महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
स एवमुक्तः सुहृदा वचो हितं विचिन्त्य निःश्वस्य च दुर्मनाब्रवीत् । यथा भवानाह सखे तथैव त- न्ममापि विज्ञापयतो वचः शृणु ॥ ३० ॥
सुहृद् अश्वत्थामाने जब इस प्रकार हितकी बात कही, तब दुर्योधन उसपर विचार करके लंबी साँस खींचकर मन-ही-मन दुःखी हो इस प्रकार बोला—'सखे! तुम जैसा कहते हो, वह सब ठीक है; परंतु इस विषयमें कुछ मैं भी निवेदन कर रहा हूँ, अतः मेरी बात भी सुन लो ॥ ३० ॥
निहत्य दुःशासनमुक्तवान् वचः प्रसह्य शार्दूलवदेष दुर्मतिः । वृकोदरस्तद्धृदये मम स्थितं न तत् परोक्षं भवतः कुतः शमः ॥ ३१ ॥
'इस दुर्बुद्धि भीमसेनने सिंहके समान हठपूर्वक दुःशासनका वध करके जो बात कही थी, वह तुमसे छिपी नहीं है। वह इस समय भी मेरे हृदयमें स्थित होकर पीड़ा दे रही है। ऐसी दशामें कैसे संधि हो सकती है? ॥ ३१ ॥
न चापि कर्णं प्रसहेद् रणेऽर्जुनो महागिरिं मेरुमिवोग्रमारुतः । न चाश्वसिष्यन्ति पृथात्मजा मयि प्रसह्य वैरं बहुशो विचिन्त्य ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा भयंकर वायु जैसे महापर्वत मेरुका सामना नहीं कर सकती, उसी प्रकार अर्जुन इस रणभूमिमें कर्णका वेग नहीं सह सकते। हमने हठपूर्वक बारंबार जो वैर किया है, उसे सोचकर कुन्तीके पुत्र मुझपर विश्वास भी नहीं करेंगे ॥ ३२ ॥
न चापि कर्णं गुरुपुत्र संयुगा- दुपारमेत्यर्हसि वक्तुमच्युत । श्रमेण युक्तो महताद्य फाल्गुन- स्तमेष कर्णः प्रसभं हनिष्यति ॥ ३३ ॥
'अपनी मर्यादा न छोड़नेवाले गुरुपुत्र! तुम्हें कर्णसे युद्ध बंद करनेके लिये नहीं कहना चाहिये; क्योंकि इस समय अर्जुन महान् परिश्रमसे थक गये हैं; अतः अब कर्ण उन्हें बलपूर्वक मार डालेगा' ॥ ३३ ॥
तमेवमुक्त्वाप्यनुनीय चासकृत् तवात्मजः स्वाननुशास्ति सैनिकान् । विनिघ्नताभिद्रवताहितान् मम सबाणहस्ताः किमु जोषमासत ॥ ३४ ॥
अश्वत्थामासे ऐसा कहकर बारंबार अनुनय-विनयके द्वारा उसे प्रसन्न करके आपके पुत्रने अपने सैनिकोंको आदेश देते हुए कहा—'अरे! तुमलोग हाथोंमें बाण लिये चुपचाप बैठे क्यों हो? मेरे शत्रुओंपर टूट पड़ो और उन्हें मार डालो' ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामवाक्येऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाका वचनविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2329)
एकोननवतितमोऽध्यायः
कर्ण और अर्जुनका भयंकर युद्ध और कौरववीरोंका पलायन
संजय उवाच
तौ शङ्खभेरीनिनादे समृद्धे
समीयतुः श्वेतहयौ नराग्र्यौ ।
वैकर्तनः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च
दुर्मन्त्रिते तव पुत्रस्य राजन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप जब वहाँ शंख और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, उस समय वहाँ श्वेत घोड़ोंवाले दोनों नरश्रेष्ठ वैकर्तन कर्ण और अर्जुन युद्धके लिये एक-दूसरेकी ओर बढ़े ॥ १ ॥
(आशीविषावग्निमिवापधूमं
वैरं मुखाभ्यामभिनिःश्वसन्तौ ।
यशस्विनौ जज्वलतुर्मृधे तदा
घृतावसिक्ताविव हव्यवाहौ ॥)
वे दोनों यशस्वी वीर उस समय दो विषधर सर्पोंके समान लंबी साँस खींचकर मानो अपने मुखोंसे धूमरहित अग्निके सदृश वैरभाव प्रकट कर रहे थे। वे घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई दो अग्नियोंकी भाँति युद्धभूमिमें देदीप्यमान होने लगे।
यथा गजौ हैमवतौ प्रभिन्नौ
प्रवृद्धदन्ताविव वासितार्थे ।
तथा समाजग्मतुरुग्रवीर्यौ
धनंजयश्चाधिरथिश्च वीरौ ॥ २ ॥
जैसे मदकी धारा बहानेवाले हिमाचलप्रदेशके बड़े-बड़े दाँतोंवाले दो हाथी किसी हथिनीके लिये लड़ रहे हों, उसी प्रकार भयंकर पराक्रमी वीर अर्जुन और कर्ण युद्धके लिये एक-दूसरेके सामने आये ॥ २ ॥
बलाहकेनेव महाबलाहको
यदृच्छया वा गिरिणा यथा गिरिः ।
तथा धनुर्ज्यातलनेमिनिस्वनैः
समीयतुस्ताविषुवर्षवर्षिणौ ॥ ३ ॥
जैसे महान् मेघ किसी दूसरे मेघके साथ अथवा दैवेच्छासे एक पर्वत दूसरे पर्वतके साथ टक्कर लेनेके लिये उद्यत हो, उसी प्रकार धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली तथा रथके पहियोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ बाणोंकी वर्षा करते हुए वे दोनों वीर एक-दूसरेके सामने आये ।। ३ ।।
प्रवृद्धशृङ्गद्रुमवीरुदोषधी
प्रवृद्धनानाविधनिर्झरौकसौ ।
यथाचलौ वा चलितौ महाबलौ
तथा महास्त्रैरितरेतरं हतः ।। ४ ।।
जिनके शिखर, वृक्ष, लता-गुल्म और ओषधि सभी विशाल एवं बढ़े हुए हों तथा जो नाना प्रकारके बड़े-बड़े झरनोंके उद्गमस्थान हों, ऐसे दो पर्वतके समान वे महाबली कर्ण और अर्जुन आगे बढ़कर अपने महान् अस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेपर आघात करने लगे ।। ४ ।।
स संनिपातस्तु तयोर्महानभूत्
सुरेशवैरोचनयोर्यथा पुरा ।
शरैर्विमुन्नाङ्गनियन्तृवाहयोः
सुदुःसहोऽन्यैः कटुशोणितोदकः ।। ५ ।।
उन दोनोंका वह संग्राम वैसा ही महान् था, जैसा कि पूर्वकालमें इन्द्र और बलिका युद्ध हुआ था। बाणोंके आघातसे उन दोनोंके शरीर, सारथि और घोड़े क्षत-विक्षत हो गये थे और वहाँ कटु रक्तरूपी जलका प्रवाह बह रहा था। वह युद्ध दूसरोंके लिये अत्यन्त दुःसह था ।। ५ ।।
प्रभूतपद्मोत्पलमतस्यकच्छपौ
महाह्रदौ पक्षिगणैरिवावृतौ ।
सुसंनिकृष्टावनिलोद्धतौ यथा
तथा रथौ तौ ध्वजिनौ समीयतुः ।। ६ ।।
जैसे प्रचुर पद्म, उत्पल, मत्स्य और कच्छपोंसे युक्त तथा पक्षिसमूहोंसे आवृत दो अत्यन्त निकटवर्ती विशाल सरोवर वायुसे संचालित हो परस्पर मिल जायें, उसी प्रकार ध्वजोंसे सुशोभित उनके वे दोनों रथ एक-दूसरेसे भिड़ गये थे ।। ६ ।।
उभौ महेन्द्रस्य समानविक्रमा-
वुभौ महेन्द्रप्रतिमौ महारथौ ।
महेन्द्रवज्रप्रतिमैश्च सायकै-
र्महेन्द्रवृत्राविव सम्प्रजघ्नतुः ।। ७ ।।
वे दोनों वीर इन्द्रके समान पराक्रमी और उन्हींके सदृश महारथी थे। इन्द्रके वज्रतुल्य बाणोंसे इन्द्र और वृत्रासुरके समान वे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ।। ७ ।।
सनागपत्त्यश्वरथे उभे बले
विचित्रवर्माभरणाम्बरायुधे । चकम्पतुर्विस्मयनीयरूपे वियद्गताश्चार्जुनकर्णसंयुगे ॥ ८ ॥ विचित्र कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध धारण करनेवाली, हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित उभय पक्षकी चतुरंगिणी सेनाएँ अर्जुन और कर्णके उस युद्धमें भयके कारण आश्चर्यजनकरूपसे काँपने लगीं तथा आकाशवर्ती प्राणी भी भयसे थर्रा उठे ॥ ८ ॥
भुजाः सवस्त्राङ्गुलयः समुच्छ्रिताः ससिंहनादैर्हृषितैर्दिदृक्षुभिः । यदर्जुनो मत्त इव द्विपो द्विपं समभ्ययादाधिरथिं जिघांसया ॥ ९ ॥ जैसे मतवाला हाथी किसी हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अर्जुन जब कर्णके वधकी इच्छासे उसपर धावा करने लगे, उस समय दर्शकोंने आनन्दित हो सिंहनाद करते हुए अपने हाथ ऊपर उठा दिये और अंगुलियोंमें वस्त्र लेकर उन्हें हिलाना आरम्भ किया ॥ ९ ॥
(ततः कुरूणामथ सोमकानां शब्दो महान् प्रादुरभूत् समन्तात् । यदार्जुनं सूतपुत्रोऽपराह्ने महाहवे शैलमिवाम्बुदोऽर्छत् ॥ तदैव चासीद् रथयोः समागमो महारणे शोणितमांसकर्दमे ॥) जब महासमरमें अपराह्नके समय पर्वतपर जानेवाले मेघके समान सूतपुत्र कर्णने अर्जुनपर आक्रमण किया, उस समय कौरवों और सोमकोंका महान् कोलाहल सब ओर प्रकट होने लगा। उसी समय उन दोनों रथोंका संघर्ष आरम्भ हुआ। उस महायुद्धमें रक्त और मांसकी कीच जम गयी थी।
उदक्रोशन् सोमकास्तत्र पार्थ पुरःसराश्चार्जुन भिन्धि कर्णम् । छिन्ध्यस्य मूर्धानमलं चिरेण श्रद्धां च राज्याद् धृतराष्ट्रसूनोः ॥ १० ॥ उस समय सोमकोंने आगे बढ़कर वहाँ कुन्तीकुमारसे पुकार-पुकारकर कहा—‘अर्जुन! तुम कर्णको मार डालो। अब देर करनेकी आवश्यकता नहीं है। कर्णके मस्तक और दुर्योधनकी राज्य-प्राप्तिकी आशा दोनोंको एक साथ ही काट डालो’ ॥ १० ॥
तथास्माकं बहवस्तत्र योधाः कर्णं तथा याहि याहीत्यवोचन् ।
जह्यर्जुनं कर्ण शरैः सुतीक्ष्णैः
पुनर्वनं यान्तु चिराय पार्थाः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार हमारे पक्षके बहुत-से योद्धा कर्णको प्रेरित करते हुए बोले—'कर्ण! आगे बढ़ो, आगे बढ़ो। अपने पैने बाणोंसे अर्जुनको मार डालो, जिससे कुन्तीके सभी पुत्र पुनः दीर्घकालके लिये वनमें चले जायँ' ॥ ११ ॥
ततः कर्णः प्रथमं तत्र पार्थं
महेषुभिर्दशभिः प्रत्यविध्यत् ।
तं चार्जुनः प्रत्यविद्ध्यच्छिताग्रैः
कक्षान्तरे दशभिः सम्प्रहस्य ॥ १२ ॥
तदनन्तर वहाँ कर्णने पहले दस विशाल बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला, तब अर्जुनने भी हँसकर तीखी धारवाले दस बाणोंसे कर्णकी काँखमें प्रहार किया ॥ १२ ॥
परस्परं तौ विशिखैः सुपुङ्खै-
स्ततक्षतुः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च ।
परस्परं तौ बिभिदुर्विमर्दे
सुभीममभ्यापततुश्च हृष्टौ ॥ १३ ॥
सूतपुत्र कर्ण और अर्जुन दोनों उस युद्धमें अत्यन्त हर्षमें भरकर सुन्दर पंखवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेको क्षत-विक्षत करने लगे। वे परस्पर क्षति पहुँचाते और भयानक आक्रमण करते थे ॥ १३ ॥
ततोऽर्जुनः प्रासृजदुग्रधन्वा
भुजावुभौ गाण्डिवं चानुमृज्य ।
नाराचनालीकवराहकर्णान्
क्षुरांस्तथा साञ्जलिकार्धचन्द्रान् ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् भयंकर धनुषवाले अर्जुनने अपनी दोनों भुजाओं तथा गाण्डीव धनुषको पोंछकर नाराच, नालीक, वराहकर्ण, क्षुर, अंजलिक तथा अर्धचन्द्र आदि बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ १४ ॥
ते सर्वतः समकीर्यन्त राजन्
पार्थेषवः कर्णरथं विशन्तः ।
अवाङ्मुखाः पक्षिगणा दिनान्ते
विशन्ति केतार्थमिवाशु वृक्षम् ॥ १५ ॥
राजन्! वे अर्जुनके बाण कर्णके रथमें घुसकर सब ओर बिखर जाते थे। ठीक उसी तरह, जैसे संध्याके समय पक्षियोंके झुंड बसेरा लेनेके लिये नीचे मुख किये शीघ्र ही किसी वृक्षपर जा बैठते हैं ॥ १५ ॥
यानर्जुनः सभ्रुकुटीकटाक्षं
कर्णाय राजन्नसृजज्जितारिः ।
तान् सायकैर्ग्सते सूतपुत्रः
क्षिप्तान् क्षिप्तान् पाण्डवस्याशु संघान् ॥ १६ ॥
नरेश्वर! शत्रुविजयी अर्जुन भौंहें टेढ़ी करके कटाक्षपूर्वक देखते हुए कर्णपर जिन-जिन बाणोंका प्रहार करते थे, पाण्डुपुत्र अर्जुनके चलाये हुए उन सभी बाणसमूहोंको सूतपुत्र कर्ण शीघ्र ही नष्ट कर देता था ॥
ततोऽस्त्रमाग्नेयममित्रसाधनं
मुमोच कर्णाय महेन्द्रसूनुः ।
भूम्यन्तरिक्षे च दिशोऽर्कमार्गं
प्रावृत्य देहोऽस्य बभूव दीप्तः ॥ १७ ॥
तब इन्द्रकुमार अर्जुनने कर्णपर शत्रुनाशक आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया। उस आग्नेयास्त्रका स्वरूप पृथ्वी, आकाश, दिशा तथा सूर्यके मार्गको व्याप्त करके वहाँ प्रज्वलित हो उठा ॥ १७ ॥
योधाश्च सर्वे ज्वलिताम्बरा भृशं
प्रदुद्रुवुस्तत्र विदग्धवस्त्राः ।
शब्दश्च घोरोऽतिबभूव तत्र
यथा वने वेणुवनस्य दह्यतः ॥ १८ ॥
इससे वहाँ समस्त योद्धाओंके वस्त्र जलने लगे। कपड़े जल जानेसे वे सब-के-सब वहाँसे भाग चले। जैसे जंगलके बीच बाँसके वनमें आग लगनेपर जोर-जोरसे चटकनेकी आवाज होती है, उसी प्रकार आगकी लपटमें झुलसते हुए सैनिकोंका अत्यन्त भयंकर आर्तनाद होने लगा ॥
तद् वीक्ष्य कर्णो ज्वलनास्त्रमुद्यतं
स वारुणं तत्प्रशमार्थमाहवे ।
समुत्सृजन् सूतसुतः प्रतापवान्
स तेन वह्निं शमयाम्बभूव ॥ १९ ॥
प्रतापी सूतपुत्र कर्णने उस आग्नेयास्त्रको उद्दीप्त हुआ देखकर रणक्षेत्रमें उसकी शान्तिके लिये वारुणास्त्रका प्रयोग किया और उसके द्वारा उस आगको बुझा दिया ॥
बलाहकौघश्च दिशस्तरस्वी
चकार सर्वास्तिमिरेश संवृताः ।
ततो धरित्रीधरतुल्यरोधसः
समन्ततो वै परिवार्य वारिणा ॥ २० ॥
फिर तो बड़े वेगसे मेघोंकी घटा घिर आयी और उसने सम्पूर्ण दिशाओंको अन्धकारसे आच्छादित कर दिया। दिशाओंका अन्तिम भाग काले पर्वतके समान दिखायी देने लगा।
मेघोंकी घटाओंने वहाँका सारा प्रदेश जलसे आप्लावित कर दिया था ॥ २० ॥ तैश्चातिवेगात् स तथाविधोऽपि नीतः शमं वह्निरतिप्रचण्डः । बलाहकैरेव दिगन्तराणि व्याप्तानि सर्वाणि यथा नभश्च ॥ २१ ॥ उन मेघोंने वहाँ पूर्वोक्तरूपसे बढ़ी हुई अति प्रचण्ड आगको बड़े वेगसे बुझा दिया। फिर समस्त दिशाओं और आकाशमें वे ही छा गये ॥ २१ ॥ तथा च सर्वास्तिमिरेण वै दिशो मेघैर्वृता न प्रदृश्येत किंचित् । अथापोवाह्याभ्रसंघान् समस्तान् वायव्यास्त्रेणापततः स कर्णात् ॥ २२ ॥ ततोऽप्यस्त्रं दयितं देवराज्ञः प्रादुश्चक्रे वज्रमतिप्रभावम् । गाण्डीवं ज्यां विशिखांश्चानुमन्त्र्य धनंजयः शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ २३ ॥ मेघोंसे घिरकर सारी दिशाएँ अन्धकाराच्छन्न हो गयीं; अतः कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी। तदनन्तर कर्णकी ओरसे आये हुए सम्पूर्ण मेघ-समूहोंको वायव्यास्त्रसे छिन्न-भिन्न करके शत्रुओंके लिये अजेय अर्जुनने गाण्डीव धनुष, उसकी प्रत्यंचा तथा बाणोंको अभिमन्त्रित करके अत्यन्त प्रभावशाली वज्रास्त्रको प्रकट किया, जो देवराज इन्द्रका प्रिय अस्त्र है ॥ २२-२३ ॥ ततः क्षुरप्राञ्जलिकार्धचन्द्रा नालीकनाराचवराहकर्णाः । गाण्डीवतः प्रादुरासन् सुतीक्ष्णाः सहस्रशो वज्रसमानवेगाः ॥ २४ ॥ उस गाण्डीव धनुषसे क्षुरप्र, अंजलिक, अर्धचन्द्र, नालीक, नाराच और वराहकर्ण आदि तीखे अस्त्र हजारोंकी संख्यामें छूटने लगे। वे सभी अस्त्र वज्रके समान वेगशाली थे ॥ २४ ॥ ते कर्णमासाद्य महाप्रभावाः सुतेजना गार्ध्रपत्राः सुवेगाः । गात्रेषु सर्वेषु हयेषु चापि शरासने युगचक्रे ध्वजे च ॥ २५ ॥ वे महाप्रभावशाली गीधके पंखोंसे युक्त, तेज धारवाले और अतिशय वेगवान् अस्त्र कर्णके पास पहुँचकर उसके समस्त अंगोंमें, घोड़ोंपर, धनुषमें तथा रथके जूओं, पहियों
और ध्वजोंमें जा लगे ॥ २५ ॥ निर्भिद्य तूर्णं विविशुः सुतीक्ष्णा- स्तार्क्ष्यत्रस्ता भूमिमिवोरगास्ते । शराचिताङ्गो रुधिरार्द्रगात्रः कर्णस्तदा रोषविवृत्तनेत्रः ॥ २६ ॥ जैसे गरुड़से डरे हुए सर्प धरती छेदकर उसके भीतर घुस जाते हैं, उसी प्रकार वे तीखे अस्त्र उपर्युक्त वस्तुओंको विदीर्ण कर शीघ्र ही उनके भीतर धँस गये। कर्णके सारे अंग बाणोंसे भर गये। सम्पूर्ण शरीर रक्तसे नहा उठा। इससे उसके नेत्र उस समय क्रोधसे घूमने लगे ॥
दृढज्यमानाम्य समुद्रघोषं प्रादुश्चक्रे भार्गवास्त्रं महात्मा । महेन्द्रशस्त्राभिमुखान् विमुक्तां- श्छित्त्वा कर्णः पाण्डवस्येषुसंघान् ॥ २७ ॥ तस्यास्त्रमस्त्रेण निहत्य सोऽथ जघान संख्ये रथनागपत्तीन् । अमृष्यमाणश्च महेन्द्रकर्मा महारणे भार्गवास्त्रप्रतापात् ॥ २८ ॥ उस महामनस्वी वीरने अपने धनुषको जिसकी प्रत्यंचा सुदृढ़ थी, झुकाकर समुद्रके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले भार्गवास्त्रको प्रकट किया और अर्जुनके महेन्द्रास्त्रसे प्रकट हुए बाणसमूहोंके टुकड़े-टुकड़े करके अपने अस्त्रसे उनके अस्त्रको दबाकर युद्धस्थलमें रथों, हाथियों और पैदलसैनिकोंका संहार कर डाला। अमर्षशील कर्ण उस महासमरमें भार्गवास्त्रके प्रतापसे देवराज इन्द्रके समान पराक्रम प्रकट कर रहा था ॥ २७-२८ ॥
पञ्चालानां प्रवरांश्चापि योधान् क्रोधाविष्टः सूतपुत्रस्तरस्वी । बाणैर्विव्याधाहवे सुप्रमुक्तैः शिलाशितै रुक्मपुङ्खैः प्रसह्य ॥ २९ ॥ क्रोधमें भरे हुए वेगशाली सूतपुत्र कर्णने अच्छी तरह छोड़े गये और शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें हठपूर्वक मुख्य-मुख्य पांचालयोद्धाओंको घायल कर दिया ॥ २९ ॥
तत्पञ्चालाः सोमकाश्चापि राजन् कर्णेनाजौ पीड्यमानाः शरौघैः । क्रोधाविष्टा विव्यधुस्तं समन्तात् तीक्ष्णैर्बाणैः सूतपुत्रं समेताः ॥ ३० ॥
राजऩ्! समरांगणमें कर्णके बाणसमूहोंसे पीड़ित होते हुए पांचाल और सोमक योद्धा भी क्रोधपूर्वक एकत्र हो अपने पैने बाणोंसे सूतपुत्र कर्णको बींधने लगे ॥
तान् सूतपुत्रो निजघान बाणैः
पञ्चालानां रथनागाश्वसंघान् ।
अभ्यर्दयद् बाणगणैः प्रसह्य
विद्ध्वा हर्षात् सङ्गरे सूतपुत्रः ॥ ३१ ॥
किंतु उस रणक्षेत्रमें सूतपुत्र कर्णने बाणसमूहोंद्वारा हर्ष और उत्साहके साथ पांचालोंके रथियों, हाथीसवारों और घुड़सवारोंको घायल करके बड़ी पीड़ा दी और उन्हें बाणोंसे मार डाला ॥ ३१ ॥
ते भिन्नदेहा व्यसवो निपेतुः
कर्णेषुभिर्भूतितले स्वनन्तः ।
क्रुद्धेन सिंहेन यथेभयूथा
महावने भीमबलेन तद्वत् ॥ ३२ ॥
कर्णके बाणोंसे उनके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वे प्राणशून्य होकर कराहते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे विशाल वनमें भयानक बलशाली और क्रोधमें भरे हुए सिंहसे विदीर्ण किये गये हाथियोंके झुंड धराशायी हो जाते हैं, वैसी ही दशा उन पांचालयोद्धाओंकी भी हुई ॥
पञ्चालानां प्रवरान् संनिहत्य
प्रसह्य योधानखिलानदीनः ।
ततः स राजन् विरराज कर्णो
यथाम्बरे भास्कर उग्ररश्मिः ॥ ३३ ॥
राजन्! पांचालोंके समस्त श्रेष्ठ योद्धाओंका बलपूर्वक वध करके उदार वीर कर्ण आकाशमें प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ॥ ३३ ॥
कर्णस्य मत्वा तु जयं त्वदीयाः
परां मुदं सिंहनादांश्च चक्रुः ।
सर्वे ह्यमन्यन्त भृशाहतौ च
कर्णेन कृष्णाविति कौरवेन्द्र ॥ ३४ ॥
उस समय आपके सैनिक कर्णकी विजय समझकर बड़े प्रसन्न हुए और सिंहनाद करने लगे। कौरवेन्द्र! उन सबने यही समझा कि कर्णने श्रीकृष्ण और अर्जुनको बहुत घायल कर दिया है ॥ ३४ ॥
तत् तादृशं प्रेक्ष्य महारथस्य
कर्णस्य वीर्यं च परैरसह्यम् ।
दृष्ट्वा च कर्णेन धनंजयस्य
तथाऽऽजिमध्ये निहतं तदस्त्रम् ॥ ३५ ॥
ततस्त्वमर्षी क्रोधसंदीप्तनेत्रो
वातात्मजः पाणिना पाणिमार्च्छत् ।
भीमोऽब्रवीदर्जुनं सत्यसंध-
ममर्षितो निःश्वसञ्जातमन्युः ॥ ३६ ॥
महारथी कर्णका वह शत्रुओंके लिये असह्य वैसा पराक्रम दृष्टिपथमें लाकर तथा रणभूमिमें कर्णद्वारा अर्जुनके उस अस्त्रको नष्ट हुआ देखकर अमर्षशील वायुपुत्र भीमसेन हाथ-से-हाथ मलने लगे। उनके नेत्र क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे। हृदयमें अमर्ष और क्रोधका प्रादुर्भाव हो गया; अतः वे सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ३५-३६ ॥
कथं नु पापोऽयमपेतधर्मः
सूतात्मजः समरेऽद्य प्रसह्य ।
पञ्चालानां योधमुख्याननेकान्
निजघ्निवांस्तव जिष्णो समक्षम् ॥ ३७ ॥
‘विजयी अर्जुन! आज समरांगणमें धर्मसे दूर रहनेवाले इस पापी सूतपुत्र कर्णने तुम्हारी आँखोंके सामने अनेक प्रमुख पांचालयोद्धाओंका वध कैसे कर डाला? ॥
पूर्वं देवैरजितं कालकेयैः
साक्षात् स्थाणोर्बाहुसंस्पर्शमेत्य ।
कथं नु त्वां सूतपुत्रः किरीटि-
न्नथेषुभिर्दशभिः प्रागविद्ध्यत् ॥ ३८ ॥
‘किरीटधारी अर्जुन! तुम्हें तो पूर्वकालमें देवता भी नहीं जीत सके थे। कालकेय दानव भी नहीं परास्त कर सके थे। तुम साक्षात् भगवान् शंकरकी भुजाओंसे टक्कर ले चुके हो तो भी इस सूतपुत्रने तुम्हें पहले ही दस बाण मारकर कैसे बींध डाला? ॥ ३८ ॥
त्वया क्षिप्तांश्चाग्रसद् बाणसंघा-
नाश्चर्यमेतत् प्रतिभाति मेऽद्य ।
कृष्णापरिक्लेशमनुस्मर त्वं
यथाब्रवीत् षण्ढतिलान् स्म वाचः ॥ ३९ ॥
रूक्षाः सुतीक्ष्णाश्च हि पापबुद्धिः
सूतात्मजोऽयं गतभीर्दुरात्मा ।
संस्मृत्य सर्वं तदिहाद्य पापं
जह्याशु कर्णं युधि सव्यसाचिन् ॥ ४० ॥
‘तुम्हारे चलाये हुए बाणसमूहोंको इसने नष्ट कर दिया, यह तो आज मुझे बड़े आश्चर्यकी बात जान पड़ती है। सव्यसाची अर्जुन! कौरव-सभामें द्रौपदीको दिये गये उन क्लेशोंको तो याद करो। इस पापबुद्धि दुरात्मा सूतपुत्रने जो निर्भय होकर हमलोगोंको थोथे
तिलोंके समान नपुंसक बताया था और बहुत-सी अत्यन्त तीखी एवं रूखी बातें सुनायी थीं, उन सबको यहाँ याद करके तुम पापी कर्णको शीघ्र ही युद्धमें मार डालो ।। ३९-४० ।।
कस्मादुपेक्षां कुरुषे किरीटि- न्नुपेक्षितुं नायमिहाद्य कालः। यया धृत्या सर्वभूतान्यजैषी- र्ग्रासं ददत् खाण्डवे पावकाय ।। ४१ ।। तया धृत्या सूतपुत्रं जहि त्व- महं चैनं गदया पोथयिष्ये।
'किरीटधारी पार्थ! तुम क्यों इसकी उपेक्षा करते हो? आज यहाँ यह उपेक्षा करनेका समय नहीं है। तुमने जिस धैर्यसे खाण्डववनमें अग्निदेवको ग्रास समर्पित करते हुए समस्त प्राणियोंपर विजय पायी थी, उसी धैर्यके द्वारा सूतपुत्रको मार डालो। फिर मैं भी इसे अपनी गदासे कुचल डालूँगा' ।। ४१ १/२ ।।
अथाब्रवीद् वासुदेवोऽपि पार्थं दृष्ट्वा रधेषून् प्रतिहन्यमानान् ।। ४२ ।। अमीमृदत् सर्वपातेऽद्य कर्णो ह्यस्त्रैरस्त्रं किमिदं भो किरीटिन्। स वीर किं मुह्यसि नावधत्से नदन्त्येते कुरवः सम्प्रहृष्टाः ।। ४३ ।।
तदनन्तर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनके रथसम्बन्धी बाणोंको कर्णके द्वारा नष्ट होते देख उनसे इस प्रकार कहा 'किरीटधारी अर्जुन! यह क्या बात है? तुमने अबतक जितने बार प्रहार किये हैं, उन सबमें कर्णने तुम्हारे अस्त्रको अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर दिया है। वीर! आज तुमपर कैसा मोह छा रहा है? तुम सावधान क्यों नहीं होते? देखो, ये तुम्हारे शत्रु कौरव अत्यन्त हर्षमें भरकर सिंहनाद कर रहे हैं! ।। ४२-४३ ।।
कर्णं पुरस्कृत्य विदुर्हि सर्वे तवास्त्रमस्त्रैर्विनिपात्यमानम्। यया धृत्या निहतं तामसास्त्रं युगे युगे राक्षसाश्चापि घोराः ।। ४४ ।। दम्भोद्भवाश्चासुराश्चाहवेषु तया धृत्या जहि कर्णं त्वमद्य।
'कर्णको आगे करके सब लोग यही समझ रहे हैं कि तुम्हारा अस्त्र उसके अस्त्रोंद्वारा नष्ट होता जा रहा है। तुमने जिस धैर्यसे प्रत्येक युगमें घोर राक्षसोंका, उनके मायामय तामस अस्त्रका तथा दम्भोद्भव नामवाले असुरोंका युद्धस्थलोंमें विनाश किया है, उसी धैर्यसे आज तुम कर्णको भी मार डालो ।। ४४ १/२ ।।
अनेन चास्य क्षुरनेमिनाद्य संछिन्धि मूर्धानमरेः प्रसह्य ॥ ४५ ॥ मया विसृष्टेन सुदर्शनेन वज्रेण शक्रो नमुचेरिवारेः । ‘तुम मेरे दिये हुए इस सुदर्शनचक्रके द्वारा जिसके नेमिभागमें (किनारे) क्षुर लगे हुए हैं, आज बलपूर्वक शत्रु का मस्तक काट डालो। जैसे इन्द्रने वज्रके द्वारा अपने शत्रु नमुचिका सिर काट दिया था॥ ४५ १/२ ॥
किरातरूपी भगवान् सुधृत्या त्वया महात्मा परितोषितोऽभूत् ॥ ४६ ॥ तां त्वं पुनर्वीर धृतिं गृहीत्वा सहानुबन्धं जहि सूतपुत्रम् । ‘वीर! तुमने अपने जिस उत्तम धैर्यके द्वारा किरातरूपधारी महात्मा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया था, उसी धैर्यको पुनः अपनाकर सगे-सम्बन्धियोंसहित सूतपुत्रका वध कर डालो॥ ४६ १/२ ॥
ततो महीं सागरमेखलां त्वं सपत्तनां ग्रामवतीं समृद्धाम् ॥ ४७ ॥ प्रयच्छ राज्ञे निहितारिसंघां यशश्च पार्थातुलमाप्नुहि त्वम् । ‘पार्थ! तत्पश्चात् समुद्रसे घिरी हुई नगरों और गाँवोंसे युक्त तथा शत्रुसमुदायसे शून्य यह समृद्धिशालिनी पृथ्वी राजा युधिष्ठिरको दे दो और अनुपम यश प्राप्त करो’॥
स एवमुक्तोऽतिबलो महात्मा चकार बुद्धिं हि वधाय सौतेः ॥ ४८ ॥ स चोदितो भीमजनार्दनाभ्यां स्मृत्वा तथाऽऽत्मानमवेक्ष्य सर्वम् । इहात्मनश्चागमने विदित्वा प्रयोजनं केशवमित्युवाच ॥ ४९ ॥ भीमसेन और श्रीकृष्णके इस प्रकार प्रेरणा देने और कहनेपर अत्यन्त बलशाली महात्मा अर्जुनने सूतपुत्रके वधका विचार किया। उन्होंने अपने स्वरूपका स्मरण करके सब बातोंपर दृष्टिपात किया और इस युद्धभूमिमें अपने आगमनके प्रयोजनको समझकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ ४८-४९ ॥
प्रादुष्करोम्येष महास्त्रमुग्रं शिवाय लोकस्य वधाय सौतेः । तन्मेऽनुजानातु भवान् सुराश्च
ब्रह्मा भवो वेदविदश्च सर्वे ॥ ५० ॥ 'प्रभो! मैं जगत्के कल्याण और सूतपुत्रके वधके लिये अब एक महान् एवं भयंकर अस्त्र प्रकट कर रहा हूँ। इसके लिये आप, ब्रह्माजी, शंकरजी, समस्त देवता तथा सम्पूर्ण ब्रह्मवेत्ता मुझे आज्ञा दें' ॥ ५० ॥
इत्युच्य देवं स तु सव्यसाची
नमस्कृत्या ब्रह्मणे सोऽमितात्मा ।
तदुत्तमं ब्राह्ममसह्यमस्त्रं
प्रादुश्चक्रे मनसा यद् विधेयम् ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर अमितात्मा सव्यसाची अर्जुनने ब्रह्माजीको नमस्कार करके जिसका मनसे ही प्रयोग किया जाता है, उस असह्य एवं उत्तम ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया ॥ ५१ ॥
तदस्य हत्वा विरराज कर्णो
मुक्त्वा शरान् मेघ इवाम्बुधाराः ।
समीक्ष्य कर्णेन किरीटिनस्तु
तथाऽऽजिमध्ये निहतं तदस्त्रम् ॥ ५२ ॥
ततोऽमर्षी बलवान् क्रोधदीप्तो
भीमोऽब्रवीदर्जुनं सत्यसंधम् ।
परंतु जैसे मेघ जलकी धारा गिराता है, उसी प्रकार बाणोंकी बौछारसे कर्ण उस अस्त्रको नष्ट करके बड़ी शोभा पाने लगा। रणभूमिमें किरीटधारी अर्जुनके उस अस्त्रको कर्णद्वारा नष्ट हुआ देख अमर्षशील बलवान् भीमसेन पुनः क्रोधसे जल उठे और सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५२½ ॥
ननु त्वाहर्वेदितारं महास्त्रं
ब्राह्मं विधेयं परमं जनास्तत् ॥ ५३ ॥
तस्मादन्यद् योजय सव्यसाचि-
न्निति स्मोक्तोऽयोजयत् सव्यसाची ।
ततो दिशः प्रदिशश्चापि सर्वाः
समावृणोत् सायकैर्भूरितेजाः ॥ ५४ ॥
गाण्डीवमुक्तैर्भुजगैरि्रवोग्रै-
र्दिवाकरांशुप्रतिमैर्ज्वलद्भिः ।
‘सव्यसाचिन्! सब लोग कहते हैं कि तुम परम उत्तम एवं मनके द्वारा प्रयोग करनेयोग्य
महान् ब्रह्मास्त्रके ज्ञाता हो; इसलिये तुम दूसरे किसी श्रेष्ठ अस्त्रका प्रयोग करो।’ उनके ऐसा
कहनेपर सव्यसाची अर्जुनने दूसरे दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। इससे महातेजस्वी अर्जुनने
अपने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सर्पोंके समान भयंकर और सूर्य-किरणोंके तुल्य तेजस्वी
बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया, कोना-कोना ढक दिया ।। ५३-५४ १/२
।।
सृष्टास्तु बाणा भरतर्षभेण
शतं शतानीव सुवर्णपुङ्खाः ।। ५५ ।।
प्राच्छादयन् कर्णरथं क्षणेन
युगान्तवह्न्यर्ककरप्रकाशाः ।
भरतश्रेष्ठ अर्जुनके छोड़े हुए प्रलयकालीन सूर्य और अग्निकी किरणोंके समान
प्रकाशित होनेवाले दस हजार बाणोंने क्षणभरमें कर्णके रथको आच्छादित कर दिया ।।
ततश्च शूलानि परश्वधानि
चक्राणि नाराचशतानि चैव ।। ५६ ।।
निश्चक्रमुर्घोरतराणि योधा-
स्ततो ह्यहन्यन्त समन्ततोऽपि ।
उस दिव्यास्त्रसे शूल, फरसे, चक्र और सैकड़ों नाराच आदि घोरतर अस्त्र-शस्त्र प्रकट
होने लगे, जिनसे सब ओरके योद्धाओंका विनाश होने लगा ।।
छिन्नं शिरः कस्यचिदाजिमध्ये
पपात योधस्य परस्य कायात् ।। ५७ ।।
भयेन सोऽप्याशु पपात भूमा-
वन्यः प्रणष्टः पतितं विलोक्य ।
अन्यस्य सासिर्निपपात कृत्तो
योधस्य बाहुः करिहस्ततुल्यः ।। ५८ ।।
उस युद्धस्थलमें किसी शत्रुपक्षीय योद्धाका सिर धड़से कटकर धरतीपर गिर पड़ा। उसे
देखकर दूसरा भी भयके मारे धराशायी हो गया। उसको गिरा हुआ देख तीसरा योद्धा
वहाँसे भाग खड़ा हुआ। किसी दूसरे योद्धाकी हाथीकी सूँड़के समान मोटी दाहिनी बाँह
तलवारसहित कटकर गिर पड़ी ।। ५७-५८ ।।
अन्यस्य सव्यः सह वर्मणा च
क्षुरप्रकृत्तः पतितो धरण्याम् ।
एवं समस्तानपि योधमुख्यान्
विध्वंसयामास किरीटमाली ।। ५९ ।।
दूसरेकी बायीं भुजा क्षुरोंद्वारा कवचके साथ कटकर भूमिपर गिर गयी। इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनने शत्रुपक्षके सभी मुख्य-मुख्य योद्धाओंका संहार कर डाला ।।
शरैः शरीरान्तकरैः सुघोरै-
दर्योधनं सैन्यमशेषमेव ।
वैकर्तनेनापि तथाऽऽजिमध्ये
सहस्रशो बाणगणा विसृष्टाः ॥ ६० ॥
उन्होंने शरीरका अन्त कर देनेवाले घोर बाणोंद्वारा दुर्योधनकी सारी सेनाका विध्वंस कर दिया। इसी प्रकार वैकर्तन कर्णने भी समरांगणमें सहस्रों बाणसमूहोंकी वर्षा की ॥ ६० ॥
ते घोषिणः पाण्डवमभ्युपेयुः
पर्जन्यमुक्ता इव वारिधाराः ।
ततः स कृष्णं च किरीटिनं च
वृकोदरं चाप्रतिमप्रभावः ॥ ६१ ॥
त्रिभिस्त्रिभिर्भीमबलो निहत्य
ननाद घोरं महता स्वरेण ।
वे बाण मेघोंकी बरसायी हुई जलधाराओंके समान शब्द करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनको जा लगे। तत्पश्चात् अप्रतिम प्रभावशाली और भयंकर बलवान् कर्णने तीन-तीन बाणोंसे श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनको घायल करके बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ॥ ६१ १/२ ॥
स कर्णबाणाभिहतः किरीटी
भीमं तथा प्रेक्ष्य जनार्दनं च ॥ ६२ ॥
अमृष्यमाणः पुनरेव पार्थः
शरान् दशाष्टौ च समुद्धबर्ह ।
कर्णके बाणोंसे घायल हुए किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुन भीमसेन तथा भगवान् श्रीकृष्णको भी उसी प्रकार क्षत-विक्षत देखकर सहन न कर सके; अतः उन्होंने अपने तरकससे पुनः अठारह बाण निकाले ॥ ६२ १/२ ॥
स केतुमेकेन शरेण विद्ध्वा
शल्यं चतुर्भिस्त्रिभिरेव कर्णम् ॥ ६३ ॥
ततः स मुक्तैर्दशभिर्जघान
सभापतिं काञ्चनवर्मनद्धम् ।
एक बाणसे कर्णकी ध्वजाको बींधकर अर्जुनने चार बाणोंसे शल्यको और तीनसे कर्णको घायल कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने दस बाण छोड़कर सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले सभापति नामक राजकुमारको मार डाला ॥
स राजपुत्रो विशिरा विबाहु-
विर्वाजिसूतो विधनुर्विकेतुः ॥ ६४ ॥ हतो रथाग्रादपतत् स रुग्णः परश्वधैः शाल इवावकृत्तः । वह राजकुमार मस्तक, भुजा, घोड़े, सारथि, धनुष और ध्वजसे रहित हो मरकर रथके अग्रभागसे नीचे गिर पड़ा, मानो फरसोंसे काटा गया शालवृक्ष टूटकर धराशायी हो गया हो ॥ ६४ १/२ ॥
पुनश्च कर्णं त्रिभिरष्टभिश्च द्वाभ्यां चतुर्भिर्दशभिश्च विद्ध्वा ॥ ६५ ॥ चतुःशतान् द्विरदान् सायुधान् वै हत्वा रथानष्टशताञ्जघान । इसके बाद अर्जुनने पुनः तीन, आठ, दो, चार और दस बाणोंद्वारा कर्णको बारंबार घायल करके अस्त्र-शस्त्रधारी सवारोंसहित चार सौ हाथियोंको मारकर आठ सौ रथोंको नष्ट कर दिया ॥ ६५ १/२ ॥
सहस्रशोऽश्वांश्च पुनः स सादी- नष्टौ सहस्राणि च पत्तिवीरान् ॥ ६६ ॥ कर्णं ससूतं सरथं सकेतु- मदृश्यमज्जोगतिभिः प्रचक्रे । तदनन्तर सवारोंसहित हजारों घोड़ों और सहस्रों पैदल वीरोंको मारकर रथ, सारथि और ध्वजसहित कर्णको भी शीघ्रगामी बाणोंद्वारा ढककर अदृश्य कर दिया ॥
अथाक्रोशन् कुरवो वध्यमाना धनंजयेनाधिरथिं समन्तात् ॥ ६७ ॥ मुञ्चाभिविद्ध्यर्जुनमाशु कर्ण बाणैः पुरा हन्ति कुरून् समग्रान् । अर्जुनकी मार खाते हुए कौरव-सैनिक चारों ओरसे कर्णको पुकारने लगे—'कर्ण! शीघ्र बाण छोड़ो और अर्जुनको घायल कर डालो। कहीं ऐसा न हो कि ये पहले ही समस्त कौरवोंका वध कर डालें' ॥ ६७ १/२ ॥
स चोदितः सर्वयत्नेन कर्णो मुमोच बाणान् सुबहूनभीक्ष्णम् ॥ ६८ ॥ ते पाण्डुपञ्चालगणान् निजघ्नु- र्मर्मच्छिदः शोणितपांसुदिग्धाः । इस प्रकार प्रेरणा मिलनेपर कर्णने सारी शक्ति लगाकर बारंबार बहुत-से बाण छोड़े। रक्त और धूलमें सने हुए वे मर्मभेदी बाण पाण्डव और पांचालोंका विनाश करने लगे ॥
तावुत्तमौ सर्वधनुर्धराणां
महाबलौ सर्वसपत्नसाहौ ॥ ६९ ॥
निजघ्नतुश्चाहितसैन्यमुग्र-
मन्योन्यमप्यस्त्रविद्वौ महास्त्रैः।
वे दोनों सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ, महाबली, सारे शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और अस्त्रविद्याके विद्वान् थे; अतः भयंकर शत्रुसेनाको तथा आपसमें भी एक-दूसरेको महान् अस्त्रोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ६९ १/२ ॥
अथोपयातस्त्वरितो दिदृक्षु-
र्मन्त्रौषधीभिर्निरुजो विशल्यः ॥ ७० ॥
कृतः सुहृद्भिर्भिषजां वरिष्ठै-
र्युधिष्ठिरस्तत्र सुवर्णवर्मा ।
तत्पश्चात् शिविरमें हितैषी वैद्यशिरोमणियोंने मन्त्र और ओषधियोंद्वारा राजा युधिष्ठिरके शरीरसे बाण निकालकर उन्हें रोगरहित (स्वस्थ) कर दिया; इसलिये वे बड़ी उतावलीके साथ सुवर्णमय कवच धारण करके वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये ॥ ७० १/२ ॥
तथोपयातं युधि धर्मराजं
दृष्ट्वा मुदा सर्वभूतान्यनन्दन् ॥ ७१ ॥
राहोर्विमुक्तं विमलं समग्रं
चन्द्रं यथैवाभ्युदितं तथैव ।
धर्मराजको युद्धस्थलमें आया हुआ देख समस्त प्राणी बड़ी प्रसन्नताके साथ उनका अभिनन्दन करने लगे। ठीक उसी तरह, जैसे राहुके ग्रहणसे छूटे हुए निर्मल एवं सम्पूर्ण चन्द्रमाको उदित देख सब लोग बड़े प्रसन्न होते हैं ॥
दृष्ट्वा तु मुख्यावथ युध्यमानौ
दिदृक्षवः शूरवरावरिघ्नौ ॥ ७२ ॥
कर्णं च पार्थं च विलोकयन्तः
खस्था महीस्थाश्च जनावतस्थुः ।
परस्पर जूझते हुए उन दोनों शत्रुनाशक एवं प्रधान शूरवीर कर्ण और अर्जुनको देखकर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये आकाश और भूतलमें ठहरे हुए सभी दर्शक अपनी-अपनी जगह स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ७२ १/२ ॥
स कार्मुकज्यातलसंनिपातः
सुमुक्तबाणस्तुमुलो बभूव ॥ ७३ ॥
घ्नतोस्तथान्योन्यमिषुप्रवेकै-
र्धनंजयस्याधिरथेश्च तत्र ।
उस समय वहाँ अर्जुन और कर्ण उत्तम बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे। उनके धनुष, प्रत्यंचा और हथेलीका संघर्ष बड़ा भयंकर होता जा रहा था और उससे उत्तमोत्तम बाण छूट रहे थे ॥ ७३ १/२ ॥
ततो धनुर्ज्यां सहसातिकृष्टा
सुघोषमच्छिद्यत पाण्डवस्य ॥ ७४ ॥
तस्मिन् क्षणे पाण्डवं सूतपुत्रः
समाचिनोत् क्षुद्रकाणां शतेन ।
इसी समय पाण्डुपुत्र अर्जुनके धनुषकी डोरी अधिक खींची जानेके कारण सहसा भारी आवाजके साथ टूट गयी। उस अवसरपर सूतपुत्र कर्णने पाण्डुकुमार अर्जुनको सौ बाण मोर ॥ ७४ १/२ ॥
निर्मुक्तसर्पप्रतिमैरभीक्ष्णं
तैलप्रधौतैः खगपत्रवाजैः ॥ ७५ ॥
षष्ट्या बिभेदाशु च वासुदेव-
मनन्तरं फाल्गुनमष्टभिश्च ।
फिर तेलके धोये और पक्षियोंके पंख लगाये गये, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान भयंकर साठ बाणोंद्वारा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको भी तुरंत ही क्षत-विक्षत कर दिया। इसके बाद पुनः अर्जुनको आठ बाण मारे ॥ ७५ १/२ ॥
पूषात्मजो मर्मसु निर्बिभेद
मरुत्सुतं चायुतशः शराग्र्यैः ॥ ७६ ॥
कृष्णं च पार्थं च तथा ध्वजं च
पार्थानुजान् सोमकान् पातयंश्च ।
तदनन्तर सूर्यकुमार कर्णने दस हजार उत्तम बाणोंद्वारा वायुपुत्र भीमसेनके मर्मस्थानोंपर गहरा आघात किया। साथ ही, श्रीकृष्ण, अर्जुन और उनके रथकी ध्वजाको, उनके छोटे भाइयोंको तथा सोमकोंको भी उसने मार गिरानेका प्रयत्न किया ॥ ७६ १/२ ॥
प्राच्छादयंस्ते विशिखैः पृषत्कै-
र्जीमूतसंघा नभसीव सूर्यम् ॥ ७७ ॥
आगच्छतस्तान् विशिखैरनेकै-
र्व्यष्टम्भयत् सूतपुत्रः कृतास्त्रः ।
तब जैसे मेघोंके समूह आकाशमें सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार सोमकोंने अपने बाणोंद्वारा कर्णको आच्छादित कर दिया; परंतु सूतपुत्र अस्त्रविद्याका महान् पण्डित था, उसने अनेक बाणोंद्वारा अपने ऊपर आक्रमण करते हुए सोमकोंको जहाँ-के-तहाँ रोक दिया ॥
तैरस्तमस्त्रं विनिहत्य सर्वं
जघान तेषां रथवाजिनागान् ॥ ७८ ॥
तथा तु सैन्यप्रवरांश्च राज-
न्नभ्यर्दयन्मार्गणैः सूतपुत्रः ।
राजन्! उनके चलाये हुए सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका नाश करके सूतपुत्रने उनके बहुत-से रथों, घोड़ों और हाथियोंका भी संहार कर डाला और अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके प्रधान-प्रधान योद्धाओंको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥ ७८ १/२ ॥
ते भिन्नदेहा व्यसवो निपेतुः
कर्णेषुभिर्भूमितले स्वनन्तः ॥ ७९ ॥
सिंहेन क्रुद्धेन यथा श्वयूथ्या
महाबला भीमबलेन तद्वत् ।
उन सबके शरीर कर्णके बाणोंसे विदीर्ण हो गये और वे आर्तनाद करते हुए प्राणशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे क्रोधमें भरे हुए भयंकर बलशाली सिंहने कुत्तोंके महाबली समुदायको मार गिराया हो, वही दशा सोमकोंकी हुई ॥
पुनश्च पाञ्चालवरास्तथान्ये
तदन्तरे कर्णधनंजयाभ्याम् ॥ ८० ॥
प्रस्कन्दन्तो बलिना साधुमुक्तैः
कर्णेन बाणैर्निहताः प्रसह्य ।
पांचालोंके प्रधान-प्रधान सैनिक तथा दूसरे योद्धा पुनः कर्ण और अर्जुनके बीचमें आ पहुँचे; परंतु बलवान् कर्णने अच्छी तरह छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबको हठपूर्वक मार गिराया ॥ ८० १/२ ॥
जयं मत्वा विपुलं वै त्वदीया-
स्तलान् निजघ्नुः सिंहनादांश्च नेदुः ॥ ८१ ॥
सर्वे ह्यमन्यन्त वशे कृतौ तौ
कर्णेन कृष्णाविति ते विमर्दे ।
फिर तो आपके सैनिक कर्णकी बड़ी भारी विजय मानकर ताली पीटने और सिंहनाद करने लगे। उन सबने यह समझ लिया कि 'इस युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुन कर्णके वशमें हो गये' ॥ ८१ १/२ ॥
ततो धनुर्ज्यामवनाम्य शीघ्रं
शरानस्तानाधिरथेर्विधम्य ॥ ८२ ॥
सुसंरब्धः कर्णशरक्षताङ्गो
रणे पार्थः कौरवान् प्रत्यगृह्णात् ।
तब कर्णके बाणोंसे जिनका अंग-अंग क्षत-विक्षत हो गया था, उन कुन्तीकुमार अर्जुनने रणभूमिमें अत्यन्त कुपित हो शीघ्र ही धनुषकी प्रत्यंचाको झुकाकर चढ़ा दिया और