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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1607)

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नवमोऽध्यायः

बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुनः लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना

इन्द्र उवाच

कच्चित्सुखं स्वपिषि त्वं बृहस्पते
कच्चिन्मनोज्ञाः परिचारकास्ते ।
कच्चिद्देवानां सुखकामोऽसि विप्र
कच्चिद्देवास्तां परिपालयन्ति ॥ १ ॥

इन्द्रने कहा— बृहस्पते! आप सुखसे सोते हैं न? आपको मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हैं न? विप्रवर! आप देवताओंके सुखकी कामना तो रखते हैं न? क्या देवता आपका पूर्णरूपसे पालन करते हैं? ॥ १ ॥

बृहस्पतिरुवाच

सुखं शये शयने देवराज
तथा मनोज्ञाः परिचारका मे ।
तथा देवानां सुखकामोऽस्मि नित्यं
देवाश्च मां सुभृशं पालयन्ति ॥ २ ॥

बृहस्पतिजी बोले— देवराज! मैं सुखसे शय्यापर सोता हूँ, मुझे मेरे मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हुए हैं। मैं सदा देवताओंके सुखकी कामना करता हूँ और देवतालोग भी मेरा भलीभाँति पालन करते हैं ॥ २ ॥

इन्द्र उवाच

कुतो दुःखं मानसं देहजं वा
पाण्डुर्विवर्णश्च कुतस्त्वमद्य ।
आचक्ष्व मे ब्राह्मण यावदेतान्
निहन्मि सर्वांस्तव दुःखकर्तॄन् ॥ ३ ॥

इन्द्रने कहा— विप्रवर! आपको यह मानसिक अथवा शारीरिक दुःख कैसे प्राप्त हुआ? आप आज उदास और पीले क्यों हो रहे हैं? आप बताइये तो सही, जिन्होंने आपको दुःख दिया है, उन सबको मैं अभी नष्ट किये देता हूँ ॥ ३ ॥

बृहस्पतिरुवाच

मरुत्तमाहुर्मघवन् यक्ष्यमाणं महायज्ञेनोत्तमदक्षिणेन । संवर्तो याजयतीति मे श्रुतं तदिच्छामि न स तं याजयेत ॥ ४ ॥ बृहस्पतिजी बोले— मघवन्! लोग कहते हैं कि महाराज मरुत्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त एक महान् यज्ञ करने जा रहे हैं तथा यह भी मेरे सुननेमें आया है कि संवर्त ही आचार्य होकर वह यज्ञ करायेंगे। परंतु मेरी इच्छा है कि वे उस यज्ञको न कराने पावें ॥ ४ ॥

इन्द्र उवाच

सर्वान् कामाननुयातोऽसि विप्र यस्त्वं देवानां मन्त्रवित्सुपुरोधाः । उभौ च ते जरामृत्यू व्यतीतौ किं संवर्तस्तव कर्ताद्य विप्र ॥ ५ ॥ इन्द्रने कहा— ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवांछित भोग आपको प्राप्त हैं; क्योंकि आप देवताओंके मन्त्रज्ञ पुरोहित हैं। आपने जरा और मृत्यु दोनोंको जीत लिया है। फिर संवर्त आपका क्या कर सकते हैं? ॥ ५ ॥

बृहस्पतिरुवाच

देवैः सह त्वमसुरान् प्रणुद्य जिघांससे चाप्युत सानुबन्धान् । यं यं समृद्धं पश्यसि तत्र तत्र दुःखं सपत्नेषु समृद्धिभावः ॥ ६ ॥ बृहस्पतिजी बोले— देवराज! तुम असुरोंमेंसे जिस-जिसको समृद्धिशाली देखते हो, उसके ऊपर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें देवताओंके साथ आक्रमण करके उन सभी असुरोंको मिटा डालना चाहते हो। वास्तवमें शत्रुओंकी समृद्धि दुःखका कारण होती है ॥ ६ ॥

अतोऽस्मि देवेन्द्र विवर्णरूपः सपत्नो मे वर्धते तन्निशम्य । सर्वोपायैर्मघवन् संनियच्छ संवर्तं वा पार्थिवं वा मरुत्तम् ॥ ७ ॥ देवेन्द्र! इसीसे मैं भी उदास हो रहा हूँ। मेरा शत्रु संवर्त बढ़ रहा है, यह सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ गयी है। अतः मघवन्! तुम सभी सम्भव उपायोंद्वारा संवर्त और राजा मरुत्तको कैद कर लो ॥ ७ ॥

इन्द्र उवाच

एहि गच्छ प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं वै त्वां याजयिता बृहस्पति- स्तथामरं चैव करिष्यतीति ॥ ८ ॥ तब इन्द्रने अग्निदेवसे कहा— जातवेदा! इधर आओ और मेरा संदेश लेकर मरुत्तके पास जाओ। मरुत्तकी सम्मति लेकर बृहस्पतिजीको उनके पास पहुँचा देना। वहाँ जाकर राजासे कहना कि 'ये बृहस्पतिजी ही आपका यज्ञ करायेंगे तथा ये आपको अमर भी कर देंगे' ॥ ८ ॥

अग्निरुवाच

अहं गच्छामि मघवन् दूतोऽद्य बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । वाचं सत्यां पुरुहूतस्य कर्तुं बृहस्पतेश्चापचितिं चिकीर्षुः ॥ ९ ॥ अग्निदेवने कहा— मघवन्! मैं बृहस्पतिजीको मरुत्तके पास पहुँचा आनेके लिये आज आपका दूत बनकर जा रहा हूँ। ऐसा करके मैं देवेन्द्रकी आज्ञाका पालन और बृहस्पतिजीका सम्मान करना चाहता हूँ ॥ ९ ॥

व्यास उवाच

ततः प्रायाद् धूमकेतुर्महात्मा वनस्पतीन् वीरुधश्चापमृद्नन् । कामाद्धिमान्ते परिवर्तमानः काष्ठातिगो मातरिश्वैव नर्दन् ॥ १० ॥ व्यासजी कहते हैं— यह कहकर धूममय ध्वजावाले महात्मा अग्निदेव वनस्पतियों और लताओंको रौंदते हुए वहाँसे चल दिये। ठीक उसी तरह जैसे शीतकालके अन्तमें स्वच्छन्दतापूर्वक बहनेवाली दिगन्तव्यापिनी वायु विशेष गर्जना करती हुई आगे बढ़ रही हो ॥ १० ॥

मरुत्त उवाच

आश्चर्यमद्य पश्यामि रूपिणं वह्निमागतम् । आसनं सलिलं पाद्यं गां चोपानय वै मुने ॥ ११ ॥ मरुत्तने कहा— मुने! बड़े आश्चर्यकी बात है कि आज मैं मूर्तिमान् अग्निदेवको यहाँ आया देख रहा हूँ। आप इनके लिये आसन, पाद्य, अर्घ्य और गौ प्रस्तुत कीजिये ॥ ११ ॥

अग्निरुवाच

आसनं सलिलं पाद्यं प्रतिनन्दामि तेऽनघ ।
इन्द्रेण तु समादिष्टं विद्धि मां दूतमागतम् ॥ १२ ॥
**अग्निने कहा—**निष्पाप नरेश! आपके दिये हुए पाद्य, अर्घ्य और आसन आदिका अभिनन्दन करता हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि इस समय मैं इन्द्रका संदेश लेकर उनका दूत बनकर आपके पास आया हूँ ॥ १२ ॥

मरुत्त उवाच

कच्चिच्छ्रीमान् देवराजः सुखी च
कच्चिच्चास्मान् प्रीयते धूमकेतो ।
कच्चिद्देवा अस्य वशे यथावत्
प्रब्रूहि त्वं मम कात्स्न्यैन देव ॥ १३ ॥
**मरुत्तने कहा—**अग्निदेव! श्रीमान् देवराज सुखी तो हैं न? धूमकेतो! वे हमलोगोंपर प्रसन्न हैं न? सम्पूर्ण देवता उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं न? देव! ये सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बताइये ॥ १३ ॥

अग्निरुवाच

शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वया सः । देवाश्च सर्वे वशगास्तस्य राजन् संदेशं त्वं शृणु मे देवराज्ञः ॥ १४ ॥ **अग्निदेवने कहा—**राजेन्द्र! देवराज इन्द्र बड़े सुखसे हैं और आपके साथ अटूट मैत्री जोड़ना चाहते हैं। सम्पूर्ण देवता भी उनके अधीन ही हैं। अब आप मुझसे देवराज इन्द्रका संदेश सुनिये ॥ १४ ॥

यदर्थं मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं गुरुर्याजयतां नृप त्वां मर्त्यं सन्तममरं त्वां करोतु ॥ १५ ॥ उन्होंने जिस कामके लिये मुझे आपके पास भेजा है, उसे सुनिये। वे मेरे द्वारा बृहस्पतिजीको आपके पास भेजना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि बृहस्पतिजी आपके गुरु हैं। अतः ये ही आपका यज्ञ करायेंगे। आप मरणधर्मा मनुष्य हैं। ये आपको अमर बना देंगे ॥ १५ ॥

मरुत्त उवाच

संवर्तोऽयं याजयिता द्विजो मां बृहस्पतेरञ्जलिरेष तस्य । न चैवासौ याजयित्वा महेन्द्रं मर्त्यं सन्तं याजयन्नद्य शोभेत् ॥ १६ ॥ **मरुत्तने कहा—**भगवन्! मेरा यज्ञ ये विप्रवर संवर्तजी करायेंगे। बृहस्पतिजीके लिये तो मेरी यह अञ्जलि जुड़ी हुई है। महेन्द्रका यज्ञ कराकर अब मेरे-जैसे मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ करानेमें उनकी शोभा नहीं है ॥ १६ ॥

अग्निरुवाच

ये वै लोका देवलोके महान्तः सम्प्राप्स्यसे तान् देवराजप्रसादात् । त्वां चेदसौ याजयेद् वै बृहस्पति- र्नूनं स्वर्गं त्वं जयेः कीर्तियुक्तः ॥ १७ ॥ तथा लोका मानुषा ये च दिव्याः प्रजापतेश्चापि ये वै महान्तः । ते ते जिता देवराज्यं च कृत्स्नं बृहस्पतिर्याजयेच्चेन्नरेन्द्र ॥ १८ ॥

अग्निदेवने कहा— राजन्! यदि बृहस्पतिजी आपका यज्ञ करायेंगे तो देवराज इन्द्रके प्रसादसे देवलोकके भीतर जितने बड़े-बड़े लोक हैं, वे सभी आपके लिये सुलभ हो जायँगे। निश्चय ही आप यशस्वी होनेके साथ ही स्वर्गपर भी विजय प्राप्त कर लेंगे। मानवलोक, दिव्यलोक, महान् प्रजापतिलोक और सम्पूर्ण देवराज्यपर भी आपका अधिकार हो जायगा ।। १७-१८ ।।

संवर्त उवाच

मा स्मैव त्वं पुनरागाः कथंचिद् बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । मा त्वां धक्ष्ये चक्षुषा दारुणेन संक्रुद्धोऽहं पावक त्वं निबोध ।। १९ ।। संवर्तने कहा— अग्ने! तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो कि अबसे फिर कभी बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिये। नहीं तो क्रोधमें भरकर मैं अपनी दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा ।। १९ ।।

व्यास उवाच

ततो देवानगमद् धूमकेतु- र्दाहाद् भीतो व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् । तं वै दृष्ट्वा प्राह शक्रो महात्मा बृहस्पतेः संनिधौ हव्यवाहम् ।। २० ।। यस्त्वं गतः प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । तत् किं प्राह स नृपो यक्ष्यमाणः कच्चिद् वचः प्रतिगृह्णाति तच्च ।। २१ ।। व्यासजी कहते हैं— संवर्तकी बात सुनकर अग्निदेव भस्म होनेके भयसे व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपते हुए तुरंत देवताओंके पास लौट गये। उन्हें आया देख महामना इन्द्रने बृहस्पतिजीके सामने ही पूछा—'अग्निदेव! तुम तो मेरे भेजनेसे बृहस्पतिजीको राजा मरुत्तके पास पहुँचानेका संदेश लेकर गये थे। बताओ, यज्ञकी तैयारी करनेवाले राजा मरुत्त क्या कहते हैं? वे मेरी बात मानते हैं या नहीं?' ।। २०-२१ ।।

अग्निरुवाच

न ते वाचं रोचयते मरुत्तो बृहस्पतेरञ्जलिं प्राहिणोत् सः । संवर्तो मां याजयितेत्युवाच

पुनः पुनः स मया याच्यमानः ॥ २२ ॥
**अग्निने कहा—**देवराज! राजा मरुत्तको आपकी बात पसंद नहीं आयी। बृहस्पतिजीको तो उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम कहलाया है। मेरे बारंबार अनुरोध करनेपर भी उन्होंने यही उत्तर दिया है कि 'संवर्तजी ही मेरा यज्ञ करायेंगे' ॥ २२ ॥
उवाचेदं मानुषा ये च दिव्याः
प्रजापतेर्ये च लोका महान्तः ।
तांश्चेल्लभयं संविदं तेन कृत्वा
तथापि नेच्छेयमिति प्रतीतः ॥ २३ ॥
उन्होंने यह भी कहा है कि 'जो मनुष्यलोक, दिव्यलोक और प्रजापतिके महान् लोक हैं, उन्हें भी यदि इन्द्रके साथ समझौता करके ही पा सकता हूँ तो भी मैं बृहस्पतिजीको अपने यज्ञका पुरोहित बनाना नहीं चाहता हूँ। यह मैं दृढ़ निश्चयके साथ कह रहा हूँ' ॥ २३ ॥

इन्द्र उवाच

पुनर्गत्वा पार्थिवं त्वं समेत्य
वाक्यं मदीयं प्रापय स्वार्थयुक्तम् ।
पुनर्यद् युक्तो न करिष्यते वच-
स्त्वत्तो वज्रं सम्प्रहर्त्तास्मि तस्मै ॥ २४ ॥
**इन्द्रने कहा—**अग्निदेव! एक बार फिर जाकर राजा मरुत्तसे मिलो और मेरा अर्थयुक्त संदेश उनके पास पहुँचा दो। यदि तुम्हारे द्वारा दोबारा कहनेपर भी मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं उनके ऊपर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ २४ ॥

अग्निरुवाच

गन्धर्वराड् यत्वयं तत्र दूतो
बिभेम्यहं वासव तत्र गन्तुम् ।
संरब्धो मामब्रवीत् तीक्ष्णरोषः
संवर्तो वाक्यं चरितब्रह्मचर्यः ॥ २५ ॥
यद्यागच्छेः पुनरेवं कथंचिद्
बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते ।
दहेयं त्वां चक्षुषा दारुणेन
संक्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र ॥ २६ ॥
**अग्निने कहा—**देवेन्द्र! ये गन्धर्वराज वहाँ दूत बनकर जायँ। मैं दुबारा वहाँ जानेसे डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने तीव्र रोषमें भरकर मुझसे कहा था कि 'अग्ने! यदि फिर इस प्रकार किसी तरह बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये आओगे तो मैं कुपित हो

दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा।' इन्द्र! उनकी इस बातको अच्छी तरह समझ लीजिये ।। २५-२६ ।।

शक्र उवाच

त्वमेवान्यान् दहसे जातवेदो न हि त्वदन्यो विद्यते भस्मकर्ता । त्वत्संस्पर्शात् सर्वलोको बिभेति अश्रद्धेयं वदसे हव्यवाह ।। २७ ।।

**इन्द्रने कहा—**हव्यवाहन! अग्निदेव! तुम तो ऐसी बात कह रहे हो, जिसपर विश्वास नहीं होता; क्योंकि तुम्हीं दूसरोंको भस्म करते हो। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भस्म करनेवाला नहीं है। तुम्हारे स्पर्शसे सभी लोग डरते हैं ।। २७ ।।

अग्निरुवाच

दिवं देवेन्द्र पृथिवीं च सर्वां संवेष्टयेस्त्वं स्वबलेनैव शक्र । एवंविधस्येह सतस्तवासौ कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग् जहार ।। २८ ।।

**अग्निदेवने कहा—**देवेन्द्र! आप भी तो अपने बलसे सारी पृथ्वी और स्वर्गलोकको आवेष्टित किये हुए हैं। ऐसे होनेपर भी आपके इस स्वर्गको पूर्वकालमें वृत्रासुरने कैसे हर लिया? ।। २८ ।।

इन्द्र उवाच

न गण्डिकाकारयोगं करेऽणुं न चारिसोमं प्रपिबामि वह्ने । न क्षीणशक्तौ प्रहरामि वज्रं को मेऽसुखाय प्रहरेत मर्त्यः ।। २९ ।।

**इन्द्रने कहा—**अग्निदेव! मैं पर्वतको भी मक्खीके समान छोटा कर सकता हूँ तो भी शत्रु‌का दिया हुआ सोमरस नहीं पीता हूँ और जिसकी शक्ति क्षीण हो गयी है, ऐसे शत्रुपर वज्रका प्रहार नहीं करता। फिर भी कौन ऐसा मनुष्य है जो मुझे कष्ट पहुँचानेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ।। २९ ।।

प्रव्राजयेयं कालकेयान् पृथिव्या- मपाकर्षन् दानवानन्तरिक्षात् । दिवः प्रह्लादमवसानमानयं को मेऽसुखाय प्रहरेत मानवः ।। ३० ।।

मैं चाहूँ तो कालकेय-जैसे दानवोंको आकाशसे खींचकर पृथ्वीपर गिरा सकता हूँ। इसी प्रकार स्वर्गसे प्रह्लादके प्रभुत्वका भी अन्त कर सकता हूँ, फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा है जो कष्ट देनेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ।। ३० ।।

अग्निरुवाच

यत्र शर्यातिं च्यवनो याजयिष्यन्
सहाश्विभ्यां सोममगृह्णादेकः ।
तं त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधीः पुरस्ता-
च्छार्यातियज्ञं स्मर तं महेन्द्र ।। ३१ ।।
**अग्निदेवने कहा—**महेन्द्र! राजा शर्यातिके उस यज्ञका तो स्मरण कीजिये, जहाँ महर्षि च्यवन उनका यज्ञ करानेवाले थे। आप क्रोधमें भरकर उन्हें मना करते ही रह गये और उन्होंने अकेले अपने ही प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंसहित अश्विनीकुमारोंके साथ सोमरसका पान किया ।। ३१ ।।
वज्रं गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं
सम्प्राहार्षीश्च्यवनस्यातिघोरम् ।
स ते विप्रः सह वज्रेण बाहु-
मपगृह्णात् तपसा जातमन्युः ।। ३२ ।।
पुरंदर! उस समय आप अत्यन्त भयंकर वज्र लेकर महर्षि च्यवनके ऊपर प्रहार करना ही चाहते थे; किंतु उन ब्रह्मर्षिने कुपित होकर अपने तपोबलसे आपकी बाँहको वज्रसहित जकड़ दिया ।। ३२ ।।
ततो रोषात् सर्वतो घोररूपं
सपत्नं ते जनयामास भूखः ।
मदं नामासुरं विश्वरूपं
यं त्वं दृष्ट्वा चक्षुषी संन्यमीलः ।। ३३ ।।
तदनन्तर उन्होंने पुनः रोषपूर्वक आपके लिये सब ओरसे भयानक रूपवाले एक शत्रुको उत्पन्न किया। जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त मद नामक असुर था और जिसे देखते ही आपने अपनी आँखें बंद कर ली थीं ।। ३३ ।।
हनुरेका जगतीस्था तथैका
दिवं गता महतो दानवस्य ।
सहस्रं दन्तानां शतयोजनानां
सुतीक्ष्णानां घोररूपं बभूव ।। ३४ ।।
उस विशालकाय दानवकी एक ठोढ़ी पृथ्वीपर टिकी हुई थी और दूसरा ऊपरका ओठ स्वर्गसे जा लगा था। उसके सैकड़ों योजन लंबे सहस्रों तीखे दाँत थे, जिससे उसका रूप

बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। ३४ ।। वृत्ताः स्थूला रजतस्तम्भवर्णा दंष्ट्राश्चतस्रो द्वे शते योजनानाम् । स त्वां दन्तान् विदशन्नभ्यधाव- ञ्जिघांसया शूलमुद्यम्य घोरम् ।। ३५ ।। उसकी चार दाढ़ें गोलाकार, मोटी और चाँदीके खम्भोंके समान चमकीली थीं। उनकी लंबाई दो-दो सौ योजनकी थी। वह दानव भयंकर त्रिशूल लेकर आपको मार डालनेकी इच्छासे दाँत पीसता हुआ दौड़ा था ।। ३५ ।।

अपश्यस्त्वं तं तदा घोररूपं सर्वे वै त्वां ददृशुर्दर्शनीयम् । यस्माद् भीतः प्राञ्जलिस्त्वं महर्षि- मागच्छेथाः शरणं दानवघ्न ।। ३६ ।। दानवदलन देवराज! आपने उस समय उस घोररूपधारी दानवको देखा था और अन्य सब लोगोंने आपकी ओर भी दृष्टिपात किया था। उस अवसरपर भयके कारण आपकी जो दशा हुई थी, वह देखने ही योग्य थी। आप उस दानवसे भयभीत हो हाथ जोड़कर महर्षि च्यवनकी शरणमें गये थे ।। ३६ ।।

क्षात्राद् बलाद् ब्रह्मबलं गरीयो न ब्रह्मणतः किंचिदन्यद् गरीयः । सोऽहं जानन् ब्रह्मतेजो यथाव- न्न संवर्तं जेतुमिच्छामि शक्र ।। ३७ ।। अतः देवेन्द्र! क्षात्रबलकी अपेक्षा ब्राह्मणबल श्रेष्ठतम है। ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है। मैं ब्रह्मतेजको अच्छी तरह जानता हूँ; अतः संवर्तको जीतनेकी मुझे इच्छातक नहीं होती है ।। ३७ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये नवमोऽध्याय ।। ९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1617)

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दशमोऽध्यायः

इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्रबलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना

इन्द्र उवाच

एवमेतद् ब्रह्मबलं गरीयो
न ब्राह्मणात् किंचिदन्यद् गरीयः ।
आविक्षितस्य तु बलं न मृष्ये
वज्रमस्मै प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ १ ॥
इन्द्रने कहा— यह ठीक है कि ब्रह्मबल सबसे बढ़कर है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है; किंतु मैं राजा मरुत्तके बलको नहीं सह सकता। उनके ऊपर अवश्य अपने घोर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र प्रहितो गच्छ मरुत्तं
संवर्तेन संगतं तं वदस्व ।
बृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राजन्
वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ २ ॥
गन्धर्वराज धृतराष्ट्र! अब तुम मेरे भेजनेसे वहाँ जाओ और संवर्तके साथ मिले हुए राजा मरुत्तसे कहो—‘राजन्! आप बृहस्पतिको आचार्य बनाकर उनसे यज्ञकर्मकी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कीजिये। अन्यथा मैं इन्द्र आपपर घोर वज्रका प्रहार करूँगा’ ॥ २ ॥

व्यास उवाच

ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्रं
प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य ॥ ३ ॥
गन्धर्वं मां धृतराष्ट्रं निबोध
त्वामागतं वक्तुकामं नरेन्द्र ।
ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह
यत् प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा ॥ ४ ॥
व्यासजी कहते हैं— तब गन्धर्वराज धृतराष्ट्र राजा मरुत्तके पास गये और उनसे इन्द्रका संदेश इस प्रकार कहने लगे—‘महाराज! आपको विदित हो कि मैं धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व हूँ और आपको देवराज इन्द्रका संदेश सुनाने आया हूँ। राजसिंह! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी महामना इन्द्रने जो कुछ कहा है, उनका वह वाक्य सुनिये ॥ ३-४ ॥

बृहस्पतिं याजकं त्वं वृणीष्व वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम्। वचश्चेदेतन्न करिष्यसे मे प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा ॥ ५ ॥ अचिन्त्यकर्मा इन्द्र कहते हैं—‘राजन्! आप बृहस्पतिको अपने यज्ञका पुरोहित बनाइये। यदि आप मेरी यह बात नहीं मानेंगे तो मैं आपपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा’ ॥ ५ ॥

मरुत्त उवाच

त्वं चैवैतद् वेत्थ पुरंदरश्च विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च। मित्रद्रोहे निष्कृतिर्नास्ति लोके महत् पापं ब्रह्महत्यासमं तत् ॥ ६ ॥ मरुत्तने कहा—गन्धर्वराज! आप, इन्द्र, विश्वेदेव, वसुगण तथा अश्विनीकुमार भी इस बातको जानते हैं कि मित्रके साथ द्रोह करनेपर ब्रह्महत्याके समान महान् पाप लगता है। उससे छुटकारा पानेका संसारमें कोई उपाय नहीं है ॥ ६ ॥

बृहस्पतिर्याजयतां महेन्द्रं देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम्। संवर्तो मां याजयिताद्य राजन् न ते वाक्यं तस्य वा रोचयामि ॥ ७ ॥ गन्धर्वराज! बृहस्पतिजी वज्रधारियोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर महेन्द्रका यज्ञ करायें। मेरा यज्ञ तो अब संवर्तजी ही करायेंगे। इसके विरुद्ध न तो मैं आपकी बात मानूँगा और न इन्द्रकी ही ॥ ७ ॥

गन्धर्व उवाच

घोरो नादः श्रूयतां वासवस्य नभस्तले गर्जतो राजसिंह। व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ॥ ८ ॥ गन्धर्वराजने कहा—राजसिंह! आकाशमें गर्जना करते हुए इन्द्रका वह घोर सिंहनाद सुनिये। जान पड़ता है, महेन्द्र आपके ऊपर वज्र छोड़ना ही चाहते हैं; अतः राजन्! अपनी रक्षा एवं भलाईका उपाय सोचिये। इसके लिये यही अवसर है ॥ ८ ॥

व्यास उवाच

इत्येवमुक्तो धृतराष्ट्रेण राजन् श्रुत्वा नादं नदतो वासवस्य । तपोनित्यं धर्मविदां वरिष्ठं संवर्तं तं ज्ञापयामास कार्यम् ॥ ९ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने आकाशमें गरजते हुए इन्द्रका शब्द सुनकर सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ संवर्तको इन्द्रके इस कार्यकी सूचना दी ॥ ९ ॥

मरुत्त उवाच

इममात्मानं प्लवमानमारा- दध्वा दूरं तेन न दृश्यतेऽद्य । प्रपद्येऽहं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः प्रयच्छ तस्मादभयं विप्रमुख्य ॥ १० ॥ अयमायाति वै वज्री दिशो विद्योतयन् दश । अमानुषेण घोरेण सदस्यास्त्रासिता हि नः ॥ ११ ॥ **मरुत्तने कहा—**विप्रवर! देवराज इन्द्र दूरसे ही प्रहार करनेकी चेष्टा कर रहे हैं, वे दूरकी राहपर खड़े हैं, इसलिये उनका शरीर दृष्टिगोचर नहीं होता। ब्राह्मणशिरोमणे! मैं आपकी शरणमें हूँ और आपके द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे अभय-दान दें। देखिये, ये वज्रधारी इन्द्र दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए चले आ रहे हैं। इनके भयंकर एवं अलौकिक सिंहनादसे हमारी यज्ञशालाके सभी सदस्य थर्रा उठे हैं ॥ १०-११ ॥

संवर्त उवाच

भयं शक्राद् व्येतु ते राजसिंह
प्रणोत्स्येऽहं भयमेतत् सुघोरम् ।
संस्तम्भिन्या विद्यया क्षिप्रमेव
मा भैस्त्वमस्याभिभवात् प्रतीतः ॥ १२ ॥

संवर्तने कहा— राजसिंह! इन्द्रसे तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। मैं स्तम्भिनी विद्याका प्रयोग करके बहुत जल्द तुम्हारे ऊपर आनेवाले इस अत्यन्त भयंकर संकटको दूर किये देता हूँ। मुझपर विश्वास करो और इन्द्रसे पराजित होनेका भय छोड़ दो ॥ १२ ॥

अहं संस्तम्भयिष्यामि मा भैस्त्वं शक्रतो नृप ।
सर्वेषामेव देवानां क्षयितान्यायुधानि मे ॥ १३ ॥

दिशो वज्रं व्रजतां वायुरेतु
वर्षं भूत्वा वर्षतां काननेषु ।
आपः प्लवन्त्वन्तरिक्षे वृथा च
सौदामनी दृश्यते मापि भैस्त्वम् ॥ १४ ॥

नरेश्वर! मैं अभी उन्हें स्तम्भित करता हूँ; अतः तुम इन्द्रसे न डरो। मैंने सम्पूर्ण देवताओंके अस्त्र-शस्त्र भी क्षीण कर दिये हैं। चाहे दसों दिशाओंमें वज्र गिरे, आँधी चले, इन्द्र स्वयं ही वर्षा बनकर सम्पूर्ण वनोंमें निरन्तर बरसते रहें, आकाशमें व्यर्थ ही जलप्लावन होता रहे और बिजली चमके तो भी तुम भयभीत न होओ॥ वह्निर्देवस्त्रातु वा सर्वतस्ते कामान् सर्वान् वर्षतु वासवो वा । वज्रं तथा स्थापयतां वधाय महाघोरं प्लवमानं जलौघैः ॥ १५ ॥ अग्निदेव तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करें। देवराज इन्द्र तुम्हारे लिये जलकी नहीं, सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करें और तुम्हारे वधके लिये उठे हुए और जलराशिके साथ चंचल गतिसे चले हुए महाघोर वज्रको वे देवेन्द्र अपने हाथमें ही रखे रहें ॥ १५ ॥

मरुत्त उवाच

घोरः शब्दः श्रूयते वै महास्वनो वज्रस्यैष सहितो मारुतेन । आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु- र्न मे स्वास्थ्यं जायते चाद्य विप्र ॥ १६ ॥ **मरुत्तने कहा—**विप्रवर! आँधीके साथ ही जोर-जोरसे होनेवाली वज्रकी भयंकर गड़गड़ाहट सुनायी दे रही है। इससे रह-रहकर मेरा हृदय काँप उठता है। आज मनमें तनिक भी शान्ति नहीं है ॥ १६ ॥

संवर्त उवाच

वज्रादुग्राद् व्येतु भयं तवाद्य वातो भूत्वा हन्मि नरेन्द्र वज्रम् । भयं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व कं ते कामं मनसा साधयामि ॥ १७ ॥ **संवर्तने कहा—**नरेन्द्र! तुम्हें इन्द्रके भयंकर वज्रसे आज भयभीत नहीं होना चाहिये। मैं वायुका रूप धारण करके अभी इस वज्रको निष्फल किये देता हूँ। तुम भय छोड़कर मुझसे कोई दूसरा वर माँगो। बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी मानसिक इच्छा पूर्ण करूँ? ॥ १७ ॥

मरुत्त उवाच

इन्द्रः साक्षात् सहसाभ्येतु विप्र हविर्यज्ञे प्रतिगृह्णातु चैव ।

स्वं स्वं धिष्ण्यं चैव जुषन्तु देवा हुतं सोमं प्रतिगृह्णन्तु चैव ॥ १८ ॥ मरुत्तने कहा— ब्रह्मर्षे! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे साक्षात् इन्द्र मेरे यज्ञमें शीघ्रतापूर्वक पधारें और अपना हविष्य-भाग ग्रहण करें। साथ ही अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानपर आकर बैठ जायँ और सब लोग एक साथ आहुतिरूपमें प्राप्त हुए सोमरसका पान करें ॥ १८ ॥

संवर्त उवाच

अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन् देवैः सर्वैस्त्वरितैः स्तूयमानः । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम् ॥ १९ ॥ (तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा— राजन्! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं। मैंने मन्त्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है। देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है ॥ १९ ॥

ततो देवैः सहितो देवराजो रथे युङ्क्त्वा तान् हरीन् वाजिमुख्यान् । आयाद् यज्ञमथ राज्ञः पिपासु- रावेक्षितस्याप्रमेयस्य सोमम् ॥ २० ॥ तत्पश्चात् देवराज इन्द्र अपने रथमें उन सफेद रंगके अच्छे घोड़ोंको जोतकर देवताओंको साथ ले सोमपानकी इच्छासे अनुपम पराक्रमी राजा मरुत्तकी यज्ञशालामें आ पहुँचे ॥ २० ॥

तमायान्तं सहितं देवसंघैः प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः । चक्रे पूजां देवराजाय चाग्र्यां यथाशास्त्रं विधिवत् प्रीयमाणः ॥ २१ ॥ देववृन्दके साथ इन्द्रको आते देख राजा मरुत्तने अपने पुरोहित संवर्त मुनिके साथ आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और बड़ी प्रसन्नताके साथ शास्त्रीय विधिसे उनका अग्रपूजन किया ॥ २१ ॥

संवर्त उवाच

स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्वन् यज्ञोऽप्ययं संनिहिते त्वयीन्द्र ।

शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूयः पिबस्व सोमं सुतमुद्यतं मया ॥ २२ ॥

संवर्तने कहा—पुरुहूत इन्द्र! आपका स्वागत है। विद्वन्! आपके यहाँ पधारनेसे इस यज्ञकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मेरेद्वारा तैयार किया हुआ यह सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान कीजिये ॥ २२ ॥

मरुत्त उवाच

शिवेन मां पश्य नमश्च तेऽस्तु प्राप्तो यज्ञः सफलं जीवितं मे । अयं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र बृहस्पतेरवरजो विप्रमुख्यः ॥ २३ ॥

मरुत्तने कहा—सुरेन्द्र! आपको नमस्कार है। आप मुझे कल्याणमयी दृष्टिसे देखिये। आपके पदार्पणसे मेरा यज्ञ और जीवन सफल हो गया। बृहस्पतिजीके छोटे भाई ये विप्रवर संवर्तजी मेरा यज्ञ करा रहे हैं ॥ २३ ॥

इन्द्र उवाच

जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् । यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र प्रीतिर्मेऽद्य त्वयि मन्युः प्रणष्टः ॥ २४ ॥

इन्द्रने कहा—नरेन्द्र! आपके इन गुरुदेवको मैं जानता हूँ। ये बृहस्पतिजीके छोटे भाई और तपस्याके धनी हैं। इनका तेज दुःसह है। इन्हींके आवाहनसे मुझे आना पड़ा है। अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ और मेरा सारा क्रोध दूर हो गया है ॥ २४ ॥

संवर्त उवाच

यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम् । स्वयं सर्वान् कुरु भागान् सुरेन्द्र जानात्वयं सर्वलोकश्च देव ॥ २५ ॥

संवर्तने कहा—देवराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञमें जो-जो कार्य आवश्यक है, उसका स्वयं ही उपदेश दीजिये तथा सुरेन्द्र! स्वयं ही सब देवताओंके भाग निश्चित कीजिये। देव! यहाँ आये हुए सब लोग आपकी प्रसन्नताका प्रत्यक्ष अनुभव करें ॥ २५ ॥

व्यास उवाच

एवमुक्तस्त्वाङ्गिरसेन शक्रः

समादिदेश स्वयमेव देवान् । सभाः क्रियन्तामावसथाश्च मुख्याः सहस्रशश्चित्रभूताः समृद्धाः ॥ २६ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! संवर्तके यों कहनेपर इन्द्रने स्वयं ही सब देवताओंको आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग अत्यन्त समृद्ध एवं चित्र-विचित्र ढंगके हजारों अच्छे सभा-भवन बनाओ ॥ २६ ॥

क्लृप्ताः स्थूणाः कुरुतारोहणानि गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम् । यत्र नृत्येन्नप्सरसः समस्ताः स्वर्गोपमः क्रियतां यज्ञवाटः ॥ २७ ॥ 'गन्धर्वों और अप्सराओंके लिये ऐसे रंगमण्डपका निर्माण करो, जिसमें बहुत-से सुन्दर स्तम्भ लगे हों। उनके रंगमंचपर चढ़नेके लिये बहुत-सी सीढ़ियाँ बना दो। यह सब कार्य शीघ्र हो जाना चाहिये। यह यज्ञशाला स्वर्गके समान सुन्दर एवं मनोहर बना दो। जिसमें सारी अप्सराएँ नृत्य कर सकें' ॥ २७ ॥

इत्युक्तास्ते चक्रुराशु प्रतीता दिवौकसः शक्रवाक्यान्ररेन्द्र । ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः प्रीतो राजन् पूज्यमानो मरुत्तम् ॥ २८ ॥ नरेन्द्र! देवराजके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवताओंने संतुष्ट होकर उनकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही सबका निर्माण किया। राजन्! तत्पश्चात् पूजित एवं संतुष्ट हुए इन्द्रने राजा मरुत्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २८ ॥

एष त्वयाहमिह राजन् समेत्य ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वांश्चान्या देवताः प्रीयमाणा हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ॥ २९ ॥ 'राजन्! यह मैं यहाँ आकर तुमसे मिला हूँ। नरेन्द्र! तुम्हारे जो अन्यान्य पूर्वज हैं, वे तथा अन्य सब देवता भी यहाँ प्रसन्नतापूर्वक पधारे हैं। राजन्! ये सब लोग तुम्हारा दिया हुआ हविष्य ग्रहण करेंगे ॥ २९ ॥

आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन् । नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्यालभन्तां चलच्छिश्नं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्रयाः ॥ ३० ॥

'राजेन्द्र! अग्निके लिये लाल रंगकी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायें, विश्वेदेवोंके लिये अनेक रूप-रंगवाले पदार्थ दिये जायें, श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ छूकर दिये गये चंचल शिश्नवाले नील रंगके वृषभका दान ग्रहण करें'। । ३० ।। ततो यज्ञो ववृधे तस्य राजन् यत्र देवाः स्वयमन्नानि जह्रुः । यस्मिन् शक्रो ब्राह्मणैः पूज्यमानः सदस्योऽभूद्धरिमान् देवराजः ।। ३१ ।। नरेश्वर! तदनन्तर राजा मरुत्तके यज्ञका कार्य आगे बढ़ा, जिसमें देवतालोग स्वयं ही अन्न परोसने लगे। ब्राह्मणोंद्वारा पूजित, उत्तम अश्वोंसे युक्त देवराज इन्द्र उस यज्ञमण्डपमें सदस्य बनकर बैठे थे ।। ३१ ।। ततः संवर्तश्चैत्यगतो महात्मा यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीयः । हवींष्युच्चैराह्वयन् देवसंघान् जुहावाग्नौ मन्त्रवत् सुप्रीतः ।। ३२ ।। इसके बाद द्वितीय अग्निके समान तेजस्वी एवं यज्ञमण्डपमें बैठे हुए महात्मा संवर्तने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देववृन्दका उच्चस्वरसे आह्वान करते हुए मन्त्रपाठपूर्वक अग्निमें हविष्यका हवन किया ।। ३२ ।। ततः पीत्वा बलभित् सोममग्र्यं ये चाप्यन्ये सोमपा देवसंघाः । सर्वेऽनुज्ञाताः प्रययुः पार्थिवेन यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ।। ३३ ।। तत्पश्चात् इन्द्र तथा सोमपानके अधिकारी अन्य देवताओंने उत्तम सोमरसका पान किया। इससे सबको तृप्ति एवं प्रसन्नता हुई। फिर सब देवता राजा मरुत्तकी अनुमति लेकर अपने-अपने स्थानको चले गये ।। ३३ ।। ततो राजा जातरूपस्य राशीन् पदे पदे कारयामास हृष्टः । द्विजातिभ्यो विसृजन् भूरि वित्तं रराज वित्तेश इवारिहन्ता ।। ३४ ।। तदनन्तर शत्रुहन्ता राजा मरुत्तने बड़े हर्षके साथ वहाँ ब्राह्मणोंको बहुत-से धनका दान करते हुए उनके लिये पग-पगपर सुवर्णके ढेर लगवा दिये। उस समय धनाध्यक्ष कुबेरके समान उनकी शोभा हो रही थी ।। ३४ ।। ततो वित्तं विविधं संनिधाय यथोत्साहं कारयित्वा च कोषम् ।

अनुज्ञातो गुरुणा संनिवृत्य शशास गामखिलां सागरान्ताम् ॥ ३५ ॥ इसके बाद ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो नाना प्रकारका धन बच गया, उसको मरुत्तने उत्साहपूर्वक कोष-स्थान बनवाकर उसीमें जमा कर दिया। फिर अपने गुरु संवर्तकी आज्ञा लेकर वे राजधानीको लौट आये और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य करने लगे ॥ ३५ ॥ एवंगुणः सम्बभूवेह राजा यस्य क्रतौ तत् सुवर्णं प्रभूतम् । तत् त्वं समादाय नरेन्द्र वित्तं यजस्व देवांस्तर्पयानो निवापैः ॥ ३६ ॥ नरेन्द्र! राजा मरुत्त ऐसे प्रभावशाली हुए थे। उनके यज्ञमें बहुत-सा सुवर्ण एकत्र किया गया था। तुम उसी धनको मँगवाकर यज्ञभागसे देवताओंको तृप्त करते हुए यजन करो ॥ ३६ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो राजा पाण्डवो हृष्टरूपः श्रुत्वा वाक्यं सत्यवत्याः सुतस्य । मनश्चक्रे तेन वित्तेन यष्टुं ततोऽमात्यैर्मन्त्रयामास भूयः ॥ ३७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीके ये वचन सुनकर पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस धनके द्वारा यज्ञ करनेका विचार किया तथा इस विषयमें मन्त्रियोंके साथ बारंबार मन्त्रणा की ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्त्तमरुत्तीये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥