महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विषधर सर्पोंके समान उन कठोर बाणोंको अपनी ओर आते देख अर्जुनने तीखे सायकोंद्वारा उन सबको बीचसे काट डाला ।। १४ १/२ ।।
छित्त्वा तु तानाशु चैव कङ्कपत्राञ् शिलाशितान् ।। १५ ।।
एकैकमेषां समरे बिभेद निशितैः शरैः ।
सानपर चढ़ाकर तेज किये गये उन कंकपत्रयुक्त बाणोंके तुरन्त ही टुकड़े-टुकड़े करके समरांगणमें अर्जुनने सैन्धव वीरोंमेंसे प्रत्येकको पैने बाण मारकर घायल कर दिया ।। १५ १/२ ।।
ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनंजयम् ।। १६ ।।
जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपुः सैन्धवा नृपाः ।
तदनन्तर जयद्रथ-वधका स्मरण करके सैन्धवोंने अर्जुनपर पुनः बहुत-से प्रासों और शक्तियोंका प्रहार किया ।। १६ १/२ ।।
तेषां किरीटी संकल्पं मोघं चक्रे महाबलः ।। १७ ।।
सर्वांस्तानन्तराच्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डवः ।
परंतु महाबली किरीटधारी पाण्डुकुमार अर्जुनने उनका सारा मनसूबा व्यर्थ कर दिया। उन्होंने उन सभी प्रासों और शक्तियोंको बीचसे ही काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ।। १७ १/२ ।।
तथैवापततां तेषां योधानां जयगृद्धिनाम् ।। १८ ।।
शिरांसि पातयामास भल्लैः संनतपर्वभिः ।
साथ ही विजयकी अभिलाषा लेकर आक्रमण करनेवाले उन सैन्धव योद्धाओंके मस्तकोंको वे झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगे ।। १८ १/२ ।।
तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम् ।। १९ ।।
निवर्ततां च शब्दोऽभूत् पूर्णस्येव महोदधेः ।
उनमेंसे कुछ लोग भागने लगे, कुछ लोग फिरसे धावा करने लगे और कुछ लोग युद्धसे निवृत्त होने लगे। उन सबका कोलाहल जलसे भरे हुए महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान हो रहा था ।। १९ १/२ ।।
ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा ।। २० ।।
यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुरर्जुनम् ।
अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा मारे जानेपर भी सैन्धव योद्धा बल और उत्साहपूर्वक उनके साथ जूझते ही रहे ।। २० १/२ ।।
ततस्ते फाल्गुनेनाजौ शरैः संनतपर्वभिः ।। २१ ।।
कृता विसंज्ञा भूयिष्ठाः क्लान्तवाहनसैनिकाः ।
थोड़ी ही देरमें अर्जुनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा अधिकांश सैन्धव वीरोंको संज्ञाशून्य कर दिया। उनके वाहन और सैनिक भी थकावटसे खिन्न हो रहे थे ॥ २१ १/२ ॥
तांस्तु सर्वान् परिग्लानान् विदित्वा धृतराष्ट्रजा ॥ २२ ॥
दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा ।
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनाथागमत् तदा ॥ २३ ॥
शान्त्यर्थं सर्वयोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् ।
समस्त सैन्धव वीरोंको कष्ट पाते जान धृतराष्ट्रकी पुत्री दुःशला अपने बेटे सुरथके वीर बालकको जो उसका पौत्र था, साथ ले रथपर सवार हो रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आयी। उसके आनेका उद्देश्य यह था कि सब योद्धा युद्ध छोड़कर शान्त हो जायँ ॥ २२-२३ १/२ ॥
सा धनंजयमासाद्य रुरोदार्तस्वरं तदा ॥ २४ ॥
धनंजयोऽपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः ।
वह अर्जुनके पास आकर आर्तस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगी। शक्तिशाली अर्जुनने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया ॥ २४ १/२ ॥
समुत्सृज्य धनुः पार्थो विधिवद् भगिनीं तदा ॥ २५ ॥
प्राह किं करवाणीति सा च तं प्रत्युवाच ह ।
धनुष त्यागकर कुन्तीकुमारने विधिपूर्वक बहिनका सत्कार किया और पूछा—'बहिन! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?' तब दुःशलाने उत्तर दिया— ॥
एष ते भरतश्रेष्ठ स्वस्रीयस्यात्मजः शिशुः ॥ २६ ॥
अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ ।
‘भैया! भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथका औरस पुत्र है। पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें प्रणाम करता है’ ।। २६ १/२ ।।
इत्युक्तस्तस्य पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा ।। २७ ।।
क्वासाविति ततो राजन् दुःशला वाक्यमब्रवीत् ।
राजन्! दुःशलाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उस बालकके पिताके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा—‘बहिन! सुरथ कहाँ है?’ तब दुःशला बोली— ।। २७ १/२ ।।
पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता ।। २८ ।।
पञ्चत्वमगमद् वीरो यथा तन्मे निशामय ।
‘भैया! इस बालकका पिता वीर सुरथ पितृशोकसे संतप्त और विषादसे पीड़ित हो जिस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो ।। २८ १/२ ।।
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयानघ ।। २९ ।।
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् ।
पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात् प्राणान् धनंजय ।। ३० ।।
‘निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथने पहलेसे सुन रखा था कि अर्जुनके हाथसे ही मेरे पिताकी मृत्यु हुई है। इसके बाद जब उसके कानोंमें यह समाचार पड़ा है कि तुम घोड़ेके
पीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ।। २९-३० ।।
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ ।
विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ।। ३१ ।।
‘अनघ! ‘अर्जुन आये’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ।। ३१ ।।
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो ।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ।। ३२ ।।
‘प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ’ ।। ३२ ।।
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा ।
दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ।। ३३ ।।
ऐसा कहकर धृतराष्ट्र-पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी। उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे। उस समय दुःशला उनसे फिर बोली— ।। ३३ ।।
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्त्रीयात्मजमेव च ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ।। ३४ ।।
‘भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो। अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ।। ३४ ।।
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ।
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ।। ३५ ।।
तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः ।
‘मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ।। ३५ १/२ ।।
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ।। ३६ ।।
शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम ।
‘पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ।। ३६ १/२ ।।
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ।। ३७ ।।
प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि ।
‘महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ।। ३७ १/२ ।।
एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम ।। ३८ ।।
याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय ।
‘शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके तुमसे शान्तिके लिये याचना करता है। अब तुम शान्त हो जाओ ।। ३८ १/२ ।।
बालस्य हतबन्धोश्च पार्थ किंचिदजानतः ।। ३९ ।।
प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः ।
‘यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता है। इसके भाई-बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः धर्मज्ञ अर्जुन! तुम इसके ऊपर कृपा करो। क्रोधके वशीभूत न होओ ।। ३९ १/२ ।।
तमनार्यं नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम् ।। ४० ।।
आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
‘इस बालकका पितामह (जयद्रथ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था। उसको भूल जाओ और इस बालकपर कृपा करो’ ।। ४० १/२ ।।
एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजयः ।। ४१ ।।
संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् ।
उवाच दुःखशोकार्तः क्षत्रधर्मं व्यगर्हयत् ।। ४२ ।।
जब दुःशला इस प्रकार करुणायुक्त वचन कहने लगी, तब अर्जुन राजा धृतराष्ट्र और गान्धारी देवीको याद करके दुःख और शोकसे पीड़ित हो क्षत्रिय-धर्मकी निन्दा करने लगे — ।। ४१-४२ ।।
यस्कृते बान्धवाः सर्वे मया नीता यमक्षयम् ।
इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादिप्रसादमकरोज्जयः ।। ४३ ।।
परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान् प्रति ।। ४४ ।।
‘उस क्षात्र-धर्मको धिक्कार है, जिसके लिये मैंने अपने सारे बान्धवजनोंको यमलोक पहुँचा दिया।’ ऐसा कहकर अर्जुनने दुःशलाको बहुत सान्त्वना दी और उसके प्रति अपने कृपाप्रसादका परिचय दिया। फिर प्रसन्नतापूर्वक उससे गले मिलकर उसे घरकी ओर विदा किया ।। ४३-४४ ।।
दुःशला चापि तान् योधान् निवार्य महतो रणात् ।
सम्पूज्य पार्थं प्रययौ गृहानेव शुभानना ।। ४५ ।।
तदनन्तर सुमुखी दुःशलाने उस महान् समरसे अपने समस्त योद्धाओंको पीछे लौटाया और अर्जुनकी प्रशंसा करती हुई वह अपने घरको लौट गयी ।। ४५ ।।
एवं निर्जित्य तान् वीरान् सैन्धवान् स धनंजयः ।
अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम् ।। ४६ ।।
इस प्रकार सैन्धव वीरोंको परास्त करके अर्जुन इच्छानुसार विचरने और दौड़नेवाले उस घोड़ेके पीछे-पीछे स्वयं भी दौड़ने लगे ।। ४६ ।।
ततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् ।
ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥
जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् ।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥
वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥
क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ ।
मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४९ ॥
पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1973)
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्तं पितरं बभ्रुवाहनः ।
निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्मणार्थपुरःसरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत-सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥
मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयः ।
नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ २ ॥
मणिपुर-नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया ॥ २ ॥
उवाच च स धर्मात्मा समन्युः फाल्गुनस्तदा ।
प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ॥ ३ ॥
उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले—'बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है। जान पड़ता है, तू क्षत्रिय-धर्मसे बहिष्कृत हो गया है ॥ ३ ॥
संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् ।
यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सीः किं नु पुत्रक ॥ ४ ॥
'पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ। फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता? ॥ ४ ॥
धिक् त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् ।
यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्णथाः ॥ ५ ॥
'तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत-सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ॥
न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता ।
यस्त्वं स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्णथाः ॥ ६ ॥
'तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया। तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है ॥ ६ ॥
यद्यहं न्यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते ।
प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम ॥ ७ ॥
‘दुर्बुद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था’ ।। ७ ।।
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा ।
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ।। ८ ।।
पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी ।। ८ ।।
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् ।
संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो ।। ९ ।।
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपेत्योरगात्मजा ।
उलूपी प्राह वचनं धर्म्यं धर्मविशारदम् ।। १० ।।
प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली— ।। ९-१० ।।
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् ।
कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ।। ११ ।।
‘बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी’ ।। ११ ।।
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं पितरं युद्धदुर्मदम् ।
एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ।। १२ ।।
‘तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है’ ।। १२ ।।
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः ।
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ।। १३ ।।
भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया ।। १३ ।।
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् ।
तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम् ।। १४ ।।
सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ।। १४ ।।
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम् ।। १५ ।।
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् ।
प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहनः ॥ १६ ॥
उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ १५-१६ ॥
ततोऽभ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् ।
ग्राहयामास पुरुषैर्हयशिक्षाविशारदैः ॥ १७ ॥
पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया ॥ १७ ॥
गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनंजयः ।
पुत्रं रथस्थं भूमिष्ठः संन्यवारयदाहवे ॥ १८ ॥
घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ १८ ॥
स तत्र राजा तं वीरं शरसंघैरनेकशः ।
अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमैः ॥ १९ ॥
राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया ॥ १९ ॥
तयोः समभवद् युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् ।
देवासुररणप्रख्यमुभयोः प्रीयमाणयोः ॥ २० ॥
वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे। उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उसकी इस जगत्में कहीं भी तुलना नहीं थी ॥ २० ॥
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा ।
जत्रुदेशे नरव्याघ्रं प्रहसन् बभ्रुवाहनः ॥ २१ ॥
बभ्रुवाहनने हँसते-हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥
सोऽभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ।
विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम् ॥ २२ ॥
जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथिवीमें समा गया ॥ २२ ॥
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् ।
दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सोऽभवत् ॥ २३ ॥
इससे अर्जुनको बड़ी वेदना हुई। बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुषका सहारा लेकर दिव्य तेजमें स्थित हो मुर्देके समान हो गये ॥ २३ ॥
स संज्ञांमुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभः ।
पुत्रं शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युतिः ॥ २४ ॥
थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महातेजस्वी पुरुषप्रवर इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पुत्रकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २४ ॥
साधु साधु महाबाहो वत्स चित्राङ्गदात्मज ।
सदृशं कर्म ते दृष्ट्वा प्रीतिमानस्मि पुत्रक ॥ २५ ॥
‘महाबाहु चित्रांगदाकुमार! तुम्हें साधुवाद। वत्स! तुम धन्य हो। पुत्र! तुम्हारे योग्य पराक्रम देखकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २५ ॥
विमुञ्चाम्येष ते बाणान् पुत्र युद्धे स्थिरो भव ।
इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा ॥ २६ ॥
‘अच्छा बेटा! अब मैं तुमपर बाण छोड़ता हूँ। तुम सावधान एवं स्थिर हो जाओ।’ ऐसा कहकर शत्रुसूदन अर्जुनने बभ्रुवाहनपर नाराचोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २६ ॥
तान् स गाण्डीवनिर्मुक्तान् वज्राशनिसमप्रभान् ।
नाराचानच्छिनद् राजा भल्लैःसर्वांस्त्रिधा द्विधा ॥ २७ ॥
परंतु राजा बभ्रुवाहनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वज्र और बिजलीके समान तेजस्वी उन समस्त नाराचोंको अपने भल्लोंद्वारा मारकर प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर दिये ॥ २७ ॥
तस्य पार्थः शरैर्दिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् ।
सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद् रथात् ॥ २८ ॥
हयांश्चास्य महाकायान् महावेगानरिंदम ।
चकार राजन् निर्जीवान् प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ २९ ॥
राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये ॥ २८-२९ ॥
स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपनः ।
पदातिः पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम् ॥ ३० ॥
तब रथसे उतरकर परम क्रोधी राजा बभ्रुवाहन कुपित हो पैदल ही अपने पिता पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ ३० ॥
सम्प्रीयमाणः पार्थानामृषभः पुत्रविक्रमात् ।
नात्यर्थं पीडयामास पुत्रं वज्रधरात्मजः ॥ ३१ ॥
कुन्तीपुत्रोंमें श्रेष्ठ इन्द्रकुमार अर्जुन अपने बेटेके पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हुए थे। इसलिये वे उसे अधिक पीड़ा नहीं देते थे ।। ३१ ।।
स मन्यमानो विमुखं पितरं बभ्रुवाहनः ।
शरैराशीविषाकारैः पुनरेवार्दयद् बली ।। ३२ ।।
बलवान् बभ्रुवाहन पिताको युद्धसे विरत मानकर विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंद्वारा उन्हें पुनः पीड़ा देने लगा ।। ३२ ।।
ततः स बाल्यात् पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा ।
निशितेन सुपुङ्खेन बलवद् बभ्रुवाहनः ।। ३३ ।।
उसने बालोचित अविवेकके कारण परिणामपर विचार किये बिना ही सुन्दर पाँखवाले एक तीखे बाणद्वारा पिताकी छातीमें एक गहरा आघात किया ।। ३३ ।।
विवेश पाण्डवं राजन् मर्म भित्त्वातिदुःखकृत् ।
स तेनातिभृशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दनः ।। ३४ ।।
महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन् धनंजयः ।
राजन्! वह अत्यन्त दुःखदायी बाण पाण्डुपुत्र अर्जुनके मर्म-स्थलको विदीर्ण करके भीतर घुस गया। महाराज! पुत्रके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर कुरुनन्दन अर्जुन मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ।।
तस्मिन् निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे ।। ३५ ।।
सोऽपि मोहं जगामाथ ततश्चित्राङ्गदासुतः ।
कौरव-धुरंधर वीर अर्जुनके धराशायी होनेपर चित्रांगदाकुमार बभ्रुवाहन भी मूर्च्छित हो गया ।। ३५ ½ ।।
व्यायम्य संयुगे राजा दृष्ट्वा च पितरं हतम् ।। ३६ ।।
पूर्वमेव स बाणौघैर्गाढविद्धोऽर्जुनेन ह ।
पपात सोऽपि धरणीमालिङ्ग्य रणमूर्धनि ।। ३७ ।।
राजा बभ्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अतः पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा ।। ३६-३७ ।।
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि ।
चित्राङ्गदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे ।। ३८ ।।
पतिदेव मारे गये और पुत्र भी संज्ञाशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह देख चित्रांगदाने संतप्त हृदयसे समरांगणमें प्रवेश किया ।। ३८ ।।
शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् ।
मणिपूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम् ।। ३९ ।।
मणिपुर-नरेशकी माताका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा था! रोती और काँपती हुई चित्रांगदाने देखा कि पतिदेव मारे गये ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनबभ्रुवाहनयुद्धे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्धविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1979)
अशीतितमोऽध्यायः
चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना
वैशम्पायन उवाच
ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा ।
मुमोह दुःखसंतप्ता पपात च महीतले ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भीरु स्वभाववाली कमलनयनी चित्रांगदा पतिवियोग-दुःखसे संतप्त होकर बहुत विलाप करती हुई मूर्च्छित हो गयी और पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा ।
उलूपीं पन्नगसुतां दृष्ट्वेदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
कुछ देर बाद होशमें आनेपर दिव्यरूपधारिणी देवी चित्रांगदाने नागकन्या उलूपीको सामने खड़ी देख इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥ उलूपि पश्य भर्तारं शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम् ॥ ३ ॥ 'उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है ॥ ३ ॥ ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता । यत्त्वत्कृतेऽयं पतितः पतिस्ते निहतो रणे ॥ ४ ॥ 'बहिन! तुम तो आर्यधर्मको जाननेवाली और पतिव्रता हो। तथापि तुम्हारी ही करतूतसे ये तुम्हारे पति इस समय रणभूमिमें मरे पड़े हैं ॥ ४ ॥ किंतु सर्वापराधोऽयं यदि तेऽद्य धनंजयः । क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम् ॥ ५ ॥ 'किंतु यदि ये अर्जुन सर्वथा तुम्हारे अपराधी हों तो भी आज क्षमा कर दो। मैं तुमसे इनके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। तुम धनंजयको जीवित कर दो ॥ ५ ॥ ननु त्वमार्ये धर्मज्ञा त्रैलोक्यविदिता शुभे । यद् घातयित्वा पुत्रेण भर्तारं नानुशोचसि ॥ ६ ॥ 'आर्ये! शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली और तीनों लोकोंमें विख्यात हो। तो भी आज पुत्रसे पतिकी हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है? ॥ ६ ॥ नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि । पतिमेव तु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम् ॥ ७ ॥ 'नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती। मुझे केवल पतिके लिये शोक हो रहा है, जिनका मेरे यहाँ इस तरह आतिथ्य-सत्कार किया गया' ॥ ७ ॥ इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् । भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी ॥ ८ ॥ नागकन्या उलूपीदेवीसे ऐसा कहकर यशस्विनी चित्राङ्गदा उस समय पतिके निकट गयी और उन्हें सम्बोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी— ॥ ८ ॥ उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय । अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षितः ॥ ९ ॥ 'कुरुराजके प्रियतम और मेरे प्राणाधार! उठो। महाबाहो! मैंने तुम्हारा यह घोड़ा छुड़वा दिया है ॥ ९ ॥ ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञियः ।
अयमश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले ॥ १० ॥
‘प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वके पीछे-पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो? ॥ १० ॥
त्वयि प्राणा ममायत्ताः कुरूणां कुरुनन्दन ।
स कस्मात् प्राणदोऽन्येषां प्राणात् संत्यक्तवानसि ॥ ११ ॥
‘कुरुनन्दन! मेरे और कौरवोंके प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। तुम तो दूसरोंके प्राणदाता हो, तुमने स्वयं कैसे प्राण त्याग दिये?’ ॥ ११ ॥
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि ।
पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि ॥ १२ ॥
(इतना कहकर वह फिर उलूपीसे बोली—) ‘उलूपी! ये पतिदेव भूतलपर पड़े हैं। तुम इन्हें अच्छी तरह देख लो। तुमने इस बेटेको उकसाकर स्वामीकी हत्या करायी है। क्या इसके लिये तुम्हें शोक नहीं होता? ॥ १२ ॥
कामं स्वपितु बालोऽयं भूमौ मृत्युवशं गतः ।
लोहिताक्षो गुडाकेशो विजयः साधु जीवतु ॥ १३ ॥
‘मृत्युके वशमें पड़ा हुआ मेरा यह बालक चाहे सदाके लिये भूमिपर सोता रह जाय, किंतु निद्राके स्वामी, विजय पानेवाले अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित हों—यही उत्तम है ॥ १३ ॥
नापराधोऽस्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता ।
प्रमदानां भवत्येष मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ १४ ॥
‘सुभगे! कोई पुरुष बहुत-सी स्त्रियोंको पत्नी बनाकर रखे, तो उनके लिये यह अपराध या दोषकी बात नहीं होती। स्त्रियाँ यदि ऐसा करें (अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखें) तो यह उनके लिये अवश्य दोष या पापकी बात होती है। अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्रूर नहीं होनी चाहिये ॥ १४ ॥
सख्यं चैतत् कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु ।
सख्यं समभिजानीहि सत्यं सङ्गतमस्तु ते ॥ १५ ॥
‘विधाताने पति और पत्नीकी मित्रता सदा रहनेवाली और अटूट बनायी है। (तुम्हारा भी इनके साथ वही सम्बन्ध है।) इस सख्यभावके महत्त्वको समझो और ऐसा उपाय करो जिससे तुम्हारी इनके साथ की हुई मैत्री सत्य एवं सार्थक हो ॥ १५ ॥
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेऽद्य वै ।
जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १६ ॥
‘तुम्हींने बेटेको लड़ाकर उसके द्वारा इन पतिदेवकी हत्या करवायी है। यह सब करके यदि आज तुम पुनः इन्हें जीवित करके न दिखा दोगी तो मैं भी प्राण त्याग दूँगी ॥ १६ ॥
साहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता ।
इहैव प्रायमाशिष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशयः ॥ १७ ॥
‘देवि! मैं पति और पुत्र दोनोंसे वञ्चित होकर दुःखमें डूब गयी हूँ। अतः अब यहीं तुम्हारे देखते-देखते मैं आमरण उपवास करूँगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ १७ ॥
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नी चैत्रवाहनी ।
ततः प्रायमुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप ॥ १८ ॥
नरेश्वर! नागकन्यासे ऐसा कहकर उसकी सौत चित्रवाहनकुमारी चित्रांगदा आमरण उपवासका संकल्प लेकर चुपचाप बैठ गयी ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो विलप्य विरता भर्तुः पादौ प्रगृह्य सा ।
उपविष्टाभवद् दीना सोच्छ्वासं पुत्रमीक्षती ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर विलाप करके उससे विरत हो चित्रांगदा अपने पतिके दोनों चरण पकड़कर दीनभावसे बैठ गयी और लंबी साँस खींच-खींचकर अपने पुत्रकी ओर भी देखने लगी ॥ १९ ॥
ततः संज्ञां पुनर्लब्ध्वा स राजा बभ्रुवाहनः ।
मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाब्रवीत् ॥ २० ॥
थोड़ी ही देरमें राजा बभ्रुवाहनको पुनः चेत हुआ। वह अपनी माताको रणभूमिमें बैठी देख इस प्रकार विलाप करने लगा— ॥ २० ॥
इतो दुःखतरं किं नु यन्मे माता सुखैधिता ।
भूमौ निपतितं वीरमनुशेते मृतं पतिम् ॥ २१ ॥
‘हाय! जो अबतक सुखोंमें पली थी, वही मेरी माता चित्रांगदा आज मृत्युके अधीन होकर पृथ्वीपर पड़े हुए अपने वीर पतिके साथ मरनेका निश्चय करके बैठी हुई है। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ २१ ॥
निहन्तारं रणेऽरीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
मया विनिहतं संख्ये प्रेक्षते दुर्मरं बत ॥ २२ ॥
‘संग्राममें जिनका वध करना दूसरेके लिये नितान्त कठिन है, जो युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन्हीं मेरे पिता अर्जुनको आज यह मेरे ही हाथों मरकर पड़ा देख रही है ॥ २२ ॥
अहोऽस्या हृदयं देव्या दृढं यन्न विदीर्यते ।
व्यूढोरस्कं महाबाहुं प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम् । २३ ।।
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये ह्यध्वन्यनागते ।
‘चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले अपने पतिको मारा गया देखकर भी जो मेरी माता चित्रांगदा देवीका दृढ़ हृदय विदीर्ण नहीं हो जाता है। इससे मैं यह मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना मनुष्यका मरना बहुत कठिन है॥ २३१/२॥ यत्र नाहं न मे माता विप्रयुज्येत जीवितात्॥ २४॥ हा हा धिक् कुरुवीरस्य संनाहं काञ्चनं भुवि। अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत॥ २५॥ ‘तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिक्कार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है’॥ २४-२५॥ भो भो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि। शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम्॥ २६॥ ‘हे ब्राह्मणो! देखो, मुझ पुत्रके द्वारा मार गिराये गये मेरे वीर पिता अर्जुन वीरशय्यापर सो रहे हैं॥ २६॥ ब्राह्मणाः कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता हयसारिणः। कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे योऽयं मया हतः॥ २७॥ ‘कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके घोड़ेके पीछे-पीछे चलनेवाले जो ब्राह्मणलोग शान्तिकर्म करनेके लिये नियुक्त हुए हैं, वे इनके लिये कौन-सी शान्ति करते थे, जो ये रणभूमिमें मेरेद्वारा मार डाले गये!॥ २७॥ व्यादिशन्तु च किं विप्राः प्रायश्चित्तमिहाद्य मे। सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे॥ २८॥ ‘ब्राह्मणो! मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और समरांगणमें पिताकी हत्या करनेवाला हूँ। बताइये, मेरे लिये अब यहाँ कौन-सा प्रायश्चित्त है?॥ २८॥ दुश्चरा द्वादशसमा हत्वा पितरमद्य वै। ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा॥ २९॥ शिरःकपाले चास्यैव युज्जतः पितुरद्य मे। प्रायश्चित्तं हि नास्त्यन्यद्धत्वाद्य पितरं मम॥ ३०॥ ‘आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोंतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्चित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोंतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है॥ २९-३०॥ पश्य नागोत्तमसुते भर्तारं निहतं मया। कृतं प्रियं मया तेऽद्य निहत्य समरेऽर्जुनम्॥ ३१॥
‘नागराजकुमारी! देखो, युद्धमें मैंने तुम्हारे स्वामीका वध किया है। सम्भव है आज समरांगणमें इस तरह अर्जुनकी हत्या करके मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो ।। ३१ ।।
सोऽहमद्य गमिष्यामि गतिं पितृनिषेविताम् ।
न शक्नोम्यात्मनाऽऽत्मानमहं धारयितुं शुभे ॥ ३२ ॥
‘परंतु शुभे! अब मैं इस शरीरको धारण नहीं कर सकता। आज मैं भी उस मार्गपर जाऊँगा, जहाँ मेरे पिताजी गये हैं ।। ३२ ।।
सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि ।
भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे ॥ ३३ ॥
‘मातः! देवि! मेरे तथा गाण्डीवधारी अर्जुनके मर जानेपर तुम भलीभाँति प्रसन्न होना। मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पिताजीके बिना मेरा जीवन असम्भव है’ ।। ३३ ।।
इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहतः ।
उपस्पृश्य महाराज दुःखाद् वचनमब्रवीत् ॥ ३४ ॥
महाराज! ऐसा कहकर दुःख और शोकसे पीड़ित हुए राजा बभ्रुवाहनने आचमन किया और बड़े दुःखसे इस प्रकार कहा— ।। ३४ ।।
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे ॥ ३५ ॥
‘संसारके समस्त चराचर प्राणियो! आप मेरी बात सुनें। नागराजकुमारी माता उलूपी! तुम भी सुन लो। मैं सच्ची बात बता रहा हूँ ।। ३५ ।।
यदि नोत्तिष्ठति जयः पिता मे नरसत्तमः ।
अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम् ॥ ३६ ॥
‘यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ अर्जुन आज जीवित हो पुनः उठकर खड़े नहीं हो जाते तो मैं इस रणभूमिमें ही उपवास करके अपने शरीरको सुखा डालूँगा ।। ३६ ।।
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् ।
नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दितः ॥ ३७ ॥
‘पिताकी हत्या करके मेरे लिये कहीं कोई उद्धारका उपाय नहीं है। गुरुजन (पिता)-के वधरूपी पापसे पीड़ित हो मैं निश्चय ही नरकमें पडूँगा’ ।। ३७ ।।
वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते ।
पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम ॥ ३८ ॥
‘किसी एक वीर क्षत्रियका वध करके विजेता वीर सौ गोदान करनेसे उस पापसे छुटकारा पाता है; परंतु पिताकी हत्या करके इस प्रकार उस पापसे छुटकारा मिल जाय, यह मेरे लिये सर्वथा दुर्लभ है ।। ३८ ।।
एष एको महातेजाः पाण्डुपुत्रो धनंजयः ।
पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृतिः कुतः ॥ ३९ ॥
'ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय वीर, महान् तेजस्वी, धर्मात्मा तथा मेरे पिता थे। इनका वध करके मैंने महान् पाप किया है। अब मेरा उद्धार कैसे हो सकता है?' ।। ३९ ।। इत्येवमुक्त्वा नृपते धनंजयसुतो नृपः । उपस्पृश्याभवत् तूष्णीं प्रायोपेतो महामतिः ॥ ४० ॥ नरेश्वर! ऐसा कहकर धनंजयकुमार परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन पुनः आचमन करके आमरण उपवासका व्रत लेकर चुपचाप बैठ गया ।। ४० ।।
वैशम्पायन उवाच
प्रायोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा । पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप ॥ ४१ ॥ उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् । स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम् ॥ ४२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपूरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी ।। ४१-४२ ।।
तं गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपतेः सुता । मनःप्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत् ॥ ४३ ॥ कुरुनन्दन! उस मणिको लेकर नागराजकुमारी उलूपी सैनिकोंके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली बात बोली— ।। ४३ ।।
उत्तिष्ठ मा शुचः पुत्र नैव विष्णुस्त्वया जितः । अजेयः पुरुषैरेष तथा देवैः सवासवैः ॥ ४४ ॥ 'बेटा बभ्रुवाहन! उठो, शोक न करो! ये अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं। ये तो सभी मनुष्यों और इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हैं ।। ४४ ।।
मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता । प्रियार्थं पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेऽद्य यशस्विनः ॥ ४५ ॥ 'यह तो मैंने आज तुम्हारे यशस्वी पिता पुरुषप्रवर धनंजयका प्रिय करनेके लिये मोहनी माया दिखलायी है ।। ४५ ।।
जिज्ञासुर्ह्येष पुत्रस्य बलस्य तव कौरवः । संग्रामे युद्ध्यतो राजन्नागतः परवीरहा ॥ ४६ ॥ तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदितः । मा पापमात्मनः पुत्र शङ्केथा ह्यण्वपि प्रभो ॥ ४७ ॥
'राजन्! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकुलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो ।। ४६-४७ ।।
ऋषिरेष महानात्मा पुराणः शाश्वतोऽक्षरः ।
नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ।। ४८ ।।
'ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं। बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते ।। ४८ ।।
अयं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशाम्पते ।
मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रान् यो जीवयति नित्यदा ।। ४९ ।।
एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितुः प्रभो ।
संजीवितं तदा पार्थं स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम् ।। ५० ।।
'प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे' ।। ४९-५० ।।
इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मणिं तदा ।
पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ।। ५१ ।।
उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी ।। ५१ ।।
तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः ।
चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ।। ५२ ।।
उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे ।। ५२ ।।
तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् ।
समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बभ्रुवाहनः ।। ५३ ।।
अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ५३ ।।
उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो ।
दिव्याः सुमनसः पुण्या ववृषे पाकशासनः ।। ५४ ।।
प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की ।। ५४ ।।
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनिःस्वनाः ।
साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वनः ।। ५५ ।।