महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तथैव तव पुत्रस्य रथोदाराः प्रहारिणः ॥ १५ ॥ महत्या सेनया राजन् जग्मुर्द्रोणरथं प्रति । राजन्! इसी प्रकार प्रहार करनेमें कुशल आपके पुत्रके श्रेष्ठ रथी भी विशाल सेनाके साथ द्रोणाचार्यके रथके समीप जा पहुँचे ॥ १५ १/२ ॥
ततः सा भारती सेना हन्यमाना किरीटिना ॥ १६ ॥ तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत । उस समय किरीटधारी अर्जुनके द्वारा मारी जाती हुई कौरवी-सेना अन्धकार और निद्रा दोनोंसे पीड़ित हो पुनः भागने लगी ॥ १६ १/२ ॥
द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च ॥ १७ ॥ नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा । महाराज! द्रोणाचार्यने तथा स्वयं आपके पुत्रने भी उन्हें बहुतेरा रोका, तथापि उस समय आपके सैनिक रोके न जा सके ॥ १७ १/२ ॥
सा पाण्डुपुत्रस्य शरैर्दीर्यमाणा महाचमूः ॥ १८ ॥ तमसा संवृते लोके व्यद्रवत् सर्वतोमुखी ।
पाण्डुपुत्र अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण होती हुई वह विशाल सेना उस तिमिराच्छन्न जगत्में सब ओर भागने लगी ॥ १८ १/२ ॥
उत्सृज्य शतशो वाहांस्तत्र केचिन्नराधिपाः ।
प्राद्रवन्त महाराज भयाविष्टाः समन्ततः ॥ १९ ॥
महाराज! कुछ नरेश, जो सैकड़ोंकी संख्यामें थे, अपने वाहनोंको वहीं छोड़कर भयसे व्याकुल हो सब ओर भाग गये ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे
एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर संकुलयुद्धविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥
१६२-
द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिद्वारा सोमदत्तका वध, द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्ध तथा भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यसे दूर रहनेका आदेश
संजय उवाच
सोमदत्तं तु सम्प्रेक्ष्य विधुन्वानं महत् धनुः ।
सात्यकिः प्राह यन्तारं सोमदत्ताय मां वह ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! सोमदत्तको अपना विशाल धनुष हिलाते देख सात्यकिने अपने सारथिसे कहा—'मुझे सोमदत्तके पास ले चलो ॥ १ ॥
न ह्यहत्वा रणे शत्रुं सोमदत्तं महाबलम् ।
निवर्तिष्ये रणात् सूत सत्यमेतद् वचो मम ॥ २ ॥
'सूत! आज मैं रणभूमिमें अपने महाबली शत्रु सोमदत्तका वध किये बिना वहाँसे पीछे नहीं लौटूँगा। मेरी यह बात सत्य है' ॥ २ ॥
ततः सम्प्रैषयद् यन्ता सैन्धवांस्तान् मनोजवान् ।
तुरङ्गमाञ्छङ्खवर्णान् सर्वशब्दातिगान् रणे ॥ ३ ॥
तब सारथिने शंखके समान श्वेतवर्णवाले तथा सम्पूर्ण शब्दोंका अतिक्रमण करनेवाले मनके समान वेगशाली सिंधी घोड़ोंको रणभूमिमें आगे बढ़ाया ॥ ३ ॥
तेऽवहन् युयुधानं तु मनोमारुतरंहसः ।
यथेन्द्रं हरयो राजन् पुरा दैत्यवधोद्यतम् ॥ ४ ॥
राजन्! मन और वायुके समान वेगशाली वे घोड़े युयुधानको उसी प्रकार ले जाने लगे, जैसे पूर्वकालमें दैत्य-वधके लिये उद्यत देवराज इन्द्रको उनके घोड़े ले गये थे ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य सात्वतं रभसं रणे ।
सोमदत्तो महाबाहुरसम्भ्रान्तो न्यवर्तत ॥ ५ ॥
वेगशाली सात्यकिको रणभूमिमें अपनी ओर आते देख महाबाहु सोमदत्त बिना किसी घबराहटके उनकी ओर लौट पड़े ॥ ५ ॥
विमुञ्चञ्छरवर्षाणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् ।
छादयामास शैनेयं जलदो भास्करं यथा ॥ ६ ॥
वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हुए सोमदत्तने, जैसे बादल सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार शिनिपौत्र सात्यकिको आच्छादित कर दिया ॥
असम्भ्रान्तश्च समरे सात्यकिः कुरुपुङ्गवम् ।
छादयामास बाणौघैः समन्ताद् भरतर्षभ ॥ ७ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समरांगणमें सम्भ्रमरहित सात्यकिने भी अपने बाणसमूहोंद्वारा सब ओरसे कुरुप्रवर सोमदत्तको आच्छादित कर दिया ॥ ७ ॥
सोमदत्तस्तु तं षष्ट्या विव्याधोरसि माधवम् । सात्यकिञ्चापि तं राजन्नविध्यत् सायकैः शितैः ॥ ८ ॥ राजन्! फिर सोमदत्तने सात्यकिकी छातीमें साठ बाण मारे और सात्यकिने भी उन्हें तीखे बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८ ॥
तावन्योन्यं शरैः कृत्तौ व्यराजेतां नरर्षभौ । सुपुष्पौ पुष्पसमये पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ९ ॥ वे दोनों नरश्रेष्ठ एक-दूसरेके बाणोंसे घायल होकर वसन्त-ऋतुमें सुन्दर पुष्पवाले दो विकसित पलाशवृक्षोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ९ ॥
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ कुरुवृष्णियशस्करौ । परस्परमवेक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ॥ १० ॥ कुरुकुल और वृष्णिवंशके यश बढ़ानेवाले उन दोनों वीरोंके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे। वे नेत्रोंद्वारा एक-दूसरेको जलाते हुए-से देख रहे थे ॥ १० ॥
रथमण्डलमार्गेषु चरन्तावरिमर्दनौ । घोररूपौ हि तावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥ ११ ॥ रथ मण्डलके मार्गोंपर विचरते हुए वे दोनों शत्रुमर्दन वीर वर्षा करनेवाले दो बादलोंके समान भयंकर रूप धारण किये हुए थे ॥ ११ ॥
शरसम्भिन्नगात्रौ तु सर्वतः शकलीकृतौ । श्वाविधाविव राजेन्द्र दृश्येतां शरविक्षतौ ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! उनके शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर सब ओरसे खण्डित-से हो बाणविद्ध हिंसक पशुओंके समान दिखायी दे रहे थे ॥ १२ ॥
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिराचितौ तौ व्यराजताम् । खद्योतैरावृतौ राजन् प्रावृषीव वनस्पती ॥ १३ ॥ राजन्! सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे व्याप्त होकर वे दोनों योद्धा वर्षाकालमें जुगनुओंसे व्याप्त हुए दो वृक्षोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १३ ॥
सम्प्रदीपितसर्वाङ्गौ सायकैस्तैर्महारथौ । अदृश्येतां रणे क्रुद्धावुल्काभिरिव कुञ्जरौ ॥ १४ ॥ उन दोनों महारथियोंके सारे अंग उन बाणोंसे उद्भासित हो रहे थे; इसीलिये वे दोनों, रणक्षेत्रमें उल्काओंसे प्रकाशित एवं क्रोधमें भरे हुए दो हाथियोंके समान दिखायी देते थे ॥ १४ ॥
ततो युधि महाराज सोमदत्तो महारथः ।
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद माधवस्य महत् धनुः ॥ १५ ॥
महाराज! तदनन्तर युद्धस्थलमें महारथी सोमदत्तने अर्धचन्द्राकार बाणसे सात्यकिके विशाल धनुषको काट दिया ॥ १५ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या सायकानां समर्पयत् ।
त्वरमाणस्त्वराकाले पुनश्च दशभिः शरैः ॥ १६ ॥
और तत्काल ही उनपर पचीस बाणोंका प्रहार किया। शीघ्रताके अवसरपर शीघ्रता करनेवाले सोमदत्तने सात्यकिको पुनः दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १६ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सात्यकिर्वेगवत्तरम् ।
पञ्चभिः सायकैस्तूर्णं सोमदत्तमविध्यत ॥ १७ ॥
तदनन्तर सात्यकिने अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष हाथमें लेकर तुरंत ही पाँच बाणोंसे सोमदत्तको बींध डाला ॥ १७ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ।
बाह्लीकस्य रणे राजन् सात्यकिः प्रहसन्निव ॥ १८ ॥
राजन्! फिर सात्यकिने हँसते हुए-से रणभूमिमें एक दूसरे भल्लके द्वारा बाह्लीकपुत्र सोमदत्तके सुवर्णमय ध्वजको काट दिया ॥ १८ ॥
सोमदत्तस्त्वसम्भ्रान्तो दृष्ट्वा केतुं निपातितम् ।
शैनेयं पञ्चविंशत्या सायकानां समाचिनोत् ॥ १९ ॥
ध्वजको गिराया हुआ देख सम्भ्रमरहित सोमदत्तने सात्यकिके शरीरमें पचीस बाण चुन दिये ॥ १९ ॥
सात्वतोऽपि रणे क्रुद्धः सोमदत्तस्य धन्विनः ।
धनुश्चिच्छेद भल्लेन क्षुरप्रेण शितेन ह ॥ २० ॥
तब रणक्षेत्रमें कुपित हुए सात्यकिने भी तीखे क्षुरप्र नामक भल्लसे धनुर्धर सोमदत्तके धनुषको काट दिया ॥
अथैनं रुक्मपुङ्खानां शतेन नतपर्वणाम् ।
आचिनोद् बहुधा राजन् भग्नदंष्ट्रमिव द्विपम् ॥ २१ ॥
राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने झुकी हुई गाँठ और सुवर्णमय पंखवाले सौ बाणोंसे टूटे दाँतवाले हाथीके समान सोमदत्तके शरीरको अनेक बार बींध दिया ॥ २१ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सोमदत्तो महारथः ।
सात्यकिं छादयामास शरवृष्ट्या महाबलः ॥ २२ ॥
इसके बाद महारथी महाबली सोमदत्तने दूसरा धनुष लेकर सात्यकिको बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥
सोमदत्तं तु संक्रुद्धो रणे विव्याध सात्यकिः ।
सात्यकिं शरजालेन सोमदत्तोऽप्यपीडयत् ॥ २३ ॥
उस युद्धमें क्रुद्ध हुए सात्यकिने सोमदत्तको गहरी चोट पहुँचायी और सोमदत्तने भी अपने बाणसमूहद्वारा सात्यकिको पीड़ित कर दिया ।। २३ ।। दशभिः सात्वतस्यार्थे भीमोऽहन् बाह्लिकात्मजम् । सोमदत्तोऽप्यसम्भ्रान्तो भीममार्च्छच्छितैः शरैः ।। २४ ।। उस समय भीमसेनने सात्यकिकी सहायताके लिये सोमदत्तको दस बाण मारे। इससे सोमदत्तको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने भी तीखे बाणोंसे भीमसेनको पीड़ित कर दिया ।। २४ ।। ततस्तु सात्वतस्यार्थे भीमसेनो नवं दृढ़म् । मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य वक्षसि ।। २५ ।। तत्पश्चात् सात्यकिकी ओरसे भीमसेनने सोमदत्तकी छातीको लक्ष्य करके एक नूतन सुदृढ़ एवं भयंकर परिघ छोड़ा ।। २५ ।। तमापतन्तं वेगेन परिघं घोरदर्शनम् । द्विधा चिच्छेद समरे प्रहसन्निव कौरवः ।। २६ ।। समरांगणमें बड़े वेगसे आते हुए उस भयंकर परिघके कुरुवंशी सोमदत्तने हँसते हुए-से दो टुकड़े कर डाले ।। २६ ।। स पपात द्विधा छिन्न आयसः परिघो महान् । महीधरस्येव महच्छिखरं वज्रदारितम् ।। २७ ।। लोहेका वह महान् परिघ दो खण्डोंमें विभक्त होकर वज्रसे विदीर्ण किये गये महान् पर्वतशिखरके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। २७ ।। ततस्तु सात्यकी राजन् सोमदत्तस्य संयुगे । धनुश्चिच्छेद भल्लेन हस्तावापं च पञ्चभिः ।। २८ ।। राजन्! तदनन्तर संग्रामभूमिमें सात्यकिने एक भल्लसे सोमदत्तका धनुष काट दिया और पाँच बाणोंसे उनके दस्ताने नष्ट कर दिये ।। २८ ।। ततश्चतुर्भिश्च शरैस्तूर्णं तांस्तुरगोत्तमान् । समीपं प्रेषयामास प्रेतराजस्य भारत ।। २९ ।। भारत! फिर तत्काल ही चार बाणोंसे उन्होंने सोमदत्तके उन उत्तम घोड़ोंको प्रेतराज यमके समीप भेज दिया ।। २९ ।। सारथेश्च शिरः कायाद् भल्लेन नतपर्वणा । जहार नरशार्दूलः प्रहसञ्छिनिपुङ्गवः ।। ३० ।। इसके बाद पुरुषसिंह शिनिप्रवर सात्यकिने हँसते हुए झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे सोमदत्तके सारथिका सिर धड़से अलग कर दिया ।। ३० ।। ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । मुमोच सात्वतो राजन् स्वर्णपुङ्खं शिलाशितम् ।। ३१ ।।
राजन्! तत्पश्चात् सात्वतवंशी सात्यकिने प्रज्वलित पावकके समान एक महाभयंकर, सुवर्णमय पंखवाला और शिलापर तेज किया हुआ बाण सोमदत्तपर छोड़ा ।। ३१ ।।
स विमुक्तो बलवता शैनेयेन शरोत्तमः ।
घोरस्तस्योरसि विभो निपपाताशु भारत ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! प्रभो! शिनिवंशी बलवान् सात्यकिके द्वारा छोड़ा हुआ वह श्रेष्ठ एवं भयंकर बाण शीघ्र ही सोमदत्तकी छातीपर जा पड़ा ॥ ३२ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज सात्वतेन महारथः ।
सोमदत्तो महाबाहुर्निपपात ममार च ॥ ३३ ॥
महाराज! सात्यकिके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर महारथी महाबाहु सोमदत्त पृथ्वीपर गिरे और मर गये ॥ ३३ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं तत्र सोमदत्तं महारथाः ।
महता शरवर्षेण युयुधानमुपाद्रवन् ॥ ३४ ॥
सोमदत्तको मारा गया देख आपके बहुसंख्यक महारथी बाणोंकी भारी वृष्टि करते हुए वहाँ सात्यकिपर टूट पड़े ॥ ३४ ॥
छाद्यमानं शरैर्दृष्ट्वा युयुधानं युधिष्ठिरः ।
पाण्डवाश्च महाराज सह सर्वैः प्रभद्रकैः ।
महत्या सेनया सार्धं द्रोणानीकमुपाद्रवन् ॥ ३५ ॥
महाराज! उस समय सात्यकिको बाणोंद्वारा आच्छादित होते देख युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डवोंने समस्त प्रभद्रकोंसहित विशाल सेनाके साथ द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा किया ॥ ३५ ॥
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धस्तावकानां महाबलम् ।
शरैर्विद्रावयामास भारद्वाजस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने अपने बाणोंकी मारसे आपकी विशाल वाहिनीको द्रोणाचार्यके देखते-देखते खदेड़ना आरम्भ किया ॥ ३६ ॥
सैन्यानि द्रावयन्तं तु द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् ।
अभिदुद्राव वेगेन क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ३७ ॥
द्रोणाचार्यने देखा कि युधिष्ठिर मेरे सैनिकोंको खदेड़ रहे हैं, तब वे क्रोधसे लाल आँखें करके बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥ ३७ ॥
ततः सुनिशितैर्बाणैः पार्थं विव्याध सप्तभिः ।
युधिष्ठिरोऽपि संक्रुद्धः प्रतिविव्याध पञ्चभिः ॥ ३८ ॥
फिर उन्होंने सात तीखे बाणोंसे कुन्तीकुमार युधिष्ठिरको घायल कर दिया। अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए युधिष्ठिरने भी उन्हें पाँच बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥
सोऽतिविद्धो महाबाहुः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
युधिष्ठिरस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च ॥ ३९ ॥
स च्छिन्नधन्वा त्वरितस्त्वराकाले नृपोत्तमः ।
अन्यदादत्त वेगेन कार्मुकं समरे दृढम् ॥ ४० ॥
तब अत्यन्त घायल हुए महाबाहु द्रोणाचार्य अपने दोनों गलफर चाटने लगे। उन्होंने युधिष्ठिरके ध्वज और धनुषको भी काट दिया। शीघ्रताके समय शीघ्रता करनेवाले नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरने समरांगणमें धनुष कट जानेपर दूसरे सुदृढ़ धनुषको वेगपूर्वक हाथमें ले लिया ॥ ३९-४० ॥
ततः शरसहस्रेण द्रोणं विव्याध पार्थिवः ।
साश्वसूतध्वजरथं तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४१ ॥
फिर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके राजाने घोड़े, सारथि, रथ और ध्वजसहित द्रोणाचार्यको बींध डाला। वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ ४१ ॥
ततो मुहूर्तं व्यथितः शरपातप्रपीडितः ।
निषसाद रथोपस्थे द्रोणो भरतसत्तम ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन बाणोंके आघातसे अत्यन्त पीड़ित एवं व्यथित होकर द्रोणाचार्य दो घड़ीतक रथके पिछले भागमें बैठे रहे ॥ ४२ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां मुहूर्ताद् द्विजसत्तमः ।
क्रोधेन महताऽऽविष्टो वायव्यास्त्रमवासृजत् ॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् सचेत होनेपर द्विजश्रेष्ठ द्रोणने महान् क्रोधमें भरकर वायव्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४३ ॥
असम्भ्रान्तस्ततः पार्थो धनुराकृष्य वीर्यवान् ।
ततस्तदस्त्रमस्त्रेण स्तम्भयामास भारत ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर पराक्रमी युधिष्ठिरने सम्भ्रमरहित हो धनुष खींचकर उनके उस अस्त्रको अपने दिव्यास्त्र-द्वारा कुण्ठित कर दिया ॥ ४४ ॥
चिच्छेद च धनुर्दीर्घं ब्राह्मणस्य च पाण्डवः ।
ततोऽन्यद् धनुरादत्त द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ॥ ४५ ॥
तदप्यस्य शितैर्भल्लैश्चिच्छेद कुरुपुङ्गवः ।
इतना ही नहीं, उन पाण्डुकुमारने विप्रवर द्रोणाचार्यके विशाल धनुषको भी काट दिया। फिर क्षत्रियोंका मान-मर्दन करनेवाले द्रोणाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लिया। परंतु कुरुप्रवर युधिष्ठिरने अपने तीखे भल्लोंसे उसको भी काट दिया ॥ ४५ १/२ ॥
ततोऽब्रवीद् वासुदेवः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो यत्त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।
उपारमस्व युद्धे त्वं द्रोणाद् भरतसत्तम ॥ ४७ ॥
तदनन्तर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे कहा—'महाबाहु युधिष्ठिर! मैं तुमसे जो कह रहा हूँ, उसे सुनो। भरतश्रेष्ठ! तुम युद्धमें द्रोणाचार्यसे अलग रहो॥ ४६-४७ ॥ यतते हि सदा द्रोणो ग्रहणे तव संयुगे । नानुरूपमहं मन्ये युद्धमस्य त्वया सह ॥ ४८ ॥ 'क्योंकि द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें सदा तुम्हें कैद करनेके प्रयत्नमें रहते हैं; अतः तुम्हारे साथ इनका युद्ध होना मैं उचित नहीं मानता ॥ ४८ ॥ योऽस्य सृष्टो विनाशाय स एवैनं हनिष्यति । परिवर्ज्य गुरुं याहि यत्र राजा सुयोधनः ॥ ४९ ॥ 'जो इनके विनाशके लिये उत्पन्न हुआ है, वही इन्हें मारेगा। तुम अपने गुरुदेवको छोड़कर जहाँ राजा दुर्योधन हैं, वहाँ जाओ ॥ ४९ ॥ राजा राज्ञा हि योद्धव्यो नाराज्ञा युद्धमिष्यते । तत्र त्वं गच्छ कौन्तेय हस्त्यश्वरथसंवृतः ॥ ५० ॥ 'क्योंकि राजाको राजाके ही साथ युद्ध करना चाहिये। जो राजा नहीं है, उसके साथ उसका युद्ध अभीष्ट नहीं है। अतः कुन्तीनन्दन! तुम हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनासे घिरे रहकर वहीं जाओ ॥ ५० ॥ यावन्मात्रेण च मया सहायेन धनंजयः । भीमश्च रथशार्दूलो युध्यते कौरवैः सह ॥ ५१ ॥ 'तबतक मेरे साथ रहकर अर्जुन तथा रथियोंमें सिंहके समान पराक्रमी भीमसेन कौरवोंके साथ युद्ध करते हैं'॥ वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु ततो दारुणमाहवम् ॥ ५२ ॥ प्रायाद् द्रुतममित्रघ्नो यत्र भीमो व्यवस्थितः । विनिघ्नंस्तावकान् योधन् व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ५३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक उस दारुण युद्धके विषयमें सोचा। फिर वे तुरंत वहाँ चले गये, जहाँ शत्रुओंका संहार करनेवाले भीमसेन आपके योद्धाओंका वध करते हुए मुँह फैलाये यमराजके समान खड़े थे ॥ ५२-५३ ॥ रथघोषेण महता नादयन् वसुधातलम् । पर्जन्य इव घर्मान्ते नादयन् वै दिशो दश ॥ ५४ ॥ भीमस्य निघ्नतः शत्रून् पार्ष्णिं जग्राह पाण्डवः । द्रोणोऽपि पाण्डुपञ्चालान् व्यधमद् रजनीमुखे ॥ ५५ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर अपने रथकी भारी घर्घर्राहटसे भूतलको उसी प्रकार प्रतिध्वनित कर रहे थे, जैसे वर्षाकालमें गर्जना करता हुआ मेघ दसों दिशाओंको गुँजा देता है। उन्होंने शत्रुओंका संहार करनेवाले भीमसेनके पार्श्वभागकी रक्षाका भार ले लिया। उधर द्रोणाचार्य भी रात्रिके समय पाण्डव तथा पांचाल सैनिकोंका संहार करने लगे ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६२ ।।
१६३-
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंमें प्रदीपों (मशालों)-का प्रकाश
संजय उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भयावहे ।
तमसा संवृते लोके रजसा च महीपते ॥ १ ॥
नापश्यन्त रणे योधाः परस्परमवस्थिताः ।
अनुमानेन संज्ञाभिर्युद्धं तद् ववृधे महत् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जिस समय वह भयंकर घोर युद्ध चल रहा था, उस समय सम्पूर्ण जगत् अन्धकार और धूलसे आच्छादित था; इसीलिये रणभूमिमें खड़े हुए योद्धा एक-दूसरेको देख नहीं पाते थे। वह महान् युद्ध अनुमानसे तथा नाम या संकेतोंद्वारा चलता हुआ उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा था ॥ १-२ ॥
नरनागाश्वमथनं परमं लोमहर्षणम् ।
द्रोणकर्णकृपा वीरा भीमपार्षतसात्यकाः ॥ ३ ॥
अन्योन्यं क्षोभयामासुः सैन्यानि नृपसत्तम ।
उस समय अत्यन्त रोमांचकारी युद्ध हो रहा था। उसमें मनुष्य, हाथी और घोड़े मथे जा रहे थे। एक ओरसे द्रोण, कर्ण और कृपाचार्य ये तीन वीर युद्ध करते थे तथा दूसरी ओरसे भीमसेन, धृष्टद्युम्न एवं सात्यकि सामना कर रहे थे। नृपश्रेष्ठ! ये एक-दूसरेकी सेनाओंमें हलचल मचाये हुए थे ॥ ३ ½ ॥
वध्यमानानि सैन्यानि समन्तात् तैर्महारथैः ॥ ४ ॥
तमसा संवृते चैव समन्ताद् विप्रदुद्रुवुः ।
उन महारथियोंद्वारा उस अन्धकाराच्छन्न प्रदेशमें सब ओरसे मारी जाती हुई सेनाएँ चारों ओर भागने लगीं ॥ ४ ½ ॥
ते सर्वतो विद्रवन्तो योधा विध्वस्तचेतनाः ॥ ५ ॥
अहन्यन्त महाराज धावमानाश्च संयुगे ।
महाराज! वे योद्धा अचेत होकर सब ओर भागते थे और भागते हुए ही उस युद्धस्थलमें मारे जाते थे ॥ ५ ½ ॥
महारथसहस्राणि जघ्नुरन्योन्यमाहवे ॥ ६ ॥
अन्धे तमसि मूढानि पुत्रस्य तव मन्त्रिते ।
आपके पुत्र दुर्योधनकी सलाहसे होनेवाले उस युद्धके भीतर प्रगाढ़ अन्धकारमें किंकर्तव्यविमूढ़ हुए सहस्रों महारथियोंने एक-दूसरेको मार डाला ।। ६ १/२ ।।
ततः सर्वाणि सैन्यानि सेनागोपांश्च भारत ।
व्यमुह्यन्त रणे तत्र तमसा संवृते सति ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर उस रणभूमिके तिमिराच्छन्न हो जानेपर समस्त सेनाएँ और सेनापति मोहित हो गये ।।
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां संलोड्यमानानां पाण्डवैर्विहतौजसाम् ।
अन्धे तमसि मग्नानामासीत् किं वो मनस्तदा ॥ ८ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जिस समय तुम सब लोग अन्धकारमें डूबे हुए थे और पाण्डव तुम्हारे बल और पराक्रमको नष्ट करके तुम्हें मथे डालते थे, उस समय तुम्हारे और उन पाण्डवोंके मनकी कैसी अवस्था थी? ।।
कथं प्रकाशस्तेषां वा मम सैन्यस्य वा पुनः ।
बभूव लोके तमसा तथा संजय संवृते ॥ ९ ॥
संजय! जब कि सारा जगत् अन्धकारसे आवृत था, उस समय पाण्डवोंको अथवा मेरी सेनाको कैसे प्रकाश प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥
संजय उवाच
ततः सर्वाणि सैन्यानि हतशिष्टानि यानि वै ।
सेनागोप्तॄनथादिश्य पुनर्व्यूहमकल्पयत् ॥ १० ॥
**संजयने कहा—**राजन्! तदनन्तर जितनी सेनाएँ मरनेसे बची हुई थीं, उन सबको तथा सेनापतियोंको आदेश देकर दुर्योधनने उनका पुनः व्यूह-निर्माण करवाया ।।
द्रोणः पुरस्ताज्जघने तु शल्य-
स्तथा द्रौणिः पार्श्वतः सौबलश्च ।
स्वयं तु सर्वाणि बलानि राजन्
राजाभ्ययाद् गोपयन् वै निशायाम् ॥ ११ ॥
राजन्! उस व्यूहके अग्रभागमें द्रोणाचार्य, मध्यभागमें शल्य तथा पार्श्वभागमें अश्वत्थामा और शकुनि थे। स्वयं राजा दुर्योधन उस रात्रिके समय सम्पूर्ण सेनाओंकी रक्षा करता हुआ युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ।। ११ ।।
उवाच सर्वांश्च पदातिसङ्घान्
दुर्योधनः पार्थिव सान्त्वपूर्वम् ।
उत्सृज्य सर्वे परमायुधानि
गृह्णीत हस्तैर्ज्वलितान् प्रदीपान् ॥ १२ ॥
पृथ्वीनाथ! उस समय दुर्योधनने समस्त पैदल सैनिकोंसे सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा—‘वीरो! तुम सब लोग उत्तम आयुध छोड़कर अपने हाथोंमें जलती हुई मशालें ले लो’ ॥ १२ ॥
ते चोदिताः पार्थिवसत्तमेन
ततः प्रहृष्टा जगृहुः प्रदीपान् ।
देवर्षिगन्धर्वसुरर्षिसङ्घा
विद्याधराश्चाप्सरसां गणाश्च ॥ १३ ॥
नागाः सयक्षोरगकिन्नराश्च
हृष्टा दिविस्था जगृहुः प्रदीपान् ।
नृपश्रेष्ठ दुर्योधनकी आज्ञा पाकर उन पैदल सिपाहियोंने बड़े हर्षके साथ हाथोंमें मशालें ले लीं। आकाशमें खड़े हुए देवता, ऋषि, गन्धर्व, देवर्षि, विद्याधर, अप्सराओंके समूह, नाग, यक्ष, सर्प और किन्नर आदिने भी प्रसन्न होकर हाथोंमें प्रदीप ले लिये ॥ १३ ½ ॥
दिग्दैवतेभ्यश्च समापतन्तो-
ऽदृश्यन्त दीपाः ससुगन्धितैलाः ॥ १४ ॥
विशेषतो नारदपर्वताभ्यां
सम्बोध्यामानाः कुरुपाण्डवार्थम् ।
दिशाओंकी अधिष्ठात्री देवियोंके यहाँसे भी सुगन्धित तैलसे भरे हुए दीप वहाँ उतरते दिखायी दिये। विशेषतः नारद और पर्वत नामक मुनियोंने कौरव और पाण्डवोंकी सुविधाके लिये वे दीप जलाये थे ॥ १४ ½ ॥
सा भूय एव ध्वजिनी विभक्ता
व्यरोचताग्निप्रभया निशायाम् ॥ १५ ॥
महाधनैराभरणैश्च दिव्यैः
शस्त्रैश्च दीप्तैरपि सम्पतद्भिः ।
रातके समय अग्निकी प्रभासे वह सेना पुनः विभागपूर्वक प्रकाशित हो उठी। बहुमूल्य आभूषणों तथा सैनिकोंपर गिरनेवाले दीप्तिमान् दिव्यास्त्रोंसे भी वह सेना बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १५ ½ ॥
रथे रथे पञ्च विदीपकास्तु
प्रदीपकास्तत्र गजे त्रयश्च ॥ १६ ॥
प्रत्यश्वमेकश्च महाप्रदीपः
कृतास्तु तैः पाण्डवैः कौरवेयैः ।
क्षणेन सर्वे विहिताः प्रदीपा
व्यादीपयन्तो ध्वजिनीं तवाशु ॥ १७ ॥
एक-एक रथके पास पाँच-पाँच मशालें थीं। प्रत्येक हाथीके साथ तीन-तीन प्रदीप जलते थे। प्रत्येक घोड़ेके साथ एक महाप्रदीपकी व्यवस्था की गयी थी। पाण्डवों तथा कौरवोंके द्वारा इस प्रकार व्यवस्थापूर्वक जलाये गये समस्त प्रदीप क्षणभरमें आपकी सारी सेनाको प्रकाशित करने लगे ।। १६-१७ ।।
सर्वास्तु सेना व्यतिसेव्यमानाः
पदातिभिः पावकतैलहस्तैः ।
प्रकाश्यमाना ददृशुर्निशायां
यथान्तरिक्षे जलदास्तडिद्भिः ॥ १८ ॥
सब लोगोंने देखा कि मशाल और तेल हाथमें लिये पैदल सैनिकोंद्वारा सेवित सारी सेनाएँ रात्रिके समय उसी प्रकार प्रकाशित हो उठी हैं, जैसे आकाशमें बादल बिजलियोंके प्रकाशसे प्रकाशित हो उठते हैं ।।
प्रकाशितायां तु ततो ध्वजिन्यां
द्रोणोऽग्निकल्पः प्रतपन् समन्तात् ।
रराज राजेन्द्र सुवर्णवर्मा
मध्यं गतः सूर्य इवांशुमाली ॥ १९ ॥
राजेन्द्र! सारी सेनामें प्रकाश फैल जानेपर अग्निके समान प्रतापी द्रोणाचार्य सुवर्णमय कवच धारण करके दोपहरके सूर्यकी भाँति सब ओर देदीप्यमान होने लगे ।।
जाम्बूनदेष्वाभरणेषु चैव
निष्केषु शुद्धेषु शरासनेषु ।
पीतेषु शस्त्रेषु च पावकस्य
प्रतिप्रभास्तत्र तदा बभूवुः ॥ २० ॥
उस समय सोनेके आभूषणों, शुद्ध निष्कों, धनुषों तथा चमकीले शस्त्रोंमें वहाँ उन मशालोंकी आगके प्रतिबिम्ब पड़ रहे थे ।। २० ।।
गदाश्च शैक्याः परिघाश्च शुभ्रा
रथेषु शक्त्यश्च विवर्तमानाः ।
प्रतिप्रभारश्मिभिराजमीढ
पुनः पुनः संजनयन्ति दीपान् ॥ २१ ॥
अजमीढकुलनन्दन! वहाँ जो गदाएँ, शैक्य, चमकीले परिघ तथा रथ-शक्तियाँ घुमायी जा रही थीं, उनमें जो उन मशालोंकी प्रभाएँ प्रतिबिम्बित होती थीं, वे मानो पुनः-पुनः बहुत-से नूतन प्रदीप प्रकट करती थीं ।। २१ ।।
छत्राणि वालव्यजनानि खड्गा
दीप्ता महोल्काश्च तथैव राजन् ।
व्याघूर्णमानाश्च सुवर्णमाला
व्यायच्छतां तत्र तदा विरेजुः ॥ २२ ॥
राजन्! छत्र, चँवर, खड्ग, प्रज्वलित विशाल उल्काएँ तथा वहाँ युद्ध करते हुए वीरोंकी हिलती हुई सुवर्णमालाएँ उस समय प्रदीपोंके प्रकाशसे बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ २२ ॥
शस्त्रप्रभाभिश्च विराजमानं
दीपप्रभाभिश्च तदा बलं तत् ।
प्रकाशितं चाभरणप्रभाभि-
र्भृशं प्रकाशं नृपते बभूव ॥ २३ ॥
नरेश्वर! उस समय चमकीले अस्त्रों, प्रदीपों तथा आभूषणोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित एवं सुशोभित आपकी सेना अत्यन्त प्रकाशसे उद्भासित होने लगी ॥ २३ ॥
पीतानि शस्त्राण्यसृगुक्षितानि
वीरावधूतानि तनुच्छदानि ।
दीप्तां प्रभां प्राजनयन्त तत्र
तपात्यये विद्युदिवान्तरिक्षे ॥ २४ ॥
पानीदार एवं खूनसे रँगे हुए शस्त्र तथा वीरोंद्वारा कँपाये हुए कवच वहाँ प्रदीपोंके प्रतिबिम्ब ग्रहण करके वर्षाकालके आकाशमें चमकनेवाली बिजलीकी भाँति अत्यन्त उज्ज्वल प्रभा बिखेर रहे थे ॥ २४ ॥
प्रकम्पितानामभिघातवेगै-
रभिघ्नतां चापततां जवेन ।
वक्त्राण्यकाशन्त तदा नराणां
वाय्वीरितानीव महाम्बुजानि ॥ २५ ॥
आघातके वेगसे कम्पित, आघात करनेवाले तथा वेगपूर्वक शत्रु की ओर झपटनेवाले वीर मनुष्योंके मुख-मण्डल उस समय वायुसे हिलाये हुए बड़े-बड़े कमलोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २५ ॥
महावने दारुमये प्रदीप्ते
यथा प्रभा भास्करस्यापि नश्येत् ।
तथा तदाऽऽसीद् ध्वजिनी प्रदीप्ता
महाभया भारत भीमरूपा ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! जैसे सूखे काठके विशाल वनमें आग लग जानेपर वहाँ सूर्यकी भी प्रभा फीकी पड़ जाती है, उसी प्रकार उस समय अधिक प्रकाशसे प्रज्वलित होती हुई-सी आपकी भयानक सेना महान् भय उत्पन्न करनेवाली प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥
तत् सम्प्रदीप्तं बलमस्मदीयं
निशम्य पार्थास्त्वरितास्तथैव ।
सर्वेषु सैन्येषु पदातिसंघा-
नचोदयंस्तेऽपि चक्रुः प्रदीपान् ॥ २७ ॥ हमारी सेनाको मशालोंके प्रकाशसे प्रकाशित देख कुन्तीके पुत्रोंने भी तुरंत ही सारी सेनाके पैदल सैनिकोंको मशाल जलानेकी आज्ञा दी, अतः उन्होंने भी मशालें जला लीं ॥ २७ ॥ गजे गजे सप्त कृताः प्रदीपा रथे रथे चैव दश प्रदीपाः । द्वावश्वपृष्ठे परिपार्श्वतोऽन्ये ध्वजेषु चान्ये जघनेषु चान्ये ॥ २८ ॥ उनके एक-एक हाथीके लिये सात-सात और एक-एक रथके लिये दस-दस प्रदीपोंकी व्यवस्था की गयी। घोड़ोंके पृष्ठभागमें दो प्रदीप थे। अगल-बगलमें, ध्वजाओंके समीप तथा रथके पिछले भागोंमें अन्यान्य दीपकोंकी व्यवस्था की गयी थी ॥ २८ ॥ सेनासु सर्वासु च पार्श्वतोऽन्ये पश्चात् पुरस्ताच्च समन्ततश्च । मध्ये तथान्ये ज्वलिताग्निहस्ता व्यदीपयन् पाण्डुसुतस्य सेनाम् ॥ २९ ॥ सारी सेनाओंके पार्श्वभागमें, आगे, पीछे, बीचमें एवं चारों ओर भिन्न-भिन्न सैनिक चलती हुई मशालें हाथमें लेकर पाण्डुपुत्रकी सेनाको प्रकाशित करने लगे ॥ मध्ये तथान्ये ज्वलिताग्निहस्ताः सेनाद्वयेऽपि स्म नरा विचेरुः । सर्वेषु सैन्येषु पदातिसङ्घा विमिश्रिता हस्तिरथाश्ववृन्दैः ॥ ३० ॥ व्यदीपयंस्ते ध्वजिनीं प्रदीप्तां तथा बलं पाण्डवेयाभिगुप्तम् । दोनों ही सेनाओंके अन्यान्य पैदल सैनिक हाथोंमें प्रदीप धारण किये दोनों ही सेनाओंके भीतर विचरण करने लगे। सारी सेनाओंके पैदलसमूह हाथी, रथ और अश्वसमूहोंके साथ मिलकर आपकी सेनाको तथा पाण्डवोंद्वारा सुरक्षित वाहिनीको भी अत्यन्त प्रकाशित करने लगे ॥ ३० १/२ ॥ तेन प्रदीप्तेन तथा प्रदीप्तं बलं तवासीद् बलवद् बलेन ॥ ३१ ॥ भाः कुर्वता भानुमता ग्रहेण दिवाकरेणाग्निरिवाभिगुप्तः ।
जैसे किरणोंद्वारा सुशोभित और अपनी प्रभा बिखेरनेवाले सूर्यग्रहके द्वारा सुरक्षित अग्निदेव और भी प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार प्रदीपोंकी प्रभासे अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले उस पाण्डव सैन्यके द्वारा आपकी सेनाका प्रकाश और भी बढ़ गया ।। ३१ १/२ ।।
तयोः प्रभाः पृथिवीमन्तरिक्षं
सर्वा व्यतिक्रम्य दिशश्च वृद्धाः ॥ ३२ ॥
तेन प्रकाशेन भृशं प्रकाशं
बभूव तेषां तव चैव सैन्यम् ।
उन दोनों सेनाओंका बढ़ा हुआ प्रकाश पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंको लाँघकर चारों ओर फैल गया। प्रदीपोंके उस प्रकाशसे आपकी तथा पाण्डवोंकी सेना भी अधिक प्रकाशित हो उठी थी ।। ३२ १/२ ।।
तेन प्रकाशेन दिवं गतेन
सम्बोधिता देवगणाश्च राजन् ॥ ३३ ॥
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः
समागमन्रप्सरसश्च सर्वाः ।
राजन्! स्वर्गलोकतक फैले हुए उस प्रकाशसे उद्बोधित होकर देवता, गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय तथा सम्पूर्ण अप्सराएँ भी युद्ध देखनेके लिये वहाँ आ पहुँचीं ।। ३३ १/२ ।।
तद् देवगन्धर्वसमाकुलं च
यक्षासुरेन्द्राप्सरसां गणैश्च ॥ ३४ ॥
हतैश्च शूरैर्दिवमारुहद्भि-
रायोधनं दिव्यकल्पं बभूव ।
देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, असुरेन्द्रों और अप्सराओंके समुदायसे भरा हुआ वह युद्धस्थल वहाँ मारे जाकर स्वर्गलोकपर आरूढ़ होनेवाले शूरवीरोंके द्वारा दिव्यलोक-सा जान पड़ता था ।। ३४ १/२ ।।
रथाश्वनागाकुलदीपदीप्तं
संरब्धयोधं हतविद्रुताश्वम् ॥ ३५ ॥
महद् बलं व्यूढरथाश्वनागं
सुरासुरव्यूहसमं बभूव ।
रथ, घोड़े और हाथियोंसे परिपूर्ण, प्रदीपोंकी प्रभासे प्रकाशित, रोषमें भरे हुए योद्धाओंसे युक्त, घायल होकर भागनेवाले घोड़ोंसे उपलक्षित तथा व्यूहबद्ध रथ, घोड़े एवं हाथियोंसे सम्पन्न दोनों पक्षोंका वह महान् सैन्यसमूह देवताओं और असुरोंके सैन्यव्यूहके समान जान पड़ता था ।। ३५ १/२ ।।
तच्छक्तिसंघाकुलचण्डवातं महारथाभ्रं गजवाजिघोषम् ॥ ३६ ॥ शस्त्रौघवर्षं रुधिराम्बुधारं निशि प्रवृत्तं रणदुर्दिनं तत् । रातमें होनेवाला वह युद्ध मेघोंकी घटासे आच्छादित दिनके समान प्रतीत होता था। उस समय शक्तियोंका समूह प्रचण्डवायुके समान चल रहा था। विशाल रथ मेघसमूहके समान दिखायी देते थे। हाथियों और घोड़ोंके हींसने और चिग्घाड़नेका शब्द ही मानो मेघोंका गम्भीर गर्जन था। अस्त्रसमूहोंकी वर्षा ही जलकी वृष्टि थी तथा रक्तकी धारा ही जलधाराके समान जान पड़ती थी ॥ ३६ १/२ ॥
तस्मिन् महाग्निप्रतिमो महात्मा संतापयन् पाण्डवान् विप्रमुख्यः ॥ ३७ ॥ गभस्तिभिर्मध्यगतो यथार्को वर्षात्यये तद्वदभून्नरेन्द्र ॥ ३८ ॥ नरेन्द्र! जैसे शरत्कालमें मध्याह्नका सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे भारी संताप देता है, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें महान् अग्निके समान तेजस्वी महामना विप्रवर द्रोणाचार्य पाण्डवोंके लिये संतापकारी हो रहे थे ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दीपोद्योतने त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर प्रदीपोंका प्रकाशविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥
१६४-
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश
संजय उवाच
प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसाऽऽवृते ।
समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! उस समय धूल और अन्धकारसे ढकी हुई रणभूमिमें इस प्रकार उजेला होनेपर एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वीर सैनिक आपसमें भिड़ गये ॥ १ ॥
ते समेत्य रणे राजन् शस्त्रप्रासासिधारिणः ।
परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागसः ॥ २ ॥
महाराज! समरांगणमें परस्पर भिड़कर वे नाना प्रकारके शस्त्र, प्रास और खड्ग आदि धारण करनेवाले योद्धा, जो परस्पर अपराधी थे, एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ॥ २ ॥
प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः ।
रत्नाचितैः स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिञ्चितैः ॥ ३ ॥
चारों ओर हजारों मशालें जल रही थीं। उनके डंडे सोनेके बने हुए थे और उनमें रत्न जड़े हुए थे। उन मशालोंपर सुगन्धित तेल डाला जाता था ॥ ३ ॥
देवगन्धर्वदीपाद्यैः प्रभाभिरधिकोज्ज्वलैः ।
विरराज तदा भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव भारत ॥ ४ ॥
भारत! उन्हींमें देवताओं और गन्धर्वोंके भी दीप आदि जल रहे थे, जो अपनी विशेष प्रभाके कारण अधिक प्रकाशित हो रहे थे। उनके द्वारा उस समय रणभूमि नक्षत्रोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ ४ ॥
उल्काशतैः प्रज्वलितै रणभूमिर्व्यराजत ।
दह्यमानेव लोकानामभावे च वसुंधरा ॥ ५ ॥
सैकड़ों प्रज्वलित उल्काओं (मशालों)-से वह रणभूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो प्रलयकालमें यह सारी पृथ्वी दग्ध हो रही हो ॥ ५ ॥
व्यदीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः ।
वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृता वृक्षा इवाबभुः ॥ ६ ॥
उन प्रदीपोंसे सब ओर सारी दिशाएँ ऐसी प्रदीप्त हो उठीं, मानो वर्षाके सायंकालमें जुगनुओंसे घिरे हुए वृक्ष जगमगा रहे हों ॥ ६ ॥
असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक् पृथक् ।
नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगा ह्यसादिभिः ॥ ७ ॥
उस समय वीरगण विपक्षी वीरोंके साथ पृथक्-पृथक् भिड़ गये। हाथी हाथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे ॥ ७ ॥
रथा रथवरैरेव समाजग्मुर्मुदा युताः ।
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ८ ॥
चतुरङ्गस्य सैन्यस्य सम्पातश्च महानभूत् ।
इसी प्रकार रथी श्रेष्ठ रथियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करने लगे। उस भयंकर प्रदोषकालमें आपके पुत्रकी आज्ञासे वहाँ चतुरङ्गिणी सेनामें भारी मारकाट मच गयी ॥
ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् ॥ ९ ॥
व्यधमत् त्वरया युक्तः क्षपयन् सर्वपार्थिवान् ।
महाराज! तदनन्तर अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ समस्त राजाओंका संहार करते हुए कौरव-सेनाका विनाश करने लगे ॥ ९ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन् प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ १० ॥
अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि वः ।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए दुर्धर्ष वीर अर्जुन जब मेरे पुत्रकी सेनामें प्रविष्ट हुए, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥
किमकुर्वत सैन्यानि प्रविष्टे परपीड़ने ॥ ११ ॥
दुर्योधनश्च किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ।
शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले अर्जुनके प्रवेश करनेपर मेरी सेनाओंने क्या किया? तथा दुर्योधनने उस समयके अनुरूप कौन-सा कार्य उचित माना? ॥ ११ १/२ ॥
के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिंदमाः ॥ १२ ॥
द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने ।
समरांगणमें शत्रुओंका दमन करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा वीर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े। श्वेतवाहन अर्जुनके कौरव-सेनाके भीतर घुस आनेपर किन लोगोंने द्रोणाचार्यकी रक्षा की ॥ १२ १/२ ॥
केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः ॥ १३ ॥
के पृष्ठतश्चाप्यभवन् वीरा वीरान् विनिघ्नतः ।
के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नन्तः शात्रवान् रणे ॥ १४ ॥
कौन-कौन-से योद्धा द्रोणाचार्यके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा करते थे और कौन-कौन-से बायें पहियेकी? कौन-कौन-से वीर वीरोंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यके पृष्ठभागके रक्षक