महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सेवित अपने धर्ममें तत्पर रहता हो, ऐसा (आपके सिवा) कौन राजा शोक करेगा? ॥ ३७ ॥
क्षात्रेण धर्मेण पराक्रमेण जित्वा महीं मन्त्रविद्भ्यः प्रदाय । नाकस्य पृष्ठेऽसि नरेन्द्र गन्ता न शोचितव्यं भवताद्य पार्थ ॥ ३८ ॥
नरेन्द्र! कुन्तीकुमार! आप क्षत्रियधर्मके अनुसार पराक्रमद्वारा इस पृथ्वीपर विजय पाकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंको यज्ञमें बहुत-सी दक्षिणाएँ देकर स्वर्गसे भी ऊपर चले जायँगे? अतः आज आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि नकुलवाक्ये द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें नकुलवाक्यविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
सहदेवका युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना
सहदेव उवाच
न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत ।
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥ १ ॥
**सहदेव बोले—**भरतनन्दन! केवल बाहरी द्रव्यका त्याग कर देनेसे सिद्धि नहीं मिलती, शरीरसम्बन्धी द्रव्यका त्याग करनेसे भी सिद्धि मिलती है या नहीं; इसमें संदेह है ॥ १ ॥
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेष्वनुगृध्यतः ।
यो धर्मो यत् सुखं वा स्याद् द्विषतां तत् तथास्तु नः ॥ २ ॥
बाहरी द्रव्योंसे दूर होकर दैहिक सुख-भोगोंमें आसक्त रहनेवालेको जो धर्म अथवा जो सुख प्राप्त होता हो, वह उस रूपमें हमारे शत्रुओंको ही मिले ॥ २ ॥
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः ।
यो धर्मो यत् सुखं वा स्यात् सुहृदां तत् तथास्तु नः ॥ ३ ॥
परंतु शरीरके उपयोगमें आनेवाले द्रव्योंकी ममता त्यागकर अनासक्तभावसे पृथिवीका शासन करनेवाले राजाको जिस धर्म अथवा जिस सुखकी प्राप्ति होती हो, वह हमारे हितैषी सुहृदोंको मिले ॥ ३ ॥
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ ४ ॥
दो अक्षरोंका 'मम' (यह मेरा है—ऐसा भाव) मृत्यु है, और तीन अक्षरोंका 'न मम' (यह मेरा नहीं है—ऐसा भाव) अमृत—सनातन ब्रह्म है ॥ ४ ॥
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ ।
अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥ ५ ॥
राजन्! इससे सूचित होता है कि मृत्यु और अमृत-ब्रह्म दोनों अपने ही भीतर स्थित हैं। वे ही अदृश्यभावसे रहकर प्राणियोंको एक-दूसरेसे लड़ाते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत ।
हत्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! यदि इस जीवात्माका अविनाशी होना निश्चित है, तब तो प्राणियोंके शरीरका वध करनेमात्रसे उनकी हिंसा नहीं हो सकेगी ॥ ६ ॥
अथापि च सहोत्पत्तिः सत्त्वस्य प्रलयस्तथा ।
नष्टे शरीरे नष्टः स्याद् वृथा च स्यात् क्रियापथः ॥ ७ ॥ इसके विपरीत यदि शरीरके साथ ही जीवकी उत्पत्ति तथा उसके नष्ट होनेके साथ ही जीवका नाश होना माना जाय तब तो शरीर नष्ट होनेपर जीव भी नष्ट ही हो जायगा; उस दशामें सारा वैदिक कर्ममार्ग ही व्यर्थ सिद्ध होगा ॥ ७ ॥
तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः । पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता ॥ ८ ॥ इसलिये विज्ञ पुरुषको एकान्तमें रहनेका विचार छोड़कर पूर्ववर्ती तथा अत्यन्त पूर्ववर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंने जिस मार्गका सेवन किया है, उसीका आश्रय लेना चाहिये ॥ ८ ॥
(स्वायम्भुवेन मनुना तथान्यैश्चक्रवर्तिभिः । यद्ययं ह्यधमः पन्थाः कस्मात् तैस्तैर्निषेवितः ॥ यदि आपकी दृष्टिमें गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए राज्यशासन करना अधम मार्ग है तो स्वायम्भुव मनु तथा उन-उन अन्य चक्रवर्ती नरेशोंने इसका सेवन क्यों किया था? ॥
कृतत्रेतादियुक्तानि गुणवन्ति च भारत । युगानि बहुशस्तैश्च भुक्तेयमवनी नृप ॥) भरतवंशी नरेश! उन नरपतियोंने उत्तम गुणवाले सत्ययुग-त्रेता आदि अनेक युगोंतक इस पृथ्वीका उपभोग किया है ॥
लब्ध्वापि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजंगमाम् । न भुंक्ते यो नृपःसम्यङ् निष्फलं तस्य जीवितम् ॥ ९ ॥ जो राजा चराचर प्राणियोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको पाकर इसका अच्छे ढंगसे उपभोग नहीं करता, उसका जीवन निष्फल है ॥ ९ ॥
अथवा वसतो राजन् वने वन्येन जीवतः । द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ १० ॥ अथवा राजन्! वनमें रहकर वनके ही फल-फूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए भी जिस पुरुषकी द्रव्योंमें ममता बनी रहती है, वह मौतके ही मुखमें है ॥ १० ॥
बाह्यान्तरं च भूतानां स्वभावं पश्य भारत । ये तु पश्यन्ति तद् भूतं मुच्यन्ते ते महाभयात् ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! प्राणियोंका बाह्य स्वभाव कुछ और होता है और आन्तरिक स्वभाव कुछ और। आप उसपर गौर कीजिये। जो सबके भीतर विराजमान परमात्माको देखते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥
भवान् पिता भवान् माता भवान् भ्राता भवान् गुरुः । दुःखप्रलापार्तस्य तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ प्रभो! आप मेरे पिता, माता, भ्राता और गुरु हैं। मैंने आर्त होकर दुःखमें जो-जो प्रलाप किये हैं, उन सबको आप क्षमा करें ॥ १२ ॥
तथ्यं वा यदि वातथ्यं यन्मयैतत् प्रभाषितम् ।
तद् विद्धि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम ।। १३ ।।
भरतवंशभूषण भूपाल! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह यथार्थ हो या अयथार्थ, आपके प्रति भक्ति होनेके कारण ही ये बातें मेरे मुँहसे निकली हैं, यह आप अच्छी तरह समझ लें ।। १३ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सहदेववाक्ये
त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सहदेववाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं)
चतुर्दशोऽध्यायः
द्रौपदीका युधिष्ठिरको राजदण्डधारणपूर्वक पृथ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना
वैशम्पायन उवाच
अव्याहरति कौन्तेये धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
भ्रातॄणां ब्रुवतां तांस्तान् विविधान् वेदनिश्चयान् ॥ १ ॥
महाभिजनसम्पन्ना श्रीमत्यायतलोचना ।
अभ्यभाषत राजेन्द्र द्रौपदी योषितां वरा ॥ २ ॥
आसीनमृषभं राज्ञां भ्रातृभिः परिवारितम् ।
सिंहशार्दूलसदृशैर्वारणैरिव यूथपम् ॥ ३ ॥
अभिमानवती नित्यं विशेषेण युधिष्ठिरे ।
लालिता सततं राज्ञा धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी ॥ ४ ॥
आमन्त्र्य विपुलश्रोणी साम्ना परमवल्गुना ।
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य ततो वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अपने भाइयोंके मुखसे नाना प्रकारके वेदोंके सिद्धान्तोंको सुनकर भी जब कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कुछ नहीं बोले, तब महान् कुलमें उत्पन्न हुई, युवतियोंमें श्रेष्ठ, स्थूल, नितम्ब और विशाल नेत्रोंवाली, पतियों एवं विशेषतः राजा युधिष्ठिरके प्रति अभिमान रखनेवाली, राजाकी सदा ही लाड़िली, धर्मपर दृष्टि रखनेवाली तथा धर्मको जाननेवाली श्रीमती महारानी द्रौपदी हाथियोंसे घिरे हुए यूथपति गजराजकी भाँति सिंहशार्दूल-सदृश पराक्रमी भाइयोंसे घिरकर बैठे हुए पतिदेव नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरकी ओर देखकर उन्हें सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीमें इस प्रकार बोलीं ॥ १—५ ॥
द्रौपद्युवाच
इमे ते भ्रातरः पार्थ शुष्यन्ते स्तोकका इव ।
वावाश्यमानास्तिष्ठन्ति न चैनानभिनन्दसे ॥ ६ ॥
कुन्तीकुमार! आपके ये भाई आपका संकल्प सुनकर सूख गये हैं; पपीहोंके समान आपसे राज्य करनेकी रट लगा रहे हैं; फिर भी आप इनका अभिनन्दन नहीं करते? ॥
नन्दयैतान् महाराज मत्तानिव महाद्विपान् । उपपन्नेन वाक्येन सततं दुःखभागिनः ॥ ७ ॥ महाराज! उन्मत्त गजराजोंके समान आपके ये बन्धु सदा आपके लिये दुःख ही-दुःख उठाते आये हैं। अब तो इन्हें युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आनन्दित कीजिये ॥ ७ ॥ कथं द्वैतवने राजन् पूर्वमुक्त्वा तथा वचः । भ्रातृनेतान् स्म सहितान् शीतवातातपार्दितान् ॥ ८ ॥ वयं दुर्योधनं हत्वा मृधे भोक्ष्याम मेदिनीम् । सम्पूर्णां सर्वकामानामाहवे विजयैषिणः ॥ ९ ॥ विरथांश्च रथान् कृत्वा निहत्य च महागजान् । संस्तीर्य च रथैर्भूमिं ससादिभिररिंदमाः ॥ १० ॥ यजतां विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । वनवासकृतं दुःखं भविष्यति सुखाय वः ॥ ११ ॥ इत्येतानेवमुक्त्वा त्वं स्वयं धर्मभृतां वर । कथमद्य पुनर्वीर विनिहंसि मनांसि नः ॥ १२ ॥
राजन्! द्वैतवनमें ये सभी भाई जब आपके साथ सर्दी-गर्मी और आँधी-पानीका कष्ट भोग रहे थे, उन दिनों आपने इन्हें धैर्य देते हुए कहा था—'शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर बन्धुओ! विजयकी इच्छावाले हमलोग युद्धमें दुर्योधनको मारकर रथियोंको रथहीन करके बड़े-बड़े हाथियोंका वध कर डालेंगे और घुड़सवारसहित रथोंसे इस पृथ्वीको पाट देंगे। तत्पश्चात् सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न वसुधाका उपभोग करेंगे। उस समय पर्याप्त दान-दक्षिणावाले नाना प्रकारके समृद्धिशाली यज्ञोंके द्वारा भगवान्की आराधनामें लगे रहनेसे तुमलोगोंका यह वनवासजनित दुःख सुखरूपमें परिणत हो जायगा।' धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! वीर महाराज! पहले द्वैतवनमें इन भाइयोंसे स्वयं ही ऐसी बातें कहकर आज क्यों आप फिर हमलोगोंका दिल तोड़ रहे हैं ॥ ८—१२ ॥
न क्लीबो वसुधां भुङ्क्ते न क्लीबो धनमश्नुते । न क्लीबस्य गृहे पुत्रा मत्स्याः पंक इवासते ॥ १३ ॥ जो कायर और नपुंसक है, वह पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। वह न तो धनका उपार्जन कर सकता है और न उसे भोग ही सकता है। जैसे केवल कीचड़में मछलियाँ नहीं होतीं, उसी प्रकार नपुंसकके घरमें पुत्र नहीं होते ॥ १३ ॥
नादण्डः क्षत्रियो भाति नादण्डो भूमिमश्नुते । नादण्डस्य प्रजा राज्ञः सुखं विन्दन्ति भारत ॥ १४ ॥ जो दण्ड देनेकी शक्ति नहीं रखता, उस क्षत्रियकी शोभा नहीं होती, दण्ड न देनेवाला राजा इस पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। भारत! दण्डहीन राजाकी प्रजाओंको कभी सुख नहीं मिलता है ॥ १४ ॥
मित्रता सर्वभूतेषु दानमध्ययनं तपः । ब्राह्मणस्यैव धर्मः स्यान्न राज्ञो राजसत्तम ॥ १५ ॥ नृपश्रेष्ठ! समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव, दान लेना, देना, अध्ययन और तपस्या—यह ब्राह्मणका ही धर्म है, राजाका नहीं ॥ १५ ॥
असतां प्रतिषेधश्च सतां च परिपालनम् । एष राज्ञां परो धर्मः समरे चापलायनम् ॥ १६ ॥ राजाओंका परम धर्म तो यही है कि वे दुष्टोंको दण्ड दें, सत्पुरुषोंका पालन करें और युद्धमें कभी पीठ न दिखावें ॥ १६ ॥
यस्मिन् क्षमा च क्रोधश्च दानादाने भयाभये । निग्रहानुग्रहौ चोभौ स वै धर्मविदुच्यते ॥ १७ ॥ जिसमें समयानुसार क्षमा और क्रोध दोनों प्रकट होते हैं, जो दान देता और कर लेता है, जिसमें शत्रुओंको भय दिखाने और शरणागतोंको अभय देनेकी शक्ति है, जो दुष्टोंको दण्ड देता और दीनोंपर अनुग्रह करता है, वही धर्मज्ञ कहलाता है ॥ १७ ॥
न श्रुतेन न दानेन न सान्त्वेन न चेज्यया ।
त्वयेयं पृथिवी लब्धा न संकोचेन चाप्युत ॥ १८ ॥
आपको यह पृथिवी न तो शास्त्रोंके श्रवणसे मिली है, न दानमें प्राप्त हुई है, न किसीको समझाने-बुझानेसे उपलब्ध हुई है, न यज्ञ करानेसे और न कहीं भीख माँगनेसे ही प्राप्त हुई है ॥ १८ ॥
यत् तद् बलममित्राणां तथा वीर्यसमुद्यतम् ।
हस्त्यश्वरथसम्पन्नं त्रिभिरङ्गैरुत्तमम् ॥ १९ ॥
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च ।
तत् त्वया निहतं वीर तस्माद् भुङ्क्ष्व वसुन्धराम् ॥ २० ॥
वह जो शत्रुओंकी पराक्रम-सम्पन्न एवं श्रेष्ठ सेना हाथी, घोड़े और रथ तीनों अंगोंसे सम्पन्न थी तथा द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य जिसकी रक्षा करते थे, उसका आपने वध किया है, तब यह पृथ्वी आपके अधिकारमें आयी है। अतः वीर! आप इसका उपभोग करें ॥
जम्बूद्वीपो महाराज नानाजनपदैर्युतः ।
त्वया पुरुषशार्दूल दण्डेन मृदितः प्रभो ॥ २१ ॥
प्रभो! महाराज! पुरुषसिंह! आपने अनेक जनपदोंसे युक्त इस जम्बूद्वीपको अपने दण्डसे रौंद डाला है ॥ २१ ॥
जम्बूद्वीपेन सदृशः क्रौञ्चद्वीपो नराधिप ।
अधरेण महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया ॥ २२ ॥
नरेश्वर! जम्बूद्वीपके समान ही क्रौञ्चद्वीपको जो महामेरुसे पश्चिम है, आपने दण्डसे कुचल दिया है ॥ २२ ॥
क्रौञ्चद्वीपेन सदृशः शाकद्वीपो नराधिप ।
पूर्वेण तु महामेरोर्दण्डेन मृदितास्त्वया ॥ २३ ॥
नरेन्द्र! क्रौञ्चद्वीपके समान ही शाकद्वीपको जो महामेरुसे पूर्व है, आपने दण्ड देकर दबा दिया है ॥ २३ ॥
उत्तरेण महामेरोः शाकद्वीपेन सम्मितः ।
भद्राश्वः पुरुषव्याघ्र दण्डेन मृदितस्त्वया ॥ २४ ॥
पुरुषसिंह! महामेरुसे उत्तर शाकद्वीपके बराबर ही जो भद्राश्व वर्ष है, उसे भी आपके दण्डसे दबना पड़ा है ॥
द्वीपाश्च सान्तरद्वीपा नानाजनपदाश्रयाः ।
विगाह्य सागरं वीर दण्डेन मृदितास्त्वया ॥ २५ ॥
वीर! इनके अतिरिक्त भी जो बहुत-से देशोंके आश्रयभूत द्वीप और अन्तर्द्वीप हैं, समुद्र लाँघकर उन्हें भी आपने दण्डद्वारा दबाकर अपने अधिकारमें कर लिया है ॥ २५ ॥
एतान्यप्रतिमेयानि कृत्वा कर्माणि भारत ।
न प्रीयसे महाराज पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। २६ ।।
भरतनन्दन! महाराज! आप ऐसे-ऐसे अनुपम पराक्रम करके द्विजातियोंद्वारा
सम्मानित होकर भी प्रसन्न नहीं हो रहे हैं? ।। २६ ।।
स त्वं भ्रातॄनिमान् दृष्ट्वा प्रतिनन्दस्व भारत ।
ऋषभानिव सम्मत्तान् गजेन्द्रानूर्जितानिव ।। २७ ।।
भारत! मतवाले साँडों और बलशाली गजराजोंके समान अपने इन भाइयोंको देखकर
आप इनका अभिनन्दन कीजिये ।। २७ ।।
अमरप्रतिमाः सर्वे शत्रुसाहाः परंतपाः ।
एकोऽपि हि सुखायैषां मम स्यादिति मे मतिः ।। २८ ।।
किं पुनः पुरुषव्याघ्र पतयो मे नरर्षभाः ।
समस्तानीन्द्रियाणीव शरीरस्य विचेष्टने ।। २९ ।।
पुरुषसिंह! शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके ये सभी भाई शत्रु-सैनिकोंका वेग सहन
करनेमें समर्थ हैं, देवताओंके समान तेजस्वी हैं, मेरा विश्वास है कि इनमेंसे एक वीर भी मुझे
पूर्ण सुखी बना सकता है, फिर ये मेरे पाँचों नरश्रेष्ठ पति क्या नहीं कर सकते हैं? शरीरको
चेष्टाशील बनानेमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका जो स्थान है, वही मेरे जीवनको सुखी बनानेमें इन
सबका है ।। २८-२९ ।।
अनृतं नाब्रवीच्छ्वश्रूः सर्वज्ञा सर्वदर्शनी ।
युधिष्ठिरस्त्वां पाञ्चालि सुखे धास्यत्यनुत्तमे ।। ३० ।।
हत्वा राजसहस्राणि बहून्याशुपराक्रमः ।
तद् व्यर्थं सम्प्रपश्यामि मोहात् तव जनाधिप ।। ३१ ।।
महाराज! मेरी सास कभी झूठ नहीं बोलीं। वे सर्वज्ञ हैं और सब कुछ देखनेवाली हैं।
उन्होंने मुझसे कहा था—'पाञ्चालराजकुमारि! युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाले
हैं। ये कई सहस्र राजाओंका संहार करके तुम्हें सुखके सिंहासनपर प्रतिष्ठित करेंगे।' किंतु
जनेश्वर! आज आपका यह मोह देखकर मुझे अपनी सासकी कही हुई बात भी व्यर्थ होती
दिखायी देती है ।।
येषामुन्मत्तको ज्येष्ठः सर्वे तेऽप्यनुसारिणः ।
तवोन्मादान्महाराज सोन्मादाः सर्वपाण्डवाः ।। ३२ ।।
जिनका जेठा भाई उन्मत्त हो जाता है, वे सभी उसीका अनुकरण करने लगते हैं।
महाराज! आपके उन्मादसे सारे पाण्डव भी उन्मत्त हो गये हैं ।। ३२ ।।
यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते नराधिप ।
बद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासैयुर्वसुन्धराम् ।। ३३ ।।
नरेश्वर! यदि ये आपके भाई उन्मत्त नहीं हुए होते तो नास्तिकोंके साथ आपको भी
बाँधकर स्वयं इस वसुधाका शासन करते ।। ३३ ।।
कुरुते मूढ एवं हि यः श्रेयो नाधिगच्छति ।
धूपैरञ्जनयोगैश्च नस्यकर्मभिरेव च ॥ ३४ ॥
भेषजैः स चिकित्सः स्याद् य उन्मार्गेण गच्छति ।
जो मूर्ख इस प्रकारका काम करता है, वह कभी कल्याणका भागी नहीं होता। जो उन्मादग्रस्त होकर उलटे मार्गसे चलने लगता है, उसके लिये धूपकी सुगंध देकर, आँखोंमें सिद्ध अंजन लगाकर, नाकमें सुँघनी सुँघाकर अथवा और कोई औषध खिलाकर उसके रोगकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३४ १/२ ॥
साहं सर्वाधमा लोके स्त्रीणां भरतसत्तम ॥ ३५ ॥
तथा विनिकृता पुत्रैर्याहमिच्छामि जीवितुम् ।
भरतश्रेष्ठ! मैं ही संसारकी सब स्त्रियोंमें अधम हूँ, जो कि पुत्रोंसे हीन हो जानेपर भी जीवित रहना चाहती हूँ ॥ ३५ १/२ ॥
एतेषां यतमानानां न मेऽद्य वचनं मृषा ॥ ३६ ॥
त्वं तु सर्वां महीं त्यक्त्वा कुरुषे स्वयमापदम् ।
ये सब लोग आपको समझानेका प्रयत्न कर रहे हैं, फिर भी आप ध्यान नहीं देते। मैं इस समय जो कुछ कह रही हूँ मेरी यह बात झूठी नहीं है। आप सारी पृथ्वीका राज्य छोड़कर अपने लिये स्वयं ही विपत्ति खड़ी कर रहे हैं ॥ ३६ १/२ ॥
यथाऽऽस्तां संमतौ राज्ञां पृथिव्यां राजसत्तम ॥ ३७ ॥
मान्धाता चाम्बरीषश्च तथा राजन् विराजसे ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे मान्धाता और अम्बरीष भूमण्डलके समस्त राजाओंमें सम्मानित थे, राजन्! वैसे ही आप भी सुशोभित हो रहे हैं ॥ ३७ १/२ ॥
प्रशाधि पृथिवीं देवीं प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३८ ॥
सपर्वतवनद्वीपां मा राजन् विमना भव ।
नरेश्वर! धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए पर्वत, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वी देवीका शासन कीजिये। इस उदासीन न होइये ॥ ३८ १/२ ॥
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्युध्यस्वारीन् प्रयच्छ च ।
धनानि भोगान् वासांसि द्विजातिभ्यो नृपोत्तम ॥ ३९ ॥
नृपश्रेष्ठ! नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान और शत्रुओंके साथ युद्ध कीजिये। ब्राह्मणोंको धन, भोगसामग्री और वस्त्रोंका दान कीजिये ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये
चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
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अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन
पञ्चदशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् ।
अनुमान्य महाबाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमच्युतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रुपदकुमारीका यह वचन सुनकर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले बड़े भाई महाबाहु युधिष्ठिरका सम्मान करते हुए अर्जुनने फिर इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
अर्जुन उवाच
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ २ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! दण्ड समस्त प्रजाओंका शासन करता है, दण्ड ही उनकी सब ओरसे रक्षा करता है, सबके सो जानेपर भी दण्ड जागता रहता है; इसलिये विद्वान् पुरुषोंने दण्डको राजाका धर्म माना है ॥ २ ॥
दण्डः संरक्षते धर्मं तथैवार्थं जनाधिप ।
कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते ॥ ३ ॥
जनेश्वर! दण्ड ही धर्म और अर्थकी रक्षा करता है, वही कामका भी रक्षक है, अतः दण्ड त्रिवर्गरूप कहा जाता है ॥ ३ ॥
दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते ।
एवं विद्वानुपाधत्स्व भावं पश्यस्व लौकिकम् ॥ ४ ॥
दण्डसे धान्यकी रक्षा होती है, उसीसे धनकी भी रक्षा होती है; ऐसा जानकर आप भी दण्ड धारण कीजिये और जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालिये ॥ ४ ॥
राजदण्डभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
यमदण्डभयादेके परलोकभयादपि ॥ ५ ॥
परस्परभयादेके पापाः पापं न कुर्वते ।
एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६ ॥
कितने ही पापी राजदण्डके भयसे पाप नहीं करते हैं। कुछ लोग यमदण्डके भयसे, कोई परलोकके भयसे और कितने ही पापी आपसमें एक-दूसरेके भयसे पाप नहीं करते हैं। जगत्की ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है; इसलिये सब कुछ दण्डमें ही प्रतिष्ठित है ॥ ५-६ ॥
दण्डस्यैव भयादेके न खादन्ति परस्परम् । अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ७ ॥ बहुत-से मनुष्य दण्डके ही भयसे एक-दूसरेको खा नहीं जाते हैं, यदि दण्ड रक्षा न करे तो सब लोग घोर अन्धकारमें डूब जायँ ॥ ७ ॥
यस्माददान्तान् दमयत्यशिष्टान् दण्डयत्यपि । दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः ॥ ८ ॥ यह उद्दण्ड मनुष्योंका दमन करता और दुष्टोंको दण्ड देता है, अतः उस दमन और दण्डके कारण ही विद्वान् पुरुष इसे दण्ड कहते हैं ॥ ८ ॥
वाचा दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम् । दानदण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते ॥ ९ ॥ यदि ब्राह्मण अपराध करे तो वाणीसे उसको अपमानित करना ही उसका दण्ड है, क्षत्रियको भोजनमात्रके लिये वेतन देकर उससे काम लेना उसका दण्ड है, वैश्योंसे जुर्मानाके रूपमें धन वसूल करना उनका दण्ड है, परंतु शूद्र दण्डरहित कहा गया है। उससे सेवा लेनेके सिवा और कोई दण्ड उसके लिये नहीं है ॥ ९ ॥
असम्मोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च । मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशाम्पते ॥ १० ॥ प्रजानाथ! मनुष्योंको प्रमादसे बचाने और उनके धनकी रक्षा करनेके लिये लोकमें जो मर्यादा स्थापित की गयी है, उसीका नाम दण्ड है ॥ १० ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूद्यतः । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ते नेता चेत् साधु पश्यति ॥ ११ ॥ दण्डनीयपर ऐसी जोरकी मार पड़ती है कि उसकी आँखोंके सामने अँधेरा छा जाता है; इसलिये दण्डको काला कहा गया है। दण्ड देनेवालेकी आँखें क्रोधसे लाल रहती हैं; इसलिये उसे लोहिताक्ष कहते हैं। ऐसा दण्ड जहाँ सर्वथा शासनके लिये उद्यत होकर विचरता रहता है और नेता या शासक अच्छी तरह अपराधोंपर दृष्टि रखता है, वहाँ प्रजा प्रमाद नहीं करती ॥ ११ ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः । दण्डस्यैव भयादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ॥ १२ ॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये सभी मनुष्य दण्डके ही भयसे अपने-अपने मार्गपर स्थिर रहते हैं ॥ १२ ॥
नाभीतो यजते राजन् नाभीतो दातुमिच्छति । नाभीतः पुरुषः कश्चित् समये स्थातुमिच्छति ॥ १३ ॥ राजन्! बिना भयके कोई यज्ञ नहीं करता है, बिना भयके कोई दान नहीं करना चाहता है, और दण्डका भय न हो तो कोई पुरुष मर्यादा या प्रतिज्ञाके पालनपर भी स्थिर नहीं
रहना चाहता है ॥ १३ ॥ नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ १४ ॥ मछली मारनेवाले मल्लाहोंकी तरह दूसरोंके मर्मस्थानोंका उच्छेद और दुष्कर कर्म किये बिना तथा बहुसंख्यक प्राणियोंको मारे बिना कोई बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं प्राप्त कर सकता ॥ १४ ॥ नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः । इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत ॥ १५ ॥ जो दूसरोंका वध नहीं करता, उसे इस संसारमें न तो कीर्ति मिलती है, न धन प्राप्त होता है और न प्रजा ही उपलब्ध होती है। इन्द्र वृत्रासुरका वध करनेसे ही महेन्द्र हो गये ॥ १५ ॥ य एव देवा हन्तारस्तांल्लोकोऽर्चयते भृशम् । हन्ता रुद्रस्तथा स्कन्दः शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ॥ १६ ॥ हन्ता कालस्तथा वायुर्मृत्युर्वैश्रवणो रविः । वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवाश्च भारत ॥ १७ ॥ एतान् देवान् नमस्यन्ति प्रतापप्रणता जनाः । जो देवता दूसरोंका वध करनेवाले हैं, उन्हींकी संसार अधिक पूजा करता है। रुद्र, स्कन्द, इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम, काल, वायु, मृत्यु, कुबेर, सूर्य, वसु, मरुद्गण, साध्य तथा विश्वेदेव—ये सब देवता दूसरोंका वध करते हैं; इनके प्रतापके सामने नतमस्तक होकर सब लोग इन्हें नमस्कार करते हैं ॥ १६-१७ १/२ ॥ न ब्रह्माणं न धातारं न पूषाणं कथंचन ॥ १८ ॥ मध्यस्थान् सर्वभूतेषु दान्तान् शमपरायणान् । यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु ॥ १९ ॥ परंतु ब्रह्मा, धाता और पूषाकी कोई किसी तरह भी पूजा-अर्चा नहीं करते हैं; क्योंकि वे सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेके कारण मध्यस्थ, जितेन्द्रिय एवं शान्तिपरायण हैं। जो शान्त स्वभावके मनुष्य हैं, वे ही समस्त कर्मोंमें इन धाता आदिकी पूजा करते हैं ॥ न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिदहिंसया । सत्त्वैः सत्त्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः ॥ २० ॥ संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको मैं नहीं देखता जो अहिंसासे जीविका चलाता हो। क्योंकि प्रबल जीव दुर्बल जीवोंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ २० ॥ नकुलो मूषिकानत्ति बिडालो नकुलं तथा । बिडालमत्ति श्वा राजन् श्वानं व्यालमृगस्तथा ॥ २१ ॥
राजन्! नेवला चूहेको खा जाता है और नेवलेको बिलाव। बिलावको कुत्ता और कुत्तेको चीता चबा जाता है ॥ २१ ॥
तानत्ति पुरुषः सर्वान् पश्य कालो यथागतः ।
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं जङ्गमं स्थावरं च यत् ॥ २२ ॥
परंतु इन सबको मनुष्य मारकर खा जाता है। देखो, कैसा काल आ गया है? यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्राणका अन्न है ॥ २२ ॥
विधानं दैवविहितं तत्र विद्वान् न मुह्यति ।
यथा सृष्टोऽसि राजेन्द्र तथा भवितुमर्हसि ॥ २३ ॥
यह सब दैवका विधान है। इसमें विद्वान् पुरुषको मोह नहीं होता है। राजेन्द्र! आपको विधाताने जैसा बनाया है, (जिस जाति और कुलमें आपको जन्म दिया है) वैसा ही आपको होना चाहिये ॥ २३ ॥
विनीतक्रोधहर्षा हि मन्दा वनमुपाश्रिताः ।
विना वधं न कुर्वन्ति तापसाः प्राणयापनम् ॥ २४ ॥
जिनमें क्रोध और हर्ष दोनों ही नहीं रह गये हैं, वे मन्दबुद्धि क्षत्रिय वनमें जाकर तपस्वी बन जाते हैं। परंतु बिना हिंसा किये वे भी जीवन-निर्वाह नहीं कर पाते हैं ॥ २४ ॥
उदके बहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च ।
न च कश्चिन्न तान् हन्ति किमन्यत् प्राणयापनात् ॥ २५ ॥
जलमें बहुतेरे जीव हैं, पृथ्वीपर तथा वृक्षके फलोंमें भी बहुत-से कीड़े होते हैं। कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जो इनमेंसे किसीको कभी न मारता हो। यह सब जीवन-निर्वाहके सिवा और क्या है? ॥ २५ ॥
सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् ।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ २६ ॥
कितने ही ऐसे सूक्ष्म योनिके जीव हैं जो अनुमानसे ही जाने जाते हैं। मनुष्यकी पलकोंके गिरनेमात्रसे जिनके कंधे टूट जाते हैं (ऐसे जीवोंकी हिंसासे कोई कहाँ-तक बच सकता है?) ॥ २६ ॥
ग्रामान् निष्क्रम्य मुनयो विगतक्रोधमत्सराः ।
वने कुटुम्बर्धर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ॥ २७ ॥
कितने ही मुनि क्रोध और ईर्ष्यासे रहित हो गाँवसे निकलकर वनमें चले जाते हैं, और वहीं मोहवश गृहस्थधर्ममें अनुरक्त दिखायी देते हैं ॥ २७ ॥
भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान् पशून् ।
मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ॥ २८ ॥
मनुष्य धरतीको खोदकर तथा ओषधियों, वृक्षों, लताओं, पक्षियों और पशुओंका उच्छेद करके यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, और वे स्वर्गमें भी चले जाते हैं ॥
दण्डनीत्यां प्रणीतायां सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ।
कौन्तेय सर्वभूतानां तत्र मे नास्ति संशयः ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! दण्डनीतिका ठीक-ठीक प्रयोग होनेपर समस्त प्राणियोंके सभी कार्य अच्छी तरह सिद्ध होते हैं, इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ २९ ॥
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ ३० ॥
यदि संसारमें दण्ड न रहे तो यह सारी प्रजा नष्ट हो जाय; और जैसे जलमें बड़े मत्स्य छोटी मछलियोंको खा जाते हैं उसी प्रकार प्रबल जीव दुर्बल जीवोंको अपना आहार बना लें ॥ ३० ॥
सत्यं चेदं ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं
दण्डः प्रजा रक्षति साधु नीतः ।
पश्याग्नयश्च प्रतिशाम्य भीताः
संतर्जिता दण्डभयाज्ज्वलन्ति ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजीने पहले ही इस सत्यको बता दिया है कि अच्छी तरह प्रयोगमें लाया हुआ दण्ड प्रजाजनोंकी रक्षा करता है। देखो, जब आग बुझने लगती है तब वह फूँककी फटकार पड़नेपर डर जाती और दण्डके भयसे फिर प्रज्वलित हो उठती है ॥ ३१ ॥
अन्धं तम इवेदं स्यान्न प्राज्ञायत किंचन ।
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विभजन् साध्वसाधुनी ॥ ३२ ॥
यदि संसारमें भले-बुरेका विभाग करनेवाला दण्ड न हो तो सब जगह अंधेर मच जाय और किसीको कुछ सूझ न पड़े ॥ ३२ ॥
येऽपि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिका वेदनिन्दकाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनाशु निपीडिताः ॥ ३३ ॥
जो धर्मकी मर्यादा नष्ट करके वेदोंकी निन्दा करनेवाले नास्तिक मनुष्य हैं, वे भी डंडे पड़नेपर उससे पीड़ित हो शीघ्र ही राहपर आ जाते हैं—मर्यादापालनके लिये तैयार हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।
दण्डस्य हि भयाद् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
सारा जगत् दण्डसे विवश होकर ही रास्तेपर रहता है; क्योंकि स्वभावतः सर्वथा शुद्ध मनुष्य मिलना कठिन है। दण्डके भयसे डरा हुआ मनुष्य ही मर्यादा-पालनमें प्रवृत्त होता है ॥ ३४ ॥
चातुर्वर्ण्यप्रमोदाय सुनीतिनयनाय च ।
दण्डो विधात्रा विहितो धर्मार्थौ भुवि रक्षितुम् ॥ ३५ ॥
विधाताने दण्डका विधान इस उद्देश्यसे किया है कि चारों वर्णोंके लोग आनन्दसे रहें, सबमें अच्छी नीतिका बर्ताव हो तथा पृथ्वीपर धर्म और अर्थकी रक्षा रहे ।। यदि दण्डान्न बिभीयुर्वयांसि श्वापदानि च । अद्युः पशून् मनुष्यांश्च यज्ञार्थानि हवींषि च ।। ३६ ।। यदि पक्षी और हिंसक जीव दण्डके भयसे डरते न होते तो वे पशुओं, मनुष्यों और यज्ञके लिये रखे हुए हविष्योंको खा जाते ।। ३६ ।। न ब्रह्मचार्यधीयीत कल्याणी गौर्न दुह्यते । न कन्योद्वहनं गच्छेद यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३७ ।। यदि दण्ड मर्यादाकी रक्षा न करे तो ब्रह्मचारी वेदोंके अध्ययनमें न लगे, सीधी गौ भी दूध न दुहावे और कन्या ब्याह न करे ।। ३७ ।। विष्वग्लोपः प्रवर्तेत भिद्येरन् सर्वसेतवः । ममत्वं न प्रजानीयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३८ ।। यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो चारों ओरसे धर्म-कर्मका लोप हो जाय, सारी मर्यादाएँ टूट जायँ और लोग यह भी न जानें कि कौन वस्तु मेरी है और कौन नहीं? ।। ३८ ।। न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः । विधिवद् दक्षिणावन्ति यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३९ ।। यदि दण्ड धर्मका पालन न करावे तो विधि-पूर्वक दक्षिणाओंसे युक्त संवत्सरयज्ञ भी बेखटके न होने पावे ।। ३९ ।। चरेयुर्नाश्रमे धर्मं यथोक्तं विधिमाश्रिताः । न विद्यां प्राप्नुयात् कश्चिद् यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४० ।। यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो लोग आश्रमोंमें रहकर विधिपूर्वक शास्त्रोक्त धर्मका पालन न करें और कोई विद्या भी न पढ़ सके ।। ४० ।। न चोष्ट्रा न बलीवर्दा नाश्वाश्वतरगर्दभाः । युक्ता वहेयुर्यानानि यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४१ ।। यदि दण्ड कर्तव्यका पालन न करावे तो ऊँट, बैल, घोड़े, खच्चर और गदहे रथोंमें जोत दिये जानेपर भी उन्हें ढोकर ले न जायँ ।। ४१ ।। न प्रेष्या वचनं कुर्युर्न बाला जातु कर्हिचित् । न तिष्ठेद् युवती धर्मे यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४२ ।। यदि दण्ड धर्म और कर्तव्यका पालन न करावे तो सेवक स्वामीकी बात न माने, बालक भी कभी माँ-बापकी आज्ञाका पालन न करें और युवती स्त्री भी अपने सतीधर्ममें स्थिर न रहे ।। ४२ ।। दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।
दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोकोऽयं सुप्रतिष्ठितः ॥ ४३ ॥
दण्डपर ही सारी प्रजा टिकी हुई है, दण्डसे ही भय होता है, ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। मनुष्योंका इहलोक और स्वर्गलोक दण्डपर ही प्रतिष्ठित है ॥ ४३ ॥
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृश्यते ।
यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥ ४४ ॥
जहाँ शत्रुओंका विनाश करनेवाला दण्ड सुन्दर ढंगसे संचालित हो रहा है, वहाँ छल, पाप और ठगी भी नहीं देखनेमें आती है ॥ ४४ ॥
हविःश्वा प्रलिहेद् दृष्ट्वा दण्डश्चेन्नोद्यतो भवेत् ।
हरेत् काकः पुरोडाशं यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ४५ ॥
यदि दण्ड रक्षाके लिये सदा उद्यत न रहे तो कुत्ता हविष्यको देखते ही चाट जाय और यदि दण्ड रक्षा न करे तो कौआ पुरोडाशको उठा ले जाय ॥ ४५ ॥
यदीदं धर्मतो राज्यं विहितं यद्यधर्मतः ।
कार्यस्तत्र न शोको वै भुङ्क्ष्व भोगान् यजस्व च ॥ ४६ ॥
यह राज्य धर्मसे प्राप्त हुआ हो या अधर्मसे, इसके लिये शोक नहीं करना चाहिये। आप भोग भोगिये और यज्ञ कीजिये ॥ ४६ ॥
सुखेन धर्मं श्रीमन्तश्चरन्ति शुचिवाससः ।
संवर्षन्तः फलैर्दानैर्भुञ्जनाश्चान्नमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाले धनवान् पुरुष सुखपूर्वक धर्मका आचरण करते हैं और उत्तम अन्न भोजन करते हुए फलों और दानोंकी वर्षा करते हैं ॥ ४७ ॥
अर्थे सर्वे समारम्भाः समायात्ता न संशयः ।
स च दण्डे समायत्ततः पश्य दण्डस्य गौरवम् ॥ ४८ ॥
इसमें संदेह नहीं कि सारे कार्य धनके अधीन हैं, परंतु धन दण्डके अधीन है। देखिये, दण्डकी कैसी महिमा है? ॥ ४८ ॥
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ।
अहिंसासाधुहिंसेति श्रेयान् धर्मपरिग्रहः ॥ ४९ ॥
लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही धर्मका प्रतिपादन किया गया है। सर्वथा हिंसा न की जाय अथवा दुष्टकी हिंसा की जाय, यह प्रश्न उपस्थित होनेपर जिसमें धर्मकी रक्षा हो, वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिये* ॥ ४९ ॥
नात्यन्तं गुणवत् किंचिन्न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् ।
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥ ५० ॥
कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण-ही-गुण हो। ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणोंसे वंचित ही हो। सभी कार्योंमें अच्छाई और बुराई दोनों ही देखनेमें आती हैं ॥ ५० ॥
पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति मस्तकम् । वहन्ति बहवो भारान् बध्नन्ति दमयन्ति च ॥ ५१ ॥ बहुत-से मनुष्य पशुओं (बैलों)-का अण्डकोश काटकर फिर उसके मस्तकपर उगे हुए दोनों सींगोंको भी विदीर्ण कर देते हैं, जिससे वे अधिक बढ़ने न पावें। फिर उनसे भार ढुलाते हैं, उन्हें घरमें बाँधे रखते हैं और नये बच्चेको गाड़ी आदिमें जोतकर उसका दमन करते हैं—उनकी उद्दण्डता दूर करके उनसे काम करनेका अभ्यास कराते हैं ॥ ५१ ॥
एवं पर्याकुले लोके वितथैर्जर्जरीकृते । तैस्तैर्न्यायैर्महाराज पुराणं धर्ममाचर ॥ ५२ ॥ महाराज! इस प्रकार सारा जगत् मिथ्या व्यवहारोंसे आकुल और दण्डसे जर्जर हो गया है। आप भी उन्हीं-उन्हीं न्यायोंका अनुसरण करके प्राचीन धर्मका आचरण कीजिये ॥ ५२ ॥
यज देहि प्रजां रक्ष धर्मं समनुपालय । अमित्रान् जहि कौन्तेय मित्राणि परिपालय ॥ ५३ ॥ यज्ञ कीजिये, दान दीजिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और धर्मका निरन्तर पालन करते रहिये। कुन्तीनन्दन! आप शत्रुओंका वध और मित्रोंका पालन कीजिये ॥ ५३ ॥
मा च ते निघ्नतः शत्रून् मन्युर्भवतु पार्थिव । न तत्र किल्बिषं किंचित् कर्तुर्भवति भारत ॥ ५४ ॥ राजन्! शत्रुओंका वध करते समय आपके मनमें दीनता नहीं आनी चाहिये। भारत! शत्रुओंका वध करनेसे कर्ताको कोई पाप नहीं लगता ॥ ५४ ॥
आततायी हि यो हन्यादाततायिनमागतम् । न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमार्छति ॥ ५५ ॥ जो हाथमें हथियार लेकर मारने आया हो, उस आततायीको जो स्वयं भी आततायी बनकर मार डाले, उससे वह भ्रूण-हत्याका भागी नहीं होता; क्योंकि मारनेके लिये आये हुए उस मनुष्यका क्रोध ही उसका वध करनेवालेके मनमें भी क्रोध पैदा कर देता है ॥ ५५ ॥
अवध्यः सर्वभूतानामन्तरात्मा न संशयः । अवध्ये चात्मनि कथं वध्यो भवति कस्यचित् ॥ ५६ ॥ समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा अवध्य है, इसमें संशय नहीं है। जब आत्माका वध हो ही नहीं सकता तब वह किसीका वध्य कैसे होगा? ॥ ५६ ॥
यथा हि पुरुषः शालां पुनः सम्प्रविशेन्नवाम् । एवं जीवः शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते ॥ ५७ ॥ देहान् पुराणानुत्सृज्य नवान् सम्प्रतिपद्यते । एवं मृत्युमुखं प्राहुर्जना ये तत्त्वदर्शिनः ॥ ५८ ॥
जैसे मनुष्य बारंबार नये घरोंमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार जीव भिन्न-भिन्न शरीरोंको ग्रहण करता है। पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंको अपना लेता है। इसीको तत्त्वदर्शी मनुष्य मृत्युका मुख बताते हैं ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।
* यदि गोशालामें बाघ आ जाय तो उसकी हिंसा ही उचित होगी, क्योंकि उसका वध न करनेसे कितनी ही गौओंकी हिंसा हो जायगी। अतः 'आर्त-रक्षा' रूप धर्मकी सिद्धिके लिये उस हिंसक प्राणीका वध ही वहाँ श्रेयस्कर होगा।