महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ऐश्वर्यको देखकर जलनेवाले कितने ही शत्रु उनमें मतभेद पैदा करनेकी इच्छा करने लगते हैं॥ ५ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः। हन्ति सर्वमपि ज्येष्ठः कुलं यत्रावजायते ॥ ६ ॥ जेठा भाई अपनी अच्छी नीतिसे कुलको उन्नतिशील बनाता है; किंतु यदि वह कुनीतिका आश्रय लेता है तो उसे विनाशके गर्तमें डाल देता है! जहाँ बड़े भाईका विचार खोटा हुआ, वहाँ वह जिसमें उत्पन्न हुआ है, अपने उस समस्त कुलको ही चौपट कर देता है॥ ६ ॥
अथ यो विनिकुर्वीत ज्येष्ठो भ्राता यवीयसः। अज्येष्ठः स्यादभागश्च नियम्यो राजभिश्च सः ॥ ७ ॥ जो बड़ा भाई होकर छोटे भाइयोंके साथ कुटिलतापूर्ण बर्ताव करता है, वह न तो ज्येष्ठ कहलाने योग्य है और न ज्येष्ठांश पानेका ही अधिकारी है। उसे तो राजाओंके द्वारा दण्ड मिलना चाहिये॥ ७ ॥
निकृती हि नरो लोकान् पापान् गच्छत्यसंशयम्। विदुलस्येव तत् पुष्पं मोघं जनयितुः स्मृतम् ॥ ८ ॥ कपट करनेवाला मनुष्य निःसंदेह पापमय लोकों (नरक)-में जाता है। उसका जन्म पिताके लिये बेतके फूलकी भाँति निरर्थक ही माना गया है॥ ८ ॥
सर्वानर्थः कुले यत्र जायते पापपूरुषः। अकीर्तिं जनयत्येव कीर्तिमन्तर्दधाति च ॥ ९ ॥ जिस कुलमें पापी पुरुष जन्म लेता है, उसके लिये वह सम्पूर्ण अनर्थोंका कारण बन जाता है। पापात्मा मनुष्य कुलमें कलंक लगाता और उसके सुयशका नाश करता है॥ ९ ॥
सर्वे चापि विकर्मस्था भागं नार्हन्ति सोदराः। नाप्रदाय कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतकम् ॥ १० ॥ यदि छोटे भाई भी पापकर्ममें लगे रहते हों तो वे पैतृक धनका भाग पानेके अधिकारी नहीं हैं। छोटे भाइयोंको उनका उचित भाग दिये बिना बड़े भाईको पैतृक-सम्पत्तिका भाग ग्रहण नहीं करना चाहिये॥ १० ॥
अनुपघ्नन् पितुर्दायं जङ्घाश्रमफलोऽध्वगः। स्वयमीहितलब्धं तु नाकामौ दातुमर्हति ॥ ११ ॥ यदि बड़ा भाई पैतृक धनको हानि पहुँचाये बिना ही केवल जाँघोंके परिश्रमसे परदेशमें जाकर धन पैदा करे तो वह उसके निजी परिश्रमकी कमाई है। अतः यदि उसकी इच्छा न हो तो वह उस धनमेंसे भाइयोंको नहीं दे सकता है॥ ११ ॥
भ्रातॄणामविभक्तानामुत्थानमपि चेत् सह।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात् कदाचन ॥ १२ ॥
यदि भाइयोंके हिस्सेका बटवारा न हुआ हो और सबने साथ-ही-साथ व्यापार आदिके द्वारा धनकी उन्नति की हो, उस अवस्थामें यदि पिताके जीते-जी सब अलग होना चाहें तो पिताको उचित है कि वह कभी किसीको कम और किसीको अधिक धन न दे अर्थात् वह सब पुत्रोंको बराबर-बराबर हिस्सा दे ॥ १२ ॥
न ज्येष्ठो वावमन्येत दुष्कृतः सुकृतोऽपि वा ।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयश्चेत् तत् तदाचरेत् ॥ १३ ॥
धर्मं हि श्रेय इत्याहुरिति धर्मविदो जनाः ।
बड़ा भाई अच्छा काम करनेवाला हो या बुरा, छोटेको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। इसी तरह यदि स्त्री अथवा छोटे भाई बुरे रास्तेपर चल रहे हों तो श्रेष्ठ पुरुषको जिस तरहसे भी उनकी भलाई हो, वही उपाय करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि धर्म ही कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन है ॥ १३ १/२ ॥
दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ॥ १४ ॥
दश चैव पितॄन् माता सर्वां वा पृथिवीमपि ।
गौरवेणाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ॥ १५ ॥
गौरवमें दस आचार्योंसे बढ़कर उपाध्याय, दस उपाध्यायोंसे बढ़कर पिता और दस पिताओंसे बढ़कर माता है। माता अपने गौरवसे समूची पृथिवीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ १४-१५ ॥
माता गरीयसी यच्च तेनैतां मन्यते जनः ।
ज्येष्ठो भ्राता पितृसमो मृते पितरि भारत ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! माताका गौरव सबसे बढ़कर है, इसलिये लोग उसका विशेष आदर करते हैं। भारत! पिताकी मृत्यु हो जानेपर बड़े भाईको ही पिताके समान समझना चाहिये ॥ १६ ॥
स ह्येषां वृत्तिदाता स्यात् स चैतान् प्रतिपालयेत् ।
कनिष्ठास्तं नमस्येरन् सर्वे छन्दानुवर्तिनः ॥ १७ ॥
तमेव चोपजीवेरन् यथैव पितरं तथा ।
बड़े भाईको उचित है कि वह अपने छोटे भाइयोंको जीविका प्रदान करे तथा उनका पालन-पोषण करे। छोटे भाइयोंका भी कर्तव्य है कि वे सब-के-सब बड़े भाईके सामने नतमस्तक हों और उसकी इच्छाके अनुसार चलें। बड़े भाईको ही पिता मानकर उनके आश्रयमें जीवन व्यतीत करें ॥ १७ १/२ ॥
शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत ॥ १८ ॥
आचार्यशास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ।
भारत! पिता और माता केवल शरीरकी सृष्टि करते हैं, किंतु आचार्यके उपदेशसे जो ज्ञानरूप नवीन जीवन प्राप्त होता है, वह सत्य, अजर और अमर है ॥
ज्येष्ठा मातृसमा चापि भगिनी भरतर्षभ ॥ १९ ॥
भ्रातृभार्या च तद्वत् स्याद् यस्या बाल्ये स्तनं पिबेत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! बड़ी बहिन भी माताके समान है। इसी तरह बड़े भाईकी पत्नी तथा बचपनमें जिसका दूध पिया गया हो, वह धाय भी माताके समान है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ज्येष्ठकनिष्ठवृत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बड़े और छोटे भाईका पारस्परिक बर्तावनामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
षडधिकशततमोऽध्यायः
मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामेव वर्णानां म्लेच्छानां च पितामह ।
उपवासे मतिरियं कारणं च न विद्महे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! सभी वर्णों और म्लेच्छ जातिके लोग भी उपवासमें मन लगाते हैं, किंतु इसका क्या कारण है? यह समझमें नहीं आता ॥ १ ॥
ब्रह्मक्षत्रेण नियमाश्र्र्तव्या इति नः श्रुतम् ।
उपवासे कथं तेषां कृत्यमस्ति पितामह ॥ २ ॥
पितामह! सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंको नियमोंका पालन करना चाहिये; परंतु उपवास करनेसे किस प्रकार उनके प्रयोजनकी सिद्धि होती है, यह नहीं जान पड़ता है ॥ २ ॥
नियमांश्चोपवासांश्च सर्वेषां ब्रूहि पार्थिव ।
आप्नोति कां गतिं तात उपवासपरायणः ॥ ३ ॥
पृथ्वीनाथ! आप कृपा करके हमें सम्पूर्ण नियमों और उपवासोंकी विधि बताइये। तात! उपवास करनेवाला मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है? ॥ ३ ॥
उपवासः परं पुण्यमुपवासः परायणम् ।
उपोष्येह नरश्रेष्ठ किं फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! कहते हैं, उपवास बहुत बड़ा पुण्य है और उपवास सबसे बड़ा आश्रय है; परंतु उपवास करके यहाँ मनुष्य कौन-सा फल पाता है? ॥ ४ ॥
अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वा कथम् ।
स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! मनुष्य किस कर्मके द्वारा पापसे छुटकारा पाता है और क्या करनेसे किस प्रकार उसे धर्मकी प्राप्ति होती है? वह पुण्य और स्वर्ग कैसे पाता है? ॥
उपोष्य चापि किं तेन प्रदेयं स्यान्नराधिप ।
धर्मेण च सुखानर्थांल्लभेद येन ब्रवीहि तम् ॥ ६ ॥
नरेश्वर! उपवास करके मनुष्यको किस वस्तुका दान करना चाहिये? जिस धर्मसे सुख और धनकी प्राप्ति हो सके, वही मुझे बताइये ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणं कौन्तेयं धर्मज्ञं धर्मतत्त्ववित् । धर्मपुत्रमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मज्ञ धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
इदं खलु मया राजन् श्रुतमासीत् पुरातनम् । उपवासविधौ श्रेष्ठा गुणा ये भरतर्षभ ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! भरतश्रेष्ठ! उपवास करनेमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनके विषयमें मैंने प्राचीन कालमें इस तरह सुन रखा है ॥ ८ ॥ ऋषिमंगिरसं पूर्वं पृष्टवानस्मि भारत । यथा मां त्वं तथैवाहं पृष्टवांस्तं तपोधनम् ॥ ९ ॥ भारत! जिस तरह आज तुमने मुझसे प्रश्न किया है इसी प्रकार मैंने भी पूर्वकालमें तपोधन अंगिरा मुनिसे प्रश्न किया था ॥ ९ ॥ प्रश्नमेतं मया पृष्टो भगवानग्निसम्भवः । उपवासविधिं पुण्यमाचष्ट भरतर्षभ ॥ १० ॥ भरतभूषण! जब मैंने यह प्रश्न पूछा, तब अग्निनन्दन भगवान् अंगिराने मुझे उपवासकी पवित्र विधि इस प्रकार बतायी ॥ १० ॥
अंगिरा उवाच
ब्रह्मक्षत्रे त्रिरात्रं तु विहितं कुरुनन्दन । द्विस्त्रिरात्रमथैकाहं निर्दिष्टं पुरुषर्षभ ॥ ११ ॥ **अंगिरा बोले—**कुरुनन्दन! ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये तीन रात उपवास करनेका विधान है। कहीं-कहीं दो त्रिरात्र और एक दिन अर्थात् कुल सात दिन उपवास करनेका संकेत मिलता है ॥ ११ ॥ वैश्याः शूद्राश्च यन्मोहादुपवासं प्रचक्रिरे । त्रिरात्रं वा द्विरात्रं वा तयोर्व्युष्टिर्न विद्यते ॥ १२ ॥ वैश्यों और शूद्रोंने जो मोहवश तीन रात अथवा दो रातका उपवास किया है, उसका उन्हें कोई फल नहीं मिला है ॥ १२ ॥ चतुर्थभक्तक्षपणं वैश्ये शूद्रे विधीयते । त्रिरात्रं न तु धर्मज्ञैर्विहितं धर्मदर्शिभिः ॥ १३ ॥ वैश्य और शूद्रके लिये चौथे समयतकके भोजनका त्याग करनेका विधान है अर्थात् उन्हें केवल दो दिन एवं दो रात्रितक उपवास करना चाहिये; क्योंकि धर्मशास्त्रके ज्ञाता एवं
धर्मदर्शी विद्वानोंने उनके लिये तीन राततक उपवास करनेका विधान नहीं किया है ॥ १३ ॥ पञ्चम्यां वापि षष्ठ्यां च पौर्णमास्यां च भारत । उपोष्य एकभक्तेन नियतात्मा जितेन्द्रियः ॥ १४ ॥ क्षमावान् रूपसम्पन्नः श्रुतवांश्चैव जायते । नानपत्यो भवेत् प्राज्ञो दरिद्रो वा कदाचन ॥ १५ ॥ भारत! यदि मनुष्य पंचमी, षष्ठी और पूर्णिमाके दिन अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक वक्त भोजन करके दूसरे वक्त उपवास करे तो वह क्षमावान्, रूपवान् और विद्वान् होता है। वह बुद्धिमान् पुरुष कभी संतानहीन या दरिद्र नहीं होता ॥ १४-१५ ॥ यजिष्णुः पञ्चमीं षष्ठीं कुले भोजयते द्विजान् । अष्टमीमथ कौरव्य कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् ॥ १६ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कुरुनन्दन! जो पुरुष भगवान्की आराधनाका इच्छुक होकर पंचमी, षष्ठी, अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको अपने घरपर ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और स्वयं उपवास करता है, वह रोगरहित और बलवान् होता है ॥ १६ १/२ ॥ मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत् ॥ १७ ॥ भोजयेच्च द्विजान् शक्त्या स मुच्येद् व्याधिकिल्बिषैः । जो मार्गशीर्ष मासको एक समय भोजन करके बिताता है और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोग और पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ १/२ ॥ सर्वकल्याणसम्पूर्णः सर्वौषधिसमन्वितः ॥ १८ ॥ उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजायते । कृषिभागी बहुधनो बहुधान्यश्च जायते ॥ १९ ॥ वह सब प्रकारके कल्याणमय साधनोंसे सम्पन्न तथा सब तरहकी ओषधियों (अन्न-फल आदि) से भरा-पूरा होता है। मार्गशीर्ष मासमें उपवास करनेसे मनुष्य दूसरे जन्ममें रोगरहित और बलवान् होता है। उसके पास खेती-बारीकी सुविधा रहती है तथा वह बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ॥ १८-१९ ॥ पौषमासं तु कौन्तेय भक्तेनैकेन यः क्षिपेत् । सुभगो दर्शनीयश्च यशोभागी च जायते ॥ २० ॥ कुन्तीनन्दन! जो पौष मासको एक वक्त भोजन करके बिताता है, वह सौभाग्यशाली, दर्शनीय और यशका भागी होता है ॥ २० ॥ माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् । श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते ॥ २१ ॥
जो माघमासको नियमपूर्वक एक समयके भोजनसे व्यतीत करता है, वह धनवान् कुलमें जन्म लेकर अपने कुटुम्बीजनोंमें महत्त्वको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
भगदैवतमासं तु एकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
स्त्रीषु वल्लभतां याति वश्याश्चास्य भवन्ति ताः ॥ २२ ॥
जो फाल्गुन मासको एक समय भोजन करके व्यतीत करता है, वह स्त्रियोंको प्रिय होता है और वे उसके अधीन रहती हैं ॥ २२ ॥
चैत्रं तु नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये कुले महति जायते ॥ २३ ॥
जो नियमपूर्वक रहकर चैत्रमासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न महान् कुलमें जन्म लेता है ॥ २३ ॥
निस्तरेदेकभक्तेन वैशाखं यो जितेन्द्रियः ।
नरो वा यदि वा नारी ज्ञातीनां श्रेष्ठतां व्रजेत् ॥ २४ ॥
जो स्त्री अथवा पुरुष इन्द्रियसंयमपूर्वक एक समय भोजन करके वैशाख मासको पार करता है, वह सजातीय बन्धु-बान्धवोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है ॥
ज्येष्ठामूलं तु यो मासमेकभक्तेन संक्षिपेत् ।
ऐश्वर्यमतुलं श्रेष्ठं पुमान् स्त्री वा प्रपद्यते ॥ २५ ॥
जो एक समय ही भोजन करके ज्येष्ठ मासको बिताता है; वह स्त्री हो या पुरुष, अनुपम श्रेष्ठ ऐश्वर्यको प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
आषाढमेकभक्तेन स्थित्वा मासमतन्द्रितः ।
बहुधान्यो बहुधनो बहुपुत्रश्च जायते ॥ २६ ॥
जो आषाढ़ मासमें आलस्य छोड़कर एक समय भोजन करके रहता है, वह बहुत-से धन-धान्य और पुत्रोंसे सम्पन्न होता है ॥ २६ ॥
श्रावणं नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
यत्र तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिवर्धनः ॥ २७ ॥
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एक समय भोजन करते हुए श्रावण मासको बिताता है, वह विभिन्न तीर्थोंमें स्नान करनेके पुण्य-फलसे युक्त होता और अपने कुटुम्बीजनोंकी वृद्धि करता है ॥ २७ ॥
प्रौष्ठपदं तु यो मासमेकाहारो भवेन्नरः ।
गवाढ्यं स्फीतमचलमैश्वर्यं प्रतिपद्यते ॥ २८ ॥
जो मनुष्य भाद्रपद मासमें एक समय भोजन करके रहता है, वह गोधनसे सम्पन्न, समृद्धिशील तथा अविचल ऐश्वर्यका भागी होता है ॥ २८ ॥
तथैवाश्वयुजं मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत् ।
मृजावान् वाहनाढ्यश्च बहुपुत्रश्च जायते ॥ २९ ॥
जो आश्विन मासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह पवित्र, नाना प्रकारके वाहनोंसे सम्पन्न तथा अनेक पुत्रोंसे युक्त होता है ॥ २९ ॥ कार्तिकं तु नरो मासं यः कुर्यादेकभोजनम् । शूरश्च बहुभार्यश्च कीर्तिमांश्चैव जायते ॥ ३० ॥ जो मनुष्य कार्तिक मासमें एक समय भोजन करता है, वह शूरवीर, अनेक भार्याओंसे संयुक्त और कीर्तिमान् होता है ॥ ३० ॥ इति मासा नरव्याघ्र क्षिपतां परिकीर्तिताः । तिथीनां नियमा ये तु शृणु तानपि पार्थिव ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! इस प्रकार मैंने मासपर्यन्त एकभुक्त व्रत करनेवाले मनुष्योंके लिये विभिन्न मासोंके फल बताये हैं। पृथिवीनाथ! अब तिथियोंके जो नियम हैं, उन्हें भी सुन लो ॥ ३१ ॥ पक्षे पक्षे गते यस्तु भक्तमश्नाति भारत । गवाढ्यो बहुपुत्रश्च बहुभार्यः स जायते ॥ ३२ ॥ भरतनन्दन! जो पंद्रह-पंद्रह दिनपर भोजन करता है, वह गोधनसे सम्पन्न और बहुत-से पुत्र तथा स्त्रियोंसे युक्त होता है ॥ ३२ ॥ मासि मासि त्रिरात्राणि कृत्वा वर्षाणि द्वादश । गणाधिपत्यं प्राप्नोति निःसपत्नमनाविलम् ॥ ३३ ॥ जो बारह वर्षोंतक प्रतिमास अनेक त्रिरात्रव्रत करता है, वह भगवान् शिवके गणोंका निष्कण्टक एवं निर्मल आधिपत्य प्राप्त करता है ॥ ३३ ॥ एते तु नियमाः सर्वे कर्तव्याः शरदो दश । द्वे चान्ये भरतश्रेष्ठ प्रवृत्तिमनुवर्तता ॥ ३४ ॥ भरतश्रेष्ठ! प्रवृत्तिमार्गका अनुसरण करनेवाले पुरुषको ये सभी नियम बारह वर्षोंतक पालन करने चाहिये ॥ ३४ ॥ यस्तु प्रातस्तथा सायं भुञ्जानो नान्तरा पिबेत् । अहिंसानिरतो नित्यं जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ३५ ॥ षड्भिः स वर्षेर्नृपते सिध्यते नात्र संशयः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३६ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे और शामको भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा सदा अहिंसा-परायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छः वर्षोंमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसमें संशय नहीं है तथा नरेश्वर! वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ॥ अधिवासे सोऽप्सरसां नृत्यगीतविनादिते । रमते स्त्रीसहस्राढ्ये सुकृती विरजो नरः ॥ ३७ ॥ वह पुण्यात्मा एवं रजोगुणरहित पुरुष सहस्रों दिव्य रमणियोंसे भरे हुए अप्सराओंके महलमें, जहाँ नृत्य और गीतकी ध्वनि गूँजती रहती है, रमण करता है ॥ ३७ ॥
तप्तकाञ्चनवर्णाभं विमानमधिरोहति ।
पूर्णं वर्षसहस्रं च ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३८ ॥
तत्क्षयादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ।
इतना ही नहीं, वह तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होता है और पूरे एक हजार वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है ॥ ३८ १/२ ॥
यस्तु संवत्सरं पूर्णमेकाहारो भवेन्नरः ॥ ३९ ॥
अतिरात्रस्य यज्ञस्य स फलं समुपश्नुते ।
जो मानव पूरे एक वर्षतक प्रतिदिन एक बार भोजन करके रहता है, वह अतिरात्रयज्ञका फल भोगता है ॥ ३९ १/२ ॥
दशवर्षसहस्राणि स्वर्गे च स महीयते ॥ ४० ॥
तत्क्षयादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ।
वह पुरुष दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ४० १/२ ॥
यस्तु संवत्सरं पूर्णं चतुर्थं भक्तमश्नुते ॥ ४१ ॥
अहिंसानिरतो नित्यं सत्यवाग् विजितेन्द्रियः ।
वाजपेयस्य यज्ञस्य स फलं समुपश्नुते ॥ ४२ ॥
दशवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।
जो पूरे एक वर्षतक दो-दो दिनपर भोजन करके रहता है तथा साथ ही अहिंसा, सत्य और इन्द्रिय-संयमका पालन करता है, वह वाजपेय यज्ञका फल पाता है और दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४१-४२ १/२ ॥
षष्ठे काले तु कौन्तेय नरः संवत्सरं क्षिपन् ॥ ४३ ॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
कुन्तीनन्दन! जो एक सालतक छठे समय अर्थात् तीन-तीन दिनोंपर भोजन करता है, वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ ४३ १/२ ॥
चक्रवाकप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥ ४४ ॥
चत्वारिंशत् सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ।
वह चक्रवाकोंद्वारा वहन किये हुए विमानसे स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ चालीस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥ ४४ १/२ ॥
अष्टमेन तु भक्तेन जीवन् संवत्सरं नृप ॥ ४५ ॥
गवामयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
नरेश्वर! जो मनुष्य चार दिनोंपर भोजन करता हुआ एक वर्षतक जीवन धारण करता है, उसे गवामय यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४५ १/२ ॥
हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥ ४६ ॥
पञ्चाशतं सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ।
वह हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानद्वारा जाता है और पचास हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥ ४६ १/२ ॥
पक्षे पक्षे गते राजन् योऽश्रीयाद् वर्षमेव तु ॥ ४७ ॥
षण्मासानशनं तस्य भगवानङ्गिराऽब्रवीत् ।
राजन्! जो एक-एक पक्ष बीतनेपर भोजन करता है और इसी तरह एक वर्ष पूरा कर देता है, उसको छः मासतक अनशन करनेका फल मिलता है। ऐसा भगवान् अंगिरा मुनिका कथन है ॥ ४७ १/२ ॥
षष्टिर्वर्षसहस्राणि दिवमावसते च सः ॥ ४८ ॥
वीणानां वल्लकीनां च वेणूनां च विशाम्पते ।
सुघोषैर्मधुरैः शब्दैः सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ ४९ ॥
प्रजानाथ! वह साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है और वहाँ वीणा, वल्लकी, वेणु आदि वाद्योंके मनोरम घोष तथा सुमधुर शब्दोंद्वारा उसे सोतेसे जगाया जाता है ॥ ४८-४९ ॥
संवत्सरमिहैकं तु मासि मासि पिबेदपः ।
फलं विश्वजितस्तात प्राप्नोति स नरो नृप ॥ ५० ॥
तात! नरेश्वर! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिमास एक बार जल पीकर रहता है, उसे विश्वजित् यज्ञका फल मिलता है ॥ ५० ॥
सिंहव्याघ्रप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति ।
सप्ततिं च सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ५१ ॥
वह सिंह और व्याघ्र जुते हुए विमानसे यात्रा करता है और सत्तर हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥
मासादूर्ध्वं नरव्याघ्र नोपवासो विधीयते ।
विधिं त्वनशनस्याहुः पार्थ धर्मविदो जनाः ॥ ५२ ॥
पुरुषसिंह! एक माससे अधिक समयतक उपवास करनेका विधान नहीं है। कुन्तीनन्दन! धर्मज्ञ पुरुषोंने अनशनकी यही विधि बतायी है ॥ ५२ ॥
अनार्तो व्याधिरहितो गच्छेदन्शनं तु यः ।
पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥ ५३ ॥
जो बिना रोग-व्याधिके अनशन व्रत करता है, उसे पद-पदपर यज्ञका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥
दिवं हंसप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति । शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो ॥ ५४ ॥ शतं चाप्सरसः कन्या रमयन्त्यपि तं नरम् । प्रभो! ऐसा पुरुष हंस जुते हुए दिव्य विमानसे यात्रा करता है और एक लाख वर्षोंतक देवलोकमें आनन्द भोगता है, सैकड़ों कुमारी अप्सराएँ उस मनुष्यका मनोरंजन करती हैं ॥ ५४ १/२ ॥
आर्तो वा व्याधितो वापि गच्छेदन्शनं तु यः ॥ ५५ ॥ शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो । प्रभो! रोगी अथवा पीड़ित मनुष्य भी यदि उपवास करता है तो वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ५५ १/२ ॥
काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तश्चैव प्रबोध्यते ॥ ५६ ॥ सहस्रहंसयुक्तेन विमानेन तु गच्छति । वह सो जानेपर दिव्य रमणियोंकी कांची और नूपुरोंकी झनकारसे जागता है और ऐसे विमानसे यात्रा करता है, जिसमें एक हजार हंस जुते रहते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
स गत्वा स्त्रीशताकीर्णे रमते भरतर्षभ ॥ ५७ ॥ क्षीणस्याप्यायनं दृष्टं क्षतस्य क्षतरोहणम् । व्याधितस्यौषधग्रामः क्रुद्धस्य च प्रसादनम् ॥ ५८ ॥ दुःखितस्यार्थमानाभ्यां दुःखानां प्रतिषेधनम् । न चैते स्वर्गकामस्य रोचन्ते सुखमेधसः ॥ ५९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह स्वर्गमें जाकर सैकड़ों रमणियोंसे भरे हुए महलमें रमण करता है। इस जगत्में दुर्बल मनुष्यको हृष्ट-पुष्ट होते देखा गया है। जिसे घाव हो गया है, उसका घाव भी भर जाता है। रोगीको अपने रोगकी निवृत्तिके लिये औषधसमूह प्राप्त होता है। क्रोधमें भरे हुए पुरुषको प्रसन्न करनेका उपाय भी उपलब्ध होता है। अर्थ और मानके लिये दुःखी हुए पुरुषके दुःखोंका निवारण भी देखा गया है; परन्तु स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले और दिव्य सुख चाहनेवाले पुरुषको ये सब इस लोकके सुखोंकी बातें अच्छी नहीं लगतीं ॥ ५७—५९ ॥
अतः स कामसंयुक्ते विमाने हेमसंनिभे । रमते स्त्रीशताकीर्णे पुरुषोऽलंकृत शुचिः ॥ ६० ॥ स्वस्थः सफलसंकल्पः सुखी विगतकल्मषः । अतः वह पवित्रात्मा पुरुष वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सैकड़ों स्त्रियोंसे भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले सुवर्ण-सदृश विमानपर बैठकर रमण करता है। वह स्वस्थ, सफलमनोरथ, सुखी एवं निष्पाप होता है ॥
अनश्नन् देहमुत्सृज्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ६१ ॥ बालसूर्यप्रतीकाशे विमाने हेमवर्चसि ।
वैदूर्यमुक्ताखचिते वीणामुरजनादिते ॥ ६२ ॥ पताकादीपिकाकीर्णे दिव्यघण्टानिनादिते । स्त्रीसहस्रानुचरिते स नरः सुखमेधते ॥ ६३ ॥ जो मनुष्य अनशन-व्रत करके अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह निम्नांकित फलका भागी होता है। वह प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशमान, सुनहरी कान्तिवाले, वैदूर्य और मोतीसे जटित, वीणा और मृदंगकी ध्वनिसे निनादित, पताका और दीपकोंसे आलोकित तथा दिव्य घण्टानादसे गूँजते हुए, सहस्रों अप्सराओंसे युक्त विमानपर बैठकर दिव्य सुख भोगता है ॥ ६१—६३ ॥
यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु पाण्डव । तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ६४ ॥ पाण्डुनन्दन! उसके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ६४ ॥
नास्ति वेदात् परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरुः । न धर्मात् परमो लाभस्तपो नानशनात् परम् ॥ ६५ ॥ वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ॥ ६५ ॥
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति पावनं दिवि चेह च । उपवासैस्तथा तुल्यं तपःकर्म न विद्यते ॥ ६६ ॥ जैसे इस लोक और परलोकमें ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणोंसे बढ़कर कोई पावन नहीं है, उसी प्रकार उपवासके समान कोई तप नहीं है ॥ ६६ ॥
उपोष्य विधिवद् देवास्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे । ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरुपाप्नुवन् ॥ ६७ ॥ देवताओंने विधिवत् उपवास करके ही स्वर्ग प्राप्त किया है तथा ऋषियोंको भी उपवाससे ही सिद्धि प्राप्त हुई है ॥ ६७ ॥
दिव्यवर्षसहस्राणि विश्वामित्रेण धीमता । क्षान्तमेकेन भक्तेन तेन विप्रत्वमागतः ॥ ६८ ॥ परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी एक हजार दिव्य वर्षोंतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके भूखका कष्ट सहते हुए तपमें लगे रहे। उससे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥
च्यवनो जमदग्निश्च वसिष्ठो गौतमो भृगुः । सर्व एव दिवं प्राप्ताः क्षमावन्तो महर्षयः ॥ ६९ ॥ च्यवन, जमदग्नि, वसिष्ठ, गौतम, भृगु—ये सभी क्षमावान् महर्षि उपवास करके ही दिव्य लोकोंको प्राप्त हुए हैं ॥ ६९ ॥
इदमङ्गिरसा पूर्वं महर्षिभ्यः प्रदर्शितम् ।
यः प्रदर्शयते नित्यं न स दुःखमवाप्नुते ॥ ७० ॥ पूर्वकालमें अंगिरा मुनिने महर्षियोंको इस अनशन-व्रतकी महिमाका दिग्दर्शन कराया था। जो सदा इसका लोगोंमें प्रचार करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता ॥ इमं तु कौन्तेय यथाक्रमं विधिं प्रवर्तितं ह्यङ्गिरसा महर्षिणा । पठेच्च यो वै शृणुयाच्च नित्यदा न विद्यते तस्य नरस्य किल्बिषम् ॥ ७१ ॥ कुन्तीनन्दन! महर्षि अंगिराकी बतलायी हुई इस उपवासव्रतकी विधिको जो प्रतिदिन क्रमशः पढ़ता और सुनता है, उस मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है ॥ ७१ ॥ विमुच्यते चापि स सर्वसंकरै- र्न चास्य दोषैरभिभूयते मनः । वियोनिजानां च विजानते रुतं ध्रुवां च कीर्तिं लभते नरोत्तमः ॥ ७२ ॥ वह सब प्रकारके संकीर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है तथा उसका मन कभी दोषोंसे अभिभूत नहीं होता। इतना ही नहीं, वह श्रेष्ठ मानव दूसरी योनिमें उत्पन्न हुए प्राणियोंकी बोली समझने लगता है और अक्षय कीर्तिका भागी होता है ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधौ षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासविधिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पितामहेन विधिवद् यज्ञाः प्रोक्ता महात्मना ।
गुणाश्चैषां यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वशः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महात्मा पितामहने विधिपूर्वक यज्ञोंका वर्णन किया और इहलोक तथा परलोकमें जो उनके सम्पूर्ण गुण हैं, उनका भी यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया ॥ १ ॥
न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं पितामह ।
बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः ॥ २ ॥
किन्तु पितामह! दरिद्र मनुष्य उन यज्ञोंका लाभ नहीं उठा सकता; क्योंकि उन यज्ञोंके उपकरण बहुत हैं और अनेक प्रकारके आयोजनोंके कारण उनका विस्तार बहुत बढ़ जाता है ॥ २ ॥
पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक्याः प्राप्तुं पितामह ।
नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतैः ॥ ३ ॥
दादाजी! राजा अथवा राजपुत्र ही उन यज्ञोंका लाभ ले सकते हैं। जिनके पास धनकी कमी है, जो गुणहीन, एकाकी और असहाय हैं, वे उस प्रकारके यज्ञ नहीं कर सकते ॥ ३ ॥
यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं सदा भवेत् ।
अर्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतैः ॥ ४ ॥
तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे ब्रूहि पितामह ।
इसलिये जिस कर्मका अनुष्ठान दरिद्रों, गुणहीनों, एकाकी और असहायोंके लिये भी सुगम तथा बड़े-बड़े यज्ञोंके समान फल देनेवाला हो, उसीका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४ १/२ ॥
भीष्म उवाच
इदमङ्गिरसा प्रोक्तमुपवासफलात्मकम् ॥ ५ ॥
विधिं यज्ञफलैस्तुल्यं तन्निबोध युधिष्ठिर ।
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! अंगिरा मुनिकी बतलायी हुई जो उपवासकी विधि है, वह यज्ञोंके समान ही फल देनेवाली है। उसका पुनः वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ५ १/२ ॥
यस्तु कल्यं तथा सायं भुञ्जानो नान्तरा पिबेत् ॥ ६ ॥
अहिंसानिरतो नित्यं जुह्वानो जातवेदसम् ।
षड्भिरेव स वर्षेस्तु सिद्ध्यते नाज संशयः ॥ ७ ॥
जो सबेरे और शामको ही भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा अहिंसापरायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छः वर्षोंमें ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है—इसमें संशय नहीं है ॥ ६-७ ॥
तप्तकाञ्चनवर्णं च विमानं लभते नरः ।
देवस्त्रीणामधीवासे नृत्यगीतनिनादिते ॥ ८ ॥
प्राजापत्ये वसेत् पद्मं वर्षाणामग्निसंनिभे ।
वह मनुष्य तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् विमान पाता है और अग्नितुल्य तेजस्वी प्रजापतिलोकमें नृत्य तथा गीतोंसे गूँजते हुए देवांगनाओंके महलमें एक पद्म वर्षोंतक निवास करता है ॥ ८ १/२ ॥
त्रीणि वर्षाणि यः प्राश्नीत् सततं त्वेकभोजनम् ॥ ९ ॥
धर्मपत्नीरतो नित्यमग्निष्टोमफलं लभेत् ।
जो अपनी ही धर्मपत्नीमें अनुराग रखते हुए निरन्तर तीन वर्षोंतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके रहता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ९ १/२ ॥
यज्ञं बहुसुवर्णं वा वासवप्रियमाचरेत् ॥ १० ॥
सत्यवान् दानशीलश्च ब्रह्मण्यश्चानसूयकः ।
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधः स गच्छति परां गतिम् ॥ ११ ॥
जो बहुत-सी सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त इन्द्रप्रिय यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, अदोषदर्शी, क्षमाशील, जितेन्द्रिय और क्रोधविजयी होता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है ॥
पाण्डुराभ्रप्रतीकाशे विमाने हंसलक्षणे ।
द्वे समाप्ते ततः पद्मे सोऽप्सरोभिर्वसेत् सह ॥ १२ ॥
वह सफेद बादलोंके समान चमकीले हंसोपलक्षित विमानपर बैठकर दो पद्म वर्षोंतक समय समाप्त होनेतक अप्सराओंके साथ वहाँ निवास करता है ॥ १२ ॥
द्वितीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ १३ ॥
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधनः ।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १४ ॥
जो मनुष्य नित्य अग्निमें होम करता हुआ एक वर्षतक प्रति दूसरे दिन एक बार भोजन करता है तथा प्रतिदिन अग्निकी उपासनामें तत्पर रहकर नित्य सबेरे जागता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ॥
हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नरः । इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभिः समावृतः ॥ १५ ॥ वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है ॥ १५ ॥ तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ १६ ॥ अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधनः । अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १७ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है ॥ १६-१७ ॥ मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नरः । सप्तर्षीणां सदा लोके सोऽप्सरोभिर्वसेत् सह ॥ १८ ॥ निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह । उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोंतक वह निवास करता है ॥ १८ १/२ ॥ दिवसे यश्चतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ १९ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ २० ॥ जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है ॥ १९-२० ॥ इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नरः । सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत् ॥ २१ ॥ देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते । उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है ॥ २१ १/२ ॥ दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ २२ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् । अलुब्धः सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्चाविहिंसकः ॥ २३ ॥ अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् ।
जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकर्मोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। २२-२३ १/२ ।। जाम्बूनदमयं दिव्यं विमानं हंसलक्षणम् ।। २४ ।। सूर्यमालासभासमारोहेत् पाण्डुरं गृहम् । आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादश ।। २५ ।। शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस (कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ।। २४-२५ १/२ ।। दिवसे यस्तु षष्ठे वै मुनिः प्राशेत भोजनम् ।। २६ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयकः ।। २७ ।। गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अग्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है ।। २६-२७ १/२ ।। अग्निज्वालासभासं हंसबर्हिणसेवितम् ।। २८ ।। शातकुम्भसमायुक्तं साधयेद् यानमुत्तमम् । तथैवाप्सरसामङ्के प्रतिसुप्तः प्रबोध्यते ।। २९ ।। नूपुराणां निनादेन मेखलानां च निःस्वनैः । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।। कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च ।। ३० ।। पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च । अयुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च ।। ३१ ।। लोम्नां प्रमाणेन समं ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्म), अठारह पद्म, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोंतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ।। ३०-३१ १/२ ।। दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।। ३२ ।।
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सरस्वतीं गोपमानो ब्रह्मचर्यं समाचरन् ॥ ३३ ॥ सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन् । पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति ॥ ३४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ३२—३४ ॥ तत्र तत्र हि सिद्धार्थो देवकन्याभिरर्च्यते । फलं बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नरः ॥ ३५ ॥ संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्धारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ३५ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्क्तेऽहन्यष्टमे नरः ॥ ३६ ॥ देवकार्यपरो निन्यं जुह्वानो जातवेदसम् । पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ३७ ॥ जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है ॥ ३६-३७ ॥ पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति । कृष्णाः कनकगौरैश्च नार्यः श्यामास्तथापराः ॥ ३८ ॥ वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशयः । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूप-विलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३८ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते नवमे नवमेऽहनि ॥ ३९ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४० ॥ जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है ॥ ३९-४० ॥ पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नरः ।
दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च ।। ४१ ।। नीयते रुद्रकन्याभिः सोऽन्तरिक्षं सनातनम् । अष्टादश सहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च ।। ४२ ।। कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोंका विमान पाता है। दीप्तिमान् सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोंतक सुख भोगता है ।।
यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते दशाहे वै गते गते ।। ४३ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे ।। ४४ ।। अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । रूपवत्यश्च तं कन्या रमयन्ति सनातनम् ।। ४५ ।। जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास-स्थानमें जाकर एक हजार अश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।।
नीलोत्पलनिभैर्वर्णै रक्तोत्पलनिभैस्तथा । विमानं मण्डलावर्तमावर्तगहनाकुलम् ।। ४६ ।। सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद यानमनुत्तमम् । विचित्रमणिमालाभिर्नादितं शंखनिःस्वनैः ।। ४७ ।। वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।।
स्फाटिकैर्वज्रसारैश्च स्तम्भैः सुकृतवेदिकम् । आरोहति महद् यानं हंससारसनादितम् ।। ४८ ।। उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।।
एकादशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।। ४९ ।। परस्त्रियं नाभिलषेद् वाचाथ मनसापि वा ।
अनृतं च न भाषेत मातापित्रोः कृतेपि वा ॥ ५० ॥ अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५१ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन-वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान् महादेवजीके समीप जाता और हजार अश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है ॥ ४९—५१ ॥
स्वायम्भुवं च पश्येत विमानं समुपस्थितम् । कुमार्यः काञ्चनाभासा रूपवत्यो नयन्ति तम् ॥ ५२ ॥ रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा द्युलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं ॥ ५२ १/२ ॥
वर्षाण्यपरिमेयानि युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ५३ ॥ कोटीशतसहस्रं च दशकोटिशतानि च । रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मत्तम् ॥ ५४ ॥ स तस्मै दर्शनं प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् । वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोंतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोंतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान् रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान् उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ॥
दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः ॥ ५५ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सर्वमेधफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ ५५ १/२ ॥
आदित्यद्वादशं तस्य विमानं संविधीयते ॥ ५६ ॥ मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् । हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् ॥ ५७ ॥ मयूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् । अट्टैर्महद्भिः संयुक्तं ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥ नित्यमावसथं राजन् नरनारीसमावृतम् । ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिरा प्राह धर्मवित् ॥ ५९ ॥