महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[राजधर्मका वर्णन]
[राजधर्मका वर्णन] उमोवाच
देवदेव नमस्तुभ्यं त्र्यक्ष वृषभध्वज ।
श्रुतं मे भगवन् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥
उमाने कहा— देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ।।
संगृहीतं मया तच्च तव वाक्यमनुत्तमम् ।
इदानीमस्ति संदेहो मानुषेष्विह कश्चन ॥
सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है। इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ।।
तुल्यप्राणशिरःकायो राजायमिति दृश्यते ।
केन कर्मविपाकेन सर्वप्राधान्यमर्हति ॥
मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है? ।।
स चापि दण्डयन् मर्त्यान् भर्त्सयन् विविधानपि ।
प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणाम् ॥
राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद ।
यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता-फटकारता है। यह मृत्युके पश्चात् कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचार-व्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि राजधर्मं शुभानने ॥
राजायत्तं हि यत् सर्वं लोकवृत्तं शुभाशुभम् ।
महत्तस्तपसो देवि फलं राज्यमिति स्मृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्का सारा शुभाशुभ आचार-व्यवहार राजाके ही अधीन है। देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ।।
अराजके पुरा त्वासीत् प्रजानां संकुलं महत् ।
तद् दृष्ट्वा संकुलं ब्रह्मा मनुं राज्ये न्यवेशयत् ॥
प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी। प्रजापर महान् संकट आ गया। प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ।।
तदाप्रभृति संदृष्टं राज्ञां वृत्तं शुभाशुभम् ।
तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् ॥ तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ॥ यथा प्रेत्य लभेत् स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा । पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः ॥ राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद् भोक्तुमर्हति ॥ जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ॥ आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् । अनुभृत्यान् प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥ पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ॥ स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया । स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥ शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ॥ स्वस्मात् पूर्वतरं राजा विनयत्येव वै प्रजाः । अपहास्यो भवेत्तादृक् स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥ जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ॥ विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् । विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥ विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ॥ इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः । अजये सुमहान् दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥ देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये—यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ॥ पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान् पञ्च शोषयेत् । षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च ॥
शास्त्रचक्षुर्नयपरो भूत्वा भृत्यान् समाहरेत् ॥
पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले। ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छः दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ॥
वृत्तश्रुतकुलोपेतानुपधाभिः परीक्षितान् ।
अमात्यानुपधातीतान् सापसर्पान् जितेन्द्रियान् ॥
योजयेत यथायोगं यथार्हं स्वेषु कर्मसु ॥
जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सच्चाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत-से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों—ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोंमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ॥
अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् ।
दुराधर्षं पुरश्रेष्ठं कोषः कृच्छ्रसहः स्मृतः ॥
अनुरक्तं बलं साम्नामद्वैधं मित्रमेव च ।
एताः प्रकृतयः स्वेषु स्वामी विनयतत्त्ववित् ॥
बुद्धिमान् मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधामें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी—ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ॥
प्रजानां रक्षणार्थाय सर्वमेतद् विनिर्मितम् ।
आभिः करणभूताभिः कुर्याल्लोकहितं नृपः ॥
प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है। रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ हैं, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ॥
आत्मरक्षा नरेन्द्रस्य प्रजारक्षार्थमिष्यते ।
तस्मात् सततमात्मानं संरक्षेद्प्रमादवान् ॥
राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ॥
भोजनाच्छादनस्नानाद् बहिर्निष्क्रमणादपि ।
नित्यं स्त्रीगणसंयोगाद् रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन-आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना—इन सबसे अपनी रक्षा करे ॥
स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च शस्त्रादपि विषादपि ।
सततं पुत्रदारेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्री-पुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।। सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् । प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ।। आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।। प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् । प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् ।। प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ।। प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।। प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च । उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् ।। तमर्थं विमृशेद् बुद्ध्या स्वयमातत्त्वदर्शनात् ।। प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।। तत्त्वविद्भिश्च बहुभिः सहासीनो नरोत्तमैः । कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ।। ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु ।। तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।। एवं कुर्वल्लभेद् धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ।। प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः । बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ।। पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।। चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद् विज्ञाय विचारयेत् । अशुभं निर्हरेत् सद्यो जोषयच्छुभमात्मनः ।।
गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।। गर्ह्यान् विगर्हयेदेव पूज्यान् सम्पूजयेत् तथा । दण्ड्यांश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा ।। देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। पञ्चापेक्षं सदा मन्त्रं कुर्याद् बुद्धियुतैनरैः । कुलवृत्तश्रुतोपेतैर्नित्यं मन्त्रपरो भवेत् ।। पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात् पाँच मन्त्रियोंके साथ बैठकर सदा ही राज-कार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान्, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।। कामकारेण वैमुख्यैर्नैव मन्त्रमना भवेत् । राजा राष्ट्रहितापेक्षं सत्यधर्माणि कारयेत् ।। जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।। सर्वोद्योगं स्वयं कुर्याद् दुर्गादिषु सदा नृषु । देशवृद्धिकरान् भृत्यानप्रमादेन कारयेत् ।। देशक्षयकरान् सर्वानप्रियांश्च विसर्जयेत् । अहन्यहनि सम्पश्येदनुजीविगणं स्वयं ।। दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।। सुमुखः सुप्रियो दत्त्वा सम्यग्वृत्तं समाचरेत् । अधर्म्यं परुषं तीक्ष्णं वाक्यं वक्तुं न चार्हति ।। वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।। अविश्वास्यं हि वचनं वक्तुं सत्सु न चार्हति । नरे नरे गुणान् दोषान् सम्यग्वेदितुमर्हति ।। सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।
स्वेङ्गितं वृणुयाद् धैर्यान्न कुर्यात् क्षुद्रसंविदम् । परेङ्गितज्ञो लोकेषु भूत्वा संसर्गमाचरेत् ॥ अपनी चेष्टाको धैर्यपूर्वक छिपाये रखे। क्षुद्र बुद्धिका प्रदर्शन न करे अथवा मनमें क्षुद्र विचार न लाये। दूसरेकी चेष्टाको अच्छी तरह समझकर संसारमें उनके साथ सम्पर्क स्थापित करे ॥
स्वतश्च परतश्चैव परस्परभयादपि । अमानुषभयेभ्यश्च स्वाः प्रजाः पालयेन्नृपः ॥ राजाको चाहिये कि वह अपने भयसे, दूसरोंके भयसे, पारस्परिक भयसे तथा अमानुष भयोंसे अपनी प्रजाको सुरक्षित रखे ॥
लुब्धाः कठोराश्चाप्यस्य मानवा दस्युवृत्तयः । निग्राह्या एव ते राज्ञा संगृहीत्वा यतस्ततः ॥ जो लोभी, कठोर तथा डाका डालनेवाले मनुष्य हों, उन्हें जहाँ-तहाँसे पकड़वाकर राजा कैदमें डाल दे ॥
कुमारान् विनयैरेव जन्मप्रभृति योजयेत् । तेषामात्मगुणोपेतं यौवराज्येन योजयेत् ॥ राजकुमारोंको जन्मसे ही विनयशील बनावे। उनमेंसे जो भी अपने अनुरूप गुणोंसे युक्त हो, उसे युवराजपदपर नियुक्त करे ॥
अराजकं क्षणमपि राज्यं न स्याद्धि शोभने । आत्मनोऽनुविधानाय यौवराज्यं सदेष्यते ॥ शोभने! एक क्षणके लिये भी बिना राजाका राज्य नहीं रहना चाहिये। अतः अपने पीछे राजा होनेके लिये एक युवराजको नियत करना सदा ही आवश्यक है ॥
कुलजानां च वैद्यानां श्रोत्रियाणां तपस्विनाम् । अन्येषां वृत्तियुक्तानां विशेषं कर्तुमर्हति ॥ आत्मार्थं राज्यतन्त्रार्थं कोशार्थं च समाचरेत् ॥ कुलीन पुरुषों, वैद्यों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों, तपस्वी मुनियों तथा वृत्तियुक्त दूसरे पुरुषोंका भी राजा विशेष सत्कार करे। अपने लिये, राज्यके हितके लिये तथा कोष-संग्रहके लिये ऐसा करना आवश्यक है ॥
चतुर्धा विभजेत् कोशं धर्मभृत्यात्मकारणात् । आपदर्थं च नीतिज्ञो देशकालवशेन तु ॥ नीतिज्ञ पुरुष अपने कोषको चार भागोंमें विभक्त करे—धर्मके लिये, पोष्य वर्गके पोषणके लिये, अपने लिये तथा देश-कालवश आनेवाली आपत्तिके लिये ॥
अनाथान् व्याधितान् वृद्धान् स्वदेशे पोषयेन्नृपः ॥ सन्धिं च विग्रहं चैव तद् विशेषांस्तथा परान् ।
यथावत् संविमृश्यैव बुद्धिपूर्वं समाचरेत् ॥ राजाको चाहिये कि अपने देशमें जो अनाथ, रोगी और वृद्ध हों, उनका स्वयं पोषण करे। संधि, विग्रह तथा अन्य नीतियोंका बुद्धिपूर्वक भलीभाँति विचार करके प्रयोग करे ॥
सर्वेषां सम्प्रियो भूत्वा मण्डलं सततं चरेत् । शुभेष्वपि च कार्येषु न चैकान्तः समाचरेत् ॥ राजा सबका प्रिय होकर सदा अपने मण्डल (देशके भिन्न-भिन्न भाग) में विचरे। शुभ कार्योंमें भी वह अकेला कुछ न करे ॥
स्वतश्च परतश्चैव व्यसनानि विमृश्य सः । परेण धार्मिकान् योगान् नातीयाद् द्वेषलोभतः ॥ अपने और दूसरोंसे संकटकी सम्भावनाका विचार करके द्वेष या लोभवश धार्मिक पुरुषोंके साथ सम्बन्धका त्याग न करे ॥
रक्ष्यत्वं वै प्रजाधर्मः क्षत्रधर्मस्तु रक्षणम् । कुनृपैः पीडितास्तस्मात् प्रजाः सर्वत्र पालयेत् ॥ प्रजाका धर्म है रक्षणीयता और क्षत्रिय राजाका धर्म है रक्षा; अतः दुष्ट राजाओंसे पीड़ित हुई प्रजाकी सर्वत्र रक्षा करे ॥
व्यसनेभ्यो बलं रक्षेन्नयतो व्ययतोऽपि वा । प्रायशो वर्जयेद् युद्धं प्राणरक्षणकारणात् ॥ सेनाको संकटोंसे बचावे, नीतिसे अथवा धन खर्च करके भी प्रायः युद्धको टाले। सैनिकों तथा प्रजाजनोंके प्राणोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही ऐसा करना चाहिये ॥
कारणादेव योद्धव्यं नात्मनः परदोषतः । सुयुद्धे प्राणमोक्षश्च तस्य धर्माय इष्यते ॥ अनिवार्य कारण उपस्थित होनेपर ही युद्ध करना चाहिये, अपने या पराये दोषसे नहीं। उत्तम युद्धमें प्राण-विसर्जन करना वीर योद्धाके लिये धर्मकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥
अभियुक्तो बलवता कुर्यादापद्विधिं नृपः । अनुनीय तथा सर्वान् प्रजानां हितकारणात् ॥ एष देवि समासेन राजधर्मः प्रकीर्तितः ॥ किसी बलवान् शत्रुके आक्रमण करनेपर राजा उस आपत्तिसे बचनेका उपाय करे। प्रजाके हितके लिये समस्त विरोधियोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल बना ले। देवि! यह संक्षेपसे राजधर्म बताया गया है ॥
एवं संवर्तमानस्तु दण्डयन् भर्त्सयन् प्रजाः । निष्कल्मषमवाप्नोति पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ इस प्रकार बर्ताव करनेवाला राजा प्रजाको दण्ड देता और फटकारता हुआ भी जलसे लिप्त न होनेवाले कमलदलके समान पापसे अछूता ही रहता है ॥
एवं संवर्तमानस्य कालधर्मो यदा भवेत् ।
स्वर्गलोके तदा राजा त्रिदशैः सह तोष्यते ॥
इस बर्तावसे रहनेवाले राजाकी जब मृत्यु होती है, तब वह स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ॥
(दाक्षिणात्यप्रतिमें अध्याय समाप्त)
[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]
[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]
श्रीमहेश्वर उवाच
अथ यस्तु सहायार्थमुक्ताः स्यात् पार्थिवैनरैः ।।
भोगानां संविभागेन वस्त्राभरणभूषणैः ।
सहभोजनसम्बन्धैः सत्कारैर्विविधैरपि ।।
सहायकाले सम्प्राप्ते संग्रामे शस्त्रमुद्धरेत् ।।
भगवान् महेश्वर कहते हैं—राजा भाँति-भाँतिके भोग, वस्त्र और आभूषण देकर जिन
लोगोंको अपनी सहायताके लिये बुलाता और रखता है, उनके साथ भोजन करके घनिष्ठ
सम्बन्ध स्थापित करता है और नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, ऐसे
योद्धाओंको उचित है कि युद्ध छिड़ जानेपर सहायताके समय उस राजाके लिये शस्त्र
उठावे ।।
हन्यमानेष्वभिघ्नत्सु शूरेषु रणसंकटे ।
पृष्ठं दत्त्वा च ये तत्र नायकस्य नराधमाः ।।
अनाहता निवर्तन्ते नायके चाप्यनीप्सति ।
ते दुष्कृतं प्रपद्यन्ते नायकस्याखिलं नराः ।।
यच्चास्ति सुकृतं तेषां युज्यते तेन नायकः ।
जब घोर संग्राममें शूरवीर एक-दूसरेको मारते और मारे जाते हों, उस अवसरपर जो
नराधम सैनिक पीठ देकर सेनानायककी इच्छा न होते हुए भी बिना घायल हुए ही युद्धसे
मुँह मोड़ लेते हैं, वे सेनापतिके सम्पूर्ण पापोंको स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं और उन भगोड़ोंके
पास जो कुछ भी पुण्य होता है, वह सेनानायकको प्राप्त हो जाता है ।।
अहिंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः ।
संग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपतः ।।
नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिणः ।।
‘अहिंसा परम धर्म है,’ ऐसी जिनकी मान्यता है, वे भी यदि राजाके सेवक हैं, उनसे
भरण-पोषणकी सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशामें भी वे अपनी शक्तिके अनुरूप
संग्रामोंमें जूझते नहीं हैं तो घोर नरकमें पड़ते हैं; क्योंकि वे स्वामीके अन्नका अपहरण
करनेवाले हैं ।।
यस्तु प्राणान् परित्यज्य प्रविशेदुद्यतायुधः ।
संग्राममग्निप्रतिमं पतंग इव निर्भयः ।।
स्वर्गमाविशते ज्ञात्वा योधस्य गतिनिश्चयम् ।।
जो अपने प्राणोंकी परवाह छोड़कर पतंगकी भाँति निर्भय हो हाथमें हथियार उठाये
अग्निके समान विनाशकारी संग्राममें प्रवेश कर जाता है और योद्धाको मिलनेवाली निश्चित
गतिको जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है ।।
यस्तु स्वं नायकं रक्षेद्तिघोरे रणाङ्गणे ।
तापयन्नरिसैन्यानि सिंहो मृगगणानिव ।।
आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यो रणाजिरे ।।
निर्दयो यस्तु संग्रामे प्रहरन्तुद्यतायुधः ।
यजते स तु पूतात्मा संग्रामेण महाक्रतुम् ।।
जो अत्यन्त घोर समरांगणमें मृगोंके झुडोंको संतप्त करनेवाले सिंहके समान
शत्रुसैनिकोंको ताप देता हुआ अपने नायक (राजा या सेनापति) की रक्षा करता है,
मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति रणक्षेत्रमें जिसकी ओर देखना शत्रुओंके लिये अत्यन्त कठिन
हो जाता है तथा जो संग्राममें शस्त्र उठाये निर्दयतापूर्वक प्रहार करता है, वह शुद्धचित्त
होकर उस युद्धके द्वारा ही मानो महान् यज्ञका अनुष्ठान करता है ।।
वर्म कृष्णाजिनं तस्य दन्तकाष्ठं धनुः स्मृतम् ।
रथो वेदिर्ध्वजो यूपः कुशाश्च रथरश्मयः ।।
मानो दर्पस्त्वहङ्कारस्त्रयस्त्रेताग्नयः स्मृताः ।
प्रतोदश्च स्रुवस्तस्य उपाध्यायो हि सारथिः ।।
स्रुग्भाण्डं चापि यत् किंचिद् यज्ञोपकरणानि च ।।
आयुधान्यस्य तत् सर्वं समिधः सायकाः स्मृताः ।।
उस समय कवच ही उसका काला मृगचर्म है, धनुष ही दाँतुन या दन्तकाष्ठ है, रथ ही
वेदी है, ध्वज यूप है और रथकी रस्सियाँ ही बिछे हुए कुशोंका काम देती हैं। मान, दर्प और
अहंकार—ये त्रिविध अग्नियाँ हैं, चाबुक, सुवा है, सारथि उपाध्याय है, स्रुक्-भाण्ड आदि
जो कुछ भी यज्ञकी सामग्री है, उसके स्थानमें उस योद्धाके भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं।
सायकोंको ही समिधा माना गया है ।।
स्वेदस्रवश्च गात्रेभ्यः क्षौद्रं तस्य यशस्विनः ।
पुरोडाशा नृशीर्षाणि रुधिरं चाहुतिः स्मृता ।।
तूणाश्चैव चरुर्ज्ञेया वसोर्धारा वसाः स्मृताः ।।
क्रव्यादा भूतसंघाश्च तस्मिन् यज्ञे द्विजातयः ।
तेषां भक्तान्नपानानि हता नृगजवाजिनः ।।
उस यशस्वी वीरके अंगोंसे जो पसीने ढलते हैं, वे ही मानो मधु हैं। मनुष्योंके मस्तक
पुरोडाश हैं, रुधिर आहुति है, तूणीरोंको चरु समझना चाहिये। वसाको ही वसुधारा माना
गया है, मांसभक्षी भूतोंके समुदाय ही उस यज्ञमें द्विज हैं। मारे गये मनुष्य, हाथी और घोड़े
ही उनके भोजन और अन्नपान हैं ।।
निहतानां तु योधानां वस्त्राभरणभूषणम् ।
हिरण्यं च सुवर्णं च यद् वै यज्ञस्य दक्षिणा ।।
मारे गये योद्धाओंके जो वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण हैं, वे ही मानो उस रणयज्ञकी दक्षिणा हैं ।। यस्तत्र हन्यते देवि गजस्कन्धगतो नरः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति रणेष्वभिमुखो हतः ।। देवि! जो संग्राममें हाथीकी पीठपर बैठा हुआ युद्धके मुहानेपर मारा जाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।। रथमध्यगतो वापि हयपृष्ठगतोऽपि वा । हन्यते यस्तु संग्रामे शक्रलोके महीयते ।। रथके बीचमें बैठा हुआ या घोड़ेकी पीठपर चढ़ा हुआ जो वीर युद्धमें मारा जाता है, वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।। स्वर्गे हताः प्रपूज्यन्ते हन्ता त्वत्रैव पूज्यते । द्वावेतौ सुखमेधेते हन्ता यश्चैव हन्यते ।। मारे गये योद्धा स्वर्गमें पूजित होते हैं; किन्तु मारनेवाला इसी लोकमें प्रशंसित होता है। अतः युद्धमें दोनों ही सुखी होते हैं—जो मारता है वह और जो मारा जाता है वह ।। तस्मात् संग्राममासाद्य प्रहर्तव्यमभीतवत् ।। निर्भयो यस्तु संग्रामे प्रहरेदुद्यतायुधः ।। यथा नदीसहस्राणि प्रविष्टानि महोदधिम् । तथा सर्वे न संदेहो धर्मा धर्मभृतां वरम् ।। अतः संग्रामभूमिमें पहुँच जानेपर निर्भय होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये। जो हथियार उठाकर संग्राममें निर्भय होकर प्रहार करता है, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उस वीरको निस्संदेह सभी धर्म प्राप्त होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें सहस्रों नदियाँ आकर मिलती हैं ।। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः पार्थिवेन विशेषतः ।। धर्म ही, यदि उसका हनन किया जाय तो मारता है और धर्म ही सुरक्षित होनेपर रक्षा करता है; अतः प्रत्येक मनुष्यको, विशेषतः राजाको धर्मका हनन नहीं करना चाहिये ।। प्रजाः पालयते यत्र धर्मेण वसुधाधिपः । षट्कर्मनिरता विप्राः पूज्यन्ते पितृदैवतैः ।। नैव तस्मिन्ननावृष्टिर्न रोगा नाप्युपद्रवाः । धर्मशीलाः प्रजाः सर्वाः स्वधर्मनिरते नृपे ।। जहाँ राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके साथ षट्कर्मपरायण ब्राह्मणोंकी पूजा होती है, उस देशमें न तो कभी अनावृष्टि होती है, न
रोगोंका आक्रमण होता है और न किसी तरहके उपद्रव ही होते हैं। राजाके स्वधर्म-परायण होनेपर वहाँकी सारी प्रजा धर्मशील होती है।। एष्टव्यः सततं देवि युक्ताचारो नराधिपः। छिद्रज्ञश्चैव शत्रूणामप्रमत्तः प्रतापवान् ॥ देवि! प्रजाको सदा ऐसे नरेशकी इच्छा रखनी चाहिये, जो सदाचारी तो हो ही, देशमें सब ओर गुप्तचर नियुक्त करके शत्रुओंके छिद्रोंकी जानकारी रखता हो। सदा ही प्रमादशून्य और प्रतापी हो ।। क्षुद्राः पृथिव्यां बहवो राज्ञां बहुविनाशकाः। तस्मात् प्रमादं सुश्रोणि न कुर्यात् पण्डितो नृपः ॥ सुश्रोणि! पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे क्षुद्र मनुष्य हैं, जो राजाओंका महान् विनाश करनेपर तुले रहते हैं; अतः विद्वान् राजाको कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये (आत्मरक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये)।। तेषु मित्रेषु त्यक्तेषु तथा मर्त्येषु हस्तिषु। विस्रम्भो नोपगन्तव्यः स्नानपानेषु नित्यशः ॥ पहलेके छोड़े हुए मित्रोंपर, अन्यान्य मनुष्योंपर, हाथियोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। प्रतिदिनके स्नान और खानपानमें भी किसीका पूर्णतः विश्वास करना उचित नहीं है।। राज्ञो वल्लभतामेति कुलं भावयते स्वकम् । यस्तु राष्ट्रहितार्थाय गोब्राह्मणकृते तथा ॥ बन्दीग्रहाय मित्रार्थे प्राणांस्त्यजति दुस्त्यजान् ॥ जो राष्ट्रके हितके लिये, गौ और ब्राह्मणोंके उपकारके लिये, किसीको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये और मित्रोंकी सहायताके निमित्त अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग कर देता है, वह राजाको प्रिय होता है और अपने कुलको उन्नतिके शिखरपर पहुँचा देता है ।। सर्वकामदुघां धेनुं धरणीं लोकधारिणीम् । समुद्रान्तां वरारोहे सशैलवनकाननाम् ॥ दद्याद् देवि द्विजातिभ्यो वसुपूर्णां वसुन्धराम् ॥ न तत्समं वरारोहे प्राणत्यागी विशिष्यते ॥ वरारोहे! यदि कोई सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुको तथा पर्वत और वनोंसहित समुद्रपर्यन्त लोकधारिणी पृथ्वीको धनसे परिपूर्ण करके द्विजोंको दान कर देता है, उसका वह दान भी पूर्वोक्त प्राणत्यागी योद्धाके त्यागके समान नहीं है। वह प्राण-त्यागी ही उस दातासे बढ़कर है।। सहस्रमपि यज्ञानां यजते च धनर्द्धिमान् । यज्ञैस्तस्य किमाश्चर्यं प्राणत्यागः सुदुष्करः ॥
जिसके पास धन और सम्पत्ति है, वह सहस्रों यज्ञ कर सकता है। उसके उन यज्ञोंसे कौन-सी आश्चर्यकी बात हो गयी! प्राणोंका परित्याग करना तो सभीके लिये अत्यन्त दुष्कर है ।।
तस्मात् सर्वेषु यज्ञेषु प्राणयज्ञो विशिष्यते ।
एवं संग्रामयज्ञास्ते यथार्थं समुदाहृताः ।।
अतः सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्राणयज्ञ ही बढ़कर है। देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रणयज्ञका यथार्थरूपसे वर्णन किया है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
सम्प्रहासश्च भृत्येषु न कर्तव्यो नराधिपैः ।
लघुत्वं चैव प्राप्नोति आज्ञा चास्य निवर्तते ॥
श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ॥
भृत्यानां सम्प्रहासेन पार्थिवः परिभूयते ।
अयाच्यानि च याचन्ति अवक्तव्यं ब्रुवन्ति च ॥
सेवकोंके साथ हँसी-परिहास करनेसे राजाका तिरस्कार होता है। वे धृष्ट सेवक न माँगने योग्य वस्तुओंको भी माँग बैठते हैं और न कहने योग्य बातें भी कह डालते हैं ॥
पूर्वमप्युचितैर्लाभैः परितोषं न यान्ति ते ।
तस्माद् भृत्येषु नृपतिः सम्प्रहासं विवर्जयेत् ॥
पहलेसे ही उचित लाभ मिलनेपर भी वे संतुष्ट नहीं होते; इसलिये राजा सेवकोंके साथ हँसी-मजाक करना छोड़ दे ॥
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते न च विश्वसेत् ।
सगोत्रेषु विशेषेण सर्वोपायैर्न विश्वसेत् ॥
राजा अविश्वस्त पुरुषपर कभी विश्वास न करे। जो विश्वस्त हो, उसपर भी पूरा विश्वास न करे; विशेषतः अपने समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंपर किसी भी उपायसे कदापि विश्वास न करे ॥
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं हन्याद् वृक्षमिवाशनिः ।
प्रमादाद्धन्यते राजा लोभेन च वशीकृतः ॥
तस्मात् प्रमादं लोभं च न च कुर्यान्न विश्वसेत् ॥
जैसे वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय राजाको नष्ट कर डालता है। प्रमादवश लोभके वशीभूत हुआ राजा मारा जाता है। अतः प्रमाद और लोभको अपने भीतर न आने दे तथा किसीपर भी विश्वास न करे ॥
भयार्तानां भयात् त्राता दीनानुग्रहकारणात् ।
कार्याकार्यविशेषज्ञो नित्यं राष्ट्रहिते रतः ॥
राजा भयातुर मनुष्योंकी भयसे रक्षा करे, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करे, कर्तव्य और अकर्तव्यको विशेषरूपसे समझे और सदा राष्ट्रके हितमें संलग्न रहे ॥
सत्यः संधस्थितो राज्ये प्रजापालनतत्परः ।
अलुब्धो न्यायवादी च षड्भागमुपजीवति ॥
अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे। राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे। लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवन-निर्वाह करे ।।
कार्याकार्यविशेषज्ञः सर्वं धर्मेण पश्यति ।
स्वराष्ट्रेषु दयां कुर्यादकार्ये न प्रवर्तते ।।
कर्तव्य-अकर्तव्यको समझे। सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत्त न हो ।।
ये चैवैनं प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ।
शत्रुं च मित्रवत् पश्येदपराधविवर्जितम् ।।
जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ।।
अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत् ।
धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः ।।
दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे। जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ।।
नाधर्मो विद्यते तत्र यत्र राजाक्षमान्वितः ।।
अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् ।
जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता। अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ।।
वध्यांश्च घातयेद् यस्तु अवध्यान् परिरक्षति ।।
अवध्या ब्राह्मणा गावो दूताश्चैव पिता तथा ।
विद्यां ग्राहयते यश्च ये च पूर्वोपकारिणः ।।
स्त्रियश्चैव न हन्तव्या यश्च सर्वातिथिर्नरः ।।
राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य—ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।
धरणीं गां हिरण्यं च सिद्धान्नं च तिलान् घृतम् ।
ददन्नित्यं द्विजातिभ्यो मुच्यते राजकिल्बिषात् ।।
पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धान्न, तिल और घी—इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ।।
एवं चरति यो नित्यं राजा राष्ट्रहिते रतः ।
तस्य राष्ट्रं धनं धर्मो यशः कीर्तिश्च वर्धते ।।
जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ॥ न च पापैर्न चानर्थैर्युज्यते स नराधिपः ॥ षड्भागमुपयुञ्जन् यः प्रजा राजा न रक्षति ॥ स्वचक्रपरचक्राभ्यां धर्मैर्वा विक्रमेण वा । निरुद्योगो नृपो यश्च परराष्ट्रविघातने ॥ स्वराष्ट्रं निष्प्रतापस्य परचक्रेण हन्यते ॥ ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता। जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र (अपनी मण्डलीके लोगों) तथा परचक्र (शत्रुमण्डलीके लोगों)-से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ यत् पापं परचक्रस्य परराष्ट्राभिघातने । तत् पापं सकलं राजा हतराष्ट्रः प्रपद्यते ॥ दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ मातुलं भागिनेयं वा मातरं श्वशुरं गुरुम् । पितरं वर्जयित्वैकं हन्याद् घातकमागतम् ॥ मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता—इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे (आततायी समझकर) मार डालना चाहिये ॥ स्वस्य राष्ट्रस्य रक्षार्थं युध्यमानस्तु यो हतः । संग्रामे परचक्रेण श्रूयतां तस्य या गतिः ॥ जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ॥ विमाने तु वरारोहे अप्सरोगणसेविते । शक्रलोकमितो याति संग्रामे निहतो नृपः ॥ वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युस्तस्य गात्रेषु सुन्दरि । तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥
सुन्दरि! उसके अंगोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।
यदि वै मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते ।
राजा वा राजमात्रो वा भूयो भवति वीर्यवान् ।।
यदि कदाचित् वह फिर मनुष्यलोकमें आता है तो पुनः राजा या राजाके तुल्य ही शक्तिशाली पुरुष होता है ।।
तस्माद् यत्नेन कर्तव्यं स्वराष्ट्रपरिपालनम् ।
व्यवहाराश्च चारश्च सततं सत्यसंधता ।।
अप्रमादः प्रमोदश्च व्यवसायेऽप्यचण्डता ।
भरणं चैव भृत्यानां वाहनानां च पोषणम् ।।
योधानां चैव सत्कारः कृते कर्मण्यमोघता ।
श्रेय एव नरेन्द्राणामिह चैव परत्र च ।।
इसलिये राजाको यत्नपूर्वक अपने राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये। राजोचित व्यवहारोंका पालन, गुप्तचरोंकी नियुक्ति, सदा सत्यप्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, व्यवसायमें अत्यन्त कुपित न होना, भृत्यवर्गका भरण और वाहनोंका पोषण करना, योद्धाओंका सत्कार करना और किये हुए कार्यमें सफलता लाना—यह सब राजाओंका कर्तव्य है। ऐसा करनेसे उन्हें इहलोक और परलोकमें भी श्रेयकी प्राप्ति होती है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥
[अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता]
उमोवाच
देवदेव महादेव सर्वदेवनमस्कृत ।
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥
उमाने कहा— सर्वदेववन्दित देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्मके रहस्योंको सुनना चाहती हूँ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
अहिंसा परमो धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम् ।
अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंमें अहिंसाको परमपद बताया गया है ॥
देवतातिथिशुश्रूषा सततं धर्मशीलता ।
वेदाध्ययनयज्ञांश्च तपो दानं दमस्तथा ॥
आचार्यगुरुशुश्रूषा तीर्थाभिगमनं तथा ।
अहिंसाया वरारोहे कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
एतत् ते परमं गुह्यमाख्यातं परमार्चितम् ॥
वरारोहे! देवताओं और अतिथियोंकी सेवा, निरन्तर धर्मशीलता, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान, दम, गुरु और आचार्यकी सेवा तथा तीर्थोंकी यात्रा—ये सब अहिंसा-धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। यह मैंने तुम्हें धर्मका परम गुह्य रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है ॥
निरुणद्धीन्द्रियाण्येव स सुखी स विचक्षणः ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन दानेन च दमेन च ।
नरः सर्वमवाप्नोति मनसा यद् यदिच्छति ॥
जो अपनी इन्द्रियोंका निरोध करता है, वही सुखी है और वही विद्वान् है। इन्द्रियोंके निरोधसे, दानसे और इन्द्रिय-संयमसे मनुष्य मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब पा लेता है ॥
यतो यतो महाभागे हिंसा स्यान्महती ततः ।
निवृत्तो मधुमांसाभ्यां हिंसा त्वल्पतरा भवेत् ॥
महाभागे! जिस-जिस ओरसे भारी हिंसाकी सम्भावना हो, उससे तथा मद्य और मांससे मनुष्यको निवृत्त हो जाना चाहिये। इससे हिंसाकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है ॥
निवृत्तिः परमो धर्मो निवृत्तिः परमं सुखम् ।
मनसा विनिवृत्तानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ।। मनःपूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशयः । मनसा बध्यते चापि मुच्यते चापि मानवः ॥ निगृहीते भवेत् स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुवः । इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है। यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।। जीवाः पुराकृतेनैव तिर्यग्योनिसरीसृपाः । नानायोनिषु जायन्ते स्वकर्मपरिवेष्टिताः ॥ जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु-पक्षी एवं कीट आदि होते हैं। अपने-अपने कर्मोंसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ।। जायमानस्य जीवस्य मृत्युः पूर्वं प्रजायते । सुखं वा यदि वा दुःखं यथापूर्वं कृतं तु वा ॥ जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है। मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दुःख प्राप्त होता है ।। अप्रमत्तः प्रमत्तेषु विधिर्जागर्ति जन्तुषु । न हि तस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो न च मध्यमः ॥ प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जायँ, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य—सावधान होकर सदा जागता रहता है। उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ।। समः सर्वेषु भूतेषु कालः कालं निरीक्षते । गतायुषो ह्याक्षिपते जीवः सर्वस्य देहिनः ॥ काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है। वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है। जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है। वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा ।
इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्पकला और अभिनय-कला—ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं॥
विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते ।
कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं॥
विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात् तत्त्वविदर्शनम् ।
दृष्टतत्त्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोंका भाजन हो जाता है॥
शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम् ॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम् ।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् ॥
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे॥
भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥
कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् ।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले॥
यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेतधात्मनः ॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा ।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यासद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे॥
एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः ।