महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यदि कार्य करनेवाला पुरुष स्वयं ही कर्ता होता तो उसको उत्पन्न करनेवाला दूसरा कोई कभी न होता। वह दूसरेके द्वारा उत्पन्न किया जाता है; इसलिये कालके सिवा दूसरा कोई कर्ता नहीं है ॥ ३४ ॥ कालेनाहं त्वमजयं कालेनाहं जितस्त्वया । गन्ता गतिमतां कालः कालः कलयति प्रजाः ॥ ३५ ॥ कालकी सहायता पाकर मैंने तुमपर विजय पायी थी और कालके ही सहयोगसे अब तुमने मुझे पराजित कर दिया है। काल ही जानेवाले प्राणियोंके साथ जाता या उन्हें गमनकी शक्ति प्रदान करता है और वही समस्त प्रजाका संहार करता है ॥ ३५ ॥ इन्द्र प्राकृतया बुद्ध्या प्रलयं नावबुद्ध्यसे । केचित् त्वां बहु मन्यन्ते श्रैष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ॥ ३६ ॥ इन्द्र! तुम्हारी बुद्धि साधारण है; इसलिये उसके द्वारा तुम एक-न-एक दिन अवश्य होनेवाले अपने विनाशकी बात नहीं समझ पाते। संसारमें कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो तुम्हें अपने ही पराक्रमसे श्रेष्ठताको प्राप्त हुआ मानते और तुम्हें अधिक महत्त्व देते हैं ॥ ३६ ॥ कथमस्मद्विधो नाम जानन् लोकप्रवृत्तयः । कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद् वाप्यथ विभ्रमेत् ॥ ३७ ॥ किंतु मेरे-जैसा पुरुष जो जगत्की प्रवृत्तिको जानता है-उन्नति और अवनतिका कारण काल-प्रारब्ध ही है; ऐसा समझता है, वह तुम्हें महत्त्व कैसे दे सकता है? जो कालसे पीड़ित है, वह प्राणी शोकग्रस्त, मोहित अथवा भ्रान्त भी हो सकता है ॥ ३७ ॥ नित्यं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा । बुद्धिर्व्यसनमासाद्य भिन्ना नौरिव सीदति ॥ ३८ ॥ मैं होऊँ या मेरे-जैसा दूसरा कोई पुरुष हो। जब काल (प्रारब्ध) से आक्रान्त हो जाता है, तब सदा ही उसकी बुद्धि संकटमें पड़कर फटी हुई नौकाके समान शिथिल हो जाती है ॥ ३८ ॥ अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः । ते सर्वे शक्र यास्यन्ति मार्गमिन्द्रशतैर्गतम् ॥ ३९ ॥ इन्द्र! मैं, तुम या और जो लोग भी देवेश्वरके पदपर प्रतिष्ठित होंगे, वे सब-के-सब उसी मार्गपर जायँगे, जिसपर पहलेके सैकड़ों इन्द्र जा चुके हैं ॥ ३९ ॥ त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परया श्रिया । काले परिणते कालः कलयिष्यति मामिव ॥ ४० ॥ यद्यपि आज तुम इस प्रकार दुर्धर्ष हो और अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो रहे हो; किंतु जब समय परिवर्तित होगा, अर्थात् जब तुम्हारा प्रारब्ध खराब होगा, तब मेरी ही भाँति तुम्हें भी काल अपना शिकार बना लेगा—इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर देगा ॥ ४० ॥ बहूनीन्द्रसहस्राणि दैवतानां युगे युगे ।
अभ्यतीतानि कालेन कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ४१ ॥
युग-युगमें (प्रत्येक मन्वन्तरमें) इन्द्रोंका परिवर्तन होनेके कारण अबतक देवताओंके अनेक सहस्र इन्द्र कालके गालमें चले गये हैं; अतः कालका उल्लङ्घन करना किसीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ ४१ ॥
इदं तु लब्ध्वा संस्थानमात्मानं बहु मन्यसे ।
सर्वभूतभवं देवं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ४२ ॥
न चेदमचलं स्थानमनन्तं वापि कस्यचित् ।
त्वं तु बालिशया बुद्ध्या ममेदमिति मन्यसे ॥ ४३ ॥
तुम इस शरीरको पाकर समस्त प्राणियोंको जन्म देनेवाले सनातन देव भगवान् ब्रह्माजीकी भाँति अपनेको बहुत बड़ा मानते हो; किंतु तुम्हारा यह इन्द्रपद आजतक (किसीके लिये भी) अविचल या अनन्त कालतक रहनेवाला नहीं सिद्ध हुआ—इसपर कितने ही आये और चले गये। केवल तुम्हीं अपनी मूढ़बुद्धिके कारण इसे अपना मानते हो ॥ ४२-४३ ॥
अविश्वस्ते विश्वसिषि मन्यसे वाध्रुवे ध्रुवम् ।
नित्यं कालपरीतात्मा भवत्येवं सुरेश्वर ॥ ४४ ॥
देवेश्वर! नाशवान् होनेके कारण जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस राज्यपर तुम विश्वास करते हो और जो अस्थिर है, उसे स्थिर मानते हो; किंतु इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कालने जिसके हृदयपर अधिकार कर लिया हो, वह सदा ऐसी ही विपरीत भावनासे भावित होता है ॥ ४४ ॥
ममेयमिति मोहात् त्वं राजश्रियमीप्ससि ।
नेयं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा सदा ॥ ४५ ॥
तुम मोहवश जिस राजलक्ष्मीको 'यह मेरी है' ऐसा समझकर पाना चाहते हो, वह न तुम्हारी है, न हमारी है और न दूसरोंकी ही है। वह किसीके पास भी सदा स्थिर नहीं रहती ॥ ४५ ॥
अतिक्रम्य बहूनन्यांस्त्वयि तावदियं गता ।
कंचित् कालमियं स्थित्वा त्वयि वासव चञ्चला ॥ ४६ ॥
गौर्निपानमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति ।
वासव! यह चञ्चला राजलक्ष्मी दूसरे बहुत-से राजाओंको लाँघकर इस समय तुम्हारे पास आयी है और कुछ कालतक तुम्हारे यहाँ ठहरकर फिर उसी तरह दूसरेके पास चली जायगी, जैसे गौ जल पीनेके स्थानका परित्याग करके चली जाती है ॥ ४६ १/२ ॥
राजलोका ह्यतिक्रान्ता यान्न संख्यातुमुत्सहे ॥ ४७ ॥
त्वत्तो बहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरंदर ।
पुरंदर! अबतक इसने जितने राजाओंका परित्याग किया है, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता। तुम्हारे बाद भी बहुत-से नरेश इसके अधिकारी होंगे॥ ४७ १/२ ॥
सवृक्षौषधिरत्नेयं सहसत्त्ववनाकरा ॥ ४८ ॥
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेयं पुरा मही।
जिन लोगोंने पहले वृक्ष, ओषधि, रत्न, जीव-जन्तु, वन और खानोंसहित इस सारी पृथ्वीका उपभोग किया है, उन सबको मैं इस समय नहीं देखता हूँ॥
पृथुरैलो मयो भीमो नरकः शम्बरस्तथा ॥ ४९ ॥
अश्वग्रीवः पुलोमा च स्वर्भानुरमितध्वजः।
प्रह्लादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः ॥ ५० ॥
हीनिषेवः सुहोत्रश्च भूरिहा पुष्पवान् वृषः।
सत्येषुर्ऋषभो बाहुः कपिलाश्वो विरूपकः ॥ ५१ ॥
बाणः कार्तस्वरो वह्निर्विश्वदंष्ट्रोऽथ नैर्ऋतिः।
संकोचोऽथ वरीताक्षो वराहाश्वो रुचिप्रभः ॥ ५२ ॥
विश्वजित् प्रतिरूपश्च वृषाण्डो विष्करो मधुः।
हिरण्यकशिपुश्चैव कैटभश्चैव दानवः ॥ ५३ ॥
दैतेया दानवाश्चैव सर्वे ते नैर्ऋतैः सह।
एते चान्ये च बहवः पूर्वे पूर्वतराश्च ये ॥ ५४ ॥
दैत्येन्द्रा दानवेन्द्राश्च यांश्चान्याननुशुश्रुम।
बहवः पूर्वदैत्येन्द्राः संत्यज्य पृथिवीं गताः ॥ ५५ ॥
कालेनाभ्याहताः सर्वे कालो हि बलवत्तरः।
पृथु, इलानन्दन पुरूरवा, मय, भीम, नरकासुर, शम्बरासुर, अश्वग्रीव, पुलोमा, स्वर्भानु, अमितध्वज, प्रह्लाद, नमुचि, दक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन, हीनिषेव, सुहोत्र, भूरिहा, पुष्पवान्, वृष, सत्येषु, ऋषभ, बाहु, कपिलाश्व, विरूपक, बाण, कार्तस्वर, वह्नि, विश्वदंष्ट्र, नैर्ऋति, संकोच, वरीताक्ष, वराहाश्व, रुचिप्रभ, विश्वजित्, प्रतिरूप, वृषाण्ड, विष्कर, मधु, हिरण्यकशिपु और कैटभ—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य, दानव एवं राक्षस सभी इस पृथ्वीके स्वामी हो चुके हैं। पहलेके और बहुत पहलेके ये पूर्वोक्त तथा अन्य अनेक दैत्यराज, दानवराज एवं दूसरे-दूसरे नरेश जिनका नाम हमलोग सुनते आ रहे हैं, कालसे पीड़ित हो सभी इस पृथ्वीको छोड़कर चले गये; क्योंकि काल ही सबसे बड़ा बलवान् हैं॥ ४९—५५ १/२ ॥
सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं न त्वमेकः शतक्रतुः ॥ ५६ ॥
सर्वे धर्मपराश्चासन् सर्वे सततसत्रिणः।
अन्तरिक्षचराः सर्वे सर्वेऽभिमुखयोधिनः ॥ ५७ ॥
केवल तुमने ही सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया हो, यह बात नहीं है। उन सभी राजाओंने सौ-सौ यज्ञ किये थे। सभी धर्मपरायण थे और सभी निरन्तर यज्ञमें संलग्न रहते थे। वे सभी आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखते थे और युद्धमें शत्रुके सामने डटकर लोहा लेनेवाले थे।।
सर्वे संहननोपेताः सर्वे परिघबाहवः ।
सर्वे मायाशतधराः सर्वे ते कामरूपिणः ॥ ५८ ॥
वे सब-के-सब सुदृढ़ शरीरसे सुशोभित होते थे। उन सबकी भुजाएँ परिघ (लोहदण्ड) के समान मोटी और मजबूत थीं। वे सभी सैकड़ों माया जानते और इच्छानुसार रूप धारण करते थे ॥ ५८ ॥
सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते पराजिताः ।
सर्वे सत्यव्रतपराः सर्वे कामविहारिणः ॥ ५९ ॥
वे सब लोग समराङ्गणमें पहुँचकर कभी पराजित होते नहीं सुने गये थे। सभी सत्यव्रतका पालन करनेमें तत्पर और इच्छानुसार विहार करनेवाले थे ॥ ५९ ॥
सर्वे वेदव्रतपराः सर्वे चैव बहुश्रुताः ।
सर्वे सम्मतमैश्वर्यमीश्वराः प्रतिपेदिरे ॥ ६० ॥
सभी वेदोक्त व्रतको धारण करनेवाले और बहुश्रुत विद्वान् थे। सभी लोकेश्वर थे और सबने मनोवाञ्छित ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ६० ॥
न चैश्वर्यमदस्तेषां भूतपूर्वो महात्मनाम् ।
सर्वे यथार्हदातारः सर्वे विगतमत्सराः ॥ ६१ ॥
उन महामना नरेशोंको पहले कभी भी ऐश्वर्यका मद नहीं हुआ था। वे सब-के-सब यथायोग्य दान करनेवाले और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित थे ॥ ६१ ॥
सर्वे सर्वेषु भूतेषु यथावत् प्रतिपेदिरे ।
सर्वे दाक्षायणीपुत्राः प्राजापत्या महाबलाः ॥ ६२ ॥
वे सभी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ यथायोग्य बर्ताव करते थे। उन सबका जन्म दक्ष-कन्याओंके गर्भसे हुआ था और वे सभी महाबलशाली वीर प्रजापति कश्यपकी संतान थे ॥ ६२ ॥
ज्वलन्तः प्रतपन्तश्च कालेन प्रतिसंहृताः ।
त्वं चैवेमां यदा भुक्त्वा पृथिवीं त्यक्ष्यसे पुनः ॥ ६३ ॥
न शक्ष्यसि तदा शक्र नियन्तुं शोकमात्मनः ।
इन्द्र! वे सभी नरेश अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले और प्रतापी थे, किंतु कालने उन सबका संहार कर दिया। तुम जब इस पृथ्वीका उपभोग करके पुनः इसे छोड़ोगे, तब अपने शोकको रोकनेमें समर्थ न हो सकोगे ॥ ६३ १/२ ॥
मुञ्चेच्छां कामभोगेषु मुञ्चेमं श्रीभवं मदम् ॥ ६४ ॥
एवं स्वराज्यनाशे त्वं शोकं सम्प्रसहिष्यसि ।
तुम काम-भोगकी इच्छाको छोड़ो और राजलक्ष्मीके इस मदको त्याग दो। इस दशामें यदि तुम्हारे राज्यका नाश हो जाय तो तुम उस शोकको सह सकोगे ।। ६४ १/२ ।। शोककाले शुचो मा त्वं हर्षकाले च मा हृषः ।। ६५ ।। अतीतानागतं हित्वा प्रत्युत्पन्नेन वर्तय । तुम शोकका अवसर आनेपर शोक न करो और हर्षके समय हर्षित मत होओ। भूत और भविष्यकी चिन्ता छोड़कर वर्तमान कालमें जो वस्तु उपलब्ध हो, उसीसे जीवन-निर्वाह करो ।। ६५ १/२ ।। मां चेदभ्यागतः कालः सदा युक्तमतन्द्रितः ।। ६६ ।। क्षमस्व नचिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति । इन्द्र! मैं सदा सावधान रहता था, तथापि कभी आलस्य न करनेवाले कालका यदि मुझपर आक्रमण हो गया तो तुमपर भी शीघ्र ही उस कालका आक्रमण होगा। इस कटु सत्यके लिये मुझे क्षमा करना ।। ६६ १/२ ।। त्रासयन्निव देवेन्द्र वाग्भिस्तक्षसि मामिह ।। ६७ ।। संयते मयि नूनं त्वमात्मानं बहु मन्यसे । देवेन्द्र! इस समय भयभीत करते हुए-से तुम यहाँ अपने वाग्बाणोंसे मुझे छेदे डालते हो। मैं अपनेको संयममें रखकर शान्त बैठा हूँ; इसीलिये अवश्य तुम अपनेको बहुत बड़ा समझने लगे हो ।। ६७ १/२ ।। कालः प्रथममायान्मां पश्चात् त्वामनुधावति ।। ६८ ।। तेन गर्जसि देवेन्द्र पूर्वं कालहते मयि । देवराज! जिस कालका पहले मुझपर धावा हुआ है, वही पीछे तुमपर भी चढ़ाई करेगा। मैं पहले कालसे पीड़ित हो गया हूँ; इसीलिये तुम सामने खड़े होकर गरज रहे हो ।। ६८ १/२ ।। को हि स्थातुमलं लोके मम क्रुद्धस्य संयुगे ।। ६९ ।। कालस्तु बलवान् प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव । अन्यथा संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें कुपित होनेपर मेरे सामने ठहर सके। इन्द्र! बलवान् काल (अदृष्ट) ने मुझपर आक्रमण किया है, इसीसे तुम मेरे सम्मुख खड़े हुए हो ।। ६९ १/२ ।। यत् तद् वर्षसहस्रान्तं पूर्णं भवितुमर्हति ।। ७० ।। यथा मे सर्वगात्राणि न सुस्थानि महौजसः । अहमैन्द्राच्च्युतः स्थानात् त्वमिन्द्रः प्रकृतो दिवि ।। ७१ ।। देवताओंका वह सहस्रों वर्षका समय अब पूरा होना ही चाहता है, जबतक कि तुम्हें इन्द्रके पदपर रहना है। कालके ही प्रभावसे मुझ महाबली वीरके अब सारे अंग उतने स्वस्थ
नहीं रह गये हैं। मैं इन्द्रपदसे गिरा दिया गया और तुम स्वर्गमें इन्द्र बना दिये गये ॥ सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययात् । किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं वा कृत्वा वयं च्युताः ॥ ७२ ॥ कालके उलट-फेरसे ही इस विचित्र जीवलोकमें तुम सबके आराध्य बन गये हो। भला बताओ तो तुम कौन-सा शुभ कर्म करके आज इन्द्र हो गये और हम कौन-सा अशुभ कर्म करके इन्द्रपदसे नीचे गिर गये ॥ कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम् । नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ७३ ॥ विद्वान् प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् । काल (प्रारब्ध) ही सबकी उत्पत्ति और संहारका कर्ता है। दूसरी सारी वस्तुएँ इसमें कारण नहीं मानी जा सकतीं; अतः विद्वान् पुरुष नाश-विनाश, ऐश्वर्य, सुख-दुःख, अभ्युदय या पराभव पाकर न तो अत्यन्त हर्ष माने और न अधिक व्यथित ही हो ॥ ७३ १/२ ॥ त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान् वेदाहं त्वां च वासव ॥ ७४ ॥ किं कथसे मां किं च त्वं कालेन निरपत्रपः । इन्द्र! हम कैसे हैं, यह तुम्हीं अच्छी तरह जानते हो। वासव! मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ; फिर भी तुम लज्जाको तिलाञ्जलि दे क्यों मेरे सामने व्यर्थ आत्मश्लाघा कर रहे हो। वास्तवमें काल ही यह सब कुछ करा रहा है ॥ ७४ १/२ ॥ त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत् तदा पौरुषं मम ॥ ७५ ॥ समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् । पहले मैं जो पुरुषार्थ प्रकट कर चुका हूँ, उसको सबसे अधिक तुम्हीं जानते हो। कई बारके युद्धोंमें तुम मेरा पराक्रम देख चुके हो। इस समय एक ही दृष्टान्त देना काफी होगा ॥ ७५ १/२ ॥ आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह ॥ ७६ ॥ मया विनिर्जिताः पूर्वं मरुतश्च शचीपते । त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे ॥ ७७ ॥ शचीवल्लभ इन्द्र! पहले जब देवासुरसंग्राम हुआ था, उस समयकी बात तुम्हें अच्छी तरह याद होगी। मैंने अकेले ही समस्त आदित्यों, रुद्रों, साध्यों, वसुओं तथा मरुद्गणोंको परास्त किया था ॥ ७६-७७ ॥ समेता विबुधा भग्नास्तरसा समरे मया । पर्वताश्चासकृत् क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः ॥ ७८ ॥ सटङ्कशिखरा भग्नाः समरे मूर्ध्नि ते मया । किं नु शक्यं मया कर्तुं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ७९ ॥
मेरे वेगसे सब देवता युद्धका मैदान छोड़कर एक साथ ही भाग खड़े हुए थे। वन एवं वनवासियोंसहित कितने ही पर्वत, मैंने बारंबार तुमलोगोंपर चलाये थे। तुम्हारे सिरपर भी सुदृढ़ पाषाण और शिखरोंसहित बहुत-से पर्वत मैंने फोड़ डाले थे; किंतु इस समय मैं क्या कर सकता हूँ; क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना बहुत कठिन है ॥ ७८-७९ ॥
न हि त्वां नोत्सहे हन्तुं सवज्रमपि मुष्टिना ।
न तु विक्रमकालोऽयं क्षमाकालोऽयमागतः ॥ ८० ॥
तुम्हारे हाथमें वज्र रहनेपर भी मैं केवल मुक्केसे मारकर तुम्हें यमलोक न पहुँचा सकूँ, ऐसी बात नहीं है। किंतु मेरे लिये यह पराक्रम दिखानेका नहीं, क्षमा करनेका समय आया है ॥ ८० ॥
तेन त्वां मर्षये शक्र दुर्मर्षणतरस्त्वया ।
तं मां परिणते काले परीतं कालवह्निना ॥ ८१ ॥
नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे ।
इन्द्र! यही कारण है कि मैं तुम्हारे सब अपराध चुपचाप सहे लेता हूँ। अब भी मेरा वेग तुम्हारे लिये अत्यन्त दुःसह है। किंतु जब समयने पलटा खाया है, कालरूपी अग्निने मुझे सब ओरसे घेर लिया है और मैं कालपाशसे निश्चितरूपसे बँध गया हूँ, तब तुम मेरे सामने खड़े होकर अपनी झूठी बड़ाई किये जा रहे हो ॥ ८१ ½ ॥
अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य दुरतिक्रमः ॥ ८२ ॥
बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनया यथा ।
जैसे मनुष्य रस्सीसे किसी पशुको बाँध लेता है, उसी प्रकार यह भयंकर कालपुरुष मुझे अपने पाशमें बाँधे खड़ा है ॥ ८२ ½ ॥
लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ ॥ ८३ ॥
वधबन्धप्रमोक्षं च सर्वं कालेन लभ्यते ।
पुरुषको लाभ-हानि, सुख-दुःख, काम-क्रोध, अभ्युदयपराभव, वध, कैद और कैदसे छुटकारा—यह सब काल (प्रारब्ध) से ही प्राप्त होते हैं ॥ ८३ ½ ॥
नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः ॥ ८४ ॥
सोऽयं पचति कालो मां वृक्षे फलमिवागतम् ।
न मैं कर्ता हूँ, न तुम कर्ता हो। जो वास्तवमें सदा कर्ता है, वह सर्वसमर्थ काल वृक्षपर लगे हुए फलके समान मुझे पका रहा है ॥ ८४ ½ ॥
यान्येव पुरुषः कुर्वन् सुखैः कालेन युज्यते ॥ ८५ ॥
पुनस्तान्येव कुर्वाणो दुःखैः कालेन युज्यते ।
पुरुष कालका सहयोग पाकर जिन कर्मोंको करनेसे सुखी होता है, कालका सहयोग न मिलनेसे पुनः उन्हीं कर्मोंको करके वह दुःखका भागी होता है ॥
न च कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हति ॥ ८६ ॥
तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहायता ।
इन्द्र! जो कालके प्रभावको जानता है, वह उससे आक्रान्त होकर भी शोक नहीं करता; क्योंकि विपत्ति दूर करनेमें शोकसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिये मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८६ १/२ ।।
यदा हि शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ।। ८७ ।।
सामर्थ्यं शोचतो नास्तीत्यतोऽहं नाद्य शोचिमि ।
जब शोक करनेवाले पुरुषका शोक उसके संकटको दूर नहीं हटा पाता है, उलटे शोकग्रस्त मनुष्यकी शक्ति क्षीण हो जाती है, तब शोक क्यों किया जाय? यही सोचकर मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८७ १/२ ।।
एवमुक्तः सहस्राक्षो भगवान् पाकशासनः ।। ८८ ।।
प्रतिसंहृत्य संरम्भमित्युवाच शतक्रतुः ।
बलिके ऐसा कहनेपर सहस्रनेत्रधारी पाकशासन शतक्रतु भगवान् इन्द्रने अपने क्रोधको रोककर इस प्रकार कहा— ।। ८८ १/२ ।।
सवज्रमुद्यतं बाहुं दृष्ट्वा पाशांश्च वारुणान् ।। ८९ ।।
कस्येह न व्यथेद् बुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ।
सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ।। ९० ।।
'दैत्यराज! मेरे हाथको वज्र एवं वरुणपाशसहित ऊपर उठा देखकर मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्युका भी दिल दहल जाता है; फिर दूसरा कौन है जिसकी बुद्धि व्यथित न हो। तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली और स्थिर है; इसलिये तनिक भी विचलित नहीं होती है ।। ८९-९० ।।
ध्रुवं न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात् सत्यपराक्रम ।
को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् ।। ९१ ।।
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् ।
'सत्यपराक्रमी वीर! तुम निश्चय ही धैर्यके कारण व्यथित नहीं होते हो। इस सम्पूर्ण जगत्को विनाशकी ओर जाते देखकर कौन शरीरधारी पुरुष धन-वैभव, विषय-भोग अथवा अपने शरीरपर भी विश्वास कर सकता है? ।। ९१ १/२ ।।
अहमप्येवमेवैतं लोकं जानाम्यशाश्वतम् ।। ९२ ।।
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ।
'मैं भी इसी प्रकार सर्वव्यापी, अविनाशी, घोर एवं गुह्य कालाग्निमें पड़े हुए इस जगत्को क्षणभंगुर ही जानता हूँ ।। ९२ १/२ ।।
न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् ।। ९३ ।।
सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ।
‘जो कालकी पकड़में आ चुका है, ऐसे किसी भी पुरुषके लिये उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं है। सूक्ष्मसे सूक्ष्म और महान् भूत भी कालग्निमें पकाये जा रहे हैं, उनका भी उससे छुटकारा होनेवाला नहीं है॥ ९३ १/२ ॥
अनीशस्याप्रमत्तस्य भूतानि पचतः सदा ॥ ९४ ॥
अनिवृत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ।
‘कालपर किसीका भी वश नहीं चलता। वह सदा सावधान रहकर सम्पूर्ण भूतोंको पकाता रहता है। वह कभी लौटनेवाला नहीं है। ऐसे कालके अधीन हुआ प्राणी उससे छुटकारा नहीं पाता है॥ ९४ १/२ ॥
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु ॥ ९५ ॥
प्रयत्नेनाप्यपक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् ।
‘देहधारी जीव प्रमादमें पड़कर सोते हैं; किंतु काल सदा सावधान रहकर जागता रहता है। किसीके प्रयत्नसे भी कालको पीछे हटाया जा सका हो, ऐसा पहले कभी किसीने देखा नहीं है॥ ९५ १/२ ॥
पुराणः शाश्वतो धर्मः सर्वप्राणभृतां समः ॥ ९६ ॥
कालो न परिहार्यश्च न चास्यास्ति व्यतिक्रमः ।
‘काल पुरातन (अनादि), सनातन, धर्मस्वरूप और समस्त प्राणियोंके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है। कालका किसीके द्वारा भी परिहार नहीं हो सकता और न उसका कोई उल्लङ्घन ही कर सकता है॥
अहोरात्रांश्च मासांश्च क्षणान् काष्ठा लवान् कलाः ॥ ९७ ॥
सम्पीडयति यः कालो वृद्धिं वार्धुषिको यथा ।
जैसे ऋण देनेवाला पुरुष व्याजका हिसाब जोड़कर ऋण लेनेवालोंको तंग करता है, उसी प्रकार वह काल दिन, रात, मास, क्षण, काष्ठा, लव और कला तकका हिसाब लगाकर प्राणियोंको पीड़ा देता रहता है॥ ९७ १/२ ॥
इदमद्य करिष्यामि श्वः कर्तास्मीति वादिनम् ॥ ९८ ॥
कालो हरति सम्प्राप्तो नदीवेग इव द्रुमम् ।
‘जैसे नदीका वेग सहसा बढ़कर किनारेके वृक्षका हरण कर लेता है। उसी प्रकार ‘यह आज करूँगा और वह कल पूरा करूँगा।' ऐसा कहनेवाले पुरुषका काल सहसा आकर हरण कर लेता है॥ ९८ १/२ ॥
इदानीं तावदेवासौ मया दृष्टः कथं मृतः ॥ ९९ ॥
इति कालेन ह्रियतां प्रलापः श्रूयते नृणाम् ।
“अरे! अभी-अभी तो मैंने उसे देखा था। वह मर कैसे गया?' इस प्रकार कालसे अपहृत होनेवालोंके लिये अन्य मनुष्योंका प्रलाप सुना जाता है॥ ९९ १/२ ॥
नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च ॥ १०० ॥ जीवितं जीवलोकस्य कालेनागम्य नीयते । ‘धन और भोग नष्ट हो जाते हैं। स्थान और ऐश्वर्य छिन जाता है तथा इस जीव-जगत्के जीवनको भी काल आकर हर ले जाता है ॥ १०० १/२ ॥’
उच्छ्राया विनिपातान्ता भावोऽभावः स एव च ॥ १०१ ॥ अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसायो हि दुष्करः । ‘ऊँचे चढ़नेका अन्त है नीचे गिरना तथा जन्मका अन्त है मृत्यु। जो कुछ देखनेमें आता है, वह सब नाशवान् है, अस्थिर है तो भी इसका निरन्तर स्मरण रहना कठिन हो जाता है ॥ १०१ १/२ ॥’
सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ॥ १०२ ॥ अहमासं पुरा चेति मनसापि न बुद्ध्यते । ‘अवश्य ही तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली तथा स्थिर है, इसीलिये उसे व्यथा नहीं होती। मैं पहले अत्यन्त ऐश्वर्यशाली था, इस बातको तुम मनसे भी स्मरण नहीं करते ॥ १०२ १/२ ॥’
कालेनाक्रम्य लोकेऽस्मिन् पच्यमाने बलीयसा ॥ १०३ ॥ अज्येष्ठमकनिष्ठं च क्षिप्यमाणो न बुद्ध्यते । ‘अत्यन्त बलवान् काल इस सम्पूर्ण जगत्पर आक्रमण करके सबको अपनी आँचमें पका रहा है। वह इस बातको नहीं देखता है कि कौन छोटा है और कौन बड़ा? सब लोग कालाग्निमें झोंके जा रहे हैं, फिर भी किसीको चेत नहीं होता ॥ १०३ १/२ ॥’
ईर्ष्याभिमानलोभेषु कामक्रोधभयेषु च ॥ १०४ ॥ स्पृहामोहाभिमानेषु लोकः सक्तो विमुह्यति । ‘लोग ईर्ष्या, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध, भय, स्पृहा, मोह और अभिमानमें फँसकर अपना विवेक खो बैठे हैं ॥’
भवांस्तु भावतत्त्वज्ञो विद्वान् ज्ञानतपोऽन्वितः ॥ १०५ ॥ कालं पश्यति सुव्यक्तं पाणावामलकं यथा । कालचारित्रतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १०६ ॥ विवेचने कृतात्मासि स्पृहणीयो विजानताम् । सर्वलोको ह्ययं मन्ये बुद्ध्या परिगतस्त्वया ॥ १०७ ॥ ‘परंतु तुम विद्वान्, ज्ञानी और तपस्वी हो। समस्त पदार्थोंके तत्त्वको जानते हो। कालकी लीला और उसके तत्त्वको समझते हो। सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हो। तत्त्वके विवेचनमें कुशल, मनको वशमें रखनेवाले तथा ज्ञानी पुरुषोंके आदर्श हो। इसीलिये हाथपर रक्खे हुए आँवलेके समान कालको स्पष्टरूपसे देख रहे हो। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुमने अपनी बुद्धिसे सम्पूर्ण लोकोंका तत्त्व जान लिया है ॥ १०५—१०७ ॥’
विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते ।
रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम् ॥ १०८ ॥
‘तुम सर्वत्र विचरते हुए भी सबसे मुक्त हो। कहीं भी तुम्हारी आसक्ति नहीं है। तुमने
अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है; इसलिये रजोगुण और तमोगुण तुम्हारा स्पर्श नहीं कर
सकते ॥ १०८ ॥
निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ।
सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् ॥ १०९ ॥
‘जो हर्षसे रहित, संतापसे शून्य, सम्पूर्ण भूतोंका सुहृद्, वैररहित और शान्तचित्त है,
उस आत्माकी तुम उपासना करते हो ॥ १०९ ॥
दृष्ट्वा त्वां मम संजाता त्वय्यनुक्रोशिनी मतिः ।
नाहमेतादृशं बुद्धं हन्तुमिच्छामि बन्धने ॥ ११० ॥
‘तुम्हें देखकर मेरे मनमें दयाका संचार हो आया है। मैं ऐसे ज्ञानी पुरुषको बन्धनमें
रखकर उसका वध करना नहीं चाहता ॥ ११० ॥
आनृशंस्यं परो धर्मो ह्यनुक्रोशश्च मे त्वयि ।
मोक्ष्यन्ते वारुणाः पाशास्त्वेमे कालपर्ययात् ॥ १११ ॥
‘किसीके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करना सबसे बड़ा धर्म है। तुम्हारे ऊपर मेरा पूर्ण
अनुग्रह है। कुछ समय बीतनेपर तुम्हें बाँधनेवाले ये वरुणदेवताके पाश अपने आप ही तुम्हें
छोड़ देंगे ॥ १११ ॥
प्रजानामपचारेण स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ।
यदा श्वश्रूं स्नुषा वृद्धां परिचारेण योक्ष्यते ॥ ११२ ॥
पुत्रश्च पितरं मोहात् प्रेषयिष्यति कर्मसु ।
ब्राह्मणैः कारयिष्यन्ति वृषलाः पादधावनम् ॥ ११३ ॥
शूद्राश्च ब्राह्मणीं भार्यामुपयास्यन्ति निर्भयाः ।
वियोनिषु विमोक्ष्यन्ति बीजानि पुरुषा यदा ॥ ११४ ॥
संकरं कांस्यभाण्डैश्च बलिं चैव कुपात्रकेः ।
चातुर्वर्ण्यं यदा कृत्स्नममर्यादं भविष्यति ॥ ११५ ॥
एकैकस्ते तदा पाशः क्रमशः परिमोक्ष्यते ।
‘महान् असुर! जब प्रजाजनोंका न्यायके विपरीत आचरण होने लगेगा, तब तुम्हारा
कल्याण होगा। जब पतोहू बूढ़ी साससे अपनी सेवा-टहल कराने लगेगी और पुत्र भी
मोहवश पिताको विभिन्न प्रकारके कार्य करनेके लिये आज्ञा प्रदान करने लगेगा, शूद्र
ब्राह्मणोंसे पैर धुलाने लगेंगे तथा वे निर्भय होकर ब्राह्मण जातिकी स्त्रीको अपनी भार्या
बनाने लगेंगे, जब पुरुष निर्भय होकर मानवेतर योनियोंमें अपना वीर्य स्थापित करने लगेंगे,
जब काँसेके पात्रमें ऊँच जाति और नीच जातिके लोग एक साथ भोजन करने लगेंगे एवं
अपवित्र पात्रोंद्वारा देवपूजाके लिये उपहार अर्पित किया जायगा, सारा वर्णधर्म जब मर्यादाशून्य हो जायगा, उस समय क्रमशः तुम्हारा एक-एक पाश (बन्धन) खुलता जायगा।।
अस्मत्तस्ते भयं नास्ति समयं प्रतिपालय।
सुखी भव निराबाधः स्वस्थचेता निरामयः॥ ११६॥
'हमारी ओरसे तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम समयकी प्रतीक्षा करो और निर्बाध, स्वस्थचित्त एवं रोगरहित हो सुखसे रहो'॥ ११६॥
तमेवमुक्त्वा भगवान्छतक्रतुः
प्रतिप्रयातो गजराजवाहनः।
विजित्य सर्वानसुरान् सुराधिपो
ननन्द हर्षेण बभूव चैकराट्॥ ११७॥
बलिसे ऐसा कहकर गजराजकी सवारीपर चलनेवाले भगवान् शतक्रतु इन्द्र अपने स्थानको लौट गये। वे समस्त असुरोंपर विजय पाकर देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए थे और एकच्छत्रसम्राट् होकर हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे थे॥ ११७॥
महर्षयस्तुष्टुवुरञ्जसा च तं
वृषाकपिं सर्वचराचरेश्वरम्।
हिमापहो हव्यमुवाह चाध्वरे
तथामृतं चार्पितमीश्वरोऽपि हि॥ ११८॥
उस समय महर्षियोंने सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी इन्द्रका भलीभाँति स्तवन किया। अग्निदेव यज्ञमण्डपमें देवताओंके लिये हविष्य वहन करने लगे और देवेश्वर इन्द्र भी सेवकोंद्वारा अर्पित अमृत पीने लगे॥ ११८॥
द्विजोत्तमैः सर्वगतैरभिष्टुतो
विदीप्ततेजा गतमन्युरीश्वरः।
प्रशान्तचेता मुदितः स्वमालयं
त्रिविष्टपं प्राप्य मुमोद वासवः॥ ११९॥
सर्वत्र पहुँचनेकी शक्ति रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उद्दीप्त तेजस्वी और क्रोधशून्य हुए देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति की; फिर वे इन्द्र शान्तचित्त एवं प्रसन्न हो अपने निवासस्थान स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करने लगे॥ ११९॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादे
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि-वासवसंवादविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२७॥
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२२८-
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
युधिष्ठिर उवाच
पूर्वरूपाणि मे राजन् पुरुषस्य भविष्यतः ।
पराभविष्यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजन्! पितामह! जिस पुरुषका उत्थान या पतन होनेवाला होता है, उसके पूर्व लक्षण कैसे होते हैं? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ।
भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। जिस मनुष्यका उत्थान या पतन होनेको होता है, उसका मन ही उसके पूर्व लक्षणोंको प्रकट कर देता है ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
श्रिया शक्रस्य संवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
इस विषयमें लक्ष्मीके साथ जो इन्द्रका संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण यहाँ दिया जाता है। युधिष्ठिर! तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ ३ ॥
महत्तस्तपसो व्युष्ट्या पश्यँल्लोकौ परावरौ ।
सामान्यमृषिभिर्गत्वा ब्रह्मलोकनिवासिभिः ॥ ४ ॥
ब्रह्मेवामितदीप्तौजाः शान्तपाप्मा महातपाः ।
विचचार यथाकामं त्रिषु लोकेषु नारदः ॥ ५ ॥
एक समयकी बात है, महातपस्वी एवं पापरहित नारदजी अपनी इच्छाके अनुसार तीनों लोकोंमें विचरण करते थे। वे अपनी बड़ी भारी तपस्याके प्रभावसे ऊँचे और नीचे दोनों प्रकारके लोकोंको देख सकते थे तथा ब्रह्मलोक-निवासी ऋषियोंके समान होकर ब्रह्माजीकी ही भाँति अमित दीप्ति और ओजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४-५ ॥
कदाचित् प्रातरुत्थाय पिस्पृक्षुः सलिलं शुचि ।
ध्रुवद्वारभवां गङ्गां जगामावततार च ॥ ६ ॥
एक दिन वे प्रातःकाल उठकर पवित्र जलमें स्नान करनेकी इच्छासे ध्रुवद्वारसे प्रवाहित हुई गङ्गाजीके तटपर गये और उसके भीतर उतरे ॥ ६ ॥
सहस्रनयनश्चापि वज्री शम्बरपाकहा ।
तस्या देवर्षिजुष्टायास्तीरमभ्याजगाम ह ॥ ७ ॥
इसी समय शम्बरासुर और पाक नामक दैत्यका वध करनेवाले वज्रधारी सहस्रलोचन इन्द्र भी देवर्षियोंद्वारा सेवित गङ्गाजीके उसी तटपर आये ॥ ७ ॥
तावाप्लुत्य यतात्मानौ कृतजप्यौ समासतः ।
नद्याः पुलिनमासाद्य सूक्ष्मकाञ्चनवालुकम् ॥ ८ ॥
पुण्यकर्मभिराख्याता देवर्षिकथिताः कथाः ।
चक्रतुस्तौ तथाऽऽसीनौ महर्षिकथितास्तथा ॥ ९ ॥
फिर उन दोनोंने गङ्गाजीमें गोते लगाकर मनको एकाग्र करके संक्षेपसे गायत्रीजपका कार्य पूर्ण किया। इसके बाद सूक्ष्म सुवर्णमयी बालुकासे भरे हुए सुन्दर गङ्गातटपर आकर वे दोनों बैठ गये और पुण्यात्मा पुरुषों, देवर्षियों तथा महर्षियोंके मुखसे सुनी हुई कथाएँ कहने-सुनने लगे ॥ ८-९ ॥
पूर्ववृत्तव्यपेतानि कथयन्तौ समाहितौ ।
अथ भास्करमुद्यन्तं रश्मिजालपुरस्कृतम् ॥ १० ॥
पूर्णमण्डलमालोक्य तावुत्थायोपतस्थतुः ।
दोनों एकाग्रचित्त होकर प्राचीन वृत्तान्तोंकी चर्चा कर ही रहे थे कि किरणजालसे मण्डित भगवान् भास्करका उदय हुआ। सूर्यदेवका सम्पूर्ण मण्डल देख उन दोनोंने खड़े होकर उनका उपस्थान किया ॥ १० १/२ ॥
अभितस्तूदयन्तं तमर्कमर्कमिवापरम् ॥ ११ ॥
आकाशे ददृशे ज्योतिरुद्यतार्चिःसमप्रभम् ।
तयोः समीपं तं प्राप्तं प्रत्यदृश्यत भारत ॥ १२ ॥
उदित होते हुए सूर्यके पास ही आकाशमें उन्हें द्वितीय सूर्यके समान एक दिव्य ज्योति दिखायी दी, जो प्रज्वलित अग्निशिखाके समान प्रकाशित हो रही थी। भारत! वह ज्योति क्रमशः उन दोनोंके समीप आती दिखायी दी ॥ ११-१२ ॥
तत् सुपर्णार्कचरितमास्थितं वैष्णवं पदम् ।
भाभिरप्रतिमं भाति त्रैलोक्यमवभासयत् ॥ १३ ॥
वह प्रभापुञ्ज भगवान् विष्णुका एक विमान था, जो अपनी दिव्य प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित करता हुआ अनुपम जान पड़ता था। सूर्य और गरुड़ जिस आकाशमार्गसे चलते हैं, उसीपर वह भी चल रहा था ॥
तत्राभिरूपशोभाभिरप्सरोभिः पुरस्कृतम् ।
बृहतीमंशुमत्प्रख्यां बृहद्भानोरिवार्चिषम् ॥ १४ ॥
नक्षत्रकल्पाभरणां तां मौक्तिकसमस्रजम् ।
श्रियं ददृशतुः पद्मां साक्षात् पद्मदलस्थिताम् ॥ १५ ॥
उस विमानमें उन दोनोंने कमलदलपर विराजमान साक्षात् लक्ष्मीदेवीको देखा, जो पद्माके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन्हें बहुत-सी परम शोभामयी सुन्दरी अप्सराएँ आगे किये खड़ी थीं। लक्ष्मीदेवीकी आकृति विशाल थी। वे अंशुमाली सूर्यके समान तेजस्विनी थीं और प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाके समान जाज्वल्यमान हो रही थीं। उनके आभूषण नक्षत्रोंके समान चमक रहे थे। मोती-जैसे रत्नोंके हार उनके कण्ठदेशकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १४-१५ ॥
सावरुह्य विमानाग्रादङ्गनानामनुत्तमा ।
अभ्यागच्छत् त्रिलोकेशं देवर्षिं चापि नारदम् ॥ १६ ॥
अङ्गनाओंमें परम उत्तम लक्ष्मीदेवी उस विमानके अग्रभागसे उतरकर त्रिभुवनपति इन्द्र और देवर्षि नारदके पास आयीं ॥ १६ ॥
नारदानुगतः साक्षान्मघवांस्तामुपागमत् ।
कृताञ्जलिपुटो देवीं निवेद्यात्मानमात्मना ॥ १७ ॥
चक्रे चानुपमां पूजां तस्याश्चापि स सर्ववित् ।
देवराजः श्रियं राजन् वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥
आगे-आगे नारदजी और उनके पीछे साक्षात् इन्द्रदेव हाथ जोड़े हुए देवीकी ओर बढ़े। उन्होंने स्वयं ही देवीको आत्मसमर्पण करके उनकी अनुपम पूजा की। राजन्! तत्पश्चात् सर्वज्ञ देवराजने लक्ष्मीदेवीसे इस प्रकार कहा ॥ १७-१८ ॥
शक्र उवाच
का त्वं केन च कार्येण सम्प्राप्ता चारुहासिनि ।
कुतश्चागम्यते सुभ्रु गन्तव्यं क्व च ते शुभे ॥ १९ ॥
इन्द्र बोले— चारुहासिनि! तुम कौन हो? और किस कार्यसे यहाँ आयी हो? सुन्दर भौंहोंवाली देवि! तुम्हारा शुभागमन कहाँसे हुआ है? और शुभे! तुम्हें जाना कहाँ है? ॥ १९ ॥
श्रीरुवाच
पुण्येषु त्रिषु लोकेषु सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।
ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मना ॥ २० ॥
लक्ष्मीने कहा— इन्द्र! तीनों पुण्यमय लोकोंके समस्त चराचर प्राणी मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे परम उत्साहपूर्वक प्रयत्न करते रहते हैं ॥ २० ॥
साहं वै पङ्कजे जाता सूर्यरश्मिविबोधिते ।
भूत्यर्थं सर्वभूतानां पद्मा श्रीः पद्ममालिनी ॥ २१ ॥
मैं समस्त प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके तापसे खिले हुए कमलमें प्रकट हुई हूँ। मेरा नाम पद्मा, श्री और पद्ममालिनी है ॥ २१ ॥ अहं लक्ष्मीरहं भूतिः श्रीश्चाहं बलसूदन । अहं श्रद्धा च मेधा च संनतिर्विजितिः स्थितिः ॥ २२ ॥ अहं धृतिरहं सिद्धिरहं त्विड् भूतिरेव च । अहं स्वाहा स्वधा चैव संस्तुतिर्नियतिः स्मृतिः ॥ २३ ॥ बलसूदन! मैं ही लक्ष्मी हूँ। मैं ही भूति हूँ और मैं ही श्री हूँ। मैं श्रद्धा, मेधा, संनति, विजिति, स्थिति, धृति, सिद्धि, कान्ति, समृद्धि, स्वाहा, स्वधा, संस्तुति, नियति और स्मृति हूँ ॥ २२-२३ ॥ राज्ञां विजयमानानां सेनाग्रेषु ध्वजेषु च । निवासे धर्मशीलानां विषयेषु पुरेषु च ॥ २४ ॥ युद्धमें विजय पानेवाले राजाओंकी सेनाओंके अग्रभागमें फहरानेवाले ध्वजाओंपर और स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंके निवासस्थानमें, उनके राज्य और नगरोंमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २४ ॥ जितकाशिनि शूरे च संग्रामेष्वनिवर्तिनि । निवसामि मनुष्येन्द्रे सदैव बलसूदन ॥ २५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1509)
देवर्षि एवं देवराजको भगवती लक्ष्मीका दर्शन
बलसूदन! संग्रामसे पीछे न हटनेवाले तथा विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर नरेशके शरीरमें भी मैं सदा ही मौजूद रहती हूँ ॥ २५ ॥
धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।
प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥ २६ ॥
नित्य धर्माचरण करनेवाले, परम बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुषमें भी मैं सदा ही निवास करती हूँ ॥ २६ ॥
असुरेष्ववसं पूर्वं सत्यधर्मनिबन्धना ।
विपरीतांस्तु तान् बुद्ध्वा त्वयि वासमरोचयम् ॥ २७ ॥
सत्य और धर्मसे बँधकर पहले मैं असुरोंके यहाँ रहती थी। अब उन्हें धर्मके विपरीत देखकर मैंने तुम्हारे यहाँ रहना पसंद किया है ॥ २७ ॥
शक्र उवाच
कथंवृत्तेषु दैत्येषु त्वमवात्सीर्वरानने ।
दृष्ट्वा च किमिहागास्त्वं हित्वा दैतेयदानवान् ॥ २८ ॥
**इन्द्रने कहा—**सुमुखि! दैत्योंका आचरण पहले कैसा था? जिससे तुम उनके पास रहती थी और अब क्या देखा है, जो उन दैत्यों और दानवोंको छोड़कर यहाँ चली आयी हो? ॥ २८ ॥
श्रीरुवाच
स्वधर्ममनुतिष्ठत्सु धैर्यादचलितेषु च ।
स्वर्गमार्गाभिरामेषु सत्त्वेषु निरता ह्यहम् ॥ २९ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! जो अपने धर्मका पालन करते, धैर्यसे कभी विचलित नहीं होते और स्वर्गप्राप्तिके साधनोंमें सानन्द लगे रहते हैं, उन प्राणियोंके भीतर मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २९ ॥
दानाध्ययनयज्ञेज्यापितृदैवतपूजनम् ।
गुरूणामतिथीनां च तेषां सत्यमवर्तत ॥ ३० ॥
पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन और यज्ञ-यागमें संलग्न रहते थे। देवता, गुरु, पितर और अतिथियोंकी पूजा करते थे। उनके यहाँ सत्यका भी पालन होता था ॥ ३० ॥
सुसम्पृष्टगृहाश्वासन् जितस्त्रीका हुताग्नयः ।
गुरुशुश्रूषका दान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ३१ ॥
वे अपना घर-द्वार झाड़-बुहारकर साफ रखते थे। अपनी स्त्रीके मनको प्यारसे जीत लेते थे। प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे। वे गुरुसेवी, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी थे ॥ ३१ ॥
श्रद्दधाना जितक्रोधा दानशीलानसूयवः ।
भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ॥ ३२ ॥ उनमें श्रद्धा थी। वे क्रोधको जीत चुके थे। वे दानी थे। दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं रखते थे और ईर्ष्यारहित थे। वे स्त्री, पुत्र और मन्त्री आदिका भरण-पोषण करते थे ॥ ३२ ॥ अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन । न च जातूपतप्यन्ति धीराः परसमृद्धिभिः ॥ ३३ ॥ अमर्षवश कभी एक-दूसरेके प्रति लाग-डाँट नहीं रखते थे। सभी धीर स्वभावके थे। दूसरोंकी समृद्धियोंसे उनके मनमें कभी संताप नहीं होता था ॥ ३३ ॥ दातारः संगृहीतार आर्याः करुणवेदिनः । महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥ वे दान देते, कर आदिके द्वारा धन-संग्रह करते तथा आर्य-जनोचित आचार-विचारसे रहते थे। वे दया करना जानते थे। वे दूसरोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले थे। वे सभी सरल स्वभावके और दृढ़तापूर्वक भक्ति रखनेवाले थे। उन सबने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पायी थी ॥ ३४ ॥ संतुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रियवादिनः । यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ ३५ ॥ वे अपने भृत्यों और मन्त्रियोंको संतुष्ट रखते थे। कृतज्ञ और मधुरभाषी थे। सबका समुचित रूपसे सम्मान करते, सबको धन देते, लज्जाका सेवन करते और व्रत एवं नियमोंका पालन करते थे ॥ ३५ ॥ नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलंकृताः । उपवासतपःशीलाः प्रतीता ब्रह्मवादिनः ॥ ३६ ॥ सदा ही पर्वोंपर विशेष स्नान करते, अपने अंगोंमें चन्दन लगाते और सुन्दर अलंकार धारण करते थे। स्वभावसे ही उपवास और तपमें लगे रहते थे। सबके विश्वासपात्र थे और वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे ॥ नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशयाः । रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन् ॥ ३७ ॥ दैत्य कभी प्रातःकाल सोये नहीं रहते थे। उनके सोते समय सूर्य नहीं उगते थे; अर्थात् वे सूर्योदयसे पहले ही जाग उठते थे। वे रातमें कभी दही और सत्तू नहीं खाते थे ॥ ३७ ॥ कल्यं घृतं चान्ववेक्षन् प्रयता ब्रह्मवादिनः । मङ्गल्यान्यपि चापश्यन् ब्राह्मणांश्चाप्यपूजयन् ॥ ३८ ॥ वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते, सबेरे उठकर घीका दर्शन करते, वेदोंका पाठ करते, अन्य मांगलिक वस्तुओंको देखते और ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे ॥ ३८ ॥ सदा हि वदतां धर्मं सदा चाप्रतिगृह्णताम् ।