्मणपूजिता ॥ ८ ॥ ‘स्त्रियोंके लिये जो अत्यन्त दुष्कर था, ऐसा घोर तप करके देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हुई वह महान् सौभाग्यशालिनी देवी स्वर्गलोकको चली गयी थी’ ॥ ८ ॥ श्रुत्वा ऋषीणां वचनमाश्रमं तं जगाम ह । ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः ॥ ९ ॥ संध्याकार्याणि सर्वाणि निर्वर्त्यारुरुहेऽचलम् । ऋषियोंका वचन सुनकर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले बलरामजी उस आश्रममें गये। वहाँ हिमालयके पार्श्वभागमें उन ऋषियोंको प्रणाम करके संध्या-वन्दन आदि सब कार्य करनेके अनन्तर वे हिमालयपर चढ़ने लगे ॥ ९½ ॥ नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली ॥ १० ॥ पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः । प्रभावं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं बलः ॥ ११ ॥ जिनकी ध्वजापर तालका चिह्न सुशोभित होता है, वे बलरामजी उस पर्वतपर थोड़ी ही दूर गये थे कि उनकी दृष्टि एक पुण्यमय उत्तम तीर्थपर पड़ी। वह सरस्वतीकी उत्पत्तिका स्थान प्लक्षप्रस्रवण नामक तीर्थ था। उसका दर्शन करके बलरामजीको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १०-११ ॥ सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् । हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥ १२ ॥ आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ । संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥ १३ ॥ तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह । मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥ १४ ॥ फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये। महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये ॥ १२—१४ ॥ इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक् प्रीतिमाप्नुवन् । तं देशं कारपवनाद् यमुनायां जगाम ह ॥ १५ ॥
स्नात्वा तत्र च धर्मात्मा परां प्रीतिमवाप्य च ।
ऋषिभिश्चैव सिद्धैश्च सहितो वै महाबलः ॥ १६ ॥
उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः ।
जहाँ पूर्वकालमें इन्द्र, अग्नि और अर्यमाने बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की थी, वह स्थान यमुनाके तटपर है। कारपवनसे उस तीर्थमें जाकर महाबली धर्मात्मा बलरामने स्नान करके बड़ा हर्ष प्राप्त किया। फिर वे यदुपुंगव बलभद्र ऋषियों और सिद्धोंके साथ बैठकर उत्तम कथाएँ सुनने लगे ॥ १५-१६ ½ ॥
तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषिः ॥ १७ ॥
आजगामाथ तं देशं यत्र रामो व्यवस्थितः ।
इस प्रकार वे लोग वहीं ठहरे हुए थे, तबतक देवर्षि भगवान् नारद भी उनके पास उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ बलरामजी विराजमान थे ॥ १७ ½ ॥
जटामण्डलसंवीतः स्वर्णचीरो महातपाः ॥ १८ ॥
हेमदण्डधरो राजन् कमण्डलुधरस्तथा ।
कच्छपीं सुखशब्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् ॥ १९ ॥
राजन्! महातपस्वी नारद जटामण्डलसे मण्डित हो सुनहरा चीर धारण किये हुए थे। उन्होंने कमण्डलु, सोनेका दण्ड तथा सुखदायक शब्द करनेवाली कच्छपी नामक मनोरम वीणा भी ले रखी थी ॥ १८-१९ ॥
नृत्ये गीते च कुशलो देवब्राह्मणपूजितः ।
प्रकर्ता कलहानां च नित्यं च कलहप्रियः ॥ २० ॥
वे नृत्य-गीतमें कुशल, देवताओं तथा ब्राह्मणोंसे सम्मानित, कलह करानेवाले तथा सदैव कलहके प्रेमी हैं ॥ २० ॥
तं देशमगमद् यत्र श्रीमान् रामो व्यवस्थितः ।
प्रत्युत्थाय च तं सम्यक् पूजयित्वा यतव्रतम् ॥ २१ ॥
देवर्षिं पर्यपृच्छत् स यथा वृत्तं कुरून् प्रति ।
वे उस स्थानपर गये, जहाँ तेजस्वी बलराम बैठे हुए थे। उन्होंने उठकर नियम और व्रतका पालन करनेवाले देवर्षिका भलीभाँति पूजन करके उनसे कौरवोंका समाचार पूछा ॥ २१ ½ ॥
ततोऽस्याकथयद् राजन् नारदः सर्वधर्मवित् ॥ २२ ॥
सर्वमेतद् यथावृत्तमतीव कुरुसंक्षयम् ।
राजन्! तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता नारदजीने उनसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता दिया कि कुरुकुलका अत्यन्त संहार हो गया है ॥ २२ ½ ॥
ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥ २३ ॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।