महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दोनों यदि अशुभ हों तो उनका फल भी अशुभ समझे तथा शुभ हों तो उनका फल भी शुभ जानना चाहिये; क्योंकि ये दोनों ही शुभ और अशुभरूप होती हैं ।।
दैवं च दैवसंयुक्तं प्राणंश्च प्राणदश्च ह ।
अपेक्षापूर्वककरणादशुभानां शुभं फलम् ।। १४ ।।
‘देवताओंके निमित्त, दैवयुक्त (शास्त्रीय कर्म), प्राण और प्राणदाता—इन चारोंकी अपेक्षापूर्वक जो कुछ किया जाता है, उससे अशुभका भी शुभ ही फल होता है ।। १४ ।।
ऊर्ध्वं भवति संदेहादिह दृष्टार्थमेव च ।
अपेक्षापूर्वककरणात् प्रायश्चित्तं विधीयते ।। १५ ।।
‘प्राणोंपर संशय न होनेकी स्थितिमें अथवा किसी प्रत्यक्ष लाभके लिये जो यहाँ अशुभ कर्म बन जाता है, उसे इच्छापूर्वक करनेके कारण उसके दोषकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्तका विधान है ।। १५ ।।
क्रोधमोहकृते चैव दृष्टान्तागमहेतुभिः ।
शरीराणामुपक्लेशो मनसश्च प्रियाप्रिये ।
तदौषधैश्च मन्त्रैश्च प्रायश्चित्तैश्च शाम्यति ।। १६ ।।
‘यदि क्रोध और मोहके वशीभूत होकर मनको प्रिय या अप्रिय लगनेवाले अशुभ कार्य हो जाते हैं तो उनके निवारणके लिये दृष्टान्तप्रतिपादक शास्त्रकी दृष्टियोंसे उपवास आदिके द्वारा शरीरको सुखाना ही करने योग्य प्रायश्चित्त माना गया है। इसके सिवा, हविष्यान्न-भोजन, मन्त्रोंके जप तथा अन्यान्य प्रायश्चित्तोंसे भी क्रोध आदिके कारण किये गये पापकी शान्ति होती है ।। १६ ।।
उपवासमेकरात्रं दण्डोत्सर्गे नराधिपः ।
विशुद्ध्येदात्मशुद्ध्यर्थं त्रिरात्रं तु पुरोहितः ।। १७ ।।
‘यदि राजा दण्डनीय पुरुषको दण्ड न दे तो उसे अपनी शुद्धिके लिये एक रातका उपवास करना चाहिये। यदि पुरोहित राजाको ऐसे अवसरपर कर्तव्यका उपदेश न दे तो उसे तीन रातका उपवास करना चाहिये ।। १७ ।।
क्षयं शोकं प्रकुर्वाणो न म्रियेत यदा नरः ।
शस्त्रादिभिरुपाविष्टस्त्रिरात्रं तत्र निर्दिशेत् ।। १८ ।।
‘यदि पुत्र आदिकी मृत्युके कारण शोक करनेवाला पुरुष आमरण उपवास करनेके लिये बैठ जाय अथवा शस्त्र आदिसे आत्मघातकी चेष्टा करे; परंतु उसकी मृत्यु न हो, उस दशामें भी उस निन्द्यकर्मके लिये जो चेष्टा की गयी थी, उसके दोषकी निवृत्तिके लिये उसे तीन रातका उपवास बताना चाहिये ।। १८ ।।
जातिश्रेण्यधिवासानां कुलधर्मांश्च सर्वतः ।
वर्जयन्ति च ये धर्मं तेषां धर्मो न विद्यते ।। १९ ।।
‘परंतु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम तथा कुलके धर्मोंका सर्वथा परित्याग कर देते हैं और जो लोग धर्ममात्रको छोड़ बैठते हैं उनके लिये कोई धर्म (प्रायश्चित्त) नहीं है। अर्थात् किसी भी प्रायश्चित्तसे उनकी शुद्धि नहीं हो सकती है ।। १९ ।।
दश वा वेदशास्त्रज्ञास्त्रयो वा धर्मपाठकाः ।
यद् ब्रूयुः कार्य उत्पन्ने स धर्मो धर्मसंशये ।। २० ।।
‘यदि प्रायश्चित्तकी आवश्यकता पड़ जाय और धर्मके निर्णयमें संदेह उपस्थित हो जाय तो वेद और धर्म-शास्त्रको जाननेवाले दस अथवा निरन्तर धर्मका विचार करनेवाले तीन ब्राह्मण उस प्रश्नपर विचार करके जो कुछ कहें, उसे ही धर्म मानना चाहिये ।। २० ।।
अनड्वान् मृत्तिका चैव तथा क्षुद्रपिपीलिकाः ।
श्लेष्मातकस्तथा विप्रैरभक्ष्यं विषमेव च ।। २१ ।।
‘बैल, मिट्टी, छोटी-छोटी चीटियाँ, श्लेष्मातक³ (लसोड़ा) और विष—ये सब ब्राह्मणोंके लिये अभक्ष्य हैं ।। २१ ।।
अभक्ष्या ब्राह्मणैर्मत्स्याः शल्कैर्यै वै विवर्जिताः ।
चतुष्पात् कच्छपादन्द्यो मण्डूका जलजाश्च ये ।। २२ ।।
‘काँटोंसे रहित जो मत्स्य हैं, वे भी ब्राह्मणोंके लिये अभक्ष्य हैं। कच्छप और उसके सिवा अन्य चार पैरवाले सभी जीव अभक्ष्य हैं। मेढ़क और जलमें उत्पन्न होनेवाले अन्य जीव भी अभक्ष्य ही हैं ।। २२ ।।
भासा हंसाः सुपर्णाश्च चक्रवाकाः प्लवा बकाः ।
काको मद्गुश्च गृध्रश्च श्येनोल्लूकस्तथैव च ।। २३ ।।
क्रव्यादा दंष्ट्रिणः सर्वे चतुष्पात् पक्षिणश्च ये ।
येषां चोभयतो दन्ताश्चतुर्दंष्ट्राश्च सर्वशः ।। २४ ।।
‘भास, हंस, गरुड़, चक्रवाक, बतख, बगुले, कौए, मद्गु³, गीध, बाज, उल्लू, कच्चे मांस खानेवाले दाढ़ोंसे युक्त सभी हिंसक पशु, चार पैरवाले जीव और पक्षी तथा दोनों ओर दाँत और चार दाढ़ोंवाले सभी जीव अभक्ष्य हैं ।। २३-२४ ।।
एडकाश्वखरोष्ट्रीणां सूतिकानां गवामपि ।
मानुषीणां मृगीणां च न पिबेद् ब्राह्मणः पयः ।। २५ ।।
‘भेड़, घोड़ी, गदही, ऊँटनी, दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई गाय, मानवी स्त्री और हिरनियोंका दूध ब्राह्मण न पीये ।। २५ ।।
प्रेतान्नं सूतिकान्नं च यच्च किंचिदनिर्दशम् ।
अभोज्यं चाप्यपेयं च धेनोर्दुग्धमनिर्दशम् ।। २६ ।।
‘यदि किसीके यहाँ मरणाशौच या जननाशौच हो गया हो तो उसके यहाँ दस दिनोंतक कोई अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये, इसी प्रकार ब्यायी हुई गायका दूध भी यदि दस दिनके
भीतरका हो तो उसे नहीं पीना चाहिये ॥ २६ ॥ राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयुः सुवर्णकारान्नंमवीरायाश्च योषितः ॥ २७ ॥ ‘राजाका अन्न तेज हर लेता है, शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है, सुनारका तथा पति और पुत्रसे हीन युवतीका अन्न आयुका नाश करता है ॥ २७ ॥ विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं गणिकान्नंमथेन्द्रियम् । मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितान्नं च सर्वशः ॥ २८ ॥ ‘व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान है और वेश्याका अन्न वीर्यके समान। जो अपनी स्त्रीके पास किसी उपपतिका आना सह लेते हैं, उन कायरोंका तथा सदा स्त्रीके वशीभूत रहनेवाले पुरुषोंका अन्न भी वीर्यके ही तुल्य है ॥ २८ ॥ दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रतुविक्रयिकस्य च । तक्षणश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च ॥ २९ ॥ चिकित्सकस्य यच्चान्नंमभोज्यं रक्षिणस्तथा । ‘जिसने यज्ञकी दीक्षा ली हो उसका अन्न अग्निषोमीय होमविशेषके पहले अग्राह्य है। कंजूस, यज्ञ बेचनेवाले, बढ़ई, चमार या मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य तथा चौकीदारका अन्न भी खाने योग्य नहीं है ॥ २९ ½ ॥ गणग्रामाभिशस्तानां रङ्गस्त्रीजीविनां तथा ॥ ३० ॥ परिवित्तीनां पुंसां च बन्दिद्यूतविदां तथा । ‘जिन्हें किसी समाज या गाँवने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकीके द्वारा अपनी जीविका चलाते हों, छोटे भाईका ब्याह हो जानेपर भी कुँवारे रह गये हों, बंदी (चारण या भाट)-का काम करते हों या जुआरी हों, ऐसे लोगोंका अन्न भी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥ ३० ½ ॥ वामहस्ताहृतं चान्नं भक्तं पर्युषितं च यत् ॥ ३१ ॥ सुरानुगतमुच्छिष्टमभोज्यं शेषितं च यत् । ‘बायें हाथसे लाया अथवा परोसा गया अन्न, बासी भात, शराब मिला हुआ, जूठा और घरवालोंको न देकर अपने लिये बचाया हुआ अन्न भी अखाद्य ही है ॥ ३१ ½ ॥ पिष्टस्य चेक्षुशाकानां विकाराः पयसस्तथा ॥ ३२ ॥ सक्तुधानाकरम्भाणां नोपभोग्याश्चिरस्थिताः । ‘इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईखके रस, साग या दूधको बिगाड़कर या सड़ाकर बनाये गये हों, सत्तू, भूने हुए जौ और दहीमिश्रित सत्तू इन्हें विकृत करके बनाये हुए पदार्थ यदि बहुत देरके बने हों तो उन्हें नहीं खाना चाहिये ॥ ३२ ½ ॥ पायसं कृसरं मांसमपूपांश्च वृथाकृताः ॥ ३३ ॥ अपेयाश्चाप्यभक्ष्याश्च ब्राह्मणैर्गृहमेधिभिः ।
'खीर, खिचड़ी, फलका गूदा और पूए यदि देवताके उद्देश्यसे न बनाये गये हों तो गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये खाने-पीने योग्य नहीं हैं ॥ ३३ १/२ ॥ देवानृषीन् मनुष्यांश्च पितॄन् गृह्याश्च देवताः ॥ ३४ ॥ पूजयित्वा ततः पश्चाद् गृहस्थो भोक्तुमर्हति । 'गृहस्थको चाहिये कि वह पहले देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों (अतिथियों), पितरों और घरके देवताओंका पूजन करके पीछे अपने भोजन करे ॥ ३४ १/२ ॥ यथा प्रव्रजितो भिक्षुस्तथैव स्वे गृहे वसेत् ॥ ३५ ॥ एवंवृत्तः प्रियैर्दारैः संवसन् धर्ममाप्नुयात् । 'जैसे गृहत्यागी संन्यासी घरके प्रति अनासक्त होता है, उसी प्रकार गृहस्थको भी ममता और आसक्ति छोड़कर ही घरमें रहना चाहिये। जो इस प्रकार सदाचारका पालन करते हुए अपनी प्रिय पत्नीके साथ घरमें निवास करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ १/२ ॥ न दद्याद् यशसे दानं न भयान्नोपकारिणे ॥ ३६ ॥ न नृत्यगीतशीलेषु हासकेषु च धार्मिकः । न मत्ते चैव नोन्मत्ते न स्तेने न च कुत्सके ॥ ३७ ॥ न वाग्धीने विवर्णे वा नाङ्गहीने न वामने । न दुर्जने दौष्कुले वा व्रतैर््यो वा न संस्कृतः । न श्रोत्रियमृते दानं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते ॥ ३८ ॥ 'धर्मात्मा पुरुषको चाहिये कि वह यशके लोभसे, भयके कारण अथवा अपना उपकार करनेवालेको दान न दे अर्थात् उसे जो दिया जाय वह दान नहीं है, ऐसा समझना चाहिये। जो नाचने-गानेवाले, हँसी-मजाक करनेवाले (भाँड़ आदि), मदमत्त, उन्मत्त, चोर, निन्दक, गूँगे, कान्तिहीन, अङ्गहीन, बौने, दुष्ट, दूषित कुलमें उत्पन्न तथा व्रत एवं संस्कारसे शून्य हों, उन्हें भी दान न दे। श्रोत्रियके सिवा वेदज्ञानशून्य ब्राह्मणको दान नहीं देना चाहिये ॥ ३६—३८ ॥ असम्यक् चैव यद् दत्तमसम्यक् च प्रतिग्रहः । उभयं स्यादनर्थाय दातुरादातुरेव च ॥ ३९ ॥ 'जो उत्तम विधिसे दिया न गया हो तथा जिसे उत्तम विधिके साथ ग्रहण न किया गया हो, वह देना और लेना दोनों ही देने और लेनेवालेके लिये अनर्थकारी होते हैं ॥ ३९ ॥ यथा खदिरमालम्ब्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् । मज्जेत मज्जतस्तद्वद् दाता यश्च प्रतिग्रही ॥ ४० ॥ 'जैसे खैरकी लकड़ी या पत्थरकी शिलाका सहारा लेकर समुद्र पार करनेवाला मनुष्य बीचमें ही डूब जाता है, उसी प्रकार अविधिपूर्वक दान देने और लेनेवाले यजमान और पुरोहित दोनों डूब जाते हैं ॥ ४० ॥
काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते । तपःस्वाध्यायचारित्रैरेवं हीनः प्रतिग्रही ॥ ४१ ॥ ‘जैसे गीली लकड़ीसे ढकी हुई आग प्रज्वलित नहीं होती, उसी प्रकार तपस्या, स्वाध्याय तथा सदाचारसे हीन ब्राह्मण यदि दान ग्रहण कर ले तो वह उसे पचा नहीं सकता ॥ ४१ ॥
कपाले यद्वदापः स्युः श्वदृतौ च यथा पयः । आश्रयस्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम् ॥ ४२ ॥ ‘जैसे मनुष्यकी खोपड़ीमें भरा हुआ जल और कुत्तेकी खालमें रखा हुआ दूध आश्रयदोषसे अपवित्र होता है, उसी प्रकार सदाचारहीन ब्राह्मणका शास्त्रज्ञान भी आश्रय-स्थानके दोषसे दूषित हो जाता है ॥ ४२ ॥
निर्मन्त्रो निर्वृतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयकः । अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च ॥ ४३ ॥ ‘जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतुष्ट रहता है, उसे तथा व्रतशून्य दीन-हीनको भी दया करके दान देना चाहिये ॥ ४३ ॥
न वै देयमनुक्रोशाद् दीनायाप्यपकारिणे । आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुनः ॥ ४४ ॥ ‘पर जो दूसरोंका बुरा करनेवाला हो वह यदि दीन हो तो भी उसे दया करके नहीं देना चाहिये। यह शिष्टोंका आचार है और यही धर्म है ॥ ४४ ॥
निष्कारणं स्मृतं दत्तं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते । भवेद्पात्रदोषेण न चात्रास्ति विचारणा ॥ ४५ ॥ ‘वेदविहीन ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान अपात्रदोषसे निरर्थक हो जाता है, इसमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥ ४५ ॥
यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चानधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ ४६ ॥ ‘जैसे लकड़ीका हाथी और चामका बना हुआ मृग हो, उसी प्रकार वेदशास्त्रोंके अध्ययनसे शून्य ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र धारण करते हैं (परंतु नामके अनुसार काम नहीं देते) ॥ ४६ ॥
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला । शकुनिर्वाप्यपक्षः स्यान्निर्मन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥ ४७ ॥ ‘जैसे नपुंसक मनुष्य स्त्रियोंके पास जाकर निष्फल होता है, गाय गायसे ही संयुक्त होनेपर कोई फल नहीं दे सकती और जैसे बिना पंखका पक्षी उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे शून्य ब्राह्मण भी व्यर्थ ही होता है ॥ ४७ ॥
ग्रामो धान्यैर्यथा शून्यो यथा कूपश्च निर्जलः ।
यथा हुतमनग्नौ च तथैव स्यान्निराकृतौ ॥ ४८ ॥
‘जिस प्रकार अन्नहीन ग्राम, जलरहित कुँआ और राखमें की हुई आहुति व्यर्थ होती है, उसी प्रकार मूर्ख ब्राह्मणको दिया हुआ दान भी व्यर्थ ही है ॥ ४८ ॥
देवतानां पितॄणां च हव्यकव्यविनाशकः ।
शत्रुरर्थहरो मूर्खो न लोकान् प्राप्तुमर्हति ॥ ४९ ॥
‘मूर्ख ब्राह्मण देवताओंके यज्ञ और पितरोंके श्राद्धका नाश करनेवाला होता है। वह धनका अपहरण करनेवाला शत्रु है। वह दान देनेवालोंको उत्तम लोकमें नहीं पहुँचा सकता’ ॥ ४९ ॥
एतत् ते कथितं सर्वं यथावृत्तं युधिष्ठिर ।
समासेन महद्ध्येतच्छ्रोतव्यं भरतर्षभ ॥ ५० ॥
भरतभूषण युधिष्ठिर! यह सब वृत्तान्त तुम्हें यथावत् रूपसे थोड़ेमें बताया गया। यह महत्त्वपूर्ण प्रसंग सबको सुनना चाहिये ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये
षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
१-श्लेष्मातकके वैद्यकमें अनेक नाम आये हैं, उनमेंसे एक नाम ‘द्विजकुत्सित’ भी है। इससे सिद्ध होता है कि वह द्विजातिमात्रके लिये अभक्ष्य है।
२-मद्गु एक प्रकारके जलचर पक्षीका नाम है।
राजधर्मान् द्विजश्रेष्ठ चातुर्वर्ण्यस्य चाखिलान् ॥ १ ॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाराज युधिष्ठिरका नगरमें प्रवेश
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छामि भगवन् विस्तरेण महामुने ।
राजधर्मान् द्विजश्रेष्ठ चातुर्वर्ण्यस्य चाखिलान् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! महामुने! द्विजश्रेष्ठ! मैं चारों वर्णोंके सम्पूर्ण धर्मोंका तथा राजधर्मका भी विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
आपत्सु च यथा नीतिः प्रणेतव्या द्विजोत्तम ।
धर्म्यमालक्ष्य पन्थानं विजयेयं कथं महीम् ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आपत्तिकालमें मुझे कैसी नीतिसे काम लेना चाहिये? धर्मके अनुकूल मार्गपर दृष्टि रखते हुए मैं किस प्रकार इस पृथ्वीपर विजय पा सकता हूँ? ॥ २ ॥
प्रायश्चित्तकथा ह्येषा भक्ष्याभक्ष्यविवर्जिता ।
कौतूहलानुप्रवणा हर्षं जनयतीव मे ॥ ३ ॥
भक्ष्य और अभक्ष्यसे रहित, उपवासस्वरूप प्रायश्चित्तकी यह चर्चा बड़ी उत्सुकता पैदा करनेवाली है। यह मेरे हृदयमें हर्ष-सा उत्पन्न कर रही है ॥ ३ ॥
धर्मचर्या च राज्यं च नित्यमेव विरुध्यते ।
एवं मुह्यति मे चेतश्चिन्तयानस्य नित्यशः ॥ ४ ॥
एक ओर धर्मका आचरण और दूसरी ओर राज्यका पालन—ये दोनों सदा एक दूसरेके विरुद्ध हैं। यह सोचकर मुझे निरन्तर चिन्ता बनी रहती है और मेरे चित्तपर मोह छा रहा है ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तमुवाच महाराज व्यासो वेदविदां वरः ।
नारदं समभिप्रेक्ष्य सर्वज्ञानां पुरातनम् ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजीने सर्वज्ञ महात्माओंमें सबसे प्राचीन नारदजीकी ओर देखकर युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥
श्रोतुमिच्छसि चेद् धर्मं निखिलेन नराधिप ।
प्रैहि भीष्मं महाबाहो वृद्धं कुरुपितामहम् ॥ ६ ॥
‘महाबाहु नरेश्वर! यदि तुम धर्मका पूर्णरूपसे विवेचन सुनना चाहते हो तो कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मके पास जाओ ॥ ६ ॥
स ते धर्मरहस्येषु संशयान् मनसि स्थितान् । छेत्ता भागीरथीपुत्रः सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥ ७ ॥ ‘गङ्गापुत्र भीष्म सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं। वे धर्म-रहस्यके विषयमें तुम्हारे मनमें स्थित हुए सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करेंगे ॥ ७ ॥ जनयामास यं देवी दिव्या त्रिपथगा नदी । साक्षाद् ददर्श यो देवान् सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८ ॥ बृहस्पतिपुरोगांस्तु देवर्षीनसकृत् प्रभुः । तोषयित्वोपचारेण राजनीतिमधीतवान् ॥ ९ ॥ ‘जिन्हें दिव्य नदी त्रिपथगा गङ्गादेवीने जन्म दिया है, जिन्होंने इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका साक्षात् दर्शन किया है तथा जिन शक्तिशाली भीष्मने बृहस्पति आदि देवर्षियोंको बारम्बार अपनी सेवाद्वारा संतुष्ट करके राजनीतिका अध्ययन किया है, उनके पास चलो ॥ ८-९ ॥ उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च देवगुरुर्द्विजः । तच्च सर्वं सव्याख्यं प्राप्तवान् कुरुसत्तमः ॥ १० ॥ ‘शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं तथा देवगुरु विप्रवर बृहस्पतिको जिस शास्त्रका ज्ञान है, वह सम्पूर्ण शास्त्र कुरुश्रेष्ठ भीष्मने व्याख्यासहित प्राप्त किया है ॥ १० ॥ भार्गवाच्च्यवनाच्चापि वेदानङ्गोपबृंहितान् । प्रतिपेदे महाबाहुर्वसिष्ठाच्चरितव्रतः ॥ ११ ॥ ‘ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके महाबाहु भीष्मने भृगुवंशी च्यवन तथा महर्षि वसिष्ठसे वेदाङ्गोंसहित वेदोंका अध्ययन किया है ॥ ११ ॥ पितामहसुतं ज्येष्ठं कुमारं दीप्ततेजसम् । अध्यात्मगतितत्त्वज्ञमुपाशिक्षत यः पुरा ॥ १२ ॥ ‘इन्होंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र उद्दीप्त तेजस्वी सनत्कुमारजीसे, जो अध्यात्मगतिके तत्त्वको जाननेवाले हैं, अध्यात्मज्ञानकी शिक्षा पायी थी ॥ १२ ॥ मार्कण्डेयमुखात् कृत्स्नं यतिधर्ममवाप्तवान् । रामादस्त्राणि शक्राच्च प्राप्तवान् पुरुषर्षभः ॥ १३ ॥ ‘पुरुषप्रवर भीष्मने मार्कण्डेयजीके मुखसे सम्पूर्ण यतिधर्मका ज्ञान प्राप्त किया है और परशुराम तथा इन्द्रसे अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी है ॥ १३ ॥ मृत्युरात्मेच्छया यस्य जातस्य मनुजेष्वपि । तथानपत्यस्य सतः पुण्यलोका दिवि श्रुताः ॥ १४ ॥ ‘मनुष्योंमें उत्पन्न होकर भी इन्होंने मृत्युको अपनी इच्छाके अधीन कर लिया है। संतानहीन होनेपर भी उनको प्राप्त होनेवाले पुण्य-लोक देवलोकमें विख्यात हैं ॥ १४ ॥ यस्य ब्रह्मर्षयः पुण्या नित्यमासन् सभासदः ।
यस्य नाविदितं किंचिज्ज्ञानयज्ञेषु विद्यते ॥ १५ ॥ 'पुण्यात्मा ब्रह्मर्षि सदा उनके सभासद रहे हैं। ज्ञानयज्ञमें कोई भी ऐसी बात नहीं है, जिसका उन्हें ज्ञान न हो ॥ १५ ॥
स ते वक्ष्यति धर्मज्ञः सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्ववित् । तमभ्येहि पुरा प्राणान् स विमुञ्चति धर्मवित् ॥ १६ ॥ 'सूक्ष्म धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले वे धर्मवेत्ता भीष्म तुम्हें धर्मका उपदेश देंगे। वे धर्मज्ञ महात्मा अपने प्राणोंका परित्याग करें, इसके पहले ही तुम इनके पास चलो' ॥ १६ ॥
एवमुक्तस्तु कौन्तेयो दीर्घप्रज्ञो महामतिः । उवाच वदतां श्रेष्ठं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १७ ॥ उनके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् दूरदर्शी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने वक्ताओंमें श्रेष्ठ सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे कहा ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वैशसं सुमहत् कृत्वा ज्ञातीनां रोमहर्षणम् । आगस्कृत् सर्वलोकस्य पृथिवीनाशकारकः ॥ १८ ॥ घातयित्वा तमेवाजौ छलेनाजिह्मयोधिनम् । उपसम्प्रष्टुमर्हामि तमहं केन हेतुना ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर बोले—मुने! मैं अपने भाई-बन्धुओंका यह महान् एवं रोमाञ्चकारी संहार करके सम्पूर्ण लोकोंका अपराधी बन गया हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश किया है। भीष्मजी सरलतापूर्वक युद्ध करनेवाले थे तो भी मैंने युद्धमें उन्हें छलसे मरवा डाला। अब फिर उन्हींसे मैं अपनी शङ्काओंको पूछूँ, क्या इसके योग्य मैं रह गया हूँ? अब मैं किस हेतुसे उन्हें मुँह दिखा सकता हूँ? ॥ १८-१९ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्तं नृपतिश्रेष्ठं चातुर्वर्ण्यहितेप्सया । पुनराह महाबाहुर्यदुश्रेष्ठो महामतिः ॥ २० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब परम बुद्धिमान् महाबाहु यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने चारों वर्णोंके हितकी इच्छासे नृपतिशिरोमणि युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
नेदानीमतिनिबन्धं शोके त्वं कर्तुमर्हसि । यदाह भगवान् व्यासस्तत् कुरुष्व नृपोत्तम ॥ २१ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**नृपश्रेष्ठ! अब आप अत्यन्त हठपूर्वक शोकको ही पकड़े न रहें। भगवान् व्यास जो आज्ञा देते हैं, वही करें॥ २१॥
ब्राह्मणास्त्वां महाबाहो भ्रातरश्च महौजसः।
पर्जन्यमिव घर्मान्ते नाथमाना उपासते॥ २२॥
महाबाहो! जैसे वर्षाकालमें लोग मेघकी ओर टकटकी लगाये देखते हैं—उससे जलकी याचना करते हैं, उसी प्रकार ये सारे ब्राह्मण और आपके ये महातेजस्वी भाई आपसे धैर्य धारण करनेकी प्रार्थना करते हुए आपके पास बैठे हैं॥ २२॥
हतशिष्टाश्च राजानः कृत्स्नं चैव समागतम्।
चातुर्वर्ण्यं महाराज राष्ट्रं ते कुरुजाङ्गलम्॥ २३॥
महाराज! मरनेसे बचे हुए राजालोग और चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे युक्त यह सारा कुरुजाङ्गल देश इस समय आपकी सेवामें उपस्थित है॥ २३॥
प्रियार्थमपि चैतेषां ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
नियोगादस्य च गुरोर्व्यासस्यामिततेजसः॥ २४॥
सुहृदामस्मदादीनां द्रौपद्याश्च परंतप।
कुरु प्रियममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु॥ २५॥
शत्रुओंको मारने और संताप देनेवाले नरेश! इन महामना ब्राह्मणोंका प्रिय करनेके लिये भी आपको इनकी बात मान लेनी चाहिये। आप अमित तेजस्वी गुरुदेव व्यासकी आज्ञासे हम सुहृदोंका और द्रौपदीका प्रिय कीजिये तथा सम्पूर्ण जगत्के हितसाधनमें लग जाइये॥ २४-२५॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स कृष्णेन राजा राजीवलोचनः।
हितार्थं सर्वलोकस्य समुत्तस्थौ महामनाः॥ २६॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कमलनयन महामनस्वी राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये उठ खड़े हुए॥ २६॥
सोऽनुनीतो नरव्याघ्र विष्टरश्रवसा स्वयम्।
द्वैपायनेन च तथा देवस्थानेन जिष्णुना॥ २७॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिरनुनीतो युधिष्ठिरः।
व्यजहान्मानसं दुःखं संतापं च महायशाः॥ २८॥
पुरुषसिंह! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण, द्वैपायन व्यास, देवस्थान, अर्जुन तथा अन्य बहुत-से लोगोंके समझाने-बुझाने पर महायशस्वी युधिष्ठिरने मानसिक दुःख और संतापको त्याग दिया॥ २७-२८॥
श्रुतवाक्यः श्रुतनिधिः श्रुतश्रव्यविशारदः।
व्यवस्य मनसः शान्तिमगच्छत् पाण्डुनन्दनः ॥ २९ ॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रेष्ठ पुरुषोंके उपदेशको सुना था। वेद-शास्त्रोंके ज्ञानकी तो वे निधि ही थे। सुने हुए शास्त्रों तथा सुनने योग्य नीतिग्रन्थोंके विचारमें भी वे कुशल थे। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय करके मनमें पूर्ण शान्ति पा ली थी ॥ २९ ॥
स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य स्वपुरं प्रविवेश ह ॥ ३० ॥ नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान राजा युधिष्ठिर वहाँ आये हुए सब लोगोंसे घिरकर धृतराष्ट्रको आगे करके अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चल दिये ॥ ३० ॥
प्रविविक्षुः स धर्मज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च सहस्रशः ॥ ३१ ॥ ततो नवं रथं शुभ्रं कम्बलाजिनसंवृतम् । युक्तं षोडशभिर्गोभिः पाण्डुरैः शुभलक्षणैः ॥ ३२ ॥ मन्त्रैरभ्यर्चितं पुण्यैः स्तूयमानश्च बन्दिभिः । आरुरोह यथा देवः सोमोऽमृतमयं रथम् ॥ ३३ ॥ नगरमें प्रवेश करते समय धर्मज्ञ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने देवताओं तथा सहस्रों ब्राह्मणोंका पूजन किया। तदनन्तर कम्बल और मृगचर्मसे ढके हुए एक नूतन उज्ज्वल रथपर जिसकी पवित्र मन्त्रोंद्वारा पूजा की गयी थी तथा जिसमें शुभ लक्षणसम्पन्न सोलह सफेद बैल जुते हुए थे, वे बन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए उसी प्रकार सवार हुए, जैसे चन्द्रदेव अपने अमृतमय रथपर आरूढ़ होते हैं ॥ ३१-३३ ॥
जग्राह रश्मीन् कौन्तेयो भीमो भीमपराक्रमः । अर्जुनः पाण्डुरं छत्रं धारयामास भानुमत् ॥ ३४ ॥ भयानक पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीमसेनने उन बैलोंकी रास सँभाली। अर्जुनने तेजस्वी श्वेत छत्र धारण किया ॥
ध्रियमाणं च तच्छत्रं पाण्डुरं रथमूर्धनि । शुशुभे तारकाकीर्णं सितमभ्रमिवाम्बरे ॥ ३५ ॥ रथके ऊपर तना हुआ वह श्वेत छत्र आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त श्वेत बादलके समान शोभा पाता था ॥
चामरव्यजने त्वस्य वीरौ जगृहतुस्तदा । चन्द्ररश्मिप्रभे शुभ्रे माद्रीपुत्रावलंकृते ॥ ३६ ॥ उस समय माद्रीके वीर पुत्र नकुल और सहदेवने चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमकीले रत्नभूषित श्वेत चँवर और व्यजन हाथोंमें ले लिये ॥ ३६ ॥
ते पञ्च रथमास्थाय भ्रातरः समलंकृताः । भूतानीव समस्तानि राजन् ददृशिरे तदा ॥ ३७ ॥
राजन्! वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुए वे पाँचों भाई रथपर बैठकर मूर्तिमान् पाँच महाभूतोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥ आस्थाय तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्मनोजवैः । अन्वयात् पृष्ठतो राजन् युयुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ॥ ३८ ॥ नरेश्वर! मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए शुभ्र रथपर आरूढ़ हो युयुत्सु ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चले ॥ ३८ ॥ रथं हेममयं शुभ्रं शैब्यसुग्रीवयोजितम् । सह सात्यकिना कृष्णः समास्थायान्वयात् कुरून् ॥ ३९ ॥ शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए सुन्दर सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सात्यकिसहित श्रीकृष्ण भी कौरवोंके पीछे-पीछे गये ॥ ३९ ॥ नरयानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत । अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो ययौ ॥ ४० ॥ भरतनन्दन! कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरके ज्येष्ठ पिता (ताऊ) गान्धारीसहित पालकीमें बैठकर उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥ ४० ॥ कुरुस्त्रियश्च ताः सर्वाः कुन्ती कृष्णा तथैव च । यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ॥ ४१ ॥ इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुलकी वे सभी स्त्रियाँ यथायोग्य भिन्न-भिन्न सवारियोंपर चढ़कर चल रही थीं। इनके पीछे विदुरजी थे, जो इन सबकी देखभाल करते थे ॥ ४१ ॥ ततो रथाश्च बहुला नागाश्चाश्वसमलंकृताः । पादाताश्च हयाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ॥ ४२ ॥ तदनन्तर इन सबके पीछे हाथी और घोड़ोंसे विभूषित बहुतसे रथी, पैदल और घुड़सवार सैनिक चल रहे थे ॥ ४२ ॥ ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः । स्तूयमानो ययौ राजा नगरं नागसाह्वयम् ॥ ४३ ॥ इस प्रकार वैतालिकों, सूतों और मागधोंद्वारा सुन्दर वाणीमें अपनी स्तुति सुनते हुए राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ४३ ॥ तत् प्रयाणं महाबाहोर्बभूवाप्रतिमं भुवि । आकुलाकुलमुत्कृष्टं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४४ ॥ महाबाहु युधिष्ठिरकी यह सामूहिक यात्रा (जुलूस) इस भूतलपर अनुपम थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे। भीड़-पर-भीड़ बढ़ती चली जाती थी और बड़े जोरसे जयघोष एवं कोलाहल हो रहा था ॥ ४४ ॥ अभियाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः ।
नगरं राजमार्गाश्च यथावत्समलङ्कृताः ॥ ४५ ॥
राजा युधिष्ठिरकी इस यात्राके समय नगरनिवासी मनुष्योंने समूचे नगर तथा वहाँकी सड़कोंको अच्छी तरहसे सजा दिया था ॥ ४५ ॥
पाण्डुरेण च माल्येन पताकाभिश्च मेदिनी ।
संस्कृतो राजमार्गोऽभूद्धूपनैश्च प्रधूपितः ॥ ४६ ॥
सफेद मालाओं तथा पताकाओंसे नगरभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी। राजमार्गको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था और धूपोंकी सुगन्ध फैलायी गयी थी ॥ ४६ ॥
अथ चूर्णैश्च गन्धानां नानापुष्पप्रियङ्गुभिः ।
माल्यदामभिरासक्तै राजवेश्माभिसंवृतम् ॥ ४७ ॥
राजमहलके आस-पास चारों ओर सुगन्धित चूर्ण बिखेरे गये थे, नाना प्रकारके फूलों, बेलों और पुष्पहारोंकी बन्दनवारोंसे उसे अच्छी तरह सुसज्जित किया गया था ॥ ४७ ॥
कुम्भाश्च नगरद्वारि वारिपूर्णा नवा दृढाः ।
सिताः सुमनसो गौराः स्थापितास्तत्र तत्र ह ॥ ४८ ॥
नगरके द्वारपर जलसे भरे हुए नूतन एवं सुदृढ़ कलश रखे गये थे और जगह-जगह सफेद फूलोंके गुच्छे रख दिये गये थे ॥ ४८ ॥
तथा स्वलंकृतद्वारं नगरं पाण्डुनन्दनः ।
स्तूयमानः शुभैर्वाक्यैः प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ ४९ ॥
अपने सुहृदोंसे घिरे हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार सजे सजाये द्वारवाले नगर—हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। उस समय सुन्दर वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशे
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका
नगरप्रवेशविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 263)
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध
वैशम्पायन उवाच
प्रवेशने तु पार्थानां जनानां पुरवासिनाम् ।
दिदृक्षूणां सहस्राणि समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुन्ती-पुत्रोंके हस्तिनापुरमें प्रवेश करते समय उन्हें देखनेके लिये दस लाख नगरनिवासी सड़कोंपर एकत्र हो गये ॥ १ ॥
स राजमार्गः शुशुभे समलंकृतचत्वरः ।
यथा चन्द्रोदये राजन् वर्धमानो महोदधिः ॥ २ ॥
राजन्! जैसे चन्द्रोदय होनेपर महासागर उमड़ने लगता है, उसी प्रकार जिसके चौराहे खूब सजाये गये थे, वह राजमार्ग मनुष्योंकी उमड़ती हुई भीड़से बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २ ॥
गृहाणि राजमार्गेषु रत्नवन्ति महान्ति च ।
प्राकम्पन्तेव भारेण स्त्रीणां पूर्णानि भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! सड़कोंके आस-पास जो रत्नविभूषित विशाल भवन थे, वे स्त्रियोंसे भरे होने के कारण उनके भारी भारसे काँपते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ३ ॥
ताः शनैरिव सव्रीडं प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ।
भीमसेनार्जुनौ चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ४ ॥
वे नारियाँ लजाती हुई-सी धीरे-धीरे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा पाण्डुपुत्र माद्रीकुमार नकुल सहदेवकी प्रशंसा करने लगीं ॥ ४ ॥
धन्या त्वमसि पाञ्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् ।
उपतिष्ठसि कल्याणि महर्षीनिव गौतमी ॥ ५ ॥
तव कर्माण्यमोघानि व्रतचर्या च भाविनि ।
वे बोलीं—‘कल्याणि! पाञ्चालराजकुमारी! तुम धन्य हो, जो इन पाँच महान् पुरुषोंकी सेवामें उसी प्रकार उपस्थित रहती हो, जैसे गौतमवंशमें उत्पन्न हुई जटिला अनेक महर्षियोंकी सेवा करती हैं। भाविनि! तुम्हारे सभी पुण्यकर्म अमोघ हैं और समस्त व्रतचर्या सफल है' ॥ ५ ½ ॥
इति कृष्णां महाराज प्रशशंसुस्तदा स्त्रियः ॥ ६ ॥ प्रशंसावचनैस्तासां मिथःशब्दैश्च भारत । प्रीतिजैश्च तदा शब्दैः पुरमासीत् समाकुलम् ॥ ७ ॥ महाराज! इस प्रकार उस समय सारी स्त्रियाँ द्रुपदकुमारी कृष्णाकी प्रशंसा करती थीं। भारत! एक दूसरेके प्रति कहे जानेवाले उनके प्रशंसा-वचनों और प्रीतिजनित शब्दोंसे उस समय सारा नगर व्याप्त हो रहा था ॥ ६-७ ॥ तमतीत्य यथायुक्तं राजमार्गं युधिष्ठिरः । अलंकृतं शोभमानमुपायाद् राजवेश्म ह ॥ ८ ॥ राजन्! उस सजे सजाये शोभासम्पन्न राजमार्गको यथोचित रूपसे लाँघकर राजा युधिष्ठिर राजभवनके समीप जा पहुँचे ॥ ८ ॥ ततः प्रकृतयः सर्वाः पौरा जानपदास्तदा । ऊचुः कर्णसुखा वाचः समुपेत्य ततस्ततः ॥ ९ ॥ तदनन्तर मन्त्री-सेनापति आदि प्रकृतिवर्गके सभी लोग, नगरवासी और जनपदनिवासी मनुष्य इधर-उधरसे आकर कानोंको सुख देनेवाली बातें कहने लगे— ॥ ९ ॥ दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र शत्रून् शत्रुनिषूदन । दिष्ट्या राज्यं पुनः प्राप्तं धर्मेण च बलेन च ॥ १० ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाले राजेन्द्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप विजयी हो रहे हैं, आपने धर्मके प्रभाव तथा बलसे अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया—यह बड़े हर्षका विषय है ॥ १० ॥ भव नस्त्वं महाराज राजेह शरदां शतम् । प्रजाः पालय धर्मेण यथेन्द्रस्त्रिदिवं तथा ॥ ११ ॥ 'महाराज! आप सैकड़ों वर्षोंतक हमारे राजा बने रहें। जैसे इन्द्र स्वर्गलोकका पालन करते हैं, उसी प्रकार आप भी धर्मपूर्वक अपनी प्रजाकी रक्षा करें' ॥ ११ ॥ एवं राजकुलद्वारे मङ्गलैरभिपूजितः । आशीर्वादान् द्विजैरुक्तान् प्रतिगृह्य समन्ततः ॥ १२ ॥ प्रविश्य भवनं राजा देवराजगृहोपमम् । श्रद्धाविजयसंयुक्तं रथात् पश्चादवातरत् ॥ १३ ॥ इस प्रकार राजकुलके द्वारपर माङ्गलिक द्रव्योंद्वारा पूजित हो ब्राह्मणोंके दिये हुए आशीर्वाद सब ओरसे ग्रहण करके राजा युधिष्ठिर देवराज इन्द्रके महलके समान राजभवनमें प्रविष्ट हुए, जो श्रद्धा और विजयसे सम्पन्न था। वहाँ पहुँचकर वे रथसे नीचे उतरे ॥ प्रविश्याभ्यन्तरं श्रीमान् दैवतान्यभिगम्य च । पूजयामास रत्नैश्च गन्धमाल्यैश्च सर्वशः ॥ १४ ॥
राजमहलके भीतर प्रवेश करके श्रीमान् नरेशने कुलदेवताओंका दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदिसे सर्वथा उनकी पूजा की ।। १४ ।।
निष्चक्राम ततः श्रीमान् पुनरेव महायशाः ।
ददर्श ब्राह्मणांश्चैव सोऽभिरूपानवस्थितान् ॥ १५ ॥
इसके बाद महायशस्वी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर महलसे बाहर निकले। वहाँ उन्हें बहुत-से ब्राह्मण खड़े दिखायी दिये, जो हाथमें मङ्गलद्रव्य लिये खड़े थे ।। १५ ।।
स संवृतस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः ।
शुशुभे विमलश्चन्द्रस्तारागणवृतो यथा ॥ १६ ॥
जैसे तारोंसे घिरे हुए निर्मल चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार आशीर्वाद देनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी ।। १६ ।।
तांस्तु वै पूजयामास कौन्तेयो विधिवद् द्विजान् ।
धौम्यं गुरुं पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च ॥ १७ ॥
कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने गुरु धौम्य तथा ताऊ धृतराष्ट्रको आगे करके उन सभी ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन किया ।। १७ ।।
सुमनोमोदकै रत्नैर्हिरण्येन च भूरिणा ।
गोभिर्वस्त्रैश्च राजेन्द्र विविधैश्च किमिच्छकैः ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! इन्होंने फूल, मिठाई, रत्न, बहुत-से सुवर्ण, गौओं, वस्त्रों तथा उनकी इच्छा पूछ-पूछ कर मँगाये हुए नाना प्रकारके मनोवाञ्छित पदार्थोंद्वारा उन सबका यथोचित सत्कार किया ।। १८ ।।
ततः पुण्याहघोषोऽभूद् दिवं स्तब्ध्वेव भारत ।
सुहृदां प्रीतिजननः पुण्यः श्रुतिसुखावहः ॥ १९ ॥
भारत! इसके बाद पुण्याहवाचनका गम्भीर घोष होने लगा, जो आकाशको स्तब्ध-सा किये देता था। वह पवित्र शब्द कानोंको सुख देनेवाला तथा सुहृदोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला था ।। १९ ।।
हंसवद् विदुषां राजन् द्विजानां तत्र भारती ।
शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा ॥ २० ॥
राजन्! उस समय वेदवेत्ता विद्वान् ब्राह्मणोंने हंसके समान हर्ष-गद्गद स्वरसे जो प्रचुर अर्थ, पद एवं अक्षरोंसे युक्त वाणी कही थी, वह वहाँ सबको स्पष्ट सुनायी दे रही थी ।। २० ।।
ततो दुन्दुभिनिर्घोषः शंखानां च मनोरमः ।
जयं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नृप ॥ २१ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर दुन्दुभियों और शंखोंकी मनोरम ध्वनि होने लगी, जय-जयकार करनेवालोंका गम्भीर घोष वहाँ प्रकट होने लगा ।। २१ ।।
निःशब्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुनः । राजानं ब्राह्मणच्छद्मा चार्वाको रक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥ जब सब ब्राह्मण चुपचाप खड़े हो गये, तब ब्राह्मणका वेष बनाकर आया हुआ चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ २२ ॥ तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृतः । साक्षः शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वसः ॥ २३ ॥ वह दुर्योधनका मित्र था। उसने संन्यासी ब्राह्मणके वेषमें अपने असली रूपको छिपा रखा था। उसके हाथमें अक्षमाला थी और मस्तकपर शिखा। उसने त्रिदण्ड धारण कर रखा था। वह बड़ा ढीठ और निर्भय था ॥ २३ ॥ वृतः सर्वैस्तथा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः । परःसहस्रै राजेन्द्र तपोनियमसंवृतैः ॥ २४ ॥ स दुष्टः पापमाशंसुः पाण्डवानां महात्मनाम् । अनामन्त्र्यैव तान् विप्रंस्तमुवाच महीपतिम् ॥ २५ ॥ राजेन्द्र! तपस्या और नियममें लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजारसे भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवोंका विनाश चाहता था। उसने उन सब ब्राह्मणोंसे अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ २४-२५ ॥
चार्वाक उवाच इमे प्राहुर्द्विजाः सर्वे समारोप्य वचो मयि । धिग् भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै ॥ २६ ॥ किं तेन स्याद्धि कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् । घातयित्वा गुरूंच्छैव मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ २७ ॥ चार्वाक बोला— राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं—'कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई-बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो। तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु-बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं' ॥ २६-२७ ॥ इति ते वै द्विजाः श्रुत्वा तस्य दुष्टस्य रक्षसः । विव्यथुश्चक्रुशुश्चैव तस्य वाक्यप्रधर्षिताः ॥ २८ ॥ वे ब्राह्मण उस दुष्ट राक्षसकी यह बात सुनकर उसके वचनोंसे तिरस्कृत हो व्यथित हो उठे और मन-ही-मन उसके कथनकी निन्दा करने लगे ॥ २८ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे स च राजा युधिष्ठिरः ।
व्रीडिताः परमोद्विग्नास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ २९ ॥ प्रजानाथ! इसके बाद वे सभी ब्राह्मण तथा राजा युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और लज्जित हो गये। प्रतिवादके रूपमें उनके मुँहसे एक शब्द भी नहीं निकला। वे सभी कुछ देरतक चुप रहे ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभियाचतः । प्रत्यासन्नव्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने कहा—ब्राह्मणो! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके विनीतभावसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। इस समय मुझपर सब ओरसे बड़ी भारी विपत्ति आ गयी है; अतः आपलोग मुझे धिक्कार न दें ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो राजन् ब्राह्मणास्ते सर्व एव विशाम्पते । ऊचुर्नैतद् वचोऽस्माकं श्रीरस्तु तव पार्थिव ॥ ३१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! प्रजानाथ! उनकी यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे—'महाराज! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो यह आशीर्वाद देते हैं कि 'आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे' ॥ ३१ ॥
जज्ञुश्चैव महात्मानस्ततस्तं ज्ञानचक्षुषा । ब्राह्मणा वेदविद्वांसस्तपोभिर्विमलीकृताः ॥ ३२ ॥ उन वेदवेत्ता ब्राह्मणोंका अन्तःकरण तपस्यासे निर्मल हो गया था। उन महात्माओंने ज्ञानदृष्टिसे उस राक्षसको पहचान लिया ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
एष दुर्योधनसखा चार्वाको नाम राक्षसः । परिव्राजकरूपेण हितं तस्य चिकीर्षति ॥ ३३ ॥ वयं ब्रूमो न धर्मात्मन् व्येतु ते भयमीदृशम् । उपतिष्ठतु कल्याणं भवन्तं भ्रातृभिः सह ॥ ३४ ॥ ब्राह्मण बोले—धर्मात्मन्! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासीके रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है। हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं। आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये। हम आशीर्वाद देते हैं कि 'भाइयोंसहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो' ॥ ३३-३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे हुंकारैः क्रोधमूर्च्छिताः ।
निर्भर्त्सयन्तः शुचयो निजघ्नुः पापराक्षसम् ॥ ३५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर क्रोधसे आतुर हुए उन सभी शुद्धात्मा ब्राह्मणोंने उस पापात्मा राक्षसको बहुत फटकारा और अपने हुङ्कारोंसे उसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥
स पपात विनिर्दग्धस्तेजसा ब्रह्मवादिनाम् ।
महेन्द्राशनिनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ ३६ ॥
ब्रह्मवादी महात्माओंके तेजसे दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रसे जलकर कोई अंकुरयुक्त वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ ३६ ॥
पूजिताश्च ययुर्विप्रा राजानमभिनन्द्य तम् ।
राजा च हर्षमापेदे पाण्डवः ससुहृज्जनः ॥ ३७ ॥
तत्पश्चात् राजाद्वारा पूजित हुए वे ब्राह्मण उनका अभिनन्दन करके चले गये और पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने सुहृदोंसहित बड़े हर्षको प्राप्त हुए ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवधेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चार्वाकका वधविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्तं भ्रातृभिः सह ।
उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सर्वदर्शी देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ भाइयोंसहित खड़े हुए राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ १ ॥
वासुदेव उवाच
ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम ।
एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः ॥ २ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**तात! इस संसारमें ब्राह्मण मेरे लिये सदा ही पूजनीय हैं। ये पृथ्वीपर विचरनेवाले देवता हैं। कुपित होने पर इनकी वाणीमें विषका-सा प्रभाव होता है। ये सहज ही प्रसन्न होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते हैं ॥ २ ॥
पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः ।
तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम् ॥ ३ ॥
राजन्! महाबाहो! पहले सत्ययुग की बात है, चार्वाक राक्षसने बहुत वर्षोंतक बद्रिकाश्रममें तपस्या की ॥ ३ ॥
वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! जब ब्रह्माजीने उससे बारंबार वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उसने यही वर माँगा कि मुझे किसी भी प्राणीसे भय न हो ॥ ४ ॥
द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद् वरमनुत्तमम् ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः ॥ ५ ॥
जगदीश्वर ब्रह्माजीने उसे यह परम उत्तम वर देते हुए कहा कि 'तुम्हें ब्राह्मणका अपमान करनेके सिवा और कहीं किसीसे भय नहीं है' इस तरह उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओरसे अभयदान दे दिया ॥ ५ ॥
स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः ।
राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः ॥ ६ ॥
वर पाकर वह अमित पराक्रमी महाबली और दुःसह कर्म करनेवाला पापात्मा राक्षस देवताओंको संताप देने लगा ॥ ६ ॥