महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृथग्भूतं मनो बुद्ध्या मनो भवति केवलम् ।। १३ ।।
बुद्धि जिस विषयका अवलम्बन करती है, मन भी उसीका आश्रय लेता है। मन जब बुद्धिसे पृथक् होता है, तब केवल मन रह जाता है ।। १३ ।।
तत्रैनं विधुतं शून्यं रजः पर्यवतिष्ठते ।
तन्मनः कुरुते सख्यं रजसा सह सङ्गतम् ।
तं चादाय जनं पौरं रजसे सम्प्रयच्छति ।। १४ ।।
उस समय रजोगुणजनित काम मनको आत्माके बलसे युक्त होनेपर भी विवेकसे रहित होनेके कारण सब ओरसे घेर लेता है। तब वह कामसे घिरा हुआ मन उस रजोगुणरूप कामके साथ मित्रता स्थापित कर लेता है। उसके बाद वह मन ही उस इन्द्रियरूप पुरवासीजनको रजोगुणजनित कामके हाथमें समर्पित कर देता है (जैसे राजाका विरोधी मन्त्री राज्य और प्रजाको शत्रुके हाथमें सौंप देता है) ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५४ ।।
पञ्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन
पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पञ्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन
भीष्म उवाच
भूतानां परिसंख्यानं भूयः पुत्र निशामय ।
द्वैपायनमुखाद् भ्रष्टं श्लाघया परयानघ ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—निष्पाप पुत्र युधिष्ठिर! द्वैपायन व्यासजीके मुखसे वर्णित जो पञ्चमहाभूतोंका निरूपण है, वह मैं पुनः तुम्हें बता रहा हूँ; तुम बड़ी स्पृहाके साथ इस विषयको सुनो ॥ १ ॥
दीप्तानलनिभः प्राह भगवान् धूमवर्चसे ।
ततोऽहमपि वक्ष्यामि भूयः पुत्र निदर्शनम् ॥ २ ॥
वत्स! प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भगवान् वेदव्यासने धूमाच्छादित अग्निके सदृश विराजमान अपने पुत्र शुकदेवके समक्ष पहले जिस प्रकार इस विषयका प्रतिपादन किया था, उसे मैं पुनः तुमसे कहूँगा। बेटा! तुम सुनिश्चित दर्शन-शास्त्रको श्रवण करो ॥ २ ॥
भूमेः स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवार्थता ।
गन्धो गुरुत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः ॥ ३ ॥
स्थिरता, भारीपन, कठिनता (कड़ापन), बीजको अंकुरित करनेकी शक्ति, गन्ध, विशालता, शक्ति, संघात, स्थापना और धारणशक्ति—ये दस पृथ्वीके गुण हैं ॥ ३ ॥
अपां शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता ।
जिह्वा विस्यन्दनं चापि भौमानां श्रपणं तथा ॥ ४ ॥
शीतलता, रस, क्लेद (गलाना या गीला करना), द्रवत्व (पिघलना), स्नेह (चिकनाहट), सौम्यभाव, जिह्वा, टपकना, ओले या बर्फके रूपमें जम जाना तथा पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले चावल-दाल आदिको गला देना—ये सब जलके गुण हैं ॥ ४ ॥
अग्नेर्दुर्धर्षता ज्योतिस्तापः पाकः प्रकाशनम् ।
शोको रागो लघुस्तैक्ष्ण्यं सततं चोर्ध्वभासिता ॥ ५ ॥
दुर्धर्ष होना, जलना, ताप देना, पकाना, प्रकाश करना, शोक, राग, हलकापन, तीक्ष्णता और आगकी लपटोंका सदा ऊपरकी ओर उठना एवं प्रकाशित होना—ये सब अग्निके गुण हैं ॥ ५ ॥
वायोरनियमस्पर्शो वादस्थानं स्वतन्त्रता ।
बलं शैघ्र्यं च मोक्षं च कर्म चेष्टाऽऽत्मता भवः ॥ ६ ॥ अनियत स्पर्श, वाक्-इन्द्रियकी स्थिति, चलने-फिरने आदिकी स्वतन्त्रता, बल, शीघ्रगामिता, मल-मूत्र आदिको शरीरसे बाहर निकालना, उत्क्षेपण आदि कर्म, क्रिया-शक्ति, प्राण और जन्म-मृत्यु—ये सब वायुके गुण हैं ॥ ६ ॥ आकाशस्य गुणः शब्दो व्यापित्वं छिद्रतापि च । अनाश्रयमनलम्बमव्यक्तमविकारिता ॥ ७ ॥ अप्रतीघातिता चैव भूतत्वं विकृतानि च । गुणाः पञ्चाशतं प्रोक्ताः पञ्चभूतात्मभाविताः ॥ ८ ॥ शब्द, व्यापकता, छिद्र होना, किसी स्थूल पदार्थका आश्रय न होना, स्वयं किसी दूसरे आधारपर न रहना, अव्यक्तता, निर्विकारता, प्रतिघातशून्यता और भूतता अर्थात् श्रवणेन्द्रियका कारण होना और विकृतिसे युक्त होना—से सब आकाशके गुण हैं। इस प्रकार पञ्चमहाभूतोंके ये पचास गुण बताये गये हैं ॥ ७-८ ॥ धैर्योपपत्तिर्व्यक्तिश्च विसर्गः कल्पना क्षमा । सदसच्चाशुता चैव मनसो नव वै गुणाः ॥ ९ ॥ धैर्य, तर्क-वितर्कमें कुशलता, स्मरण, भ्रान्ति, कल्पना, क्षमा, शुभ एवं अशुभ संकल्प और चंचलता—ये मनके नौ गुण हैं ॥ ९ ॥ इष्टानिष्टविपत्तिश्च व्यवसायः समाधिता । संशयः प्रतिपत्तिश्च बुद्धेः पञ्चगुणान् विदुः ॥ १० ॥ इष्ट और अनिष्ट वृत्तियोंका नाश, विचार, समाधान, संदेह और निश्चय—ये पाँच बुद्धिके गुण माने गये हैं ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं पञ्चगुणा बुद्धिः कथं पञ्चेन्द्रिया गुणाः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूक्ष्मज्ञानं पितामह ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! बुद्धिके पाँच ही गुण कैसे हैं? तथा पाँच इन्द्रियाँ भी भूतोंके गुण कैसे हो सकती हैं? यह सारा सूक्ष्म ज्ञान आप मुझे बताइये ॥ ११ ॥
भीष्म उवाच
आहुः षष्टिं बुद्धिगुणान् वै भूतविशिष्टा नित्यविषक्ताः । भूतविभूतीश्चाक्षरसृष्टाः पुत्र न नित्यं तदिह वदन्ति ॥ १२ ॥ भीष्मजीने कहा—वत्स युधिष्ठिर! महर्षियोंका कहना है कि बुद्धिके साठ गुण हैं; अर्थात् पाँचों भूतोंके पूर्वोक्त पचास गुण तथा बुद्धिके पाँच गुण मिलकर पचपन हुए। इनमें
पञ्चभूतोंको भी बुद्धिके गुणरूपसे गिन लेनेपर वे साठ हो जाते हैं। ये सभी गुण नित्य चैतन्यसे मिले हुए हैं। पञ्चमहाभूत और उनकी विभूतियाँ अविनाशी परमात्माकी सृष्टि हैं; परंतु परिवर्तनशील होनेके कारण उसे तत्त्वज्ञ पुरुष नित्य नहीं बताते हैं॥ १२॥
तत् पुत्र चिन्ताकलिलं तदुक्त-
मनागतं वै तव सम्प्रतीह।
भूतार्थतत्त्वं तदवाप्य सर्वं
भूतप्रभावाद् भव शान्तबुद्धिः॥ १३॥
वत्स युधिष्ठिर! अन्य वक्ताओंने जगत्की उत्पत्तिके विषयमें पहले जो कुछ कहा है, वह सब वेदविरुद्ध और विचार-दूषित है; अतः इस समय तुम नित्यसिद्ध परमात्माका यथार्थ तत्त्व सुनकर उन्हीं परमेश्वरके प्रभाव एवं प्रसादसे शान्तबुद्धि हो जाओ॥ १३॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५५॥
युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन
षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
य इमे पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले ।
पृतनामध्य एते हि गतसंज्ञा महाबलाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! ये जो असंख्य भूपाल (प्राणशून्य होकर) इस भूतलपर सेनाके बीचमें सो रहे हैं इनकी ओर दृष्टिपात कीजिये। ये महान् बलवान् थे तो भी संज्ञाहीन होकर पड़े हैं ॥ १ ॥
एकैकशो भीमबला नागायुतबलास्तथा ।
एते हि निहताः संख्ये तुल्यतेजोबलैर्नरैः ॥ २ ॥
इनमेंसे एक-एक नरेश भयानक बलसे सम्पन्न था। दस-दस हजार हाथियोंकी शक्ति रखता था। वे सब-के-सब इस युद्धस्थलमें अपने समान ही तेजस्वी और बलवान् मनुष्योंद्वारा मारे गये हैं ॥ २ ॥
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे परम् ।
विक्रमेणोपसम्पन्नास्तेजोबलसमन्विताः ॥ ३ ॥
इन प्राणशक्ति-सम्पन्न नरेशोंको कोई दूसरा वीर संग्रामभूमिमें मार सके—ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि वे सब-के-सब बल-पराक्रमसे सम्पन्न और तेजस्वी थे ॥ ३ ॥
अथ चेमे महाप्राज्ञाः शेरते हि गतासवः ।
मृता इति च शब्दोऽयं वर्तत्येषु गतासुषु ॥ ४ ॥
किंतु इस समय ये महाबुद्धिमान् भूपाल निष्प्राण होकर पड़े हैं। इनके प्राण निकल जानेपर इनके लिये मृत शब्दका व्यवहार होता है; अर्थात् ‘ये मर गये’ ऐसा कहा जाता है ॥ ४ ॥
इमे मृता नृपतयः प्रायशो भीमविक्रमाः ।
तत्र मे संशयो जातः कुतः संज्ञा मृता इति ॥ ५ ॥
कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः ।
हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥
ये जो नरेश मृत्युको प्राप्त हो गये हैं, इनमें बहुत-से भयानक पराक्रमसे सम्पन्न हैं। यहाँ मेरे मनमें यह संदेह होता है कि इन्हें मृत नाम कैसे दिया गया? किसकी मृत्यु होती है? किससे मृत्यु होती है? और किस कारणसे मृत्यु यहाँ समस्त प्राणियोंका अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! मुझे यह सब बतानेकी कृपा करें॥ ५-६॥
भीष्म उवाच
पुरा कृतयुगे तात राजा ह्यासीदकम्पनः।
स शत्रुवशमापन्नः संग्रामे क्षीणवाहनः॥ ७॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! प्राचीन सत्ययुगकी बात है, अकम्पन नामके एक राजा थे। एक समय संग्राममें उनका रथ नष्ट हो गया और वे शत्रुके वशमें पड़ गये॥ ७॥
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले।
स शत्रुभिर्हतः संख्ये सबलः सपदानुगः॥ ८॥
उनके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि। वह बलमें भगवान् नारायणके ही समान जान पड़ता था, परंतु उस समराङ्गणमें शत्रुओंने सेना और सेवकोंसहित उस राजकुमारको मार गिराया॥ ८॥
स राजा शत्रुवशगः पुत्रशोकसमन्वितः।
यदृच्छया शान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम्॥ ९॥
राजा अकम्पन स्वतन्त्र भूपाल न रहकर शत्रुके अधीन हो गये तथा पुत्रके शोकमें डूबे रहने लगे। वे शान्तिका उपाय ढूँढ़ रहे थे। इतनेहीमें दैवेच्छासे भूतलपर विचरते हुए देवर्षि नारदका उन्हें दर्शन हुआ॥ ९॥
तस्मै स सर्वमाचष्ट यथावृत्तं जनेश्वरः।
शत्रुभिर्ग्रहणं संख्ये पुत्रस्य मरणं तथा॥ १०॥
राजाने युद्धस्थलमें शत्रुओंद्वारा अपने पकड़े जाने एवं पुत्रकी मृत्यु होनेका सारा समाचार यथावत् रूपसे नारदजीके सामने कह सुनाया॥ १०॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नारदोऽथ तपोधनः।
आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा॥ ११॥
राजाका वह कथन सुनकर तपस्याके धनी नारदजीने उस समय उनसे यह प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया, जो उनके पुत्रशोकको मिटानेवाला था॥ ११॥
नारद उवाच
राजन् शृणु समाख्यानमद्येदं बहुविस्तरम्।
यथावृत्तं श्रुतं चैव मयेदं वसुधाधिप॥ १२॥
**नारदजी बोले—**राजन्! आज यह अत्यन्त विस्तृत आख्यान सुनो। पृथ्वीनाथ! मैंने इसे जैसा सुना है, वह यथावत् वृत्तान्त तुम्हें सुना रहा हूँ॥ १२॥
प्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः । अतीव वृद्धा बहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः ॥ १३ ॥ प्रजाकी सृष्टि करते समय महातेजस्वी पितामह ब्रह्माने जब बहुत-से प्राणियोंकी सृष्टि कर डाली, तब उनकी संख्या बहुत अधिक हो गयी। इतनी अधिक प्रजाओंका होना ब्रह्माजीसे सहन न हो सका ॥ १३ ॥
न ह्यन्तरमभूत् किञ्चित् क्वचिज्जन्तुभिरच्युत । निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप ॥ १४ ॥ अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! उस समय कहीं कोई थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जो जीव-जन्तुओंसे भरा न हो। सारी त्रिलोकी अवरुद्ध हो गयी। लोगोंका कहीं साँस लेना भी असम्भव-सा हो गया—सबका दम घुटने लगा ॥ १४ ॥
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते । चिन्तयन् नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम् ॥ १५ ॥ भूपाल! अब ब्रह्माजीके मनमें प्रजाके संहारकी—उनकी संख्या घटानेकी चिन्ता उत्पन्न हुई। वे बहुत देरतक सोचते-विचारते रहे, परंतु प्रजाके संहारका कोई युक्तियुक्त कारण ध्यानमें नहीं आया ॥ १५ ॥
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो राजन् ददाह स पितामहः ॥ १६ ॥ महाराज! उस समय रोषवश ब्रह्माजीके नेत्र आदि इन्द्रियगोलकोंसे अग्नि प्रकट हो गयी। राजन्! उस अग्निसे पितामहने सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करना आरम्भ किया ॥ १६ ॥
ततो दिवं भुवं खं च जगच्च सचराचरम् । ददाह पावको राजन् भगवत्कोपसम्भवः ॥ १७ ॥ राजन्! तब भगवान् ब्रह्माके क्रोधसे प्रकट हुई वह आग स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्को जलाने लगी ॥ १७ ॥
तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च । महता क्रोधवेगेन कुपिते प्रपितामहे ॥ १८ ॥ प्रपितामह ब्रह्माके कुपित होनेपर उनके क्रोधके महान् वेगसे सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी दग्ध होने लगे ॥ १८ ॥
ततोऽध्वरजटः स्थाणुर्वेदाध्वरपतिः शिवः । जगाम शरणं देवो ब्रह्माणं परवीरहा ॥ १९ ॥ तब यज्ञ ही जिनकी जटाएँ हैं तथा जो वेदों और यज्ञोंके प्रतिपालक हैं, वे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कल्याणकारी भगवान् शिव ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ १९ ॥
तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया ।
अब्रवीत् परमो देवो ज्वलन्निव तदा शिवम् ॥ २० ॥
प्रजावर्गके हितकी इच्छासे महादेवजीके अपने सामने आनेपर तेजसे जलते हुए-से परमदेव ब्रह्माजी उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
करवाण्यद्य कं कामं वरार्होऽसि मतो मम ।
कर्ता ह्यस्मि प्रियं शम्भो तव यद् हृदि वर्तते ॥ २१ ॥
‘शम्भो! मैं तुम्हें वर पानेके योग्य समझता हूँ, बोलो, आज तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ? तुम्हारे हृदयमें जो भी प्रिय मनोरथ हो, उसे मैं पूर्ण करूँगा’ ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादोपक्रमे
षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिके संवादका उपक्रमविषयक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥
२५७-
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति
स्थाणुरुवाच
प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो ।
विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥ १ ॥
**महादेवजीने कहा—**प्रभो! पितामह! मेरा मनोरथ या प्रयोजन आपसे प्रजासर्गकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना है। आप इस बातको जान लें। आपहीने इन प्रजाओंकी सृष्टि की है; अतः आप इनपर क्रोध न कीजिये ॥ १ ॥
तव तेजोऽग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥ २ ॥
देव! जगदीश्वर! आज आपकी क्रोधाग्निसे सारी प्रजाएँ दग्ध हो रही हैं। उन्हें उस अवस्थामें देखकर मुझे दया आती है, आप उनपर क्रोध न करें ॥ २ ॥
प्रजापतिरुवाच
न कुप्ये न च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति ।
लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥ ३ ॥
**प्रजापति ब्रह्माजी बोले—**शिव! मैं प्रजापर कुपित नहीं हूँ और न मेरी यही इच्छा है कि प्रजाओंका विनाश हो जाय। पृथ्वीका भार हल्का करनेके लिये ही प्रजाके संहारकी आवश्यकता प्रतीत हुई है ॥ ३ ॥
इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ॥ ४ ॥
महादेव! यह पृथ्वीदेवी भारी भारसे पीड़ित हो सदा मुझे प्रजाके संहारके लिये प्रेरित करती रही है; क्योंकि यह जगत्के भारसे समुद्रमें डुबी जा रही है ॥
यदाहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् ।
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥ ५ ॥
जब बहुत विचार करनेपर भी मुझे इन बढ़ी हुई प्रजाओंके संहारका कोई उपाय न सूझा, तब मुझे क्रोध आ गया ॥ ५ ॥
स्थाणुरुवाच
संहारार्थं प्रसीदस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर ।
मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशत् ॥ ६ ॥
महादेवजीने कहा— देवेश्वर! संहारके लिये आप क्रोध न करें। प्रजापर प्रसन्न हों। कहीं ऐसा न हो कि समस्त चराचर प्राणियोंका विनाश हो जाय ।। ६ ।।
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ७ ।।
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् सर्वमुपप्लुतम् ।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया ।। ८ ।।
ये सारे जलाशय, सब-के-सब घास और लता-बेलें तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) भस्मीभूत हो रहे हैं। सारे जगत्का प्रलय उपस्थित हो गया है। भगवन्! प्रसन्न होइये। साधो! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ।। ७-८ ।।
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततामेतत् तेन स्वेनैव तेजसा ।। ९ ।।
यदि इन प्रजाओंका नाश हो गया तो ये किसी तरह फिर यहाँ उपस्थित न हो सकेंगी। इसलिये आप अपने ही प्रभावसे इस क्रोधाग्निको निवृत्त कीजिये ।। ९ ।।
उपायमन्यं सम्पश्य भूतानां हितकाम्यया ।
यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन् पितामह ।। १० ।।
पितामह! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये संहारका कोई दूसरा ही उपाय सोचिये, जिससे ये सारे जीव-जन्तु एक साथ ही दग्ध न हो जायें ।। १० ।।
अभावं हि न गच्छेयुरुच्छिन्नप्रजनाः प्रजाः ।
अधिदैवे नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेश्वरेश्वर ।। ११ ।।
लोकेश्वरेश्वर! आपने मुझे देवताओंके आधिपत्य-पदपर नियुक्त किया है, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, यदि प्रजाकी संततिका उच्छेद होगा तो समस्त प्रजाओंका सर्वथा अभाव ही हो जायगा; अतः आप इस विनाशको बंद कीजिये ।। ११ ।।
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ।। १२ ।।
जगन्नाथ! महादेव! यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपको प्रसन्न करके यह याचना करता हूँ कि ये सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो—मरकर पुनः जन्म धारण करे ।। १२ ।।
नारद उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्मनाः ।
तेजस्तत् संनिजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ।। १३ ।।
नारदजी कहते हैं— राजन्! महादेवजीकी वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्माने मन और वाणीका संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही लीन कर
लिया ।। १३ ।।
ततोऽग्निमुपसंगृह्य भगवाँल्लोकपूजितः ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पयामास वै प्रभुः ।। १४ ।।
तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके प्रजाके लिये जन्म और मृत्युकी व्यवस्था की ।। १४ ।।
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तदा ।
प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ।। १५ ।।
उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई ।। १५ ।।
कृष्णरक्ताम्बरधरा कृष्णनेत्रतलान्तरा ।
दिव्यकुण्डलसम्पन्ना दिव्याभरणभूषिता ।। १६ ।।
उसके वस्त्र काले और लाल थे। आँखोंके निम्न और आभ्यन्तर प्रदेश भी काले रंगके ही थे। वह दिव्य कुण्डलोंसे कान्तिमती तथा अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित थी ।। १६ ।।
सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् ।
ददृशाते च तां कन्यां देवौ विश्वेश्वरावुभौ ।। १७ ।।
वह ब्रह्माजीके इन्द्रियछिद्रोंसे निकलकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दी। उस समय उन दोनों जगदीश्वरों (ब्रह्मा और शिव) ने उस कन्याको देखा ।। १७ ।।
तामाहूय तदा देवो लोकानामादिरीश्वरः ।
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ।। १८ ।।
भूपाल! तब लोकोंके आदिकारण भगवान् ब्रह्माने उसे 'मृत्यु' कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा—'तुम इन प्रजाओंका समय-समयपर विनाश करती रहो ।। १८ ।।
त्वं हि संहारबुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च ।
तस्मात् संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ।। १९ ।।
'मैंने प्रजाके संहारकी भावनासे रोषमें भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानोंसहित सम्पूर्ण प्रजाओंका संहार करो ।। १९ ।।
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर कामिनि ।
मम त्वं हि नियोगेन श्रेयः परमवाप्स्यसि ।। २० ।।
कामिनि! तुम मेरे आदेशसे सामान्यतः सारी प्रजाका संहार करो। इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी' ।। २० ।।
एवमुक्ता तु सा देवी मृत्युः कमलमालिनी ।
प्रदध्यौ दुःखिता बाला साश्रुपातमतीव च ।। २१ ।।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर कमलोंकी मालासे अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्तामें पड़ गयी ।। २१ ।।
पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः ।
मानवानां हितार्थाय ययाचे पुनरेव ह ॥ २२ ॥
तब जनेश्वर ब्रह्माजीने मानवोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें मृत्युके आँसू ले लिये। फिर मृत्युने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका संवादविषयक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥
२५८-
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना
नारद उवाच
विनीय दुःखमबला साऽऽत्मनैवायतेक्षणा ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता तदा ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वह विशाल नेत्रोंवाली अबला स्वयं ही उस दुःखको दूर हटाकर झुकायी हुई लताके समान विनम्र हो हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे बोली— ॥ १ ॥
त्वया सृष्टा कथं नारी मादृशी वदतां वर ।
रौद्रकर्माभिजायेत सर्वप्राणिभयङ्करी ॥ २ ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रजापते! (यदि मुझसे क्रूर कर्म ही कराना था तो) आपने मुझ-जैसी कोमलहृदया नारीको क्यों उत्पन्न किया? क्या मुझ-जैसी स्त्री समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर तथा क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली हो सकती है? ॥ २ ॥
बिभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे ।
त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेक्षस्व चक्षुषा ॥ ३ ॥
‘भगवन्! मैं अधर्मसे बहुत डरती हूँ। आप मुझे धर्मानुकूल कार्य करनेकी आज्ञा दें। मुझ भयभीत अबलापर दृष्टिपात करें और कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखें ॥ ३ ॥
बालान् वृद्धान् वयस्थांश्च न हरेयमनागसः ।
प्राणिनः प्राणिनामीश नमस्तेऽस्तु प्रसीद मे ॥ ४ ॥
‘समस्त प्राणियोंके अधीश्वर! मैं निरपराध बाल, वृद्ध और तरुण प्राणियोंके प्राण नहीं लूँगी। आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ४ ॥
प्रियान् पुत्रान् वयस्यांश्च भ्रातॄन् मातृः पितॄनपि ।
अपध्यास्यन्ति यद्येवं मृतास्तेषां बिभेम्यहम् ॥ ५ ॥
‘जब मैं लोगोंके प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं तथा पिताओंको मारने लगूँगी, तब उनके सम्बन्धी उनके इस प्रकार मारे जानेके कारण मेरा अनिष्ट-चिन्तन करेंगे; अतः मैं उन लोगोंसे बहुत डरती हूँ ॥ ५ ॥
कृपणाश्रुपरिक्लेदो दहेन्मां शाश्वतीः समाः ।
तेभ्योऽहं बलवद् भीता शरणं त्वामुपागता ॥ ६ ॥
‘उन दीन-दुखियोंके नेत्रोंसे जो आँसू बहकर उनके कपोलों और वक्षःस्थलको भिगो देगा, वह मुझे सदा अनन्त वर्षोंतक जलाता रहेगा। मैं उनसे बहुत डरी हुई हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आयी हूँ।। ६ ।।
यमस्य भवने देव पात्यन्ते पापकर्मिणः ।
प्रसादये त्वां वरद प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ७ ॥
‘वरदायक प्रभो! देव! सुना है कि पापाचारी प्राणी यमराजके लोकमें गिराये जाते हैं, अतः आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करती हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये ।।
एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ।
इच्छेयं त्वत्प्रसादार्थं तपस्तप्तुं महेश्वर ॥ ८ ॥
‘लोकपितामह! महेश्वर! मैं आपसे अपनी एक अभिलाषाकी पूर्ति चाहती हूँ। मेरी इच्छा है कि मैं आपकी प्रसन्नताके लिये कहीं जाकर तप करूँ' ।। ८ ।।
पितामह उवाच
मृत्यो संकल्पिता मे त्वं प्रजासंहारहेतुना ।
गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा च विचारय ॥ ९ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**मृत्यो! प्रजाके संहारके लिये ही मैंने संकल्पपूर्वक तुम्हारी सृष्टि की है। जाओ, सारी प्रजाका संहार करो। इसके लिये मनमें कोई विचार न करो ।। ९ ।।
एतदेवमवश्यं हि भविता नैतदन्यथा ।
क्रियतामनवद्याङ्गि यथोक्तं मद्वचोऽनघे ॥ १० ॥
यह बात अवश्य ही इसी प्रकार होनेवाली है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैंने जो बात कही है, उसका पालन करो। इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा ।। १० ।।
एवमुक्ता महाबाहो मृत्युः परपुरंजय ।
न व्याजहार तस्थौ च प्रह्रा भगवदुन्मुखी ॥ ११ ॥
महाबाहो! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु उन्हींकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े खड़ी रह गयी—कुछ बोल न सकी ।। ११ ।।
पुनः पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी ।
तूष्णीमासीत् ततो देवो देवानामीश्वरेश्वरः ॥ १२ ॥
प्रससाद किल ब्रह्मा स्वयमेवात्मनाऽऽत्मनि ।
स्मयमानश्च लोकेशो लोकान् सर्वानवैक्षत ॥ १३ ॥
उनके बारंबार कहनेपर वह मानिनी नारी निष्प्राण-सी होकर मौन रह गयी। ‘हाँ' या ‘ना' कुछ भी न बोल सकी। तदनन्तर देवताओंके भी देवता और ईश्वरोंके भी ईश्वर
लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं ही अपने मनमें बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराते हुए समस्त लोकोंकी ओर देखने लगे॥ निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते। सा कन्याथ जगामास्य समीपादिति नः श्रुतम् ॥ १४ ॥ उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उनके निकटसे चली गयी, ऐसा हमने सुना है॥ १४॥ अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा। त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची॥ १५॥ सा तत्र परमं देवी तपोऽचरद् दुष्करम्। समा ह्येकपदे तस्थौ दश पद्मानि पञ्च च ॥ १६ ॥ वहाँ मृत्युदेवीने अत्यन्त दुष्कर और उत्तम तपस्या की। वह पंद्रह पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही॥ तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुष्करम्। पुनरेव महातेजा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥ इस प्रकार वहाँ अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई मृत्युसे महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुनः जाकर इस प्रकार कहा—॥ कुरुष्व मे वचो मृत्यो तदनादृत्य सत्वरा। तथैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ॥ १८ ॥ तस्थौ पद्मानि षट् चैव पञ्च द्वे चैव मानद। ‘मृत्यो! तुम मेरी आज्ञाका पालन करो।’ दूसरोंको मान देनेवाले तात! उनके इस कथनका आदर न करके मृत्युने तुरंत ही दूसरे बीस पद्म वर्षोंतक पुनः एक पैरपर खड़ी हो तपस्या आरम्भ कर दी ॥ १८ १/२ ॥ भूयः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा ॥ १९ ॥ द्वे चायुते नरश्रेष्ठ वाय्वाहारा महामते। तात! महामते! नरश्रेष्ठ! फिर वह दस हजार पद्म वर्षोंतक मृगोंके साथ विचरती रही। इसके बाद बीस हजार वर्षोंतक उसने केवल वायुका आहार किया॥ १९ १/२ ॥ पुनरेव ततो राजन् मौनमातिष्ठदुत्तमम् ॥ २० ॥ अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च पार्थिव। राजन्! तदनन्तर उसने उत्तम मौन-व्रत धारण कर लिया। पृथ्वीपते! फिर उसने जलमें आठ हजार वर्षोंतक रहकर तपस्या की॥ २० १/२ ॥ ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं नृपसत्तम ॥ २१ ॥
तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः । नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर वह कन्या कौशिकी नदीके तटपर गयी। वहाँ वायु और जलका आहार करके उसने पुनः कठोर नियमोंका पालन किया ॥ २१ १/२ ॥ ततो ययौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम् ॥ २२ ॥ तस्थौ दार्विव निश्चेष्टा प्रजानां हितकाम्यया । तत्पश्चात् वह महाभागा ब्रह्मकन्या गङ्गाजीके किनारे और केवल मेरुपर्वतपर गयी। वहाँ प्रजावर्गके हितकी इच्छासे वह काठकी भाँति निश्चेष्ट खड़ी रही ॥ २२ १/२ ॥ ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः समीजिरे ॥ २३ ॥ तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमपरं ततः । तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास यत्नतः ॥ २४ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर हिमालय पर्वतके शिखरपर जहाँ पहले देवताओंने यज्ञ किया था, उस स्थानपर वह परम शुभलक्षणा कन्या एक निखर्व वर्षोंतक अँगूठेके बलपर खड़ी रही। इस प्रकार यत्न करके उसने पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट कर लिया ॥ २३-२४ ॥ ततस्तामब्रवीत् तत्र लोकानां प्रभवाप्ययः । किमिदं वर्तते पुत्रि क्रियतां मम तद् वचः ॥ २५ ॥ तब सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्माजी वहाँ उस कन्यासे बोले—'बेटी! तुम यह क्या करती हो? मेरी आज्ञाका पालन करो' ॥ २५ ॥ ततोऽब्रवीत् पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् । न हरेयं प्रजा देव पुनश्चाहं प्रसादये ॥ २६ ॥ तब मृत्युने पुनः भगवान् पितामहसे कहा—'देव! मैं प्रजाका नाश नहीं कर सकती। इसके लिये पुनः आपका कृपाप्रसाद चाहती हूँ' ॥ २६ ॥ तामधर्मभयाद् भीतां पुनरेव प्रयाचतीम् । तदाब्रवीद् देवदेवो निगृह्येदं वचस्ततः ॥ २७ ॥ अधर्मके भयसे डरकर पुनः कृपाकी भीख माँगती हुई मृत्युको रोककर देवाधिदेव ब्रह्माने उससे यह बात कही— ॥ २७ ॥ अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संयच्छेमाः प्रजाः शुभे । मया ह्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किंचन ॥ २८ ॥ 'मृत्यो! तुम इन प्रजाओंका संहार करो। शुभे! इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा। भद्रे! मेरी कही हुई कोई भी बात यहाँ झूठी नहीं हो सकती ॥ २८ ॥ धर्मः सनातनश्च त्वामिहैवानुप्रवेक्ष्यति । अहं च विबुधाश्चैव त्वद्धिते निरताः सदा ॥ २९ ॥ 'सनातन धर्म यहीं तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगा। मैं तथा ये सम्पूर्ण देवता सदा तुम्हारे हितमें लगे रहेंगे ॥ २९ ॥
इममन्यं च ते कामं ददानि मनसेप्सितम् । न त्वां दोषेण यास्यन्ति व्याधिसम्पीडिताः प्रजाः ॥ ३० ॥ पुरुषेषु स्वरूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि । स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीयेषु नपुंसकम् ॥ ३१ ॥ 'मैं तुम्हें यह दूसरा भी मनोवाञ्छित वर दे रहा हूँ कि रोगोंसे पीड़ित हुई प्रजा तुम्हारे प्रति दोष-दृष्टि नहीं करेगी। तुम पुरुषोंमें पुरुषरूपसे रहोगी, स्त्रियोंमें स्त्रीरूप धारण कर लोगी और नपुंसकोंमें नपुंसक हो जाओगी' ॥ ३०-३१ ॥ सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरुवाच ह । पुनरेव महात्मानं नेति देवेशमव्ययम् ॥ ३२ ॥ महाराज! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु हाथ जोड़कर उन अविनाशी महात्मा देवेश्वर ब्रह्मासे पुनः इस प्रकार बोली—'प्रभो! मैं प्राणियोंका संहार नहीं करूँगी' ॥ ३२ ॥ तामब्रवीत् तदा देवी मृत्यो संहर मानवान् । अधर्मस्ते न भविता तथा ध्यास्याम्यहं शुभे ॥ ३३ ॥ तब ब्रह्माजीने उससे कहा—'मृत्यो! तुम मनुष्योंका संहार करो, तुम्हें पाप नहीं लगेगा। शुभे! मैं तुम्हारे लिये शुभ चिन्तन करता रहूँगा ॥ ३३ ॥ यानश्रुबिन्दून् पतितानपश्यं ये पाणिभ्यां धारितास्ते पुरस्तात् । ते व्याधयो मानवान् घोररूपाः प्राप्ते काले कालयिष्यन्ति मृत्यो ॥ ३४ ॥ 'मृत्यो! मैंने पहले तुम्हारे जिन अश्रुबिन्दुओंको गिरते देखा और जिन्हें अपने हाथोंमें धारण कर लिया था, वे ही समय आनेपर भयंकर रोग बनकर मनुष्योंको कालके गालमें डाल देंगे ॥ ३४ ॥ सर्वेषां त्वं प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ सहितौ योजयेथाः । एवं धर्मस्त्वामुपैष्यत्यमेयो न चाधर्मं लप्स्यसे तुल्यवृत्तिः ॥ ३५ ॥ 'सभी प्राणियोंके अन्तकालमें तुम काम और क्रोधको एक साथ नियुक्त कर देना। इस प्रकार तुम्हें अप्रमेय धर्मकी प्राप्ति होगी और तुम्हें पाप नहीं लगेगा; क्योंकि तुम्हारी चित्तवृत्ति सम (राग-द्वेषसे शून्य) है ॥ ३५ ॥ एवं धर्मं पालयिष्यस्यथो त्वं न चात्मानं मज्जयिष्यस्यधर्मे । तस्मात् कामं रोचयाभ्यागतं त्वं संयोज्याथो संहरस्वेह जन्तून् ॥ ३६ ॥
'इस प्रकार तुम धर्मका पालन करोगी और अपने-आपको पापमें नहीं डुबाओगी; अतः अपनेको प्राप्त होनेवाले इस अधिकारको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करो और कामको इस कार्यमें लगाकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करो' ॥ ३६ ॥ सा वै तदा मृत्युसंज्ञापदेशा भीता शापाद् बाढमित्यब्रवीत् तम् । अथो प्राणान् प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ प्राप्य निर्मोह्य हन्ति ॥ ३७ ॥ तब वह मृत्यु नामवाली नारी शापसे डरकर ब्रह्माजीसे बोली—'बहुत अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है।' वही मृत्यु प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर काम और क्रोधको प्रेरित करके उनके द्वारा उन्हें मोहमें डालकर मार डालती है ॥ ३७ ॥ मृत्योर्ये ते व्याधयश्चाश्रुपाता मनुष्याणां रुज्यते यैः शरीरम् । सर्वेषां वै प्राणिनां प्राणनान्ते तस्माच्छोकं मा कृथा बुद्धय बुद्धया ॥ ३८ ॥ पहले मृत्युके जो अश्रुबिन्दु गिरे थे, वे ही ज्वर आदि रोग हो गये; जिनके द्वारा मनुष्योंका शरीर रुग्ण हो जाता है। वह मृत्यु सभी प्राणियोंकी आयु समाप्त होनेपर उनके पास आती है। अतः राजन्! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। इस विषयको बुद्धिके द्वारा समझो ॥ ३८ ॥ सर्वे देवाः प्राणिनां प्राणनान्ते गत्वा वृत्ताः संनिवृत्तास्तथैव । एवं सर्वे मानवाः प्राणनान्ते गत्वा वृत्ता देववद् राजसिंह ॥ ३९ ॥ राजसिंह! जैसे इन्द्रियाँ जाग्रत्-अवस्थाके अन्तमें सुषुप्तिके समय निष्क्रिय होकर विलीन हो जाती हैं और जाग्रत्-अवस्था आनेपर पुनः लौट आती हैं, उसी प्रकार सारे प्राणी ही जीवनके अन्तमें परलोकमें जाकर कर्मोंके अनुसार देवताओंके तुल्य अथवा नरकगामी होते हैं और कर्मोंके क्षीण होनेपर इस जगत्में लौटकर पुनः मनुष्य आदि योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥ ३९ ॥ वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः स सर्वेषां प्राणिनां प्राणभूतः । नानावृत्तिर्देहिनां देहभेदे तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥ ४० ॥ भयंकर शब्द करनेवाला महान् बलशाली भयानक प्राणवायु ही समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है। वही देहधारियोंके देहका नाश होनेपर नाना प्रकारके रूपों या शरीरोंको
प्राप्त होता है। अतः इस शरीरके भीतर देवाधिदेव वायु (प्राण) ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ४० ॥
सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टाः
सर्वे मर्त्या देवसंज्ञाविशिष्टाः ।
तस्मात् पुत्रं मा शुचो राजसिंह
पुत्रः स्वर्गं प्राप्य ते मोदते ह ॥ ४१ ॥
सभी देवता पुण्य क्षय होनेपर इस लोकमें आकर मरणधर्मा नामसे विभूषित होते हैं और सभी मरणधर्मा मनुष्य पुण्यके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् देवसंज्ञासे संयुक्त होते हैं। अतः राजसिंह! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें जाकर आनन्द भोग रहा है ॥
एवं मृत्युर्देवसृष्टा प्रजानां
प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् ।
तस्याश्चैव व्याधयस्तेऽश्रुपाताः
प्राप्ते काले संहरन्तीह जन्तून् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार ब्रह्माजीने ही प्राणियोंकी मृत्यु रची है। वह मृत्यु ठीक समय आनेपर यथावत् रूपसे जीवोंका संहार करती है। उसके जो अश्रुपात हैं, वे ही मृत्युकाल प्राप्त होनेपर रोग बनकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करते हैं ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका
संवादविषयक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५८ ॥
धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय
एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय
युधिष्ठिर उवाच
इमे वै मानवाः सर्वे धर्मं प्रति विशङ्किताः ।
कोऽयं धर्मः कुतो धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! ये सभी मनुष्य प्रायः धर्मके विषयमें संशयशील हैं; अतः मैं जानना चाहता हूँ कि धर्म क्या है? और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
धर्मस्त्वयमिहार्थः किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत् ।
उभयार्थो हि वा धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! इस लोकमें सुख पानेके लिये जो कर्म किया जाता है, वही धर्म है या परलोकमें कल्याणके लिये जो कुछ किया जाता है, उसे धर्म कहते हैं? अथवा लोक-परलोक दोनोंके सुधारके लिये कुछ किया जानेवाला कर्म ही धर्म कहलाता है? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
सदाचारः स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम् ।
चतुर्थमर्थमित्याहुः कवयो धर्मलक्षणम् ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! वेद, स्मृति और सदाचार—ये तीन धर्मके स्वरूपको लक्षित करानेवाले हैं। कुछ विद्वान् अर्थको भी धर्मका चौथा लक्षण बताते हैं ॥ ३ ॥
अपि ह्युक्तानि धर्म्याणि व्यवस्यन्त्युत्तरापरे ।
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः ॥ ४ ॥
शास्त्रोंमें जो धर्मानुकूल कार्य बताये गये हैं, उन्हें ही प्रधान एवं अप्रधान सभी लोग निश्चित रूपसे धर्म मानते हैं। लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही महर्षियोंने यहाँ धर्मकी मर्यादा स्थापित की है ॥ ४ ॥
उभयत्र सुखोदर्क इह चैव परत्र च ।
अलब्ध्वा निपुणं धर्मं पापः पापेन युज्यते ॥ ५ ॥
धर्मका पालन करनेसे आगे चलकर इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है। पापी मनुष्य विचारपूर्वक धर्मका आश्रय न लेनेसे पापमें प्रवृत्त हो उसके दुःखरूप फलका भागी होता है ॥ ५ ॥
न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि ।