महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 654)
इन्द्रने पूछा— भगवन्! मैं देखता हूँ कि गोलोक-निवासी पुरुष अपने तेजसे स्वर्गवासियोंकी कान्ति फीकी करते हुए उन्हें लाँघकर चले जाते हैं; अतः मेरे मनमें यहाँ यह संदेह होता है ।। ६ ।।
इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर
कीदृशा भगवाँल्लोका गवां तद् ब्रूहि मेऽनघ ।
यानावसन्ति दातार एतदिच्छामि वेदितुम् ।। ७ ।।
भगवन्! गौओंके लोक कैसे हैं? अनघ! यह मुझे बताइये। गोदान करनेवाले लोग जिन लोकोंमें निवास करते हैं, उनके विषयमें निम्नांकित बातें जानना चाहता हूँ ।। ७ ।।
कीदृशाः किंफलाः किंस्वित् परमस्तत्र को गुणः ।
कथं च पुरुषास्तत्र गच्छन्ति विगतज्वराः ।। ८ ।।
वे लोक कैसे हैं? वहाँ क्या फल मिलता है? वहाँका सबसे महान् गुण क्या है? गोदान करनेवाले मनुष्य सब चिन्ताओंसे मुक्त होकर वहाँ किस प्रकार पहुँचते हैं? ।। ८ ।।
कियत्कालं प्रदानस्य दाता च फलमश्नुते ।
कथं बहुविधं दानं स्यादल्पमपि वा कथम् ।। ९ ।।
दाताको गोदानका फल वहाँ कितने समयतक भोगनेको मिलता है? अनेक प्रकारका दान कैसे किया जाता है? अथवा थोड़ा-सा भी दान किस प्रकार सम्भव होता है? ॥ ९ ॥
बह्वीनां कीदृशं दानमल्पानां वापि कीदृशम् ।
अदत्त्वा गोप्रदाः सन्ति केन वा तच्च शंस मे ॥ १० ॥
बहुत-सी गौओंका दान कैसा होता है? अथवा थोड़ी-सी गौओंका दान कैसा माना जाता है? गोदान न करके भी लोग किस उपायसे गोदान करनेवालोंके समान हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ १० ॥
कथं वा बहुदाता स्यादल्पदात्रा समः प्रभो ।
अल्पप्रदाता बहुदः कथं स्वित् स्यादिहेश्वर ॥ ११ ॥
प्रभो! बहुत दान करनेवाला पुरुष अल्प दान करनेवालेके समान कैसे हो जाता है? तथा सुरेश्वर! अल्प दान करनेवाला पुरुष बहुत दान करनेवालेके तुल्य किस प्रकार हो जाता है? ॥ ११ ॥
कीदृशी दक्षिणा चैव गोप्रदाने विशिष्यते ।
एतत् तथ्येन भगवन् मम शंसितुमर्हसि ॥ १२ ॥
भगवन्! गोदानमें कैसी दक्षिणा श्रेष्ठ मानी जाती है? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके
द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 656)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना
पितामह उवाच
योऽयं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारितः ।
नास्ति प्रष्टास्ति लोकेऽस्मिंस्त्वत्तोऽन्यो हि शतक्रतो ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा— देवेन्द्र! गोदानके सम्बन्धमें तुमने जो यह प्रश्न उपस्थित किया है, तुम्हारे सिवा इस जगत्में दूसरा कोई ऐसा प्रश्न करनेवाला नहीं है ॥ १ ॥
सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि ।
पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यश्च याः स्त्रियः ॥ २ ॥
शक्र! ऐसे अनेक प्रकारके लोक हैं, जिन्हें तुम नहीं देख पाते हो। मैं उन लोकोंको देखता हूँ और पतिव्रता स्त्रियाँ भी उन्हें देख सकती हैं ॥ २ ॥
कर्मभिश्चापि सुशुभैः सुव्रता ऋषयस्तथा ।
सशरीरा हि तान् यान्ति ब्राह्मणाः शुभबुद्धयः ॥ ३ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं ॥ ३ ॥
शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च ।
स्वप्रभूतांश्च ताँल्लोकान् पश्यन्तीहापि सुव्रताः ॥ ४ ॥
श्रेष्ठ व्रतके आचरणमें लगे हुए योगी पुरुष समाधि-अवस्थामें अथवा मृत्युके समय जब शरीरसे सम्बन्ध त्याग देते हैं, तब अपने शुद्ध चित्तके द्वारा स्वप्नकी भाँति दीखनेवाले उन लोकोंका यहाँसे भी दर्शन करते हैं ॥ ४ ॥
ते तु लोकाः सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विताः ।
न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः ॥ ५ ॥
सहस्राक्ष! वे लोक जैसे गुणोंसे सम्पन्न हैं, उनका वर्णन सुनो। वहाँ काल और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता। अग्निका भी जोर नहीं चलता ॥ ५ ॥
तथा नास्त्यशुभं किंचिन्न व्याधिस्तत्र न क्लमः ।
यद् यच्च गावो मनसा तस्मिन् वाञ्छन्ति वासव ॥ ६ ॥
तत् सर्वं प्राप्नुवन्ति स्म मम प्रत्यक्षदर्शनात् ।
कामगाः कामचारिण्यः कामात् कामांश्च भुञ्जते ॥ ७ ॥
वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं,
यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं ॥ ६-७ ॥
वाप्यः सरांसि सरितो विविधानि वनानि च ।
गृहाणि पर्वताश्चैव यावद्द्रव्यं च किंचन ॥ ८ ॥
बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं ॥ ८ ॥
मनोज्ञं सर्वभूतेभ्यः सर्वतन्त्रं प्रदृश्यत ।
ईदृशाद् विपुलाल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविधः ॥ ९ ॥
गोलोक समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर है। वहाँकी प्रत्येक वस्तुपर सबका समान अधिकार देखा जाता है। इतना विशाल दूसरा कोई लोक नहीं है ॥ ९ ॥
तत्र सर्वसहाः क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिनः ।
अहंकारैर्वरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमाः ॥ १० ॥
इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं ॥ १० ॥
यः सर्वमांसानि न भक्षयीत
पुमान् सदा भावितो धर्मयुक्तः ।
मातापित्रोरर्चिता सत्ययुक्तः
शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्यः ॥ ११ ॥
अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु
धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्च ।
यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्च
दाने रतो यः क्षमी चापराधे ॥ १२ ॥
मृदुर्दान्तो देवपरायणश्च
सर्वातिथिश्चापि तथा दयावान् ।
ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति
लोकं गवां शाश्वतं चाव्ययं च ॥ १३ ॥
जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है ॥ ११—१३ ॥
न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुघ्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्ववात्तवैरो दोषैरेतैश्च युक्तो दुरात्मा ॥ १४ ॥ न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद् गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ॥ १५ ॥ परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्वेषी और ब्रह्महत्यारा—इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है ॥ १४-१५ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो ॥ १६ ॥ सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है। अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो ॥ १६ ॥
दायाद्यलब्धैरर्थैर्यो गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितान् धनैः क्रीतान् स लोकानाप्नुतेऽक्षयान् ॥ १७ ॥ जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
यो वै द्यूते धनं जित्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्नुते ॥ १८ ॥ शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोंतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है ॥ १८ ॥
दायाद्याद् याः स्म वै गावो न्यायपूर्वेरुपार्जिताः । प्रदद्यात् ताः प्रदातॄणां सम्भवन्त्यपि च ध्रुवाः ॥ १९ ॥ जो पैतृक-सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं ॥ १९ ॥
प्रतिगृह्य तु यो दद्याद् गाः संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाल्लोँकान् ध्रुवान् विद्धि शचीपते ॥ २० ॥ शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है—यह निश्चितरूपसे समझ लो ॥ २० ॥
जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रियः ।
गुरुद्विजसहः क्षान्तस्तस्य गोभिः समा गतिः ॥ २१ ॥ जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है। अर्थात् वह गोलोकमें जाता है ॥ २१ ॥
न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते । मनसा गोषु न द्रुह्येद् गोवृत्तिर्गोऽनुकल्पकः ॥ २२ ॥ सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु । गोसहस्रेण समिता तस्य धेनुर्भवत्युत ॥ २३ ॥ शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है ॥ २२-२३ ॥
क्षत्रियस्य गुणैरेतैरपि तुल्यफलं शृणु । तस्यापि द्विजतुल्या गौर्भवतीति विनिश्चयः ॥ २४ ॥ यदि क्षत्रिय भी इन गुणोंसे युक्त होता है तो उसे भी ब्राह्मणके समान ही (गोदानका) फल मिलता है। इस बातको अच्छी तरह सुन लो। उसकी (दान दी हुई) गौ भी ब्राह्मणकी गौके तुल्य ही फल देनेवाली होती है। यह धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ २४ ॥
वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पञ्चशतं भवेत् । शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम् ॥ २५ ॥ यदि वैश्यमें भी उपर्युक्त गुण हों तो उसे भी एक गोदान करनेपर ब्राह्मणकी अपेक्षा (आधे भाग) पाँच सौ गौओंके दानका फल मिलता है और विनयशील शूद्रको ब्राह्मणके चौथाई भाग अर्थात् ढाई सौ गौओंके दानका फल प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
एतच्चैनं योऽनुतिष्ठेत युक्तः ** सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च ।** दक्षः क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः ** शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोऽनहंवाक् ॥ २६ ॥** महत् फलं प्राप्यते स द्विजाय ** दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनानेन धेनुम् ।** जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता है तथा जो सत्यवादी, गुरुसेवापरायण, दक्ष, क्षमाशील, देवभक्त, शान्तचित्त, पवित्र, ज्ञानवान्, धर्मात्मा और अहंकारशून्य होता है, वह यदि पूर्वोक्त विधिसे ब्राह्मणको दूध देनेवाली गायका दान करे तो उसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ २६ १/२ ॥
नित्यं दद्यादेकभक्तः सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च ॥ २७ ॥ वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्च नित्यं दत्त्वा योऽभिनन्देत गाश्च । आजातितो यश्च गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य ॥ २८ ॥ इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो ॥ २७-२८ ॥
यत् स्यादिष्ट्वा राजसूये फलं तु यत् स्यादिष्ट्वा बहुना काञ्चनेन । एतत् तुल्यं फलमप्याहुरग्र्यं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धाः ॥ २९ ॥ राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है। यह सभी सिद्ध-संत-महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है ॥ २९ ॥
योऽग्रं भक्तं किंचिदप्राश्य दद्याद् गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तोऽलुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्नुयात् सत्यशीलः ॥ ३० ॥ जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य-शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है ॥ ३० ॥
यदेकभक्तमश्नीयाद् दद्यादेकं गवां च यत् । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गोऽनुकम्पकः ॥ ३१ ॥ जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोंतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं ॥ ३१ ॥
एकेनैव च भक्तेन यः क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो ॥ ३२ ॥ तावत् प्रदानात् स गवां फलमाप्नोति शाश्वतम् ।
शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है॥ ३२ १/२॥
ब्राह्मणस्य फलं हीदं क्षत्रियस्य तु वै शृणु ॥ ३३ ॥
पञ्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फलं स्मृतम् ।
ततोऽर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धतः स्मृतः ॥ ३४ ॥
यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोंतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रको उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है॥ ३३-३४॥
यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति ।
यावत् संदर्शयेद् गां वै स तावत् फलमश्नुते ॥ ३५ ॥
जो अपने आपको बेचकर भी गायको खरीदकर उसका दान करता है, वह ब्रह्माण्डमें जबतक गोजातिकी सत्ता देखता है, तबतक उस दानका अक्षय फल भोगता रहता है॥ ३५॥
रोम्णि रोम्णि महाभाग लोकाश्चास्याऽक्षयाःस्मृताः ।
संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गाः सम्प्रयच्छति ।
आत्मविक्रयतुल्यास्ताः शाश्वता विद्धि कौशिक ॥ ३६ ॥
महाभाग इन्द्र! गौओंके रोम-रोममें अक्षय लोकोंकी स्थिति मानी गयी है। जो संग्राममें गौओंको जीतकर उनका दान कर देता है, उनके लिये वे गौएँ स्वयं अपनेको बेचकर लेकर दी हुई गौओंके समान अक्षय फल देनेवाली होती हैं—इस बातको तुम जान लो॥ ३६॥
अभावे यो गवां दद्यात् तिलधेनुं यतव्रतः ।
दुर्गात् स तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोद्ते ॥ ३७ ॥
जो संयम और नियमका पालन करनेवाला पुरुष गौओंके अभावमें तिलधेनुका दान करता है, वह उस धेनुकी सहायता पाकर दुर्गम संकटसे पार हो जाता है तथा दूधकी धारा बहानेवाली नदीके तटपर रहकर आनन्द भोगता है॥ ३७॥
न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं
पात्रं कालो गोविशेषो विधिश्च ।
कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि
दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ॥ ३८ ॥
केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है। विप्रवर! गौओंमें जो
परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही
कठिन है ॥ ३८ ॥
स्वाध्यायाढ्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं
वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम् ।
गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं
वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः ॥ ३९ ॥
जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु
और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है,
जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम
पात्र बताया गया है ॥ ३९ ॥
वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं
कृष्यर्थे वा होम्यहेतोः प्रसूतेः ।
गुर्वर्थं वा बालसंवृद्धये वा
धेनुं दद्याद् देशकालेऽविशिष्टे ॥ ४० ॥
जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको
सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये। इसके सिवा खेतीके
लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु-
पालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है ॥ ४० ॥
अन्तर्ज्ञाताः सक्रयज्ञानलब्धाः
प्राणैः क्रीतास्तेजसा यौतकाश्च ।
कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च
द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ॥ ४१ ॥
गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके
बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई,
पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन-पोषणके लिये अपने पास
आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी
हैं ॥ ४१ ॥
बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः
सर्वाः प्रशंसन्ते सुगन्धवत्यः ।
यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा
तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ॥ ४२ ॥
हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं।
जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौओंमें उत्तम है ॥
तिस्रो रात्रीस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेयाः। वत्सैः पुष्टैः क्षीरपैः सुप्रचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ॥ ४३ ॥ (गोदानकी विधि इस प्रकार है—) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास-भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे। उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट-पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों। गोदान करनेके पश्चात् तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये ॥ ४३ ॥
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च। यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र ॥ ४४ ॥ जो गौ सीधी-साधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता परलोकमें सुख भोगता है ॥ ४४ ॥
तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय धुर्यं युवानं बलिनं विनीतम्। हलस्य वोढारमनन्तवीर्यं प्राप्नोति लोकान् दशधेनुदस्य ॥ ४५ ॥ जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत—सीधा-सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है ॥ ४५ ॥
कान्तारे ब्राह्मणान् गाश्च यः परित्राति कौशिक। क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ४६ ॥ इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो ॥ ४६ ॥
अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम्। मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाङ्क्षते ॥ ४७ ॥ सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है। वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है ॥ ४७ ॥
लोकान् बहुविधान् दिव्यान् यच्चास्य हृदि वर्तते।
तत् सर्वं समवाप्नोति कर्मणैतेन मानवः ॥ ४८ ॥ नाना प्रकारके दिव्य लोक तथा उसके हृदयमें जो-जो कामना होती है, वह सब कुछ मनुष्य उपर्युक्त सत्कर्मके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है ॥ ४८ ॥ गोभिश्च समनुज्ञातः सर्वत्र च महीयते । यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति ॥ ४९ ॥ तृणगोमयपर्णाशी निःस्पृहो नियतः शुचिः । अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो ॥ ५० ॥ मम लोके सुरैः सार्धं लोके यत्रापि चेच्छति ॥ ५१ ॥ इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है ॥ ४९—५१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितामहेन्द्रसंवादे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्माजी और इन्द्रका संवादविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य
इन्द्र उवाच
जानन् यो गामपहरेद् विक्रीयाच्चार्थकारणात् ।
एतद् विज्ञातुमिच्छामि क्व नु तस्य गतिर्भवेत् ॥ १ ॥
**इन्द्रने पूछा—**पितामह! यदि कोई जान-बूझकर दूसरेकी गौका अपहरण करे और धनके लोभसे उसे बेच डाले, उसकी परलोकमें क्या गति होती है? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
पितामह उवाच
भक्षार्थं विक्रयार्थं वा येऽपहारं हि कुर्वते ।
दानार्थं ब्राह्मणार्थाय तत्रेदं श्रूयतां फलम् ॥ २ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! जो खाने, बेचने या ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये दूसरेकी गाय चुराते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, यह सुनो ॥ २ ॥
विक्रयार्थं हि यो हिंस्याद् भक्षयेद् वा निरंकुशः ।
घातयानं हि पुरुषं येऽनुमन्येयुरर्थिनः ॥ ३ ॥
जो उच्छृंखल मनुष्य मांस बेचनेके लिये गौकी हिंसा करता या गोमांस खाता है तथा जो स्वार्थवश घातक पुरुषको गाय मारनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान् पापके भागी होते हैं ॥ ३ ॥
घातकः खादको वापि तथा यश्चानुमन्यते ।
यावन्ति तस्या रोमाणि तावद् वर्षाणि मज्जति ॥ ४ ॥
गौकी हत्या करनेवाले, उसका मांस खानेवाले तथा गोहत्याका अनुमोदन करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक नरकमें डूबे रहते हैं ॥ ४ ॥
ये दोषा यादृशाश्चैव द्विजयज्ञोपघातके ।
विक्रये चापहारे च ते दोषा वै स्मृताः प्रभो ॥ ५ ॥
प्रभो! ब्राह्मणके यज्ञका नाश करनेवाले पुरुषको जैसे और जितने पाप लगते हैं, दूसरोंकी गाय चुराने और बेचनेमें भी वे ही दोष बताये गये हैं ॥ ५ ॥
अपहृत्य तु यो गां वै ब्राह्मणाय प्रयच्छति ।
यावद् दानफलं तस्यास्तावन्निरयमृच्छति ॥ ६ ॥
जो दूसरेकी गाय चुराकर ब्राह्मणको दान करता है, वह गोदानका पुण्य भोगनेके लिये जितना समय शास्त्रोंमें बताया गया है, उतने ही समयतक नरक भोगता है ॥ ६ ॥ सुवर्णं दक्षिणामाहुर्गोप्रदाने महाद्युते । सुवर्णं परमित्युक्तं दक्षिणार्थमसंशयम् ॥ ७ ॥ महातेजस्वी इन्द्र! गोदानमें कुछ सुवर्णकी दक्षिणा देनेका विधान है। दक्षिणाके लिये सुवर्ण सबसे उत्तम बताया गया है। इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ गोप्रदानात् तारयते सप्त पूर्वांस्तथा परान् । सुवर्णं दक्षिणां कृत्वा तावद्द्विगुणमुच्यते ॥ ८ ॥ मनुष्य गोदान करनेसे अपनी सात पीढ़ी पहलेके पितरोंका और सात पीढ़ी आगे आनेवाली संतानोंका उद्धार करता है; किंतु यदि उसके साथ सोनेकी दक्षिणा भी दी जाय तो उस दानका फल दूना बताया गया है ॥ सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा । सुवर्णं पावनं शक्र पावनानां परं स्मृतम् ॥ ९ ॥ क्योंकि इन्द्र! सुवर्णका दान सबसे उत्तम दान है। सुवर्णकी दक्षिणा सबसे श्रेष्ठ है, तथा पवित्र करनेवाली वस्तुओंमें सुवर्ण ही सबसे अधिक पावन माना गया है ॥ ९ ॥ कुलानां पावनं प्राहुर्जातरूपं शतक्रतो । एषा मे दक्षिणा प्रोक्ता समासेन महाद्युते ॥ १० ॥ महातेजस्वी शतक्रतो! सुवर्ण सम्पूर्ण कुलोंको पवित्र करनेवाला बताया गया है। इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें यह दक्षिणाकी बात बतायी ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
एतत् पितामहेनोक्तमिन्द्राय भरतर्षभ । इन्द्रो दशरथायाह रामायाह पिता तथा ॥ ११ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह उपर्युक्त उपदेश ब्रह्माजीने इन्द्रको दिया। इन्द्रने राजा दशरथको तथा पिता दशरथने अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको दिया ॥ ११ ॥ राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने । ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो ॥ १२ ॥ प्रभो! श्रीरामचन्द्रजीने भी अपने प्रिय एवं यशस्वी भ्राता लक्ष्मणको इसका उपदेश दिया। फिर लक्ष्मणने भी वनवासके समय ऋषियोंको यह बात बतायी ॥ पारम्पर्यगतं चेदमृषयः संशितव्रताः । दुर्धरं धारयामासू राजानश्चैव धार्मिकाः ॥ १३ ॥ इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस दुर्धर उपदेशको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि और धर्मात्मा राजालोग धारण करते आ रहे हैं ॥ १३ ॥
उपाध्यायेन गदितं मम चेदं युधिष्ठिर । य इदं ब्राह्मणो नित्यं वदेद् ब्राह्मणसंसदि ॥ १४ ॥ यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वयोरपि समागमे । तस्य लोकाः किलाक्षय्या दैवतैः सह नित्यदा ॥ १५ ॥ (इति ब्रह्मा स भगवान् उवाच परमेश्वरः)
युधिष्ठिर! मुझसे मेरे उपाध्याय (परशुरामजी) ने इस विषयका वर्णन किया था। जो ब्राह्मण अपनी मण्डलीमें बैठकर प्रतिदिन इस उपदेशको दुहराता है और यज्ञमें, गोदानके समय तथा दो व्यक्तियोंके भी समागममें इसकी चर्चा करता है, उसको सदा देवताओंके साथ अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। यह बात भी परमेश्वर भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही इन्द्रको बतायी है ॥ १४-१५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल १५ १/३ श्लोक हैं)
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता
युधिष्ठिर उवाच
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।
प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है। पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये ॥ १ ॥
व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते ।
नियमानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ॥ २ ॥
महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है? ॥ २ ॥
दत्तस्येह फलं किं च वेदानां धारणे च किम् ।
अध्यापने फलं किं च सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह ।
तस्य किं च फलं दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति ॥ ४ ॥
पितामह! संसारमें जो प्रतिग्रह नहीं लेता, उसे क्या फल मिलता है? तथा जो वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उसके लिये कौन-सा फल देखा गया है ॥ ४ ॥
स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि किं फलम् ।
शौचे च किं फलं प्रोक्तं ब्रह्मचर्ये च किं फलम् ॥ ५ ॥
अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहनेवाले शूरवीरोंको भी किस फलकी प्राप्ति होती है? शौचाचारका तथा ब्रह्मचर्यके पालनका क्या फल बताया गया है? ॥ ५ ॥
पितृशुश्रूषणे किं च मातृशुश्रूषणे तथा ।
आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने ॥ ६ ॥
पिता और माताकी सेवासे कौन-सा फल प्राप्त होता है? आचार्य एवं गुरुकी सेवासे तथा प्राणियोंपर अनुग्रह एवं दयाभाव बनाये रखनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? ॥ ६ ॥
एतत् सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् ।
वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ॥ ७ ॥ धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत् रूपसे जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥
भीष्म उवाच
यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते । अखण्डं सम्यगारभ्य तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे किसी व्रतको आरम्भ करके उसे अखण्डरूपसे निभा देते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
नियमानां फलं राजन् प्रत्यक्षमिह दृश्यते । नियमानां क्रतूनां च त्वयावाप्तमिदं फलम् ॥ ९ ॥ राजन्! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है ॥ ९ ॥
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च । इहलोकेऽथवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते ॥ १० ॥ वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है। स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है ॥ १० ॥
दमस्य तु फलं राजन् शृणु त्वं विस्तरेण मे । दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः ॥ ११ ॥ राजन्! अब तुम मुझसे विस्तारपूर्वक दम (इन्द्रियसंयम)के फलका वर्णन सुनो। जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सुखी और सर्वत्र संतुष्ट रहते हैं ॥ ११ ॥
यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः । प्रार्थयन्ति च यद् दान्ता लभन्ते तन्न संशयः ॥ १२ ॥ वे जहाँ चाहते हैं वहीं चले जाते हैं और जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं वही उन्हें प्राप्त हो जाती है। वे सम्पूर्ण शत्रुओंका अन्त कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव । स्वर्गे यथा प्रमोन्दन्ते तपसा विक्रमेण च ॥ १३ ॥ दानैर्यज्ञैश्च विविधैस्तथा दान्ताः क्षमान्विताः । पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ॥ १३ १/२ ॥
दानाद् दमो विशिष्टो हि ददत्किंचित् द्विजातये ॥ १४ ॥ दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दमः ।
यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोकाः सनातनाः ॥ १५ ॥ दानसे दमका स्थान ऊँचा होता है। दानी पुरुष ब्राह्मणको कुछ दान करते समय कभी क्रोध भी कर सकता है; परंतु दमनशील या जितेन्द्रिय पुरुष कभी क्रोध नहीं करता; इसलिये दम (इन्द्रिय-संयम) दानसे श्रेष्ठ है। जो दाता बिना क्रोध किये दान करता है उसे सनातन (नित्य) लोक प्राप्त होते हैं ॥ १४-१५ ॥
क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानात् परं दमः । अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि ॥ १६ ॥ ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः । दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः ॥ १७ ॥ कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दमः । दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है। महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान् लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः 'दम' दानसे श्रेष्ठ है ॥ १६-१७ १/२ ॥
अध्यापकः परिक्लेशादक्षयं फलमश्नुते ॥ १८ ॥ विधिवत् पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है। अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ १/२ ॥
अधीत्यापि हि यो वेदान् न्यायविद्भ्यः प्रयच्छति ॥ १९ ॥ गुरुकर्मप्रशंसी तु सोऽपि स्वर्गे महीयते । जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोंकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
क्षत्रियोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि । युद्धे यश्च परित्राता सोऽपि स्वर्गे महीयते ॥ २० ॥ वेदाध्ययन, यज्ञ और दानकर्ममें तत्पर रहनेवाला तथा युद्धमें दूसरोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय भी स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २० ॥
वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् । शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषयार्च्छति ॥ २१ ॥ अपने कर्ममें लगा हुआ वैश्य दान देनेसे महत्-पदको प्राप्त होता है। अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाला शूद्र सेवा करनेसे स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २१ ॥
शूरा बहुविधाः प्रोक्तास्तेषामर्थांस्तु मे शृणु ।
शूरान्वयानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव हि ॥ २२ ॥
शूरवीरोंके अनेक भेद बताये गये हैं। उन सबके तात्पर्य मुझसे सुनो। उन शूरोंके वंशजों तथा शूरोंके लिये जो फल बताया गया है, उसे बता रहा हूँ ॥ २२ ॥
यज्ञशूरा दमे शूराः सत्यशूरास्तथापरे ।
युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्च मानवाः ॥ २३ ॥
(बुद्धिशूरास्तथा चान्ये क्षमाशूरास्तथा परे ।)
कुछ लोग यज्ञशूर हैं। कुछ इन्द्रियसंयममें शूर होनेके कारण दमशूर कहलाते हैं। इसी प्रकार कितने ही मानव सत्यशूर, युद्धशूर, दानशूर, बुद्धिशूर तथा क्षमाशूर कहे गये हैं ॥ २३ ॥
सांख्यशूराश्च बहवो योगशूरास्तथापरे ।
अरण्ये गृहवासे च त्यागे शूरास्तथापरे ॥ २४ ॥
बहुत-से मनुष्य सांख्यशूर, योगशूर, वनवासशूर, गृहवासशूर तथा त्यागशूर हैं ॥ २४ ॥
आर्जवे च तथा शूराः शमे वर्तन्ति मानवाः ।
तैस्तैश्च नियमैः शूरा बहवः सन्ति चापरे ।
वेदाध्ययनशूराश्च शूराश्चाध्यापने रताः ॥ २५ ॥
गुरुशुश्रूषया शूराः पितृशुश्रूषयापरे ।
मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथापरे ॥ २६ ॥
कितने मानव सरलता दिखानेमें शूरवीर हैं। बहुत-से शम (मनोनिग्रह) में ही शूरता प्रकट करते हैं। विभिन्न नियमोंद्वारा अपना शौर्य सूचित करनेवाले और भी बहुत-से शूरवीर हैं। कितने ही वेदाध्ययनशूर, अध्यापनशूर, गुरुशुश्रूषाशूर, पितृसेवाशूर, मातृसेवाशूर तथा भिक्षाशूर हैं ॥ २५-२६ ॥
अरण्ये गृहवासे च शूराश्चातिथिपूजने ।
सर्वे यान्ति पराँल्लोकान् स्वकर्मफलनिर्जितान् ॥ २७ ॥
कुछ लोग वनवासमें, कुछ गृहवासमें और कुछ लोग अतिथियोंकी सेवा-पूजामें शूरवीर होते हैं। ये सब-के-सब अपने कर्मफलोंद्वारा उपार्जित उत्तम लोकोंमें जाते हैं ॥ २७ ॥
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सत्यं च ब्रुवतो नित्यं समं वा स्यान्न वा समम् ॥ २८ ॥
सम्पूर्ण वेदोंको धारण करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना—इन सत्कर्मोंका पुण्य सदा सत्य बोलनेवाले पुरुषके पुण्यके बराबर हो सकता है या नहीं; इसमें सन्देह है। अर्थात् इनसे सत्य श्रेष्ठ है ॥ २८ ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ २९ ॥
यदि तराजूके एक पलड़ेपर एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य और दूसरे पलड़ेपर केवल सत्य रखा जाय तो एक सहस्र अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा ॥ २९ ॥ सत्येन सूर्यस्तपति सत्येनाग्निः प्रदीप्यते । सत्येन मरुतो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ३० ॥ सत्यके प्रभावसे सूर्य तपते हैं, सत्यसे अग्नि प्रज्वलित होती है और सत्यसे ही वायुका सर्वत्र संचार होता है; क्योंकि सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ॥ सत्येन देवाः प्रीयन्ते पितरो ब्राह्मणास्तथा । सत्यमाहुः परो धर्मस्तस्मात् सत्यं न लङ्घयेत् ॥ ३१ ॥ देवता, पितर और ब्राह्मण सत्यसे ही प्रसन्न होते हैं। सत्यको ही परम धर्म बताया गया है; अतः सत्यका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये ॥ ३१ ॥ मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमाः । मुनयः सत्यशपथास्तस्मात् सत्यं विशिष्यते ॥ ३२ ॥ ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं। इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥ सत्यवन्तः स्वर्गलोके मोदन्ते भरतर्षभ । दमः सत्यफलावाप्तिरुक्ता सर्वात्मना मया ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! सत्य बोलनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। किंतु इन्द्रियसंयम—दम उस सत्यके फलकी प्राप्तिमें कारण है। यह बात मैंने सम्पूर्ण हृदयसे कही है ॥ ३३ ॥ असंशयं विनीतात्मा स वै स्वर्गे महीयते । ब्रह्मचर्यस्य च गुणं शृणु त्वं वसुधाधिप ॥ ३४ ॥ जिसने अपने मनको वशमें करके विनयशील बना दिया है, वह निश्चय ही स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। पृथ्वीनाथ! अब तुम ब्रह्मचर्यके गुणोंका वर्णन सुनो ॥ ३४ ॥ आजन्ममरणाद् यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह । न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप ॥ ३५ ॥ नरेश्वर! जो जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त यहाँ ब्रह्मचारी ही रह जाता है, उसके लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है, इस बातको जान लो ॥ ३५ ॥ बह्व्यःकोट्यस्त्वृषीणां तु ब्रह्मलोके वसन्त्युत । सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ३६ ॥ ब्रह्मलोकमें ऐसे करोड़ों ऋषि निवास करते हैं, जो इस लोकमें सदा सत्यवादी, जितेन्द्रिय और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) रहे हैं ॥ ३६ ॥ ब्रह्मचर्यं दहेद् राजन् सर्वपापान्युपासितम् । ब्राह्मणेन विशेषेण ब्राह्मणो ह्यग्निरुच्यते ॥ ३७ ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करे तो वह सम्पूर्ण पापोंको भस्म कर डालता है; क्योंकि ब्रह्मचारी ब्राह्मण अग्निस্বরূপ कहा जाता है ।। ३७ ।।
प्रत्यक्षं हि तथा ह्येतद् ब्राह्मणेषु तपस्विषु ।
बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षितः ॥ ३८ ॥
तद् ब्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते ।
मातापित्रोः पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु ॥ ३९ ॥
तपस्वी ब्राह्मणोंमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्योंकि ब्रह्मचारीके आक्रमण करनेपर साक्षात् इन्द्र भी डरते हैं। ब्रह्मचर्यका वह फल यहाँ ऋषियोंमें दृष्टिगोचर होता है। अब तुम माता-पिता आदिके पूजनसे जो धर्म होता है, उसके विषयमें भी मुझसे सुनो ॥ ३८-३९ ॥
शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन ।
मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च ॥ ४० ॥
तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् ।
न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥ ४१ ॥
राजन्! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरु और आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो। उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है। मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ४०-४१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥