महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तब महात्मा प्रह्लादको बड़ा भय हुआ। उन्होंने पुनः पूछा—'कमलालये! तुम कहाँ जा रही हो, तुम तो सत्यव्रता देवी और सम्पूर्ण जगत्की परमेश्वरी हो। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? यह मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ' ।। ५८-५९ ।।
श्रीरुवाच
स शक्रो ब्रह्मचारी यस्त्वत्तश्चैवोपशिक्षितः ।
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत् तेनापहृतं प्रभो ।। ६० ।।
लक्ष्मीने कहा— प्रभो! तुमने जिसे उपदेश दिया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् इन्द्र थे। तीनों लोकोंमें जो तुम्हारा ऐश्वर्य फैला हुआ था, वह उन्होंने हर लिया ।। ६० ।।
शीलेन हि त्रयो लोकास्त्वया धर्मज्ञ निर्जिताः ।
तद्विज्ञाय सुरेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ।। ६१ ।।
धर्मज्ञ! तुमने शीलके द्वारा ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी। प्रभो! यह जानकर ही सुरेन्द्रने तुम्हारे शीलका अपहरण कर लिया है ।। ६१ ।।
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ।। ६२ ।।
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी)—ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं—शील ही इन सबकी जड़ है। इसमे संशय नहीं है ।। ६२ ।।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा गता श्रीस्तु ते च सर्वे युधिष्ठिर ।
दुर्योधनस्तु पितरं भूय एवाब्रवीद् वचः ।। ६३ ।।
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन ।
प्राप्यते च यथा शीलं तं चोपायं वदस्व मे ।। ६४ ।।
भीष्मजी कहते हैं— 'युधिष्ठिर! यों कहकर लक्ष्मी तथा वे शील आदि समस्त सद्गुण इन्द्रके पास चले गये। इस कथाको सुनकर दुर्योधनने पुनः अपने पितासे कहा—'कौरवनन्दन! मैं शीलका तत्त्व जानना चाहता हूँ। शील जिस तरह प्राप्त हो सके, वह उपाय भी मुझे बताइये' ।। ६३-६४ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
सोपायं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्रादेन महात्मना ।
संक्षेपेण तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नरेश्वर ।। ६५ ।।
धृतराष्ट्रने कहा— नरेश्वर! शीलका स्वरूप और उसे पानेका उपाय—ये दोनों बातें महात्मा प्रह्लादने पहले ही बतायी हैं। मैं संक्षेपसे शीलकी प्राप्तिका उपायमात्र बता रहा हूँ,
ध्यान देकर सुनो ।। ६५ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ।। ६६ ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना—यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।। ६६ ।।
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ।। ६७ ।।
अपना जो भी पुरुषार्थ और कर्म दूसरोंके लिये हितकर न हो अथवा जिसे करनेमें संकोचका अनुभव होता हो, उसे किसी तरह नहीं करना चाहिये ।। ६७ ।।
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि ।
शीलं समासेनेतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। ६८ ।।
जो कर्म जिस प्रकार करनेसे भरी सभामें मनुष्यकी प्रशंसा हो, उसे उसी प्रकार करना चाहिये। कुरुश्रेष्ठ! यह तुम्हें थोड़ेमें शीलका स्वरूप बताया गया है ।। ६८ ।।
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् ।
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च न सन्ति ते ।। ६९ ।।
तात! नरेश्वर! यद्यपि कहीं-कहीं शीलहीन मनुष्य भी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकालतक उसका उपभोग नहीं कर पाते और जड़मूलसहित नष्ट हो जाते हैं ।। ६९ ।।
एतद् विदित्वा तत्त्वेन शीलवान् भव पुत्रक ।
यदिच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ।। ७० ।।
बेटा! यदि तुम युधिष्ठिरसे भी अच्छी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहो तो इस उपदेशको यथार्थरूपसे समझकर शीलवान् बनो ।। ७० ।।
भीष्म उवाच
एतत् कथितवान् पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
एतत् कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत् फलम् ।। ७१ ।।
भीष्मजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको यह उपदेश दिया था। तुम भी इसका आचरण करो, इससे तुम्हें भी वही फल प्राप्त होगा ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि शीलवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें शीलवर्णनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।
१२५-
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना
युधिष्ठिर उवाच
शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह ।
कथं त्वाशा समुत्पन्ना या चाशा तद् वदस्व मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने पुरुषमें शीलको ही प्रधान बताया है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये ॥ १ ॥
संशयो मे महानेष समुत्पन्नः पितामह ।
छेत्ता च तस्य नान्योऽस्ति त्वत्तः परपुरञ्जय ॥ २ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पितामह! मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है। इसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥
पितामहाशा महती ममासीद्धि सुयोधने ।
प्राप्ते युद्धे तु तद् युक्तं तत् कर्तार्यमिति प्रभो ॥ ३ ॥
पितामह! दुर्योधनपर मेरी बड़ी भारी आशा थी कि युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर वह उचित कार्य करेगा। प्रभो! मैं समझता था कि वह युद्ध किये बिना ही मुझे आधा राज्य लौटा देगा ॥ ३ ॥
सर्वस्याशा सुमहती पुरुषस्योपजायते ।
तस्यां विहन्यमानायां दुःखो मृत्युर्न संशयः ॥ ४ ॥
प्रायः सभी मनुष्योंके हृदयमें कोई-न-कोई बड़ी आशा पैदा होती ही है। उसके भंग होनेपर महान् दुःख होता है। किसी-किसीकी मृत्यूतक हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
सोऽहं हताशो दुर्बुद्धिः कृतस्तेन दुरात्मना ।
धार्तराष्ट्रेण राजेन्द्र पश्य मन्दात्मतां मम ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उस दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रने मुझ दुर्बुद्धिको हताश कर दिया। देखिये, मैं कैसा मन्दभाग्य हूँ ॥ ५ ॥
आशां महत्तरां मन्ये पर्वतादपि सद्रुमात् ।
आकाशादपि वा राजन्नप्रमेयैव वा पुनः ॥ ६ ॥
राजन्! मैं आशाको वृक्षसहित पर्वतसे भी बहुत बड़ी मानता हूँ अथवा वह आकाशसे भी बढ़कर अप्रमेय है ।। एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा । दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद् दुर्लभं ततः ।। ७ ।। कुरुश्रेष्ठ! वह अचिन्त्य और परम दुर्लभ है—उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ या दुर्जय होनेके कारण ही मैं उसे इतनी बड़ी देखता और समझता हूँ। भला, आशासे बढ़कर दुर्लभ और क्या है? ।। ७ ।।
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध तत् । इतिहासं सुमित्रस्य निर्वृत्तमृषभस्य च ।। ८ ।। भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनिका पूर्वघटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा। उसे ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। सुमित्रो नाम राजर्षिर्हैहयो मृगयां गतः । ससार स मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ।। ९ ।। राजर्षि सुमित्र हैहयवंशी राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक मृगको घायल करके उसका पीछा करना आरम्भ किया ।। ९ ।। स मृगो बाणमादाय ययावमितविक्रमः । स च राजा बलात् तूर्णं ससार मृगयूथपम् ।। १० ।। वह मृग बहुत तेज दौड़नेवाला था। वह राजाका बाण लिये-दिये भाग निकला। राजाने भी बलपूर्वक मृगोंके उस यूथपतिका तुरंत पीछा किया ।। १० ।। ततो निम्नं स्थलं चैव स मृगोऽद्रवदाशुगः । मुहूर्तमिव राजेन्द्र समेन स पथागमत् ।। ११ ।। राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक भागनेवाला वह मृग वहाँसे नीची भूमिकी ओर दौड़ा। फिर दो ही घड़ीमें वह समतल मार्गसे भागने लगा ।। ११ ।। ततः स राजा तारुण्यादौरसेन बलेन च । ससार बाणासनभृत् सखड्गोऽसौ तनुत्रवान् ।। १२ ।। राजा भी नौजवान और हार्दिक बलसे सम्पन्न थे, उन्होंने कवच बाँध रखा था। वे धनुष-बाण और तलवार लिये उसका पीछा करने लगे ।। १२ ।। ततो नदान् नदींश्चैव पल्वलानि वनानि च । अतिक्रम्याभ्यतिक्रम्य ससारैको वनेचरः ।। १३ ।।
उधर वह वनमें विचरनेवाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्डों और जंगलोंको बारंबार लाँघता हुआ आगे-आगे भागता जा रहा था ॥ १३ ॥
स तु कामान्मृगो राजन्नासाद्यासाद्य तं नृपम् । पुनरभ्येति जवनो जवेन महता ततः ॥ १४ ॥ राजन्! वह वेगशाली मृग अपनी इच्छासे ही राजाके निकट आ-आकर पुनः बड़े वेगसे आगे भागता था ॥ १४ ॥
स तस्य बाणैर्बहुभिः समभ्यस्तो वनेचरः । प्रक्रीडन्निव राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! यद्यपि राजाके बहुत-से बाण उसके शरीरमें धँस गये थे, तथापि वह वनचारी मृग खेल करता हुआ-सा बारंबार उनके निकट आ जाता था ॥ १५ ॥
पुनश्चजवमास्थाय जवनो मृगयूथपः । अतीत्यातीत्य राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! वह मृगसमूहोंका सरदार था। उसका वेग बड़ा तीव्र था। वह बारंबार बड़े वेगसे छलाँग मारता और दूरतककी भूमि लाँघ-लाँघकर पुनः निकट आ जाता था ॥ १६ ॥
तस्य मर्मच्छिदं घोरं तीक्ष्णं चामित्रकर्शनः । समादाय शरं श्रेष्ठं कार्मुके तु तथासृजत् ॥ १७ ॥ तब शत्रुसूदन नरेशने एक बड़ा भयंकर तीखा बाण हाथमें लिया, जो मर्मस्थलोंको विदीर्ण कर देनेवाला था। उस श्रेष्ठ बाणको उन्होंने धनुषपर रखा ॥ १७ ॥
ततो गव्यूतिमात्रेण मृगयूथपयूथपः । तस्य बाणपथं मुक्त्वा तस्थिवान् प्रहसन्निव ॥ १८ ॥ यह देख मृगोंका वह यूथपति राजाके बाणका मार्ग छोड़कर दो कोस दूर जा पहुँचा और हँसता हुआ-सा खड़ा हो गया ॥ १८ ॥
तस्मिन् निपतिते बाणे भूमौ ज्वलिततेजसि । प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ॥ १९ ॥ जब राजाका वह तेजस्वी बाण पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मृग एक महान् वनमें घुस गया, राजाने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
१२६-
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना
भीष्म उवाच
प्रविश्य स महारण्यं तापसानामथाश्रमम् ।
आससाद ततो राजा श्रान्तश्चोपाविशत् तदा ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस महान् वनमें प्रवेश करके राजा सुमित्र तापसोंके आश्रमपर जा पहुँचे और वहाँ थककर बैठ गये ॥ १ ॥
तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा ।
समेत्य ऋषयस्तस्मिन् पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ २ ॥
वे परिश्रमसे पीड़ित और भूखसे व्याकुल हो रहे थे। उस अवस्थामें धनुष धारण किये राजा सुमित्रको देखकर बहुत-से ऋषि उनके पास आये और सबने मिलकर उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ॥ २ ॥
स पूजामृषिभिर्दत्तां सम्प्रगृह्य नराधिपः ।
अपृच्छत् तापसान् सर्वांस्तपसो वृद्धिमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
ऋषियोंद्वारा किये गये उस स्वागत-सत्कारको ग्रहण करके राजाने भी उन सब तापसोंसे उनकी तपस्याकी भलीभाँति वृद्धि होनेका समाचार पूछा ॥ ३ ॥
ते तस्य राज्ञो वचनं सम्प्रगृह्य तपोधनाः ।
ऋषयो राजशार्दूलं तमपृच्छन् प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
उन तपस्याके धनी महर्षियोंने राजाके वचनोंको सादर ग्रहण करके उन नृपश्रेष्ठके वहाँ आनेका प्रयोजन पूछा ॥ ४ ॥
केन भद्र सुखार्थेन सम्प्राप्तोऽसि तपोवनम् ।
पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशो धन्वी बाणी नरेश्वर ॥ ५ ॥
‘कल्याणस्वरूप नरेश्वर! किस सुखके लिये आप इस तपोवनमें तलवार बाँधे धनुष और बाण लिये पैदल ही चले आये हैं? ॥ ५ ॥
एतदिच्छामहे श्रोतुं कुतः प्राप्तोऽसि मानद ।
कस्मिन् कुले तु जातस्त्वं किंनामा चासि ब्रूहि नः ॥ ६ ॥
‘मानद! हम यह सब सुनना चाहते हैं, आप कहाँसे पधारे हैं? किस कुलमें आपका जन्म हुआ है? तथा आपका नाम क्या है? ये सारी बातें हमें बताइये’ ॥
ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ ।
आचचक्षे यथान्यायं परिचर्यां च भारत ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर भरतनन्दन! तदनन्तर राजा सुमित्रने उन समस्त ब्राह्मणोंसे यथोचित बात कही और अपना कार्यक्रम बताया— ॥ ७ ॥
हैहयानां कुले जातः सुमित्रो मित्रनन्दनः ।
चरामि मृगयूथानि निघ्नन् बाणैः सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘तपोधनो! मेरा जन्म हैहय-कुलमें हुआ है। मैं मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला राजा सुमित्र हूँ और सहस्रों बाणोंके आघातसे मृग-समूहोंका विनाश करता हुआ विचर रहा हूँ ॥ ८ ॥
बलेन महता गुप्तः सामात्यः सावरोधनः ।
मृगस्तु विद्धो बाणेन मया सरति शल्यवान् ॥ ९ ॥
‘मेरे साथ बहुत बड़ी सेना थी। उसके द्वारा सुरक्षित हो मैं मन्त्री और अन्तःपुरके साथ आया था, परंतु मेरे बाणोंसे घायल हुआ एक मृग बाणसहित इधर ही भाग निकला ॥ ९ ॥
तं द्रवन्तमनुप्राप्तो वनमेतद् यदृच्छया ।
भवत्सकाशं नष्टश्रीर्हताशः श्रमकर्शितः ॥ १० ॥
‘उस भागते हुए मृगके पीछे मैं अकस्मात् इस वनमें आपलोगोंके समीप आ पहुँचा हूँ। मेरी सारी शोभा नष्ट हो गयी है। मैं हताश होकर भारी परिश्रमसे कष्ट पा रहा हूँ ॥ १० ॥
किं नु दुःखमतोऽन्यद् वै यदहं श्रमकर्शितः ।
भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षणः ॥ ११ ॥
‘मैंने परिश्रमके कारण जो इतना कष्ट पाया है और अपने राजचिह्नोंसे भ्रष्ट होकर एक हताशकी भाँति आपके आश्रममें पैर रखा है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ ११ ॥
न राजलक्षणत्यागो न पुरस्य तपोधनाः ।
दुःखं करोति तत् तीव्रं यथाऽऽशा विहता मम ॥ १२ ॥
‘तपोधनो! नगर तथा राजचिह्नोंका परित्याग मुझे वैसा तीव्र कष्ट नहीं दे रहा है, जैसा कि मेरी भग्न हुई आशा दे रही है ॥ १२ ॥
हिमवान् वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः ।
महत्त्वान्नान्वपद्येतां नभसो वान्तरं तथा ॥ १३ ॥
आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गतः ।
भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः ॥ १४ ॥
‘महान् पर्वत हिमालय अथवा अगाध जलराशि समुद्र अपनी विशालताके द्वारा आशाकी समानता नहीं कर सकते। तपस्यामें श्रेष्ठ तपोधनो! जैसे आकाशका कहीं अन्त नहीं है, उसी प्रकार मैं आशाका अन्त नहीं पा सका हूँ। आपको तो सब कुछ मालूम ही है; क्योंकि तपोधन मुनि सर्वज्ञ होते हैं ॥ १३-१४ ॥
भवन्तः सुमहाभागास्तस्मात् पृच्छामि संशयम् । आशावान् पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा ॥ १५ ॥ किं नु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वात् प्रतिभाति वः । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम् ॥ १६ ॥ ‘आप महान् सौभाग्यशाली तपस्वी हैं; इसलिये मैं आपसे अपने मनका संदेह पूछता हूँ। एक ओर आशावान् पुरुष हो और दूसरी ओर अनन्त आकाश हो तो जगत्में महत्ताकी दृष्टिसे आपलोगोंको कौन बड़ा जान पड़ता है? मैं इस बातको तत्त्वसे सुनना चाहता हूँ। भला, यहाँ आकर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रहेगी? ॥ १५-१६ ॥
यदि गुह्यं न वो नित्यं तदा प्रब्रूत मा चिरम् । न गुह्यं श्रोतुमिच्छामि युष्मद्भ्यो द्विजसत्तमाः ॥ १७ ॥ ‘यदि आपके लिये सदा यह कोई गोपनीय रहस्य न हो तो शीघ्र इसका वर्णन कीजिये। विप्रवरों! मैं आपलोगोंसे ऐसी कोई बात नहीं सुनना चाहता, जो गोपनीय रहस्य हो ॥ १७ ॥
भवत् तपोविघातो वा यदि स्याद् विरमे ततः । यदि वास्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरितः ॥ १८ ॥ एतत् कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत् समन्विताः ॥ १९ ॥ ‘यदि मेरे इस प्रश्नसे आपलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ रहा हो तो मैं इससे विराम लेता हूँ और यदि आपके पास बातचीतका समय हो तो जो प्रश्न मैंने उपस्थित किया है, इसका आप समाधान करें। मैं इस आशाके कारण और सामर्थ्यके विषयमें ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। आपलोग भी सदा तपमें संलग्न रहनेवाले हैं; अतः एकत्र होकर इस प्रश्नका विवेचन करें’ ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना
भीष्म उवाच
ततस्तेषां समस्तानाम्मृषीणामृषिसत्तमः ।
ऋषभो नाम विप्रर्षिर्विस्मयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर उन समस्त ऋषियोंमेंसे मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभने विस्मित होकर इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
पुराहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन् प्रभो ।
समासादितवान् दिव्यं नरनारायणाश्रमम् ॥ २ ॥
नृपश्रेष्ठ! पहलेकी बात है, मैं सब तीर्थोंमें विचरण करता हुआ भगवान् नरनारायणके दिव्य आश्रममें जा पहुँचा ॥ २ ॥
यत्र सा बदरी रम्या ह्रदो वैहायसस्तथा ।
यत्र चाश्वशिरा राजन् वेदान् पठति शाश्वतान् ॥ ३ ॥
'राजन्! जहाँ वह रमणीय बदरीका वृक्ष है, जहाँ वैहायस* कुण्ड है तथा जहाँ अश्वशिरा (हयग्रीव) सनातन वेदोंका पाठ करते हैं (वहीं नरनारायणाश्रम है) ॥
तस्मिन् सरसि कृत्वाहं विधिवत् तर्पणं पुरा ।
पितॄणां देवतानां च ततोऽश्रममियां तदा ॥ ४ ॥
रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी ।
उस वैहायस कुण्डमें स्नान करके मैंने विधिपूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद उस आश्रममें प्रवेश किया, जहाँ मुनिवर नर और नारायण नित्य सानन्द निवास करते हैं ॥ ४ १/२ ॥
अदूरादाश्रमं कञ्चिद् वासार्थमगमं तदा ॥ ५ ॥
तत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च ।
अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोधनम् ॥ ६ ॥
उसके बाद वहाँसे निकट ही एक-दूसरे आश्रममें मैं ठहरनेके लिये गया। वहाँ मुझे तनु नामवाले एक तपोधन ऋषि आते दिखायी दिये, जो चीर और मृगचर्म धारण किये हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था ॥ ५-६ ॥
अन्यैर्नरैर्महाबाहो वपुषाष्टगुणान्वितम् ।
कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी क्वचित् ॥ ७ ॥
महाबाहो! उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्योंसे आठ गुना लंबा था। राजर्षे! मैंने उनकी- जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी है ॥ ७ ॥ शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिष्ठिकासमम् । ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ८ ॥ ‘राजेन्द्र! उनका शरीर भी कनिष्ठिका अंगुलीके समान पतला था। उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिरके बाल भी अद्भुत दिखायी देते थे ॥ ८ ॥ शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च । तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ॥ ९ ॥ शरीरके अनुरूप ही उनके मस्तक, कान और नेत्र भी थे। नृपश्रेष्ठ! उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी ॥ ९ ॥ दृष्ट्वाहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः । पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥ १० ॥ मैं उन दुबले-पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन-ही-मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥ १० ॥ निवेद्य नामगोत्रे च पितरं च नरर्षभ । प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ॥ ११ ॥ नरश्रेष्ठ! उनके सामने नाम, गोत्र और पिताका परिचय देकर उन्हींके दिये हुए आसन पर धीरेसे बैठ गया ॥ ११ ॥ ततः स कथयामास कथां धर्मार्थसंहिताम् । ऋषिमध्ये महाराज तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ १२ ॥ महाराज! तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु ऋषियोंके बीचमें बैठकर धर्म और अर्थसे युक्त कथा कहने लगे ॥ १२ ॥ तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः । उपायाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः ॥ १३ ॥ उनके कथा कहते समय ही कमलके समान नेत्रोंवाले एक नरेश वेगशाली घोड़ोंद्वारा अपनी सेना और अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥ १३ ॥ स्मरन् पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः । भूरिद्युम्नपिता श्रीमान् वीरद्युम्नो महायशाः ॥ १४ ॥ उनका पुत्र जंगलमें खो गया था। उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे। उनके पुत्रका नाम था भूरिद्युम्न और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे ॥ १४ ॥ इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः । एवमाशाहृतो राजा चरन् वनमिदं पुरा ॥ १५ ॥
यहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा। यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा। इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे ॥ १५ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुं नूनं परमधार्मिकः ।
एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत् तदा ॥ १६ ॥
‘वह बड़ा धर्मात्मा था। अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है। एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वनमें खो गया’ इन्हीं बातोंको वे बार-बार दुहराते थे ॥ १६ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुमाशा च महती मम ।
तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥ १७ ॥
‘मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है। उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है। इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ’ ॥ १७ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः ।
अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान् ॥ १८ ॥
राजाकी यह बात सुनकर मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् तनु नीचे सिर किये ध्यानमग्न हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रह गये ॥ १८ ॥
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः ।
उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दं मन्दमिवासकृत् ॥ १९ ॥
उनको चिन्तन करते देख परम दुखी हुए नरेश दीनहृदय हो मन्द-मन्द वाणीमें बारंबार इस प्रकार कहने लगे— ॥ १९ ॥
दुर्लभं किं नु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत् ।
ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यं न ते मयि ॥ २० ॥
‘देवर्षे! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशासे भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टिमें यह बात मुझसे छिपानेयोग्य न हो तो आप इसे अवश्य बतावें’ ॥ २० ॥
मुनिरुवाच
महर्षिर्भगवान्स्तेन पूर्वमासीद् विमानितः ।
बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः ॥ २१ ॥
**तब मुनिने कहा—**राजन्! आपके उस पुत्रने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्यके कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था ॥
अर्थयन् कलशं राजन् काञ्चनं वल्कलानि च ।
अवज्ञापूर्वकेनापि न सम्पादितवांस्ततः ।
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निशश्वसः समपद्यत ॥ २२ ॥
राजन्! वे उससे एक सुवर्णमय कलश और वल्कल माँग रहे थे। आपके पुत्रने अवहेलना करके भी महर्षिकी वह इच्छा पूरी नहीं की; इससे वे विप्र ऋषि अत्यन्त खिन्न और निराश हो गये थे ॥ २२ ॥
एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् । श्रान्तोऽवसीदद् धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ॥ २३ ॥ (ऋषभ कहते हैं—) नरश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर उन लोकपूजित महर्षिको प्रणाम करके धर्मात्मा राजा वीरद्युम्न तुम्हारे ही समान थककर शिथिल हो गये ॥ २३ ॥
अर्घ्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महार्नृषिः । आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् उन महर्षिने तपोवनमें प्रचलित शिष्टाचारकी विधिसे राजाको पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ २४ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे परिवार्य नरर्षभम् । उपाविशन् नरव्याघ्र सप्तर्षय इव ध्रुवम् ॥ २५ ॥ पुरुषसिंह! तब वे सभी मुनि नरश्रेष्ठ वीरद्युम्नको सब ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये, मानो सप्तर्षि ध्रुवको चारों ओरसे घेरकर शोभा पा रहे हों ॥ २५ ॥
अपृच्छंश्चैव तं तत्र राजानमपराजितम् । प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य निवेशने ॥ २६ ॥ उन सबने वहाँ उन अपराजित नरेशसे उस आश्रमपर पधारनेका सारा प्रयोजन पूछा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
* 'विहायसा गच्छन्त्या मन्दाकिन्या वैहायस्या अयं वैहायसः' अर्थात् आकाशमार्गसे गमन करनेवाली मन्दाकिनी या आकाश गंगाका नाम वैहायसी है। वहींके जलसे भरा होनेके कारण वह कुण्ड वैहायस कहलाता है। बदरिकाश्रममें गंगाका नाम अलकनन्दा है।
१२८-
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना
राजोवाच
वीरद्युम्न इति ख्यातो राजाहं दिक्षु विश्रुतः।
भूरिद्युम्नं सुतं नष्टमन्वेष्टुं वनमागतः॥ १ ॥
राजाने कहा— मुने! मैं सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात वीरद्युम्न नामक राजा हूँ और खोये हुए अपने पुत्र भूरिद्युम्नकी खोज करनेके लिये वनमें आया हूँ॥ १ ॥
एकः पुत्रः स विप्राग्र्य बाल एव च मेऽनघ।
न दृश्यते वने चास्मिंस्तमन्वेष्टुं चराम्यहम्॥ २ ॥
निष्पाप विप्रवर! मेरे एक ही वह पुत्र था। वह भी बालक ही था। इस वनमें आनेपर वह कहीं दिखायी नहीं दे रहा है, उसीको खोजनेके लिये मैं चारों ओर विचर रहा हूँ॥ २ ॥
ऋषभ उवाच
इत्येवमुक्ते वचने राज्ञा मुनिरधोमुखः।
तूष्णीमेवाभवत् तत्र न च प्रत्युक्तवान् नृपम्॥ ३ ॥
ऋषभ कहते हैं— राजन्! राजाके ऐसा कहनेपर वे मुनि नीचे मुँह किये चुपचाप बैठे ही रह गये। राजाको कुछ उत्तर न दे सके॥ ३ ॥
स हि तेन पुरा विप्रो राज्ञा नात्यर्थमानितः।
आशाकृतश्च राजेन्द्र तपो दीर्घं समाश्रितः॥ ४ ॥
प्रतिग्रहमहं राज्ञां न करिष्ये कथञ्चन।
अन्येषां चैव वर्णानामिति कृत्वा धियं तदा॥ ५ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालमें कभी उसी राजाने उन्हीं ऋषिका विशेष आदर नहीं किया था। उनकी आशा भंग कर दी थी। इससे वे मुनि 'मैं किसी प्रकार भी किसी राजा या दूसरे वर्णके लोगोंका दिया हुआ दान नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा निश्चय करके दीर्घकालीन तपस्यामें लग गये थे॥
आशा हि पुरुषं बालमुत्थापयति तस्थुषी।
तामहं व्यपनेष्यामि इति कृत्वा व्यवस्थितः।
वीरद्युम्नस्तु तं भूयः पप्रच्छ मुनिसत्तमम्॥ ६ ॥
बहुत कालतक रहनेवाली आशा मूर्ख मनुष्यको ही उद्यमशील बनाती है। मैं उसे दूर कर दूँगा। ऐसा निश्चय करके वे तपस्यामें स्थिर हो गये थे। इधर वीरद्युम्नने उन मुनिश्रेष्ठसे
पुनः प्रश्न किया ॥ ६ ॥
राजोवाच
आशायाः किं कृशत्वं च किं चेह भुवि दुर्लभम् ।
ब्रवीतु भगवानेतत् त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ॥ ७ ॥
**राजा बोले—**विप्रवर! आप धर्म और अर्थके ज्ञाता हैं, अतः यह बतानेकी कृपा करें कि आशासे बढ़कर दुर्बलता क्या है? और इस पृथ्वीपर सबसे दुर्लभ क्या है? ॥ ७ ॥
ततः संस्मृत्य तत् सर्वं स्मारयिष्यन्निवाब्रवीत् ।
राजानं भगवान् विप्रस्ततः कृशतनुस्तदा ॥ ८ ॥
तब उन दुर्बल शरीरवाले पूज्यपाद ऋषिने पहलेकी सारी बातोंको याद करके राजाको भी उनका स्मरण दिलाते हुए-से इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥
ऋषिरुवाच
कृशत्वेन समं राजन्नाशाया विद्यते नृप ।
तस्या वै दुर्लभत्वाच्च प्रार्थिताः पार्थिवा मया ॥ ९ ॥
**ऋषि बोले—**नरेश्वर! आशा या आशावान्की दुर्बलताके समान और किसीकी दुर्बलता नहीं है। जिस वस्तुकी आशा की जाती है, उसकी दुर्लभताके कारण ही मैंने बहुत-से राजाओंके यहाँ याचना की है ॥ ९ ॥
राजोवाच
कृशाकृशे मया ब्रह्मन् गृहीते वचनात् तव ।
दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज ॥ १० ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने आपके कहनेसे यह अच्छी तरह समझ लिया कि जो आशासे बँधा हुआ है, वह दुर्बल है और जिसने आशाको जीत लिया है, वह पुष्ट है। द्विजश्रेष्ठ! आपकी इस बातको भी मैंने वेदवाक्यकी भाँति ग्रहण किया कि जिस वस्तुकी आशा की जाती है, वह अत्यन्त दुर्लभ होती है ॥ १० ॥
संशयस्तु महाप्राज्ञ संजातो हृदये मम ।
तन्मुने मम तत्त्वेन वक्तुमर्हसि पृच्छतः ॥ ११ ॥
महाप्राज्ञ! मुने! किंतु मेरे मनमें एक संशय है, जिसे पूछ रहा हूँ। आप उसे यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ११ ॥
त्वत्तः कृशतरं किं नु ब्रवीतु भगवानिदम् ।
यदि गुह्यं न ते किञ्चिद् विद्यते मुनिसत्तम ॥ १२ ॥
मुनिश्रेष्ठ! यदि कोई वस्तु आपके लिये गोपनीय या छिपानेयोग्य न हो तो आप यह बतावें कि आपसे भी बढ़कर अत्यन्त दुर्बल वस्तु क्या है? ॥ १२ ॥
कृश उवाच
दुर्लभोऽप्यथवा नास्ति योऽर्थी धृतिमवाप्नुयात् । स दुर्लभतरस्तात योऽर्थिनं नावमन्यते ॥ १३ ॥ **दुर्बल शरीरवाले मुनिने कहा—**तात! जो याचक धैर्य धारण कर सके अर्थात् किसी वस्तुकी आवश्यकता होनेपर भी उसके लिये किसीसे याचना न करे, वह दुर्लभ है एवं जो याचना करनेवाले याचककी अवहेलना न करे—आदरपूर्वक उसकी इच्छा पूर्ण करे, ऐसा पुरुष संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १३ ॥
सत्कृत्य नोपकुरुते परं शक्त्या यथार्हतः । या सत्ता सर्वभूतेषु साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १४ ॥ जब मनुष्य सत्कार करके याचकको आशा दिलाकर भी उसका शक्तिके अनुसार यथायोग्य उपकार नहीं करता, उस स्थितिमें सम्पूर्ण भूतोंके मनमें जो आशा होती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है ॥ १४ ॥
कृतघ्नेषु च या सत्ता नृशंसेष्वलसेषु च । अपकारिषु चासक्ता साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १५ ॥ कृतघ्न, नृशंस, आलसी तथा दूसरोंका अपकार करनेवाले पुरुषोंमें जो आशा होती है, वह (कभी पूर्ण न होनेके कारण चिन्तासे दुर्बल बना देती है; इसलिये वह) मुझसे भी अत्यन्त कृश है ॥ १५ ॥
एकपुत्रः पिता पुत्रे नष्टे वा प्रोषितेऽपि वा । प्रवृत्तिं यो न जानाति साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १६ ॥ इकलौते बेटेका बाप जब अपने पुत्रके खो जाने या परदेशमें चले जानेपर उसका कोई समाचार नहीं जान पाता, तब उसके मनमें जो आशा रहती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है ॥ १६ ॥
प्रसवे चैव नारीणां वृद्धानां पुत्रकारिता । तथा नरेन्द्र धनिनां साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १७ ॥ नरेन्द्र! वृद्ध अवस्थावाली नारियोंके हृदयमें जो पुत्र पैदा होनेके लिये आशा बनी रहती है तथा धनियोंके मनमें जो अधिकाधिक धनलाभकी आशा रहती है, वह मुझसे अत्यन्त कृश है ॥ १७ ॥
प्रदानकांक्षिणीनां च कन्यानां वयसि स्थिते । श्रुत्वा कथास्तथायुक्ताः साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १८ ॥ तरुण अवस्था आनेपर विवाहकी चर्चा सुनकर ब्याहकी इच्छा रखनेवाली कन्याओंके हृदयमें जो आशा होती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है* ॥ १८ ॥
एतच्छ्रुत्वा ततो राजन् स राजा सावरोधनः ।
संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभम् ॥ १९ ॥ राजन्! ब्राह्मणश्रेष्ठ उस ऋषिकी वह बात सुनकर राजा अपनी रानीके साथ उनके चरणोंका मस्तकसे स्पर्श करके वहीं गिर पड़े ॥ १९ ॥
राजोवाच
प्रसादये त्वां भगवन् पुत्रेणेच्छामि संगमम् । यदेतदुक्तं भवता सम्प्रति द्विजसत्तम ॥ २० ॥ सत्यमेतन्न संदेहो यदेतद् व्याहृतं त्वया । **राजा बोले—**भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझे अपने पुत्रसे मिलनेकी बड़ी इच्छा है। द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझसे इस समय जो कुछ कहा है, आपका यह सारा कथन सत्य है, इसमें संदेह नहीं ॥
ततः प्रहस्य भगवांस्तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ २१ ॥ पुत्रमस्या नयत् क्षिप्रं तपसा च श्रुतेन च । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् तनुने हँसकर अपनी तपस्या और शास्त्रज्ञानके प्रभावसे राजकुमारको शीघ्र वहाँ बुला दिया ॥ २१ १/२ ॥
स समानीय तत्पुत्रं तमुपालभ्य पार्थिवम् ॥ २२ ॥ आत्मानं दर्शयामास धर्मं धर्मभृतां वरः । इस प्रकार उनके पुत्रको वहाँ बुलाकर तथा राजाको उलाहना देकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु मुनिने उन्हें अपने साक्षात् धर्मस्वरूपका दर्शन कराया ॥ २२ १/२ ॥
स दर्शयित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् । विपाप्मा विगतक्रोधश्चचार वनमन्तिकात् ॥ २३ ॥ दिव्य और अद्भुत दिखायी देनेवाले अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराकर क्रोध और पापसे रहित तनु मुनि निकटवर्ती वनमें चले गये ॥ २३ ॥
एतद् दृष्टं मया राजंस्तथा च वचनं श्रुतम् । आशामपनयस्वाशु ततः कृशतरीमिमाम् ॥ २४ ॥ ऋषभ मुनि कहते हैं—राजन्! मैंने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है और मुनिका वह कथन भी अपने कानों सुना है। ऐसे ही तुम भी शरीरको अत्यन्त कृश बना देनेवाली इस मृगविषयक दुराशाको शीघ्र ही त्याग दो ॥ २४ ॥
भीष्म उवाच
स तथोक्तस्तदा राजन् ऋषभेण महात्मना । सुमित्रोऽपनयत् क्षिप्रामाशां कृशतरीं ततः ॥ २५ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! महात्मा ऋषभके ऐसा कहनेपर सुमित्रने शरीरको अत्यन्त दुर्बल बनानेवाली वह आशा तुरंत ही त्याग दी ॥ २५ ॥
एवं त्वमपि कौन्तेय श्रुत्वा वाणीमिमां मम । स्थिरो भव महाराज हिमवानिव पर्वतः ॥ २६ ॥ महाराज! कुन्तीकुमार! तुम भी मेरा यह कथन सुनकर आशाको त्याग दो और हिमालय पर्वतके समान स्थिर हो जाओ ॥ २६ ॥ त्वं हि प्रष्टा च श्रोता च कृच्छ्रेष्वनुगतेष्विह । श्रुत्वा मम महाराज न संतप्तुमिहार्हसि ॥ २७ ॥ महाराज! ऐसे संकट उपस्थित होनेपर भी तुम यहाँ उपयुक्त प्रश्न करते और उनका योग्य उत्तर सुनते हो; इसलिये दुर्योधनके साथ जो संधि न हो सकी, उसको लेकर तुम्हें संतप्त नहीं होना चाहिये ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
* आशाको अत्यन्त कृश कहनेका तात्पर्य यह है कि वह मनुष्यको अत्यन्त कृश बना देती है।
यम और गौतमका संवाद
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
यम और गौतमका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
नामृतस्येव पर्याप्तिर्ममास्ति ब्रुवति त्वयि ।
यथा हि स्वात्मवृत्तिस्थस्तथा तृप्तोऽस्मि भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भरतनन्दन! जैसे अमृतको पीनेसे इच्छा पूर्ण नहीं होती, और भी पीनेकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार जब आप उपदेश करने लगते हैं, उस समय उसे सुननेसे मेरा मन नहीं भरता है। जैसे परमात्माके ध्यानमें निमग्न हुआ योगी परमानन्दसे तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी अत्यन्त तृप्तिका अनुभव करता हूँ ॥ १ ॥
तस्मात् कथय भूयस्त्वं धर्ममेव पितामह ।
न हि तृप्तिमहं यामि पिबन् धर्मामृतं हि ते ॥ २ ॥
अतः पितामह! आप पुनः धर्मकी ही बात बताइये। आपके धर्मोपदेशरूपी अमृतका पान करते समय मुझे यह नहीं अनुभव होता है कि बस, अब पूरा हो गया, बल्कि सुननेकी प्यास और बढ़ती ही जाती है ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस धर्मके विषयमें भी विज्ञ पुरुष गौतम तथा महात्मा यमके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥
पारियात्रं गिरिं प्राप्य गौतमस्याश्रमो महान् ।
उवास गौतमो यं च कालं तमपि मे शृणु ॥ ४ ॥
पारियात्रनामक पर्वतपर महर्षि गौतमका महान् आश्रम है। उसमें गौतम जितने समयतक रहे, वह भी मुझसे सुनो ॥ ४ ॥
षष्टिं वर्षसहस्राणि सोऽतप्यद् गौतमस्तपः ।
तमुग्रतपसा युक्तं भावितं सुमहामुनिम् ॥ ५ ॥
उपयातो नरव्याघ्र लोकपालो यमस्तदा ।
तमपश्यत् सुतपसमृषिं वै गौतमं तदा ॥ ६ ॥
गौतमने उस आश्रममें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की। नरश्रेष्ठ! एक दिन उग्र तपस्यामें लगे हुए पवित्र महात्मा महामुनि गौतमके पास लोकपाल यम स्वयं आये। उन्होंने वहाँ आकर उत्तम तपस्वी गौतम ऋषिको देखा ॥ ५-६ ॥
स तं विदित्वा ब्रह्मर्षिर्यममागतमोजसा । प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा उपविष्टस्तपोधनः ॥ ७ ॥ ब्रह्मर्षि गौतमने वहाँ आये हुए यमराजको उनके तेजसे ही जान लिया। फिर वे तपोधन मुनि हाथ जोड़ संयतचित्त हो उनके पास जा बैठे ॥ ७ ॥
तं धर्मराजो दृष्ट्वैव सत्कृत्यैव द्विजर्षभम् । न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन् ॥ ८ ॥ धर्मराजने विप्रवर गौतमको देखते ही उनका सत्कार किया और मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ऐसा कहते हुए उन्हें धर्मचर्चा सुननेके लिये सम्मति प्रदान की ॥ ८ ॥
गौतम उवाच
मातापितृभ्यामानृण्यं किं कृत्वा समवाप्नुयात् । कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभान् शुचीन् ॥ ९ ॥ **तब गौतमने कहा—**भगवन्! मनुष्य कौन-सा कर्म करके माता-पिताके ऋणसे उऋण हो सकता है? और किस प्रकार उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकोंकी प्राप्ति होती है? ॥ ९ ॥
यम उवाच
तपःशौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च । मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥ १० ॥ **यमराजने कहा—**ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर-भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे। यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ॥ १० ॥
अश्वमेधैश्च यष्टव्यं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः । तेन लोकानवाप्नोति पुरुषोऽद्भुतदर्शनान् ॥ ११ ॥ राजाको तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान भी करना चाहिये। ऐसा करनेसे पुरुष अद्भुत दृश्योंसे सम्पन्न पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि यमगौतमसंवादे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें यम और गौतमका संवादविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥