महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
आहवे तु हतं शूरं न शोचेत कथंचन ॥ ४४ ॥
अशोच्यो हि हतः शूरः स्वर्गलोके महीयते ।
युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरके लिये किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। वह मारा गया शूरवीर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, अतः कदापि शोचनीय नहीं है ॥ ४४ ½ ॥
न ह्यन्नं नोदकं तस्य न स्नानं नाप्यशौचकम् ॥ ४५ ॥
हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकान् शृणुष्व मे ।
युद्धमें मारे गये वीरके लिये उसके आत्मीयजन न तो स्नान करना चाहते हैं, न अशौचसम्बन्धी कृत्यका पालन, न अन्नदान (श्राद्ध) करनेकी इच्छा करते हैं, और न जलदान (तर्पण) करनेकी। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ४५ ½ ॥
वराप्सरःसहस्राणि शूरमायोधने हतम् ॥ ४६ ॥
त्वरमाणाभिधावन्ति मम भर्ता भवेदिति ।
युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरकी ओर सहस्रों सुन्दरी अप्सराएँ यह आशा लेकर बड़ी उतावलीके साथ दौड़ी जाती हैं कि यह मेरा पति हो जाय ॥ ४६ ½ ॥
एतत् तपश्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः ॥ ४७ ॥
चत्वारश्चाश्रमास्तस्य यो युद्धमनुपालयेत् ।
जो युद्धधर्मका निरन्तर पालन करता है, उसके लिये यही तपस्या, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमोंके नियमोंका पालन है ॥ ४७ ½ ॥
वृद्धबालौ न हन्तव्यौ न च स्त्री नैव पृष्ठतः ॥ ४८ ॥
तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् ।
युद्धमें वृद्ध, बालक और स्त्रियोंका वध नहीं करना चाहिये, किसी भागते हुएकी पीठमें आघात नहीं करना चाहिये, जो मुँहमें तिनका लिये शरण में आ जाय और कहने लगे कि मैं आपका ही हूँ, उसका भी वध नहीं करना चाहिये ॥ ४८ ½ ॥
जम्भं वृत्रं बलं पाकं शतमायं विरोचनम् ॥ ४९ ॥
दुर्वार्यं चैव नमुचिं नैकमायं च शम्बरम् ।
विप्रचित्तिं च दैतेयं दनोः पुत्रांश्च सर्वशः ।
प्रह्लादं च निहत्याजौ ततो देवाधिपोऽभवम् ॥ ५० ॥
जम्भ, वृत्रासुर, बलासुर, पाकासुर, सैकड़ों माया जाननेवाले विरोचन, दुर्जय वीर नमुचि, विविधमायाविशारद शम्बरासुर, दैत्यवंशी विप्रचित्ति, सम्पूर्ण दानवदल तथा प्रह्लादको भी युद्धमें मारकर मैं देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ ॥ ४९-५० ॥
भीष्म उवाच
इत्येतच्छक्रवचनं निशम्य प्रतिगृह्य च ।
योधानामात्मनः सिद्धिमम्बरीषोऽभिपन्नवान् ॥ ५१ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इन्द्रका यह वचन सुनकर राजा अम्बरीषने मन-ही-मन इसे स्वीकार किया और वे यह मान गये कि योद्धाओंको स्वतः सिद्धि प्राप्त होती है ।। ५१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्राम्बरीषसंवादे अष्टनवतितमोऽध्यायः ।। ९८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और अम्बरीषका संवादविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ १/२ श्लोक मिलाकर कुछ ७४ १/२ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 661)
नवनवतितमोऽध्यायः
शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रतर्दनो मैथिलश्च संग्रामं यत्र चक्रतुः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि किसी समय राजा प्रतर्दन तथा मिथिलेश्वर जनकने परस्पर संग्राम किया था ॥ १ ॥
यज्ञोपवीती संग्रामे जनको मैथिलो यथा ।
योधानुद्घर्षयामास तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! यज्ञोपवीतधारी मिथिलापति जनकने रणभूमिमें अपने योद्धाओंको जिस प्रकार उत्साहित किया था, वह सुनो ॥ २ ॥
जनको मैथिलो राजा महात्मा सर्वतत्त्ववित् ।
योधान् स्वान् दर्शयामास स्वर्गं नरकमेव च ॥ ३ ॥
मिथिलाके राजा जनक बड़े महात्मा और सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता थे। उन्होंने अपने योद्धाओंको योगबलसे स्वर्ग और नरकका प्रत्यक्ष दर्शन कराया और इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
अभीरूणामिमे लोका भास्वन्तो हन्त पश्यत ।
पूर्णा गन्धर्वकन्याभिः सर्वकामदुहोऽक्षयाः ॥ ४ ॥
‘वीरो! देखो, ये जो तेजस्वी लोक दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं। ये अविनाशी लोक असंख्य गन्धर्वकन्याओं (अप्सराओं) से भरे हुए हैं और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
इमे पलायमानानां नरकाः प्रत्युपस्थिताः ।
अकीर्तिः शाश्वती चैव यतितव्यमनन्तरम् ॥ ५ ॥
‘और देखो, ये जो तुम्हारे सामने नरक उपस्थित हुए हैं, युद्धमें पीठ दिखाकर भागनेवालोंको मिलते हैं। साथ ही इस जगत्में उनकी सदा रहनेवाली अपकीर्ति फैल जाती है; अतः अब तुम लोगोंको विजयके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥
तान् दृष्ट्वारीन् विजयत भूत्वा संत्यागबुद्धयः ।
नरकस्याप्रतिष्ठस्य मा भूत वशवर्तिनः ॥ ६ ॥
‘उन स्वर्ग और नरक दोनों प्रकारके लोकोंका दर्शन करके तुम लोग युद्धमें प्राण-विसर्जनके लिये दृढ़ निश्चयके साथ डट जाओ और शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो। जिसकी कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं है, उस नरकके अधीन न होओ ।। ६ ।।
त्यागमूलं हि शूराणां स्वर्गद्वारमनुत्तमम् ।
इत्युक्तास्ते नृपतिना योधाः परपुरंजय ।। ७ ।।
अजयन्त रणे शत्रून् हर्षयन्तो नरेश्वरम् ।
तस्मादात्मवता नित्यं स्थातव्यं रणमूर्धनि ।। ८ ।।
‘शूरवीरोंको जो सर्वोत्तम स्वर्गलोकका द्वार प्राप्त होता है, उसमें उनका त्याग ही मूल कारण है’। शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले युधिष्ठिर! राजा जनकके ऐसा कहनेपर उन योद्धाओंने रणभूमिमें अपने महाराजका हर्ष बढ़ाते हुए उनके शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली; अतः मनस्वी वीरको सदा युद्धके मुहानेपर डटे रहना चाहिये ।। ७-८ ।।
गजानां रथिनो मध्ये रथानामनु सादिनः ।
सादिनामन्तरे स्थाप्यं पादातमपि दंशितम् ।। ९ ।।
गजारोहियोंके बीचमें रथियोंको खड़ा करे। रथियोंके पीछे घुड़सवारोंकी सेना रखे और उनके बीचमें कवच एवं अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित पैदलोंकी सेना खड़ी करे ।। ९ ।।
य एवं व्यूहते राजा स नित्यं जयति द्विषः ।
तस्मादेवं विधातव्यं नित्यमेव युधिष्ठिर ।। १० ।।
जो राजा अपनी सेनाका इस प्रकार व्यूह बनाता है, वह सदा शत्रुओंपर विजय पाता है; अतः युधिष्ठिर! तुम्हें भी सदा इसी प्रकार व्यूहरचना करनी चाहिये ।। १० ।।
सर्वे स्वर्गतिमिच्छन्ति सुयुद्धेनातिमन्यवः ।
क्षोभयेयुरनीकानि सागरं मकरा यथा ।। ११ ।।
सभी क्षत्रिय उत्तम युद्धके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं; अतः जैसे मकर समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं, उसी प्रकार वे अत्यन्त कुपित हो शत्रुओंकी सेनाओंमें हलचल मचा देते हैं ।। ११ ।।
हर्षयेयुर्विषण्णांश्च व्यवस्थाप्य परस्परम् ।
जितां च भूमिं रक्षेत् भग्नान् नात्यनुसारयेत् ।। १२ ।।
यदि अपने सैनिक विषादग्रस्त या शिथिल हो रहे हों तो उनका पूर्ववत् व्यूह बनाकर उन्हें परस्पर स्थापित करे और उन समस्त योद्धाओंका हर्ष एवं उत्साह बढ़ावे। जो भूमि जीत ली गयी हो, उसकी रक्षा करे; परंतु शत्रुओंके जो सैनिक पराजित होकर भाग रहे हों, उनका बहुत दूरतक पीछा नहीं करना चाहिये ।। १२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 663)
पुनरावर्तमानानां निराशानां च जीविते ।
वेगः सुदुःसहो राजंस्तस्मान्नात्यनुसारयेत् ॥ १३ ॥
राजन्! जो जीवनसे निराश होकर पुनः युद्धके लिये लौट पड़ते हैं, उनका वेग अत्यन्त दुःसह होता है; अतः भागते हुओंके पीछे अधिक नहीं पड़ना चाहिये ॥ १३ ॥
न हि प्रहर्तुमिच्छन्ति शूराः प्रद्रवतो भृशम् ।
तस्मात् पलायमानानां कुर्यान्नात्यनुसारणम् ॥ १४ ॥
शूरवीर जोर-जोरसे भागते हुए योद्धाओंपर प्रहार करना नहीं चाहते हैं; अतः पलायन करनेवाले सैनिकोंका अधिक दूरतक पीछा नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥
चराणामचरा ह्यन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ।
आपः पिपासतामन्नमन्नं शूरस्य कातराः ॥ १५ ॥
चलनेवाले प्राणियोंके अन्न हैं स्थावर, दाँतवाले जीवोंके अन्न हैं बिना दाँतके प्राणी, प्यासोंका अन्न है पानी और शूरवीरोंके अन्न हैं कायर ॥ १५ ॥
समानपृष्ठोदरपाणिपादाः
पराभवं भीरवो वै व्रजन्ति ।
अतो भयार्ताः प्रणिपत्य भूयः
कृत्वाञ्जलीनुपतिष्ठन्ति शूरान् ॥ १६ ॥
वीरों और कायरोंके पेट, पीठ, हाथ और पैर समान ही होते हैं; तो भी कायर पुरुष जगत्में अपमानको प्राप्त होते हैं। अतः भयसे आतुर हुए वे मनुष्य हाथ जोड़कर बारंबार प्रणाम करते हुए सदा शूरवीरोंकी शरणमें आते हैं ॥ १६ ॥
शूरबाहुषु लोकोऽयं लम्बते पुत्रवत् सदा ।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु शूरः सम्मानमर्हति ॥ १७ ॥
जैसे पुत्र सदा पितापर अवलम्बित होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् शूरवीरकी भुजाओंपर ही टिका हुआ है; इसलिये सभी अवस्थाओंमें वीर पुरुष सम्मान पानेके योग्य है ॥ १७ ॥
न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥
तीनों लोकोंमें शूरवीरतासे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। शूरवीर सबका पालन करता है और सारा जगत् उसीके आधारपर टिका हुआ है ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते
नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
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सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन
शततमोऽध्यायः
सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
यथा जयार्थिनः सेनां नयन्ति भरतर्षभ ।
ईषद् धर्मं प्रपीड्यापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ पितामह! विजया-भिलाषी राजालोग जिस प्रकार धर्मका थोड़ा-सा उल्लंघन करके भी अपनी सेनाको आगे ले जाते हैं, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सत्येन हि स्थितो धर्म उपपत्त्या तथा परे ।
साध्वाचारतया केचित् तथैवौपयिकादपि ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! किन्हींका मत है कि धर्म सत्यसे ही स्थिर रहता है। दूसरे लोग युक्तिवादसे ही धर्मकी प्रतिष्ठा मानते हैं। किसी-किसीके मतमें श्रेष्ठ आचरणसे ही धर्मकी स्थिति है और कितने ही लोग यथासम्भव साम-दान आदि उपायोंके अवलम्बनसे भी धर्मकी प्रतिष्ठा स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
उपायधर्मान् वक्ष्यामि सिद्धार्थानर्थधर्मयोः ।
निर्मर्यादा दस्यवस्तु भवन्ति परिपन्थिनः ॥ ३ ॥
तेषां प्रतिविधातार्थं प्रवक्ष्याम्यथ नैगमम् ।
कार्याणां सर्वसिद्ध्यर्थं तानुपायान् निबोध मे ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! अब मैं अर्थसिद्धिके साधनभूत धर्मोंका वर्णन करूँगा। यदि डाकू और लुटेरे अर्थ और धर्मकी मर्यादा तोड़ने लगें, तब उनके विनाशके लिये वेदोंमें जो साधन बताया गया है, उसका वर्णन आरम्भ करता हूँ। तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये उन उपायोंको मुझसे सुनो ॥ ३-४ ॥
उभे प्रज्ञे वेदितव्ये ऋज्वी वक्रा च भारत ।
जानन् वक्रां न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम् ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! बुद्धि दो प्रकारकी होती है। एक सरल, दूसरी कुटिल। राजाको उन दोनोंका ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जहाँतक सम्भव हो, जान-बूझकर कुटिल बुद्धिका सेवन न करे। यदि वैसी बुद्धि स्वतः आ जाय तो भी उसे हटानेका ही प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
अमित्रा एव राजानं भेदेनोपचरन्त्युत ।
तां राजा निकृतिं जानन् यथामित्रान् प्रबाधते ॥ ६ ॥
जो वास्तवमें मित्र नहीं हैं, वे ही भीतरसे राजाके अन्तरंग व्यक्तियोंमें फूट डालनेका प्रयत्न करते हुए ऊपरसे उसकी सेवामें लगे रहते हैं। राजा उनकी इस शठताको समझे और शत्रुओंकी भाँति उनको भी मिटानेका प्रयत्न करे ॥ ६ ॥ गजानां पार्थ वर्माणि गोवृषाजगरानी च । शल्यकण्टकलोहानि तनुत्रचमराणि च ॥ ७ ॥ सितपीतानि शस्त्राणि संनाहाः पीतलोहिताः । नानारञ्जनरक्ताः स्युः पताकाः केतवश्च ह ॥ ८ ॥ ऋष्टयस्तोमराः खङ्गा निशिताश्च परश्वधाः । फलकान्यथ चर्माणि प्रतिकल्प्यान्यनेकशः ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! राजाको चाहिये कि वह गाय, बैल तथा अजगरके चमड़ोंसे हाथियोंकी रक्षाके लिये कवच बनवावे। इसके सिवा लोहेकी कीलें, लोहे, कवच, चँवर, चमकीले और पानीदार शस्त्र, पीले और लाल रंगके कवच, बहुरंगी ध्वजा-पताकाएँ, ऋष्टि, तोमर, खड्ग, तीखे फरसे, फलक और ढाल—इन्हें भारी संख्यामें तैयार कराकर सदा अपने पास रखे ॥ ७—९ ॥ अभिनीतानि शस्त्राणि योधाश्च कृतनिश्चयाः । चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्यां वा सेनायोगः प्रशस्यते ॥ १० ॥ यदि शस्त्र तैयार हों और योद्धा भी शत्रुओंसे भिड़नेका दृढ़ निश्चय कर चुके हों, तो चैत्र या मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाको सेनाका युद्धके लिये उद्यत होकर प्रस्थान करना उत्तम माना गया है ॥ १० ॥ पक्वसस्या हि पृथिवी भवत्यम्बुमती तदा । नैवातिशीतो नात्युष्णः कालो भवति भारत ॥ ११ ॥ क्योंकि उस समय खेती पक जाती है और भूतलपर जलकी प्रचुरता रहती है। भरतनन्दन! उस समय मौसम भी न तो अधिक ठंडा रहता है और न अधिक गरम ॥ ११ ॥ तस्मात् तदा योजयेत परेषां व्यसनेऽथवा । एते हि योगाः सेनायाः प्रशस्ताः परबाधने ॥ १२ ॥ इसलिये उसी समय चढ़ाई करे अथवा जिस समय शत्रु संकटमें हो, उसी अवसरपर उसपर आक्रमण कर दे। शत्रुओंको सेनाद्वारा बाधा पहुँचानेके लिये ये ही अवसर अच्छे माने गये हैं ॥ १२ ॥ जलवांस्तृणवान् मार्गः समो गम्यः प्रशस्यते । चारैः सुविदिताभ्यासः कुशलैर्वनगोचरैः ॥ १३ ॥ युद्धके लिये यात्रा करते समय मार्ग समतल और सुगम हो तथा वहाँ जल और घास आदि सुलभ हों तो अच्छा समझा जाता है। वनमें विचरनेवाले कुशल गुप्तचरोंको मार्गके
विषयमें विशेष जानकारी रहा करती है ॥ १३ ॥ न ह्यारण्येन शक्येत गन्तुं मृगगणैरिव । तस्मात् सेनासु तानेव योजयन्ति जयार्थिनः ॥ १४ ॥ वन्य पशुओंकी भाँति मनुष्य जंगलमें आसानीसे नहीं चल सकते; इसलिये विजयाभिलाषी राजा सेनाओंमें मार्गदर्शन करानेके लिये उन्हीं गुप्तचरोंको नियुक्त करते हैं ॥ १४ ॥ अग्रतः पुरुषानीकं शक्तं चापि कुलोद्भवम् । आवासस्तोयवान् दुर्गः पर्याकाशः प्रशस्यते ॥ १५ ॥ सेनामें सबसे आगे कुलीन एवं शक्तिशाली पैदल सिपाहियोंको रखना चाहिये। शत्रुसे बचावके लिये सैनिकोंके रहनेका स्थान या किला ऐसा होना चाहिये, जहाँ पहुँचना कठिन हो, जिसके चारों ओर जलसे भरी हुई खाई और ऊँचा परकोटा हो। साथ ही उसके चारों ओर खुला आकाश होना चाहिये ॥ १५ ॥ परेषामुपसर्पणं प्रतिषेधस्तथा भवेत् । आकाशात् तु वनाभ्याशं मन्यन्ते गुणवत्तरम् ॥ १६ ॥ बहुभिर्गुणजातैश्च ये युद्धकुशला जनाः । उपन्यासो भवेत् तत्र बलानां नातिदूरतः ॥ १७ ॥ उस स्थानपर शत्रुओंके आक्रमणको रोकनेके लिये सुविधा होनी चाहिये। युद्धकुशल पुरुष सेनाकी छावनी डालनेके लिये खुले मैदानकी अपेक्षा अनेक गुणोंके कारण जंगलके निकटवर्ती स्थानको अधिक लाभदायक मानते हैं। उस वनके समीप ही सेनाका पड़ाव डालना चाहिये ॥ १६-१७ ॥ उपन्यासावतरणं पदातीनां च गूहनम् । अथ शत्रुप्रतीघातमापदर्थं परायणम् ॥ १८ ॥ वहाँ व्यूह निर्माण करनेके लिये रथ और वाहनोंसे उतरना तथा पैदल सैनिकोंको छिपाकर रखना सम्भव है। वहाँ रहकर शत्रुओंके प्रहारका जवाब दिया जा सकता है और आपत्तिके समय छिप जानेका भी सुभीता रहता है ॥ सप्तर्षीन् पृष्ठतः कृत्वा युध्येयुरचला इव । अनेन विधिना शत्रून् जिगीषेतापि दुर्जयान् ॥ १९ ॥ योद्धाओंको चाहिये कि वे सप्तर्षियोंको पीछे रखकर पर्वतकी तरह अविचलभावसे युद्ध करें। इस विधिसे आक्रमण करनेवाला राजा दुर्जय शत्रुओंको भी जीतनेकी आशा कर सकता है ॥ १९ ॥ यतो वायुर्यतः सूर्यो यतः शुक्रस्ततो जयः । पूर्वं पूर्वं ज्याय एषां संनिपाते युधिष्ठिर ॥ २० ॥
जिस ओर वायु, जिस ओर सूर्य और जिस ओर शुक्र हों, उसी ओर पृष्ठभाग रखकर युद्ध करनेसे विजय प्राप्त होती है। युधिष्ठिर! यदि ये तीनों भिन्न-भिन्न दिशाओंमें हों तो इनमें पहला-पहला श्रेष्ठ है अर्थात् वायुको पीछे रखकर शेष दोको सामने रखते हुए भी युद्ध किया जा सकता है ॥ २० ॥
अकर्दमामनुदकाममर्यादामलोष्टकाम् ।
अश्वभूमिं प्रशंसन्ति ये युद्धकुशला जनाः ॥ २१ ॥
घुड़सवार सेनाके लिये युद्धकुशल पुरुष उसी भूमिकी प्रशंसा करते हैं, जिसमें कीचड़, पानी, बाँध और ढेले न हों ॥ २१ ॥
अपङ्का गर्तरहिता रथभूमिः प्रशस्यते ।
नीचद्रुमा महाकक्षा सोदका हस्तियोधिनाम् ॥ २२ ॥
रथसेनाके लिये वह भूमि अच्छी मानी गयी है, जहाँ कीचड़ और गड्ढे न हों। जिस भूमिमें नाटे वृक्ष, बहुत-से घास-फूस और जलाशय हों, वह गजारोही योद्धाओंके लिये अच्छी मानी गयी है ॥ २२ ॥
बहुदुर्गा महाकक्षा वेणुवेत्रसमाकुला ।
पदातीनां क्षमा भूमिः पर्वतोपवनानि च ॥ २३ ॥
जो भूमि अत्यन्त दुर्गम, अधिक घास-फूसवाली, बाँस और बेंतोंसे भरी हुई तथा पर्वत एवं उपवनोंसे युक्त हो, वह पैदल सेनाओंके योग्य होती है ॥ २३ ॥
पदातिबहुला सेना दृढा भवति भारत ।
रथाश्वबहुला सेना सुदिनेषु प्रशस्यते ॥ २४ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनामें पैदलोंकी संख्या बहुत अधिक हो, वह मजबूत होती है। जिसमें रथों और घोड़ोंकी संख्या बढ़ी हुई हो, वह सेना अच्छे दिनोंमें (जबकि वर्षा न होती हो) अच्छी मानी जाती है ॥ २४ ॥
पदातिनागबहुला प्रावृट्काले प्रशस्यते ।
गुणानेतान् प्रसंख्याय देशकालौ प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
बरसातमें वही सेना श्रेष्ठ समझी जाती है, जिसमें पैदलों और हाथीसवारोंकी संख्या अधिक हो। इन गुणोंका विचार करके देश और कालको दृष्टिमें रखते हुए सेनाका संचालन करना चाहिये ॥ २५ ॥
एवं संचिन्त्य यो याति तिथिनक्षत्रपूजितः ।
विजयं लभते नित्यं सेनां सम्यक् प्रयोजयन् ।
प्रसुप्तांस्तृषितान् श्रान्तान् प्रकीर्णान् नाभिघातयेत् ॥ २६ ॥
जो इन सब बातोंपर विचार करके शुभ तिथि और श्रेष्ठ नक्षत्रसे युक्त होकर शत्रुपर चढ़ाई करता है, वह सेनाका ठीक ढंगसे संचालन करके सदा ही विजयलाभ करता है। जो
लोग सो रहे हों, प्यासे हों, थक गये हों अथवा इधर-उधर भाग रहे हों, उनपर अघात न करे ।। २६ ।।
मोक्षे प्रयाणे चलने पानभोजनकालयोः । अतिक्षिप्तान् व्यतिक्षिप्तान् निहतान् प्रतनूकृतान् ।। २७ ।। सुविश्रब्धान् कृतारम्भानुपन्यासान् प्रतापितान् । बहिश्चरानुपन्यासान् कृतवेश्मानुसारिणः ।। २८ ।।
शस्त्र और कवच उतार देनेके बाद, युद्धस्थलसे प्रस्थान करते समय, घूमते-फिरते समय और खाने-पीनेके अवसरपर किसीको न मारे। इसी प्रकार जो बहुत घबराये हुए हों, पागल हो गये हों, घायल हों, दुर्बल हो गये हों, निश्चिन्त होकर बैठे हों, दूसरे किसी काममें लगे हों, लेखनका कार्य करते हों, पीड़ासे संतप्त हों, बाहर घूम रहे हों, दूरसे सामान लाकर लोगोंके निकट पहुँचानेका काम करते हों अथवा छावनीकी ओर भागे जा रहे हों, उनपर भी प्रहार न करे ।। २७-२८ ।।
पारम्पर्यागते द्वारे ये केचिदनुवर्तिनः । परिचर्यावतो द्वारे ये च केचन वर्गिणः ।। २९ ।।
जो परम्परासे प्राप्त हुए राजद्वारपर रक्षा आदि सेवाका कार्य करते हों अथवा जो राजसेवक मन्त्री आदिके द्वारपर पहरा देते हों तथा किसी यूथके अधिपति हों, उनको भी नहीं मारना चाहिये ।। २९ ।।
अनीकं ये विभिन्दन्ति भिन्नं संस्थापयन्ति च । समानाशनपानास्ते कार्याः द्विगुणवेतनाः ।। ३० ।।
जो शत्रु की सेनाको छिन्न-भिन्न कर डालते हैं और अपनी तितर-बितर हुई सेनाको संगठित करके दृढ़तापूर्वक स्थापित करनेकी शक्ति रखते हैं, ऐसे लोगोंको राजा अपने समान ही भोजन-पानकी सुविधा देकर सम्मानित करे और उन्हें दुगुना वेतन दे ।। ३० ।।
दशाधिपतयः कार्याः शताधिपतयस्तथा । ततः सहस्राधिपतिं कुर्याच्छूरमतन्द्रितम् ।। ३१ ।।
सेनामें कुछ लोगोंको दस-दस सैनिकोंका नायक बनावे, कुछको सौका तथा किसी प्रमुख और आलस्यरहित वीरको एक हजार योद्धाओंका अध्यक्ष नियुक्त करे ।। ३१ ।।
यथामुख्यान् संनिपात्य वक्तव्याः संशपामहे । विजयार्थं हि संग्रामे न त्यक्ष्यामः परस्परम् ।। ३२ ।।
तत्पश्चात् मुख्य-मुख्य वीरोंको एकत्र करके यह प्रतिज्ञा करावे कि हम संग्राममें विजय प्राप्त करनेके लिये प्राण रहते एक-दूसरेका साथ नहीं छोड़ेंगे ।। ३२ ।।
इहैव ते निवर्तन्तां ये च केचन भीरवः । ये घातयेयुः प्रवरं कुर्वाणास्तुमुलं प्रति ।। ३३ ।।
जो लोग डरपोक हों, वे यहींसे लौट जायँ और जो लोग भयानक संग्राम करते हुए शत्रुपक्षके प्रधान वीरका वध कर सकें, वे ही यहाँ ठहरें ।। ३३ ।। न संनिपाते प्रदरं वधं वा कुर्युरीदृशाः । आत्मानं च स्वपक्षं च पालयन् हन्ति संयुगे ।। ३४ ।। क्योंकि ऐसे डरपोक मनुष्य घमासान युद्धमें शत्रुओंको न तो तितर-बितर करके भगा सकते हैं और न उनका वध ही कर सकते हैं। शूरवीर पुरुष ही युद्धमें अपनी और अपने पक्षके सैनिकोंकी रक्षा करता हुआ शत्रुओंका संहार कर सकता है ।। ३४ ।। अर्थनाशो वधोऽकीर्तिरयशश्च पलायने । अमनोज्ञासुखा वाचः पुरुषस्य पलायने ।। ३५ ।। सैनिकोंको यह भी समझा देना चाहिये कि युद्धके मैदानसे भागनेमें कई प्रकारके दोष हैं, एक तो अपने प्रयोजन और धनका नाश होता है। दूसरे भागते समय शत्रुके हाथसे मारे जानेका भय रहता है, तीसरे भागनेवालेकी निन्दा होती है और सब ओर उसका अपयश फैल जाता है। इसके सिवा युद्धसे भागनेपर लोगोंके मुखसे मनुष्यको तरह-तरहकी अप्रिय और दुःखदायिनी बातें भी सुननी पड़ती हैं ।। ३५ ।। प्रतिध्वस्तोष्ठदन्तस्य न्यस्तसर्वायुधस्य च । अमित्रैरवरुद्धस्य द्विषतामस्तु नः सदा ।। ३६ ।। जिसके ओठ और दाँत टूट गये हों, जिसने सारे अस्त्र-शस्त्रोंको नीचे डाल दिया हो तथा जिसे शत्रुगण सब ओरसे घेरकर खड़े हों, ऐसा योद्धा सदा हमारे शत्रुओंकी सेनामें ही रहे ।। ३६ ।। मनुष्यापसदा ह्येते ये भवन्ति पराङ्मुखाः । राशिवर्धनमात्रास्ते नैव ते प्रेत्य नो इह ।। ३७ ।। जो लोग युद्धमें पीठ दिखाते हैं, वे मनुष्योंमें अधम हैं; केवल योद्धाओंकी संख्या बढ़ानेवाले हैं। उन्हें इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुख नहीं मिलता ।। ३७ ।। अमित्रा हृष्टमनसः प्रत्युद्यान्ति पलायिनम् । जयिनस्तु नरास्तात चन्दनैर्मण्डनेन च ।। ३८ ।। शत्रु प्रसन्नचित्त होकर भागनेवाले योद्धाका पीछा करते हैं तथा तात! विजयी मनुष्य चन्दन और आभूषणोंद्वारा पूजित होते हैं ।। ३८ ।। यस्य स्म संग्रामगता यशो वै घ्नन्ति शत्रवः । तदसह्यतरं दुःखमहं मन्ये वधादपि ।। ३९ ।। संग्रामभूमिमें आये हुए शत्रु जिसके यशका नाश कर देते हैं। उसके लिये उस दुःखको मैं मरणसे भी बढ़कर असह्य मानता हूँ ।। ३९ ।। जयं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च । या भीरूणां परा ग्लानिः शूरस्तामधिगच्छति ।। ४० ।।
वीरो! तुम लोग युद्धमें विजयको ही धर्म एवं सम्पूर्ण सुखोंका मूल समझो। कायरों या डरपोक मनुष्योंको जिससे भारी ग्लानि होती है, वीर पुरुष उसी प्रहार और मृत्युको सहर्ष स्वीकार करता है ॥ ४० ॥ ते वयं स्वर्गमिच्छन्तः संग्रामे त्यक्तजीविताः । जयन्तो वध्यमाना वा प्राप्नुयाम च सद्गतिम् ॥ ४१ ॥ अतः तुम लोग यह निश्चय कर लो कि हम स्वर्गकी इच्छा रखकर संग्राममें अपने प्राणोंका मोह छोड़कर लड़ेंगे। या तो विजय प्राप्त करेंगे या युद्धमें मारे जाकर सद्गति पायेंगे ॥ ४१ ॥ एवं संशप्तशपथाः समभित्यक्तजीविताः । अमित्रवाहिनीं वीराः प्रतिगाहन्त्यभीरवः ॥ ४२ ॥ जो इस प्रकार शपथ लेकर जीवनका मोह छोड़ देते हैं, वे वीर पुरुष निर्भय होकर शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं ॥ ४२ ॥ अग्रतः पुरुषानीकमसिचर्मवतां भवेत् । पृष्ठतः शकटानीकं कलत्रं मध्यतस्तथा ॥ ४३ ॥ सेनाके कूच करते समय सबसे आगे ढाल-तलवार धारण करनेवाले पुरुषोंकी टुकड़ी रखे। पीछेकी ओर रथियोंकी सेना खड़ी करे और बीचमें राज-स्त्रियोंको रखे ॥ ४३ ॥ परेषां प्रतिघातार्थं पदातीनां च बृंहणम् । अपि तस्मिन् पुरे वृद्धा भवेयुर्ये पुरोगमाः ॥ ४४ ॥ उस नगरमें जो वृद्ध पुरुष अगुआ हों, वे शत्रुओंका सामना और विनाश करनेके लिये पैदल सैनिकोंको प्रोत्साहन एवं बढ़ावा दें ॥ ४४ ॥ ये पुरस्तादभिमताः सत्त्ववन्तो मनस्विनः । ते पूर्वमभिवर्तेरंश्चैतानेवेतरे जनाः ॥ ४५ ॥ जो पहलेसे ही अपने शौर्यके लिये सम्मानित, धैर्यवान् और मनस्वी हैं, वे आगे रहें और दूसरे लोग उन्हींके पीछे-पीछे चलें ॥ ४५ ॥ अपि चोद्धर्षणं कार्यं भीरूणामपि यत्नतः । स्कन्धदर्शनमात्रात्तु तिष्ठेयुर्वा समीपतः ॥ ४६ ॥ जो डरनेवाले सैनिक हों, उनका भी प्रयत्नपूर्वक उत्साह बढ़ाना चाहिये अथवा वे सेनाका विशेष समुदाय दिखानेके लिये ही आस-पास खड़े रहें ॥ ४६ ॥ संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद् बहून् । सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह ॥ ४७ ॥ यदि अपने पास थोड़े-से सैनिक हों तो उन्हें एक साथ संघबद्ध रखकर युद्ध करनेका आदेश देना चाहिये और यदि बहुत-से योद्धा हों तो उन्हें बहुत दूरतक इच्छानुसार फैलाकर
रखना चाहिये। थोड़े-से सैनिकोंको बहुतोंके साथ युद्ध करना हो तो उनके लिये सूचीमुख नामक व्यूह उपयोगी होता है ।। ४७ ।। सम्प्रयुक्ते निकृष्टे वा सत्यं वा यदि वानृतम् । प्रगृह्य बाहून् क्रोशेत भग्ना भग्नाः परे इति ॥ ४८ ॥ आगतं मे मित्रबलं प्रहरध्वमभीतवत् । अपनी सेना उत्कृष्ट अवस्थामें हो या निकृष्ट अवस्थामें, बात सच्ची हो या झूठी, हाथ ऊपर उठाकर हल्ला मचाते हुए कहे, 'वह देखो, शत्रु भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, हमारी मित्रसेना आ गयी। अब निर्भय होकर प्रहार करो' ।। ४८ १/२ ।। सत्त्ववन्तोऽभिधावेयुः कुर्वन्तो भैरवान् रवान् ॥ ४९ ॥ इतनी बात सुनते ही धैर्यवान् और शक्तिशाली वीर भयंकर सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़ें ।। ४९ ।। क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः । भेरीमृदङ्गपणवान् नादयेयुः पुराश्चरान् ॥ ५० ॥ जो लोग सेनाके आगे हों, उन्हें गर्जन-तर्जन करते और किलकारियाँ भरते हुए क्रकच, नरसिंहे, भेरी, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजाने चाहिये ।। ५० ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनानीतिकथने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनानीतिका वर्णनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।
भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन
एकाधिकशततमोऽध्यायः
भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
किंशीलाः किंसमाचाराः कथंरूपाश्च भारत ।
किंसन्नाहाः कथंशस्त्रा जनाः स्युः संगरे क्षमाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—‘भरतनन्दन! युद्धस्थलमें कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण और कैसे रूपवाले योद्धा ठीक समझे जाते हैं? उनके कवच और अस्त्र-शस्त्र भी कैसे होने चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
यथाऽऽचरितमेवात्र शस्त्रं पत्रं विधीयते ।
आचाराद् वीरपुरुषस्तथा कर्मसु वर्तते ॥ २ ॥
भीष्मजी बोले—‘राजन्! अस्त्र-शस्त्र और वाहन तो योद्धाओंके देश और कुलके आचारके अनुरूप ही होने चाहिये। वीर पुरुष अपने परम्परागत आचारके अनुसार ही सभी कार्योंमें प्रवृत्त होता है ॥ २ ॥
गान्धाराः सिन्धुसौवीरा नखरप्रासयोधिनः ।
अभीरवः सुबलिनस्तद्वलं सर्वपारगम् ॥ ३ ॥
गान्धार, सिन्धु और सौवीर देशके योद्धा नखर (बघनखे) और प्राससे युद्ध करनेवाले हैं। वे बड़े बलवान् और निडर होते हैं। उनकी सेना सबको लाँघ जानेवाली होती है ॥ ३ ॥
सर्वशस्त्रेषु कुशलाः सत्त्ववन्तो ह्युशीनराः ।
प्राच्या मातङ्गयुद्धेषु कुशलाः कूटयोधिनः ॥ ४ ॥
उशीनरदेशके वीर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंमें कुशल और बड़े बलशाली होते हैं। पूर्वदेशके योद्धा हाथीपर सवार होकर युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं। वे कपटयुद्धके भी ज्ञाता हैं ॥ ४ ॥
तथा यवनकाम्बोजा मथुरामभितश्च ये ।
एते नियुद्धकुशला दाक्षिणात्यासिपाणयः ॥ ५ ॥
यवन, काम्बोज और मथुराके आस-पासके रहनेवाले योद्धा मल्लयुद्धमें निपुण होते हैं। तथा दक्षिण देशोंके निवासी हाथोंमें तलवार लिये रहते हैं। (वे तलवार चलाना अच्छा जानते हैं) ॥ ५ ॥
सर्वत्र शूरा जायन्ते महासत्त्वा महाबलाः ।
प्राय एव समुद्दिष्ट लक्षणानि तु मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रायः सभी देशोंमें महान् धैर्यशाली, महाबली एवं शूरवीर पैदा होते हैं। उन सबका उल्लेख अधिकतर किया जा चुका है। अब तुम मुझसे उनके लक्षण सुनो ॥
सिंहशार्दूलवाङ्नेत्राः सिंहशार्दूलगामिनः । पारावतकुलिङ्गाक्षाः सर्वे शूराः प्रमाथिनः ॥ ७ ॥ जिनकी वाणी, नेत्र तथा चाल-ढाल सिंहों या बाघोंके समान होती है और जिनकी आँखें कबूतर या गौरैयेके समान होती हैं, वे सभी शूरवीर एवं शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥
मृगस्वरा द्वीपिनेत्रा ऋषभाक्षास्तरस्विनः । प्रमादिनश्च मन्दाश्च क्रोधनाः किङ्किणीस्वनाः ॥ ८ ॥ जिनका कण्ठस्वर मृगोंके समान और नेत्र बाघ एवं बैलोंके तुल्य होते हैं, वे वीर वेगशाली, असावधान और मूर्ख हुआ करते हैं। जिनका कण्ठनाद किंकिणीके समान मधुर हो, वे स्वभावके बड़े क्रोधी होते हैं ॥ ८ ॥
मेघस्वनाः क्रोधमुखाः केचित् करभसंनिभाः । जिह्मनासाग्रजिह्वाश्च दूरगा दूरपातिनः ॥ ९ ॥ जिनकी गर्जना मेघके समान, मुख क्रोधयुक्त, शरीर ऊँटकी तरह तथा नाक और जीभ टेढ़ी हो, वे बहुत दूरतक दौड़नेवाले तथा सुदूरवर्ती लक्ष्यको भी मार गिरानेवाले होते हैं ॥ ९ ॥
बिडालकुब्जतनवस्तनुकेशास्तनुत्वचः । शीघ्राश्चपलवृत्ताश्च ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १० ॥ जिनका शरीर बिलावके समान कुबड़ा तथा सिरके बाल और देहकी खाल पतले होते हैं, वे शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले चंचल और दुर्जय होते हैं ॥ १० ॥
गोधानिमीलिताः केचिन्मृदुप्रकृतयस्तथा । तरङ्गगतिनिर्घोषास्ते नराः पारयिष्णवः ॥ ११ ॥ जो गोहटीके समान आँखें बन्द किये रहते हैं, जिनका स्वभाव कोमल होता है तथा जिनके चलनेपर घोड़ेकी टाप पड़ने-जैसी आवाज होती है, वे मनुष्य युद्धके पार पहुँच जाते हैं ॥ ११ ॥
सुसंहताः सुतनवो व्यूढोरस्काः सुसंस्थिताः । प्रवादितेषु कुप्यन्ति हृष्यन्ति कलहेषु च ॥ १२ ॥ जिनके शरीर गठीले, छाती चौड़ी और अंग-प्रत्यंग सुडौल होते हैं, जो युद्धमें डटकर खड़े होनेवाले हैं, वे वीर पुरुष युद्धका धौंसा सुनते ही कुपित हो उठते हैं। उन्हें लड़ने-भिड़नेमें ही आनन्द आता है ॥ १२ ॥
गम्भीराक्षा निःसृताक्षाः पिङ्गाक्षा भ्रुकुटीमुखाः ।
नकुलाक्षास्तथा चैव सर्वे शूरास्तनुत्यजः ॥ १३ ॥
जिनकी आँखें गहरी हैं अथवा बड़ी होनेके कारण निकली हुई-सी प्रतीत होती हैं या जिनके नेत्र पिंगलवर्णके हैं अथवा जिनकी आँखें नेवलेके समान भूरी-भूरी हैं और जिनके मुखपर भौंहें तनी रहती हैं, ऐसे लक्षणोंवाले सभी मनुष्य शूरवीर तथा रणभूमिमें शरीरका त्याग करनेवाले होते हैं ॥ १३ ॥
जिह्माक्षाः प्रललाटाश्च निर्मांसहनवोऽपि च ।
वज्रबाह्वंगुलीचक्राः कृशा धमनिसंतताः ॥ १४ ॥
प्रविशन्ति च वेगेन साम्पराये ह्युपस्थिते ।
वारणा इव सम्मत्तास्ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १५ ॥
जिनकी आँखें तिरछी, ललाट ऊँचे और ठोड़ी मांसहीन एवं दुबली-पतली है, जिनकी भुजाओंपर वज्रका और अंगुलियोंपर चक्रका चिह्न होता है तथा जिनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं, वे युद्ध उपस्थित होते ही बड़े वेगसे शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं और मतवाले हाथियोंके समान शत्रुओंके लिये दुर्जय होते हैं ॥ १४-१५ ॥
दीप्तस्फुटितकेशान्ताः स्थूलपार्श्वहनुमुखाः ।
उन्नतांसाः पृथुग्रीवा विकटाः स्थूलपिण्डिकाः ॥ १६ ॥
उद्धता इव सुग्रीवा विनताविहगा इव ।
पिण्डशीर्षातिवक्त्राश्च वृषदंशमुखास्तथा ॥ १७ ॥
उग्रस्वरा मन्युमन्तो युद्धेष्वारावसारिणः ।
अधर्मज्ञावलिप्ताश्च घोरा रौद्रप्रदर्शनाः ॥ १८ ॥
जिनके केशोंके अग्रभाग पीले और छितराये हुए हैं, पसलियाँ, ठोड़ी और मुँह लंबे एवं मोटे हैं, कंधे ऊँचे, गर्दन मोटी और पिण्डली भारी हैं, जो देखनेमें विकट जान पड़ते हैं, सुग्रीव जातिवाले अश्वोंके समान तथा गरुड़ पक्षीकी भाँति उद्धत स्वभावके हैं, जिनके सिर गोल और मुख विशाल हैं, जो बिलाव-जैसा मुख धारण करते हैं तथा जिनके स्वरमें कठोरता है, वे बड़े क्रोधी होते हैं और युद्धमें गर्जना करते हुए विचरते हैं। उन्हें धर्मका ज्ञान नहीं होता। वे घमंडमें भरे हुए घोर आकृतिवाले दिखायी देते हैं। उनका दर्शन ही बड़ा भयंकर है ॥ १६—१८ ॥
त्यक्तात्मानः सर्व एते अन्त्यजा ह्यनिवर्तिनः ।
पुरस्कार्याः सदा सैन्ये हन्यन्ते घ्नन्ति चापि ये ॥ १९ ॥
ये सब-के-सब अन्त्यज (कोल-भील आदि) हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते और शरीरका मोह छोड़कर लड़ते हैं। सेनामें ऐसे लोगोंको सदा पुरस्कार देना चाहिये और इन्हें सदा आगे-आगे रखना चाहिये। ये धैर्यपूर्वक शत्रुओंकी मार सहते और उन्हें भी मारते हैं ॥
अधार्मिका भिन्नवृत्ताः सान्त्वेनैषां पराभवः ।
एवमेव प्रकुप्यन्ति राज्ञोऽप्येते ह्यभीक्ष्णशः ॥ २० ॥
ये अधर्मी होते हैं, धर्मकी मर्यादा भंग कर देते हैं। इसी तरह ये बारंबार राजापर भी कुपित हो उठते हैं; अतः इन्हें मीठी-मीठी बातोंसे समझा-बुझाकर ही काबूमें करना चाहिये ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः
विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश
युधिष्ठिर उवाच
जयित्र्याः कानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि चेच्छामि वेदितुम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— 'भरतश्रेष्ठ! विजय पानेवाली सेनाके कौन-कौन-से शुभ लक्षण होते हैं? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
जयित्र्या यानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतभूषण! विजय पानेवाली सेनाके समक्ष जो-जो शुभ लक्षण प्रकट होते हैं, उन सबका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
दैवे पूर्वं प्रकुपिते मानुषे कालचोदिते ।
तद्विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ज्ञानदिव्येन चक्षुषा ॥ ३ ॥
प्रायश्चित्तविधिं चात्र जपहोमांश्च तद्विदः ।
मङ्गलानि च कुर्वन्ति शमयन्त्यहितानि च ॥ ४ ॥
कालसे प्रेरित हुए मनुष्यपर पहले दैवका प्रकोप होता है। उसे विद्वान् पुरुष जब ज्ञानमयी दिव्यदृष्टिसे देख लेते हैं, तब उसके प्रतीकारको जाननेवाले वे पुरुष उसके प्रायश्चित्तका विधान—जप, होम आदि मांगलिक कृत्य करते हैं और उस अहितकारक दैवी उपद्रवको शान्त कर देते हैं ॥ ३-४ ॥
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत ।
यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां परो जयः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनाके योद्धा और वाहन मनमें प्रसन्न एवं उत्साहयुक्त होते हैं, उसकी उत्तम विजय अवश्य होती है ॥ ५ ॥
अन्वेतान् वायवो यान्ति तथैवेन्द्रधनूंषि च ।
अनुप्लवन्तो मेघाश्च तथाऽऽदित्यस्य रश्मयः ॥ ६ ॥
गोमायवश्चानुकूला बलगृध्राश्च सर्वशः ।
अर्हयेयुर्यदा सेनां तदा सिद्धिरनुत्तमा ॥ ७ ॥