महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यमिदमाह जनाधिपः ॥ १५ ॥
अभिद्रव द्रुतं द्रोणं किमु तिष्ठसि पार्षत ।
न पश्यसि भयं द्रोणाद् घोरं नः समुपस्थितम् ॥ १६ ॥
इसके बाद राजाने पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—‘द्रुपदनन्दन! खड़े क्यों हो? तुरंत ही द्रोणाचार्यपर धावा करो। क्या तुम नहीं देखते कि द्रोणकी ओरसे हमलोगोंपर घोर भय उपस्थित हो गया है? ॥ १५-१६ ॥
असौ द्रोणो महेष्वासो युयुधानेन संयुगे ।
क्रीडते सूत्रबद्धेन पक्षिणा बालको यथा ॥ १७ ॥
‘जैसे कोई बालक डोरमें बँधे हुए पक्षीके साथ खेलता है, उसी प्रकार ये महाधनुर्धर द्रोण युद्धस्थलमें युयुधानके साथ क्रीड़ा करते हैं ॥ १७ ॥
तत्रैव सर्वे गच्छन्तु भीमसेनपुरोगमाः ।
त्वयैव सहिताः सर्वे युयुधानरथं प्रति ॥ १८ ॥
‘अतः तुम्हारे साथ भीमसेन आदि सभी महारथी वहीं युयुधानके रथके समीप जाएँ ॥ १८ ॥
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि त्वामहं सहसैनिकः ।
सात्यकिं मोक्षयस्वाद्य यमदंष्ट्रान्तरं गतम् ॥ १९ ॥
‘फिर मैं भी सम्पूर्ण सैनिकोंके साथ तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगा। इस समय यमराजकी दाढ़ोंमें पहुँचे हुए सात्यकिको छुड़ाओ’ ॥ १९ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजा सर्वसैन्येन भारत ।
अभ्यद्रवद् रणे द्रोणं युयुधानस्य कारणात् ॥ २० ॥
‘भारत! ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने उस समय रणक्षेत्रमें युयुधानकी रक्षाके लिये अपनी सारी सेनाके साथ द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ॥ २० ॥
तत्रारावो महानासीद् द्रोणमेकं युयुत्सताम् ।
पाण्डवानां च भद्रं ते सृञ्जयानां च सर्वशः ॥ २१ ॥
राजन्! आपका भला हो। अकेले द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे आये हुए पाण्डवों और सृञ्जयोंका वहाँ सब ओर महान् कोलाहल छा गया ॥ २१ ॥
ते समेत्य नरव्याघ्रा भारद्वाजं महारथम् ।
अभ्यवर्षन् शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥ २२ ॥
वे मनुष्योंमें व्याघ्रके समान पराक्रमी सैनिक महारथी द्रोणाचार्यके पास जाकर कंक और मोरके पंखोंसे युक्त तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २२ ॥
स्मयन्नेव तु तान् वीरान् द्रोणः प्रत्यग्रहीत् स्वयम् ।
अतिथीनागतान् यद्वत् सलिलेनासनेन च ॥ २३ ॥
तर्पितास्ते शरैस्तस्य भारद्वाजस्य धन्विनः ।
आतिथेयं गृहं प्राप्य नृपतेऽतिथयो यथा ॥ २४ ॥ राजन्! जैसे घरपर आये हुए अतिथियोंका जल और आसन आदिके द्वारा सत्कार किया जाता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने स्वयं उन समस्त आक्रमणकारी वीरोंकी मुसकराते हुए ही अगवानी की। जैसे अतिथिसत्कारमें निपुण गृहस्थके घर जाकर अतिथि तृप्त होते हैं, उसी प्रकार धनुर्धर द्रोणाचार्यके बाणोंसे उन सबकी यथेष्ट तृप्ति की गयी ॥ २३-२४ ॥
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतीविक्षितुम् । मध्यंदिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो ॥ २५ ॥ प्रभो! जैसे दोपहरके प्रचण्ड मार्तण्डकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार वे समस्त योद्धा भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यकी ओर देखनेमें भी समर्थ न हो सके ॥ २५ ॥
तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । अतापयच्छरव्रतैर्गभस्तिभिरिवांशुमान् ॥ २६ ॥ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य उन समस्त महाधनुर्धरोंको अपने बाणसमूहोंद्वारा उसी प्रकार संतप्त करने लगे, जैसे अंशुमाली सूर्य अपनी किरणोंसे जगत्को संताप देते हैं ॥ २६ ॥
वध्यमाना महाराज पाण्डवाः सृञ्जयास्तथा । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्कमग्ना इव द्विपाः ॥ २७ ॥ महाराज! उस समय द्रोणाचार्यकी मार खाते हुए पाण्डव और सृंजय सैनिक कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके समान कोई रक्षक न पा सके ॥ २७ ॥
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः । गभस्तय इवार्कस्य प्रतपन्तः समन्ततः ॥ २८ ॥ जैसे सूर्यकी किरणें सब ओर ताप प्रदान करती हुई फैल जाती हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके विशाल बाण सब ओर फैलते और शत्रुओंको संतप्त करते दिखायी देते थे ॥ २८ ॥
तस्मिन् द्रोणेन निहताः पञ्चालाः पञ्चविंशतिः । महारथाः समाख्याता धृष्टद्युम्नस्य सम्मताः ॥ २९ ॥ उस युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा पांचालोंके पचीस सुप्रसिद्ध महारथी मारे गये जो धृष्टद्युम्नको बहुत ही प्रिय थे ॥ २९ ॥
पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पञ्चालानां तथैव च । द्रोणं स्म ददृशुः शूरं विनिघ्नन्तं वरान् वरान् ॥ ३० ॥ लोगोंने देखा, पाण्डवों और पांचालोंकी समस्त सेनाओंमें जो मुख्य-मुख्य योद्धा हैं, उन्हें शूरवीर द्रोणाचार्य चुन-चुनकर मार रहे हैं ॥ ३० ॥
केकयानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः । द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३१ ॥
महाराज! सौ केकययोद्धाओंको मारकर शेष सैनिकोंको चारों ओर खदेड़नेके पश्चात् द्रोणाचार्य मुँह बाये हुए यमराजके समान खड़े हो गये ॥ ३१ ॥ पञ्चालान् सृञ्जयान् मत्स्यान् केकयांश्च नराधिप । द्रोणोऽजयन्महाबाहुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३२ ॥ नरेश्वर! महाबाहु द्रोणाचार्यने पांचाल, सृंजय, मत्स्य और केकयोंके सैकड़ों तथा सहस्रों वीरोंको परास्त किया ॥ ३२ ॥ तेषां समभवच्छब्दो विद्धानां द्रोणसायकैः । वनौकसामिवारण्ये व्याप्तानां धूम्रकेतुना ॥ ३३ ॥ जैसे घोर जंगलमें दावानलसे व्याप्त हुए वनवासी जन्तुओंकी क्रन्दनध्वनि सुनायी पड़ती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके बाणोंसे घायल हुए उन विपक्षी योद्धाओंका आर्तनाद वहाँ श्रवणगोचर होता था ॥ ३३ ॥ तत्र देवाः सगन्धर्वाः पितरश्चाब्रुवन् नृप । एते द्रवन्ति पञ्चालाः पाण्डवाश्च ससैनिकाः ॥ ३४ ॥ नरेश्वर! उस समय वहाँ आकाशमें खड़े हुए देवता, पितर और गन्धर्व कहते थे, ये पांचाल और पाण्डव अपने सैनिकोंके साथ भागे जा रहे हैं ॥ ३४ ॥ तं तथा समरे द्रोणं निघ्नन्तं सोमकान् रणे । न चाप्यभिययुः केचिदपरे नैव विव्यधुः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार समरांगणमें सोमकोंका वध करते हुए द्रोणाचार्यके सामने न तो कोई जा सके और न कोई उन्हें चोट ही पहुँचा सके ॥ ३५ ॥ वर्तमाने तथा रौद्रे तस्मिन् वीरवरक्षये । अशृणोत् सहसा पार्थः पाञ्चजन्यस्य निःस्वनम् ॥ ३६ ॥ बड़े-बड़े वीरोंका संहार करनेवाला वह भयंकर संग्राम चल ही रहा था कि सहसा कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने पांचजन्यकी ध्वनि सुनी ॥ ३६ ॥ पूरितो वासुदेवेन शङ्खराट् स्वनते भृशम् । युध्यमानेषु वीरेषु सैन्धवस्याभिरक्षिषु ॥ ३७ ॥ नदत्सु धार्तराष्ट्रेषु विजयस्य रथं प्रति । गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रणष्टे समन्ततः ॥ ३८ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके फूँकनेपर वह शंखराज पांचजन्य बड़े जोरसे अपनी ध्वनिका विस्तार कर रहा था। सिन्धुराज जयद्रथकी रक्षामें नियुक्त हुए वीरगण युद्धमें संलग्न थे। अर्जुनके रथके पास आपके पुत्र और सैनिक गरज रहे थे तथा गाण्डीव धनुषकी टंकार सब ओरसे दब गयी थी ॥ ३७-३८ ॥ कश्मलाभिहतो राजा चिन्तयामास पाण्डवः । न नूनं स्वस्ति पार्थाय यथा नदति शङ्खराट् ॥ ३९ ॥
कौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर मोहके वशीभूत होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'जिस प्रकार शंखराज पांचजन्यकी ध्वनि हो रही है और जिस तरह कौरव-सैनिक बारंबार हर्षनाद कर रहे हैं, उससे जान पड़ता है, निश्चय ही अर्जुनकी कुशल नहीं है' ।। ३९ १/२ ।।
एवं स चिन्तयित्वा तु व्याकुलेनान्तरात्मना ।। ४० ।। अजातशत्रुः कौन्तेयः सात्वतं प्रत्यभाषत । बाष्पगद्गदया वाचा मुह्यमानो मुहुर्मुहुः । कृतस्यानन्तरापेक्षी शैनेयं शिनिपुङ्गवम् ।। ४१ ।। ऐसा विचारकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरका हृदय व्याकुल हो उठा। वे चाहते थे कि जयद्रथवधका कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो जाय; अतः बारंबार मोहित हो अश्रुगद्गद वाणीमें शिनिप्रवर सात्यकिको सम्बोधित करके बोले ।। ४०-४१ ।।
युधिष्ठिर उवाच
यः स धर्मः पुरा दृष्टः सद्भिः शैनेय शाश्वतः । साम्पराये सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽयमागतः ।। ४२ ।। **युधिष्ठिरने कहा—**शैनेय! साधु पुरुषोंने पूर्वकालमें विपत्तिके समय एक सुहृद्के कर्तव्यके विषयमें जिस सनातन धर्मका साक्षात्कार किया है, आज उसीके पालनका अवसर उपस्थित हुआ है ।। ४२ ।।
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयन् शिनिपुङ्गव । त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ।। ४३ ।। शिनिप्रवर सात्यके! इस दृष्टिसे विचार करनेपर मैं समस्त योद्धाओंमें किसीको भी तुमसे बढ़कर अपना अतिशय सुहृत् नहीं समझ पाता हूँ ।। ४३ ।।
यो हि प्रीतमना नित्यं यश्च नित्यमनुव्रतः । स कार्ये साम्पराये तु नियोज्य इति मे मतिः ।। ४४ ।। जो सदा प्रसन्नचित्त रहता हो तथा जो नित्य-निरन्तर अपने प्रति अनुराग रखता हो, उसीको संकटकालमें किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका सम्पादन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये, ऐसा मेरा मत है ।। ४४ ।।
यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां परायणम् । तथा त्वमपि वार्ष्णेय कृष्णतुल्यपराक्रमः ।। ४५ ।। वार्ष्णेय! जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पाण्डवोंके परम आश्रय हैं, उसी प्रकार तुम भी हो। तुम्हारा पराक्रम भी श्रीकृष्णके समान ही है ।। ४५ ।।
सोऽहं भारं समाधास्ये त्वयि तं वोढुमर्हसि ।
अभिप्रायं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमर्हसि ॥ ४६ ॥ अतः मैं तुमपर जो कार्यभार रख रहा हूँ, उसका तुम्हें निर्वाह करना चाहिये। मेरे मनोरथको सदा सफल बनानेकी ही तुम्हें चेष्टा करनी चाहिये ॥ ४६ ॥ स त्वं भ्रातुर्वयस्यस्य गुरोरपि च संयुगे । कुरु कृच्छ्रे सहायार्थमर्जुनस्य नरर्षभ ॥ ४७ ॥ नरश्रेष्ठ! अर्जुन तुम्हारा भाई, मित्र और गुरु है। वह युद्धके मैदानमें संकटमें पड़ा हुआ है। अतः तुम उसकी सहायताके लिये प्रयत्न करो ॥ ४७ ॥ त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभयङ्करः । लोके विख्यायसे वीर कर्मभिः सत्यवागिति ॥ ४८ ॥ तुम सत्यव्रती, शूरवीर तथा मित्रोंको अभय देनेवाले हो। वीर! तुम अपने कर्मोंद्वारा संसारमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हो ॥ ४८ ॥ यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् । पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥ ४९ ॥ शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ॥ ४९ ॥ श्रुताश्च बहवोऽस्माभी राजानो ये दिवं गताः । दत्त्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥ ५० ॥ हमने सुना है कि बहुत-से राजा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक इस समूची पृथ्वीका दान करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ५० ॥ एवं त्वामपि धर्मात्मन् प्रयाचेऽहं कृताञ्जलिः । पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ॥ ५१ ॥ धर्मात्मन्! इसी प्रकार तुमसे भी मैं अर्जुनकी सहायताके लिये हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। प्रभो! ऐसा करनेसे तुम्हें पृथ्वीदानके समान अथवा उससे भी अधिक फल प्राप्त होगा ॥ ५१ ॥ एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयङ्करः । रणे संत्यजति प्राणान् द्वितीयस्त्वं च सात्यके ॥ ५२ ॥ सात्यके! मित्रोंको अभय प्रदान करनेवाले एक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही सदा हमारे लिये युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं और दूसरे तुम ॥ ५२ ॥ विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थयतो यशः । शूर एव सहायः स्यान्नेतरः प्राकृतो जनः ॥ ५३ ॥ युद्धमें सुयश पानेकी इच्छा रखकर पराक्रम करनेवाले वीर पुरुषकी सहायता कोई शूरवीर पुरुष ही कर सकता है। दूसरा कोई निम्न कोटिका मनुष्य उसका सहायक नहीं हो सकता ॥ ५३ ॥
ईदृशे तु परामर्दे वर्तमानस्य माधव । त्वदन्यो हि रणे गोप्ता विजयस्य न विद्यते ॥ ५४ ॥ माधव! ऐसे घोर युद्धमें लगे हुए रणक्षेत्रमें अर्जुनका सहायक एवं संरक्षक होनेयोग्य तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ ५४ ॥ श्लाघन्नेव हि कर्माणि शतशस्तव पाण्डवः । मम संजनयन् हर्षं पुनः पुनरकीर्तयत् ॥ ५५ ॥ पाण्डुपुत्र अर्जुनने तुम्हारे सैकड़ों कार्योंकी प्रशंसा करते और मेरा हर्ष बढ़ाते हुए बारंबार तुम्हारे गुणोंका वर्णन किया था ॥ ५५ ॥ लघुहस्तश्चित्रयोधी तथा लघुपराक्रमः । प्राज्ञः सर्वास्त्रविच्छूरो मुह्यते न च संयुगे ॥ ५६ ॥ वह कहता था—'सात्यकिके हाथोंमें बड़ी फुर्ती है। वह विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला और शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाला है। सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता, विद्वान् एवं शूरवीर सात्यकि युद्धस्थलमें कभी मोहित नहीं होता है ॥ ५६ ॥ महास्कन्धो महोरस्को महाबाहुर्महाहनुः । महाबलो महावीर्यः स महात्मा महारथः ॥ ५७ ॥ 'उसके कंधे महान्, छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और ठोढ़ी विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट हैं। वह महाबली, महापराक्रमी, महामनस्वी और महारथी है ॥ ५७ ॥ शिष्यो मम सखा चैव प्रियोऽस्याहं प्रियश्च मे । युयुधानः सहायो मे प्रमथिष्यति कौरवान् ॥ ५८ ॥ 'सात्यकि मेरा शिष्य और सखा है। मैं उसको प्रिय हूँ और वह मुझे। युयुधान मेरा सहायक होकर मेरे विपक्षी कौरवोंका संहार कर डालेगा ॥ ५८ ॥ अस्मदर्थं च राजेन्द्र संनह्येद् यदि केशवः । रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्युम्नो वा महारथः ॥ ५९ ॥ गदो वा सारणो वापि साम्बो वा सह वृष्णिभिः । सहायार्थं महाराज संग्रामोत्तममूर्धनि ॥ ६० ॥ तथाप्यहं नरव्याघ्रं शैनेयं सत्यविक्रमम् । साहाय्ये विनियोक्ष्यामि नास्ति मेऽन्यो हि तत्समः ॥ ६१ ॥ 'राजेन्द्र! महाराज! यदि युद्धके श्रेष्ठ मुहानेपर हमारी सहायताके लिये भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्ध, महारथी प्रद्युम्न, गद, सारण अथवा वृष्णिवंशियोंसहित साम्ब कवच धारण करके तैयार होंगे, तो भी मैं पुरुषसिंह सत्यपराक्रमी शिनिपौत्र सात्यकिको अवश्य ही अपनी सहायताके कार्यमें नियुक्त करूँगा; क्योंकि मेरी दृष्टिमें दूसरा कोई सात्यकिके समान नहीं है' ॥ ५९—६१ ॥ इति द्वैतवने तात मामुवाच धनंजयः ।
परोक्षे त्वद्गुणांस्तथ्यान् कथयन्नार्यसंसदि ॥ ६२ ॥ तात! इस प्रकार अर्जुनने द्वैतवनमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सभामें तुम्हारे यथार्थ गुणोंका वर्णन करते हुए परोक्षमें मुझसे उपर्युक्त बातें कही थीं ॥ ६२ ॥
तस्य त्वमेवं संकल्पं न वृथा कर्तुमर्हसि । धनंजयस्य वार्ष्णेय मम भीमस्य चोभयोः ॥ ६३ ॥ वार्ष्णेय! अर्जुनका, मेरा, भीमसेनका तथा दोनों माद्रीकुमारोंका तुम्हारे विषयमें जो वैसा संकल्प है, उसे तुम्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिये ॥ ६३ ॥
यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति । तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान् ॥ ६४ ॥ जब मैं तीर्थोंमें विचरता हुआ द्वारकामें गया था, वहाँ भी अर्जुनके प्रति जो तुम्हारा भक्तिभाव है, उसे मैंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ६४ ॥
न तत् सौहृदमन्येषु मया शैनेय लक्षितम् । यथा त्वमस्मान् भजसे वर्तमानानपुप्लवे ॥ ६५ ॥ शैनेय! इस विनाशकारी संकटमें पड़े हुए हमलोगोंकी तुम जिस प्रकार सेवा एवं सहायता कर रहे हो, वैसा सौहार्द मैंने तुम्हारे सिवा दूसरोंमें नहीं देखा है ॥ ६५ ॥
सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च । सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥ ६६ ॥ सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च । अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ६७ ॥ महाबाहु महाधनुर्धर माधव! वही तुम हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये ही उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण, अर्जुनके प्रति भक्तिभाव, मैत्री, गुरुभाव, सौहार्द, पराक्रम, कुलीनता और सत्यके अनुरूप कर्म करो ॥ ६६-६७ ॥
सुयोधनो हि सहसा गतो द्रोणेन दंशितः । पूर्वमेवानुयातास्ते कौरवाणां महारथाः ॥ ६८ ॥ द्रोणाचार्यद्वारा दी गयी कवचधारणासे सुरक्षित हो दुर्योधन सहसा अर्जुनका सामना करनेके लिये गया है। बहुतेरे कौरव महारथियोंने पहलेसे ही उसका पीछा किया था ॥ ६८ ॥
सुमहान् निनदश्चैव श्रूयते विजयं प्रति । स शैनेय जवेनाशु गन्तुमर्हसि मानद ॥ ६९ ॥ जहाँ अर्जुन हैं, उस ओर बड़े जोरकी गर्जना सुनायी दे रही है। अतः दूसरोंको मान देनेवाले शैनेय! तुम्हें शीघ्रतापूर्वक बड़े वेगसे वहाँ जाना चाहिये ॥ ६९ ॥
भीमसेनो वयं चैव संयत्ताः सहसैनिकाः । द्रोणमावारयिष्यामो यदि त्वां प्रति यास्यति ॥ ७० ॥
भीमसेन और हमलोग अपने सैनिकोंके साथ सब प्रकारसे सावधान हैं। यदि द्रोणाचार्य तुम्हारा पीछा करेंगे तो हम सब लोग उन्हें रोकेंगे ॥ ७० ॥ पश्य शैनेय सैन्यानि द्रवमाणानि संयुगे । महान्तं च रणे शब्दं दीर्यमाणां च भारतीम् ॥ ७१ ॥ शैनेय! वह देखो, उधर युद्धस्थलमें सेनाएँ भाग रही हैं। रणक्षेत्रमें महान् कोलाहल हो रहा है और मोरचेबंदी करके खड़ी हुई कौरवी सेनामें दरारें पड़ रही हैं ॥ ७१ ॥ महामारुतवेगेन समुद्रमिव पर्वसु । धार्तराष्ट्रबलं तात विक्षिप्तं सव्यसाचिना ॥ ७२ ॥ तात! पूर्णिमाके दिन प्रचण्ड वायुके वेगसे विक्षुब्ध हुए समुद्रके समान सव्यसाची अर्जुनके द्वारा पीड़ित हुई दुर्योधनकी सेनामें हलचल मच गयी है ॥ ७२ ॥ रथैर्विपरिधावद्भिर्मनुष्यैश्च हयैश्च ह । सैन्यं रजःसमुद्भूतमेतत् सम्परिवर्तते ॥ ७३ ॥ इधर-उधर भागते हुए रथों, मनुष्यों और घोड़ोंके द्वारा उड़ी हुई धूलसे आच्छादित हुई यह सारी सेना चक्कर काट रही है ॥ ७३ ॥ संवृतः सिन्धुसौवीरैर्नखरप्रासयोधिभिः । अत्यन्तोपचितैः शूरैः फाल्गुनः परवीरहा ॥ ७४ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अर्जुन, नखर (बघनखे) और प्रासोंद्वारा युद्ध करनेवाले तथा अधिक संख्यामें एकत्र हुए सिन्धु-सौवीर देशके शूरवीर सैनिकोंसे घिर गया है ॥ ७४ ॥ नैतद् बलमसंवार्य शक्यो जेतुं जयद्रथः । एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे संत्यक्तजीविताः ॥ ७५ ॥ इस सेनाका निवारण किये बिना जयद्रथको जीतना असम्भव है। ये सभी सैनिक सिन्धुराजके लिये अपना जीवन न्यौछावर कर चुके हैं ॥ ७५ ॥ शरशक्तिध्वजवरं हयनागसमाकुलम् । पश्यैतद् धार्तराष्ट्राणामनीकं सुदुरासदम् ॥ ७६ ॥ बाण, शक्ति और ध्वजाओंसे सुशोभित तथा घोड़े और हाथियोंसे भरी हुई कौरवोंकी इस दुर्जय सेनाको देखो ॥ ७६ ॥ शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दांश्च पुष्कलान् । सिंहनादरवांश्चैव रथनेमिस्वनांस्तथा ॥ ७७ ॥ सुनो, डंकोंकी आवाज हो रही है, जोर-जोरसे शंख बज रहे हैं, वीरोंके सिंहनाद तथा रथोंके पहियोंकी घर्घरहाटके शब्द सुनायी पड़ रहे हैं ॥ ७७ ॥ नागानां शृणु शब्दं च पत्तीनां च सहस्रशः । सादिनां द्रवतां चैव शृणु कम्पयतां महीम् ॥ ७८ ॥
हाथियोंके चिग्घाड़नेकी आवाज सुनो। सहस्रों पैदल सिपाहियों तथा पृथ्वीको कम्पित करते हुए दौड़ लगानेवाले घुड़सवारोंके शब्द सुन लो॥ ७८॥ पुरस्तात् सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठतः। बहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडयेत्॥ ७९॥ नरव्याघ्र! अर्जुनके सामने सिन्धुराजकी सेना है और पीछे द्रोणाचार्यकी। इसकी संख्या इतनी अधिक है कि यह देवराज इन्द्रको भी पीड़ित कर सकती है॥ ७९॥ अपर्यन्ते बले मग्नो जह्यादपि च जीवितम्। तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत् मादृशः॥ ८०॥ सर्वथाहमनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं त्वयि जीवति। इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा। युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे-जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते-जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ॥ ८० १/२॥ श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः॥ ८१॥ लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम्। सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्चातिवर्तते॥ ८२॥ निद्राविजयी पाण्डुकुमार अर्जुन श्यामवर्णवाला दर्शनीय तरुण है। वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाता और विचित्र रीतिसे युद्ध करता है। तात! उस महाबाहु वीरने सूर्योदयके समय अकेले ही कौरवी-सेनामें प्रवेश किया था और अब दिन बीतता चला जा रहा है॥ ८१-८२॥ तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा न वा। कुरूणां चापि तत् सैन्यं सागरप्रतिमं महत्॥ ८३॥ एक एव च बीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम्। अविषह्यां महाबाहुः सुरैरपि महाहवे॥ ८४॥ वार्ष्णेय! पता नहीं, इस समयतक अर्जुन जीवित है या नहीं। महासमरमें जिसके वेगको सहन करना देवताओंके लिये भी असम्भव है, कौरवोंकी वह सेना समुद्रके समान विशाल है, तात! उस कौरवी-सेनामें महाबाहु अर्जुनने अकेले ही प्रवेश किया है॥ ८३-८४॥ न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन। द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम्॥ ८५॥ आज किसी प्रकार मेरी बुद्धि युद्धमें नहीं लग रही है। इधर द्रोणाचार्य भी युद्धस्थलमें बड़े वेगसे आक्रमण करके मेरी सेनाको पीड़ित कर रहे हैं॥ ८५॥ प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथासौ चरति द्विजः। युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः॥ ८६॥
महाबाहो! विप्रवर द्रोणाचार्य जैसा कार्य कर रहे हैं, वह सब तुम्हारी आँखोंके सामने है। एक ही समय प्राप्त हुए अनेक कार्योंमेंसे किसका पालन आवश्यक है, इसका निर्णय करनेमें तुम कुशल हो॥ ८६॥ महार्थं लघुसंयुक्तं कर्तुमर्हसि मानद। तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन्मतं महत्॥ ८७॥ अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे। मानद! सबसे महान् प्रयोजनको तुम्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये। मुझे तो सब कार्योंमें सबसे महान् कार्य यही जान पड़ता है कि युद्धस्थलमें अर्जुनकी रक्षा की जाय॥ ८७ १/२॥ नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः पतिम्॥ ८८॥ स हि शक्तो रणे तात त्रींल्लोकानपि संगतान्। विजेतुं पुरुषव्याघ्रः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ८९॥ किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य बलमेतत् सुदुर्बलम्। तात! मैं दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके लिये शोक नहीं करता। वे तो सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक और स्वामी हैं। युद्धस्थलमें तीनों लोक संगठित होकर आ जायँ तो भी वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण उन सबको परास्त कर सकते हैं, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। फिर दुर्योधनकी इस अत्यन्त दुर्बल सेनाको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ८८-८९ १/२॥ अर्जुनस्त्वेष वार्ष्णेय पीडितो बहुभिर्युधि॥ ९०॥ प्रजह्यात् समरे प्राणांस्तस्माद् विन्दामि कश्मलम्। परंतु वार्ष्णेय! यह अर्जुन तो युद्धस्थलमें बहुसंख्यक सैनिकोंद्वारा पीड़ित होनेपर समरांगणमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा। इसीलिये मैं शोक और दुःखमें डूबा जा रहा हूँ॥ ९० १/२॥ तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वादृशा यथा॥ ९१॥ तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदितः। अतः तुम मेरे-जैसे मनुष्यसे प्रेरित हो ऐसे संकटके समय अर्जुन-जैसे प्रिय सखाके पथका अनुसरण करो, जैसा कि तुम्हारे-जैसे वीर पुरुष किया करते हैं॥ ९१ १/२॥ रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथी स्मृतौ॥ ९२॥ प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः। सात्वत! वृष्णिवंशी प्रमुख वीरोंमें रणक्षेत्रके लिये दो ही व्यक्ति अतिरथी माने गये हैं—एक तो महाबाहु प्रद्युम्न और दूसरे सुविख्यात वीर तुम॥ ९२ १/२॥ अस्त्रे नारायणसमः संकर्षणसमो बले॥ ९३॥ वीरतायां नरव्याघ्र धनंजयसमो ह्यसि।
नरव्याघ्र! तुम अस्त्रविद्याके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णके समान, बलमें बलरामजीके तुल्य और वीरतामें धनंजयके समान हो ॥ ९३ १/२ ॥
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम् ॥ ९४ ॥
त्वामेव पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ।
इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ॥ ९४ १/२ ॥
(सदेवासुरगन्धर्वान् सकिन्नरमहोरगान् ।
योधयेत् स जगत् सर्वं विजयेत रिपून् बहून् ॥
इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणान् सदा ।
समागमेषु जल्पन्ति पृथगेव च सर्वदा ॥)
जब अच्छे पुरुषोंका समाज जुटता है, उस समय उसमें आये हुए सब लोग संसारमें तुम्हारे गुणोंको सदा-सर्वदा सबसे विलक्षण ही बतलाते हैं। उनका कहना है कि सात्यकि देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर तथा बड़े-बड़े नागोंसहित बहुसंख्यक शत्रुओंपर विजय पा सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्से अकेले ही युद्ध कर सकते हैं।
नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव ॥ ९५ ॥
तत् त्वां यदभिवक्ष्यामि तत् कुरुष्व महाबल ।
सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ९६ ॥
नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमर्हसि ।
परित्यज्य प्रियान् प्राणान् रणे चर विभीतवत् ॥ ९७ ॥
माधव! लोग कहते हैं कि संसारमें सात्यकिके लिये कोई कार्य असाध्य नहीं है। महाबली वीर! सब लोगोंकी तथा मेरी और अर्जुनकी—दोनों भाइयोंकी तुम्हारे विषयमें बड़ी उत्तम भावना है। अतः मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसका पालन करो। महाबाहो! तुम हमारी पूर्वोक्त धारणाको बदल न देना। समरांगणमें प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भयके समान विचरो ॥ ९५—९७ ॥
न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ।
अयुद्धमनवस्थानं संग्रामे च पलायनम् ॥ ९८ ॥
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवितः ।
शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं। युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है। दशार्हकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं ॥ ९८ १/२ ॥
तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव ॥ ९९ ॥
वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ।
तात! शिनिप्रवर! धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारा गुरु है तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे और बुद्धिमान् अर्जुनके भी गुरु हैं ।। ९९ १/२ ।।
कारणद्वयमेतद्धि जानंस्वामहमनुब्रुवम् ।। १०० ।।
मावमंस्था वचो मह्यं गुरुस्तव गुरोर्ह्यहम् ।
इन दोनों कारणोंको जानकर मैं तुमसे इस कार्यके लिये कह रहा हूँ। तुम मेरी बातकी अवहेलना न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु हूँ ।। १०० १/२ ।।
वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च ।। १०१ ।।
सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनंजयः ।
तुम्हारा वहाँ जाना भगवान् श्रीकृष्णको, मुझको तथा अर्जुनको भी प्रिय है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात कही है। अतः जहाँ अर्जुन है, वहाँ जाओ ।। १०१ १/२ ।।
एतद् वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम ।। १०२ ।।
प्रविशैतद् बलं तात धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ।
सत्यपराक्रमी वत्स! तुम मेरी इस बातको मानकर दुर्बुद्धि दुर्योधनकी इस सेनामें प्रवेश करो ।। १०२ १/२ ।।
प्रविश्य च यथान्यायं संगम्य च महारथैः ।
यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय ।। १०३ ।।
सात्वत! इसमें प्रवेश करके यथायोग्य सब महारथियोंसे मिलकर युद्धमें अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ ।। १०३ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं)
सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
संजय उवाच
प्रीतियुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च ।
कालयुक्तं च चित्रं च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम् ॥ १ ॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! धर्मराजका वह वचन प्रेमपूर्ण, मनको प्रिय लगनेवाला, मधुर अक्षरोंसे युक्त, सामयिक, विचित्र, कहनेयोग्य तथा न्यायसंगत था। भरतश्रेष्ठ! उसे सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिने युधिष्ठिरको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १-२ ॥
श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मयाच्युत ।
न्याययुक्तं च चित्रं च फाल्गुनार्थे यशस्करम् ॥ ३ ॥
‘अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! आपने अर्जुनकी सहायताके लिये जो-जो बातें कही हैं, वह सब मैंने सुन लीं। आपका कथन अद्भुत, न्यायसंगत और यशकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३ ॥
एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सम्मतम् ।
वक्तुमर्हसि राजेन्द्र यथा पार्थं तथैव माम् ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! ऐसे समयमें मेरे-जैसे प्रिय व्यक्तिको देखकर आप जैसी बात कह सकते हैं, वैसी ही कही है। आप अर्जुनसे जो कुछ कह सकते हैं, वही आपने मुझसे भी कहा है ॥ ४ ॥
न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथंचन ।
त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ॥ ५ ॥
‘महाराज! अर्जुनके हितके लिये मुझे किसी प्रकार भी अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता नहीं करनी है; फिर आपका आदेश मिलनेपर मैं इस महायुद्धमें क्या नहीं कर सकता हूँ? ॥ ५ ॥
लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम् ।
त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रह किमुतैतत् सुदुर्बलम् ॥ ६ ॥
‘नरेन्द्र! आपकी आज्ञा हो तो देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित तीनों लोकोंके साथ मैं युद्ध कर सकता हूँ। फिर यहाँ इस अत्यन्त दुर्बल कौरवी सेनाका सामना करना कौन बड़ी बात है? ॥ ६ ॥
सुयोधनबलं त्वद्य योधयिष्ये समन्ततः ।
विजेष्ये च रणे राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
'राजन्! मैं रणक्षेत्रमें आज चारों ओर घूमकर दुर्योधनकी सेनाके साथ युद्ध करूँगा और उसपर विजय पाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ७ ॥
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनंजयम् ।
हते जयद्रथे राजन् पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ८ ॥
'राजन्! मैं कुशलपूर्वक रहकर सकुशल अर्जुनके पास पहुँच जाऊँगा और जयद्रथके मारे जानेपर उनके साथ ही आपके पास लौट आऊँगा ॥ ८ ॥
अवश्यं तु मया सर्वं विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप ।
वासुदेवस्य यद् वाक्यं फाल्गुनस्य च धीमतः ॥ ९ ॥
'परंतु नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण तथा बुद्धिमान् अर्जुनने युद्धके लिये जाते समय मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब आपको सूचित कर देना मेरे लिये अत्यन्त आवश्यक है ॥ ९ ॥
दृढं त्वभिपरीतोऽहमर्जुनेन पुनः पुनः ।
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ १० ॥
'अर्जुनने सारी सेनाके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए मुझे बारंबार कहकर दृढ़तापूर्वक बाँध लिया है ॥
अद्य माधव राजानमप्रमत्तोऽनुपालय ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा यावद्धन्मि जयद्रथम् ॥ ११ ॥
'उन्होंने कहा था—'माधव! आज मैं जबतक जयद्रथका वध करता हूँ, तबतक युद्धमें तुम श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पूरी सावधानीके साथ राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो ॥ ११ ॥
त्वयि चाहं महाबाहो प्रद्युम्ने वा महारथे ।
नृपं निक्षिप्य गच्छेयं निरपेक्षो जयद्रथम् ॥ १२ ॥
'महाबाहो! मैं तुमपर अथवा महारथी प्रद्युम्नपर ही भरोसा करके राजाको धरोहरकी भाँति सौंपकर निरपेक्षभावसे जयद्रथके पास जा सकता हूँ ॥ १२ ॥
जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठसम्मतम् ।
प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ॥ १३ ॥
'माधव! तुम जानते ही हो कि रणक्षेत्रमें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित आचार्य द्रोण कितने वेगशाली हैं। उन्होंने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी तुम प्रतिदिन सुनते ही होगे ॥ १३ ॥
ग्रहणे धर्मराजस्य भारद्वाजोऽपि गृध्यति ।
शक्तश्चापि रणे द्रोणो निग्रहीतुं युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
'द्रोणाचार्य भी धर्मराजको बंदी बनाना चाहते हैं और वे समरांगणमें राजा युधिष्ठिरको कैद करनेमें समर्थ भी हैं ॥ १४ ॥
एवं त्वयि समाधाय धर्मराजं नरोत्तमम् ।
अहमद्य गमिष्यामि सैन्धवस्य वधाय हि ॥ १५ ॥
'ऐसी अवस्थामें नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरकी रक्षाका सारा भार तुमपर ही रखकर आज मैं सिन्धुराजके वधके लिये जाऊँगा ।। १५ ।। जयद्रथं च हत्वाहं द्रुतमेष्यामि माधव । धर्मराजं न चेद् द्रोणो निगृह्णीयाद् रणे बलात् ।। १६ ।। 'माधव! यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें धर्मराजको बलपूर्वक बंदी न बना सकें तो मैं जयद्रथका वध करके शीघ्र ही लौट आऊँगा ।। १६ ।। निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव । सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ।। १७ ।। 'मधुवंशी वीर! यदि द्रोणाचार्यने नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको कैद कर लिया तो सिन्धुराजका वध नहीं हो सकेगा और मुझे भी महान् दुःख होगा ।। १७ ।। एवंगते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि । अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत् पुनः ।। १८ ।। 'यदि सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार युधिष्ठिर इस प्रकार बंदी बनाये गये तो निश्चय ही हमें पुनः वनमें जाना पड़ेगा ।। १८ ।। सोऽयं मम जयो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति । यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीयाद् युधिष्ठिरम् ।। १९ ।। 'यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें कुपित होकर युधिष्ठिरको कैद कर लेंगे तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जायगी ।। १९ ।। स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थं मम माधव । जयार्थं च यशोऽर्थं च रक्ष राजानमाहवे ।। २० ।। 'महाबाहु माधव! इसलिये तुम आज मेरा प्रिय करने, मुझे विजय दिलाने और मेरे यशकी वृद्धि करनेके लिये युद्धस्थलमें राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो' ।। २० ।। स भवान् मयि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना । भारद्वाजाद् भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो ।। २१ ।। 'प्रभो! इस प्रकार द्रोणाचार्यसे निरन्तर भय मानते हुए सव्यसाची अर्जुनने आपको मेरे पास धरोहरके रूपमें रख छोड़ा है ।। २१ ।। तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे । नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो ।। २२ ।। 'महाबाहो! प्रभो! मैं प्रतिदिन युद्धस्थलमें रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता जो द्रोणाचार्यके सामने खड़ा होकर उनसे युद्ध कर सके ।। २२ ।। मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः । सोऽहं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् ।। २३ ।। पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ।
‘अर्जुन मुझे भी बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका सामना करनेमें समर्थ योद्धा मानते हैं। महीपते! मैं अपने आचार्यकी इस सम्भावनाको तथा उनके उस आदेशको न तो पीछे ढकेल सकता हूँ और न आपको ही त्याग सकता हूँ ।। २३ १/२ ।।
आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः ।। २४ ।। उपलभ्य रणे क्रीडेद् यथा शकुनिना शिशुः ।
‘द्रोणाचार्य अभेद्य कवचसे सुरक्षित हैं। वे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेके कारण रणक्षेत्रमें अपने विपक्षीको पाकर उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं, जैसे कोई बालक पक्षीके साथ खेल रहा हो ।। २४ १/२ ।।
यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिर्हि स्यान्मकरध्वजः ।। २५ ।। तस्मै त्वां विसृजेयं वै स त्वां रक्षेद् यथार्जुनः ।
‘यदि कामदेवके अवतार श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न यहाँ हाथमें धनुष लेकर खड़े होते तो उन्हें मैं आपको सौंप देता। वे अर्जुनके समान ही आपकी रक्षा कर सकते थे ।। २५ १/२ ।।
कुरु त्मात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ।। २६ ।। यः प्रतीयाद् रणे द्रोणं यावद् गच्छामि पाण्डवम् ।
‘आप पहले अपनी रक्षाकी व्यवस्था कीजिये। मेरे चले जानेपर कौन आपका संरक्षण करनेवाला है, जो रणक्षेत्रमें तबतक द्रोणाचार्यका सामना करता रहे जबतक कि मैं अर्जुनके पास जाता (और लौटता) हूँ ।। २६ १/२ ।।
मा च ते भयमद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम् ।। २७ ।। न स जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ।
‘महाराज! आज आपके मनमें अर्जुनके लिये भय नहीं होना चाहिये। वे महाबाहु किसी कार्यभारको उठा लेनेपर कभी शिथिल नहीं होते हैं ।। २७ १/२ ।।
ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः ।। २८ ।। उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः । ये च कर्णमुखा राजन् रथोदाराः प्रकीर्तिताः ।। २९ ।। एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
‘राजन्! जो सौवीर, सिन्धु तथा पुरुदेशके योद्धा हैं, जो उत्तर और दक्षिणके निवासी एवं अन्य महारथी हैं तथा जो कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी बताये गये हैं वे कुपित हुए अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ।।
उद्युक्ता पृथिवी सर्वा ससुरासुरमानुषा ।। ३० ।। सराक्षसगणा राजन् सकिन्नरमहोरगा । जङ्गमाः स्थावराः सर्वे नालं पार्थस्य संयुगे ।। ३१ ।।
‘नरेश्वर! देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, किन्नर तथा महान् सर्पगणोंसहित यह समूची पृथ्वी और सभी स्थावर-जंगम प्राणी युद्धके लिये उद्यत हो जायँ तो भी सब मिलकर भी युद्धस्थलमें अर्जुनका सामना नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ ॥
एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते धीर्धनंजये ।
यत्र वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ ॥ ३२ ॥
न तत्र कर्मणो व्यापत् कथञ्चिदपि विद्यते ।
‘महाराज! ऐसा जानकर अर्जुनके विषयमें आपका भय दूर हो जाना चाहिये। जहाँ सत्यपराक्रमी और महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन विद्यमान हैं वहाँ किसी प्रकार भी कार्यमें व्याघात नहीं हो सकता ॥ ३२ १/२ ॥
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे ॥ ३३ ॥
कृतज्ञतां दयां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय ।
‘आपके भाई अर्जुनमें जो दैवीशक्ति, अस्त्रविद्याकी निपुणता, योग, युद्धस्थलमें अमर्ष, कृतज्ञता और दया आदि सद्गुण हैं उनका आप बारंबार चिन्तन कीजिये ॥ ३३ १/२ ॥
मयि चापि सहाये ते गच्छमानेऽर्जुनं प्रति ॥ ३४ ॥
द्रोणे चित्रास्त्रतां संख्ये राजंस्त्वमनुचिन्तय ।
‘राजन्! मैं आपका सहायक रहा हूँ, यदि मैं भी अर्जुनके पास चला जाता हूँ तो युद्धमें द्रोणाचार्य जिन विचित्र अस्त्रोंका प्रयोग करेंगे उनपर भी आप अच्छी तरह विचार कर लीजिये ॥ ३४ १/२ ॥
आचार्यो हि भृशं राजन् निग्रहे तव गृध्यति ॥ ३५ ॥
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्यां कर्तुं च भारत ।
‘भरतवंशी नरेश! द्रोणाचार्य आपको कैद करनेकी बड़ी इच्छा रखते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए उसे सत्य कर दिखाना चाहते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
कुरुष्वाद्यात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ॥ ३६ ॥
यस्याहं प्रत्ययात् पार्थ गच्छेयं फाल्गुनं प्रति ।
‘अब आप अपनी रक्षाका प्रबन्ध कीजिये। पार्थ! मेरे चले जानेपर कौन आपका रक्षक होगा, जिसपर विश्वास करके मैं अर्जुनके पास चला जाऊँ ॥ ३६ १/२ ॥
न ह्यहं त्वां महाराज अनिक्षिप्य महाहवे ॥ ३७ ॥
क्वचिद् यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘महाराज! कुरुनन्दन! मैं आपको इस महासमरमें किसी वीरके संरक्षणमें रखे बिना कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७ १/२ ॥
एतद्विचार्य बहुशो बुद्ध्या बुद्धिमतां वर ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा श्रेयः परं बुद्ध्या ततो राजन् प्रशाधि माम् ॥ ३९ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अपनी बुद्धिसे इस विषयमें बहुत सोच-विचार करके आपको जो परम मंगलकारक कृत्य जान पड़े, उसके लिये मुझे आज्ञा दें' ।। ३८-३९ ।।
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव ।
न तु मे शुद्ध्यते भावः श्वेताश्वं प्रति मारिष ।। ४० ।।
**युधिष्ठिर बोले—**महाबाहु माधव! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। आर्य! श्वेतवाहन द्रोणाचार्यकी ओरसे मेरा हृदय शुद्ध (निश्चिन्त) नहीं हो रहा है ।।
करिष्ये परमं यत्नमात्मनो रक्षणे ह्यहम् ।
गच्छ त्वं समनुज्ञातो यत्र यातो धनंजयः ।। ४१ ।।
मैं अपनी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करूँगा। तुम मेरी आज्ञासे वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन गया है ।। ४१ ।।
आत्मसंरक्षणं संख्ये गमनं चार्जुनं प्रति ।
विचार्यैतत् स्वयं बुद्ध्या गमनं तत्र रोचय ।। ४२ ।।
मुझे युद्धमें अपनी रक्षा करनी चाहिये या अर्जुनके पास तुम्हें भेजना चाहिये। इन दोनों बातोंपर तुम स्वयं ही अपनी बुद्धिसे विचार करके वहाँ जाना ही पसंद करो ।।
स त्वमातिष्ठ यानाय यत्र यातो धनंजयः ।
ममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महाबलः ।। ४३ ।।
अतः जहाँ अर्जुन गया है वहाँ जानेके लिये तुम तैयार हो जाओ। महाबली भीमसेन मेरी भी रक्षा कर लेंगे ।। ४३ ।।
पार्षतश्च ससोदर्यः पार्थिवाश्च महाबलाः ।
द्रौपदेयाश्च मां तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।। ४४ ।।
तात! भाइयोंसहित धृष्टद्युम्न, महाबली भूपालगण तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र मेरी रक्षा कर लेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। ४४ ।।
केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः ।
विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथः ।। ४५ ।।
धृष्टकेतुश्च बलवान् कुन्तिभोजश्च मातुलः ।
नकुलः सहदेवश्च पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ४६ ।।
एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।
तात! पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, विराट, द्रुपद, महारथी शिखण्डी, धृष्टकेतु, बलवान् मामा कुन्तिभोज (पुरुजित्), नकुल, सहदेव, पांचाल तथा सृंजय-वीरगण—ये सभी सावधान होकर निःसंदेह मेरी रक्षा करेंगे ।। ४५-४६ १/२ ।।
न द्रोणः सह सैन्येन कृतवर्मा च संयुगे ।। ४७ ।।
समासादयितुं शक्तो न च मां धर्षयिष्यति । सेनासहित द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा—ये युद्धस्थलमें मेरे पास नहीं पहुँच सकते और न मुझे परास्त ही कर सकेंगे ॥ ४७ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नश्च समरे द्रोणं क्रुद्धं परंतपः ॥ ४८ ॥ वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम् । शत्रुओंको संताप देनेवाला धृष्टद्युम्न समरांगणमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको पराक्रम करके रोक लेगा। ठीक वैसे ही, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोक देती है ॥ ४८ १/२ ॥ यत्र स्थास्यति संग्रामे पार्षतः परवीरहा ॥ ४९ ॥ द्रोणो न सैन्यं बलवत् क्रामेत् तत्र कथंचन । जहाँ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार संग्रामभूमिमें खड़ा होगा, वहाँ मेरी प्रबल सेनापर द्रोणाचार्य किसी तरह आक्रमण नहीं कर सकते ॥ एष द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ॥ ५० ॥ कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः । यह धृष्टद्युम्न, द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये कवच, धनुष, बाण, खड्ग और श्रेष्ठ आभूषणोंके साथ अग्निसे प्रकट हुआ है ॥ ५० १/२ ॥ विश्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीर्मयि सम्भ्रमम् । धृष्टद्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति ॥ ५१ ॥ अतः शिनिनन्दन! तुम निश्चिन्त होकर जाओ। मेरे लिये संदेह मत करो। धृष्टद्युम्न रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको सर्वथा रोक देगा ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरसात्यकिवाक्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिर और सात्यकिका संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
११२-
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना
संजय उवाच
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
स पार्थाद् भयमाशंसन् परित्यागान्महीपतेः ॥ १ ॥
अपवादं ह्यात्मनश्च लोकात् पश्यन् विशेषतः ।
ते मां भीतमिति ब्रूयुरायान्तं फाल्गुनं प्रति ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! धर्मराजका वह कथन सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिके मनमें राजाको छोड़कर जानेसे अर्जुनके अप्रसन्न होनेकी आशंका उत्पन्न हुई। विशेषतः उन्हें अपने लिये लोकापवादका भय दिखायी देने लगा। वे सोचने लगे—मुझे अर्जुनकी ओर आते देख सब लोग यही कहेंगे कि यह डरकर भाग आया है ॥ १-२ ॥
निश्चित्य बहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
धर्मराजमिदं वाक्यमब्रवीत् पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥
युद्धमें दुर्जय वीर पुरुषरत्न सात्यकिने इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विचार करके धर्मराजसे यह बात कही— ॥ ३ ॥
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति तेऽस्तु विशाम्पते ।
अनुयास्यामि बीभत्सुं करिष्ये वचनं तव ॥ ४ ॥
'प्रजानाथ! यदि आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था की हुई मानते हैं तो आपका कल्याण हो। मैं अर्जुनके पास जाऊँगा और आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ४ ॥
न हि मे पाण्डवात् कश्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
यो मे प्रियतरो राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
'राजन्! मैं आपसे सच कहता हूँ कि तीनों लोकोंमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मुझे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे अधिक प्रिय हो ॥ ५ ॥
तस्याहं पदवीं यास्ये संदेशात् तव मानद ।