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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

जो उत्तम कुल और अपने ही देशमें उत्पन्न हुए हों, बुद्धिमान्, रूपवान्, बहुज्ञ, निर्भय और अनुरक्त हों, वे ही तुम्हारे परिच्छद (सेनापति आदि) होने चाहिये ॥ ६ ॥

दौष्कुलेयाश्च लुब्धाश्च नृशंसा निरपत्रपाः ।
ते त्वां तात निषेवेयुर्यावदार्द्रकपाणयः ॥ ७ ॥
तात! जो निन्दित कुलमें उत्पन्न, लोभी, क्रूर और निर्लज्ज हैं, वे तभीतक तुम्हारी सेवा करेंगे, जबतक उनके हाथ गीले रहेंगे ॥ ७ ॥

कुलीनात् शीलसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ।
देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः ॥ ८ ॥
नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजा कुर्वीत मन्त्रिणः ।
अच्छे कुलमें उत्पन्न, शीलवान्, इशारे समझनेवाले, निष्ठुरतारहित (दयालु), देशकालके विधानको समझनेवाले और स्वामीके अभीष्ट कार्यकी सिद्धि तथा हित चाहनेवाले मनुष्योंको राजा सदा सभी कार्योंके लिये अपना मन्त्री बनावे ॥ ८ १/२ ॥

अर्थमानार्घ्यसत्कारैर्भोगैरुच्चावचैः प्रियान् ॥ ९ ॥
यानर्थभाजो मन्येथास्ते ते स्युः सुखभागिनः ।
तुम जिन्हें अपना प्रिय मानते हो, उन्हें धन, सम्मान, अर्घ्य, सत्कार तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके भोगोंद्वारा संतुष्ट करो, जिससे वे तुम्हारे प्रियजन धन और सुखके भागी हों ॥ ९ १/२ ॥

अभिन्नवृत्ता विद्वांसः सद्वृत्ताश्चरितव्रताः ।
न त्वां नित्यार्थिनो जह्युरक्षुद्राः सत्यवादिनः ॥ १० ॥
जिनका सदाचार नष्ट नहीं हुआ है, जो विद्वान्, सदाचारी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं; जिन्हें सदा तुमसे अभीष्ट वस्तुके लिये प्रार्थना करनेकी आवश्यकता पड़ती है तथा जो श्रेष्ठ और सत्यवादी हैं, वे कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकते ॥ १० ॥

अनार्या ये न जानन्ति समयं मन्दचेतसः ।
तेभ्यः परिजुगुप्सेथा ये चापि समयच्युताः ॥ ११ ॥
जो अनार्य और मन्दबुद्धि हैं, जिन्हें की हुई प्रतिज्ञाके पालनका ध्यान नहीं रहता तथा जो कई बार अपनी प्रतिज्ञासे गिर चुके हैं, उनसे अपनेको सुरक्षित रखनेके लिये तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिये ॥ ११ ॥

नैकमिच्छेद गणं हित्वा स्वाच्छेदन्तरग्रहः ।
यस्त्वेको बहुभिः श्रेयान् कामं तेन गणं त्यजेत् ॥ १२ ॥
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूहको छोड़कर एक व्यक्तिको ग्रहण करनेकी इच्छा न करे। परंतु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्योंकी अपेक्षा गुणोंमें श्रेष्ठ हो और इन दोनोंमेंसे एकको ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी परिस्थितिमें कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उस एकके लिये समूहको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥

श्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते । कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात् समये यश्च तिष्ठति ॥ १३ ॥ समर्थान् पूजयेद् यश्च नास्पर्धैः स्पर्धते च यः । न च कामाद् भयात् क्रोधाल्लोभाद् वा धर्ममुत्सृजेत् ॥ १४ ॥ अमानी सत्यवान् क्षान्तो जितात्मा मानसंवृतः । स ते मन्त्रसहायः स्यात् सर्वावस्थापरीक्षितः ॥ १५ ॥ श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण इस प्रकार है—जिसका पराक्रम देखा जाता हो, जिसके जीवनमें कीर्तिकी प्रधानता हो, जो अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहता हो, सामर्थ्यशाली पुरुषोंका सम्मान करता हो, जो स्पर्धाके अयोग्य पुरुषोंसे ईर्ष्या न रखता हो, कामना, भय, क्रोध अथवा लोभसे भी धर्मका उल्लंघन न करता हो, जिसमें अभिमानका अभाव हो, जो सत्यवान्, क्षमाशील, जितात्मा तथा सम्मानित हो और जिसकी सभी अवस्थाओंमें परीक्षा कर ली गयी हो, ऐसा पुरुष ही तुम्हारी गुप्त मन्त्रणामें सहायक होना चाहिये ॥ १३—१५ ॥

कुलीनः कुलसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् । शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥ १६ ॥ कुन्तीनन्दन! उत्तम कुलमें जन्म होना, सदा श्रेष्ठ कुलके सम्पर्कमें रहना, सहनशीलता, कार्यदक्षता, मनस्विता, शूरता, कृतज्ञता और सत्यभाषण—ये ही श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं ॥ १६ ॥

तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः । अमित्राः सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥ १७ ॥ ऐसा बर्ताव करनेवाले विज्ञ पुरुषके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और उसके साथ मैत्री स्थापित कर लेते हैं ॥ १७ ॥

अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणम् । संयतात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ॥ १८ ॥ इसके बाद मनको वशमें रखनेवाला शुद्धबुद्धि और ऐश्वर्यकामी भूपाल अपने मन्त्रियोंके गुण और अवगुणकी परीक्षा करे ॥ १८ ॥

सम्बन्धिपुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः । अहार्यैरव्यभीचारैः सर्वशः सुपरीक्षितैः ॥ १९ ॥ यौनाः श्रौतास्तथा मौलास्तथैवाप्यनहंकृताः । कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥ जिनके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध हो, जो अच्छे कुलमें उत्पन्न, विश्वासपात्र, स्वदेशीय, घूस न खानेवाले तथा व्यभिचार-दोषसे रहित हों, जिनकी सब प्रकारसे भलीभाँति परीक्षा ले ली गयी हो, जो उत्तम जातिवाले, वेदके मार्गपर चलनेवाले, कई पीढ़ियोंसे राजकीय

सेवा करनेवाले तथा अहङ्कारशून्य हों, ऐसे ही लोगोंको अपनी उन्नति चाहनेवाला ऐश्वर्यकामी पुरुष मन्त्री बनावे ॥ येषां वैनयिकी बुद्धिः प्रकृतिश्चैव शोभना । तेजो धैर्यं क्षमा शौचमनुरागः स्थितिर्धृतिः ॥ २१ ॥ परीक्ष्य च गुणान् नित्यं प्रौढभावान् धुरंधरन् । पञ्चोपधाव्यतीतांश्च कुर्याद् राजार्थकारिणः ॥ २२ ॥ जिनमें विनययुक्त बुद्धि, सुन्दर स्वभाव, तेज, वीरता, क्षमा, पवित्रता, प्रेम, धृति और स्थिरता हो, उनके इन गुणोंकी परीक्षा करके यदि वे राजकीय कार्यभारको सँभालनेमें प्रौढ़ तथा निष्कपट सिद्ध हों तो राजा उनमेंसे पाँच व्यक्तियोंको चुनकर अर्थमन्त्री बनावे ॥ पर्याप्तवचनान् वीरान् प्रतिपत्तिविशारदान् । कुलीनात् सत्त्वसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ॥ २३ ॥ देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः । नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजन् कुर्वीत मन्त्रिणः ॥ २४ ॥ राजन्! जो बोलनेमें कुशल, शौर्यसम्पन्न, प्रत्येक बातको ठीक-ठीक समझनेमें निपुण, कुलीन, सत्त्वयुक्त, संकेत समझनेवाले, निष्ठुरतासे रहित (दयालु), देश और कालके विधानको जाननेवाले तथा स्वामीके कार्य एवं हितकी सिद्धि चाहनेवाले हों, ऐसे पुरुषोंको सदा सभी प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये मन्त्री बनाना चाहिये ॥ हीनतेजोऽभिसंसृष्टो नैव जातु व्यवस्यति । अवश्यं जनयत्येव सर्वकर्मसु संशयम् ॥ २५ ॥ तेजोहीन मन्त्रीके सम्पर्कमें रहनेवाला राजा कभी कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर सकता। वैसा मन्त्री सभी कार्योंमें अवश्य ही संशय उत्पन्न कर देता है ॥ २५ ॥ एवमल्पश्रुतो मन्त्री कल्याणाभिजनोऽप्युत । धर्मार्थकामसंयुक्तो नालं मन्त्रं परीक्षितुम् ॥ २६ ॥ इसी प्रकार जो मन्त्री उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी शास्त्रोंका बहुत कम ज्ञान रखता हो, वह धर्म, अर्थ और कामसे संयुक्त होकर भी गुप्त मन्त्रणाकी परीक्षा नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ तथैवानभिजातोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः । अनायक इवाचक्षुर्मुह्यत्यणुषु कर्मसु ॥ २७ ॥ वैसे ही जो अच्छे कुलमें उत्पन्न नहीं है, वह भले ही अनेक शास्त्रोंका विद्वान् हो, किंतु नायकरहित सैनिक तथा नेत्रहीन मनुष्यकी भाँति वह छोटे-छोटे कार्योंमें भी मोहित हो जाता है—कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं कर पाता ॥ २७ ॥ यो वाप्यस्थिरसंकल्पो बुद्धिमानागतागमः । उपायज्ञोऽपि नालं स कर्म प्रापयितुं चिरम् ॥ २८ ॥

जिसका संकल्प स्थिर नहीं है, वह बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ और उपायोंका जानकार होनेपर भी किसी कार्यको दीर्घकालमें भी पूरा नहीं कर सकता ॥ २८ ॥

केवलात् पुनरादानात् कर्मणो नोपपद्यते ।
परामर्शो विशेषाणामश्रुतस्येह दुर्मतेः ॥ २९ ॥
जिसकी बुद्धि खोटी है तथा जिसे शास्त्रोंका बिल्कुल ज्ञान नहीं है, वह केवल मन्त्रीका कार्य हाथमें ले लेने मात्रसे सफल नहीं हो सकता। विशेष कार्योंके विषयमें उसका दिया हुआ परामर्श युक्तिसंगत नहीं होता है ॥ २९ ॥

मन्त्रिण्यननुरक्ते तु विश्वासो नोपपद्यते ।
तस्मादननुरक्ताय नैव मन्त्रं प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥
जिस मन्त्रीका राजाके प्रति अनुराग न हो, उसका विश्वास करना ठीक नहीं है; अतः अनुरागरहित मन्त्रीके सामने अपने गुप्त विचारको प्रकट न करे ॥ ३० ॥

व्यथयेद्धि स राजानं मन्त्रिभिः सहितोऽनृजुः ।
मारुतोपहितच्छिद्रैः प्रविश्याग्निरिव द्रुमम् ॥ ३१ ॥
वह कपटी मन्त्री यदि गुप्त विचारोंको जान ले तो अन्य मन्त्रियोंके साथ मिलकर राजाको उसी प्रकार पीड़ा देता है, जैसे आग हवासे भरे हुए छेदोंमें घुसकर समूचे वृक्षको भस्म कर डालती है ॥ ३१ ॥

संक्रुद्धश्चैकदा स्वामी स्थानाच्चैवापकर्षति ।
वाचा क्षिपति संरब्धः पुनः पश्चात् प्रसीदति ॥ ३२ ॥
राजा एक बार कुपित होकर मन्त्रीको उसके स्थानसे हटा देता है और रोषमें भरकर वाणीद्वारा उसपर आक्षेप भी करता है; परंतु फिर अन्तमें प्रसन्न हो जाता है ॥ ३२ ॥

तानि तान्यनुरक्तेन शक्यानि हि तितिक्षितुम् ।
मन्त्रिणां च भवेत् क्रोधो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ ३३ ॥
राजाके इन सब बर्तावोंको वही मन्त्री सह सकता है, जिसका उसके प्रति अनुराग हो। अनुरागशून्य मन्त्रियोंका क्रोध वज्रपातके समान भयंकर होता है ॥ ३३ ॥

यस्तु संसहते तानि भर्तुः प्रियचिकीर्षया ।
समानसुखदुःखं तं पृच्छेदर्थेषु मानवम् ॥ ३४ ॥
जो मन्त्री स्वामीका प्रिय करनेकी इच्छासे उसके उन सभी बर्तावोंको सह लेता है, वही अनुरक्त है। वह राजाके सुख-दुःखको अपना ही सुख-दुःख मानता है। ऐसे ही मनुष्यसे राजाको सभी कार्योंमें सलाह पूछनी चाहिये ॥ ३४ ॥

अनृजुस्त्वनुरक्तोऽपि सम्पन्नश्चेतरैर्गुणैः ।
राज्ञः प्रज्ञानयुक्तोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३५ ॥
जो अनुरक्त हो, अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न हो और बुद्धिमान् हो, वह भी यदि सरल स्वभावका न हो तो राजाकी गुप्त सलाहको सुननेका अधिकारी नहीं है ॥ ३५ ॥

योऽमित्रैः सह सम्बद्धो न पौरान् बहु मन्यते । असुहृत् तादृशो ज्ञेयो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३६ ॥ जिसका शत्रुओंके साथ सम्बन्ध हो तथा अपने राज्यके नागरिकोंके प्रति जिसकी अधिक आदरबुद्धि न हो, ऐसे मनुष्यको सुहृद् नहीं मानना चाहिये। वह भी गुप्त सलाह सुननेका अधिकारी नहीं है ॥ ३६ ॥

अविद्वानशुचिः स्तब्धः शत्रुसेवी विकत्थनः । असुहृत् क्रोधनो लुब्धो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३७ ॥ जो मूर्ख, अपवित्र, जड, शत्रुसेवी, बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाला, क्रोधी और लोभी है तथा सुहृद् नहीं है, उसको भी गुप्त मन्त्रणा सुननेका अधिकार नहीं है ॥

आगन्तुश्चानुरक्तोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः । सत्कृतः संविभक्तो वा न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३८ ॥ जो कोई अनुरक्त, अनेक शास्त्रोंका विद्वान् और सबके द्वारा सम्मानित हो तथा जिसको भलीभाँति भेंट दी गयी हो, वह भी यदि नया आया हुआ हो तो गुप्त मन्त्रणा सुननेके योग्य नहीं है ॥ ३८ ॥

विधर्मतो विप्रकृतः पिता यस्याभवत् पुरा । सत्कृतः स्थापितः सोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ३९ ॥ जिसके पिताको अधर्माचरणके कारण पहले अपमानपूर्वक निकाल दिया गया हो और उसका वह पुत्र सम्मानपूर्वक पिताके पदपर प्रतिष्ठित कर दिया गया हो, तो वह भी गुप्त सलाह सुननेका अधिकारी नहीं है ॥ ३९ ॥

यः स्वल्पेनापि कार्येण सुहृदाक्षारितो भवेत् । पुनरन्यैर्गुणैर्युक्तो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४० ॥ जो थोड़े-से भी अनुचित कार्यके कारण दण्डित करके निर्धन कर दिया गया हो, वह सुहृद् एवं अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न होनेपर भी गुप्त मन्त्रणा सुननेके योग्य नहीं है ॥ ४० ॥

कृतप्रज्ञश्च मेधावी बुधो जानपदः शुचिः । सर्वकर्मसु यः शुद्धः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४१ ॥ जिसकी बुद्धि तीव्र और धारणाशक्ति प्रबल हो, जो अपने ही देशमें उत्पन्न, शुद्ध आचरणवाला और विद्वान् हो तथा सब तरहके कार्योंमें परीक्षा करनेपर निर्दोष सिद्ध हुआ हो, वह गुप्त सलाह सुननेका अधिकारी है ॥ ४१ ॥

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नः प्रकृतिज्ञः परात्मनोः । सुहृदात्मसमो राज्ञः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४२ ॥ जो ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, अपने और शत्रुओंके पक्षके लोगोंकी प्रकृतिको परखनेवाला तथा राजाका अपने आत्माके समान अभिन्न सुहृद् हो, वह गुप्त मन्त्रणा सुननेका अधिकारी है ॥ ४२ ॥

सत्यवाक् शीलसम्पन्नो गम्भीरः सत्रपो मृदुः ।
पितृपैतामहो यः स्यात् स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४३ ॥
जो सत्यवादी, शीलवान्, गम्भीर, लज्जाशील, कोमल स्वभाववाला तथा बाप-दादोंके समयसे ही राजाकी सेवा करता आया है, वह भी गुप्त मन्त्रणा सुननेका अधिकारी है ॥ ४३ ॥

संतुष्टः सम्मतः सत्यः शौटीरो द्वेष्यपापकः ।
मन्त्रवित् कालविच्छूरः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४४ ॥
जो संतोषी, सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित, सत्यपरायण, शूरवीर, पापसे घृणा करनेवाला, राजकीय मन्त्रणाको समझनेवाला, समयकी पहचान रखनेवाला तथा शौर्यसम्पन्न है, वह भी गुप्त मन्त्रणाको सुननेकी योग्यता रखता है ॥ ४४ ॥

सर्वलोकमिमं शक्तः सान्त्वेन कुरुते वशे ।
तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता नृप ॥ ४५ ॥
नरेश्वर! जो राजा चिरकालतक दण्ड धारण करनेकी इच्छा रखता हो, उसे अपनी गुप्त सलाह उसी व्यक्तिको बतानी चाहिये, जो शक्तिशाली हो और सारे जगत्‌के समझा-बुझाकर अपने वशमें कर सकता हो ॥

पौरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ।
योद्धा नयविपश्चिच्च स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ ४६ ॥
नगर और जनपदके लोग जिसपर धर्मतः विश्वास करते हों तथा जो कुशल योद्धा और नीतिशास्त्रका विद्वान् हो, वही गुप्त सलाह सुननेका अधिकारी है ॥

तस्मात् सर्वैर्गुणैरेतैरुपपन्नाः सुपूजिताः ।
मन्त्रिणः प्रकृतिज्ञाः स्युस्त्र्यवरा महदीप्सवः ॥ ४७ ॥
इसलिये जो उपर्युक्त सभी गुणोंसे सम्पन्न, सबके द्वारा सम्मानित, प्रकृतिको परखनेवाले तथा महान् पदकी इच्छा रखनेवाले हों, ऐसे पुरुषोंको ही मन्त्रीके पदपर नियुक्त करना चाहिये। राजाके मन्त्रियोंकी संख्या कम-से-कम तीन होनी चाहिये ॥ ४७ ॥

स्वासु प्रकृतिषुच्छिद्रं लक्षयेरन् परस्य च ।
मन्त्रिणां मन्त्रमूलं हि राज्ञो राष्ट्रं विवर्धते ॥ ४८ ॥
अपनी तथा शत्रु की प्रकृतियोंमें जो दोष या दुर्बलता हो, उनपर मन्त्रियोंको दृष्टि रखनी चाहिये; क्योंकि मन्त्रियोंकी मन्त्रणा (उनकी दी हुई नेक सलाह) ही राजाके राष्ट्रकी जड़ है। उसीके आधारपर राज्यकी उन्नति होती है ॥ ४८ ॥

नास्य छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमान्वियात् ।
गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः ॥ ४९ ॥
राजा ऐसा प्रयत्न करे कि उसका छिद्र शत्रु न देख सके; परंतु वह शत्रु की सारी दुर्बलताओंको जान ले। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेटे रहता है, उसी तरह राजाको

भी अपने गुप्त विचारों तथा छिद्रोंको छिपाये रखना चाहिये ।। ४९ ।।

मन्त्रगूढा हि राज्यस्य मन्त्रिणो ये मनीषिणः ।

मन्त्रसंहननो राजा मन्त्राङ्गानीतरे जनाः ।। ५० ।।

जो बुद्धिमान् मन्त्री हैं, वे राज्यके गुप्त मन्त्रको छिपाये रखते हैं; क्योंकि मन्त्र ही

राजाका कवच है और सदस्य आदि दूसरे लोग मन्त्रणाके अंग हैं ।। ५० ।।

राज्यं प्रणिधिमूलं हि मन्त्रसारं प्रचक्षते ।

स्वामिनं त्वनुवर्तन्ते वृत्त्यर्थमिह मन्त्रिणः ।। ५१ ।।

विद्वान् पुरुष कहते हैं कि राज्यका मूल है गुप्तचर और उसका सार है गुप्त मन्त्रणा।

मन्त्रीलोग तो यहाँ अपनी जीविकाके लिये ही राजाका अनुसरण करते हैं ।।

संविनीय मदक्रोधौ मानमीर्ष्यां च निर्वृताः ।

नित्यं पञ्चोपधातीतैर्मन्त्रयेत् सह मन्त्रिभिः ।। ५२ ।।

जो मद और क्रोधको जीतकर मान और ईर्ष्यासे रहित हो गये हैं तथा जो कायिक,

वाचिक, मानसिक, कर्मकृत और संकेतजनित—इन पाँचों प्रकारके छलोंको लाँघकर ऊपर

उठे हुए हैं, ऐसे मन्त्रियोंके साथ ही राजाको सदा गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिये ।। ५२ ।।

तेषां त्रयाणां विविधं विमर्शं

विबुद्ध्य चित्तं विनिवेश्य तत्र ।

स्वनिश्चयं तं परनिश्चयं च

निवेदयेदुत्तरमन्त्रकाले ।। ५३ ।।

राजा पहले सदा तीनों मन्त्रियोंकी पृथक्-पृथक् सलाह जानकर उसपर मनोयोगपूर्वक

विचार करे। तत्पश्चात् बादमें होनेवाली मन्त्रणाके समय अपने तथा दूसरोंके निश्चयको

राजगुरुकी सेवामें निवेदन करे ।। ५३ ।।

धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छेद्

युक्तो गुरुं ब्राह्मणमुत्तरार्थम् ।

निष्ठा कृता तेन यदा सहः स्यात्

तं मन्त्रमार्गं प्रणयेदसक्तः ।। ५४ ।।

राजा सावधान होकर धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता ब्राह्मणगुरुके समीप जा उनका

उत्तर जाननेके लिये उनकी राय पूछे। जब वे कोई निर्णय दे दें और वह सब लोगोंको एक

मतसे स्वीकार हो जाय, तब राजा दूसरे किसी विचारमें न पड़कर उसी मन्त्रमार्ग

(विचारपद्धति) को कार्यरूपमें परिणत करे ।। ५४ ।।

एवं सदा मन्त्रयितव्यमाहु-

र्ये मन्त्रतत्त्वार्थविनिश्चयज्ञाः ।

तस्मात् तमेवं प्रणयेत् सदैव

मन्त्रं प्रजासंग्रहणे समर्थम् ।। ५५ ।।

मन्त्रतत्त्वके अर्थका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि सदा इसी तरह मन्त्रणा करे और जो विचार प्रजाको अपने अनुकूल बनानेमें अधिक प्रबल जान पड़े, सर्वदा उसे ही काममें ले ।। ५५ ।।

न वामनाः कुब्जकृशा न खञ्जा
नान्धो जडः स्त्री च नपुंसकं च ।
न चात्र तिर्यक् च पुरो न पश्चा-
न्नोर्ध्वं न चाधः प्रचरेत् कथंचित् ।। ५६ ।।

जहाँ गुप्त विचार किया जाता हो, वहाँ या उसके अगल-बगल, आगे-पीछे और ऊपर-नीचे भी किसी तरह बौने, कुबड़े, दुबले, लँगड़े, अन्धे, गूँगे, स्त्री और हीजड़े—ये न आने पावें ।। ५६ ।।

आरुह्य वा वेश्म तथैव शून्यं
स्थलं प्रकाशं कुशकाशहीनम् ।
वागङ्गदोषान् परिहृत्य सर्वान्
सम्मन्त्रयेत् कार्यमहीनकालम् ।। ५७ ।।

महलके ऊपरी मंजिलपर चढ़कर अथवा सूने एवं खुले हुए समतल मैदानमें जहाँ कुश-कास—घास-पात बढ़े हुए न हों, ऐसी जगह बैठकर वाणी और शरीरके सारे दोषोंका परित्याग करके उपयुक्त समयमें भावी कार्यके सम्बन्धमें गुप्त विचार करना चाहिये ।। ५७ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सभ्यादिलक्षणकथने
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सभासद् आदिके लक्षणोंका कथनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८३ ।।

इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुरशीतितमोऽध्यायः

इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादं शक्रस्य च युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस विषयमें मनस्वी पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, वह सुनो ॥ १ ॥

शक्र उवाच

किं स्विदेकपदं ब्रह्मन् पुरुषः सम्यगाचरन् ।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥ २ ॥
इन्द्रने पूछा— ब्रह्मन्! वह कौन-सी ऐसी एक वस्तु है, जिसका नाम एक ही पदका है और जिसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियोंका प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥

बृहस्पतिरुवाच

सान्त्वमेकपदं शक्र पुरुषः सम्यगाचरन् ।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥ ३ ॥
बृहस्पतिजीने कहा— इन्द्र! जिसका नाम एक ही पदका है, वह एकमात्र वस्तु है सान्त्वना (मधुर वचन बोलना)। उसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियोंका प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥

एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् ।
आचरन् सर्वभूतेषु प्रियो भवति सर्वदा ॥ ४ ॥
शक्र! यही एक वस्तु सम्पूर्ण जगत्‌के लिये सुखदायक है। इसको आचरणमें लानेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ॥ ४ ॥

यो हि नाभाषते किंचित् सर्वदा भ्रुकुटीमुखः ।
द्वेष्यो भवति भूतानां स सान्त्वमिह नाचरन् ॥ ५ ॥
जो मनुष्य सदा भौंहें टेढ़ी किये रहता है, किसीसे कुछ बातचीत नहीं करता, वह शान्तभाव (मृदुभाषी होनेके गुण) को न अपनानेके कारण सब लोगोंके द्वेषका पात्र हो जाता है ॥ ५ ॥

यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पूर्वमेवाभिभाषते ।

स्मितपूर्वाभिभाषी च तस्य लोकः प्रसीदति ॥ ६ ॥
जो सभीको देखकर पहले ही बात करता है और सबसे मुसकराकर ही बोलता है, उसपर सब लोग प्रसन्न रहते हैं ॥ ६ ॥

दानमेव हि सर्वत्र सान्त्वेनानभिजल्पितम् ।
न प्रीणयति भूतानि निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ॥ ७ ॥
जैसे बिना व्यञ्जन (साग-दाल आदि) का भोजन मनुष्यको संतुष्ट नहीं कर सकता, उसी प्रकार मधुर वचन बोले बिना दिया हुआ दान भी प्राणियोंको प्रसन्न नहीं कर पाता है ॥ ७ ॥

आदानादपि भूतानां मधुरामीरयन् गिरम् ।
सर्वलोकमिमं शक्र सान्त्वेन कुरुते वशे ॥ ८ ॥
शक्र! मधुर वचन बोलनेवाला मनुष्य लोगोंकी कोई वस्तु लेकर भी अपनी मधुर वाणीद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्‌को वशमें कर लेता है ॥ ८ ॥

तस्मात् सान्त्वं प्रयोक्तव्यं दण्डमाधित्सतोऽपि हि ।
फलं च जनयत्येवं न चास्योद्विजते जनः ॥ ९ ॥
अतः किसीको दण्ड देनेकी इच्छा रखनेवाले राजाको भी उससे सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोलना चाहिये। ऐसा करके वह अपना प्रयोजन तो सिद्ध कर ही लेता है और उससे कोई मनुष्य उद्विग्न भी नहीं होता है ॥ ९ ॥

सुकृतस्य हि सान्त्वस्य श्लक्ष्णस्य मधुरस्य च ।
सम्यगासेव्यमानस्य तुल्यं जातु न विद्यते ॥ १० ॥
यदि अच्छी तरहसे सान्त्वनापूर्ण, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचन बोला जाय और सदा सब प्रकारसे उसीका सेवन किया जाय तो उसके समान वशीकरणका साधन इस जगत्‌में निःसंदेह दूसरा कोई नहीं है ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः कृतवान् सर्वं यथा शक्रः पुरोधसा ।
तथा त्वमपि कौन्तेय सम्यगेतत् समाचर ॥ ११ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**कुन्तीनन्दन! अपने पुरोहित बृहस्पतिके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सब कुछ उसी तरह किया। इसी प्रकार तुम भी इस सान्त्वनापूर्ण वचनको भलीभाँति आचरणमें लाओ ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे
चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥

प्रीतिं धर्मविशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

राजाकी व्यावहारिक नीति, मन्त्रिमण्डलका संगठन, दण्डका औचित्य तथा दूत, द्वारपाल, शिरोरक्षक, मन्त्री और सेनापतिके गुण

युधिष्ठिर उवाच

कथं स्विदिह राजेन्द्र पालयन् पार्थिवः प्रजाः ।
प्रीतिं धर्मविशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजेन्द्र! इस जगत्में राजा किस प्रकार धर्मविशेषके द्वारा प्रजाका पालन करे, जिससे वह लोगोंका प्रेम और अक्षय कीर्ति प्राप्त कर सके? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

व्यवहारेण शुद्धेन प्रजापालनतत्परः ।
प्राप्य धर्मं च कीर्तिं च लोकानाप्नोत्युभौ शुचिः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो राजा बाहर-भीतरसे पवित्र रहकर शुद्ध व्यवहारसे प्रजापालनमें तत्पर रहता है, वह धर्म और कीर्ति प्राप्त करके इहलोक और परलोक दोनोंको सुधार लेता है ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशैर्व्यवहारैस्तु कैश्च व्यवहरेन्नृपः ।
एतत्पृष्टो महाप्राज्ञ यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महामते! राजाको किस-किस प्रकारके लोगोंसे किस-किस प्रकारका बर्ताव काममें लाना चाहिये? मेरे इस प्रश्नका आप यथावत्रूपसे समाधान करें ॥ ३ ॥

ये चैव पूर्वं कथिता गुणास्ते पुरुषं प्रति ।
नैकस्मिन् पुरुषे ह्येते विद्यन्त इति मे मतिः ॥ ४ ॥
मेरी तो ऐसी मान्यता है कि पहले आपने पुरुषके लिये जिन गुणोंका वर्णन किया है, वे सब किसी एक पुरुषमें नहीं मिल सकते ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि बुद्धिमन् ।
दुर्लभः पुरुषः कश्चिदेभिर्युक्तो गुणैः शुभैः ॥ ५ ॥

**भीष्मजीने कहा—**महाप्राज्ञ! परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर! तुम जैसा कहते हो, वह ठीक ऐसा ही है। वस्तुतः इन सभी शुभ गुणोंसे सम्पन्न किसी एक पुरुषका मिलना कठिन है॥ ५॥ किंतु संक्षेपतः शीलं प्रयत्नेनेह दुर्लभम्। वक्ष्यामि तु यथामात्यान् यादृशांश्च करिष्यसि॥ ६॥ इसलिये तुम जिस भावसे जैसे मन्त्रियोंको संगठित करोगे अर्थात् करना चाहते हो, उनका दुर्लभ शील-स्वभाव जैसा होना चाहिये—इस बातको मैं प्रयत्नपूर्वक संक्षेपसे बताऊँगा॥ ६॥ चतुरो ब्राह्मणान् वैद्यान् प्रगल्भान् स्नातकान् शुचीन्। क्षत्रियांश्च तथा चाष्टौ बलिनः शस्त्रपाणिनः॥ ७॥ वैश्यान् वित्तेन सम्पन्नानेकविंशतिसंख्यया। त्रींश्च शूद्रान् विनीतांश्च शुचीन् कर्मणि पूर्वके॥ ८॥ अष्टाभिश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं तथा। पञ्चाशद्वर्षवयसं प्रगल्भमनसूयकम्॥ ९॥ श्रुतिस्मृतिसमायुक्तं विनीतं समदर्शिनम्। कार्ये विवदमानानां शक्तमर्थेष्वलोलुपम्॥ १०॥ वर्जितं चैव व्यसनैः सुघोरैः सप्तभिर्भृशम्। अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्॥ ११॥ राजाको चाहिये कि जो वेदविद्याके विद्वान्, निर्भीक, बाहर-भीतरसे शुद्ध एवं स्नातक हों, ऐसे चार ब्राह्मण, शरीरसे बलवान् तथा शस्त्रधारी आठ क्षत्रिय, धन-धान्यसे सम्पन्न इक्कीस वैश्य, पवित्र आचार-विचारवाले तीन विनयशील शूद्र तथा आठ³ गुणोंसे युक्त एवं पुराणविद्याको जाननेवाला एक सूत जातिका मनुष्य—इन सब लोगोंका एक मन्त्रिमण्डल बनावे। उस सूतकी अवस्था लगभग पचास वर्षकी हो और वह निर्भीक, दोषदृष्टिसे रहित, श्रुतियों और स्मृतियोंके ज्ञानसे सम्पन्न, विनयशील, समदर्शी, वादी-प्रतिवादीके मामलोंका निपटारा करनेमें समर्थ, लोभरहित और अत्यन्त भयंकर सात³ प्रकारके दुर्व्यसनोंसे बहुत दूर रहनेवाला हो। ऐसे आठ मन्त्रियोंके बीचमें राजा गुप्त मन्त्रणा करे॥ ७—११॥ ततः सम्प्रेषयेद् राष्ट्रे राष्ट्रियाय च दर्शयेत्। अनेन व्यवहारेण द्रष्टव्यास्ते प्रजाः सदा॥ १२॥ इन सबकी रायसे जो बात निश्चित हो, उसको देशमें प्रचारित करे और राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको इसका ज्ञान करा दे। युधिष्ठिर! इस प्रकारके व्यवहारसे तुम्हें सदा प्रजावर्गकी देख-रेख करनी चाहिये॥ १२॥ न चापि गूढं द्रव्यं ते ग्राह्यं कार्योपघातकम्।

कार्ये खलु विपन्ने त्वां सोऽधर्मस्तांश्च पीडयेत् ॥ १३ ॥
राजन्! तुमको किसीका कोई गुप्त धन ग्रहण नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह तुम्हारे कर्तव्य—न्यायधर्मका नाश करनेवाला होगा। यदि कहीं वास्तवमें तुम्हारे न्यायधर्मका नाश हुआ तो वह अधर्म तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियोंको बड़े कष्टमें डाल देगा ॥ १३ ॥
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात् पक्षिगणा इव ।
परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे ॥ १४ ॥
फिर तो तुम्हें अन्यायी मानकर राष्ट्रकी सारी प्रजा तुमसे उसी प्रकार दूर भागेगी, जैसे बाज पक्षीके डरसे दूसरे पक्षी भागते हैं तथा जैसे टूटी हुई नाव समुद्रमें कहाँकी कहाँ बह जाती है, उसी प्रकार प्रजा धीरे-धीरे तुम्हारा राज्य छोड़कर अन्यत्र चली जायगी ॥ १४ ॥
प्रजाः पालयतोऽसम्यग्धर्मेणेह भूपतेः ।
हार्दं भयं सम्भवति स्वर्गश्चास्य विरुद्ध्यते ॥ १५ ॥
जो राजा अन्याय एवं अधर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसके हृदयमें भय बना रहता है तथा उसका परलोक भी बिगड़ जाता है ॥ १५ ॥
अथ योऽधर्मतः पाति राजामात्योऽथ वाऽऽत्मजः ।
धर्मासने संनियुक्तो धर्ममूले नरर्षभ ॥ १६ ॥
कार्येष्वधिकृताः सम्यगकुर्वन्तो नृपानुगाः ।
आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सहपार्थिवाः ॥ १७ ॥
नरश्रेष्ठ! धर्म ही जिसकी जड़ है, उस धर्मासन अथवा न्यायासनपर बैठकर जो राजा, मन्त्री अथवा राजकुमार धर्म-पूर्वक प्रजाकी रक्षा नहीं करता तथा राजाका अनुसरण करनेवाले राज्यके दूसरे अधिकारी भी यदि अपनेको सामने रखकर प्रजाके साथ उचित बर्ताव नहीं करते हैं तो वे राजाके साथ ही स्वयं भी नरकमें गिर जाते हैं ॥ १६-१७ ॥
बलात्कृतानां बलिभिः कृपणं बहु जल्पताम् ।
नाथो वै भूमिपो नित्यमनाथानां नृणां भवेत् ॥ १८ ॥
बलवानोंके बलात्कार (अत्याचार) से पीड़ित हो अत्यन्त दीनभावसे पुकार मचाते हुए अनाथ मनुष्योंको आश्रय देनेवाला उनका संरक्षक या स्वामी राजा ही होता है ॥
ततः साक्षिबलं साधु द्वैधवादकृतं भवेत् ।
असाक्षिकमनाथं वा परीक्ष्यं तद् विशेषतः ॥ १९ ॥
जब कोई अभियोग उपस्थित हो और उसमें उभय पक्षद्वारा दो प्रकारकी बातें कही जायँ, तब उसमें यथार्थताका निर्णय करनेके लिये साक्षीका बल श्रेष्ठ माना गया है (अर्थात् मौकेका गवाह बुलाकर उससे सच्ची बात जाननेका प्रयत्न करना चाहिये)। यदि कोई गवाह न हो तथा उस मामलेकी पैरवी करनेवाला कोई मालिक-मुख्तार न दिखायी दे तो राजाको स्वयं ही विशेष प्रयत्न करके उसकी छानबीन करनी चाहिये ॥ १९ ॥
अपराधानुरूपं च दण्डं पापेषु धारयेत् ।

वियोजयेद् धनैर्ऋद्धानधनानथ बन्धनैः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् अपराधियोंको अपराधके अनुरूप दण्ड देना चाहिये। अपराधी धनी हो तो उसको उसकी सम्पत्तिसे वञ्चित कर दे और निर्धन हो तो उसे बन्दी बनाकर कारागारमें डाल दे ॥ २० ॥

विनयेच्चापि दुर्द्वृत्तान् प्रहारैरपि पार्थिवः । सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालयेत् ॥ २१ ॥ जो अत्यन्त दुराचारी हों, उन्हें मार-पीटकर भी राजा राहपर लानेका प्रयत्न करे तथा जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उन्हें मीठी वाणीसे सान्त्वना देते हुए सुख-सुविधाकी वस्तुएँ अर्पित करके उनका पालन करे ॥ २१ ॥

राज्ञो वधं चिकीर्षेद् यस्तस्य चित्रो वधो भवेत् । आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसंकरिकस्य च ॥ २२ ॥ जो राजाका वध करनेकी इच्छा करे, जो गाँव या घरमें आग लगावे, चोरी करे अथवा व्यभिचारद्वारा वर्णसंकरता फैलानेका प्रयत्न करे, ऐसे अपराधीका वध अनेक प्रकारसे करना चाहिये ॥ २२ ॥

सम्यक् प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशाम्पते । युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वतः ॥ २३ ॥ प्रजानाथ! जो भलीभाँति विचार करके अपराधीको उचित दण्ड देता है और अपने कर्त्तव्यपालनके लिये सदा उद्यत रहता है, उस राजाको वध और बन्धनका पाप नहीं लगता, अपितु उसे सनातन धर्मकी ही प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥

कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः । स इहाकीर्तिसंयुक्तो मृतो नरकमृच्छति ॥ २४ ॥ जो अज्ञानी नरेश बिना विचारे स्वेच्छापूर्वक दण्ड देता है, वह इस लोकमें तो अपयशका भागी होता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है ॥ २४ ॥

न परस्य प्रवादेन परेषां दण्डमर्पयेत् । आगमानुगमं कृत्वा बध्नीयान्मोक्षयीत वा ॥ २५ ॥ राजा दूसरेके अपराधपर दूसरोंको दण्ड न दे, बल्कि शास्त्रके अनुसार विचार करके अपराध सिद्ध होता हो तो अपराधीको कैद करे और सिद्ध न होता हो तो उसे मुक्त कर दे ॥ २५ ॥

न तु हन्यान्नृपो जातु दूतं कस्याञ्चिदापदि । दूतस्य हन्ता निरयमाविशेत् सचिवैः सह ॥ २६ ॥ राजा कभी किसी आपत्तिमें भी किसीके दूतकी हत्या न करे। दूतका वध करनेवाला नरेश अपने मन्त्रियोंसहित नरकमें गिरता है ॥ २६ ॥

यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः ।

यो हन्यात् पितरस्तस्य भ्रूणहत्यामवाप्नुयुः ॥ २७ ॥
क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला जो राजा अपने स्वामीके कथनानुसार यथार्थ बातें कहनेवाले दूतको मार डालता है, उसके पितरोंको भ्रूणहत्याके फलका भोग करना पड़ता है ॥ २७ ॥
कुलीनः शीलसम्पन्नो वाग्मी दक्षः प्रियंवदः ।
यथोक्तवादी स्मृतिमान् दूतः स्यात् सप्तभिर्गुणैः ॥ २८ ॥
राजाके दूतको कुलीन, शीलवान्, वाचाल, चतुर, प्रिय वचन बोलनेवाला, संदेशको ज्यों का-त्यों कह देनेवाला तथा स्मरणशक्तिसे सम्पन्न—इस प्रकार सात गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ २८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तः प्रतिहारोऽस्य रक्षिता ।
शिरोरक्षश्च भवति गुणैरेतैः समन्वितः ॥ २९ ॥
राजाके द्वारकी रक्षा करनेवाले प्रतीहारी (द्वारपाल) में भी ये ही गुण होने चाहिये। उसका शिरोरक्षक (अथवा अङ्गरक्षक) भी इन्हीं गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ २९ ॥
धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः संधिविग्रहीको भवेत् ।
मतिमान् धृतिमान् ह्रीमान् रहस्यविनिगूहिता ॥ ३० ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नः शुक्लोऽमात्यः प्रशस्यते ।
एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ॥ ३१ ॥
सन्धि-विग्रहके अवसरको जाननेवाला, धर्मशास्त्रका तत्त्वज्ञ, बुद्धिमान्, धीर, लज्जावान्, रहस्यको गुप्त रखनेवाला, कुलीन, साहसी तथा शुद्ध हृदयवाला मन्त्री ही उत्तम माना जाता है। सेनापति भी इन्हीं गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥
व्यूहयन्त्रायुधानां च तत्त्वज्ञो विक्रमान्वितः ।
वर्षशीतोष्णवातानां सहिष्णुः पररन्ध्रवित् ॥ ३२ ॥
इनके सिवा वह व्यूहरचना (मोर्चाबंदी), यन्त्रोंके प्रयोग तथा नाना प्रकारके अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेकी कलाका तत्त्वज्ञ—विशेष जानकार हो, पराक्रमी हो, सर्दी, गर्मी, आँधी और वर्षाके कष्टको धैर्यपूर्वक सहनेवाला तथा शत्रुओंके छिद्रको समझनेवाला हो ॥ ३२ ॥
विश्वासयेत् परांश्चैव विश्वसेच्च न कस्यचित् ।
पुत्रेष्वपि हि राजेन्द्र विश्वासो न प्रशस्यते ॥ ३३ ॥
राजा दूसरोंके मनमें अपने ऊपर विश्वास पैदा करे; परंतु स्वयं किसीका भी विश्वास न करे। राजेन्द्र! अपने पुत्रोंपर भी पूरा-पूरा विश्वास करना अच्छा नहीं माना गया है ॥ ३३ ॥
एतच्छास्त्रार्थतत्त्वं तु मयाऽऽख्यातं तवानघ ।
अविश्वासो नरेन्द्राणां गुह्यं परममुच्यते ॥ ३४ ॥

निष्पाप युधिष्ठिर! यह नीतिशास्त्रका तत्त्व है, जिसे मैंने तुम्हें बताया है। किसीपर भी पूरा विश्वास न करना नरेशोंका परम गोपनीय गुण बताया जाता है ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यविभागे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ।। ८५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रीविभागविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८५ ।।


१. सेवा करनेको सदा तैयार रहना, कही हुई बातको ध्यानसे सुनना, उसे ठीक-ठीक समझना, याद रखना, किस कार्यका कैसा परिणाम होगा-इसपर तर्क करना, यदि अमुक प्रकारसे कार्य सिद्ध न हुआ तो क्या करना चाहिये?—इस तरह वितर्क करना, शिल्प और व्यवहारकी जानकारी रखना और तत्त्वका बोध होना—ये आठ गुण पौराणिक सूतमें होने चाहिये।
२. शिकार, जूआ, परस्त्रीप्रसंग और मदिरापान—ये चार कामजनित दोष और मारना, गाली बकना तथा दूसरेकी चीज खराब कर देना—ये तीन क्रोधजनित दोष मिलकर सात दुर्व्यसन माने गये हैं।

राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश

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षडशीतितमोऽध्यायः

राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश

युधिष्ठिर उवाच

कथंविधं पुरं राजा स्वयमावस्तुमर्हति ।
कृतं वा कारयित्वा वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजाको स्वयं कैसे नगरमें निवास करना चाहिये? वह पहलेसे बनी हुई राजधानीमें रहे या नये नगरका निर्माण कराकर उसमें निवास करे, यह मुझे बताइये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

वस्तव्यं यत्र कौन्तेय सपुत्रज्ञातिबन्धुना ।
न्याय्यं तत्र परिप्रष्टुं वृत्तिं गुप्तिं च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भारत! कुन्तीनन्दन! पुत्र, कुटुम्बीजन तथा बन्धुवर्गके साथ राजा जिस नगरमें निवास करे, उसमें जीवन-निर्वाह तथा रक्षाकी व्यवस्थाके सम्बन्धमें तुम्हारा प्रश्न करना न्यायसङ्गत है ॥ २ ॥

तस्मात् ते वर्तयिष्यामि दुर्गकर्म विशेषतः ।
श्रुत्वा तथा विधातव्यमनुष्ठेयं च यत्नतः ॥ ३ ॥
इसलिये मैं तुम्हारे समक्ष दुर्गनिर्माणकी क्रियाका विशेषरूपसे वर्णन करूँगा। तुम इस विषयको सुनकर वैसा ही करना और प्रयत्नपूर्वक दुर्गका निर्माण कराना ॥

षड्विधं दुर्गमास्थाय पुराण्यथ निवेशयेत् ।
सर्वसम्पत्प्रधानं यद् बाहुल्यं चापि सम्भवेत् ॥ ४ ॥
जहाँ सब प्रकारकी सम्पत्ति प्रचुरमात्रामें भरी हुई हो तथा जो स्थान बहुत विस्तृत हो, वहाँ छः प्रकारके दुर्गोंका आश्रय लेकर राजाको नये नगर बसाने चाहिये ॥

धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च ।
मनुष्यदुर्गं अब्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ॥ ५ ॥
उन छहों दुर्गोंके नाम इस प्रकार हैं—धन्वदुर्ग¹, महीदुर्ग², गिरिदुर्ग³, मनुष्यदुर्ग⁴, जलदुर्ग⁵, तथा वनदुर्ग⁶ ॥ ५ ॥

यत्पुरं दुर्गसम्पन्नं धान्यायुधसमन्वितम् । दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ ६ ॥ विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचयाश्च सुसंचिताः । धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ॥ ७ ॥ ऊर्जस्विनरनागाश्वं चत्वरापणशोभितम् । प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभयम् ॥ ८ ॥ सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् । शूराढ्यजनसम्पन्नं ब्रह्मघोषानुनादितम् ॥ ९ ॥ समाजोत्सवसम्पन्नं सदा पूजितदैवतम् । वश्यामात्यबलो राजा तत्पुरं स्वयमाविशेत् ॥ १० ॥ जिस नगरमें इनमेंसे कोई-न-कोई दुर्ग हो, जहाँ अन्न और अस्त्र-शस्त्रोंकी अधिकता हो, जिसके चारों ओर मजबूत चहारदीवारी और गहरी एवं चौड़ी खाई बनी हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथोंकी बहुतायत हो, जहाँ विद्वान् और कारीगर बसे हों, जिस नगरमें आवश्यक वस्तुओंके संग्रहसे भरे हुए कई भंडार हों, जहाँ धार्मिक तथा कार्यकुशल मनुष्योंका निवास हो, जो बलवान् मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे सम्पन्न हो, चौराहे तथा बाजार जिसकी शोभा बढ़ा रहे हों, जहाँका न्याय-विचार एवं न्यायालय सुप्रसिद्ध हो, जो सब प्रकारसे शान्तिपूर्ण हो, जहाँ कहींसे कोई भय या उपद्रव न हो, जिसमें रोशनीका अच्छा प्रबन्ध हो, संगीत और वाद्योंकी ध्वनि होती रहती हो, जहाँका प्रत्येक घर सुन्दर और सुप्रशस्त हो, जिसमें बड़े-बड़े शूरवीर और धनाढ्य लोग निवास करते हों, वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती हो तथा जहाँ सदा ही सामाजिक उत्सव और देवपूजनका क्रम चलता रहता हो, ऐसे नगरके भीतर अपने वशमें रहनेवाले मन्त्रियों तथा सेनाके साथ राजाको स्वयं निवास करना चाहिये ॥ ६—१० ॥

तत्र कोशं बलं मित्रं व्यवहारं च वर्धयेत् । पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान् निवर्तयेत् ॥ ११ ॥ राजाको चाहिये कि वह उस नगरमें कोष, सेना, मित्रोंकी संख्या तथा व्यवहारको बढ़ावे। नगर तथा बाहरके ग्रामोंमें सभी प्रकारके दोषोंको दूर करे ॥ ११ ॥

भाण्डागारायुधागारं प्रयत्नेनाभिवर्धयेत् । निचयान् वर्धयेत् सर्वांस्तथा यन्त्रायुधालयान् ॥ १२ ॥ अन्नभण्डार तथा अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहालयको प्रयत्नपूर्वक बढ़ावे, सब प्रकारकी वस्तुओंके संग्रहालयोंकी भी वृद्धि करे, यन्त्रों तथा अस्त्र-शस्त्रोंके कारखानोंकी उन्नति करे ॥ १२ ॥

काष्ठलोहतुषाङ्गारदारुशृङ्गास्थिवैणवान् । मज्जा स्नेहवसा क्षौद्रमौषधग्राममेव च ॥ १३ ॥

शणं सर्जरसं धान्यमायुधानि शरांस्तथा ।
चर्म स्नायुं तथा वेत्रं मुञ्जबल्वजबन्धनान् ॥ १४ ॥
काठ, लोहा, धानकी भूसी, कोयला, बाँस, लकड़ी, सींग, हड्डी, मज्जा, तेल, घी, चरबी, शहद, औषधसमूह, सन, राल, धान्य, अस्त्र-शस्त्र, बाण, चमड़ा, ताँत, बेंत तथा मूँज और बल्वजकी रस्सी आदि सामग्रियोंका संग्रह रखे ॥ १३-१४ ॥

आशयाश्चोदपानाश्च प्रभूतसलिलाकराः ।
निरोद्धव्याः सदा राज्ञा क्षीरिणश्च महीरुहाः ॥ १५ ॥
जलाशय (तालाब, पोखरे आदि), उदपान (कुँए, बावड़ी आदि), प्रचुर जलराशिसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब तथा दूधवाले वृक्ष—इन सबकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १५ ॥

सत्कृताश्च प्रयत्नेन आचार्यर्त्विक्पुरोहिताः ।
महेष्वासाः स्थपतयः सांवत्सरचिकित्सकाः ॥ १६ ॥
आचार्य, ऋत्विज्, पुरोहित और महान् धनुर्धरोंका तथा घर बनानेवालोंका, वर्षफल बतानेवाले ज्योतिषियोंका और वैद्योंका यत्नपूर्वक सत्कार करे ॥ १६ ॥

प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता दक्षाः शूरा बहुश्रुताः ।
कुलीनाः सत्त्वसम्पन्ना युक्ताः सर्वेषु कर्मसु ॥ १७ ॥
विद्वान्, बुद्धिमान्, जितेन्द्रिय, कार्यकुशल, शूर, बहुज्ञ, कुलीन तथा साहस और धैर्यसे सम्पन्न पुरुषोंको यथायोग्य समस्त कर्मोंमें लगावे ॥ १७ ॥

पूजयेद् धार्मिकान् राजा निगृह्णीयादधार्मिकान् ।
नियुञ्ज्याच्च प्रयत्नेन सर्ववर्णान् स्वकर्मसु ॥ १८ ॥
राजाको चाहिये कि धार्मिक पुरुषोंका सत्कार करे और पापियोंको दण्ड दे। वह सभी वर्णोंको प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने कर्मोंमें लगावे ॥ १८ ॥

बाह्यमाभ्यन्तरं चैव पौरजानपदं तथा ।
चारैः सुविदितं कृत्वा ततः कर्म प्रयोजयेत् ॥ १९ ॥
गुप्तचरोंद्वारा नगर तथा छोटे ग्रामोंके बाहरी और भीतरी समाचारोंको अच्छी तरह जानकर फिर उसके अनुसार कार्य करे ॥ १९ ॥

चरान्मन्त्रं च कोशं च दण्डं चैव विशेषतः ।
अनुतिष्ठेत् स्वयं राजा सर्वं ह्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥ २० ॥
गुप्तचरोंसे मिलने, गुप्त सलाह करने, खजानेकी जाँच-पड़ताल करने तथा विशेषतः अपराधियोंको दण्ड देनेका कार्य राजा स्वयं करे; क्योंकि इन्हींपर सारा राज्य प्रतिष्ठित है ॥ २० ॥

उदासीनारिमित्राणां सर्वमेव चिकीर्षितम् ।
पुरे जनपदे चैव ज्ञातव्यं चारचक्षुषा ॥ २१ ॥