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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर

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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर

युधिष्ठिर उवाच

यथा बुद्ध्या महीपालो भ्रष्टश्रीर्विचरेन्महीम् ।
कालदण्डविनिष्पिष्टस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया हो और कालके दण्डसे पिस गया हो, वह भूपाल किस बुद्धिसे इस पृथ्वीपर विचरे, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वासवस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य विरोचनकुमार बलि और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

पितामहमुपागम्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
सर्वानिवासुरान् जित्वा बलिं पप्रच्छ वासवः ॥ ३ ॥
एक समय इन्द्र समस्त असुरोंपर विजय पाकर पितामह ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन्होंने पूछा—'भगवन्! बलि कहाँ रहता है?' ॥ ३ ॥

यस्य स्म ददतो वित्तं न कदाचन हीयते ।
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥ ४ ॥
'ब्रह्मन्! जिसके दान देते समय उसके धनका भण्डार कभी खाली नहीं होता था, उस राजा बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ४ ॥

स वायुर्वरुणश्चैव स रविः स च चन्द्रमाः ।
सोऽग्निस्तपति भूतानि जलं च स भवत्युत ॥ ५ ॥
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।
'वह राजा बलि ही वायु बनकर चलता, वरुण बनकर वर्षा करता, सूर्य और चन्द्रमा बनकर प्रकाश करता, अग्नि बनकर समस्त प्राणियोंको ताप देता तथा जल बनकर सबकी प्यास बुझाता था, उसी राजा बलिको मैं कहीं नहीं पा रहा हूँ। ब्रह्मन्! आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ५ १/२ ॥

स एव ह्यस्तमयते स स्म विद्योतते दिशः ॥ ६ ॥
स वर्षति स्म वर्षाणि यथाकालमतन्द्रितः ।

तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।। ७ ।। 'वही यथासमय आलस्य छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाशित होता, वही अस्त होता और वही वर्षा करता था। ब्रह्मन्! उस बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे राजा बलिका पता बताइये ।। ६-७ ।।

ब्रह्मोवाच नैतत् ते साधु मघवन् यदेनमनुपृच्छसि । पृष्टस्तु नानृतं ब्रूयात् तस्माद् वक्ष्यामि ते बलिम् ।। ८ ।। **ब्रह्माजीने कहा—**मघवन्! यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है कि तुम मुझसे बलिका पता पूछ रहे हो। पूछनेपर झूठ नहीं बोलना चाहिये, इसलिये मैं तुमसे बलिका पता बता रहा हूँ ।। ८ ।।

उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः । वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ।। ९ ।। शचीपते! किसी शून्य घरमें ऊँट, गौ, गर्दभ अथवा अश्वजातिके पशुओंमें जो श्रेष्ठ जीव उपलब्ध हो, उसे बलि समझो ।। ९ ।।

शक्र उवाच यदि स्म बलिना ब्रह्मन् शून्यागारे समेयिवान् । हन्यामेनं न वा हन्यां तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ।। १० ।। **इन्द्रने पूछा—**ब्रह्मन्! यदि किसी एकान्त गृहमें राजा बलिसे मेरी भेंट हो जाय तो मैं उन्हें मार डालूँ या न मारूँ, यह मुझे बतावें ।। १० ।।

ब्रह्मोवाच मा स्म शक्र बलिं हिंसीर्न बलिर्वधमर्हति । न्यायस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वया वासव काम्यया ।। ११ ।। **ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! तुम बलिका वध न करना, बलि वधके योग्य नहीं है। वासव! तुम उनसे इच्छानुसार न्यायोचित व्यवहारके विषयमें प्रश्न कर सकते हो ।। ११ ।।

भीष्म उवाच एवमुक्तो भगवता महेन्द्रः पृथिवीं तदा । चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिया वृतः ।। १२ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके इस प्रकार आदेश देनेपर देवराज इन्द्र ऐरावतकी पीठपर सवार हो राजलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे ।। १२ ।।

ततो ददर्श स बलिं खरवेषेण संवृतम् ।

यथाऽऽख्यातं भगवता शून्यागारकृतालयम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन्होंने भगवान् ब्रह्माके बताये अनुसार एक शून्य घरमें निवास करनेवाले राजा बलिको देखा, जिन्होंने गर्दभके वेषमें अपने आपको छिपा रखा था ॥ १३ ॥

शक्र उवाच

खरयोनिमनुप्राप्तस्तुषभक्षोऽसि दानव ।
इयं ते योनिरधमा शोचस्याहो न शोचसि ॥ १४ ॥
**इन्द्र बोले—**दानव! तुम गदहेकी योनिमें पड़कर भूसी खा रहे हो। यह नीच योनि तुम्हें प्राप्त हुई है। इसके लिये तुम्हें शोक होता है या नहीं? ॥ १४ ॥
अदृष्टं बत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् ।
श्रिया विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
आज तुम्हारी ऐसी अवस्था देख रहा हूँ, जो पहले कभी नहीं देखी गयी थी। तुम शत्रुओंके वशमें पड़ गये हो। राजलक्ष्मी तथा मित्रोंसे हीन हो गये हो तथा तुम्हारा बल-पराक्रम नष्ट हो गया है ॥ १५ ॥
यत् तद् यानसहस्रैस्त्वं ज्ञातिभिः परिवारितः ।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन् ॥ १६ ॥
पहले तुम अपने सहस्रों वाहनों और सजातीय बन्धुओंसे घिरकर सब लोगोंको ताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे ॥ १६ ॥
त्वन्मुखाश्चैव दैतेया व्यतिष्ठंस्तव शासने ।
अकृष्टपच्या च मही तवैश्वर्ये बभूव ह ॥ १७ ॥
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि ।
सब दैत्य तुम्हारा मुँह जोहते हुए तुम्हारे ही शासनमें रहते थे। तुम्हारे राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा करती थी। परंतु आज तुम्हारे ऊपर यह संकट आ पहुँचा है। इसके लिये तुम शोक करते हो या नहीं? ॥ १७ १/२ ॥
यदाऽऽतिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिहन् ॥ १८ ॥
ज्ञातीन् विभजतो वित्तं तदाऽऽसीत् ते मनः कथम् ।
जिस समय तुम समुद्रके पूर्वतटपर विविध भोगोंका आस्वादन करते हुए निवास करते थे और अपने भाई-बन्धुओंको धन बाँटते थे, उस समय तुम्हारे मनकी अवस्था कैसी रही होगी? ॥ १८ १/२ ॥
यत् ते सहस्रसमिता ननृतुर्देवयोषितः ॥ १९ ॥
बहूनि वर्षपूगानि विहारे दीप्यतः श्रिया ।
सर्वाः पुष्करमालिन्यः सर्वाः काञ्चनसुप्रभाः ॥ २० ॥
कथमद्य तदा चैव मनस्ते दानवेश्वर ।

तुमने बहुत वर्षोंतक राजलक्ष्मीसे सुशोभित हो विहारमें समय बिताया है। उस समय सुवर्णकी-सी कान्तिवाली सहस्रों देवांगनाएँ जो सब-की-सब पद्ममालाओंसे अलंकृत होती थीं, तुम्हारे सामने नृत्य किया करती थीं। दानवराज! उन दिनों तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी और अब कैसी है? ।। १९-२०१/२ ।।

छत्रं तवासीत् सुमहत् सौवर्णं रत्नभूषितम् ।। २१ ।।
ननृतुस्तत्र गन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ।
एक समय था, जब कि तुम्हारे ऊपर सोनेका बना हुआ रत्नभूषित विशाल छत्र तना रहता था और छः हजार गन्धर्व सप्त स्वरोंमें गीत गाते हुए तुम्हारे सम्मुख अपनी नृत्यकलाका प्रदर्शन करते थे ।। २११/२ ।।

यूपस्तवासीत् सुमहान् यजतः सर्वकाञ्चनः ।। २२ ।।
यत्राददः सहस्राणि अयुतानां गवां दश ।
अनन्तरं सहस्रेण तदाऽऽसीद् दैत्य का मतिः ।। २३ ।।
यज्ञ करते समय तुम्हारे यज्ञमण्डपका अत्यन्त विशाल मध्यवर्ती स्तम्भ पूरा-का-पूरा सोनेका बना होता था। जिस समय तुम निरन्तर दस-दस करोड़ गौओंका सहस्रों बार दान किया करते थे, दैत्यराज! उस समय तुम्हारे मनमें कैसे विचार उठते रहे होंगे? ।। २२-२३ ।।

यदा च पृथिवीं सर्वां यजमानोऽनुपर्यगाः ।
शम्याक्षेपेण विधिना तदाऽऽसीत् किं तु ते हृदि ।। २४ ।।
जब तुमने शम्याक्षेपकी* विधिसे यज्ञ करते हुए सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की थी, उस समय तुम्हारे हृदयमें कितना उत्साह रहा होगा? ।। २४ ।।

न ते पश्यामि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च ते मालां न पश्याम्यसुराधिप ।। २५ ।।
असुरराज! अब तो मैं तुम्हारे पास न तो सोनेकी झारी, न छत्र और न चँवर ही देखता हूँ तथा ब्रह्माजीकी दी हुई वह दिव्य माला भी तुम्हारे गलेमें नहीं दिखायी देती है ।।

(भीष्म उवाच

ततः प्रहस्य स बलिर्वासवेन समीरितम् ।
निशम्य भावगम्भीरं सुरराजमथाब्रवीत् ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इन्द्रकी कही हुई वह भावगम्भीर वाणी सुनकर राजा बलि हँस पड़े और देवराजसे इस प्रकार बोले ।।

बलिरुवाच

अहो हि तव बालिश्यमिह देवगणाधिप ।
अयुक्तं देवराजस्य तव कत्थमिदं वचः ।।)

बलिने कहा— देवेश्वर! यहाँ तुमने जो मूर्खता दिखायी है, वह मेरे लिये आश्चर्यजनक है। तुम देवताओंके राजा हो। इस तरह दूसरोंको कष्ट देनेवाली बात कहना तुम्हारे लिये योग्य नहीं है।।

न त्वं पश्यसि भृङ्गारं न छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च मे मालां न त्वं द्रक्ष्यसि वासव ॥ २६ ॥
इन्द्र! इस समय तुम मेरी सोनेकी झारीको, मेरे छत्र और चँवरको तथा ब्रह्माजीकी दी हुई मेरी उस दिव्य मालाको भी नहीं देख सकोगे ।। २६ ।।

गुहायां निहितानि त्वं मम रत्नानि पृच्छसि ।
यदा मे भविता कालस्तदा त्वं तानि द्रक्ष्यसि ॥ २७ ॥
तुम मेरे जिन रत्नोंके विषयमें पूछ रहे हो, वे सब गुफामें छिपा दिये गये हैं। जब मेरे लिये अच्छा समय आयेगा, तब तुम फिर उन्हें देखोगे ।। २७ ।।

न त्वेतदनुरूपं ते यशसो वा कुलस्य च ।
समृद्धार्थोऽसमृद्धार्थं यन्मां कथितुमिच्छसि ॥ २८ ॥
इस समय तुम समृद्धिशाली हो और मेरी समृद्धि छिन गयी है, ऐसी अवस्थामें जो तुम मेरे सामने अपनी प्रशंसाके गीत गाना चाहते हो, यह तुम्हारे कुल और यशके अनुरूप नहीं है ।। २८ ।।

न हि दुःखेषु शोचन्ते न प्रहृष्यन्ति चर्धिषु ।
कृतप्रज्ञा ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ॥ २९ ॥
जिसकी बुद्धि शुद्ध है तथा जो ज्ञानसे तृप्त हैं, वे क्षमाशील मनीषी सत्पुरुष दुःख पड़नेपर शोक नहीं करते और समृद्धि प्राप्त होनेपर हर्षसे फूल नहीं उठते ।। २९ ।।

त्वं तु प्राकृतया बुद्ध्या पुरन्दर विकत्थसे ।
यदाहमिव भावी स्यास्तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३० ॥
पुरन्दर! तुम अपनी अशुद्ध बुद्धिके कारण मेरे सामने आत्मप्रशंसा कर रहे हो। जब मेरी-जैसी स्थिति तुम्हारी भी हो जायगी, तब ऐसी बात नहीं बोल सकोगे ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादो नाम
त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि और इन्द्रका संवाद नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं)

*– शम्याक्षेप कहते हैं शम्यापातको। ‘शम्या’ एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है। उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर जोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ‘शम्यापात’ कहते हैं।

बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना

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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना

भीष्म उवाच

पुनरेव तु तं शक्रः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं प्रव्याहाराय भारत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! ऐसा कहकर सर्पके समान फुफकारते हुए बलिसे इन्द्रने पुनः अपना उत्कर्ष सूचित करनेके लिये हँसते हुए कहा ॥ १ ॥

शक्र उवाच

यत् तद् यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः ।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन् ॥ २ ॥
दृष्ट्वा सुकृपणां चेमामवस्थामात्मनो बले ।
ज्ञातिमित्रपरित्यक्तः शोचस्याहो न शोचसि ॥ ३ ॥
**इन्द्र बोले—**दैत्यराज बलि! पहले जो तुम सहस्रों वाहनों और भाई-बन्धुओंसे घिरकर सम्पूर्ण लोकोंको संताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे और अब बन्धु-बान्धवों तथा मित्रोंसे परित्यक्त होकर जो अपनी यह अत्यन्त दीनदशा देख रहे हो, इससे तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं? ॥

प्रीतिं प्राप्यातुलां पूर्वं लोकांश्चात्मवशे स्थितान् ।
विनिपातमिमं बाह्यं शोचस्याहो न शोचसि ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें तुमने सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर लिया था और अनुपम प्रसन्नता प्राप्त की थी; किंतु इस समय बाह्य जगत्में तुम्हारा यह घोर पतन हुआ है, यह सब सोचकर तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं? ॥ ४ ॥

बलिरुवाच

अनित्यमुपलक्ष्येह कालपर्यायधर्मतः ।
तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥ ५ ॥
**बलिने कहा—**इन्द्र! कालचक्र स्वभावसे ही परिवर्तनशील है, उसके द्वारा यहाँकी प्रत्येक वस्तुको मैं अनित्य समझता हूँ, इसीलिये कभी शोक नहीं करता हूँ; क्योंकि यह सारा जगत् विनाशशील है ॥ ५ ॥

अन्तवन्त इमे देहा भूतानां च सुराधिप ।
तेन शक्र न शोचामि नापराधादिदं मम ॥ ६ ॥

देवेश्वर! प्राणियोंके ये सारे शरीर अन्तवान् हैं; इसलिये मैं कभी शोक नहीं करता हूँ। यह गर्दभका शरीर भी मुझे किसी अपराधसे नहीं प्राप्त हुआ है (मैंने इसे स्वेच्छासे ग्रहण किया है) ॥ ६ ॥
जीवितं च शरीरं च जात्यैव सह जायते ।
उभे सह विवर्धेते उभे सह विनश्यतः ॥ ७ ॥
जीवन और शरीर दोनों जन्मके साथ ही उत्पन्न होते हैं, साथ ही बढ़ते हैं और साथ ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥
न हीदृशमहं भावमवशः प्राप्य केवलम् ।
यदेवमभिजानामि का व्यथा मे विजानतः ॥ ८ ॥
मैं इस गर्दभ-शरीरको पाकर भी विवश नहीं हुआ हूँ। जब मैं इस प्रकार देहकी अनित्यता और आत्माकी असंगताको जानता हूँ, तब यह जानते हुए मुझे क्या व्यथा हो सकती है? ॥ ८ ॥
भूतानां निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागरः ।
नैतत् सम्यग्विज्ञानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रधृक् ॥ ९ ॥
वज्रधारी इन्द्र! जैसे जलके प्रवाहोंका अन्तिम आश्रय समुद्र है, उसी प्रकार शरीरधारियोंकी अन्तिम गति मृत्यु है। जो पुरुष इस बातको अच्छी तरह जानते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ॥ ९ ॥
ये त्वेवं नाभिजानन्ति रजोमोहपरायणाः ।
ते कृच्छ्रं प्राप्य सीदन्ति बुद्धिर्येषां प्रणश्यति ॥ १० ॥
जो लोग रजोगुण (काम-क्रोध) और मोहके वशीभूत हो इस बातको भलीभाँति नहीं जानते हैं तथा जिनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वे संकटमें पड़नेपर बहुत दुखी होते हैं ॥ १० ॥
बुद्धिलाभात् तु पुरुषः सर्वं तुदति किल्बिषम् ।
विपाप्मा लभते सत्त्वं सत्त्वस्थः सम्प्रसीदति ॥ ११ ॥
जिसे सद्बुद्धि प्राप्त होती है, वह पुरुष उस बुद्धिके द्वारा सारे पापोंको नष्ट कर देता है। पापहीन होनेपर उसे सत्त्वगुणकी प्राप्ति होती है और सत्त्वगुणमें स्थित होकर वह सात्त्विक प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है ॥
ततस्तु ये निवर्तन्ते जायन्ते वा पुनः पुनः ।
कृपणाः परितप्यन्ते तैरर्थैरभिचोदिताः ॥ १२ ॥
जो मन्दबुद्धि मानव सत्त्वगुणसे भ्रष्ट हो जाते हैं, वे बारंबार इस संसारमें जन्म लेते हैं तथा रजोगुणजनित काम, क्रोध आदि दोषोंसे प्रेरित होकर सदा संतप्त होते रहते हैं ॥ १२ ॥
अर्थसिद्धिमनर्थं च जीवितं मरणं तथा ।

सुखदुःखफले चैव न द्वेष्मि न च कामये ॥ १३ ॥
मैं न तो अर्थसिद्धि, जीवन और सुखमय फलकी कामना करता हूँ और न अनर्थ, मृत्यु एवं दुःखमय फलसे द्वेष ही रखता हूँ ॥ १३ ॥
हतं हन्ति हतो ह्येव यो नरो हन्ति कञ्चन ।
उभौ तौ न विजानीतो यश्च हन्ति हतश्च यः ॥ १४ ॥
जो मनुष्य किसीकी हत्या करता है, वह वास्तवमें स्वयं मरा हुआ होते हुए मरे हुएको ही मारता है। जो मारता है और जो मारा जाता है, वे दोनों ही आत्माको नहीं जानते हैं (क्योंकि आत्मा हननक्रियाका न तो कर्म है, न कर्ता) ॥ १४ ॥
हत्वा जित्वा च मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते ।
अकर्ता ह्येव भवति कर्ता ह्येव करोति तत् ॥ १५ ॥
मघवन्! जो कोई किसीको मारकर या जीतकर अपने पौरुषपर गर्व करता है, वह वास्तवमें उस पुरुषार्थका कर्ता ही नहीं है; क्योंकि जो जगत्‌का कर्ता, जो परमात्मा है, वही उस कर्मका भी कर्ता है ॥ १५ ॥
को हि लोकस्य कुरुते विनाशप्रभवावुभौ ।
कृतं हि तत् कृतेनैव कर्ता तस्यापि चापरः ॥ १६ ॥
सम्पूर्ण जगत्‌का संहार और सृष्टि—इन दोनों कार्योंको कौन करता है? वह सब प्राणियोंके कर्मोंद्वारा ही किया गया है और उसका भी प्रयोजक कोई और (ईश्वर) ही है ॥ १६ ॥
पृथिवी ज्योतिराकाशमापो वायुश्च पञ्चमः ।
एतद्योनीनि भूतानि तत्र का परिदेवना ॥ १७ ॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंके कारण हैं; अतः उनके लिये शोक और विलापकी क्या आवश्यकता है? ॥ १७ ॥
महाविद्योऽल्पविद्यश्च बलवान् दुर्बलश्च यः ।
दर्शनीयो विरूपश्च सुभगो दुर्भगश्च यः ॥ १८ ॥
सर्वं कालः समादत्ते गम्भीरः स्वेन तेजसा ।
तस्मिन् कालवशं प्राप्ते का व्यथा मे विजानतः ॥ १९ ॥
कोई बड़ा भारी विद्वान् हो या अल्पविद्यासे युक्त, बलवान् हो या दुर्बल, सुन्दर हो या कुरूप, सौभाग्यशाली हो या दुर्भाग्ययुक्त, गम्भीर काल सबको अपने तेजसे ग्रहण कर लेता है; अतः उन सबके कालके अधीन हो जानेपर जगत्‌की क्षणभंगुरताको जाननेवाले मुझ बलिको क्या व्यथा हो सकती है? ॥ १८-१९ ॥
दग्धमेवानुदहति हतमेवानुहन्यते ।
नश्यते नष्टमेवाग्रे लब्धव्यं लभते नरः ॥ २० ॥

जो कालके द्वारा दग्ध हो चुका है, उसीको पीछेसे आग जलाती है। जिसे कालने पहलेसे ही मार डाला है, वही किसी दूसरेके द्वारा मारा जाता है। जो पहलेसे ही नष्ट हो चुकी है, वही वस्तु किसीके द्वारा नष्ट की जाती है तथा जिसका मिलना पहलेसे ही निश्चित है, उसीको मनुष्य हस्तगत करता है ।। २० ।। नास्य द्वीपः कुतः पारो नावारः सम्प्रदृश्यते । नान्तमस्य प्रपश्यामि विधेर्दिव्यस्य चिन्तयन् ।। २१ ।। मैं बहुत सोचनेपर भी दिव्य विधाता कालका अन्त नहीं देख पाता हूँ। उस समुद्र-जैसे कालका कहीं द्वीप भी नहीं है, फिर पार कहाँसे प्राप्त हो सकता है? उसका आर-पार कहीं नहीं दिखायी देता है ।। २१ ।। यदि मे पश्यतः कालो भूतानि न विनाशयेत् । स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ।। २२ ।। शचीपते! यदि काल मेरे देखते-देखते समस्त प्राणियोंका विनाश नहीं करता तो मुझे हर्ष होता, अपनी शक्तिपर गर्व होता और उस क्रूर कालपर मुझे क्रोध भी होता ।। २२ ।। तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे । बिभ्रतं गार्दभं रूपमागत्य परिगर्हसे ।। २३ ।। इस एकान्त गृहमें गर्दभका रूप धारण किये मुझे भूसी खाता जानकर तुम यहाँ आये हो और मेरी निन्दा करते हो ।। २३ ।। इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि बहुधाऽऽत्मनः । विभीषणानि यानीक्ष्य पलायेथास्त्वमेव मे ।। २४ ।। मैं चाहूँ तो अपने बहुत-से ऐसे भयानक रूप प्रकट कर सकता हूँ, जिन्हें देखकर तुम्हीं मेरे निकटसे भाग खड़े होओगे ।। २४ ।। कालः सर्वं समादत्ते कालः सर्वं प्रयच्छति । कालेन विहितं सर्वं मा कृथाः शक्र पौरुषम् ।। २५ ।। इन्द्र! काल ही सबको ग्रहण करता है, काल ही सब कुछ देता है तथा कालने ही सब कुछ किया है; अतः अपने पुरुषार्थका गर्व न करो ।। २५ ।। पुरा सर्वं प्रव्यथितं मयि क्रुद्धे पुरंदर । अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मं शक्र सनातनम् ।। २६ ।। पुरन्दर! पूर्वकालमें मेरे कुपित होनेपर सारा जगत् व्यथित हो उठता था। इस लोककी कभी वृद्धि होती है और कभी ह्रास। यह इसका सनातन स्वभाव है। शक्र! इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।। २६ ।। त्वमप्येवमवेक्षस्व माऽऽत्मना विस्मयं गमः । प्रभवश्च प्रभावश्च नात्मसंस्थः कदाचन ।। २७ ।।

तुम भी जगत्को इसी दृष्टिसे देखो। अपने मनमें विस्मित न होओ। प्रभुता और प्रभाव अपने अधीन नहीं हैं ॥ २७ ॥

कौमारमेव ते चित्तं तथैवाद्य यथा पुरा । समवेक्षस्व मघवन् बुद्धिं विन्दस्व नैष्ठिकीम् ॥ २८ ॥

तुम्हारा चित्त अभी बालकके समान है। वह जैसा पहले था, वैसा ही आज भी है। मघवन्! इस बातकी ओर दृष्टिपात करो और नैष्ठिक बुद्धि प्राप्त करो ॥ २८ ॥

देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः । आसन् सर्वे मम वशे तत् सर्वं वेत्थ वासव ॥ २९ ॥

वासव! एक दिन देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस—ये सभी मेरे अधीन थे। वह सब कुछ तुम जानते हो ॥ २९ ॥

नमस्तस्यै दिशेऽप्यस्तु यस्यां वैरोचनो बलिः । इति मामभ्यपद्यन्त बुद्धिमात्सर्यमोहिताः ॥ ३० ॥

मेरे शत्रु अपने बुद्धिगत द्वेषसे मोहित होकर मेरी शरण ग्रहण करते हुए ऐसा कहा करते थे कि विरोचनकुमार बलि जिस दिशामें हों, उस दिशाको भी हमारा नमस्कार है ॥ ३० ॥

नाहं तदनुशोचामि नात्मभ्रंशं शचीपते । एवं मे निश्चिता बुद्धिः शास्तुस्तिष्ठाम्यहं वशे ॥ ३१ ॥

शचीपते! मुझे अपने इस पतनके लिये तनिक भी शोक नहीं होता है, मेरी बुद्धिका ऐसा निश्चय है कि मैं सदा सबके शासक ईश्वरके वशमें हूँ ॥ ३१ ॥

दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीयः प्रतापवान् । दुःखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३२ ॥

एक उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ दर्शनीय एवं प्रतापी पुरुष अपने मन्त्रियोंके साथ दुःखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है, उसका वैसा ही भवितव्य था ॥ ३२ ॥

दौष्कुलेयस्तथा मूढो दुर्जातः शक्र दृश्यते । सुखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३३ ॥

इन्द्र! एक नीच कुलमें उत्पन्न हुआ मूढ़ मनुष्य जिसका जन्म दुराचारसे हुआ है, अपने मन्त्रियोंसहित सुखी जीवन बिताता देखा जाता है। उसकी भी वैसी ही होनहार समझनी चाहिये ॥ ३३ ॥

कल्याणी रूपसम्पन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते । अलक्षणा विरूपा च सुभगा दृश्यते परा ॥ ३४ ॥

शक्र! एक कल्याणमय आचार-विचार रखनेवाली सुरूपवती युवती विधवा हुई देखी जाती है और दूसरी कुलक्षणा और कुरूपा स्त्री सौभाग्यवती दिखायी देती है ॥ ३४ ॥

नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वया कृतम् ।

यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यच्चाप्येवंगता वयम् ॥ ३५ ॥ वज्रधारी इन्द्र! आज तो तुम इस तरह समृद्धिशाली हो गये हो और हमलोग जो ऐसी अवस्थामें पहुँच गये हैं, यह न तो हमारा किया हुआ है और न तुमने ही कुछ किया है ॥ ३५ ॥ न कर्म भविताप्येतत् कृतं मम शतक्रतो । ऋद्धिर्वाऽप्यथवा नर्द्धिः पर्यायकृतमेव तत् ॥ ३६ ॥ शतक्रतो! इस समय मैं इस परिस्थितिमें हूँ और जो कर्म मेरे इस शरीरसे हो रहा है, यह सब मेरा किया हुआ नहीं है। समृद्धि और निर्धनता (प्रारब्धके अनुसार) बारी-बारीसे सबपर आती है ॥ ३६ ॥ पश्यामि त्वां विराजन्तं देवराजमवस्थितम् । श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जमानं ममोपरि ॥ ३७ ॥ मैं देखता हूँ, इस समय तुम देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हो। अपने कान्तिमान् और तेजस्वी स्वरूपसे विराज रहे हो और मेरे ऊपर बारंबार गर्जना करते हो ॥ एवं नैव न चेत् कालो मामाक्रम्य स्थितो भवेत् । पातयेयमहं त्वाद्य सवज्रमपि मुष्टिना ॥ ३८ ॥ परंतु यदि इस तरह काल मुझपर आक्रमण करके मेरे सिरपर सवार न होता तो मैं आज वज्र लिये होनेपर भी तुम्हें केवल मुक्केसे मारकर धरतीपर गिरा देता ॥ न तु विक्रमकालोऽयं शान्तिकालोऽयमागतः । कालः स्थापयते सर्वं कालः पचति वै तथा ॥ ३९ ॥ किंतु यह मेरे लिये पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है; अपितु शान्त रहनेका समय आया है। काल ही सबको विभिन्न अवस्थाओंमें स्थापित करके सबका पालन करता है और काल ही सबको पकाता (क्षीण करता) है ॥ ३९ ॥ मां चेदभ्यागतः कालो दानवेश्वरपूजितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च कमन्यं नागमिष्यति ॥ ४० ॥ एक दिन मैं दानवेश्वरोंद्वारा पूजित था और मैं भी गर्जता तथा अपना प्रताप सर्वत्र फैलाता था। जब मुझपर भी कालका आक्रमण हुआ है, तब दूसरे किसपर वह आक्रमण नहीं करेगा? ॥ ४० ॥ द्वादशानां तु भवतामादित्यानां महात्मनाम् । तेजांस्येकेन सर्वेषां देवराज धृतानि मे ॥ ४१ ॥ देवराज! तुमलोग जो बारह महात्मा आदित्य कहलाते हो, तुम सब लोगोंके तेज मैंने अकेले धारण कर रखे थे ॥ ४१ ॥ अहमेवोद्वहाम्यापो विसृजामि च वासव । तपामि चैव त्रैलोक्यं विद्योताम्यहमेव च ॥ ४२ ॥

वासव! मैं ही सूर्य बनकर अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीका जल ऊपर उठाता और मेघ बनकर वर्षा करता था। मैं ही त्रिलोकीको ताप देता और विद्युत् बनकर प्रकाश फैलाता था ॥ ४२ ॥ संरक्षामि विलुम्पामि ददाम्यहमथाददे । संयच्छामि नियच्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वरः ॥ ४३ ॥ मैं प्रजाकी रक्षा करता था और लुटेरोंको लूट भी लेता था। मैं सदा दान देता और प्रजासे कर लेता था। मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका शासक और प्रभु होकर सबको संयम-नियममें रखता था ॥ ४३ ॥ तदद्य विनिवृत्तं मे प्रभुत्वममराधिप । कालसैन्यावगाढस्य सर्वं न प्रतिभाति मे ॥ ४४ ॥ अमरेश्वर! आज मेरी वह प्रभुता समाप्त हो गयी। कालकी सेनासे मैं आक्रान्त हो गया हूँ; अतः मेरा वह सब ऐश्वर्य अब प्रकाशित नहीं हो रहा है ॥ ४४ ॥ नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्यः कर्ता शचीपते । पर्यायेण हि भुज्यन्ते लोकाः शक्र यदृच्छया ॥ ४५ ॥ शचीपति इन्द्र! न मैं कर्ता हूँ, न तुम कर्ता हो और न कोई दूसरा ही कर्ता है। काल बारी-बारीसे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका उपभोग करता है ॥ मासमासार्धवेश्मानमहोरात्राभिसंवृतम् । ऋतुद्वारं वर्षमुखमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ४६ ॥ वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं कि मास और पक्ष कालके आवास (शरीर) हैं। दिन और रात उसके आवरण (वस्त्र) हैं। ऋतुएँ द्वार (मन-इन्द्रिय) हैं और वर्ष मुख है। वह काल आयुस्वरूप है ॥ ४६ ॥ आहुः सर्वमिदं चिन्त्यं जनाः केचिन्मनीषया । अस्याः पञ्चैव चिन्तायाः पर्येष्यामि च पञ्चधा ॥ ४७ ॥ कुछ विद्वान् अपनी बुद्धिके बलसे कहते हैं कि यह सब कुछ कालसंज्ञक ब्रह्म है। इसका इसी रूपमें चिन्तन करना चाहिये। इस चिन्तनके मास आदि उपर्युक्त पाँच ही विषय हैं। मैं पूर्वोक्त पाँच भेदोंसे युक्त कालको जानता हूँ ॥ ४७ ॥ गम्भीरं गहनं ब्रह्म महत्तोयार्णवं यथा । अनादिनिधनं चाहुरक्षरं क्षरमेव च ॥ ४८ ॥ वह कालरूप ब्रह्म अनन्त जलसे भरे हुए महासागरके समान गम्भीर एवं गहन है। उसका कहीं आदि-अन्त नहीं है। उसे ही क्षर एवं अक्षररूप बताया गया है ॥ सत्त्वेषु लिङ्गमावेश्य निर्लिङ्गमपि तत् स्वयम् । मन्यन्ते ध्रुवमेवैनं ये जनास्तत्त्वदर्शिनः ॥ ४९ ॥

जो लोग तत्त्वदर्शी हैं, वे निश्चितरूपसे ऐसा मानते हैं कि वह कालरूप परब्रह्म परमात्मा स्वयं निराकार होते हुए भी समस्त प्राणियोंके भीतर जीवका प्रवेश कराता है ।। ४९ ।। भूतानां तु विपर्यासं कुरुते भगवानिति ।
न ह्येतावद् भवेद् गम्यं न यस्मात् प्रभवेत् पुनः ॥ ५० ॥
भगवान् काल ही समस्त प्राणियोंकी अवस्थामें उलट-फेर कर देते हैं। कोई भी व्यक्ति उनके इस माहात्म्यको समझ नहीं पाता। कालकी ही महिमासे पराजित होकर मनुष्य कुछ भी कर नहीं पाता ।। ५० ।।
गतिं हि सर्वभूतानामगत्वा क्व गमिष्यति ।
यो धावता न हातव्यस्तिष्ठन्नपि न हीयते ॥ ५१ ॥
तमिन्द्रियाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति पञ्चधा ।
आहुश्चैनं केचिदग्निं केचिदाहुः प्रजापतिम् ॥ ५२ ॥
देवराज! समस्त प्राणियोंकी गति जो काल है, उसको प्राप्त हुए बिना तुम कहाँ जाओगे? मनुष्य भागकर भी उसे छोड़ नहीं सकता—उससे दूर नहीं जा सकता और न खड़ा होकर ही उसके चंगुलसे छूट सकता है। श्रवण आदि समस्त इन्द्रियाँ मास-पक्ष आदि पाँच भेदोंसे युक्त उस कालका अनुभव नहीं कर पातीं। कुछ लोग इन कालदेवताको अग्नि कहते हैं और कुछ प्रजापति ।।
ऋतून् मासार्धमासांश्च दिवसांश्च क्षणांस्तथा ।
पूर्वाह्नमपराह्नं च मध्याह्नमपि चापरे ॥ ५३ ॥
मुहूर्तंमपि चैवाहुरेकं सन्त मनेकधा ।
तं कालमिति जानीहि यस्य सर्वमिदं वशे ॥ ५४ ॥
दूसरे लोग उस कालको ऋतु, मास, पक्ष, दिन, क्षण, पूर्वाह्न, अपराह्न और मध्याह्न कहते हैं। उसीको विद्वान् पुरुष मुहूर्त भी कहते हैं। वह एक होकर भी अनेक प्रकारका बताया जाता है। इन्द्र! तुम उस कालको इस प्रकार जानो। यह सारा जगत् उसीके अधीन है।।
बहूनीन्द्रसहस्राणि समतीतानि वासव ।
बलवीर्योपपन्नानि यथैव त्वं शचीपते ॥ ५५ ॥
शचीपति इन्द्र! जैसे तुम हो, वैसे ही बल और पराक्रमसे सम्पन्न अनेक सहस्र इन्द्र समाप्त हो चुके हैं।।
त्वामप्यतिबलं शक्र देवराजं बलोत्कटम् ।
प्राप्ते काले महावीर्यः कालः संशमयिष्यति ॥ ५६ ॥
शक्र! तुम अपनेको अत्यन्त शक्तिशाली और उत्कट बलसे युक्त देवराज समझते हो; परंतु समय आनेपर महापराक्रमी काल तुम्हें भी शान्त कर देगा ।। ५६ ।।

य इदं सर्वमादत्ते तस्माच्छक्र स्थिरो भव । मया त्वया च पूर्वैश्च न स शक्योऽतिवर्तितुम् ॥ ५७ ॥ इन्द्र! वह काल ही सम्पूर्ण जगत्‌को अपने वशमें कर लेता है; अतः तुम भी स्थिर रहो। मैं, तुम तथा हमारे पूर्वज भी कालकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकते ॥ ५७ ॥

यामेतां प्राप्य जानीषे राज्यश्रियमनुत्तमाम् । स्थिता मयीति तन्मिथ्या नैषा ह्येकत्र तिष्ठति ॥ ५८ ॥ तुम जिस इस परम उत्तम राजलक्ष्मीको पाकर यह जानते हो कि यह मेरे पास स्थिरभावसे रहेगी, तुम्हारी यह धारणा मिथ्या है; क्योंकि यह कहीं एक जगह बँधकर नहीं रहती है ॥ ५८ ॥

स्थिता हीन्द्र सहस्रेषु त्वद्विशिष्टतमेष्वियम् । मां च लोला परित्यज्य त्वामगाद् विबुधाधिप ॥ ५९ ॥ इन्द्र! यह लक्ष्मी तुमसे भी श्रेष्ठ सहस्रों पुरुषोंके पास रह चुकी है। देवेश्वर! इस समय यह चंचला मुझे भी छोड़कर तुम्हारे पास गयी है ॥ ५९ ॥

मैवं शक्र पुनः कार्षीः शान्तो भवितुमर्हसि । त्वामप्येवंविधं ज्ञात्वा क्षिप्रमन्यं गमिष्यति ॥ ६० ॥ शक्र! अब फिर तुम ऐसा बर्ताव न करना। अब तुमको शान्ति धारण कर लेनी चाहिये। तुम्हें भी मेरी-जैसी स्थितिमें जानकर यह लक्ष्मी शीघ्र किसी दूसरेके पास चली जायगी ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादे चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि और इन्द्रका संवादविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥

इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा

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पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा

भीष्म उवाच

शतक्रतुरथापश्यद् बलेर्दीप्तां महात्मनः ।
स्वरूपिणीं शरीराद्धि निष्क्रामन्तीं तदा श्रियम् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर इन्द्रने देखा कि महात्मा बलिके शरीरसे परम सुन्दरी तथा कान्तिमती लक्ष्मी मूर्तिमती होकर निकल रही हैं ॥ १ ॥

तां दृष्ट्वा प्रभया दीप्तां भगवान् पाकशासनः ।
विस्मयोत्फुल्लनयनो बलिं पप्रच्छ वासवः ॥ २ ॥
पाकशासन भगवान् इन्द्र प्रभासे प्रकाशित होनेवाली उस लक्ष्मीको देखकर आश्चर्यचकित हो उठे। उनके नेत्र विस्मयसे खिल उठे। उन्होंने बलिसे पूछा ॥ २ ॥

शक्र उवाच

बले केयमपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी ।
त्वत्तः स्थिता सकेयूरा दीप्यमाना स्वतेजसा ॥ ३ ॥
**इन्द्र बोले—**बले! यह वेणी धारण करनेवाली कान्तिमयी कौन सुन्दरी तुम्हारे शरीरसे निकल कर खड़ी है? इसकी भुजाओंमें बाजूबंद शोभा पा रहे हैं और यह अपने तेजसे उद्भासित हो रही है ॥ ३ ॥

बलिरुवाच

न हीमामासुरीं वेद्मि न दैवीं च न मानुषीम् ।
त्वमेनां पृच्छ वा मा वा यथेष्टं कुरु वासव ॥ ४ ॥
**बलिने कहा—**इन्द्र! मेरी समझमें न तो यह असुरकुलकी स्त्री है, न देवजातिकी है और न मानवी ही है। तुम जानना चाहते हो तो इसीसे पूछो अथवा न पूछो। जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो ॥ ४ ॥

शक्र उवाच

का त्वं बलेरपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी ।
अजानतो ममाचक्ष्व नामधेयं शुचिस्मिते ॥ ५ ॥
का त्वं तिष्ठसि मामेवं दीप्यमाना स्वतेजसा ।
हित्वा दैत्यवरं सुभ्रु तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ६ ॥

**तब इन्द्रने पूछा—**पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी! बलिके शरीरसे निकलकर खड़ी हुई तुम कौन हो? तुम्हारी चमक-दमक अद्भुत है। तुम्हारी वेणी भी अत्यन्त सुन्दर है। मैं तुम्हें जानता नहीं हूँ; इसलिये पूछता हूँ। तुम मुझे अपना नाम बताओ। सुभ्रू! दैत्यराजको त्यागकर अपने तेजसे मुझे प्रकाशित करती हुई इस प्रकार तुम कौन खड़ी हो? मेरे प्रश्नके अनुसार अपना परिचय दो ।। ५-६ ।।

श्रीरुवाच

न मां विरोचनो वेद नायं वैरोचनो बलिः । आहुर्मां दुःसहेत्येवं विधित्सेति च मां विदुः ।। ७ ।। **लक्ष्मी बोली—**मुझे न तो विरोचन जानता है और न उसका पुत्र यह बलि। लोग मुझे दुःसहा कहते हैं और कुछ लोग मुझे विधित्साके नामसे भी जानते हैं ।। भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येवं च वासव । त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ।। ८ ।। वासव! जानकार मनुष्य मुझे भूति, लक्ष्मी और श्री भी कहते हैं। शक्र! तुम मुझे नहीं जानते तथा सम्पूर्ण देवताओंको भी मेरे विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं है ।। ८ ।।

शक्र उवाच

किमिदं त्वं मम कृते उताहो बलिनः कृते । दुःसहे विजहास्येनं चिरसंवासिनी सती ।। ९ ।। **इन्द्रने पूछा—**दुःसहे! तुमने चिरकालतक राजा बलिके शरीरमें निवास किया है, अब क्या तुम मेरे लिये अथवा बलिके ही हितके लिये इनका त्याग कर रही हो? ।। ९ ।।

श्रीरुवाच

नो धाता न विधाता मां विदधाति कथंचन । कालस्तु शक्र पर्यागान्मैनं शक्रावमन्यथाः ।। १० ।। **लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! धाता या विधाता किसी प्रकार भी मुझे किसी कार्यमें नियुक्त नहीं कर सकते हैं; किंतु कालका ही आदेश मुझे मानना पड़ता है। वही काल इस समय बलिका परित्याग करनेके लिये मुझे प्रेरित करनेके निमित्त उपस्थित हुआ है। इन्द्र! तुम उस कालकी अवहेलना न करना ।। १० ।।

शक्र उवाच

कथं त्वया बलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि । कथं च मां न जहास्त्वं तन्मे ब्रूहि शुचिस्मिते ।। ११ ।। **इन्द्रने पूछा—**वेणी धारण करनेवाली लक्ष्मी! तुमने बलिका कैसे और किसलिये त्याग किया है? शुचिस्मिते! तुम मेरा त्याग किस प्रकार नहीं करोगी? यह मुझे बताओ ।। ११ ।।

श्रीरुवाच

सत्ये स्थितास्मि दाने च व्रते तपसि चैव हि ।
पराक्रमे च धर्मे च पराचीनस्ततो बलिः ॥ १२ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**मैं सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम और धर्ममें निवास करती हूँ। राजा बलि इन सबसे विमुख हो चुके हैं ॥ १२ ॥

ब्रह्मण्योऽयं पुरा भूत्वा सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
अभ्यसूयद् ब्राह्मणानामुच्छिष्टश्चास्पृशद् घृतम् ॥ १३ ॥
ये पहले ब्राह्मणोंके हितैषी, सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे; किंतु आगे चलकर ब्राह्मणोंके प्रति इनकी दोषद्रष्टि हो गयी तथा इन्होंने जूठे हाथसे घी छू दिया था ॥ १३ ॥

यज्ञशीलः सदा भूत्वा मामेव यजत स्वयम् ।
प्रोवाच लोकान् मूढात्मा कालेनोपनिपीडितः ॥ १४ ॥
पहले ये सदा यज्ञ किया करते थे; किंतु आगे चलकर कालसे पीड़ित एवं मोहितचित्त होकर इन्होंने सब लोगोंको स्वयं ही स्पष्टरूपसे आदेश दिया कि तुम सब लोग मेरा ही यजन करो ॥ १४ ॥

अपाकृता ततः शक्र त्वयि वत्स्यामि वासव ।
अप्रमत्तेन धार्यास्मि तपसा विक्रमेण च ॥ १५ ॥
वासव! इस प्रकार इनके द्वारा तिरस्कृत होकर अब मैं तुममें ही निवास करूँगी। तुम्हें सदा सावधान रहकर तपस्या और पराक्रमद्वारा मुझे धारण करना चाहिये ॥

शक्र उवाच

नास्ति देवमनुष्येषु सर्वभूतेषु वा पुमान् ।
यस्त्वामेको विषहितुं शक्नुयात् कमलालये ॥ १६ ॥
**इन्द्रने कहा—**कमलालये! देवताओं, मनुष्यों अथवा सम्पूर्ण प्राणियोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो अकेला तुम्हारा भार सहन कर सके? ॥ १६ ॥

श्रीरुवाच

नैव देवो न गन्धर्वो नासुरो न च राक्षसः ।
यो मामेको विषहितुं शक्तः कश्चित् पुरंदर ॥ १७ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**पुरंदर! देवता, गन्धर्व, असुर और राक्षस कोई भी अकेला मेरा भार सहन नहीं कर सकता ॥ १७ ॥

शक्र उवाच

तिष्ठेथा मयि नित्यं त्वं यथा तद् ब्रूहि मे शुभे ।
तत् करिष्यामि ते वाक्यमृतं तत् वक्तुमर्हसि ॥ १८ ॥

इन्द्रने कहा— शुभे! तुम जिस प्रकार मेरे निकट सदा निवास कर सको, वह उपाय मुझे बताओ। मैं तुम्हारी आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन करूँगा; क्योंकि तुम वह उपाय मुझे अवश्य बता सकती हो ॥ १८ ॥

श्रीरुवाच

स्थास्यामि नित्यं देवेन्द्र यथा त्वयि निबोध तत् ।
विधिना वेददृष्टेन चतुर्धा विभजस्व माम् ॥ १९ ॥
लक्ष्मीने कहा— देवेन्द्र! मैं जिस उपायसे तुम्हारे निकट सदा निवास कर सकूँगी, वह बताती हूँ, सुनो। तुम वेदमें बतायी हुई विधिसे मुझे चार भागोंमें विभक्त करो ॥ १९ ॥

शक्र उवाच

अहं वै त्वां निधास्यामि यथाशक्ति यथाबलम् ।
न तु मेऽतिक्रमः स्याद् वै सदा लक्ष्मि तवान्तिके ॥ २० ॥
इन्द्रने कहा— लक्ष्मी! मैं शारीरिक बल और मानसिक शक्तिके अनुसार तुम्हें धारण करूँगा, किंतु तुम्हारे निकट कभी मेरा परित्याग न हो ॥ २० ॥
भूमिरेव मनुष्येषु धारिणी भूतभाविनी ।
सा ते पादं तितिक्षेत समर्था हीति मे मतिः ॥ २१ ॥
मेरी यह धारणा है कि मनुष्यलोकमें सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाली यह पृथ्वी ही सबको धारण करती है। वह तुम्हारे पैरका भार सह सकेगी; क्योंकि वह सामर्थ्यशालिनी है ॥ २१ ॥

श्रीरुवाच

एष मे निहितः पादो योऽयं भूमौ प्रतिष्ठितः ।
द्वितीयं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २२ ॥
लक्ष्मीने कहा— इन्द्र! यह जो मेरा एक पैर पृथ्वी पर रखा हुआ है, इसे मैंने यहीं प्रतिष्ठित कर दिया। अब तुम मेरे दूसरे पैरको भी सुप्रतिष्ठित करो ॥ २२ ॥

शक्र उवाच

आप एव मनुष्येषु द्रवन्त्यः परिचारिणीः ।
तास्ते पादं तितिक्षन्तामलमापस्तितिक्षितुम् ॥ २३ ॥
इन्द्रने कहा— लक्ष्मी! मनुष्यलोकमें जल ही सब ओर प्रवाहित होता है; अतः वही तुम्हारे दूसरे पैरका भार सहन करे; क्योंकि जल इस कार्यके लिये पूर्ण समर्थ है ॥ २३ ॥

श्रीरुवाच

एष मे निहितः पादो योऽयमप्सु प्रतिष्ठितः ।

तृतीयं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २४ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! लो, मैंने यह पैर जलमें रख दिया। अब यह जलमें ही सुप्रतिष्ठित है। अब तुम मेरे तीसरे पैरको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २४ ॥

शक्र उवाच

यस्मिन् वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मिन् देवाः प्रतिष्ठिताः ।
तृतीयं पादमग्निस्ते सुधृतं धारयिष्यति ॥ २५ ॥
**इन्द्रने कहा—**देवि! जिसमें वेद, यज्ञ और सम्पूर्ण देवता प्रतिष्ठित हैं। वे अग्निदेव तुम्हारे तीसरे पैरको अच्छी तरह धारण करेंगे ॥ २५ ॥

श्रीरुवाच

एष मे निहितः पादो योऽयमग्नौ प्रतिष्ठितः ।
चतुर्थं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २६ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! यह तीसरा पाद मैंने अग्निमें रख दिया। अब यह अग्निमें प्रतिष्ठित है। इसके बाद मेरे चौथे पादको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २६ ॥

शक्र उवाच

ये वै सन्तो मनुष्येषु ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।
ते ते पादं तितिक्षन्तामलं सन्तस्तितिक्षितुम् ॥ २७ ॥
**इन्द्र बोले—**देवि! मनुष्योंमें जो ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे आपके चौथे पादका भार वहन करें; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष उसे सहन करनेमें पूर्ण समर्थ हैं ॥ २७ ॥

श्रीरुवाच

एष मे निहितः पादो योऽयं सत्सु प्रतिष्ठितः ।
एवं हि निहितां शक्र भूतेषु परिधत्स्व माम् ॥ २८ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! यह मैंने अपना चौथा पाद रखा। अब यह सत्पुरुषोंमें प्रतिष्ठित हुआ। इसी प्रकार तुम अब सम्पूर्ण भूतोंमें मुझे स्थापित करके सब ओरसे मेरी रक्षा करो ॥ २८ ॥

शक्र उवाच

भूतानामिह यो वै त्वां मया विनिहितां सतीम् ।
उपहन्यात् स मे धृष्यस्तथा शृण्वन्तु मे वचः ॥ २९ ॥
**इन्द्रने कहा—**देवि! मेरेद्वारा स्थापित की हुई आपको समस्त प्राणियोंमेंसे जो भी पीड़ा देगा, वह मेरेद्वारा दण्डनीय होगा। मेरी यह बात वे सब लोग सुन लें ॥
ततस्त्यक्तः श्रिया राजा दैत्यानां बलिरब्रवीत् ।