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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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महाभारत

सुवर्णमय पक्षीके रूपमें देवराज इन्द्रका संन्यासी बने हुए ब्राह्मण-बालकोंको उपदेश

क्योंकि विघसाशी पुरुष प्रातः-सायंकाल विधि-विधानपूर्वक अपने कुटुम्बमें अन्नका विभाग करके दुर्जय अविनाशी पदको प्राप्त कर लेते हैं। देवताओं, पितरों, अतिथियों तथा अपने परिवारके अन्य सब लोगोंको अन्न देकर जो सबसे पीछे अवशिष्ट अन्न खाते हैं, उन्हें विघसाशी कहा गया है ॥ २३-२४ ॥

तस्मात् स्वधर्ममास्थाय सुव्रताः सत्यवादिनः ।
लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ॥ २५ ॥

इसलिये अपने धर्मपर आरूढ़ हो उत्तम व्रतका पालन और सत्यभाषण करते हुए वे जगद्गुरु होकर सर्वथा संदेहरहित हो जाते हैं ॥ २५ ॥

त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य स्वर्गलोके विमत्सराः ।
वसन्ति शाश्वतान् वर्षाञ्जना दुष्करकारिणः ॥ २६ ॥

वे ईर्ष्यारहित दुष्कर व्रतका पालन करनेवाले पुण्यात्मा पुरुष इन्द्रके स्वर्गलोकमें पहुँचकर अनन्त वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं ॥ २६ ॥

अर्जुन उवाच

ततस्ते तद् वचः श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् ।
उत्सृज्य नास्तीति गता गार्हस्थ्यं समुपाश्रिताः ॥ २७ ॥

अर्जुन कहते हैं— महाराज! वे ब्राह्मणकुमार पक्षिरूपधारी इन्द्रकी धर्म और अर्थयुक्त हितकर बातें सुनकर इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग जिस मार्गपर चल रहे हैं वह हमारे लिये हितकर नहीं है। अतः वे उसे छोड़कर घर लौट गये और गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥

तस्मात्त्वमपि सर्वज्ञ धैर्यमालम्ब्य शाश्वतम् ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां हतामित्रां नरोत्तम ॥ २८ ॥

सर्वज्ञ नरश्रेष्ठ! अतः आप भी सदाके लिये धैर्य धारण करके शत्रुहीन हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कीजिये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये
ऋषिशकुनिसंवादकथने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनके वचनके प्रसंगमें ऋषियों और पक्षिरूपधारी इन्द्रके संवादका वर्णनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

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द्वादशोऽध्यायः

नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना

वैशम्पायन उवाच

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमब्रवीत् ।
राजानमभिसम्प्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरम् ।। १ ।।
अनुरुध्य महाप्राज्ञो भ्रातुश्चित्तमरिंदम ।
व्यूढोरस्को महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ।। २ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अर्जुनकी बात सुनकर नकुलने भी सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरकी ओर देखकर कुछ कहनेको उद्यत हुए। शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! महाबाहु नकुल बड़े बुद्धिमान् थे। उनकी छाती चौड़ी, मुख ताम्रवर्णका था। वे बड़े मितभाषी थे। उन्होंने भाईके चित्तका अनुसरण करते हुए कहा ।। १-२ ।।

नकुल उवाच

विशाखयूपे देवानां सर्वेषामग्नयश्चिताः ।
तस्माद् विद्धि महाराज देवाः कर्मफले स्थिताः ।। ३ ।।

नकुल बोले— महाराज! विशाखयूप नामक क्षेत्रमें सम्पूर्ण देवताओंद्वारा की हुई अग्निस्थापनाके चिह्न (ईंटोंकी बनी हुई वेदियाँ) मौजूद हैं। इससे आपको यह समझना चाहिये कि देवता भी वैदिक कर्मों और उनके फलोंपर विश्वास करते हैं ।। ३ ।।

अनास्तिकानां भूतानां प्राणदाः पितरश्च ये ।
तेऽपि कर्मैव कुर्वन्ति विधिं सम्प्रेक्ष्य पार्थिव ।। ४ ।।

राजन्! आस्तिकताकी बुद्धिसे रहित समस्त प्राणियोंके प्राणदाता पितर भी शास्त्रके विधिवाक्योंपर दृष्टि रखकर कर्म ही करते हैं ।। ४ ।।

वेदवादापविद्धांस्तु तान् विद्धि भृशनास्तिकान् ।
न हि वेदोक्तमुत्सृज्य विप्रः सर्वेषु कर्मसु ।। ५ ।।
देवयानेन नाकस्य पृष्ठमाप्नोति भारत ।

भारत! जो वेदोंकी आज्ञाके विरुद्ध चलते हैं, उन्हें बड़ा भारी नास्तिक समझिये। वेदकी आज्ञाका उल्लंघन करके सब प्रकारके कर्म करनेपर भी कोई ब्राह्मण देवयान मार्गके द्वारा स्वर्गलोककी पृष्ठभूमिमें पैर नहीं रख सकता ।। ५ १/२ ।।

अत्याश्रमानयं सर्वानित्याहुर्वेदनिश्चयाः ।। ६ ।।

ब्राह्मणाःश्रुतिसम्पन्नास्तान् निबोध नराधिप । यह गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा है। यह बात वेदोंके सिद्धान्तको जाननेवाले श्रुतिसम्पन्न ब्राह्मण कहते हैं। नरेश्वर! आप उनकी सेवामें उपस्थित होकर इस बातको समझिये ।। ६ १/२ ।। वित्तानि धर्मलब्धानि क्रतुमुख्येष्ववासृजन् ।। ७ ।। कृतात्मा स महाराज स वै त्यागी स्मृतो नरः ।। ८ ।। महाराज! जो धर्मसे प्राप्त किये हुए धनका श्रेष्ठ यज्ञोंमें उपयोग करता है और अपने मनको वशमें रखता है, वह मनुष्य त्यागी माना गया है ।। ७-८ ।। अनवेक्ष्य सुखादानं तथैवोर्ध्वं प्रतिष्ठितः । आत्मत्यागी महाराज स त्यागी तामसो मतः ।। ९ ।। महाराज! जिसने गृहस्थ-आश्रमके सुखभोगोंको कभी नहीं देखा, फिर भी जो ऊपरवाले वानप्रस्थ आदि आश्रमोंमें प्रतिष्ठित होकर देहत्याग करता है, उसे तामस त्यागी माना गया है ।। ९ ।। अनिकेतः परिपतन् वृक्षमूलाश्रयो मुनिः । अपाचकः सदा योगी स त्यागी पार्थ भिक्षुकः ।। १० ।। पार्थ! जिसका कोई घर-बार नहीं, जो इधर-उधर विचरता और चुपचाप किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़पर सो जाता है, जो अपने लिये कभी रसोई नहीं बनाता और सदा योगपरायण रहता है, ऐसे त्यागीको भिक्षुक कहते हैं ।। १० ।। क्रोधहर्षावनादृत्य पैशुन्यं च विशेषतः । विप्रो वेदानधीते यः स त्यागी पार्थ उच्यते ।। ११ ।। कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण क्रोध, हर्ष और विशेषतः चुगलीकी अवहेलना करके सदा वेदोंके स्वाध्यायमें लगा रहता है, वह त्यागी कहलाता है ।। ११ ।। आश्रमांस्तुलया सर्वान् धृतानाहुर्मनीषिणः । एकतश्च त्रयो राजन् गृहस्थाश्रम एकतः ।। १२ ।। राजन्! कहते हैं कि एक समय मनीषी पुरुषोंने चारों आश्रमोंको (विवेकके) तराजूपर रखकर तौला था। एक ओर तो अन्य तीनों आश्रम थे और दूसरी ओर अकेला गृहस्थ-आश्रम था ।। १२ ।। समीक्ष्य तुलया पार्थ कामं स्वर्गं च भारत । अयं पन्था महर्षीणामियं लोकविदां गतिः ।। १३ ।। भरतवंशी नरेश! पार्थ! इस प्रकार विवेककी तुलापर रखकर जब देखा गया तो गृहस्थ-आश्रम ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ; क्योंकि वहाँ भोग और स्वर्ग दोनों सुलभ थे। तबसे उन्होंने निश्चय किया कि ‘यही मुनियोंका मार्ग है और यही लोकवेत्ताओंकी गति है’ ।।

इति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ । न यः परित्यज्य गृहान् वनमेति विमूढवत् ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! जो ऐसा भाव रखता है, वही त्यागी है। जो मूर्खकी तरह घर छोड़कर वनमें चला जाता है, वह त्यागी नहीं है ॥ १४ ॥ यदा कामान् समीक्षेत धर्मवैतंसिको नरः । अथैनं मृत्युपाशेन कण्ठे बध्नाति मृत्युराट् ॥ १५ ॥ वनमें रहकर भी यदि धर्मध्वजी मनुष्य काम-भोगोंपर दृष्टिपात (उनका स्मरण) करता है तो यमराज उसके गलेमें मौतका फंदा डाल देते हैं ॥ १५ ॥ अभिमानकृतं कर्म नैतत् फलवदुच्यते । त्यागयुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ॥ १६ ॥ महाराज! यही कर्म यदि अभिमानपूर्वक किया जाय तो वह सफल नहीं होता, और त्यागपूर्वक किया हुआ सारा कर्म ही महान् फलदायक होता है ॥ १६ ॥ शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् । यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥ १७ ॥ शम, दम, धैर्य, सत्य, शौच, सरलता, यज्ञ, धृति तथा धर्म—इन सबका ऋषियोंके लिये निरन्तर पालन करनेका विधान है ॥ १७ ॥ पितृदेवातिथिकृते समारम्भोऽत्र शस्यते । अत्रैव हि महाराज त्रिवर्गः केवलं फलम् ॥ १८ ॥ महाराज! गृहस्थ-आश्रममें ही देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके लिये किये जानेवाले आयोजनकी प्रशंसा की जाती है। केवल यहीं धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों सिद्ध होते हैं ॥ १८ ॥ एतस्मिन् वर्तमानस्य विधावप्रतिषेधिते । त्यागिनः प्रसृतस्येह नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥ १९ ॥ यहाँ रहकर वेदविहित विधिका पालन करनेवाले निष्ठावान् त्यागीका कभी विनाश नहीं होता—वह पारलौकिक उन्नतिसे कभी वञ्चित नहीं रहता ॥ १९ ॥ असृजद्धि प्रजा राजन् प्रजापतिरकल्मषः । मां यक्ष्यन्तीति धर्मात्मा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ॥ २० ॥ राजन्! पापरहित धर्मात्मा प्रजापतिने इस उद्देश्यसे प्रजाओंकी सृष्टि की कि 'ये नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करेंगी' ॥ २० ॥ वीरुधश्चैव वृक्षांश्च यज्ञार्थं वै तथौषधीः । पशूंश्चैव तथा मेध्यान् यज्ञार्थानि हवींषि च ॥ २१ ॥ इसी उद्देश्यसे उन्होंने यज्ञसम्पादनके लिये नाना प्रकारकी लता-वेलों, वृक्षों, ओषधियों, मेध्य पशुओं तथा यज्ञार्थक हविष्योंकी भी सृष्टि की है ॥ २१ ॥

गृहस्थाश्रमिणस्तच्च यज्ञकर्म विरोधकम् । तस्माद् गार्हस्थ्यमेवेह दुष्करं दुर्लभं तथा ॥ २२ ॥ वह यज्ञकर्म गृहस्थाश्रमी पुरुषको एक मर्यादाके भीतर बाँध रखनेवाला है; इसलिये गार्हस्थ्यधर्म ही इस संसारमें दुष्कर और दुर्लभ है ॥ २२ ॥ तत् सम्प्राप्य गृहस्था ये पशुधान्यधनान्विताः । न यजन्ते महाराज शाश्वतं तेषु किल्बिषम् ॥ २३ ॥ महाराज! जो गृहस्थ उसे पाकर पशु और धन-धान्यसे सम्पन्न होते हुए भी यज्ञ नहीं करते हैं, उन्हें सदा ही पापका भागी होना पड़ता है ॥ २३ ॥ स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथा परे । अथापरे महायज्ञान् मनस्येव वितन्वते ॥ २४ ॥ कुछ ऋषि वेद-शास्त्रोंका स्वाध्यायरूप यज्ञ करनेवाले होते हैं, कुछ ज्ञानयज्ञमें तत्पर रहते हैं और कुछ लोग मनमें ही ध्यानरूपी महान् यज्ञोंका विस्तार करते हैं ॥ २४ ॥ एवं मनःसमाधानं मार्गमातिष्ठतो नृप । द्विजातेर्ब्रह्मभूतस्य स्पृहयन्ति दिवौकसः ॥ २५ ॥ नरेश्वर! चित्तको एकाग्र करना-रूप जो साधन है उसका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत हुए द्विजके दर्शनकी अभिलाषा देवता भी रखते हैं ॥ २५ ॥ स रत्नानि विचित्राणि संहृतानि ततस्ततः । मखेष्वनभिसंत्यज्य नास्तिक्यमभिजल्पसि ॥ २६ ॥ इधर-उधरसे जो विचित्र रत्न संग्रह करके लाये गये हैं, उनका यज्ञोंमें वितरण न करके आप नास्तिकताकी बातें कर रहे हैं ॥ २६ ॥ कुटुम्बमास्थिते त्यागं न पश्यामि नराधिप । राजसूयाश्वमेधेषु सर्वमेधेषु वा पुनः ॥ २७ ॥ नरेश्वर! जिसपर कुटुम्बका भार हो, उसके लिये त्यागका विधान नहीं देखनेमें आता है। उसे तो राजसूय, अश्वमेध अथवा सर्वमेध यज्ञोंमें प्रवृत्त होना चाहिये ॥ २७ ॥ ये चान्ये क्रतवस्तात ब्राह्मणैरभिपूजिताः । तैर्यजस्व महीपाल शक्रो देवपतिर्यथा ॥ २८ ॥ भूपाल! इनके सिवा जो दूसरे भी ब्राह्मणोंद्वारा प्रशंसित यज्ञ हैं, उनके द्वारा देवराज इन्द्रके समान आप भी यज्ञपुरुषकी आराधना कीजिये ॥ २८ ॥ राज्ञः प्रमाददोषेण दस्युभिः परिमुष्यताम् । अशरण्यः प्रजानां यः स राजा कलिरुच्यते ॥ २९ ॥ राजाके प्रमाददोषसे लुटेरे प्रबल होकर प्रजाको लूटने लगते हैं, उस अवस्थामें यदि राजाने प्रजाको शरण नहीं दी तो उसे मूर्तिमान् कलियुग कहा जाता है ॥ २९ ॥ अश्वान् गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलंकृताः ।

ग्रामाञ्जनपदांश्चैव क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥ ३० ॥ अप्रदाय द्विजातिभ्यो मात्सर्याविष्टचेतसः । वयं ते राजकलयो भविष्याम विशाम्पते ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! यदि हमलोग ईर्ष्यायुक्त मनवाले होकर ब्राह्मणोंको घोड़े, गाय, दासी, सजी-सजायी हथिनी, गाँव, जनपद, खेत और घर आदिका दान नहीं करते हैं तो राजाओंमें कलियुग समझे जायँगे ॥ ३०-३१ ॥

अदातारः शरण्याश्च राजकिल्बिषभागिनः । दोषाणामेव भोक्तारो न सुखानां कदाचन ॥ ३२ ॥ जो दान नहीं देते, शरणागतोंकी रक्षा नहीं करते, वे राजाओंके पापके भागी होते हैं। उन्हें दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है, सुख तो कभी नहीं मिलता ॥ ३२ ॥

अनिष्ट्वा च महायज्ञैरकृत्वा च पितृस्वधाम् । तीर्थेष्वनभिसम्प्लुत्य प्रव्रजिष्यसि चेत् प्रभो ॥ ३३ ॥ छिन्नाभ्रमिव गन्तासि विलयं मारुतेरितम् । लोकयोरुभयोर्भ्रष्टो ह्यन्तराले व्यवस्थितः ॥ ३४ ॥ प्रभो! बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान, पितरोंका श्राद्ध तथा तीर्थोंमें स्नान किये बिना ही आप संन्यास ले लेंगे तो हवा-द्वारा छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान नष्ट हो जायँगे। लोक और परलोक दोनोंसे भ्रष्ट होकर (त्रिशंकुके समान) बीचमें ही लटके रह जायँगे ॥ ३३-३४ ॥

अन्तर्बहिश्च यत् किंचिन्मनोव्यासंगकारकम् । परित्यज्य भवेत् त्यागी न हित्वा प्रतितिष्ठति ॥ ३५ ॥ बाहर और भीतर जो कुछ भी मनको फँसानेवाली चीजें हैं, उन सबको छोड़नेसे मनुष्य त्यागी होता है। केवल घर छोड़ देनेसे त्यागकी सिद्धि नहीं होती ॥ ३५ ॥

एतस्मिन् वर्तमानस्य विधावप्रतिषेधिते । ब्राह्मणस्य महाराज नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥ ३६ ॥ महाराज! इस गृहस्थ-आश्रममें ही रहकर वेद-विहित कर्ममें लगे हुए ब्राह्मणका कभी उच्छेद (पतन) नहीं होता ॥ ३६ ॥

निहत्य शत्रूंस्तरसा समृद्धान् शक्रो यथा दैत्यबलानि संख्ये । कः पार्थ शोचेन्निरतः स्वधर्मे पूर्वैः स्मृते पार्थिव शिष्टजुष्टे ॥ ३७ ॥ कुन्तीनन्दन! जैसे इन्द्र युद्धमें दैत्योंकी सेनाओंका संहार करते हैं, उसी प्रकार जो वेगपूर्वक बढ़े-चढ़े शत्रुओंका वध करके विजय पा चुका हो और पूर्ववर्ती राजाओंद्वारा

सेवित अपने धर्ममें तत्पर रहता हो, ऐसा (आपके सिवा) कौन राजा शोक करेगा? ॥ ३७ ॥

क्षात्रेण धर्मेण पराक्रमेण जित्वा महीं मन्त्रविद्भ्यः प्रदाय । नाकस्य पृष्ठेऽसि नरेन्द्र गन्ता न शोचितव्यं भवताद्य पार्थ ॥ ३८ ॥

नरेन्द्र! कुन्तीकुमार! आप क्षत्रियधर्मके अनुसार पराक्रमद्वारा इस पृथ्वीपर विजय पाकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंको यज्ञमें बहुत-सी दक्षिणाएँ देकर स्वर्गसे भी ऊपर चले जायँगे? अतः आज आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि नकुलवाक्ये द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें नकुलवाक्यविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

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त्रयोदशोऽध्यायः

सहदेवका युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना

सहदेव उवाच
न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत ।
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥ १ ॥
**सहदेव बोले—**भरतनन्दन! केवल बाहरी द्रव्यका त्याग कर देनेसे सिद्धि नहीं मिलती, शरीरसम्बन्धी द्रव्यका त्याग करनेसे भी सिद्धि मिलती है या नहीं; इसमें संदेह है ॥ १ ॥
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेष्वनुगृध्यतः ।
यो धर्मो यत् सुखं वा स्याद् द्विषतां तत् तथास्तु नः ॥ २ ॥
बाहरी द्रव्योंसे दूर होकर दैहिक सुख-भोगोंमें आसक्त रहनेवालेको जो धर्म अथवा जो सुख प्राप्त होता हो, वह उस रूपमें हमारे शत्रुओंको ही मिले ॥ २ ॥
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः ।
यो धर्मो यत् सुखं वा स्यात् सुहृदां तत् तथास्तु नः ॥ ३ ॥
परंतु शरीरके उपयोगमें आनेवाले द्रव्योंकी ममता त्यागकर अनासक्तभावसे पृथिवीका शासन करनेवाले राजाको जिस धर्म अथवा जिस सुखकी प्राप्ति होती हो, वह हमारे हितैषी सुहृदोंको मिले ॥ ३ ॥
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ ४ ॥
दो अक्षरोंका 'मम' (यह मेरा है—ऐसा भाव) मृत्यु है, और तीन अक्षरोंका 'न मम' (यह मेरा नहीं है—ऐसा भाव) अमृत—सनातन ब्रह्म है ॥ ४ ॥
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ ।
अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥ ५ ॥
राजन्! इससे सूचित होता है कि मृत्यु और अमृत-ब्रह्म दोनों अपने ही भीतर स्थित हैं। वे ही अदृश्यभावसे रहकर प्राणियोंको एक-दूसरेसे लड़ाते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत ।
हत्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! यदि इस जीवात्माका अविनाशी होना निश्चित है, तब तो प्राणियोंके शरीरका वध करनेमात्रसे उनकी हिंसा नहीं हो सकेगी ॥ ६ ॥
अथापि च सहोत्पत्तिः सत्त्वस्य प्रलयस्तथा ।

नष्टे शरीरे नष्टः स्याद् वृथा च स्यात् क्रियापथः ॥ ७ ॥ इसके विपरीत यदि शरीरके साथ ही जीवकी उत्पत्ति तथा उसके नष्ट होनेके साथ ही जीवका नाश होना माना जाय तब तो शरीर नष्ट होनेपर जीव भी नष्ट ही हो जायगा; उस दशामें सारा वैदिक कर्ममार्ग ही व्यर्थ सिद्ध होगा ॥ ७ ॥

तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः । पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता ॥ ८ ॥ इसलिये विज्ञ पुरुषको एकान्तमें रहनेका विचार छोड़कर पूर्ववर्ती तथा अत्यन्त पूर्ववर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंने जिस मार्गका सेवन किया है, उसीका आश्रय लेना चाहिये ॥ ८ ॥

(स्वायम्भुवेन मनुना तथान्यैश्चक्रवर्तिभिः । यद्ययं ह्यधमः पन्थाः कस्मात् तैस्तैर्निषेवितः ॥ यदि आपकी दृष्टिमें गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए राज्यशासन करना अधम मार्ग है तो स्वायम्भुव मनु तथा उन-उन अन्य चक्रवर्ती नरेशोंने इसका सेवन क्यों किया था? ॥

कृतत्रेतादियुक्तानि गुणवन्ति च भारत । युगानि बहुशस्तैश्च भुक्तेयमवनी नृप ॥) भरतवंशी नरेश! उन नरपतियोंने उत्तम गुणवाले सत्ययुग-त्रेता आदि अनेक युगोंतक इस पृथ्वीका उपभोग किया है ॥

लब्ध्वापि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजंगमाम् । न भुंक्ते यो नृपःसम्यङ् निष्फलं तस्य जीवितम् ॥ ९ ॥ जो राजा चराचर प्राणियोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको पाकर इसका अच्छे ढंगसे उपभोग नहीं करता, उसका जीवन निष्फल है ॥ ९ ॥

अथवा वसतो राजन् वने वन्येन जीवतः । द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ १० ॥ अथवा राजन्! वनमें रहकर वनके ही फल-फूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए भी जिस पुरुषकी द्रव्योंमें ममता बनी रहती है, वह मौतके ही मुखमें है ॥ १० ॥

बाह्यान्तरं च भूतानां स्वभावं पश्य भारत । ये तु पश्यन्ति तद् भूतं मुच्यन्ते ते महाभयात् ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! प्राणियोंका बाह्य स्वभाव कुछ और होता है और आन्तरिक स्वभाव कुछ और। आप उसपर गौर कीजिये। जो सबके भीतर विराजमान परमात्माको देखते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥

भवान् पिता भवान् माता भवान् भ्राता भवान् गुरुः । दुःखप्रलापार्तस्य तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ प्रभो! आप मेरे पिता, माता, भ्राता और गुरु हैं। मैंने आर्त होकर दुःखमें जो-जो प्रलाप किये हैं, उन सबको आप क्षमा करें ॥ १२ ॥

तथ्यं वा यदि वातथ्यं यन्मयैतत् प्रभाषितम् ।
तद् विद्धि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम ।। १३ ।।

भरतवंशभूषण भूपाल! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह यथार्थ हो या अयथार्थ, आपके प्रति भक्ति होनेके कारण ही ये बातें मेरे मुँहसे निकली हैं, यह आप अच्छी तरह समझ लें ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सहदेववाक्ये
त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सहदेववाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं)

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चतुर्दशोऽध्यायः

द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना

वैशम्पायन उवाच

अव्याहरति कौन्तेये धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
भ्रातॄणां ब्रुवतां तांस्तान् विविधान् वेदनिश्चयान् ॥ १ ॥
महाभिजनसम्पन्ना श्रीमत्यायतलोचना ।
अभ्यभाषत राजेन्द्र द्रौपदी योषितां वरा ॥ २ ॥
आसीनमृषभं राज्ञां भ्रातृभिः परिवारितम् ।
सिंहशार्दूलसदृशैर्वारणैरिव यूथपम् ॥ ३ ॥
अभिमानवती नित्यं विशेषेण युधिष्ठिरे ।
लालिता सततं राज्ञा धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी ॥ ४ ॥
आमन्त्र्य विपुलश्रोणी साम्ना परमवल्गुना ।
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य ततो वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अपने भाइयोंके मुखसे नाना प्रकारके वेदोंके सिद्धान्तोंको सुनकर भी जब कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कुछ नहीं बोले, तब महान् कुलमें उत्पन्न हुई, युवतियोंमें श्रेष्ठ, स्थूल, नितम्ब और विशाल नेत्रोंवाली, पतियों एवं विशेषतः राजा युधिष्ठिरके प्रति अभिमान रखनेवाली, राजाकी सदा ही लाड़िली, धर्मपर दृष्टि रखनेवाली तथा धर्मको जाननेवाली श्रीमती महारानी द्रौपदी हाथियोंसे घिरे हुए यूथपति गजराजकी भाँति सिंहशार्दूल-सदृश पराक्रमी भाइयोंसे घिरकर बैठे हुए पतिदेव नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरकी ओर देखकर उन्हें सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीमें इस प्रकार बोलीं ॥ १—५ ॥

द्रौपद्युवाच

इमे ते भ्रातरः पार्थ शुष्यन्ते स्तोकका इव ।
वावाश्यमानास्तिष्ठन्ति न चैनानभिनन्दसे ॥ ६ ॥

कुन्तीकुमार! आपके ये भाई आपका संकल्प सुनकर सूख गये हैं; पपीहोंके समान आपसे राज्य करनेकी रट लगा रहे हैं; फिर भी आप इनका अभिनन्दन नहीं करते? ॥

नन्दयैतान् महाराज मत्तानिव महाद्विपान् । उपपन्नेन वाक्येन सततं दुःखभागिनः ॥ ७ ॥ महाराज! उन्मत्त गजराजोंके समान आपके ये बन्धु सदा आपके लिये दुःख ही-दुःख उठाते आये हैं। अब तो इन्हें युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आनन्दित कीजिये ॥ ७ ॥ कथं द्वैतवने राजन् पूर्वमुक्त्वा तथा वचः । भ्रातृनेतान् स्म सहितान् शीतवातातपार्दितान् ॥ ८ ॥ वयं दुर्योधनं हत्वा मृधे भोक्ष्याम मेदिनीम् । सम्पूर्णां सर्वकामानामाहवे विजयैषिणः ॥ ९ ॥ विरथांश्च रथान् कृत्वा निहत्य च महागजान् । संस्तीर्य च रथैर्भूमिं ससादिभिररिंदमाः ॥ १० ॥ यजतां विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । वनवासकृतं दुःखं भविष्यति सुखाय वः ॥ ११ ॥ इत्येतानेवमुक्त्वा त्वं स्वयं धर्मभृतां वर । कथमद्य पुनर्वीर विनिहंसि मनांसि नः ॥ १२ ॥

राजन्! द्वैतवनमें ये सभी भाई जब आपके साथ सर्दी-गर्मी और आँधी-पानीका कष्ट भोग रहे थे, उन दिनों आपने इन्हें धैर्य देते हुए कहा था—'शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर बन्धुओ! विजयकी इच्छावाले हमलोग युद्धमें दुर्योधनको मारकर रथियोंको रथहीन करके बड़े-बड़े हाथियोंका वध कर डालेंगे और घुड़सवारसहित रथोंसे इस पृथ्वीको पाट देंगे। तत्पश्चात् सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न वसुधाका उपभोग करेंगे। उस समय पर्याप्त दान-दक्षिणावाले नाना प्रकारके समृद्धिशाली यज्ञोंके द्वारा भगवान्‌की आराधनामें लगे रहनेसे तुमलोगोंका यह वनवासजनित दुःख सुखरूपमें परिणत हो जायगा।' धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! वीर महाराज! पहले द्वैतवनमें इन भाइयोंसे स्वयं ही ऐसी बातें कहकर आज क्यों आप फिर हमलोगोंका दिल तोड़ रहे हैं ॥ ८—१२ ॥

न क्लीबो वसुधां भुङ्क्ते न क्लीबो धनमश्नुते । न क्लीबस्य गृहे पुत्रा मत्स्याः पंक इवासते ॥ १३ ॥ जो कायर और नपुंसक है, वह पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। वह न तो धनका उपार्जन कर सकता है और न उसे भोग ही सकता है। जैसे केवल कीचड़में मछलियाँ नहीं होतीं, उसी प्रकार नपुंसकके घरमें पुत्र नहीं होते ॥ १३ ॥

नादण्डः क्षत्रियो भाति नादण्डो भूमिमश्नुते । नादण्डस्य प्रजा राज्ञः सुखं विन्दन्ति भारत ॥ १४ ॥ जो दण्ड देनेकी शक्ति नहीं रखता, उस क्षत्रियकी शोभा नहीं होती, दण्ड न देनेवाला राजा इस पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। भारत! दण्डहीन राजाकी प्रजाओंको कभी सुख नहीं मिलता है ॥ १४ ॥

मित्रता सर्वभूतेषु दानमध्ययनं तपः । ब्राह्मणस्यैव धर्मः स्यान्न राज्ञो राजसत्तम ॥ १५ ॥ नृपश्रेष्ठ! समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव, दान लेना, देना, अध्ययन और तपस्या—यह ब्राह्मणका ही धर्म है, राजाका नहीं ॥ १५ ॥

असतां प्रतिषेधश्च सतां च परिपालनम् । एष राज्ञां परो धर्मः समरे चापलायनम् ॥ १६ ॥ राजाओंका परम धर्म तो यही है कि वे दुष्टोंको दण्ड दें, सत्पुरुषोंका पालन करें और युद्धमें कभी पीठ न दिखावें ॥ १६ ॥

यस्मिन् क्षमा च क्रोधश्च दानादाने भयाभये । निग्रहानुग्रहौ चोभौ स वै धर्मविदुच्यते ॥ १७ ॥ जिसमें समयानुसार क्षमा और क्रोध दोनों प्रकट होते हैं, जो दान देता और कर लेता है, जिसमें शत्रुओंको भय दिखाने और शरणागतोंको अभय देनेकी शक्ति है, जो दुष्टोंको दण्ड देता और दीनोंपर अनुग्रह करता है, वही धर्मज्ञ कहलाता है ॥ १७ ॥

न श्रुतेन न दानेन न सान्त्वेन न चेज्यया ।

त्वयेयं पृथिवी लब्धा न संकोचेन चाप्युत ॥ १८ ॥
आपको यह पृथिवी न तो शास्त्रोंके श्रवणसे मिली है, न दानमें प्राप्त हुई है, न किसीको समझाने-बुझानेसे उपलब्ध हुई है, न यज्ञ करानेसे और न कहीं भीख माँगनेसे ही प्राप्त हुई है ॥ १८ ॥

यत् तद् बलममित्राणां तथा वीर्यसमुद्यतम् ।
हस्त्यश्वरथसम्पन्नं त्रिभिरङ्गैरुत्तमम् ॥ १९ ॥
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च ।
तत् त्वया निहतं वीर तस्माद् भुङ्क्ष्व वसुन्धराम् ॥ २० ॥
वह जो शत्रुओंकी पराक्रम-सम्पन्न एवं श्रेष्ठ सेना हाथी, घोड़े और रथ तीनों अंगोंसे सम्पन्न थी तथा द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य जिसकी रक्षा करते थे, उसका आपने वध किया है, तब यह पृथ्वी आपके अधिकारमें आयी है। अतः वीर! आप इसका उपभोग करें ॥

जम्बूद्वीपो महाराज नानाजनपदैर्युतः ।
त्वया पुरुषशार्दूल दण्डेन मृदितः प्रभो ॥ २१ ॥
प्रभो! महाराज! पुरुषसिंह! आपने अनेक जनपदोंसे युक्त इस जम्बूद्वीपको अपने दण्डसे रौंद डाला है ॥ २१ ॥

जम्बूद्वीपेन सदृशः क्रौञ्चद्वीपो नराधिप ।
अधरेण महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया ॥ २२ ॥
नरेश्वर! जम्बूद्वीपके समान ही क्रौञ्चद्वीपको जो महामेरुसे पश्चिम है, आपने दण्डसे कुचल दिया है ॥ २२ ॥

क्रौञ्चद्वीपेन सदृशः शाकद्वीपो नराधिप ।
पूर्वेण तु महामेरोर्दण्डेन मृदितास्त्वया ॥ २३ ॥
नरेन्द्र! क्रौञ्चद्वीपके समान ही शाकद्वीपको जो महामेरुसे पूर्व है, आपने दण्ड देकर दबा दिया है ॥ २३ ॥

उत्तरेण महामेरोः शाकद्वीपेन सम्मितः ।
भद्राश्वः पुरुषव्याघ्र दण्डेन मृदितस्त्वया ॥ २४ ॥
पुरुषसिंह! महामेरुसे उत्तर शाकद्वीपके बराबर ही जो भद्राश्व वर्ष है, उसे भी आपके दण्डसे दबना पड़ा है ॥

द्वीपाश्च सान्तरद्वीपा नानाजनपदाश्रयाः ।
विगाह्य सागरं वीर दण्डेन मृदितास्त्वया ॥ २५ ॥
वीर! इनके अतिरिक्त भी जो बहुत-से देशोंके आश्रयभूत द्वीप और अन्तर्द्वीप हैं, समुद्र लाँघकर उन्हें भी आपने दण्डद्वारा दबाकर अपने अधिकारमें कर लिया है ॥ २५ ॥

एतान्यप्रतिमेयानि कृत्वा कर्माणि भारत ।

न प्रीयसे महाराज पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। २६ ।।

भरतनन्दन! महाराज! आप ऐसे-ऐसे अनुपम पराक्रम करके द्विजातियोंद्वारा

सम्मानित होकर भी प्रसन्न नहीं हो रहे हैं? ।। २६ ।।

स त्वं भ्रातॄनिमान् दृष्ट्वा प्रतिनन्दस्व भारत ।

ऋषभानिव सम्मत्तान् गजेन्द्रानूर्जितानिव ।। २७ ।।

भारत! मतवाले साँडों और बलशाली गजराजोंके समान अपने इन भाइयोंको देखकर

आप इनका अभिनन्दन कीजिये ।। २७ ।।

अमरप्रतिमाः सर्वे शत्रुसाहाः परंतपाः ।

एकोऽपि हि सुखायैषां मम स्यादिति मे मतिः ।। २८ ।।

किं पुनः पुरुषव्याघ्र पतयो मे नरर्षभाः ।

समस्तानीन्द्रियाणीव शरीरस्य विचेष्टने ।। २९ ।।

पुरुषसिंह! शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके ये सभी भाई शत्रु-सैनिकोंका वेग सहन

करनेमें समर्थ हैं, देवताओंके समान तेजस्वी हैं, मेरा विश्वास है कि इनमेंसे एक वीर भी मुझे

पूर्ण सुखी बना सकता है, फिर ये मेरे पाँचों नरश्रेष्ठ पति क्या नहीं कर सकते हैं? शरीरको

चेष्टाशील बनानेमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका जो स्थान है, वही मेरे जीवनको सुखी बनानेमें इन

सबका है ।। २८-२९ ।।

अनृतं नाब्रवीच्छ्वश्रूः सर्वज्ञा सर्वदर्शनी ।

युधिष्ठिरस्त्वां पाञ्चालि सुखे धास्यत्यनुत्तमे ।। ३० ।।

हत्वा राजसहस्राणि बहून्याशुपराक्रमः ।

तद् व्यर्थं सम्प्रपश्यामि मोहात् तव जनाधिप ।। ३१ ।।

महाराज! मेरी सास कभी झूठ नहीं बोलीं। वे सर्वज्ञ हैं और सब कुछ देखनेवाली हैं।

उन्होंने मुझसे कहा था—'पाञ्चालराजकुमारि! युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाले

हैं। ये कई सहस्र राजाओंका संहार करके तुम्हें सुखके सिंहासनपर प्रतिष्ठित करेंगे।' किंतु

जनेश्वर! आज आपका यह मोह देखकर मुझे अपनी सासकी कही हुई बात भी व्यर्थ होती

दिखायी देती है ।।

येषामुन्मत्तको ज्येष्ठः सर्वे तेऽप्यनुसारिणः ।

तवोन्मादान्महाराज सोन्मादाः सर्वपाण्डवाः ।। ३२ ।।

जिनका जेठा भाई उन्मत्त हो जाता है, वे सभी उसीका अनुकरण करने लगते हैं।

महाराज! आपके उन्मादसे सारे पाण्डव भी उन्मत्त हो गये हैं ।। ३२ ।।

यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते नराधिप ।

बद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासैयुर्वसुन्धराम् ।। ३३ ।।

नरेश्वर! यदि ये आपके भाई उन्मत्त नहीं हुए होते तो नास्तिकोंके साथ आपको भी

बाँधकर स्वयं इस वसुधाका शासन करते ।। ३३ ।।

कुरुते मूढ एवं हि यः श्रेयो नाधिगच्छति ।
धूपैरञ्जनयोगैश्च नस्यकर्मभिरेव च ॥ ३४ ॥
भेषजैः स चिकित्सः स्याद् य उन्मार्गेण गच्छति ।
जो मूर्ख इस प्रकारका काम करता है, वह कभी कल्याणका भागी नहीं होता। जो उन्मादग्रस्त होकर उलटे मार्गसे चलने लगता है, उसके लिये धूपकी सुगंध देकर, आँखोंमें सिद्ध अंजन लगाकर, नाकमें सुँघनी सुँघाकर अथवा और कोई औषध खिलाकर उसके रोगकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३४ १/२ ॥
साहं सर्वाधमा लोके स्त्रीणां भरतसत्तम ॥ ३५ ॥
तथा विनिकृता पुत्रैर्याहमिच्छामि जीवितुम् ।
भरतश्रेष्ठ! मैं ही संसारकी सब स्त्रियोंमें अधम हूँ, जो कि पुत्रोंसे हीन हो जानेपर भी जीवित रहना चाहती हूँ ॥ ३५ १/२ ॥
एतेषां यतमानानां न मेऽद्य वचनं मृषा ॥ ३६ ॥
त्वं तु सर्वां महीं त्यक्त्वा कुरुषे स्वयमापदम् ।
ये सब लोग आपको समझानेका प्रयत्न कर रहे हैं, फिर भी आप ध्यान नहीं देते। मैं इस समय जो कुछ कह रही हूँ मेरी यह बात झूठी नहीं है। आप सारी पृथ्वीका राज्य छोड़कर अपने लिये स्वयं ही विपत्ति खड़ी कर रहे हैं ॥ ३६ १/२ ॥
यथाऽऽस्तां संमतौ राज्ञां पृथिव्यां राजसत्तम ॥ ३७ ॥
मान्धाता चाम्बरीषश्च तथा राजन् विराजसे ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे मान्धाता और अम्बरीष भूमण्डलके समस्त राजाओंमें सम्मानित थे, राजन्! वैसे ही आप भी सुशोभित हो रहे हैं ॥ ३७ १/२ ॥
प्रशाधि पृथिवीं देवीं प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३८ ॥
सपर्वतवनद्वीपां मा राजन् विमना भव ।
नरेश्वर! धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए पर्वत, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वी देवीका शासन कीजिये। इस उदासीन न होइये ॥ ३८ १/२ ॥
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्युध्यस्वारीन् प्रयच्छ च ।
धनानि भोगान् वासांसि द्विजातिभ्यो नृपोत्तम ॥ ३९ ॥
नृपश्रेष्ठ! नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान और शत्रुओंके साथ युद्ध कीजिये। ब्राह्मणोंको धन, भोगसामग्री और वस्त्रोंका दान कीजिये ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये
चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

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अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन

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पञ्चदशोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् ।
अनुमान्य महाबाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमच्युतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रुपदकुमारीका यह वचन सुनकर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले बड़े भाई महाबाहु युधिष्ठिरका सम्मान करते हुए अर्जुनने फिर इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

अर्जुन उवाच

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ २ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! दण्ड समस्त प्रजाओंका शासन करता है, दण्ड ही उनकी सब ओरसे रक्षा करता है, सबके सो जानेपर भी दण्ड जागता रहता है; इसलिये विद्वान् पुरुषोंने दण्डको राजाका धर्म माना है ॥ २ ॥

दण्डः संरक्षते धर्मं तथैवार्थं जनाधिप ।
कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते ॥ ३ ॥
जनेश्वर! दण्ड ही धर्म और अर्थकी रक्षा करता है, वही कामका भी रक्षक है, अतः दण्ड त्रिवर्गरूप कहा जाता है ॥ ३ ॥

दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते ।
एवं विद्वानुपाधत्स्व भावं पश्यस्व लौकिकम् ॥ ४ ॥
दण्डसे धान्यकी रक्षा होती है, उसीसे धनकी भी रक्षा होती है; ऐसा जानकर आप भी दण्ड धारण कीजिये और जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालिये ॥ ४ ॥

राजदण्डभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
यमदण्डभयादेके परलोकभयादपि ॥ ५ ॥
परस्परभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६ ॥
कितने ही पापी राजदण्डके भयसे पाप नहीं करते हैं। कुछ लोग यमदण्डके भयसे, कोई परलोकके भयसे और कितने ही पापी आपसमें एक-दूसरेके भयसे पाप नहीं करते हैं। जगत्की ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है; इसलिये सब कुछ दण्डमें ही प्रतिष्ठित है ॥ ५-६ ॥

दण्डस्यैव भयादेके न खादन्ति परस्परम् । अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ७ ॥ बहुत-से मनुष्य दण्डके ही भयसे एक-दूसरेको खा नहीं जाते हैं, यदि दण्ड रक्षा न करे तो सब लोग घोर अन्धकारमें डूब जायँ ॥ ७ ॥

यस्माददान्तान् दमयत्यशिष्टान् दण्डयत्यपि । दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः ॥ ८ ॥ यह उद्दण्ड मनुष्योंका दमन करता और दुष्टोंको दण्ड देता है, अतः उस दमन और दण्डके कारण ही विद्वान् पुरुष इसे दण्ड कहते हैं ॥ ८ ॥

वाचा दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम् । दानदण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते ॥ ९ ॥ यदि ब्राह्मण अपराध करे तो वाणीसे उसको अपमानित करना ही उसका दण्ड है, क्षत्रियको भोजनमात्रके लिये वेतन देकर उससे काम लेना उसका दण्ड है, वैश्योंसे जुर्मानाके रूपमें धन वसूल करना उनका दण्ड है, परंतु शूद्र दण्डरहित कहा गया है। उससे सेवा लेनेके सिवा और कोई दण्ड उसके लिये नहीं है ॥ ९ ॥

असम्मोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च । मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशाम्पते ॥ १० ॥ प्रजानाथ! मनुष्योंको प्रमादसे बचाने और उनके धनकी रक्षा करनेके लिये लोकमें जो मर्यादा स्थापित की गयी है, उसीका नाम दण्ड है ॥ १० ॥

यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूद्यतः । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ते नेता चेत् साधु पश्यति ॥ ११ ॥ दण्डनीयपर ऐसी जोरकी मार पड़ती है कि उसकी आँखोंके सामने अँधेरा छा जाता है; इसलिये दण्डको काला कहा गया है। दण्ड देनेवालेकी आँखें क्रोधसे लाल रहती हैं; इसलिये उसे लोहिताक्ष कहते हैं। ऐसा दण्ड जहाँ सर्वथा शासनके लिये उद्यत होकर विचरता रहता है और नेता या शासक अच्छी तरह अपराधोंपर दृष्टि रखता है, वहाँ प्रजा प्रमाद नहीं करती ॥ ११ ॥

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः । दण्डस्यैव भयादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ॥ १२ ॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये सभी मनुष्य दण्डके ही भयसे अपने-अपने मार्गपर स्थिर रहते हैं ॥ १२ ॥

नाभीतो यजते राजन् नाभीतो दातुमिच्छति । नाभीतः पुरुषः कश्चित् समये स्थातुमिच्छति ॥ १३ ॥ राजन्! बिना भयके कोई यज्ञ नहीं करता है, बिना भयके कोई दान नहीं करना चाहता है, और दण्डका भय न हो तो कोई पुरुष मर्यादा या प्रतिज्ञाके पालनपर भी स्थिर नहीं