महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1571)
द्वितीयोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता ।
तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मेधावी युधिष्ठिर चुप ही रहे। तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ॥ १ ॥
अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप ।
संतापयति चैतस्य पूर्वप्रेतान् पितामहान् ॥ २ ॥
'जनेश्वर! यदि मनुष्य मरे हुए प्राणीके लिये अपने मनमें अधिक शोक करता है तो उसका वह शोक उसके पहलेके मरे हुए पितामहोंको भारी संतापमें डाल देता है ॥ २ ॥
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।
देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि ॥ ३ ॥
'इसलिये आप बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये और सोमरसके द्वारा देवताओं तथा स्वधाद्वारा पितरोंको तृप्त कीजिये ॥ ३ ॥
अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान् ।
विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ॥ ४ ॥
'अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी-दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये। आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है। करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है ॥ ४ ॥
श्रुताश्च राजधर्मास्ते भीष्माद् भागीरथीसुतात् ।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद् विदुरात् तथा ॥ ५ ॥
'आपने गंगानन्दन भीष्मसे राजधर्मोंका वर्णन सुना है। श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और विदुरजीसे कर्तव्यका उपदेश श्रवण किया है ॥ ५ ॥
नेमामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् ।
पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्वह ॥ ६ ॥
अतः आपको मूढ़ पुरुषोंके इस बर्तावका अनुसरण नहीं करना चाहिये। पिता-पितामहोंके बर्तावका आश्रय लेकर राजकार्यका भार सँभालिये ॥ ६ ॥
युक्तं हि यशसा क्षात्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशयम् ।
न हि कश्चिद्धि शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ॥ ७ ॥
'इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है ॥ ७ ॥ त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शक्यास्ते पुनर्दृष्टुं त्वया येऽस्मिन् रणे हताः ॥ ८ ॥ 'महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते' ॥ ८ ॥ एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब युधिष्ठिरने उनसे कहा ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥ १० ॥ युधिष्ठिर बोले—गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है। आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं ॥ १० ॥ प्रियं तु मे स्यात् सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन् प्रीतेन मनसा सर्वं यादवन्दन ॥ ११ ॥ यदि मामनुजानीयाद् भवान् गन्तुं तपोवनम् । (कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ।) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान् प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय। उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ११ १/२ ॥ न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् ॥ १२ ॥ (नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् ।) कर्णं च पुरुषव्याघ्रं संग्रामेष्वपलायिनम् । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल-पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता ॥ १२ १/२ ॥ कर्मणा येन मुच्येयमस्मात् क्रूरादरिंदम ॥ १३ ॥ कर्मणा तद् विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ।
शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये ।। १३ १/२ ।। तमेवं वादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ।। १४ ।। सान्त्वयन् सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् । अकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे ।। १५ ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा—‘तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये ।। १४-१५ ।। किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः । विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका ।। १६ ।। ‘तात! अब हमलोग किस लायक रह गये। हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है। युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं ।। १६ ।। तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे । मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः ।। १७ ।। ‘उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता। तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है ।। १७ ।। (यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि । तथा तु कुर्वन् नृपतिर्नानुबन्धेन युज्यते ।।) ‘तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ।। असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया । अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ।। १८ ।। ‘मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बुद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है ।। १८ ।। मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् । प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ । राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ।। १९ ।। ‘तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है। निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है। तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ।। १९ ।।
स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः ।
परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥ २० ॥
‘भारत! इस प्रकार सब धर्मोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो?’ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1575)
तृतीयोऽध्यायः
व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना
व्यास उवाच
युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।
न हि कश्चित्स्वयं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रियाम् ॥ १ ॥
**व्यासजीने कहा—**युधिष्ठिर! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है। कोई भी मनुष्य स्वाधीन होकर अपने-आप कोई काम नहीं करता है ॥ १ ॥
ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः ।
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥ २ ॥
यह मनुष्य अथवा पुरुषसमुदाय ईश्वरसे प्रेरित होकर ही भले-बुरे काम करता है।* अतः इसके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ २ ॥
आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्मार्णमन्ततः ।
शृणु तत्र यथापापमपकृष्येत भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! यदि तुम अन्ततोगत्वा अपने-आपको ही युद्धरूपी पापकर्मका प्रधान हेतु मानते हो तो वह पाप जिस प्रकार नष्ट हो सकता है, वह उपाय बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर ।
तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग पाप करते हैं, वे तप, यज्ञ और दानके द्वारा ही सदा अपना उद्धार करते हैं ॥ ४ ॥
यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप ।
पूयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृतकारिणः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! पुरुषसिंह! पापाचारी मनुष्य यज्ञ, दान और तपस्यासे ही पवित्र होते हैं ॥ ५ ॥
असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम् ।
प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद् यज्ञाः परायणम् ॥ ६ ॥
महामना देवता और दैत्य पुण्यके लिये यज्ञ करनेका ही प्रयत्न करते हैं, अतः यज्ञ परम आश्रय है ॥ ६ ॥
यज्ञैरेव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः ।
ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥ ७ ॥
यज्ञोंद्वारा ही महामनस्वी देवताओंका महत्त्व अधिक हुआ है और यज्ञोंसे ही क्रियानिष्ठ देवताओंने दानवोंको परास्त किया है ॥ ७ ॥
राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत ।
नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर ॥ ८ ॥
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! तुम राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध और नरमेध यज्ञ करो ॥ ८ ॥
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता ।
बहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ॥ ९ ॥
विधिवत् दक्षिणा देकर बहुत-से मनोवांछित पदार्थ, अन्न और धनसे सम्पन्न अश्वमेध यज्ञके द्वारा दशरथनन्दन श्रीरामकी भाँति यजन करो ॥ ९ ॥
यथा च भरतो राजा दौष्यन्तिः पृथिवीपतिः ।
शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ॥ १० ॥
तथा तुम्हारे पूर्वपितामह महापराक्रमी दुष्यन्तकुमार शकुन्तलानन्दन पृथ्वीपति राजा भरतने जैसे यज्ञ किया था, उसी प्रकार तुम भी करो ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच
असंशयं वाजिमेधः पावयेत् पृथिवीमपि ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ॥ ११ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**विप्रवर! इसमें संदेह नहीं कि अश्वमेध यज्ञ सारी पृथ्वीको भी पवित्र कर सकता है, किंतु इसके विषयमें मेरा एक अभिप्राय है, उसे आप यहाँ सुन लें ॥ ११ ॥
इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम ।
दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे ॥ १२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अपने जाति-भाइयोंका यह महान् संहार करके अब मुझमें थोड़ा-सा भी दान देनेकी शक्ति नहीं रह गयी है; क्योंकि मेरे पास धन नहीं है ॥ १२ ॥
न तु बालानिमान् दीनानुत्सहे वसु याचितुम् ।
तथैवार्द्रव्रणान् कृच्छ्रे वर्तमानान् नृपात्मजान् ॥ १३ ॥
यहाँ जो राजकुमार उपस्थित हैं, ये सब-के-सब बालक और दीन हैं, महान् संकटमें पड़े हुए हैं और इनके शरीरका घाव भी अभी सूखने नहीं पाया है; अतः इन सबसे मैं धनकी याचना नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
स्वयं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थं द्विजसत्तम ।
करमाहारयिष्यामि कथं शोकपरायणः ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! स्वयं ही सारी पृथ्वीका विनाश कराकर शोकमग्न हुआ मैं इनसे यज्ञके लिये कर किस तरह वसूल करूँगा ॥ १४ ॥
दुर्योधनापराधेन वसुधा वसुधाधिपाः ।
प्रणष्टा योजयित्वास्मानकीर्त्या मुनिसत्तम ॥ १५ ॥
मुनिश्रेष्ठ! दुर्योधनके अपराधसे यह पृथ्वी और अधिकांश राजा हमलोगोंके माथे अपयशका टीका लगाकर नष्ट हो गये ॥ १५ ॥
दुर्योधनेन पृथिवी क्षयिता वित्तकारणात् ।
कोशश्चापि विशीर्णोऽसौ धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ १६ ॥
दुर्योधनने धनके लोभसे समस्त भूमण्डलका संहार कराया; किन्तु धन मिलना तो दूर रहा, उस दुर्बुद्धिका अपना खजाना भी खाली हो गया ॥ १६ ॥
पृथिवी दक्षिणा चात्र विधिः प्रथमकल्पितः ।
विद्वद्भिः परिदृष्टोऽयं शिष्टो विधिविपर्ययः ॥ १७ ॥
अश्वमेध यज्ञमें समूची पृथ्वीकी दक्षिणा देनी चाहिये। यही विद्वानोंने मुख्य कल्प माना है। इसके सिवा जो कुछ किया जाता है, वह विधिके विपरीत है ॥ १७ ॥
न च प्रतिनिधिं कर्तुं चिकीर्षामि तपोधन ।
अत्र मे भगवन् सम्यक् साचिव्यं कर्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
तपोधन! मुख्य वस्तुके अभावमें जो दूसरी कोई वस्तु दी जाती है, वह प्रतिनिधि दक्षिणा कहलाती है; किन्तु प्रतिनिधि दक्षिणा देनेकी मेरी इच्छा नहीं होती; अतः भगवन्! इस विषयमें आप मुझे उचित सलाह देनेकी कृपा करें ॥ १८ ॥
एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णद्वैपायनस्तदा ।
मुहूर्तमनुसंचिन्त्य धर्मराजानमब्रवीत् ॥ १९ ॥
कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने दो घड़ीतक सोच-विचारकर धर्मराजसे कहा— ॥ १९ ॥
कोशश्चापि विशीर्णोऽयं परिपूर्णो भविष्यति ।
विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् ॥ २० ॥
उत्सृष्टं ब्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महात्मनः ।
तदानयस्व कौन्तेय पर्याप्तं तद् भविष्यति ॥ २१ ॥
'पार्थ! यद्यपि तुम्हारा खजाना इस समय खाली हो गया है तथापि वह बहुत शीघ्र भर जायगा। हिमालय पर्वतपर महात्मा मरुत्तके यज्ञमें ब्राह्मणोंने जो धन छोड़ दिया था, वह वहीं पड़ा हुआ है। कुन्तीकुमार! उसे ले आओ। वह तुम्हारे लिये पर्याप्त होगा' ॥ २०-२१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं यज्ञे मरुत्तस्य द्रविणं तत् समाचितम् ।
कस्मिंश्च काले स नृपो बभूव वदतां वर ॥ २२ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! मरुत्तके यज्ञमें इतने धनका संग्रह किस प्रकार किया गया था तथा वे महाराज मरुत्त किस समय इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे? ॥ २२ ॥
व्यास उवाच
यदि शुश्रूषसे पार्थ शृणु कारन्धमं नृपम् ।
यस्मिन् काले महीवीर्यः स राजासीन्महाधनः ॥ २३ ॥
**व्यासजीने कहा—**पार्थ! यदि तुम सुनना चाहते हो तो करन्धमके पौत्र मरुत्तका वृत्तान्त सुनो। वे महाधनी और महापराक्रमी राजा किस कालमें इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, यह बता रहा हूँ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
* यह कथन युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये गौणरूपमें इस दृष्टिसे है कि मरनेवालोंकी मृत्यु उनके प्रारब्ध-कर्मानुसार अवश्यम्भावी थी; अतः यह जो कुछ हुआ है, ईश्वर प्रेरणाके ही अनुसार हुआ है।
शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।
चतुर्थोऽध्यायः
मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन
युधिष्ठिर उवाच
शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।
द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— धर्मके ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्तकी कथा और उनके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे कहिये ॥ १ ॥
व्यास उवाच
आसीत् कृतयुगे तात मनुर्दण्डधरः प्रभुः ।
तस्य पुत्रो महाबाहुः प्रसन्धिरिति विश्रुतः ॥ २ ॥
व्यासजीने कहा— तात! सत्ययुगमें राजदण्ड धारण करनेवाले शक्तिशाली वैवस्वत मनु एक प्रसिद्ध राजा थे। उनके पुत्र महाबाहु प्रसन्धिके नामसे विख्यात थे ॥ २ ॥
प्रसन्धेरभवत् पुत्रः क्षुप इत्यभिविश्रुतः ।
क्षुपस्य पुत्र इक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत् प्रभुः ॥ ३ ॥
प्रसन्धिके पुत्र क्षुप और क्षुपके पुत्र शक्तिशाली महाराज इक्ष्वाकु हुए ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत् परमधार्मिकम् ।
तांस्तु सर्वान् महीपालानिक्ष्वाकुरकरोत् प्रभुः ॥ ४ ॥
राजन्! इक्ष्वाकुके सौ पुत्र हुए, जो बड़े धार्मिक थे। प्रभावशाली इक्ष्वाकुने उन सभी पुत्रोंको इस पृथ्वीका पालक बना दिया ॥ ४ ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत् प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ॥ ५ ॥
उनमें सबसे ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विंश, जो धनुर्धर वीरोंका आदर्श था। भारत! विंशके कल्याणमय पुत्रका नाम विविंश हुआ ॥ ५ ॥
विविंशस्य सुता राजन् बभूवुर्दश पञ्च च ।
सर्वे धनुषि विक्रान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ६ ॥
दानधर्मरताः शान्ताः सततं प्रियवादिनः ।
तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान् सर्वानपीडयत् ॥ ७ ॥
राजन्! विविंशके पन्द्रह पुत्र हुए। वे सब-के-सब धनुर्विद्यामें पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, दान-धर्मपरायण, शान्त और सर्वदा मधुर भाषण करनेवाले थे। इन सबमें जो
ज्येष्ठ था, उसका नाम खनीनेत्र था। वह अपने उन सभी छोटे भाइयोंको बहुत कष्ट देता था ॥ ६-७ ॥ खनीनेत्रस्तु विक्रान्तो जित्वा राज्यमकण्टकम् । नाशकद् रक्षितुं राज्यं नान्वरज्यन्त तं प्रजाः ॥ ८ ॥ खनीनेत्र पराक्रमी होनेके कारण निष्कण्टक राज्यको जीतकर भी उसकी रक्षा न कर सका; क्योंकि प्रजाका उसमें अनुराग न था ॥ ८ ॥ तमपास्य च तद्राज्ये तस्य पुत्रं सुवर्चसम् । अभ्यषिञ्चन्त राजेन्द्र मुदिता ह्यभवंस्तदा ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! उसे राज्यसे हटाकर प्रजाने उसीके पुत्र सुवर्चाको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। उस समय प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥ स पितुर्विक्रियां दृष्ट्वा राज्यान्निर्सनं च तत् । नियतो वर्तयामास प्रजाहितचिकीर्षया ॥ १० ॥ सुवर्चा अपने पिताकी वह दुर्दशा, वह राज्यसे निष्कासन देखकर सावधान हो नियमपूर्वक प्रजाके हितकी इच्छासे सबके साथ उत्तम बर्ताव करने लगे ॥ १० ॥ ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शुचिः शमदमान्वितः । प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ॥ ११ ॥ वे ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखते, सत्य बोलते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते और मन तथा इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते थे। सदा धर्ममें लगे रहनेवाले उन मनस्वी नरेशपर प्रजाजनोंका विशेष अनुराग था ॥ ११ ॥ तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत् कोशवाहनम् । तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात् पर्यपीडयन् ॥ १२ ॥ किंतु केवल धर्ममें ही प्रवृत्त रहनेके कारण कुछ ही दिनोंमें राजाका खजाना खाली हो गया और उनके वाहन आदि भी नष्ट हो गये। उनका खजाना खाली हो गया, यह जानकर सामन्त नरेश चारों ओरसे धावा करके उन्हें पीड़ा देने लगे ॥ १२ ॥ स पीड्यमानो बहुभिः क्षीणकोशाश्ववाहनः । आर्तिमार्च्छत् परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ॥ १३ ॥ उनका कोष और घोड़े आदि वाहन तो नष्ट हो ही गये थे। बहुसंख्यक शत्रुओंने एक साथ धावा करके उन्हें सताना आरम्भ कर दिया। इससे राजा सुवर्चा अपने सेवकों और पुरवासियोंसहित भारी संकटमें पड़ गये ॥ १३ ॥ न चैनमभिहन्तुं ते शक्नुवन्ति बलक्षये । सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर! सेना और खजाना नष्ट हो जानेपर भी वे आक्रमणकारी शत्रु सुवर्चाका वध न कर सके; क्योंकि वे राजा नित्यधर्मपरायण और सदाचारी थे ॥ १४ ॥
यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः । ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत् ततो बलम् ॥ १५ ॥ जब वे नरेश नगरवासियोंसहित भारी विपत्तिमें पड़ गये, तब उन्होंने अपने हाथको मुँहसे लगाकर उसे शंखकी भाँति बजाया। इससे बहुत बड़ी सेना प्रकट हो गयी ॥ १५ ॥
ततस्तानजयत् सर्वान् प्रातिसीमान् नराधिपान् । एतस्मात् कारणाद् राजन् विश्रुतः स करन्धमः ॥ १६ ॥ राजन्! उसीकी सहायतासे उन्होंने अपने राज्यकी सीमापर निवास करनेवाले सम्पूर्ण शत्रु नरेशोंको परास्त कर दिया। इसी कारणसे अर्थात् करका धमन करने (हाथको बजाने)-से उनका नाम करन्धम हो गया ॥ १६ ॥
तस्य कारन्धमः पुत्रस्त्रेतायुगमुखेऽभवत् । इन्द्रादनवरः श्रीमान् देवैरपि सुदुर्जयः ॥ १७ ॥ करन्धमके त्रेतायुगके आरम्भमें एक कान्तिमान् पुत्र हुआ, जो कारन्धम कहलाया। वह इन्द्रसे किसी भी बातमें कम नहीं था। उसे परास्त करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था ॥ १७ ॥
तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा । स हि सम्राडभूत् तेषां वृत्तेन च बलेन च ॥ १८ ॥ उस समयके सभी भूपाल कारन्धमके अधीन हो गये थे। वह अपने सदाचार और बलके द्वारा उन सबका सम्राट् हो गया था ॥ १८ ॥
अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् । यज्ञशीलो धर्मरतिर्धृतिमान् संयतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ उस धर्मात्मा करन्धमकुमारका नाम अविक्षित् था। वह अपने शौर्यके द्वारा इन्द्रकी समानता करता था। वह यज्ञशील, धर्मानुरागी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय था ॥ १९ ॥
तेजसाऽऽदित्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २० ॥ तेजमें सूर्य, क्षमामें पृथ्वी, बुद्धिमें बृहस्पति और सुस्थिरतामें हिमवान् पर्वतके समान माना जाता था ॥ २० ॥
कर्मणा मनसा वाचा दमेन प्रशमेन च । मनांस्याराधयामास प्रजानां स महीपतिः ॥ २१ ॥ राजा अविक्षित् मन, वाणी, क्रिया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहके द्वारा प्रजाजनोंका चित्त संतुष्ट किये रहते थे ॥ २१ ॥
य ईजे हयमेधानां शतेन विधिवत् प्रभुः । याजयामास यं विद्वान् स्वयमेवाङ्गिराः प्रभुः ॥ २२ ॥
उन प्रभावशाली नरेशने विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। साक्षात् विद्वान् प्रभु, अंगिरा मुनिने ही उनका यज्ञ कराया था॥ २२॥
तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तया।
मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महायशाः ॥ २३ ॥
उन्हींके पुत्र हुए महायशस्वी, चक्रवर्ती, धर्मज्ञ राजा मरुत्त। जो अपने गुणोंके कारण पितासे भी बढ़े-चढ़े थे ॥ २३ ॥
नागायुतसमप्राणः साक्षाद् विष्णुरिवापरः।
स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत ॥ २४ ॥
कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः।
उनमें दस हजार हाथियोंके समान बल था। वे साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते थे। धर्मात्मा मरुत्त जब यज्ञ करनेको उद्यत हुए, उस समय उन्होंने सहस्रों सोनेके समुज्ज्वल पात्र बनवाये ॥ २४ १/२ ॥
मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे ॥ २५ ॥
काञ्चनः सुमहान् पादस्तत्र कर्म चकार सः।
ततः कुण्डानि पात्रींश्च पिठराण्यासनानि च ॥ २६ ॥
चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां संख्या न विद्यते।
तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह ॥ २७ ॥
हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें मेरु पर्वतके निकट एक महान् सुवर्णमय पर्वत है। उसीके समीप उन्होंने यज्ञशाला बनवायी और वहीं यज्ञ-कार्य आरम्भ किया। उनकी आज्ञासे अनेक सुनारोंने आकर सुवर्णमय कुण्ड, सोनेके बर्तन, थाली और आसन (चौकी आदि) तैयार किये। उन सब वस्तुओंकी गणना असम्भव है॥ २५—२७॥
ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत् पृथिवीपतिः।
मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ॥ २८ ॥
जब सब सामग्री तैयार हो गयी, तब वहाँ धर्मात्मा, पृथिवीपति राजा मरुत्तने अन्य सब प्रजापालोंके साथ विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1583)
पञ्चमोऽध्यायः
इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना
युधिष्ठिर उवाच
कथंवीर्यः समभवत् स राजा वदतां वर ।
कथं च जातरूपेण समयुज्यत स द्विज ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा मरुत्तका पराक्रम कैसा था? तथा उन्हें सुवर्णकी प्राप्ति कैसे हुई? ॥ १ ॥
क्व च तत् साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते ।
कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन ॥ २ ॥
भगवन्! तपोधन! वह द्रव्य इस समय कहाँ है? और हम उसे किस तरह प्राप्त कर सकते हैं? ॥ २ ॥
व्यास उवाच
असुराश्चैव देवाश्च दक्षस्यासन् प्रजापतेः ।
अपत्यं बहुलं तात संस्पर्धन्त परस्परम् ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**तात! प्रजापति दक्षके देवता और असुर नामक बहुत-सी संतानें हैं, जो आपसमें स्पर्धा रखती हैं ॥ ३ ॥
तथैवाङ्गिरसः पुत्रौ व्रततुल्यौ बभूवतुः ।
बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः संवर्तश्च तपोधनः ॥ ४ ॥
इसी प्रकार महर्षि अंगिराके दो पुत्र हुए, जो व्रतका पालन करनेमें एक समान हैं। उनमेंसे एक हैं महातेजस्वी बृहस्पति और दूसरे हैं तपस्याके धनी संवर्त ॥ ४ ॥
तावतिस्पर्धिनौ राजन् पृथगास्तां परस्परम् ।
बृहस्पतिः स संवर्तं बाधते स्म पुनः पुनः ॥ ५ ॥
राजन्! वे दोनों भाई एक-दूसरेसे अलग रहते और आपसमें बड़ी स्पर्धा रखते थे। बृहस्पति अपने छोटे भाई संवर्तको बारंबार सताया करते थे ॥ ५ ॥
स बाध्यमानः सततं भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत ।
अर्थानुत्सृज्य दिग्वासा वनवासमरोचयत् ॥ ६ ॥
भारत! अपने बड़े भाईके द्वारा सदा सताये जानेपर संवर्त धन-दौलतका मोह छोड़ घरसे निकल गये और दिगम्बर होकर वनमें रहने लगे। घरकी अपेक्षा वनवासमें ही उन्होंने सुख माना ॥ ६ ॥
वासवोऽप्यसुरान् सर्वान् विजित्य च निपात्य च ।
इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् ॥ ७ ॥
पुत्रमङ्गिरसो ज्येष्ठं विप्रज्येष्ठं बृहस्पतिम् ।
इसी समय इन्द्रने समस्त असुरोंको जीतकर मार गिराया तथा त्रिभुवनका साम्राज्य प्राप्त कर लिया। तदनन्तर उन्होंने अंगिराके ज्येष्ठ पुत्र विप्रवर बृहस्पतिको अपना पुरोहित बनाया ॥ ७ ½ ॥
याज्यस्त्वङ्गिरसः पूर्वमासीद् राजा करंधमः ॥ ८ ॥
वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च बलेन च ।
शतक्रतुरिवौजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ९ ॥
इसके पहले अंगिराके यजमान राजा करन्धम थे। संसारमें बल, पराक्रम और सदाचारके द्वारा उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी, धर्मात्मा और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ८-९ ॥
वाहनं यस्य योधाश्च मित्राणि विविधानि च ।
शयनानि च मुख्यानि महार्हाणि च सर्वशः ॥ १० ॥
ध्यानादेवाभवद् राजन् मुखवातेन सर्वशः ।
स गुणैः पार्थिवान् सर्वान् वशे चक्रे नराधिपः ॥ ११ ॥
राजन्! उनके लिये वाहन, योद्धा, नाना प्रकारके मित्र तथा श्रेष्ठ और सब प्रकारकी बहुमूल्य शय्याएँ चिन्तन करनेसे और मुखजनित वायुसे ही प्रकट हो जाती थीं। राजा करन्धमने अपने गुणोंसे समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था ॥ १०-११ ॥
संजीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गतः ।
बभूव तस्य पुत्रस्तु ययातिरिव धर्मवित् ॥ १२ ॥
अविक्षिन्नाम शत्रुंजित् स वशे कृतवान् महीम् ।
विक्रमेण गुणैश्चैव पितेवासीत् स पार्थिवः ॥ १३ ॥
कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित् ययातिके समान धर्मज्ञ थे। उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओंपर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था। वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे ॥ १२-१३ ॥
तस्य वासवतुल्योऽभून्मरुत्तो नाम वीर्यवान् ।
पुत्रस्तमनुरक्ताभूत् पृथिवी सागराम्बरा ॥ १४ ॥
अविक्षित्के पुत्रका नाम मरुत्त था, जो इन्द्रके समान पराक्रमी थे। समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी—समस्त भूमण्डलकी प्रजा उनमें अनुराग रखती थी ॥ १४ ॥
स्पर्धते स स्म सततं देवराजेन नित्यदा ।
वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ।। १५ ।।
पाण्डुनन्दन! राजा मरुत्त सदा देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखते थे और इन्द्र भी मरुत्तके साथ स्पर्धा रखते थे ।। १५ ।।
शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषयति स्म ह ।। १६ ।।
पृथिवीपति मरुत्त पवित्र एवं गुणवान् थे। इन्द्र उनसे बढ़नेके लिये सदा प्रयत्न करते थे तो भी कभी बढ़ नहीं पाते थे ।। १६ ।।
सोऽशक्नुवन् विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम् ।
उवाचेदं वचो देवैः सहितो हरिवाहनः ।। १७ ।।
जब देवताओंसहित इन्द्र किसी तरह बढ़ न सके, तब बृहस्पतिको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहने लगे— ।। १७ ।।
बृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथंचन ।
दैवं कर्मार्थ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत् प्रियम् ।। १८ ।।
‘बृहस्पतिजी! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो राजा मरुत्तका यज्ञ तथा श्राद्धकर्म किसी तरह न कराइयेगा ।। १८ ।।
अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते ।
इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ।। १९ ।।
‘बृहस्पते! एकमात्र मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी और देवताओंका इन्द्र हूँ। मरुत्त तो केवल पृथ्वीके राजा हैं ।। १९ ।।
कथं ह्यमर्त्यं ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम् ।
याजयेर्मृत्युसंयुक्तं मरुत्तमविशङ्कया ।। २० ।।
‘ब्रह्मन्! आप अमर देवराजका यज्ञ कराकर—देवेन्द्रके पुरोहित होकर मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे निःशंक होकर कराइयेगा? ।। २० ।।
मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् ।
परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ।। २१ ।।
‘आपका कल्याण हो। आप मुझे अपना यजमान बनाइये अथवा पृथिवीपति मरुत्तको। या तो मुझे छोड़िये या मरुत्तको छोड़कर चुपचाप मेरा आश्रय लीजिये’ ।। २१ ।।
एवमुक्तः स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पतिः ।
मुहूर्तमिव संचिन्त्य देवराजानमब्रवीत् ।। २२ ।।
कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर बृहस्पतिने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ।। २२ ।।
त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च ।। २३ ।।
'देवराज! तुम सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी हो, तुम्हारे ही आधारपर समस्त लोक टिके हुए हैं। तुम नमुचि, विश्वरूप और बलासुरके विनाशक हो ।। २३ ।।
त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम् ।
त्वं बिभर्षि भुवं द्यां च सदैव बलसूदन ।। २४ ।।
'बलसूदन! तुम अद्वितीय वीर हो। तुमने उत्तम सम्पत्ति प्राप्त की है। तुम पृथ्वी और स्वर्ग दोनोंका भरण-पोषण एवं संरक्षण करते हो ।। २४ ।।
पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर ।
याजयेयमहं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ।। २५ ।।
'देवेश्वर! पाकशासन! तुम्हारी पुरोहिती करके मैं मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे करा सकता हूँ ।। २५ ।।
समाश्र्वसिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित् ।
ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ।। २६ ।।
'देवेन्द्र! धैर्य धारण करो। अब मैं कभी किसी मनुष्यके यज्ञमें जाकर सुवा हाथमें नहीं लूँगा। इसके सिवा मेरी यह बात भी ध्यानसे सुन लो ।। २६ ।।
हिरण्यरेता नोष्णः स्यात् परिवर्तत मेदिनी ।
भासं तु न रविः कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि ।। २७ ।।
'आग चाहे ठण्डी हो जाय, पृथ्वी उलट जाय और सूर्यदेव प्रकाश करना छोड़ दें; किंतु मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा नहीं टल सकती' ।। २७ ।।
वैशम्पायन उवाच
बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः ।
प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ।। २८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! बृहस्पतिजीकी बात सुनकर इन्द्रका मात्सर्य दूर हो गया और तब वे उनकी प्रशंसा करके अपने घरमें चले गये ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
षष्ठोऽध्यायः
नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रसंगमें बुद्धिमान् राजा मरुत्त और बृहस्पतिके इस पुरातन संवादविषयक इतिहासका उल्लेख किया जाता है ॥ १ ॥
देवराजस्य समयं कृतमाङ्गिरसेन ह ।
श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्यज्ञमाहारयत् परम् ॥ २ ॥
राजा मरुत्तने जब यह सुना कि अंगिराके पुत्र बृहस्पतिजीने मनुष्यके यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा कर ली है, तब उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया ॥ २ ॥
संकल्प्य मनसा यज्ञं करन्धमसुतात्मजः ।
बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
बातचीत करनेमें कुशल करन्धमपौत्र मरुत्तने मन-ही-मन यज्ञका संकल्प करके बृहस्पतिजीके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
भगवन् यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन ।
कृतोऽभिसंधिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद् गुरो ॥ ४ ॥
तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे ।
याज्योऽस्मि भवतः साधो तत् प्राप्नुहि विधत्स्व च ॥ ५ ॥
‘भगवन्! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है। साधु पुरुष! मैं आपका पुराना यजमान भी हूँ। इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये’ ॥ ४-५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
न कामये याजयितुं त्वामहं पृथिवीपते ।
वृतोऽस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ॥ ६ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! अब मैं तुम्हारा यज्ञ कराना नहीं चाहता। देवराज इन्द्रने मुझे अपना पुरोहित बना लिया है और मैंने भी उनके सामने यह प्रतिज्ञा कर ली है ॥ ६ ॥
मरुत्त उवाच
पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहु मन्ये च ते भृशम् । तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥ ७ ॥ **मरुत्त बोले—**विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ। आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये ॥ ७ ॥
बृहस्पतिरुवाच
अमर्त्यं याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम् । मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ॥ ८ ॥ **बृहस्पतिजीने कहा—**मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो। अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया हूँ ॥ ८ ॥ न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि । उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥ ९ ॥ महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना पुरोहित बना लो। जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा ॥ ९ ॥
व्यास उवाच
एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् । प्रत्यागच्छन् सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥ १० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ। वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्गमें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ ॥ १० ॥ देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः । विधिवत् प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब नारदजीने उनसे कहा— ॥ ११ ॥ राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित् क्षेमं तवानघ । क्व गतोऽसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥ १२ ॥ 'राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो। निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है? ॥ १२ ॥ श्रोतव्यं चेन्मया राजन् ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ । व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥ १३ ॥
'राजन्! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ। नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा' ।। १३ ।। एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा । विप्रलम्भमुपाध्यायात् सर्वमेव न्यवेदयत् ।। १४ ।। महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय (पुरोहित)-से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया ।। १४ ।।
मरुत्त उवाच गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् । यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ।। १५ ।। मरुत्तने कहा—नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विज्के रूपमें देखूँ; किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की ।। १५ ।। प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये । परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ।। १६ ।। नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया। उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता ।। १६ ।।
व्यास उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह । आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ।। १७ ।। व्यासजी कहते हैं—महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षित्कुमारको जीवन प्रदान करते हुए-से कहा ।। १७ ।।
नारद उवाच राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः । चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन् प्रजाः ।। १८ ।। तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः । प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ।। १९ ।। नारदजी बोले—राजन्! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात् सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ। संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे ।। १८-१९ ।।
मरुत्त उवाच
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद ।
पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ॥ २० ॥
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् ।
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥
**मरुत्त बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २०-२१ ॥
नारद उवाच
उन्मत्तवेषं बिभ्रत् स चङ्क्रमीति यथासुखम् ।
वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम् ॥ २२ ॥
**नारदजीने कहा—**महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका-सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं ॥ २२ ॥
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् ।
तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥ २३ ॥