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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

न मेऽस्ति विभवो येन नाशयेयं क्षुधां तव ।
उत्पन्नेन हि जीवामो वयं नित्यं वनौकसः ॥ १६ ॥
संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव भोजने ।
‘भाई! अब मुझे भूख सता रही है; इसलिये तुम्हारा दिया हुआ कुछ भोजन करना चाहता हूँ।' उसकी बात सुनकर कबूतर बोला—‘भैया! मेरे पास सम्पत्ति तो नहीं है, जिससे मैं तुम्हारी भूख मिटा सकूँ। हमलोग वनवासी पक्षी हैं। प्रतिदिन चुगे हुए चारेसे ही जीवन निर्वाह करते हैं। मुनियोंके समान हमारे पास कोई भोजन का संग्रह नहीं रहता है' ।। १५-१६ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तं तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ॥ १७ ॥
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरस्तदा ।
बभूव भरतश्रेष्ठ गर्हयन् वृत्तिमात्मनः ॥ १८ ॥
ऐसा कहकर कबूतरका मुख कुछ उदास हो गया। वह इस चिन्तामें पड़ गया कि अब मुझे क्या करना चाहिये? भरतश्रेष्ठ! वह अपनी कापोती वृत्तिकी निन्दा करने लगा ।। १७-१८ ।।

मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु स पक्षी पक्षिघातिनम् ।
उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ १९ ॥
थोड़ी देरमें उसे कुछ याद आया और उस पक्षीने बहेलिये से कहा—‘अच्छा, थोड़ी देरतक ठहरिये। मैं आपकी तृप्ति करूँगा' ।। १९ ।।

इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैस्तु समुज्ज्वल्य हुताशनम् ।
हर्षेण महताऽऽविष्टः स पक्षी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥
ऐसा कहकर उसने सूखे पत्तोंसे पुनः आग प्रज्वलित की और बड़े हर्षमें भर कर व्याधसे कहा— ।। २० ।।

ऋषीणां देवतानां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
श्रुतः पूर्वं मया धर्मो महानतिथिपूजने ॥ २१ ॥
‘मैंने ऋषियों, देवताओं, पितरों तथा महात्माओंके मुखसे पहले सुना है कि अतिथिकी पूजा करनेमें महान् धर्म है ।। २१ ।।

कुरुष्वानुग्रहं सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
निश्चिता खलु मे बुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ॥ २२ ॥
‘सौम्य! अतः मैंने भी आज अतिथिकी उत्तम पूजा करनेका निश्चय कर लिया है। आप मुझे ही ग्रहण करके मुझपर कृपा कीजिये। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ' ।। २२ ।।

ततः कृतप्रतिज्ञो वै स पक्षी प्रहसन्निव ।
तमग्निं त्रिःपरिक्रम्य प्रविवेश महामतिः ॥ २३ ॥

ऐसा कहकर अतिथि-पूजनकी प्रतिज्ञा करके उस परम बुद्धिमान् पक्षीने तीन बार अग्निदेवकी परिक्रमा की, और हँसते हुए-से आगमें प्रवेश किया ।। २३ ।।

अग्निमध्ये प्रविष्टं तु लुब्धो दृष्ट्वा तु पक्षिणम् ।
चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम् ।। २४ ।।
पक्षीको आगके भीतर घुसा हुआ देख व्याध मन-ही-मन चिन्ता करने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला? ।। २४ ।।

अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा ।
अधर्मः सुमहान् घोरो भविष्यति न संशयः ।। २५ ।।
अहो! अपने कर्मसे निन्दित हुए मुझ क्रूरकर्मा व्याधके जीवनमें यह सबसे भयंकर और महान् पाप होगा, इसमें संशय नहीं है ।। २५ ।।

एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धकः ।
गर्हयन् स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम् ।। २६ ।।
इस प्रकार कबूतरकी वैसी अवस्था देखकर अपने कर्मोंकी निन्दा करते हुए उस व्याधने अनेक प्रकारकी बातें कहकर बहुत विलाप किया ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतर और व्याधका संवादविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।

१४७-

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सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

बहेलियेका वैराग्य

भीष्म उवाच

ततः स लुब्धकः पश्यन् क्षुधयापि परिप्लुतः ।
कपोतमग्निपतितं वाक्यं पुनरुवाच ह ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! भूखसे व्याकुल होनेपर भी बहेलियेने जब देखा कि कबूतर आगमें कूद पड़ा, तब वह दुखी होकर इस प्रकार कहने लगा— ॥

किमीदृशं नृशंसेन मया कृतमबुद्धिना ।
भविष्यति हि मे नित्यं पातकं कृतजीविनः ॥ २ ॥
‘हाय! मुझ क्रूर और बुद्धिहीनने कैसा पाप कर डाला? मैंने अपना जीवन ही ऐसा बना रक्खा है कि मुझसे नित्य पाप बनता ही रहेगा’ ॥ २ ॥

स विनिन्दंस्तथाऽऽत्मानं पुनः पुनरुवाच ह ।
अविश्वास्यः सुदुर्बुद्धिः सदा निकृतिनिश्चयः ॥ ३ ॥
इस प्रकार बारंबार अपनी निन्दा करता हुआ वह फिर बोला—‘मैं बड़ा दुष्ट बुद्धिका मनुष्य हूँ, मुझपर किसीको विश्वास नहीं करना चाहिये। शठता और क्रूरता ही मेरे जीवनका सिद्धान्त बन गया है ॥ ३ ॥

शुभं कर्म परित्यज्य सोऽहं शकुनिलुब्धकः ।
नृशंसस्य ममाद्यायं प्रत्यादेशो न संशयः ॥ ४ ॥
दत्तः स्वमांसं दहता कपोतेन महात्मना ।
‘अच्छे-अच्छे कर्मोंको छोड़कर मैंने पक्षियोंको मारने और फँसानेका धंधा अपना लिया है। मुझ क्रूर और कुकर्मीको महात्मा कबूतरने अपने शरीरकी आहुति दे अपना मांस अर्पित किया है। इसमें संदेह नहीं कि इस अपूर्व त्यागके द्वारा उसने मुझे धिक्कारते हुए धर्माचरण करनेका आदेश दिया है ॥ ४ १/२ ॥

सोऽहं त्यक्ष्ये प्रियान् प्राणान् पुत्रान् दारांस्तथैव च ॥ ५ ॥
उपदिष्टो हि मे धर्मः कपोतेन महात्मना ।
‘अब मैं पापसे मुँह मोड़कर स्त्री, पुत्र तथा अपने प्यारे प्राणोंका भी परित्याग कर दूँगा। महात्मा कबूतरने मुझे विशुद्ध धर्मका उपदेश दिया है ॥ ५ १/२ ॥

अद्यप्रभृति देहं स्वं सर्वभोगैर्विवर्जितम् ॥ ६ ॥
यथा स्वल्पं सरो ग्रीष्मे शोषयिष्याम्यहं तथा ।
‘आजसे मैं अपने शरीरको सम्पूर्ण भोगोंसे वंचित करके उसी प्रकार सुखा डालूँगा, जैसे गर्मीमें छोटा-सा तालाब सूख जाता है ॥ ६ १/२ ॥

क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसंततः ॥ ७ ॥
उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये पारलौकिकम् ।
‘भूख, प्यास और धूपका कष्ट सहन करते हुए शरीरको इतना दुर्बल बना दूँगा कि सारे शरीरमें फैली हुई नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देंगी। मैं बारंबार अनेक प्रकारसे उपवास व्रत करके परलोक सुधारनेवाला पुण्य कर्म करूँगा ॥ ७१/२ ॥
अहो देहप्रदानेन दर्शितातिथिपूजना ॥ ८ ॥
तस्माद् धर्मं चरिष्यामि धर्मो हि परमा गतिः ।
दृष्टो धर्मो हि धर्मिष्ठे यादृशो विहगोत्तमे ॥ ९ ॥
‘अहो! महात्मा कबूतरने अपने शरीरका दान करके मेरे सामने अतिथि-सत्कारका उज्ज्वल आदर्श रखा है, अतः मैं भी अब धर्मका ही आचरण करूँगा; क्योंकि धर्म ही परम गति है। उस धर्मात्मा श्रेष्ठ पक्षीमें जैसा धर्म देखा गया है, वैसा ही मुझे भी अभीष्ट है ॥ ८-९ ॥
एवमुक्त्वा विनिश्चित्य रौद्रकर्मा स लुब्धकः ।
महाप्रस्थानमाश्रित्य प्रययौ संशितव्रतः ॥ १० ॥
ऐसा कहकर धर्मचरणका ही निश्चय करके वह भयानक कर्म करनेवाला व्याध कठोर व्रतका आश्रय ले महाप्रस्थानके पथपर चल दिया ॥ १० ॥
ततो यष्टिं शलाकां च क्षारकं पञ्जरं तथा ।
तां च बद्धां कपोतीं स प्रमुच्य विससर्ज ह ॥ ११ ॥
उस समय उसने उस बन्दी की हुई कबूतरीको पिंजरेसे मुक्त करके अपनी लाठी, शलाका, जाल, पिंजड़ा सब कुछ छोड़ दिया ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि लुब्धकोपरतौ
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें बहेलियेकी उपरतिविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥

१४८-

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अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति

भीष्म उवाच

ततो गते शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता ।
संस्मृत्य सा च भर्तारं रुदती शोककर्शिता ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस बहेलियेके चले जानेपर कबूतरी अपने पतिका स्मरण करके शोकसे कातर हो उठी और दुःखमग्न हो रोती हुई विलाप करने लगी ॥ १ ॥

नाहं ते विप्रियं कान्त कदाचिदपि संस्मरे ।
सर्वापि विधवा नारी बहुपुत्रापि शोचते ॥ २ ॥
‘प्रियतम! आपने कभी मेरा अप्रिय किया हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। सारी स्त्रियाँ अनेक पुत्रोंसे युक्त होनेपर भी पतिहीन होनेपर शोकमें डूब जाती हैं ॥

शोच्या भवति बन्धूनां पतिहीना तपस्विनी ।
लालिताहं त्वया नित्यं बहुमानाच्च पूजिता ॥ ३ ॥
‘पतिहीन तपस्विनी नारी अपने भाई-बन्धुओंके लिये भी शोचनीय बन जाती है। आपने सदा ही मेरा लाड-प्यार किया और बड़े सम्मानके साथ मुझे आदरपूर्वक रक्खा ॥ ३ ॥

वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसंक्लिष्टमनोहरैः ।
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च ॥ ४ ॥
द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताहं त्वया सह ।
आकाशगमने चैव विहृताहं त्वया सुखम् ॥ ५ ॥
‘आपने स्नेहसिक्त, सुखद, मनोहर, तथा मधुर वचनोंद्वारा मुझे आनन्दित किया। मैंने आपके साथ पर्वतोंकी गुफाओंमें नदियोंके तटोंपर, झरनोंके आस-पास तथा वृक्षोंकी सुरम्य शिखाओंपर रमण किया है। आकाशयात्रामें भी मैं सदा आपके साथ सुखपूर्वक विचरण करती रही हूँ ॥ ४-५ ॥

रमामि स्म पुरा कान्त तन्मे नास्त्यद्य किञ्चन ।
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ॥ ६ ॥
अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ।
‘प्राणनाथ! पहले मैं जिस प्रकार आपके साथ आनन्दपूर्वक रमण करती थी, अब उन सब सुखोंमेंसे कुछ भी मेरे लिये शेष नहीं रह गया है। पिता, भ्राता और पुत्र—ये सब लोग

नारीको परिमित सुख देते हैं, केवल पति ही उसे अपरिमित या असीम सुख प्रदान करता है। ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी? ।। नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम् ।। ७ ।। विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियाः । ‘स्त्रीके लिये पतिके समान कोई रक्षक नहीं है और पतिके तुल्य कोई सुख नहीं है। उसके लिये तो धन और सर्वस्वको त्यागकर पति ही एकमात्र गति है ।। न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वया विना ।। ८ ।। पतिहीना तु का नारी सती जीवितुमुत्सहेत् । ‘नाथ! अब तुम्हारे बिना यहाँ इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है? ऐसी कौन सी पतिव्रता स्त्री होगी, जो पतिके बिना जीवित रह सकेगी? ।। ८ १/२ ।। एवं विलप्य बहुधा करुणं सा सुदुःखिता ।। ९ ।। पतिव्रता सम्प्रदीप्तं प्रविवेश हुताशनम् । इस तरह अनेक प्रकारसे करुणाजनक विलाप करके अत्यन्त दुःखमें डूबी हुई वह पतिव्रता कबूतरी उसी प्रज्वलित अग्निमें समा गयी ।। ९ १/२ ।। ततश्चित्राङ्गदधरं भर्तारं सान्वपश्यत ।। १० ।। विमानस्थं सुकृतिभिः पूज्यमानं महात्मभिः । तदनन्तर उसने अपने पतिको देखा। वह विचित्र अंगद धारण किये विमानपर बैठा था और बहुत-से पुण्यात्मा महात्मा उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे ।। १० १/२ ।। चित्रमाल्याम्बरधरं सर्वाभरणभूषितम् ।। ११ ।। विमानशतकोटीभिरावृतं पुण्यकर्मभिः । उसने विचित्र हार और वस्त्र धारण कर रक्खे थे और वह सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित था। अरबों पुण्यकर्मी पुरुषोंसे युक्त विमानोंने उसे घेर रक्खा था ।। ततः स्वर्गं गतः पक्षी विमानवरमास्थितः । कर्मणा पूजितस्तत्र रेमे स सह भार्यया ।। १२ ।। इस प्रकार श्रेष्ठ विमानपर बैठा हुआ वह पक्षी अपनी स्त्रीके सहित स्वर्गलोकको चला गया और अपने सत्कर्मसे पूजित हो वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगा ।। १२ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतस्वर्गगमने अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतरका स्वर्गगमनविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४८ ।।

१४९-

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एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति

भीष्म उवाच

विमानस्थौ तु तौ राजन् लुब्धकः खे ददर्श ह ।
दृष्ट्वा तौ दम्पती राजन् व्यचिन्तयत तां गतिम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! व्याधने उन दोनों पक्षियोंको दिव्य रूप धारण करके विमान पर बैठे और आकाशमार्गसे जाते देखा। उन दिव्य दम्पतिको देखकर व्याध उनकी उस सद्गतिके विषयमें विचार करने लगा ॥ १ ॥

ईदृशेनैव तपसा गच्छेयं परमां गतिम् ।
इति बुद्ध्या विनिश्चित्य गमनायोपचक्रमे ॥ २ ॥
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धकः पक्षिजीवकः ।
निश्चेष्टो मरुदाहारो निर्ममः स्वर्गकांक्षया ॥ ३ ॥

मैं भी इसी प्रकार तपस्या करके परम गतिको प्राप्त होऊँगा, ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके पक्षियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला वह बहेलिया वहाँसे महाप्रस्थानके पथका आश्रय लेकर चल दिया। उसने सब प्रकारकी चेष्टा त्याग दी। वायु पीकर रहने लगा। स्वर्गकी अभिलाषासे अन्य सब वस्तुओंकी ओरसे उसने ममता हटा ली ॥ २-३ ॥

ततोऽपश्यत् सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्माविभूषितम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं सरः शीतलजलं शिवम् ॥ ४ ॥

आगे जाकर उसने एक विस्तृत एवं मनोरम सरोवर देखा जो कमल-समूहोंसे सुशोभित हो रहा था। नाना प्रकारके जलपक्षी उसमें कलरव कर रहे थे। वह तालाब शीतलजलसे भरा था और अत्यन्त सुखद जान पड़ता था ॥ ४ ॥

पिपासार्तोऽपि तद् दृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशयः ।
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुब्धकः ॥ ५ ॥
अनवेक्ष्यैव संहृष्टः श्वापदाध्युषितं वनम् ।
महान्तं निश्चयं कृत्वा लुब्धकः प्रविवेश ह ॥ ६ ॥
प्रविशन्नेव स वनं निगृहीतः सकण्टकैः ।
स कण्टकैर्विभिन्नाङ्गो लोहितार्द्रीकृतच्छविः ॥ ७ ॥

राजन्! कोई मनुष्य कितनी ही प्याससे पीड़ित क्यों न हो, निःसंदेह उस सरोवरके दर्शनमात्रसे वह तृप्त हो सकता था। इधर यह व्याध उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गया था, तो भी उधर दृष्टिपात किये बिना ही बड़े हर्षके साथ हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए वनमें प्रवेश कर गया। महान् लक्ष्यपर पहुँचनेका निश्चय करके बहेलिया उस वनमें घुसा।

घुसते ही कँटीली झाड़ियोंमें फँस गया। काँटोंसे उसका सारा शरीर छिदकर लहूलुहान हो गया ॥ ५-७ ॥

बभ्राम तस्मिन् विजने नानामृगसमाकुले ।
ततो द्रुमाणां महता पवनेन वने तदा ॥ ८ ॥
उदतिष्ठत संघर्षात् सुमहान् हव्यवाहनः ।
तद् वनं वृक्षसम्पूर्णं लताविटपसंकुलम् ॥ ९ ॥
ददाह पावकः क्रुद्धो युगान्ताग्निसमप्रभः ।

नाना प्रकारके वन्य पशुओंसे भरे हुए उस निर्जन वनमें वह इधर-उधर भटकने लगा। इतनेही में प्रचण्ड पवनके वेगसे वृक्षोंमें परस्पर रगड़ होनेके कारण उस वनमें बड़ी भारी आग लग गयी। आग की बड़ी-बड़ी लपटें ऊपरको उठने लगीं। प्रलयकालकी संवर्तक अग्निके समान प्रज्वलित एवं कुपित हुए अग्निदेव लता, डालियों और वृक्षोंसे व्याप्त हुए उस वनको दग्ध करने लगे ॥ ८-९ १/२ ॥

स ज्वालैः पवनोद्भूतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः ॥ १० ॥
ददाह तद् वनं घोरं मृगपक्षिसमाकुलम् ।

हवासे उड़ी हुई चिनगारियों तथा ज्वालाओंद्वारा चारों और फैलकर उस दावानलने पशु-पक्षियोंसे भरे हुए भयंकर वनको जलाना आरम्भ किया ॥ १० १/२ ॥

ततः स देहमोक्षार्थं सम्प्रहृष्टेन चेतसा ॥ ११ ॥
अभ्यधावत वर्धन्तं पावकं लुब्धकस्तदा ।

बहेलिया अपने शरीरका परित्याग करनेके लिये मनमें हर्ष और उल्लास भरकर उस बढ़ती हुई आगकी ओर दौड़ पड़ा ॥ ११ ॥

ततस्तेनाग्निना दग्धो लुब्धको नष्टकल्मषः ।
जगाम परमां सिद्धिं ततो भरतसत्तम ॥ १२ ॥

भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उस आगमें जल जानेसे बहेलियेके सारे पाप नष्ट हो गये और उसने परम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥ १२ ॥

ततः स्वर्गस्थमात्मानमपश्यद् विगतज्वरः ।
यक्षगन्धर्वसिद्धानां मध्ये भ्राजन्तमिन्द्रवत् ॥ १३ ॥

थोड़ी ही देरमें अपने आपको उसने देखा कि वह बड़े आनन्दसे स्वर्गलोकमें विराजमान है तथा अनेक यक्ष, सिद्ध और गन्धर्वोंके बीचमें इन्द्रके समान शोभा पा रहा है ॥ १३ ॥

एवं खलु कपोतश्च कपोती च पतिव्रता ।
लुब्धकेन सह स्वर्गं गताः पुण्येन कर्मणा ॥ १४ ॥

इस प्रकार वह धर्मात्मा कबूतर, पतिव्रता कपोती और बहेलिया—तीनों साथ-साथ अपने पुण्यकर्मके बलसे स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १४ ॥

यापि चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते । विराजते हि सा क्षिप्रं कपोतीव दिवि स्थिता ॥ १५ ॥ इसी प्रकार जो स्त्री अपने पतिका अनुसरण करती है, वह कपोतीके समान शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थित हो अपने तेजसे प्रकाशित होती है ॥ १५ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं लुब्धकस्य महात्मनः । कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा ॥ १६ ॥ यह प्राचीन वृत्तान्त (परशुरामजीने मुचुकुन्दको सुनाया था) यह ठीक ऐसा ही है। बहेलिये और महात्मा कबूतरको उनके पुण्यकर्मके प्रभावसे धर्मात्माओंकी गति प्राप्त हुई ॥ १६ ॥

यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तयेत् । नाशुभं विद्यते तस्य मनसापि प्रमादतः ॥ १७ ॥ जो मनुष्य इस प्रसंगको प्रतिदिन सुनता और जो इसका वर्णन करता है, उन दोनोंको मनसे भी प्रमादजनित अशुभकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर । गोध्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः ॥ १८ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह शरणागतका पालन महान् धर्म है। ऐसा करनेसे गोवध करनेवाले पुरुषोंके पापका भी प्रायश्चित्त हो जाता है ॥ १८ ॥

न निष्कृतिर्भवेत् तस्य यो हन्याच्छरणागतम् । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुण्यं पापप्रणाशनम् । न दुर्गतिमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १९ ॥ जो शरणागतका वध करता है, उसको कभी इस पापसे छुटकारा नहीं मिलता। इस पापनाशक पुण्यमय इतिहासको सुन लेनेपर मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उसे स्वर्गलोककी प्रप्ति होती है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि लुब्धकस्वर्गगमने एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें व्याधका स्वर्गलोकमें गमनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४९ ॥

१५०-

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना

युधिष्ठिर उवाच

अबुद्धिपूर्वं यत् पापं कुर्याद् भरतसत्तम ।
मुच्यते स कथं तस्मादेतत् सर्वं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! यदि कोई पुरुष अनजानमें किसी तरहका पापकर्म कर बैठे तो वह उससे किस प्रकार मुक्त हो सकता है? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि पुराणमृषिसंस्तुतम् ।
इन्द्रोतः शौनको विप्रो यदाह जनमेजयम् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें ऋषियों-द्वारा प्रशंसित एक प्राचीन प्रसंग एवं उपदेश तुम्हें सुनाऊँगा, जिसे शुनकवंशी विप्रवर इन्द्रोतने राजा जनमेजयसे कहा था ॥ २ ॥

आसीद् राजा महावीर्यः परिक्षिज्जनमेजयः ।
अबुद्धिपूर्वामागच्छद् ब्रह्महत्यां महीपतिः ॥ ३ ॥
पूर्वकालमें परिक्षित्के* पुत्र राजा जनमेजय बड़े पराक्रमी थे; परन्तु उन्हें बिना जाने ही ब्रह्महत्याका पाप लग गया था ॥ ३ ॥

ब्राह्मणाः सर्व एवैते तत्यजुः सपुरोहिताः ।
स जगाम वनं राजा दह्यमानो दिवानिशम् ॥ ४ ॥
इस बातको जानकर पुरोहितसहित सभी ब्राह्मणोंने जनमेजयको त्याग दिया। राजा चिन्तासे दिन-रात जलते हुए वनमें चले गये ॥ ४ ॥

प्रजाभिः स परित्यक्तश्चकार कुशलं महत् ।
अतिवेलं तपस्तेपे दह्यमानः स मन्युना ॥ ५ ॥
प्रजाने भी उन्हें गद्दीसे उतार दिया था; अतः वे वनमें रहकर महान् पुण्य कर्म करने लगे। दुःखसे दग्ध होते हुए वे दीर्घकालतक तपस्यामें लगे रहे ॥ ५ ॥

ब्रह्महत्यापनोदार्थमपृच्छद् ब्राह्मणान् बहून् ।
पर्यटन् पृथिवीं कृत्स्नां देशो देशे नराधिपः ॥ ६ ॥
राजाने सारी पृथ्वीके प्रत्येक देशमें घूम-घूमकर बहु-तेरे ब्राह्मणोंसे ब्रह्महत्या-निवारण के लिये उपाय पूछा ॥ ६ ॥

तत्रेतिहासं वक्ष्यामि धर्मस्यास्योपबृंहणम् ।

दह्यमानः पापकृत्या जगाम जनमेजयः ॥ ७ ॥
चरिष्यमाण इन्द्रोतं शौनकं संशितव्रतम् ।
राजन्! यहाँ मैं जो इतिहास बता रहा हूँ, वह धर्मकी वृद्धि करनेवाला है। राजा जनमेजय अपने पाप-कर्मसे दग्ध होते और वनमें विचरते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाले शुनकवंशी इन्द्रोत मुनिके पास जा पहुँचे ॥ ७१/२ ॥
समासाद्योपजग्राह पादयोः परिपीडयन् ॥ ८ ॥
ऋषिर्दृष्ट्वा नृपं तत्र जगर्हे सुभृशं तदा ।
कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ॥ ९ ॥
किं त्वयास्मासु कर्तव्यं मा मां स्प्राक्षीः कथंचन ।
गच्छ गच्छ न ते स्थानं प्रीणात्यस्मानिति ब्रुवन् ॥ १० ॥
वहाँ जाकर उन्होंने मुनिके दोनों पैर पकड़ लिये और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगे। ऋषिने वहाँ राजाको देखकर उस समय उनकी बड़ी निन्दा की। वे कहने लगे—अरे! तू तो महान् पापाचारी और ब्रह्महत्यारा है। यहाँ कैसे आया? हमलोगोंसे तेरा क्या काम है? मुझे किसी तरह छूना मत। जा-जा, तेरा यहाँ ठहरना हमलोगोंको अच्छा नहीं लगता ॥ ८—१० ॥
रुधिरस्येव ते गन्धः शवस्येव च दर्शनम् ।
अशिवः शिवसंकाशो मृतो जीवन्निवाटसि ॥ ११ ॥
‘तुमसे रुधिरकी-सी गन्ध निकलती है। तेरा दर्शन वैसा ही है, जैसा मुर्देका दीखना। तू देखनेमें मंगलमय है; परंतु है अमंगलरूप। वास्तवमें तू मर चुका; परंतु जीवित की भाँति घूम रहा है ॥ ११ ॥
ब्रह्ममृत्युरशुद्धात्मा पापमेवानुचिन्तयन् ।
प्रबुद्ध्यसे प्रस्वपिषि वर्तसे परमे सुखे ॥ १२ ॥
‘तू ब्राह्मणकी मृत्युका कारण है। तेरा अन्तःकरण नितान्त अशुद्ध है। तू पापकी ही बात सोचता हुआ जागता और सोता है और इसीसे अपनेको परम सुखी मानता है ॥ १२ ॥
मोघं ते जीवितं राजन् परिक्लिष्टं च जीवसि ।
पापायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे हि यवीयसे ॥ १३ ॥
‘राजन्! तेरा जीवन व्यर्थ और अत्यन्त क्लेशमय है। तू पापके लिये ही पैदा हुआ है। खोटे कर्मके लिये ही तेरा जन्म हुआ है ॥ १३ ॥
बहुकल्याणमिच्छन्ति ईहन्ते पितरः सुतान् ।
तपसा दैवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षया ॥ १४ ॥
माता-पिता तपस्या, देवपूजा, नमस्कार और सहनशीलता या क्षमा आदिके द्वारा पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और प्राप्त हुए पुत्रोंसे परम कल्याण पानेकी इच्छा रखते हैं ॥ १४ ॥
पितृवंशमिमं पश्य त्वत्कृते नरकं गतम् ।

निरर्थाः सर्व एवैषामाशाबन्धास्त्वदाश्रयाः ॥ १५ ॥ ‘परंतु तेरे कारण तेरे पितरोंका यह समुदाय नरकमें पड़ गया है। तू आँख उठाकर उनकी दशा देख ले। उन्होंने तुझसे जो जो आशाएँ बाँध रखी थीं, उनकी वे सभी आशाएँ आज व्यर्थ हो गयीं ॥ १५ ॥

यान् पूजयन्तो विन्दन्ति स्वर्गमायुर्यशः प्रजाः ।
तेषु त्वं सततं द्वेष्टा ब्राह्मणेषु निरर्थकः ॥ १६ ॥
‘जिनकी पूजा करनेवाले लोग स्वर्ग, आयु, यश और संतान प्राप्त करते हैं। उन्हीं ब्राह्मणोंसे तू सदा द्वेष रखता है। तेरा जीवन व्यर्थ है ॥ १६ ॥

इमं लोकं विमुच्य त्वमवाङ्‌मूर्द्धा पतिष्यसि ।
अशाश्वतीः शाश्वतीश्च समाः पापेन कर्मणा ॥ १७ ॥
‘इस लोकको छोड़नेके बाद तू अपने पापकर्मके फलस्वरूप अनन्त वर्षोंतक नीचा सिर किये नरकमें पड़ा रहेगा ॥ १७ ॥

अर्द्यमानो यत्र गृध्रैः शितिकण्ठैरयोमुखैः ।
ततश्च पुनरावृत्तः पापयोनिं गमिष्यसि ॥ १८ ॥
‘वहाँ लोहेके समान चोंचवाले गीध और मोर तुझे नोच-नोचकर पीड़ा देंगे और उसके बाद भी नरकसे लौटनेपर तुझे किसी पापयोनिमें ही जन्म लेना पड़ेगा ॥

यदिदं मन्यसे राजन् नायमस्ति कुतः परः ।
प्रतिस्मारयितारस्त्वां यमदूता यमक्षये ॥ १९ ॥
‘राजन्! तू जो यह समझता है कि जब इसी लोकमें पापका फल नहीं मिल रहा है, तब परलोकका तो अस्तित्व ही कहाँ है? सो इस धारणाके विपरीत यमलोकमें जानेपर यमराजके दूत तुझे इन सारी बातोंकी याद दिला देंगे ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीयसंवादे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवादविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥


१. ये परिक्षित् और जनमेजय अर्जुनके पौत्र और प्रपौत्र नहीं हैं।

१५१-

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना

भीष्म उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच तं मुनिं जनमेजयः ।
गर्ह्यं भवान् गर्हयते निन्द्यं निन्दति मां पुनः ॥ १ ॥
धिक्कार्यं मां धिक्कुरुते तस्मात् त्वाहं प्रसादये ।

**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! मुनिवर इन्द्रोतके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'मुने! मैं घृणा और तिरस्कारके योग्य हूँ; इसीलिये आप मेरा तिरस्कार करते हैं। मैं निन्दाका पात्र हूँ; इसीलिये बार-बार मेरी निन्दा करते हैं। मैं धिक्कारने और दुत्कारनेके ही योग्य हूँ; इसीलिये आपकी ओरसे मुझे धिक्कार मिल रहा है और इसीलिये मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ॥ १ १/२ ॥

सर्वं हीदं दुष्कृतं मे ज्वालाम्यग्नाविवोहितः ॥ २ ॥
स्वकर्मण्यभिसंधाय नाभिनन्दति मे मनः ।

'यह सारा पाप मुझमें मौजूद है; अतः मैं चिन्तासे उसी प्रकार जल रहा हूँ, मानो किसीने मुझे आगके भीतर रख दिया हो। अपने कुकर्मोंको याद करके मेरा मन स्वतः प्रसन्न नहीं हो रहा है ॥ २ १/२ ॥

प्राप्य घोरं भयं नूनं मया वैवस्वतादपि ॥ ३ ॥
तत्तु शल्यमनिहृत्य कथं शक्ष्यामि जीवितुम् ।
सर्वं मन्युं विनीय त्वमभि मां वद शौनक ॥ ४ ॥

'निश्चय ही मुझे यमराजसे भी घोर भय प्राप्त होनेवाला है, यह बात मेरे हृदयमें काँटेकी भाँति चुभ रही है। अपने हृदयसे इसको निकाले बिना मैं कैसे जीवित रह सकूँगा? अतः शौनकजी! आप समस्त क्रोधका त्याग करके मुझे उद्धारका कोई उपाय बताइये ॥ ३-४ ॥

महानासं ब्राह्मणानां भूयो वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।
अस्तु शेषं कुलस्यास्य मा पराभूदिदं कुलम् ॥ ५ ॥

'मैं ब्राह्मणोंका महान् भक्त रहा हूँ; इसीलिये इस समय पुनः आपसे निवेदन करता हूँ कि मेरे इस कुलका कुछ भाग अवश्य शेष रहना चाहिये। समूचे कुलका पराभव या विनाश नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥

न हि नो ब्रह्मशप्तानां शेषं भवितुमर्हति ।

स्तुतीरलभमानानां संविदं वेदनिश्चितान् ॥ ६ ॥ निर्विद्यमानः सुभृशं भूयो वक्ष्यामि शाश्वतम् । भूयश्चैवाभिरक्षन्तु निर्धनान् निर्जना इव ॥ ७ ॥ ‘ब्राह्मणोंके शाप दे देनेपर हमारे कुलका कुछ भी शेष नहीं रह जायगा। हम अपने पापके कारण न तो समाजमें प्रशंसा पा रहे हैं न सजातीय बन्धुओंके साथ एकमत ही हो रहे हैं; अतः अत्यन्त खेद और विरक्तिको प्राप्त होकर हम पुनः वेदोंका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले आप-जैसे ब्राह्मणोंसे सदा यही कहेंगे कि जैसे निर्जन स्थानमें रहनेवाले योगीजन पापी पुरुषोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आपलतो अपनी दयासे ही हम-जैसे दुखी मनुष्योंकी रक्षा करें’ ॥ ६-७ ॥

न ह्ययज्ञा अमुं लोकं प्राप्नुवन्ति कथञ्चन । आपातान् प्रतितिष्ठन्ति पुलिन्दशबरा इव ॥ ८ ॥ ‘जो क्षत्रिय अपने पापके कारण यज्ञके अधिकारसे वंचित हो जाते हैं, वे पुलिन्दों और शबरोंके समान नरकोंमें ही पड़े रहते हैं। किसी प्रकार परलोकमें उत्तम गतिको नहीं पाते’ ॥ ८ ॥

अविज्ञायैव मे प्रज्ञां बालस्येव स पण्डितः । ब्रह्मन् पितेव पुत्रस्य प्रीतिमान् भव शौनक ॥ ९ ॥ ‘ब्रह्मन्! शौनक! आप विद्वान् हैं और मैं मूर्ख। आप मेरी बालबुद्धिपर ध्यान न देकर जैसे पिता पुत्रपर स्वभावतः संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मुझपर भी प्रसन्न होइये’ ॥ ९ ॥

शौनक उवाच

किमाश्चर्यं यदप्राज्ञो बहु कुर्यादसाम्प्रतम् । इति वै पण्डितो भूत्वा भूतानां नानुकुप्यते ॥ १० ॥ शौनकनै कहा—यदि अज्ञानी मनुष्य अयुक्त कार्य भी कर बैठे तो इसमें कौन-सी आश्चर्यकी बात है; अतः इस रहस्यको जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्राणियोंपर क्रोध न करे ॥ १० ॥

प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्य शोचते जनान् । जगतीस्थानिवाद्रिस्थः प्रज्ञया प्रतिपत्स्यति ॥ ११ ॥ जो विशुद्ध बुद्धिकी अट्टालिकापर चढ़कर स्वयं शोकसे रहित हो दूसरे दुखी मनुष्योंके लिये शोक करता है, वह अपने ज्ञानबलसे सब कुछ उसी प्रकार जान लेता है, जैसे पर्वतकी चोटीपर खड़ा हुआ मनुष्य उस पर्वतके आस-पासकी भूमिपर रहनेवाले सब लोगोंको देखता रहता है ॥ ११ ॥

न चोपलभ्यते तेन न चाश्चर्याणि कुर्वते । निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः पूर्वसाधुषु ॥ १२ ॥

जो प्राचीन श्रेष्ठ पुरुषोंसे विरक्त हो उनके दृष्टिपथसे दूर रहता है तथा उनके द्वारा धिक्कारको प्राप्त होता रहता है, उसे ज्ञानकी उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे पुरुष के लिये दूसरे लोग आश्चर्य भी नहीं करते हैं ॥ १२ ॥ विदितं भवतो वीर्यं माहात्म्यं वेद आगमे । कुरुष्वेह यथाशान्ति ब्रह्म शरणमस्तु ते ॥ १३ ॥ तुम्हें ब्राह्मणोंकी शक्तिका ज्ञान है। वेदों और शास्त्रोंमें जो उनकी महिमा उपलब्ध होती है, उसका भी पता है; अतः तुम शान्तिपूर्वक ऐसा प्रयत्न करो, जिससे ब्राह्मणजाति तुम्हें शरण दे सके ॥ १३ ॥ तद् वै पारत्रिकं तात ब्राह्मणानामकुप्यताम् । अथवा तप्यसे पापे धर्ममेवानुपश्य वै ॥ १४ ॥ तात! क्रोधरहित ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये जो कुछ किया जाता है वह पारलौकिक लाभका ही हेतु होता है। अथवा यदि तुम्हें पापके लिये पश्चात्ताप होता है तो तुम निरन्तर धर्मपर ही दृष्टि रक्खो ॥ १४ ॥

जनमेजय उवाच अनुतप्ये च पापेन न च धर्मं विलोपये । बुभूषुं भजमानं च प्रीतिमान् भव शौनक ॥ १५ ॥ **जनमेजयने कहा—**शौनक! मुझे अपने पापके कारण बड़ा पश्चात्ताप होता है, अब मैं धर्मका कभी लोप नहीं करूँगा। मुझे कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छा है; अतः आप मुझ भक्तपर प्रसन्न होइये ॥ १५ ॥

शौनक उवाच छित्त्वां दम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप । सर्वभूतहितं तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मरन् ॥ १६ ॥ **शौनक बोले—**नरेश्वर! मैं तुम्हें तुम्हारे दम्भ और अभिमानका नाश करके तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ। तुम धर्मका निरन्तर स्मरण रखते हुए समस्त प्राणियोंके हितका साधन करो ॥ १६ ॥ न भयान्न च कार्पण्यान्न लोभात् त्वामुपाह्वये । तां मे दैवीं गिरं सत्यां शृणु त्वं ब्राह्मणैः सह ॥ १७ ॥ राजन्! मैं भयसे, दीनतासे और लोभसे भी तुम्हें अपने पास नहीं बुलाता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंके सहित दैवीवाणीके समान मेरी यह सच्ची बात कान खोलकर सुन लो ॥ १७ ॥ सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्मादुपाह्वये । क्रोशतां सर्वभूतानां हाहा धिगिति जल्पताम् ॥ १८ ॥

मैं तुमसे कोई वस्तु लेनेकी इच्छा नहीं रखता। यदि समस्त प्राणी मुझे खोटी-खरी सुनाते रहें, हाय-हाय मचाते रहें और धिक्कार देते रहें तो भी उनकी अवहेलना करके मैं तुम्हें केवल धर्मके कारण निकट आनेके लिये आमन्त्रित करता हूँ॥ १८॥

वक्ष्यन्ति मामधर्मज्ञं त्यक्ष्यन्ति सुहृदो जनाः।
ता वाचः सुहृदः श्रुत्वा संज्वरिष्यन्ति मे भृशम्॥ १९॥
मुझे लोग अधर्मज्ञ कहेंगे। मेरे हितैषी सुहृद् मुझे त्याग देंगे तथा तुम्हें धर्मोपदेश देनेकी बात सुनकर मेरे सुहृद् मुझपर अत्यन्त रोषसे जल उठेंगे॥ १९॥

केचिदेव महाप्राज्ञाः प्रतिज्ञास्यन्ति तत्त्वतः।
जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान् प्रति भारत॥ २०॥
तात! भारत! कोई-कोई महाज्ञानी पुरुष ही मेरे अभिप्रायको यथार्थरूपसे समझ सकेंगे। ब्राह्मणोंके प्रति भलाई करनेके लिये ही मेरी यह सारी चेष्टा है। यह तुम अच्छी तरह जान लो॥ २०॥

यथा ते मत्कृते क्षेमं लभन्ते ते तथा कुरु।
प्रतिजानीहि चाद्रोहं ब्राह्मणानां नराधिप॥ २१॥
ब्राह्मणलोग मेरे कारण जैसे भी सकुशल रहें, वैसा ही प्रयत्न तुम करो। नरेश्वर! तुम मेरे सामने यह प्रतिज्ञा करो कि अब मैं ब्राह्मणोंसे कभी द्रोह नहीं करूँगा॥ २१॥

जनमेजय उवाच

नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा।
द्रोग्धास्मि ब्राह्मणान् विप्र चरणावपि ते स्पृशे॥ २२॥
**जनमेजयने कहा—**विप्रवर! मैं आपके दोनों चरण छूकर शपथपूर्वक कहता हूँ कि मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी ब्राह्मणोंसे द्रोह नहीं करूँगा॥ २२॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये
एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवाद विषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥

इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश

शौनक उवाच

तस्मात् तेऽहं प्रवक्ष्यामि धर्ममावृत्तचेतसे ।
श्रीमान् महाबलस्तुष्टः स्वयं धर्ममवेक्षसे ॥ १ ॥
**शौनकने कहा—**राजन्! तुमने ऐसी प्रतिज्ञा की है, इससे जान पड़ता है कि तुम्हारा मन पापकी ओरसे निवृत्त हो गया है; इसलिये मैं तुम्हें धर्मका उपदेश करूँगा; क्योंकि तुम श्रीसम्पन्न, महाबलवान् और संतुष्टचित्त हो। साथ ही स्वयं धर्मपर दृष्टि रखते हो ॥ १ ॥

पुरस्ताद् दारुणो भूत्वा सुचित्रतरमेव तत् ।
अनुगृह्णाति भूतानि स्वेन वृत्तेन पार्थिवः ॥ २ ॥
राजा पहले कठोर स्वभावका होकर पीछे कोमल भावका अवलम्बन करके जो अपने सद्व्यवहारसे समस्त प्राणियों पर अनुग्रह करता है, वह अत्यन्त आश्चर्यकी ही बात है ॥ २ ॥

कृत्स्नं नूनं स दहति इति लोको व्यवस्यति ।
यत्र त्वं तादृशो भूत्वा धर्ममेवानुपश्यसि ॥ ३ ॥
चिरकालतक तीक्ष्ण स्वभावका आश्रय लेनेवाला राजा निश्चय ही अपना सब कुछ जलाकर भस्म कर डालता है, ऐसी लोगोंकी धारणा है; परंतु तुम वैसे होकर भी जो धर्मपर ही दृष्टि रख रहे हो, यह कम आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३ ॥

हित्वा तु सुचिरं भक्ष्यं भोज्यांश्च तप आस्थितः ।
इत्येतदभिभूतानामद्भुतं जनमेजय ॥ ४ ॥
जनमेजय! तुम जो दीर्घकालसे भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंका परित्याग करके तपस्यामें लगे हुए हो, यह पापसे अभिभूत हुए मनुष्योंके लिये अद्भुत बात है ॥

योऽदुर्लभो भवेद् दाता कृपणो वा तपोधनः ।
अनाश्चर्यं तदित्याहुर्नातिदूरेण वर्तते ॥ ५ ॥
यदि धन-सम्पन्न पुरुष दानी हो एवं कृपण या दरिद्र मनुष्य तपस्याका धनी हो जाय तो इसे आश्चर्यकी बात नहीं मानते हैं; क्योंकि ऐसे पुरुषोंका दान और तपसे सम्पन्न होना अधिक कठिन नहीं है ॥ ५ ॥

एतदेव हि कार्पण्यं समग्रमसमीक्षितम् ।

यच्चेत् समीक्ष्यैव स्याद् भवेत् तस्मिंस्ततो गुणः ॥ ६ ॥ यदि सारी बातोंपर पूर्वापर विचार न करके कोई कार्य आरम्भ किया जाय तो यही कायरतापूर्ण दोष है और यदि भलीभाँति आलोचना करके कोई कार्य हो तो यही उसमें गुण माना जाता है ॥ ६ ॥

यज्ञो दानं दया वेदाः सत्यं च पृथिवीपते । पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तपः ॥ ७ ॥ पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद, और सत्य—ये पाँचों पवित्र बताये गये हैं। इनके साथ अच्छी तरह आचरणमें लाया हुआ तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है ॥ ७ ॥

तदेव राज्ञां परमं पवित्रं जनमेजय । तेन सम्यग्गृहीतेन श्रेयांसं धर्ममाप्स्यसि ॥ ८ ॥ जनमेजय! राजाओंके लिये ये छहों वस्तुएँ परम पवित्र हैं। इन्हें भलीभाँति आचरणमें लानेपर तुम श्रेष्ठतम धर्मको प्राप्त कर लोगे ॥ ८ ॥

पुण्यदेशाभिगमनं पवित्रं परमं स्मृतम् । अत्राप्युदाहरन्तीमां गाथां गीतां ययातिना ॥ ९ ॥ पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करना भी परम पवित्र माना गया है। इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा ययातिकी गायी हुई इस गाथाका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ९ ॥

यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आयुर्जीवितमात्मनः । यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत् संन्यस्य तपश्चरेत् ॥ १० ॥ जो मनुष्य अपने लिये दीर्घ जीवनकी इच्छा रखता है, वह यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करके फिर उसे त्यागकर तपस्यामें लग जाय ॥ १० ॥

पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वतीम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥ ११ ॥ कुरुक्षेत्रको पवित्र तीर्थ बताया गया। कुरुक्षेत्रसे अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, उससे भी अधिक पवित्र उसके भिन्न-भिन्न तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें भी दूसरोंकी अपेक्षा पृथूदक तीर्थको श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ११ ॥

यत्रावगाह्य पीत्वा च नैनं श्वोमरणं तपेत् । महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे ॥ १२ ॥ कालोदकं च गन्तासि लब्धायुर्जीविते पुनः । सरस्वतीदृषद्वत्योः संगमो मानसः सरः ॥ १३ ॥ उसमें स्नान करने और उसका जल पीनेसे मनुष्यको कल ही होनेवाली मृत्युका भय नहीं सताता अर्थात् वह कृतकृत्य हो जाता है। इस कारण मरनेसे नहीं डरता। यदि तुम महासरोवर पुष्कर, प्रभास, उत्तर मानस, कालोदक, दृषद्वती और सरस्वतीके संगम तथा

मानसरोवर आदि तीर्थोंमें जाकर स्नान करोगे तो तुम्हें पुनः अपने जीवनके लिये दीर्घायु प्राप्त होगी ।। १२-१३ ।।

स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् ।
त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ।। १४ ।।
सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे। मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोंमें श्रेष्ठ है ।। १४ ।।

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथाः सत्यवता कृताः ।
यथा कुमारः सत्यो वै नैव पुण्यो न पापकृत् ।। १५ ।।
इस विषयमें भी सत्यवान् द्वारा निर्मित हुई इन गाथाओंका उदाहरण दिया जाता है। जैसे बालक रण-द्वेषसे शून्य होनेके कारण सदा सत्यपरायण ही रहता है। न तो वह पुण्य करता है और न पाप ही। इसी प्रकार प्रत्येक श्रेष्ठ पुरुषको भी होना चाहिये ।। १५ ।।

न ह्यास्ति सर्वभूतेषु दुःखमस्मिन् कुतः सुखम् ।
एवं प्रकृतिभूतानां सर्वसंसर्गयायिनाम् ।। १६ ।।
त्यजतां जीवितं श्रेयो निवृत्ते पुण्यपापके ।
इस संसारके सम्पूर्ण प्राणियोंमें जब दुःख ही नहीं है, तब सुख कहाँसे हो सकता है? यह सुख और दुःख दोनों ही प्रकृतिस्थ प्राणियोंके धर्म हैं, जो कि सब प्रकारके संसर्गदोषको स्वीकार करके उनके अनुसार चलते हैं। जिन्होंने ममता और अहंकार आदिके साथ सब कुछ त्याग दिया है, जिनके पुण्य और पाप सभी निवृत्त हो चुके हैं, ऐसे पुरुषोंका जीवन ही कल्याणमय है ।। १६ ½ ।।

यत्त्वेव राज्ञो ज्यायिष्ठं कार्याणां तद् ब्रवीमि ते ।। १७ ।।
बलेन संविभागैश्च जय स्वर्गं जनेश्वर ।
यस्यैव बलमोजश्च स धर्मस्य प्रभूर्नरः ।। १८ ।।
अब मैं राजाके कार्योंमें जो सबसे श्रेष्ठ है, उसका वर्णन करता हूँ। जनेश्वर! तुम धैर्ययुक्त बल और दानके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करो। जिसके पास बल और ओज है, वही मनुष्य धर्माचरणमें समर्थ होता है ।। १७-१८ ।।

ब्राह्मणानां सुखार्थं हि त्वं पाहि वसुधां नृप ।
यथैवैतान् पुराऽऽक्षैप्सीस्तथैवैतान् प्रसादय ।। १९ ।।
नरेश्वर! तुम ब्राह्मणोंको सुख पहुँचानेके लिये ही सारी पृथ्वीका पालन करो। जैसे पहले इन ब्राह्मणोंपर आक्षेप किया था, वैसे इन सबको अपने सद्बर्तावसे प्रसन्न करो ।। १९ ।।

अपि धिक्क्रियमाणोऽपि त्यज्यमानोऽप्यनेकधा ।
आत्मनो दर्शनाद् विप्रान्न हन्तास्मीति मार्गय ।
घटमानः स्वकार्येषु कुरु निःश्रेयसं परम् ।। २० ।।

वे बार-बार तुम्हें धिक्कारें और फटकारकर दूर हटा दें तो भी उनमें आत्मदृष्टि रखकर तुम यही निश्चय करो कि अब मैं ब्राह्मणोंको नहीं मारूँगा। अपने कर्तव्यपालनके लिये पूरी चेष्टा करते हुए परम कल्याणका साधन करो ॥ २० ॥ हिमाग्निघोरसदृशो राजा भवति कश्चन ।
लांगलाशनिकल्पो वा भवेदन्यः परंतप ॥ २१ ॥
परंतप! कोई राजा बर्फके समान शीतल होता है, कोई अग्निके समान ताप देनेवाला होता है, कोई यमराजके समान भयानक जान पड़ता है, कोई घास-फूसका मूलोच्छेद करनेवाले हलके समान दुष्टोंका समूल उन्मूलन करनेवाला होता है तथा कोई पापाचारियोंपर अकस्मात् वज्रके समान टूट पड़ता है ॥ २१ ॥
न विशेषेण गन्तव्यमविच्छिन्नेन वा पुनः ।
न जातु नाहमस्मीति सुप्रसक्तमसाधुषु ॥ २२ ॥
कभी मेरा अभाव नहीं हो जाय, ऐसा समझकर राजाको चाहिये कि दुष्ट पुरुषोंका संग कभी न करे। न तो उनके किसी विशेष गुणपर आकृष्ट हो, न उनके साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध स्थापित करे और न उनमें अत्यन्त आसक्त ही हो ॥ २२ ॥
विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते ।
नैतत् कार्यं पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ २३ ॥
यदि कोई शास्त्रविरुद्ध कर्म बन जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। यदि दूसरी बार पाप बन जाय तो ‘अब फिर ऐसा काम नहीं करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेसे वह पापमुक्त हो सकता है ॥ २३ ॥
करिष्ये धर्ममेवेति तृतीयात् परिमुच्यते ।
शुचिस्तीर्थान्यनुचरन् बहुत्वात्परिमुच्यते ॥ २४ ॥
‘आजसे केवल धर्मका ही आचरण करूँगा’ ऐसा नियम लेनेसे वह तीसरी बारके पापसे छुटकारा पा जाता है और पवित्र तीर्थोंमें विचरण करनेवाला पुरुष अनेक बारके किये हुए बहुसंख्यक पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥
कल्याणमनुकर्तव्यं पुरुषेण बुभूषता ।
ये सुगन्धीनि सेवन्ते तथागन्धा भवन्ति ते ॥ २५ ॥
ये दुर्गन्धीनि सेवते तथागन्धा भवन्ति ते ।
तपश्चर्यापरः सद्यः पापाद् विपरिमुच्यते ॥ २६ ॥
सुखकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको कल्याणकारी कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये। जो सुगन्धित पदार्थोंका सेवन करते हैं, उनके शरीरसे सुगन्ध निकलती है और जो सदा दुर्गन्धका सेवन करते हैं, वे अपने शरीरसे दुर्गन्ध ही फैलाते हैं। जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर होता है, वह तत्काल सारे पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २५-२६ ॥
संवत्सरमुपास्याग्निमभिशस्तः प्रमुच्यते ।