महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
संयोगोंका, युगोंका, पर्वतोंका और सरिताओंका जो क्षय होता है, उसपर दृष्टि डाले। वर्णोंका क्षय और क्षयका अन्त भी बारंबार देखे। जन्म, मृत्यु और जरावस्थाके दुःखोंपर दृष्टिपात करे ॥ ४९-५० ॥
देहदोषांस्तथा ज्ञात्वा तेषां दुःखं च तत्त्वतः ।
देहविकलवतां चैव सम्यग् विज्ञाय तत्त्वतः ॥ ५१ ॥
देहके दोषोंको जानकर उनसे मिलनेवाले दुःखका भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे। शरीरकी व्याकुलताको भी ठीक-ठीक जाननेका प्रयत्न करे ॥ ५१ ॥
आत्मदोषांश्च विज्ञाय सर्वान्नात्मनि संश्रितान् ।
स्वदेहादुत्थितान् गन्धांस्तथा विज्ञाय चाशुभान् ॥ ५२ ॥
अपने शरीरमें स्थित जो अपने ही दोष हैं, उन सबको जानकर शरीरसे जो निरन्तर दुर्गन्ध उठती रहती है, उसकी ओर भी ध्यान दे (तथा विरक्त होकर परमात्माका चिन्तन करते हुए भवबन्धनसे मुक्त होनेका प्रयत्न करे) ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कान् स्वगात्रोद्द्भवान् दोषान् पश्यस्यमितविक्रम ।
एतन्मे संशयं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ५३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी पितामह! आपके देखनेमें कौन-कौन-से दोष ऐसे हैं, जो अपने ही शरीरसे उत्पन्न होते हैं? आप मेरे इस सम्पूर्ण संदेहका यथार्थरूपसे समाधान करनेकी कृपा करें ॥ ५३ ॥
भीष्म उवाच
पञ्च दोषान् प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः ।
मार्गज्ञाः कापिलाः सांख्याः शृणु तानरिसूदन ॥ ५४ ॥
भीष्मजीने कहा— प्रभो! शत्रुसूदन! कपिल सांख्यमतके अनुसार चलनेवाले उत्तम मार्गोंके ज्ञाता मनीषी पुरुष इस देहके भीतर पाँच दोष बतलाते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ५४ ॥
कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते ।
एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम् ॥ ५५ ॥
काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्वास—ये पाँच दोष समस्त देहधारियोंके शरीरोंमें देखे जाते हैं ॥ ५५ ॥
छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात् ।
सत्त्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद् भयं तथा ॥ ५६ ॥
छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासमल्पाहारतया नृप ॥ ५७ ॥
सत्पुरुष क्षमासे क्रोधका, संकल्पके त्यागसे कामका, सत्त्वगुणके सेवनसे निद्राका, प्रमादके त्यागसे भयका तथा अल्पाहारके सेवनद्वारा पाँचवें श्वास-दोषका नाश करते हैं ।। ५६-५७ ।।
गुणान् गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान् दोषशतैरपि ।
हेतून् हेतुशतैश्चित्रैश्छित्रान् विज्ञाय तत्त्वतः ।। ५८ ।।
अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्मायाशतैर्वृतम् ।
चित्रभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ।। ५९ ।।
तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षबुद्बुदसंनिभम् ।
नाशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमिहावशम् ।। ६० ।।
रजस्तमसि सम्मग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् ।
सांख्या राजन् महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा स्नेहं प्रजाकृतम् ।। ६१ ।।
ज्ञानयोगेन सांख्येन व्यापिना महता नृप ।
राजसानशुभान् गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् ।। ६२ ।।
पुण्यांश्च सात्त्विकान् गन्धान् स्पर्शजान् देहसंश्रितान् ।
छित्त्वाऽऽशु ज्ञानशस्त्रेण तपोदण्डेन भारत ।। ६३ ।।
राजन्! भरतनन्दन! महाबुद्धिमान् सांख्यके विद्वान् सैकड़ों गुणोंके द्वारा गुणोंको, सैकड़ों दोषोंके द्वारा दोषोंको तथा सैकड़ों विचित्र हेतुओंसे विचित्र हेतुओंको तत्त्वतः जानकर व्यापक ज्ञानके प्रभावसे संसारको पानीके फेनके समान नश्वर, विष्णुकी सैकड़ों मायाओंसे ढँका हुआ, दीवारपर बने हुए चित्रके समान, नरकुलके समान सारहीन, अन्धकारसे भरे हुए गड्ढेकी भाँति भयंकर, वर्षाकालके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभंगुर, सुखहीन, पराधीन, नष्टप्राय तथा कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह रजोगुण और तमोगुणमें मग्न समझते हैं। इसलिये वे संतान आदिकी आसक्तिको दूर करके तपरूप दण्डसे युक्त विवेकरूपी शस्त्रसे राजस-तामस अशुभ गन्धोंको और सुन्दर शोभनीय सात्त्विक गन्धोंको तथा स्पर्शेन्द्रियके देहाश्रित भोगोंकी आसक्तिको शीघ्र ही काट डालते हैं ।। ५८—६३ ।।
ततो दुःखोदकं घोरं चिन्ताशोकमहाह्रदम् ।
व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभयमहोरगम् ।। ६४ ।।
तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञया संतरन्त्युत ।
स्नेहपङ्कं जरादुर्गं ज्ञानद्वीपमरिंदम ।। ६५ ।।
कर्मगाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमरिंदम ।
हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारससमाकरम् ।। ६६ ।।
नानाप्रीतिमहारत्नं दुःखज्वरसमीरणम् ।
शोकत्तृष्णामहावर्तं तीक्ष्णव्याधिमहागजम् ।। ६७ ।।
अस्थिसंघातसंघट्टं श्लेष्मफेनमरिंदम ।
दानमुक्ताकरं घोरं शोणितह्रदविद्रुमम् ॥ ६८ ॥
हसितोत्क्रुष्टनिर्घोषं नानाज्ञानसुदुस्तरम् ।
रोदनाश्रुमलक्षारं संगत्यागपरायणम् ॥ ६९ ॥
पुत्रदारजलौकौघं मित्रबान्धवपत्तनम् ।
अहिंसासत्यमर्यादं प्राणत्यागमहोर्मिणम् ॥ ७० ॥
वेदान्तगमनद्वीपं सर्वभूतदयोदधिम् ।
मोक्षदुर्लभविषयं वडवामुखसागरम् ॥ ७१ ॥
तरन्ति यतयः सिद्धा ज्ञानयानेन भारत ।
तीर्त्वातिदुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभः ॥ ७२ ॥
शत्रुसूदन! तदनन्तर वे सिद्ध यति प्रज्ञारूपी नौकाके द्वारा उस संसाररूपी घोर सागरको तर जाते हैं, जिसमें दुःखरूपी जल भरा है। चिन्ता और शोकके बड़े-बड़े कुण्ड हैं। नाना प्रकारके रोग और मृत्यु विशाल ग्राहोंके समान हैं। महान् भय ही महानागोंके समान हैं। तमोगुण कछुए और रजोगुण मछलियाँ हैं। स्नेह ही कीचड़ है। बुढ़ापा ही उससे पार होनेमें कठिनाई है। ज्ञान ही उसका द्वीप है। नाना प्रकारके कर्मोंद्वारा वह अगाध बना हुआ है। सत्य ही उसका तीर है। नियम-व्रत आदि स्थिरता है। हिंसा ही उसका शीघ्रगामी महान् वेग है। वह नाना प्रकारके रसोंका भण्डार है। अनेक प्रकारकी प्रीतियाँ ही उस भवसागरके महारत्न हैं। दुःख और संताप ही वहाँकी वायु है। शोक और तृष्णाकी बड़ी-बड़ी भँवरें उठती रहती हैं। तीव्र व्याधियाँ उसके भीतर रहनेवाले महान् जलहस्ती हैं। हड्डियाँ ही उसके घाट हैं। कफ फेन हैं। दान मोतियोंकी राशि हैं। रक्त उसके कुण्डमें रहनेवाले मूँगा हैं। हँसना और चिल्लाना ही उस सागरकी गम्भीर गर्जना है। अनेक प्रकारके अज्ञान ही इसे अत्यन्त दुस्तर बनाये हुए हैं। रोदनजनित आँसू ही उसमें मलिन खारे जलके समान हैं। आसक्तियोंका त्याग ही उसमें परम आश्रय या दूसरा तट है। स्त्री-पुत्र जोंकके समान हैं। मित्र और बन्धु-बान्धव तटवर्ती नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमा हैं। प्राणोंका परित्याग ही उसकी उत्ताल तरंगें हैं। वेदान्तज्ञान द्वीप है। समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव इसकी जलराशि हैं। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकारके संताप उस संसारसागरके बड़वानल हैं। भरतनन्दन! उससे पार होकर वे आकाशस्वरूप निर्मल परब्रह्ममें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ६८—७२ ॥
तत्र तान् सुकृतीन् सांख्यान् सूर्यो बहति रश्मिभिः ।
पद्मतन्तुवदाविश्य प्रवहन् विषयान् नृप ॥ ७३ ॥
राजन्! उन पुण्यात्मा सांख्ययोगी सिद्ध पुरुषोंको अपनी रश्मियोंद्वारा उनमें प्रविष्ट हुआ सूर्य अर्चिमार्गसे उस ब्रह्मलोकमें ले जानेके लिये ऊपरके लोकोंमें उसी प्रकार वहन करता है, जैसे कमलकी नाल सरोवरके जलको खींच लेती है ॥ ७३ ॥
तत्र तान् प्रवहो वायुः प्रतिगृह्णाति भारत । वीतरागान् यतीन् सिद्धान् वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ॥ ७४ ॥ वहाँ प्रवहनामक वायु-अभिमानी देवता उन वीतराग शक्तिसम्पन्न सिद्ध तपोधन महापुरुषोंको सूर्य-अभिमानी देवतासे अपने अधिकारमें ले लेता है ॥ ७४ ॥
सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत । सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान् गच्छति यः शुभान् । स तान् वहति कौन्तेय नभसः परमां गतिम् ॥ ७५ ॥ भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, सुखस्पर्श एवं सातों वायुओंमें श्रेष्ठ जो वायुदेव शुभ लोकोंमें जाते हैं, वे फिर उन कल्याणमय सांख्ययोगियोंको आकाशकी ऊँची स्थितिमें पहुँचा देते हैं ॥ ७५ ॥
नभो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् । रजो वहति राजेन्द्र सत्त्वस्य परमां गतिम् ॥ ७६ ॥ सत्त्वं वहति शुद्धात्मन् परं नारायणं प्रभुम् । प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ॥ ७७ ॥ परमात्मानमासाद्य तद्भूतायतनामलाः । अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो ॥ ७८ ॥ लोकेश्वर! आकाशाभिमानी देवता उन योगियोंको रजोगुणकी परमागतितक वहन करता है। अर्थात् तेजोमय विद्युत्-अभिमानी देवताओंके पास पहुँचा देता है। राजेन्द्र! वह रजोगुण अर्थात् विद्युदभिमानी देवता उनको सत्त्वकी परमगतितक अर्थात् जहाँ श्रीनारायणके पार्षदगण उनको लेनेके लिये प्रस्तुत रहते हैं, वहाँतक वहन करता है। शुद्धात्मन्! वहाँसे सत्त्वगुणयुक्त वे भगवान्के पार्षद उनको परम प्रभु श्रीनारायणके पास पहुँचा देते हैं। समर्थ राजन्! भगवान् नारायण स्वयं उनको विशुद्ध आत्मा परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट कर देते हैं। परमात्माको पाकर तद्रूप हुए वे निर्मल योगीजन अमृतभावसम्पन्न हो जाते हैं, फिर नहीं लौटते ॥ ७६—७८ ॥
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् । सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥ ७९ ॥ कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ॥ ७९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः । आजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत न वानघ ॥ ८० ॥ यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ।
त्वदृते पुरुषं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ॥ ८१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— निष्पाप पितामह! स्थिरतापूर्वक श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले वे सांख्ययोगी महात्मा भगवान् नारायणको एवं उत्तम परमात्मपद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेनेपर अपने जन्मसे लेकर मृत्युकके बीते हुए वृत्तान्तको फिर कभी याद करते हैं या नहीं? (मोक्षावस्थामें विशेष-विशेष बातोंका ज्ञान रहता है या नहीं? यही मेरा प्रश्न है।) इस विषयमें जो तथ्य बात है, उसे आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। कुरुनन्दन! आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषसे मैं ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ ८०-८१ ॥
मोक्षे दोषो महानेष प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन् ।
यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे ॥ ८२ ॥
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप ।
मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं नु दुःखतरं भवेत् ॥ ८३ ॥
सिद्धावस्थाको प्राप्त ऋषियोंके लिये मोक्षमें यह एक बड़ा दोष प्रतीत होता है। वह यह कि यदि मोक्ष प्राप्त होनेपर भी वे यतिलोग विशेष ज्ञानमें ही विचरण करते हैं अर्थात् उनको पहलेकी स्मृति रहती है, तब तो मैं प्रवृत्तिरूप धर्मको ही सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। यदि कहें, मुक्तावस्थामें विशेष विज्ञानका अनुभव नहीं होता तब तो उस परम ज्ञानमें डूब जानेपर विशेष जानकारीका अभाव हो जाता है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता सकता है? ॥ ८२-८३ ॥
यथान्यायं त्वया तात प्रश्नः पृष्टः सुसंकटः ।
बुधानामपि सम्मोहः प्रश्नेऽस्मिन् भरतर्षभ ॥ ८४ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! भरतश्रेष्ठ! तुमने यथोचित रीतिसे यह बहुत ही जटिल प्रश्न उपस्थित किया। इस प्रश्नपर विचार करते समय बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ॥ ८४ ॥
अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ् मयेरितम् ।
बुद्धिश्च परमा यत्र कापिलानां महात्मनाम् ॥ ८५ ॥
इस विषयमें भी जो परम तत्त्व है, उसे मैं भलीभाँति बता रहा हूँ, सुनो। यहाँ कपिलजीके द्वारा प्रतिपादित सांख्यमतका अनुसरण करनेवाले महात्मा पुरुषोंका जो उत्तम विचार है, वही प्रस्तुत किया जाता है ॥ ८५ ॥
इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप ।
कारणान्यात्मनस्तानी सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥ ८६ ॥
नरेश्वर! देहधारियोंके अपने-अपने शरीरमें जो इन्द्रियाँ हैं, वे ही विशेष-विशेष विषयोंको देखती या अनुभव करती हैं; वे ही आत्माको विभिन्न ज्ञान करानेमें कारण हैं;
क्योंकि वह सूक्ष्म आत्मा उन इन्द्रियोंद्वारा ही बाह्य विषयोंका दर्शन या प्रकाशन करता है (मुक्तावस्थामें मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध न रहनेके कारण ही उसमें इन्द्रियजनित विशेष ज्ञानका अभाव देखा जाता है) ।। ८६ ।।
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु । विनश्यन्ति न संदेहः फेना इव महार्णवे ।। ८७ ।। जैसे महासागरमें उठे हुए फेन नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर मनुष्यकी काठ और दीवारकी भाँति जड इन्द्रियाँ प्रकृतिमें विलीन हो जाती हैं, इसमें संदेह नहीं है ।। ८७ ।।
इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन । सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ।। ८८ ।। शत्रुओंको ताप देनेवाले नरेश! जब शरीरधारी प्राणी इन्द्रियोंसहित निद्रित हो जाता है, तब उसका सूक्ष्मशरीर आकाशमें वायुके समान सर्वत्र विचरण करने लगता है अर्थात् स्वप्न देखने लगता है ।। ८८ ।।
स पश्यति यथान्यायं स्पर्शान् स्पृशति वा विभो । बुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ।। ८९ ।। प्रभो! भरतनन्दन! वह जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति स्वप्नमें भी यथोचित रीतिसे दृश्य वस्तुओंको देखता है तथा स्पृश्य पदार्थोंका स्पर्श करता है। सारांश यह कि सम्पूर्ण विषयोंका वह जाग्रत्के समान ही अनुभव करता है ।। ८९ ।।
इन्द्रियाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि । अनीशत्वात् प्रलीयन्ते सर्पा हतविषा इव ।। ९० ।। फिर सुषुप्ति-अवस्था होनेपर विषय-ज्ञानमें असमर्थ हुई सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थानमें उसी प्रकार विधिवत् लीन हो जाती हैं, जैसे विषहीन सर्प (भयसे) छिपे रहते हैं ।। ९० ।।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां स्वस्थानेष्वेव सर्वशः । आक्रम्य गतयः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशयः ।। ९१ ।। स्वप्नावस्थामें अपने-अपने स्थानोंमें स्थित हुई सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी समस्त गतियोंको आक्रान्त करके जीवात्मा सूक्ष्म विषयोंमें विचरण करता है, इसमें संदेह नहीं है ।। ९१ ।।
सत्त्वस्य च गुणान् कृत्स्नान् रजसश्च गुणान् पुनः । गुणांश्च तमसः सर्वान् गुणान् बुद्धेश्च भारत ।। ९२ ।। गुणांश्च मनसश्चापि नभसश्च गुणांश्च सः । गुणान् वायोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान् पुनः ।। ९३ ।। अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि । सर्वाण्येव गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञेषु युधिष्ठिर ।। ९४ ।।
मनोऽनु याति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे । शिष्या इव महात्मानमिन्द्रियाणि च तं प्रभो ॥ ९५ ॥ प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् । परं नारायणात्मानं निर्द्वन्द्वं प्रकृतेः परम् ॥ ९६ ॥ भरतनन्दन! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर! परब्रह्म परमात्मा सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको एवं बुद्धि, मन, आकाश, वायु, तेज, जल, और पृथ्वी-इन सबके सम्पूर्ण गुणोंको तथा अन्य सब वस्तुओंको भी अपने गुणोंद्वारा व्याप्त करके सभी क्षेत्रज्ञों (जीवात्माओं) में स्थित हैं, प्रभो! जैसे शिष्य अपने गुरुके पीछे चलते हैं, उसी प्रकार मन, इन्द्रियाँ और शुभाशुभ कर्म भी उस जीवात्माके पीछे-पीछे चलते हैं। जब जीवात्मा इन्द्रियों और प्रकृतिको भी लाँघकर जाता है, तब उस नारायणस्वरूप अविनाशी परमात्माको प्राप्त हो जाता है, जो द्वन्द्वरहित और मायासे अतीत है ॥ ९२—९६ ॥
विमुक्तः पुण्यपापेभ्यः प्रविष्टस्तमनामयम् । परमात्मानमगुणं न निवर्तति भारत ॥ ९७ ॥ भारत! पुण्य-पापसे रहित हुआ सांख्ययोगी मुक्त होकर जब उन्हीं निर्गुण-निर्विकार नारायणस्वरूप परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है, फिर वह इस संसारमें नहीं लौटता है ॥ ९७ ॥
शिष्टं तत्र मनस्तात इन्द्रियाणि च भारत । आगच्छन्ति यथाकालं गुरोः संदेशकारिणः ॥ ९८ ॥ भरतनन्दन! इस प्रकार जीवन्मुक्त पुरुषका आत्मा तो परमात्मामें मिल जाता है, परंतु प्रारब्धवश जबतक शरीर रहता है, तबतक उसके मन और इन्द्रियाँ शेष रहते हैं और गुरुके आदेश पालन करनेवाले शिष्योंके समान यथासमय यहाँ गमनागमन करते हैं ॥ ९८ ॥
शक्यं चाल्पेन कालेन शान्तिं प्राप्तुं गुणार्थिना । एवमुक्तेन कौन्तेय युक्तज्ञानेन मोक्षिणा ॥ ९९ ॥ कुन्तीनन्दन! इस प्रकार बताये हुए ज्ञानसे सम्पन्न मोक्षाधिकारी तथा आध्यात्मिक उन्नतिकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष थोड़े ही समयमें परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ॥ ९९ ॥
सांख्या राजन् महाप्राज्ञा गच्छन्ति परमां गतिम् । ज्ञानेनानेन कौन्तेय तुल्यं ज्ञानं न विद्यते ॥ १०० ॥ राजन्! कुन्तीकुमार! महाज्ञानी सांख्ययोगी ऊपर बताए हुए इसी परमगतिको प्राप्त होते हैं। इस ज्ञानके समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है ॥ १०० ॥
अत्र ते संशयो मा भूज्ज्ञानं सांख्यं परं मतम् । अक्षरं ध्रुवमेवोक्तं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ १०१ ॥
सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया है। इस विषयमें तुम्हें तनिक भी संशय नहीं होना चाहिये। इसमें अक्षर, ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्मका ही प्रतिपादन हुआ है ॥ १०१ ॥ अनादिमध्यनिधनं निर्द्वन्द्वं कर्तृ शाश्वतम् । कूटस्थं चैव नित्यं च यद् वदन्ति मनीषिणः ॥ १०२ ॥ वह ब्रह्म आदि, मध्य और अन्तसे रहित, निर्द्वन्द्व, जगत्की उत्पत्तिका हेतुभूत, शाश्वत, कूटस्थ और नित्य है, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ १०२ ॥ यतः सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यच्च शंसन्ति शास्त्रेषु वदन्ति परमर्षयः ॥ १०३ ॥ संसारकी सृष्टि और प्रलयरूप सारे विकार उसीसे सम्भव होते हैं। महर्षि अपने शास्त्रोंमें उसीकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०३ ॥ सर्वे विप्राश्च देवाश्च तथा शमविदो जनाः । ब्रह्माणं परमं देवमनन्तं परमच्युतम् ॥ १०४ ॥ प्रार्थयन्तश्च तं विप्रा वदन्ति गुणबुद्धयः । सम्यग्युक्तास्तथा योगाः सांख्याश्चामितदर्शनाः ॥ १०५ ॥ समस्त ब्राह्मण, देवता और शान्तिका अनुभव करनेवाले लोग उसी अनन्त, अच्युत, ब्राह्मणहितैषी तथा परमदेव परमात्माकी स्तुति-प्रार्थना करते हैं। उनके गुणोंका चिन्तन करते हुए उनकी महिमाका गान करते हैं। योगमें उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए योगी तथा अपार ज्ञानवाले सांख्यवेत्ता पुरुष भी उसीके गुण गाते हैं ॥ अमूर्तस्तस्य कौन्तेय सांख्यं मूर्तिरिति श्रुतिः । अभिज्ञानानि तस्याहुर्मतं हि भरतर्षभ ॥ १०६ ॥ कुन्तीनन्दन! ऐसी प्रसिद्धि है कि यह सांख्यशास्त्र ही उस निराकार परमात्माका आकार है। भरतश्रेष्ठ! जितने ज्ञान हैं, वे सब सांख्यकी ही मान्यताका प्रतिपादन करते हैं ॥ १०६ ॥ द्विविधानीह भूतानि पृथिव्यां पृथिवीपते । जङ्गमागमसंज्ञानि जङ्गमं तु विशिष्यते ॥ १०७ ॥ पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर स्थावर और जंगम—दो प्रकारके प्राणी उपलब्ध होते हैं। उनमें भी जंगम ही श्रेष्ठ है ॥ १०७ ॥ ज्ञानं महद् यद्धि महत्सु राजन् वेदेषु सांख्येषु तथैव योगे । यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणे सांख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ॥ १०८ ॥ राजन्! नरेश्वर! महात्मा पुरुषोंमें, वेदोंमें, सांख्यों (दर्शनों) में, योगशास्त्रमें तथा पुराणोंमें जो नाना प्रकारका उत्तम ज्ञान देखा जाता है, वह सब सांख्यसे ही आया हुआ
है ।। १०८ ।। यच्चेतिहासेषु महत्सु दृष्टं यच्चार्थशास्त्रे नृप शिष्टजुष्टे । ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन् ।। १०९ ।। नरेश! महात्मन्! बड़े-बड़े इतिहासोंमें, सत्पुरुषों-द्वारा सेवित अर्थशास्त्रमें तथा इस संसारमें जो कुछ भी महान् ज्ञान देखा गया है, वह सब सांख्यसे ही प्राप्त हुआ है ।। १०९ ।। शमश्च दृष्टः परमं बलं च ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् । तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव सांख्ये यथावद् विहितानि राजन् ।। ११० ।। राजन्! प्रत्यक्ष प्राप्त मन और इन्द्रियोंका संयम, उत्तम बल, सूक्ष्मज्ञान तथा परिणाममें सुख देनेवाले जो सूक्ष्म तप बतलाये गये हैं, उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है ।। ११० ।। विपर्यये तस्य हि पार्थ देवान् गच्छन्ति सांख्याः सततं सुखेन । तांश्चानुसंचार्य ततः कृतार्थाः पतन्ति विप्रेषु यतेषु भूयः ।। १११ ।। कुन्तीकुमार! यदि साधनमें कुछ त्रुटि रह जानेके कारण सांख्यका सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ हो तो भी सांख्ययोगके साधक देवलोकमें अवश्य जाते हैं और वहाँ निरन्तर सुखसे रहते हुए देवताओंका आधिपत्य पाकर कृतार्थ हो जाते हैं। तदनन्तर पुण्यक्षयके पश्चात् वे इस लोकमें आकर पुनः साधनके लिये यत्नशील ब्राह्मणोंके यहाँ जन्म ग्रहण करते हैं ।। १११ ।। हित्वा च देहं प्रविशन्ति देवं दिवौकसो द्यामिव पार्थ सांख्याः । अतोऽधिकं तेऽभिरता महार्हे सांख्ये द्विजाः पार्थिव शिष्टजुष्टे ।। ११२ ।। पार्थ! सांख्यज्ञानी शरीर-त्यागके पश्चात् परमदेव परमात्मामें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे देवता स्वर्गमें। पृथ्वीनाथ! अतः शिष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित परम पूजनीय सांख्यशास्त्रमें वे सभी द्विज अधिक अनुरक्त रहते हैं ।। ११२ ।। तेषां न तिर्यग्गमनं हि दृष्टं नार्वाग्गतिः पापकृताधिवासः ।
न वा प्रधाना अपि ते द्विजातयो
ये ज्ञानमेतन्नृपतेऽनुरक्ताः ॥ ११३ ॥
राजन्! जो इस सांख्य-ज्ञानमें अनुरक्त हैं, वे ही ब्राह्मण प्रधान हैं, अतः उन्हें मृत्युके पश्चात् कभी पशु पक्षी आदिकी योनिमें जाना पड़ा हो, ऐसा नहीं देखा गया है। वे कभी नरकादि अधोगतिको भी नहीं प्राप्त होते हैं तथा उन्हें पापाचारियोंके बीचमें भी नहीं रहना पड़ता है ॥ ११३ ॥
सांख्यं विशालं परमं पुराणं
महार्णवं विमलमुदारकान्तम् ।
कृत्स्नं च सांख्यं नृपते महात्मा
नारायणो धारयतेऽप्रमेयम् ॥ ११४ ॥
सांख्यका ज्ञान अत्यन्त विशाल और परम प्राचीन है। यह महासागरके समान अगाध, निर्मल, उदार भावोंसे परिपूर्ण और अतिसुन्दर है। नरनाथ! परमात्मा भगवान् नारायण इस सम्पूर्ण अप्रमेय सांख्य-ज्ञानको पूर्णरूपसे धारण करते हैं ॥ ११४ ॥
एतन्मयोक्तं नरदेव तत्त्वं
नारायणो विश्वमिदं पुराणम् ।
स सर्गकाले च करोति सर्गं
संहारकाले च तदत्ति भूयः ॥ ११५ ॥
संहृत्य सर्वं निजदेहसंस्थं
कृत्वाप्सु शेते जगदन्तरात्मा ॥ ११६ ॥
नरदेव! यह मैंने तुमसे सांख्यका तत्त्व बतलाया है। इस पुरातन विश्वके रूपमें साक्षात् भगवान् नारायण ही सर्वत्र विराजमान हैं। वे ही सृष्टिके समय जगत्की सृष्टि और संहारकालमें उसको अपनेमें विलीन कर लेते हैं। इस प्रकार जगत्को अपने शरीरके भीतर ही स्थापित करके वे जगत्के अन्तरात्मा भगवान् नारायण एकार्णवके जलमें शयन करते हैं ॥ ११५-११६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सांख्यकथने
एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सांख्यतत्त्वका वर्णनविषयक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०१ ॥
१. ज्ञानशक्ति, वैराग्य, स्वामिभाव, तप, सत्य, क्षमा, धैर्य, स्वच्छता, आत्माका बोध और अधिष्ठातृत्व—ये दस सात्त्विक गुण बताये गये हैं। २. असंतोष, पश्चात्ताप, शोक, लोभ, अक्षमा, दमन करनेकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध और ईर्ष्या-ये नौ राजस गुण बताये गये हैं। ३. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा, अभिमान, विषाद और प्रीतिका अभाव-ये आठ तामस
गुण हैं। ४. महत्, अहंकार, शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्धतन्मात्रा-ये सात गुण बुद्धिके हैं।
१. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण-इन पाँच इन्द्रियोंसहित छठा मन-ये मनके छः गुण हैं। २. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये आकाशके पाँच गुण हैं। ३. संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण-ये बुद्धिके चार गुण हैं। ४. अप्रतिपत्ति, विप्रतिपत्ति और विपरीत प्रतिपत्ति-ये तीन गुण तमके हैं। ५. प्रवृत्ति तथा दुःख—ये दो गुण रजके हैं। ६. प्रकाश सत्त्वका एक प्रधान गुण है।
वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति
द्व्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति
युधिष्ठिर उवाच
किं तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते पुनः ।
किं च तत्क्षरमित्युक्तं यस्मादावर्तते पुनः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! वह अक्षर तत्त्व क्या है, जिसे प्राप्त कर लेनेपर जीव फिर इस संसारमें नहीं लौटता तथा वह क्षर पदार्थ क्या है, जिसको जानने या पा लेनेपर भी पुनः इस संसारमें लौटना पड़ता है? ॥ १ ॥
अक्षरक्षरयोर्व्यक्तिं पृच्छाम्यरिनिषूदन ।
उपलब्धं महाबाहो तत्त्वेन कुरुनन्दन ॥ २ ॥
शत्रुसूदन! महाबाहु! कुरुनन्दन! क्षर और अक्षरके स्वरूपको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये ही मैंने आपसे यह प्रश्न किया है ॥ २ ॥
त्वं हि ज्ञाननिधिर्विप्रैरुच्यसे वेदपारगैः ।
ऋषिभिश्च महाभागैर्यतिभिश्च महात्मभिः ॥ ३ ॥
वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण, महाभाग महर्षि तथा महात्मा यति भी आपको ज्ञाननिधि कहते हैं ॥ ३ ॥
शेषमल्पं दिनानां ते दक्षिणायनभास्करे ।
आवृत्ते भगवत्यर्के गन्तासि परमां गतिम् ॥ ४ ॥
अब सूर्यके दक्षिणायनमें रहनेके थोड़े ही दिन शेष हैं। भगवान् सूर्यके उत्तरायणमें पदार्पण करते ही आप परमधामको पधारेंगे ॥ ४ ॥
त्वयि प्रतिगते श्रेयः कुतः श्रोष्यामहे वयम् ।
कुरुवंशप्रदीपस्त्वं ज्ञानदीपेन दीप्यसे ॥ ५ ॥
आपके चले जानेपर हमलोग अपने कल्याणकी बातें किससे सुनेंगे? आप कुरुवंशको प्रकाशित करनेवाले प्रदीप हैं और ज्ञानदीपसे उद्भासित हो रहे हैं ॥ ५ ॥
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुकुलोद्वह ।
न तृप्यामीह राजेन्द्र शृण्वन्नमृतमीदृशम् ॥ ६ ॥
अतः कुरुकुलधुरन्धर! राजेन्द्र! मैं आपकेही मुँहसे यह सब सुनना चाहता हूँ। आपके इन अमृतमय वचनोंको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती है (अतएव आप मुझे यह क्षर-अक्षरका विषय बताइये)। ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । वसिष्ठस्य च संवादं करालजनकस्य च ॥ ७ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें कराल नामक जनक और वसिष्ठका जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें बतलाऊँगा ॥ ७ ॥ वसिष्ठं श्रेष्ठमासीनमृषीणां भास्करद्युतिम् । पप्रच्छ जनको राजा ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ॥ ८ ॥ एक समयकी बात है, ऋषियोंमें सूर्यके समान तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ अपने आश्रमपर विराजमान थे। वहाँ राजा जनकने पहुँचकर उनसे परम कल्याणकारी ज्ञानके विषयमें पूछा ॥ ८ ॥ परमध्यात्मकुशलमध्यात्मगतिनिश्चयम् । मैत्रावरुणिमासीनमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ९ ॥ स्वक्षरं प्रश्रितं वाक्यं मधुरं चाप्यनुल्बणम् । पप्रच्छर्षिवरं राजा करालजनकः पुरा ॥ १० ॥ मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी अध्यात्मविषयक प्रवचनमें अत्यन्त कुशल थे और उन्हें अध्यात्मज्ञानका निश्चय हो गया था। वे एक आसनपर विराजमान थे। पूर्वकालमें कराल नामक राजा जनकने उन मुनिवरके पास जा हाथ जोड़कर प्रणाम किया और सुन्दर अक्षरोंसे युक्त विनयपूर्ण तथा कुतर्करहित मधुर वाणीमें इस प्रकार पूछा— ॥ ९-१० ॥ भगवन् श्रोतुमिच्छामि परं ब्रह्म सनातनम् । यस्मान्न पुनरावृत्तिमाप्नुवन्ति मनीषिणः ॥ ११ ॥ ‘भगवन्! जहाँसे मनीषी पुरुष पुनः इस संसारमें लौटकर नहीं आते हैं, उस सनातन परब्रह्मके स्वरूपका मैं वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥ यच्च तत् क्षरमित्युक्तं यत्रेदं क्षरते जगत् । यच्चाक्षरमिति प्रोक्तं शिवं क्षेम्यमनामयम् ॥ १२ ॥ ‘तथा जिसे क्षर कहा गया है, उसे भी जानना चाहता हूँ। जिसमें इस जगत्का क्षरण (लय) होता है और जिसे अक्षर कहा गया है, उस निर्विकार कल्याणमय शिवस्वरूप अधिष्ठानका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥
वसिष्ठ उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल क्षरतीदं यथा जगत् । यन्न क्षरति पूर्वेण यावत्कालेन वाप्यथ ॥ १३ ॥ वसिष्ठजीने कहा—भूपाल! जिस प्रकार इस जगत्का क्षय (परिवर्तन) होता है, उसको तथा जो किसी भी कालमें क्षरित (नष्ट) नहीं होता, उस अक्षरको भी बता रहा हूँ,
सुनो ॥ १३ ॥ युगं द्वादशसाहस्रं कल्पं विद्धि चतुर्युगम् । दशकल्पशतावृत्तमहस्तद् ब्राह्ममुच्यते ॥ १४ ॥ देवताओंके बारह हजार वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इसीको कल्प अर्थात् महायुग समझो। ऐसे एक हजार महायुगोंका ब्रह्माजीका एक दिन बताया जाता है ॥ १४ ॥ रात्रिश्चैतावती राजन् यस्यान्ते प्रतिबुद्ध्यते । सृजत्यनन्तकर्माणं महान्तं भूतमग्रजम् ॥ १५ ॥ मूर्तिमन्तममूर्तात्मा विश्वं शम्भुः स्वयम्भुवः । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानं ज्योतिरव्ययम् ॥ १६ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १७ ॥ राजन्! उनकी रात्रि भी इतनी ही बड़ी होती है; जिसके अन्तमें वे जागते हैं। अनन्तकर्म ब्रह्माजी सबके अग्रज और महान् भूत हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप है। जो अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियोंपर शासन करनेवाले हैं, वे कल्याणस्वरूप निराकार परमेश्वर ही उन मूर्तिमान् ब्रह्माकी सृष्टि करते हैं। परमात्मा ज्योतिःस्वरूप स्वयं प्रकट और अविनाशी हैं। उनके हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक और मुख सब ओर हैं। कान भी सब ओर हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १५—१७ ॥ हिरण्यगर्भो भगवानेष बुद्धिरिति स्मृतः । महानिति च योगेषु विरिञ्चिरिति चाप्यजः ॥ १८ ॥ परमेश्वरसे उत्पन्न जो सबके अग्रज भगवान् हिरण्यगर्भ हैं, ये ही बुद्धि कहे गये हैं। योगशास्त्रमें ये ही महान् कहे गये हैं। इन्हींको विरिञ्चि तथा अज भी कहते हैं ॥ १८ ॥ सांख्ये च पठ्यते शास्त्रे नामभिर्बहुधात्मकः । विचित्ररूपो विश्वात्मा एकाक्षर इति स्मृतः ॥ १९ ॥ वृतं नैकात्मकं येन कृतं त्रैलोक्यमात्मना । तथैव बहुरूपत्वाद् विश्वरूप इति स्मृतः ॥ २० ॥ अनेक नाम और रूपोंसे युक्त इन हिरण्यगर्भ ब्रह्माका सांख्यशास्त्रमें भी वर्णन आता है। ये विचित्र रूपधारी, विश्वात्मा और एकाक्षर कहे गये हैं। इस अनेक रूपोंवाली त्रिलोकीकी रचना उन्होंने ही की है और स्वयं ही इसे व्याप्त कर रक्खा है। इस प्रकार बहुत-से रूप धारण करनेके कारण वे विश्वरूप माने गये हैं ॥ १९-२० ॥ एष वै विक्रियापन्नः सृजत्यात्मानमात्मना । अहङ्कारं महातेजाः प्रजापतिमहंकृतम् ॥ २१ ॥ ये महातेजस्वी भगवान् हिरण्यगर्भ विकारको प्राप्त हो स्वयं ही अहंकारकी और उसके अभिमानी प्रजापति विराट्की सृष्टि करते हैं ॥ २१ ॥
अव्यक्ताद् व्यक्तमापन्नं विद्यासर्गं वदन्ति तम् । महान्तं चाप्यहङ्कारमविद्यासर्गमेव च ॥ २२ ॥ इनमें निराकारसे साकार रूपमें प्रकट होनेवाली मूल प्रकृतिको तो विद्यासर्ग कहते हैं और महत्तत्त्व एवं अहंकारको अविद्यासर्ग कहते हैं ॥ २२ ॥ अविधिश्च विधिश्चैव समुत्पन्नौ तथैकतः । विद्याविद्येति विख्याते श्रुतिशास्त्रार्थचिन्तकैः ॥ २३ ॥ अविधि (ज्ञान) और विधि (कर्म) की उत्पत्ति भी उस परमात्मासे ही हुई है। श्रुति तथा शास्त्रके अर्थका विचार करनेवाले विद्वानोंने उन्हें विद्या और अविद्या बतलाया है ॥ २३ ॥ भूतसर्गमहङ्कारात् तृतीयं विद्धि पार्थिव । अहङ्कारेषु सर्वेषु चतुर्थं विद्धि वैकृतम् ॥ २४ ॥ पृथ्वीनाथ! अहंकारसे जो सूक्ष्म भूतोंकी सृष्टि होती है उसे तीसरा सर्ग समझो। सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारके अहंकारोंसे जो चौथी सृष्टि उत्पन्न होती है, उसे वैकृत-सर्ग समझो ॥ २४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2005)
महर्षि वसिष्ठका राजा कराल जनकको उपदेश
वायुर्ज्योतिरथाकाशमापोऽथ पृथिवी तथा ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥ २५ ॥
आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय वैकृत-सर्गके अन्तर्गत हैं ॥ २५ ॥
एवं युगपदुत्पन्नं दशवर्गमसंशयम् ।
पञ्चमं विद्धि राजेन्द्र भौतिकं सर्गमर्थवत् ॥ २६ ॥
इन दसोंकी उत्पत्ति एक ही साथ होती है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पाँचवाँ भौतिक सर्ग समझो। जो प्राणियोंके लिये विशेष प्रयोजनीय होनेके कारण सार्थक है ॥ २६ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणमेव च पञ्चमम् ।
वाक् च हस्तौ च पादौ च पायुर्मेढ्रंतथैव च ॥ २७ ॥
बुद्धीन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च ।
सम्भूतानीह युगपन्मनसा सह पार्थिव ॥ २८ ॥
इस भौतिक सर्गके अन्तर्गत आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और लिंग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। पृथ्वीनाथ! मनसहित इन सबकी उत्पत्ति भी एक ही साथ होती है ॥ २७-२८ ॥
एषा तत्त्वचतुर्विंशा सर्वाकृतिषु वर्तते ।
यां ज्ञात्वा नाभिशोचन्ति ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ॥ २९ ॥
ये चौबीस तत्त्व सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें मौजूद रहते हैं। तत्त्वदर्शी ब्राह्मण इनके यथार्थ स्वरूपको जानकर कभी शोक नहीं करते हैं ॥ २९ ॥
एतद् देहं समाख्यातं त्रैलोक्ये सर्वदेहिषु ।
वेदितव्यं नरश्रेष्ठ सदेवनरदानवे ॥ ३० ॥
सयक्षभूतगन्धर्वे सकिन्नरमहोरगे ।
सचारणपिशाचे वै सदेवर्षिनिशाचरे ॥ ३१ ॥
सदंशकीटमशके सपूतिकृमिमूषिके ।
शुनि श्वपाके चैणेये सचण्डाले सपुल्कसे ॥ ३२ ॥
हस्त्यश्वखरशार्दूले सवृक्षे गवि चैव ह ।
यच्च मूर्तिमयं किंचित् सर्वत्रैतन्निदर्शनम् ॥ ३३ ॥
नरश्रेष्ठ! तीनों लोकोंमें जितने देहधारी हैं, उन सबमें इन्हीं तत्त्वोंके समुदायको देह समझना चाहिये। देवता, मनुष्य, दानव, यक्ष, भूत, गन्धर्व किन्नर, महासर्प, चारण, पिशाच, देवर्षि, निशाचर, दंश (डंक मारनेवाली मक्खी), कीट, मच्छर, दुर्गन्धित कीड़े, चूहे, कुत्ते, चाण्डाल, हिरन, श्वपाक (कुत्ताका मांस खानेवाला), पुल्कस (म्लेच्छ), हाथी, घोड़े, गधे,
सिंह, वृक्ष और गौ आदिके रूपमें जो कुछ मूर्तिमान् पदार्थ है, सर्वत्र इन्हीं तत्त्वोंका दर्शन होता है ॥ ३०-३३ ॥
जले भुवि तथाऽऽकाशे नान्यत्रेति विनिश्चयः ।
स्थानं देहवतामासीदित्येवमनुशुश्रुम ॥ ३४ ॥
पृथ्वी, जल और आकाशमें ही देहधारियोंका निवास है, और कहीं नहीं; यह विद्वानोंका निश्चय है। ऐसा मैंने सुन रखा है ॥ ३४ ॥
कृत्स्नमेतावतस्तात क्षरते व्यक्तसंज्ञितम् ।
अहन्यहनि भूतात्मा ततः क्षर इति स्मृतः ॥ ३५ ॥
हे तात! यह सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् व्यक्त कहलाता है और प्रतिदिन इसका क्षरण होता है, इसलिये इसको क्षर कहते हैं ॥ ३५ ॥
एतदक्षरमित्युक्तं क्षरतीदं यथा जगत् ।
जगन्मोहात्मकं प्राहुरव्यक्ताद् व्यक्तसंज्ञकम् ॥ ३६ ॥
इससे भिन्न जो तत्त्व है, उसे अक्षर कहा गया है। इस प्रकार उस अव्यक्त अक्षरसे उत्पन्न हुआ यह व्यक्तसंज्ञक मोहात्मक जगत् क्षरित होनेके कारण क्षर नाम धारण करता है ॥ ३६ ॥
महांश्चैवाग्रजो नित्यमेतत् क्षरनिदर्शनम् ।
कथितं ते महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३७ ॥
क्षर-तत्त्वोंमें सबसे पहले महत्तत्त्वकी ही सृष्टि हुई है। यह बात सदा ध्यानमें रखनेयोग्य है। यही क्षरका परिचय है। महाराज! तुमने जो मुझसे पूछा था, उसके अनुसार यह मैंने तुम्हारे समक्ष क्षर-अक्षरके विषयका वर्णन किया है ॥ ३७ ॥
पञ्चविंशतिमो विष्णुर्निस्तत्त्वस्तत्त्वसंज्ञितः ।
तत्त्वसंश्रयणादेतत् तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ॥ ३८ ॥
इन चौबीस तत्त्वोंसे परे जो भगवान् विष्णु (सर्वव्यापी परमात्मा) हैं, उन्हें पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है। तत्त्वोंको आश्रय देनेके कारण ही मनीषी पुरुष उन्हें तत्त्व कहते हैं ॥ ३८ ॥
यन्मर्त्यमसृजद् व्यक्तं तत्तन्मूर्त्यधितिष्ठति ।
चतुर्विंशतिमोऽव्यक्तो ह्यमूर्तः पञ्चविंशकः ॥ ३९ ॥
महत्तत्त्व आदि व्यक्त पदार्थ जिन मरणशील (नश्वर) पदार्थोंकी सृष्टि करते हैं, वे किसी-न-किसी आकार या मूर्तिका आश्रय लेकर स्थित होते हैं। गणना करनेपर चौबीसवाँ तत्त्व है अव्यक्त प्रकृति और पचीसवाँ है निराकार परमात्मा ॥ ३९ ॥
स एव हृदि सर्वासु मूर्तिष्वातिष्ठतेऽत्मवान् ।
केवलश्चेतनो नित्यः सर्वमूर्तिरमर्तिमान् ॥ ४० ॥
जो अद्वितीय, चेतन, नित्य, सर्वस्वरूप, निराकार एवं सबके आत्मा हैं, वे परम पुरुष परमात्मा ही समस्त शरीरोंके हृदयदेशमें निवास करते हैं ॥ ४० ॥
सर्गप्रलयधर्मिण्या असर्गप्रलयात्मकः ।
गोचरे वर्तते नित्यं निर्गुणं गुणसंज्ञितम् ॥ ४१ ॥
यद्यपि सृष्टि और प्रलय प्रकृतिके ही धर्म हैं। पुरुष तो उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित है तथापि उस प्रकृतिके संसर्गवश पुरुष भी उस सृष्टि और प्रलयरूप धर्मसे सम्बद्ध-सा जान पड़ता है। इन्द्रियोंका विषय न होनेपर भी इन्द्रियगोचर-सा हो जाता है तथा निर्गुण होनेपर भी गुणवान्-सा जान पड़ता है ॥ ४१ ॥
एवमेष महानात्मा सर्गप्रलयकोविदः ।
विकुर्वाणः प्रकृतिमानभिमन्यत्यबुद्धिमान् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सृष्टि और प्रलयके तत्त्वको जाननेवाला यह महान् आत्मा अविकारी होकर भी प्रकृतिके संसर्गसे युक्त हो विकारवान्-सा हो जाता है एवं प्राकृत-बुद्धिसे रहित होनेपर भी शरीरमें आत्माभिमान कर लेता है ॥ ४२ ॥
तमःसत्त्वरजोयुक्तस्तासु तास्विह योनिषु ।
नीयते प्रतिबुद्धत्वादबुद्धजनसेवनात् ॥ ४३ ॥
प्रकृतिके संसर्गवश ही वह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे युक्त हो जाता है तथा अज्ञानी मनुष्योंका संग करनेसे उन्हींकी भाँति अपनेको शरीरस्थ समझनेके कारण वह उन-उन सात्त्विक, राजस, तामस योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ४३ ॥
सहवास विनाशित्वान्नान्योऽहमिति मन्यते ।
योऽहं सोऽहमिति ह्युक्त्वा गुणानेवानुवर्तते ॥ ४४ ॥
प्रकृतिके सहवाससे अपने स्वरूपका बोध लुप्त हो जानेके कारण पुरुष यह समझने लगता है कि मैं शरीरसे भिन्न नहीं हूँ। 'मैं यह हूँ, वह हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, अमुक जातिका हूँ', इस प्रकार कहता हुआ वह सात्त्विक आदि गुणोंका ही अनुसरण करता है ॥ ४४ ॥
तमसा तामसान् भावान् विविधान् प्रतिपद्यते ।
रजसा राजसांश्चैव सात्त्विकान् सत्त्वसंश्रयात् ॥ ४५ ॥
वह तमोगुणसे मोह आदि नाना प्रकारके तामस भावोंको, रजोगुणसे प्रकृति आदि राजस भावोंको तथा सत्त्वगुणका आश्रय लेकर प्रकाश आदि सात्त्विक भावोंको प्राप्त होता है ॥ ४५ ॥
शुक्ललोहितकृष्णानि रूपाण्येतानि त्रीणि तु ।
सर्वाण्येतानि रूपाणि यानीह प्राकृतानि वै ॥ ४६ ॥
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे क्रमशः शुक्ल, रक्त और कृष्ण—ये तीन वर्ण प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे जो-जो रूप प्रकट हुए हैं, वे सब इन्हीं तीनों वर्णोंके अन्तर्गत हैं ॥ ४६ ॥
तामसा निरयं यान्ति राजसा मानुषानथ ।
सात्त्विका देवलोकाय गच्छन्ति सुखभागिनः ॥ ४७ ॥ तमोगुणी प्राणी नरकमें पड़ते हैं, राजस स्वभावके जीव मनुष्यलोकमें जाते हैं तथा सुखके भागी सात्त्विक पुरुष देवलोकको प्रस्थान करते हैं ॥ ४७ ॥
निष्कैवल्येन पापेन तिर्यग्योनिमवाप्नुयात् । पुण्यपापेन मानुष्यं पुण्येनैकेन देवताः ॥ ४८ ॥ अत्यन्त केवल पापकर्मोंके फलस्वरूप जीव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिको प्राप्त होता है। पुण्य और पाप दोनोंके सम्मिश्रणसे मनुष्यलोक मिलता है तथा केवल पुण्यसे प्राणी देवयोनिको प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥
एवमव्यक्तविषयं क्षरमाहुर्मनीषिणः । पञ्चविंशतिमो योऽयं ज्ञानादेव प्रवर्तते ॥ ४९ ॥ इस प्रकार ज्ञानी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए पदार्थोंको क्षर कहते हैं। उपर्युक्त चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पचीसवाँ तत्त्व—परमपुरुष परमात्मा बताया गया है, वही अक्षर है। उसकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे द्व्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥