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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

कृताशं कृतनिर्देशं कृतभक्तं कृतश्रमम् । भेदैर्यै व्यपकर्षन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७० ॥ जो वेतनपर रखे हुए परिश्रमी नौकरको कुछ देनेकी आशा देकर और देनेका समय नियत करके उसके पहले ही भेदनीतिके द्वारा उसे मालिकके यहाँसे निकलवा देते हैं, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं ॥ ७० ॥

पर्यश्नन्ति च ये दारानग्निभृत्यातिथींस्तथा । उत्सन्नपितृदेवेज्यास्ते वै निरयगामिनः ॥ ७१ ॥ जो पितरों और देवताओंके यजन-पूजनका त्याग करके अग्निमें आहुति दिये बिना तथा अतिथि, पोष्यवर्ग और स्त्री-बच्चोंको अन्न दिये बिना ही भोजन कर लेते हैं, वे निःसंदेह नरकगामी होते हैं ॥ ७१ ॥

वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूषकाः । वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७२ ॥ जो वेद बेचते हैं, वेदोंकी निन्दा करते हैं और विक्रयके लिये ही वेदोंके मन्त्र लिखते हैं, वे भी निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ७२ ॥

चातुराश्रम्यबाह्याश्च श्रुतिबाह्याश्च ये नराः । विकर्मभिश्च जीवन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७३ ॥ जो मनुष्य चारों आश्रमों और वेदोंकी मर्यादासे बाहर हैं तथा शास्त्रविरुद्ध कर्मोंसे ही जीविका चलाते हैं, उन्हें निश्चय ही नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ७३ ॥

केशविक्रयिका राजन् विषविक्रयिकाश्च ये । क्षीरविक्रयिकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७४ ॥ राजन्! जो (ब्राह्मण) केश, विष और दूध बेचते हैं, वे भी नरकमें ही जाते हैं ॥ ७४ ॥

ब्राह्मणानां गवां चैव कन्यानां च युधिष्ठिर । येऽन्तरं यान्ति कार्येषु ते वै निरयगामिनः ॥ ७५ ॥ युधिष्ठिर! जो बाह्मण, गौ तथा कन्याओंके लिये हितकर कार्यमें विघ्न डालते हैं, वे भी अवश्य ही नरकगामी होते हैं ॥ ७५ ॥

शस्त्रविक्रयिकाश्चैव कर्तारश्च युधिष्ठिर । शल्यानां धनुषां चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७६ ॥ राजा युधिष्ठिर! जो (ब्राह्मण) हथियार बेचते और धनुष-बाण आदि शस्त्रोंको बनाते हैं, वे नरकगामी होते हैं ॥ ७६ ॥

शिलाभिः शङ्कुभिर्वापि श्वभ्रैर्वा भरतर्षभ । ये मार्गमनुरुन्धन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७७ ॥ भरतश्रेष्ठ! जो पत्थर रखकर, काँटे बिछाकर और गड्ढे खोदकर रास्ता रोकते हैं, वे भी नरकमें ही गिरते हैं ॥ ७७ ॥

उपाध्यायांश्च भृत्यांश्च भक्तांश्च भरतर्षभ । ये त्यजन्त्यविकारांस्त्रींस्ते वै निरयगामिनः ॥ ७८ ॥ भरतभूषण! जो अध्यापकों, सेवकों तथा अपने भक्तोंको बिना किसी अपराधके ही त्याग देते हैं, उन्हें भी नरकमें ही गिरना पड़ता है ॥ ७८ ॥ अप्राप्तदमकांश्चैव नासानां वेधकांश्च ये । बन्धकांश्च पशूनां ये ते वै निरयगामिनः ॥ ७९ ॥ जो काबूमें न आनेवाले पशुओंका दमन करते, नाथते अथवा कटघरेमें बंद करते हैं, वे नरकगामी होते हैं ॥ ७९ ॥ अगोप्तारश्च राजानो बलिषड्भागस्कराः । समर्थाश्चाप्यदातारस्ते वै निरयगामिनः ॥ ८० ॥ जो राजा होकर भी प्रजाकी रक्षा नहीं करते और उसकी आमदनीके छठे भागको लगानके रूपमें लूटते रहते हैं तथा जो समर्थ होनेपर भी दान नहीं करते, उन्हें भी निःसंदेह नरकमें जाना पड़ता है ॥ ८० ॥ (संश्रुत्य चाप्रदातारो दरिद्राणां विनिन्दकाः । श्रोत्रियाणां विनीतानां दरिद्राणां विशेषतः ॥ क्षमिणां निन्दकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ।) जो देनेकी प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, दरिद्रोंकी एवं विनयशील निर्धन श्रोत्रियोंकी और क्षमाशीलोंकी निन्दा करते हैं, वे भी अवश्य ही नरकमें जाते हैं ॥ क्षान्तान् दान्तांस्तथा प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥ ८१ ॥ जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा दीर्घकालतक साथ रहे हुए विद्वानोंको अपना काम निकल जानेके बाद त्याग देते हैं, वे नरकमें गिरते हैं ॥ ८१ ॥ बालानामथ वृद्धानां दासानां चैव ये नराः । अदत्त्वा भक्षयन्त्यग्रे ते वै निरयगामिनः ॥ ८२ ॥ जो बालकों, बूढ़ों और सेवकोंको दिये बिना ही पहले स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे भी निःसंदेह नरकगामी होते हैं ॥ ८२ ॥ एते पूर्वं विनिर्दिष्टाः प्रोक्ता निरयगामिनः । भागिनः स्वर्गलोकस्य वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ ८३ ॥ भरतश्रेष्ठ! पहलेके संकेतके अनुसार यहाँ नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया गया है। अब स्वर्गलोकमें जानेवालोंका परिचय देता हूँ, सुनो ॥ ८३ ॥ सर्वेष्वेव तु कार्येषु दैवपूर्वेषु भारत । हन्ति पुत्रान् पशून् कृत्स्नान् ब्राह्मणातिक्रमः कृतः ॥ ८४ ॥

भरतनन्दन! जिनमें पहले देवताओंकी पूजा की जाती है, उन समस्त कार्योंमें यदि ब्राह्मणका अपमान किया जाय तो वह अपमान करनेवालेके समस्त पुत्रों और पशुओंका नाश कर देता है ॥ ८४ ॥

दानेन तपसा चैव सत्येन च युधिष्ठिर ।
ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८५ ॥
जो दान, तपस्या और सत्यके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८५ ॥

शुश्रूषाभिस्तपोभिश्च विद्यामादाय भारत ।
ये प्रतिग्रहनिःस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८६ ॥
भारत! जो गुरुशुश्रूषा और तपस्यापूर्वक वेदाध्ययन करके प्रतिग्रहमें आसक्त नहीं होते, वे लोग स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८६ ॥

भयात्पापात्तथा बाधाद् दारिद्र्याद् व्याधिधर्षणात् ।
यत्कृते प्रतिमुच्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८७ ॥
जिनके प्रयत्नसे मनुष्य भय, पाप, बाधा, दरिद्रता तथा व्याधिजनित पीड़ासे छुटकारा पा जाते हैं, वे लोग स्वर्गमें जाते हैं ॥ ८७ ॥

क्षमावन्तश्च धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिताः ।
मङ्गलाचारसम्पन्नाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ ८८ ॥
जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८८ ॥

निवृत्ता मधुमांसेभ्यः परदारेभ्य एव च ।
निवृत्ताश्चैव मद्येभ्यस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८९ ॥
जो मद, मांस, मदिरा और परस्त्रीसे दूर रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ८९ ॥

आश्रमाणां च कर्तारः कुलानां चैव भारत ।
देशानां नगराणां च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९० ॥
भारत! जो आश्रम, कुल, देश और नगरके निर्माता तथा संरक्षक हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं ॥ ९० ॥

वस्त्राभरणदातारो भक्तपानान्नदास्तथा ।
कुटुम्बानां च दातारः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ ९१ ॥
जो वस्त्र, आभूषण, भोजन, पानी तथा अन्न दान करते हैं एवं दूसरोंके कुटुम्बकी वृद्धिमें सहायक होते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९१ ॥

सर्वहिंसानिवृत्ताश्च नराः सर्वसहाश्च ये ।
सर्वल्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९२ ॥

जो सब प्रकारकी हिंसाओंसे अलग रहते हैं, सब कुछ सहते हैं और सबको आश्रय देते रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ९२ ।।

मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति जितेन्द्रियाः । भ्रातॄणां चैव सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९३ ।। जो जितेन्द्रिय होकर माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंपर स्नेह रखते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ९३ ।।

आढ्याश्च बलवन्तश्च यौवनस्थाश्च भारत । ये वै जितेन्द्रिया धीरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९४ ।। भारत! जो धनी, बलवान् और नौजवान होकर भी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं ।। ९४ ।।

अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सलाः । आराधनसुखाश्चापि पुरुषाः स्वर्गगामिनः ।। ९५ ।। जो अपराधियोंके प्रति भी दया रखते हैं, जिनका स्वभाव मृदुल होता है, जो मृदुल स्वभाववाले व्यक्तियोंपर प्रेम रखते हैं तथा जिन्हें दूसरोंकी आराधना (सेवा) करनेमें ही सुख मिलता है, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ९५ ।।

सहस्रपरिवेशारस्तथैव च सहस्रदाः । त्रातारश्च सहस्राणां ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९६ ।। जो मनुष्य सहस्रों मनुष्योंको भोजन परोसते, सहस्रोंको दान देते तथा सहस्रोंकी रक्षा करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं ।। ९६ ।।

सुवर्णस्य च दातारो गवां च भरतर्षभ । यानानां वाहनानां च ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९७ ।। भरतश्रेष्ठ! जो सुवर्ण, गौ, पालकी और सवारीका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ९७ ।।

वैवाहिकानां द्रव्याणां प्रेष्याणां च युधिष्ठिर । दातारो वाससां चैव ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९८ ।। युधिष्ठिर! जो वैवाहिक द्रव्य, दास-दासी तथा वस्त्र दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। ९८ ।।

विहारावसथोद्यानकूपारामसभाप्रपाः । वप्राणां चैव कर्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ।। ९९ ।। जो दूसरोंके लिये आश्रम, गृह, उद्यान, कुआँ, बागीचा, धर्मशाला, पौंसला तथा चहारदीवारी बनवाते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ९९ ।।

निवेशनानां क्षेत्राणां वसतीनां च भारत । दातारः प्रार्थितानां च ते नराः स्वर्गगामिनः ।। १०० ।।

भरतनन्दन! जो याचकोंकी याचनाके अनुसार घर, खेत और गाँव प्रदान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १०० ।। रसानां चाथ बीजानां धान्यानां च युधिष्ठिर । स्वयमुत्पाद्य दातारः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ।। १०१ ।। युधिष्ठिर! जो स्वयं ही पैदा करके रस, बीज और अन्नका दान करते हैं, वे पुरुष स्वर्गगामी होते हैं ।। १०१ ।। यस्मिंस्तस्मिन् कुले जाता बहुपुत्राः शतायुषः । सानुक्रोशा जितक्रोधाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ।। १०२ ।। जो किसी भी कुलमें उत्पन्न हो बहुत-से पुत्रों और सौ वर्षकी आयुसे युक्त होते हैं, दूसरोंपर दया करते हैं और क्रोधको काबूमें रखते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १०२ ।। एतदुक्तममुत्रार्थं दैवं पित्र्यं च भारत । दानधर्मं च दानस्य यत् पूर्वमृषिभिः कृतम् ।। १०३ ।। भारत! यह मैंने तुमसे परलोकमें कल्याण करनेवाले देवकार्य और पितृकार्यका वर्णन किया तथा प्राचीनकालमें ऋषियोंद्वारा बतलाये हुए दानधर्म और दानकी महिमाका भी निरूपण किया है ।। १०३ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्वर्गनरकगामिवर्णने त्रयोविंशोऽध्यायः ।। २३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्वर्ग और नरकमें जानेवालोंका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १११ १/३ श्लोक हैं)


* जब कोई अपनी कन्याको इस शर्तपर ब्याहता है कि ‘इससे जो पहला पुत्र होगा, उसे मैं गोद ले लूँगा और अपना पुत्र मानूँगा’ तो उसे ‘पुत्रिकाधर्मके अनुसार विवाह’ कहते हैं। इस नियमसे प्राप्त होनेवाला पुत्र श्राद्धका अधिकारी नहीं है।

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चतुर्विंशोऽध्यायः

ब्रह्महत्याके समान पापोंका निरूपण

युधिष्ठिर उवाच

इदं मे तत्त्वतो राजन् वक्तुमर्हसि भारत ।
अहिंसयित्वापि कथं ब्रह्महत्या विधीयते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतवंशी नरेश! अब आप मुझे यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी मनुष्यको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

व्यासमामन्त्र्य राजेन्द्र पुरा यत् पृष्टवानहम् ।
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजेन्द्र! पूर्वकालमें मैंने एक बार व्यासजीको बुलाकर उनसे जो प्रश्न किया था (तथा उन्होंने मुझे उसका जो उत्तर दिया था), वह सब तुम्हें बता रहा हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने ।
अहिंसयित्वा केनेह ब्रह्महत्या विधीयते ॥ ३ ॥
मैंने पूछा था—‘मुने! आप वसिष्ठजीके वंशजोंमें चौथी पीढ़ीके पुरुष हैं। कृपया मुझे यह ठीक-ठीक बताइये कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी किन कर्मोंके करनेसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है?’ ॥ ३ ॥

इति पृष्टो मया राजन् पराशरशरीरजः ।
अब्रवीन्निपुणो धर्मे निःसंशयमनुत्तमम् ॥ ४ ॥
राजन्! मेरे द्वारा इस प्रकार पूछनेपर पराशर-पुत्र धर्मनिपुण व्यासजीने यह संदेहरहित परम उत्तम बात कही— ॥ ४ ॥

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थे कृशवृत्तिनम् ।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ५ ॥
‘भीष्म! जिसकी जीविकावृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको भिक्षा देनेके लिये स्वयं बुलाकर जो पीछे देनेसे इनकार कर देता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझो ॥ ५ ॥

मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ६ ॥
‘भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य तटस्थ रहनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा ही समझना चाहिये ॥ ६ ॥

गोकुलस्य तृषार्तस्य जलार्थे वसुधाधिप ।
उत्पादयति यो विघ्नं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ७ ॥
‘पृथ्वीनाथ! जो प्याससे पीड़ित हुई गौओंके पानी पीनेमें विघ्न डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती जाने ॥ ७ ॥

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।
दूषयत्यनभिज्ञाय तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ८ ॥
‘जो मनुष्य उत्तम कर्मका विधान करनेवाली श्रुतियों और ऋषिप्रणीत शास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसको भी ब्रह्मघाती ही समझो ॥ ८ ॥

आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे ।
न प्रयच्छति यः कन्यां तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ९ ॥
जो अपनी रूपवती कन्याकी बड़ी उम्र हो जानेपर भी उसका योग्य वरके साथ विवाह नहीं करता, उसे ब्रह्महत्यारा जाने ॥ ९ ॥

अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु ।
दद्यान्मर्मातिगं शोकं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ १० ॥
‘जो पापपरायण मूढ़ मनुष्य ब्राह्मणोंको अकारण ही मर्मभेदी शोक प्रदान करता है, उसे ब्रह्मघाती जाने ॥

चक्षुषा विप्रहीनस्य पंगुलस्य जडस्य वा ।
हरेत यो वै सर्वस्वं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ११ ॥
‘जो अन्धे, लूले और गूँगे मनुष्योंका सर्वस्व हर लेता है, उसे ब्रह्मघाती जाने ॥ ११ ॥

आश्रमे वा वने वापि ग्रामे वा यदि वा पुरे ।
अग्निं समुत्सृजेन्मोहात्तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ १२ ॥
‘जो मोहवश आश्रम, वन, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती ही समझना चाहिये’ ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्रह्मघ्नकथने चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्महत्यारोंका कथनविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन

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पञ्चविंशोऽध्यायः

विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

तीर्थानां दर्शनं श्रेयः स्नानं च भरतर्षभ ।
श्रवणं च महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाज्ञानी भरतश्रेष्ठ! तीर्थोंका दर्शन, उनमें किया जानेवाला स्नान और उनकी महिमाका श्रवण श्रेयस्कर बताया गया है। अतः मैं तीर्थोंका यथावत् रूपसे वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि भरतर्षभ ।
वक्तुमर्हसि मे तानि श्रोतास्मि नियतं प्रभो ॥ २ ॥
भरतभूषण! इस पृथ्वीपर जो-जो पवित्र तीर्थ हैं, उन्हें मैं नियमपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप उन्हें बतलानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

इममङ्गिरसा प्रोक्तं तीर्थवंशं महाद्युते ।
श्रोतुमर्हसि भद्रं ते प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— महातेजस्वी नरेश! पूर्वकालमें अंगिरामुनिने तीर्थसमुदायका वर्णन किया था। तुम्हारा भला हो, तुम उसीको सुनो। इससे तुम्हें उत्तम धर्मकी प्राप्ति होगी ॥ ३ ॥

तपोवनगतं विप्रमभिगम्य महामुनिम् ।
पप्रच्छाङ्गिरसं धीरं गौतमः संशितव्रतः ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, महामुनि विप्रवर धैर्यवान् अंगिरा अपने तपोवनमें विराजमान थे। उस समय कठिन व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गौतमने उनके पास जाकर पूछा — ॥ ४ ॥

अस्ति मे भगवन् कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशयः ।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंस महामुने ॥ ५ ॥
‘भगवन्! महामुने! मुझे तीर्थोंके सम्बन्धमें कुछ धर्मविषयक संदेह है। वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप कृपया मुझे बताइये ॥ ५ ॥

उपस्पृश्य फलं किं स्यात्तेषु तीर्थेषु वै मुने ।
प्रेत्यभावे महाप्राज्ञ तद् यथास्ति तथा वद ॥ ६ ॥

'महाज्ञानी मुनीश्वर! उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मृत्युके बाद किस फलकी प्राप्ति होती है? इस विषयमें जैसी वस्तुस्थिति है, वह बताइये' ॥ ६ ॥

अङ्गिरा उवाच

सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्तामूर्म्मिमालिनीम् ।
विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद् भवेत् ॥ ७ ॥
**अंगिराने कहा—**मुने! मनुष्य उपवास करके चन्द्रभागा (चनाव) और तरंगमालिनी वितस्ता (झेलम)-में सात दिनतक स्नान करे तो मुनिके समान निर्मल हो जाता है ॥ ७ ॥
काश्मीरमण्डले नद्यो याः पतन्ति महानदम् ।
ता नदीः सिन्धुमासाद्य शीलवान् स्वर्गमाप्नुयात् ॥ ८ ॥
कश्मीर प्रान्तकी जो-जो नदियाँ महानद सिन्धुमें मिलती हैं, उनमें तथा सिन्धुमें स्नान करके शीलवान् पुरुष मरनेके बाद स्वर्गमें जाता है ॥ ८ ॥
पुष्करं च प्रभासं च नैमिषं सागरोदकम् ।
देविकामिन्द्रमार्गं च स्वर्णबिन्दुं विगाह्य च ॥ ९ ॥
विबोध्यते विमानस्थः सोऽप्सतेभिरभिष्टुतः ।
पुष्कर, प्रभास, नैमिषारण्य, सागरोदक (समुद्रजल), देविका, इन्द्रमार्ग तथा स्वर्णविन्दु—इन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विमानपर बैठकर स्वर्गमें जाता है और अप्सराएँ उसकी स्तुति करती हुई उसे जगाती हैं ॥ ९ ½ ॥
हिरण्यबिन्दुं विक्षोभ्य प्रयतश्चाभिवाद्य च ॥ १० ॥
कुशेशयं च देवं तं धूयते तस्य किल्बिषम् ।
जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हिरण्यविन्दु तीर्थमें स्नान करके वहाँके प्रमुख देवता भगवान् कुशेशयको प्रणाम करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं ॥ १० ½ ॥
इन्द्रतोयां समासाद्य गन्धमादनसंनिधौ ॥ ११ ॥
करतोयां कुरङ्गे च त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति विगाह्य प्रयतः शुचिः ॥ १२ ॥
गन्धमादन पर्वतके निकट इन्द्रतोया नदीमें और कुरंग क्षेत्रके भीतर करतोया नदीमें संयतचित्त एवं शुद्धभावसे स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ ११-१२ ॥
गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते ।
तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥ १३ ॥
गंगाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक तीर्थ, नील पर्वत तथा कनखलमें स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है ॥ १३ ॥

अपां ह्रद उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसंधस्त्वहिंसकः ॥ १४ ॥ यदि कोई क्रोधहीन, सत्यप्रतिज्ञ और अहिंसक होकर ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक सलिलह्रद नामक तीर्थमें डुबकी लगाये तो उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ १४ ॥ यत्र भागीरथी गङ्गा पतते दिशमुत्तराम् । महेश्वरस्य त्रिस्थाने यो नरस्त्वभिषिच्यते ॥ १५ ॥ एकमासं निराहारः स पश्यति हि देवताः । जहाँ उत्तर दिशामें भागीरथी गंगा गिरती हैं और वहाँ उनका स्रोत तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है, वह भगवान् महेश्वरका त्रिस्थान नामक तीर्थ है। जो मनुष्य एक मासतक निराहार रहकर वहाँ स्नान करता है, उसे देवताओंका प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ १५ १/२ ॥ सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च इन्द्रमार्गे च तर्पयन् ॥ १६ ॥ सुधां वै लभते भोक्तुं यो नरो जायते पुनः । सप्तगङ्ग, त्रिगङ्ग और इन्द्रमार्गमें पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य यदि पुनर्जन्म लेता है तो उसे अमृत भोजन मिलता है (अर्थात् वह देवता हो जाता है)॥ १६ १/२ ॥ महाश्रम उपस्पृश्य योऽग्निहोत्रपरः शुचिः ॥ १७ ॥ एकमासं निराहारः सिद्धिं मासेन स व्रजेत् । महाश्रम तीर्थमें स्नान करके प्रतिदिन पवित्र भावसे अग्निहोत्र करते हुए जो एक महीनेतक उपवास करता है, वह उतने ही समयमें सिद्ध हो जाता है ॥ १७ १/२ ॥ महाह्रद उपस्पृश्य भृगुतुङ्गे त्वलोलुपः ॥ १८ ॥ त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । जो लोभका त्याग करके भृगुतुङ्ग-क्षेत्रके महाह्रद नामक तीर्थमें स्नान करता है और तीन राततक भोजन छोड़ देता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८ १/२ ॥ कन्याकूप उपस्पृश्य बलाकायां कृतोदकः ॥ १९ ॥ देवेषु लभते कीर्तिं यशसा च विराजते ॥ २० ॥ कन्याकूपमें स्नान करके बलाका तीर्थमें तर्पण करनेवाला पुरुष देवताओंमें कीर्ति पाता है और अपने यशसे प्रकाशित होता है ॥ १९-२० ॥ देविकायामुपस्पृश्य तथा सुन्दरिकाह्रदे । अश्विन्यां रूपवर्चस्कं प्रेत्य वै लभते नरः ॥ २१ ॥ देविकामें स्नान करके सुन्दरिकाकुण्ड और अश्विनीतीर्थमें स्नान करनेपर मृत्युके पश्चात् दूसरे जन्ममें मनुष्यको रूप और तेजकी प्राप्ति होती है ॥ २१ ॥ महागङ्गामुपस्पृश्य कृत्तिकाङ्गारके तथा । पक्षमेकं निराहारः स्वर्गमाप्नोति निर्मलः ॥ २२ ॥

महागङ्गा और कृतिकाङ्गारक तीर्थमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य निर्मल—निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २२ ॥ वैमानिक उपस्पृश्य किङ्किणीकाश्रमे तथा । निवासेऽप्सरसां दिव्ये कामचारी महीयते ॥ २३ ॥ जो वैमानिक और किङ्किणीकाश्रमतीर्थमें स्नान करता है, वह अप्सराओंके दिव्यलोकमें जाकर सम्मानित होता और इच्छानुसार विचरता है ॥ २३ ॥ कालिकाश्रममासाद्य विपाशायां कृतोदकः । ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिसत्रं मुच्यते भवात् ॥ २४ ॥ जो कालिकाश्रममें स्नान करके विपाशा (व्यास) नदीमें पितरोंका तर्पण करता है और क्रोधको जीतकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तीन रात वहाँ निवास करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे छूट जाता है ॥ २४ ॥ आश्रमे कृत्तिकानां तु स्नात्वा यस्तर्पयेत् पितॄन् । तोषयित्वा महादेवं निर्मलाः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २५ ॥ जो कृत्तिकाश्रममें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है और महादेवजीको संतुष्ट करता है, वह पापमुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २५ ॥ महापुर उपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितः शुचिः । त्रसानां स्थावराणां च द्विपदानां भयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ महापुरतीर्थमें स्नान करके पवित्रतापूर्वक तीन रात उपवास करनेसे मनुष्य चराचर प्राणियों तथा मनुष्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग देता है ॥ २६ ॥ देवदारुवने स्नात्वा धूतपाप्मा कृतोदकः । देवलोकमवाप्नोति सप्तरात्रोषितः शुचिः ॥ २७ ॥ जो देवदारुवनमें स्नान करके तर्पण करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं तथा जो वहाँ सात राततक निवास करता है, वह पवित्र हो मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥ शरस्तम्बे कुशस्तम्बे द्रोणशर्मपदे तथा । अपां प्रपतनासेवी सेव्यते सोऽप्सरोगणैः ॥ २८ ॥ जो शरसाम्ब, कुशसाम्ब और द्रोणशर्मपदतीर्थके झरनोंमें स्नान करता है वह स्वर्गमें अप्सराओंद्वारा सेवित होता है ॥ २८ ॥ चित्रकूटे जनस्थाने तथा मन्दाकिनीजले । विगाह्य वै निराहारो राजलक्ष्म्या निषेव्यते ॥ २९ ॥ जो चित्रकूटमें मन्दाकिनीके जलमें तथा जनस्थानमें गोदावरीके जलमें स्नान करके उपवास करता है वह पुरुष राजलक्ष्मीसे सेवित होता है ॥ २९ ॥ श्यामायास्त्वाश्रमं गत्वा उषित्वा चाभिषिच्य च । एकपक्षं निराहारस्त्वन्तर्धानफलं लभेत् ॥ ३० ॥

श्यामाश्रममें जाकर वहाँ स्नान, निवास तथा एक पक्षतक उपवास करनेवाला पुरुष अन्तर्धानके फलको प्राप्त कर लेता है ॥ ३० ॥

कौशिकीं तु समासाद्य वायुभक्षस्त्वलोलुपः ।
एकविंशतिरात्रेण स्वर्गमारोहते नरः ॥ ३१ ॥
जो कौशिकी नदीमें स्नान करके लोलुपता त्यागकर इक्कीस रातोंतक केवल हवा पीकर रह जाता है वह मनुष्य स्वर्गको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥

मतङ्गवाप्यां यः स्नायादेकरात्रेण सिद्ध्यति ।
विगाहति ह्यनालम्बमन्धकं वै सनातनम् ॥ ३२ ॥
नैमिषे स्वर्गतीर्थे च उपस्पृश्य जितेन्द्रियः ।
फलं पुरुषमेधस्य लभेन्मासं कृतोदकः ॥ ३३ ॥
जो मतङ्गवापी तीर्थमें स्नान करता है, उसे एक रातमें सिद्धि प्राप्त होती है। जो अनालम्ब, अन्धक और सनातन तीर्थमें गोता लगाता है तथा नैमिषारण्यके स्वर्गतीर्थमें स्नान करके इन्द्रिय-संयमपूर्वक एक मासतक पितरोंको जलाञ्जलि देता है उसे पुरुषमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥

गङ्गाह्रद उपस्पृश्य तथा चैवोत्पलावने ।
अश्वमेधमवाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३४ ॥
जो गङ्गाह्रद और उत्पलावनतीर्थमें स्नान करके एक मासतक वहाँ पितरोंका तर्पण करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ३४ ॥

गङ्गायमुनयोस्तीर्थे तथा कालञ्जरे गिरौ ।
दशाश्वमेधानाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३५ ॥
गङ्गा-यमुनाके सङ्गमतीर्थमें तथा कालञ्जरतीर्थमें एक मासतक स्नान और तर्पण करनेसे दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥

षष्टिह्रद उपस्पृश्य चान्नदानाद् विशिष्यते ।
दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथा पराः ॥ ३६ ॥
समागच्छन्ति माघ्यां तु प्रयागे भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! षष्टिह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे अन्नदानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। माघ-मासकी अमावास्याको प्रयागराजमें तीन करोड़ दस हजार अन्य तीर्थोंका समागम होता है ॥ ३६ १/२ ॥

माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः ॥ ३७ ॥
स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ।
भरतश्रेष्ठ! जो नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते हुए माघके महीनेमें प्रयागमें स्नान करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गमें जाता है ॥ ३७ १/२ ॥

मरुद्गण उपस्पृश्य पितृणामाश्रमे शुचिः ॥ ३८ ॥

वैवस्वतस्य तीर्थे च तीर्थभूतो भवेन्नरः ।
जो पवित्र भावसे मरुद्गण तीर्थ, पितरोंके आश्रम तथा वैवस्वततीर्थमें स्नान करता है, वह मनुष्य स्वयं तीर्थरूप हो जाता है ॥ ३८ १/२ ॥
तथा ब्रह्मसरो गत्वा भागीरथ्यां कृतोदकः ॥ ३९ ॥
एकमासं निराहारः सोमलोकमवाप्नुयात् ॥ ४० ॥
जो ब्रह्मसरोवर (पुष्करतीर्थ) और भागीरथी गङ्गामें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता और वहाँ एक मासतक निराहार रहता है उसे चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है ॥ ३९-४० ॥
उत्पातके नरः स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदकः ।
द्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत् ॥ ४१ ॥
उत्पातक तीर्थमें स्नान और अष्टावक्र तीर्थमें तर्पण करके बारह दिनोंतक निराहार रहनेसे नरमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
अश्मपृष्ठे गयायां च निरविन्दे च पर्वते ।
तृतीयां क्रौञ्चपद्यां च ब्रह्महत्यां विशुध्यते ॥ ४२ ॥
गयामें अश्मपृष्ठ (प्रेतशिला)-पर पितरोंको पिण्ड देनेसे पहली, निरविन्द पर्वतपर पिण्डदान करनेसे दूसरी तथा क्रौञ्चपदी नामक तीर्थमें पिण्ड अर्पित करनेसे तीसरी ब्रह्महत्याको दूर करके मनुष्य सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ ४२ ॥
कलविङ्क उपस्पृश्य विद्याच्च बहुशो जलम् ।
अग्नेः पुरे नरः स्नात्वा अग्निकन्यापुरे वसेत् ॥ ४३ ॥
कलविङ्क तीर्थमें स्नान करनेसे अनेक तीर्थोंमें गोते लगानेका फल मिलता है। अग्निपुर तीर्थमें स्नान करनेसे अग्निकन्यापुरका निवास प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
करवीरपुरे स्नात्वा विशालायां कृतोदकः ।
देवह्रद उपस्पृश्य ब्रह्मभूतो विराजते ॥ ४४ ॥
करवीरपुरमें स्नान, विशालामें तर्पण और देवह्रदमें मज्जन करनेसे मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ ४४ ॥
पुनरावर्त्तनन्दां च महानन्दां च सेव्य वै ।
नन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसकः ॥ ४५ ॥
जो सब प्रकारकी हिंसाका त्याग करके जितेन्द्रिय-भावसे आवर्त्तनन्दा और महानन्दा तीर्थका सेवन करता है उसकी स्वर्गस्थ नन्दनवनमें अप्सराएँ सेवा करती हैं ॥ ४५ ॥
उर्वशीं कृत्तिकायोगे गत्वा चैव समाहितः ।
लौहित्ये विधिवत् स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ४६ ॥
जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिकाका योग होनेपर एकाग्रचित्त हो उर्वशी तीर्थ और लौहित्य तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करता है उसे पुण्डरीक यज्ञका फल मिलता है ॥ ४६ ॥
रामह्रद उपस्पृश्य विपाशायां कृतोदकः ।

द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद् विप्रमुच्यते ॥ ४७ ॥ रामह्रद (परशुराम-कुण्ड)-में स्नान और विपाशा नदीमें तर्पण करके बारह दिनोंतक उपवास करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ४७ ॥

महाह्रद उपस्पृश्य शुद्धेन मनसा नरः । एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ॥ ४८ ॥ महाह्रदमें स्नान करके यदि मनुष्य शुद्ध चित्तसे वहाँ एक मासतक निराहार रहे तो उसे जमदग्निके समान सद्गति प्राप्त होती है ॥ ४८ ॥

विन्ध्ये संताप्य चात्मानं सत्यसंधस्त्वहिंसकः । विनयात्तप आस्थाय मासेनैकेन सिध्यति ॥ ४९ ॥ जो हिंसाका त्याग करके सत्यप्रतिज्ञ होकर विन्ध्याचलमें अपने शरीरको कष्ट दे विनीतभावसे तपस्याका आश्रय लेकर रहता है उसे एक महीनेमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ४९ ॥

नर्मदायामुपस्पृश्य तथा शूर्पारकोदके । एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीयते ॥ ५० ॥ नर्मदा नदी और शूर्पारक क्षेत्रके जलमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य दूसरे जन्ममें राजकुमार होता है ॥ ५० ॥

जम्बूमार्गे त्रिभिर्मासैः संयतः सुसमाहितः । अहोरात्रेण चैकेन सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ५१ ॥ साधारण भावसे तीन महीनेतक जम्बूमार्गमें स्नान करनेसे तथा इन्द्रिय-संयमपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक ही दिन स्नान करनेसे भी मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥

कोकामुखे विगाह्याथ गत्वा चाञ्जलिकाश्रमम् । शाकभक्षश्चीरवासाः कुमारीर्विन्दते दश ॥ ५२ ॥ वैवस्वतस्य सदनं न स गच्छेत् कदाचन । यस्य कन्याह्रदे वासो देवलोकं स गच्छति ॥ ५३ ॥ जो कोकामुख तीर्थमें स्नान करके अञ्जलिकाश्रम-तीर्थमें जाकर सागका भोजन करता हुआ चीरवस्त्र धारण करके कुछ कालतक निवास करता है उसे दस बार कन्याकुमारी तीर्थके सेवनका फल प्राप्त होता है तथा उसे कभी यमराजके घर नहीं जाना पड़ता। जो कन्याकुमारी तीर्थमें निवास करता है वह मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥ ५२-५३ ॥

प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां समाहितः । सिध्यते तु महाबाहो यो नरो जायतेऽमरः ॥ ५४ ॥ महाबाहो! जो एकाग्रचित्त होकर अमावास्याको प्रभास-तीर्थका सेवन करता है उसे एक ही रातमें सिद्धि मिल जाती है तथा वह मृत्युके पश्चात् देवता होता है ॥ ५४ ॥

उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे । पिङ्गायाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ उज्जानकतीर्थमें स्नान करके आर्ष्टिषेणके आश्रम तथा पिङ्गाके आश्रममें गोता लगानेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५५ ॥

कुल्यायां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् । अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ ५६ ॥ जो मनुष्य कुल्यामें स्नान करके अघमर्षण मन्त्रका जप करता है तथा तीन राततक वहाँ उपवासपूर्वक रहता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ५६ ॥

पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः । अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ॥ ५७ ॥ जो मानव पिण्डारक तीर्थमें स्नान करके वहाँ एक रात निवास करता है वह प्रातःकाल होते ही पवित्र होकर अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ५७ ॥

तथा ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । पुण्डरीकमवाप्नोति उपस्पृश्य नरः शुचिः ॥ ५८ ॥ धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करके पवित्र हुआ मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता है ॥ ५८ ॥

मैनाके पर्वते स्नात्वा तथा संध्यामुपास्य च । कामं जित्वा च वै मासं सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ५९ ॥ मैनाक पर्वतपर एक महीनेतक स्नान और संध्योपासन करनेसे मनुष्य कामको जीतकर समस्त यज्ञोंका फल पा लेता है ॥ ५९ ॥

कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ ६० ॥ सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि-कुण्ड तथा उत्तरमानस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य यदि भ्रूणहत्यारा भी हो तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ६० ॥

नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ ६१ ॥ वहाँ नन्दीश्वरकी मूर्तिका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्वर्गमार्गमें स्नान करनेसे वह ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ६१ ॥

विख्यातो हिमवान् पुण्यः शङ्करश्वशुरो गिरिः । आकरः सर्वरत्नानां सिद्धचारणसेवितः ॥ ६२ ॥ भगवान् शंकरका श्वशुर हिमवान् पर्वत परम पवित्र और संसारमें विख्यात है। वह सब रत्नोंकी खान तथा सिद्ध और चारणोंसे सेवित है ॥ ६२ ॥

शरीरमुत्सृजेत् तत्र विधिपूर्वमनाशके ।

अध्रुवं जीवितं ज्ञात्वा यो वै वेदान्तगो द्विजः ।। ६३ ।। अभ्यर्च्य देवतास्तत्र नमस्कृत्य मुनींस्तथा । ततः सिद्धो दिवं गच्छेद ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। ६४ ।। जो वेदान्तका ज्ञाता द्विज इस जीवनको नाशवान् समझकर उस पर्वतपर रहता और देवताओंका पूजन तथा मुनियोंको प्रणाम करके विधिपूर्वक अनशनके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देता है वह सिद्ध होकर सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है ।। ६३-६४ ।। कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमावसेत् । न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत् ।। ६५ ।। जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थोंमें स्नान करता है उसे उस तीर्थयात्राके पुण्यसे कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रहती ।। ६५ ।। यान्यगम्यानि तीर्थानि दुर्गानि विषमाणि च । मनसा तानि गम्यानि सर्वतीर्थसमीक्षया ।। ६६ ।। जो समस्त तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा रखता हो, वह दुर्गम और विषम होनेके कारण जिन तीर्थोंमें शरीरसे न जा सके, वहाँ मनसे यात्रा करे ।। ६६ ।। इदं मेध्यमिदं पुण्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् । इदं रहस्यं वेदानामाप्लाव्यं पावनं तथा ।। ६७ ।। यह तीर्थ-सेवनका कार्य परम पवित्र, पुण्यप्रद, स्वर्गकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन और वेदोंका गुप्त रहस्य है। प्रत्येक तीर्थ पावन और स्नानके योग्य होता है ।। इदं दद्याद् द्विजातीनां साधोरात्महितस्य च । सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ।। ६८ ।। तीर्थोंका यह माहात्म्य द्विजातियोंके, अपने हितैषी श्रेष्ठ पुरुषके, सुहृदोंके तथा अनुगत शिष्यके ही कानमें डालना चाहिये ।। ६८ ।। दत्तवान् गौतमस्यैतदङ्गिरा वै महातपाः । अङ्गिराः समनुज्ञातः काश्यपेन च धीमता ।। ६९ ।। सबसे पहले महातपस्वी अङ्गिराने गौतमको इसका उपदेश दिया। अङ्गिराको बुद्धिमान् काश्यपजीसे इसका ज्ञान प्राप्त हुआ था ।। ६९ ।। महर्षीणामिदं जप्यं पावनानां तथोत्तमम् । जपंश्चाभ्युत्थितः शश्वन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ।। ७० ।। यह कथा महर्षियोंके पढ़ने योग्य और पावन वस्तुओंमें परम पवित्र है। जो सावधान एवं उत्साहयुक्त होकर सदा इसका पाठ करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ।। ७० ।। इदं यश्चापि शृणुयाद् रहस्यं त्वङ्गिरोमतम् । उत्तमे च कुले जन्म लभेज्जातींश्च संस्मरेत् ।। ७१ ।।

जो अङ्गिरामुनिके इस रहस्यमय मतको सुनता है, वह उत्तम कुलमें जन्म पाता और पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करता है ।। ७१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आङ्गिरसतीर्थयात्रायां पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आङ्गिरसतीर्थयात्राविषयक पच्चीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५ ।।

श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

षड्विंशोऽध्यायः

श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया ब्रह्मणः समम् ।
पराक्रमे शक्रसममादित्यसमतेजसम् ॥ १ ॥
गाङ्गेयमर्जुनेनाजौ निहतं भूरितेजसम् ।
भ्रातृभिः सहितोऽन्यैश्च पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
शयानं वीरशयने कालाकाङ्क्षिणमच्युतम् ।
आजग्मुर्भरतश्रेष्ठं द्रष्टुकामा महर्षयः ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गङ्गानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह-तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये ॥ १—३ ॥

अत्रिर्वसिष्ठोऽथ भृगुः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
अङ्गिरागौतमोऽगस्त्यः सुमतिः सुयतात्मवान् ॥ ४ ॥
विश्वामित्रः स्थूलशिराः संवर्तः प्रमतिर्दमः ।
बृहस्पत्युशनोव्यासाश्च्यवनः काश्यपो ध्रुवः ॥ ५ ॥
दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कण्डेयोऽथ गालवः ।
भरद्वाजोऽथ रैभ्यश्च यवक्रीतस्त्रितस्तथा ॥ ६ ॥
स्थूलाक्षः शबलाक्षश्च कण्वो मेधातिथिः कृशः ।
नारदः पर्वतश्चैव सुधन्वाथैकतो द्विजः ॥ ७ ॥
नितम्भूर्भुवनो धौम्यः शतानन्दोऽकृतव्रणः ।
जामदग्न्यस्तथा रामः कचश्चेत्येवमादयः ॥ ८ ॥

उनके नाम ये हैं—अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच ॥ ४—८ ॥

समागता महात्मानो भीष्मं द्रष्टुं महर्षयः ।

तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
भ्रातृभिः सहितश्चक्रे यथावदनुपूर्वशः ।
ये सभी महात्मा महर्षि जब भीष्मजीको देखनेके लिये वहाँ पधारे, तब भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने उनकी क्रमशः विधिवत् पूजा की ॥ ९ १/२ ॥

ते पूजिताः सुखासीनाः कथाश्चक्रुर्महर्षयः ॥ १० ॥
भीष्माश्रिताः सुमधुराः सर्वेन्द्रियमनोहराः ।
पूजनके पश्चात् वे महर्षि सुखपूर्वक बैठकर भीष्मजीसे सम्बन्ध रखनेवाली मधुर एवं मनोहर कथाएँ कहने लगे। उनकी वे कथाएँ सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनको मोह लेती थीं ॥ १० १/२ ॥

भीष्मस्तेषां कथाः श्रुत्वा ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ११ ॥
मेने दिविष्ठमात्मानं तुष्ट्या परमया युतः ।
शुद्ध अन्तःकरणवाले उन ऋषि-मुनियोंकी बातें सुनकर भीष्मजी बहुत संतुष्ट हुए और अपनेको स्वर्गमें ही स्थित मानने लगे ॥ ११ १/२ ॥

ततस्ते भीष्ममामन्त्र्य पाण्डवांश्च महर्षयः ॥ १२ ॥
अन्तर्धानं गताः सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम् ।
तदनन्तर वे महर्षिगण भीष्मजी और पाण्डवोंकी अनुमति लेकर सबके देखते-देखते ही वहाँसे अदृश्य हो गये ॥ १२ १/२ ॥

तानृषीन् सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि ॥ १३ ॥
पाण्डवास्तुष्टुवुः सर्वे प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः ।
उन महाभाग मुनियोंके अदृश्य हो जानेपर भी समस्त पाण्डव बारंबार उनकी स्तुति और उन्हें प्रणाम करते रहे ॥ १३ १/२ ॥

प्रसन्नमनसः सर्वे गाङ्गेयं कुरुसत्तमम् ॥ १४ ॥
उपतस्थुर्यथोद्यन्तमादित्यं मन्त्रकोविदाः ।
जैसे वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण उगते हुए सूर्यका उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार प्रसन्न चित्त हुए समस्त पाण्डव कुरुश्रेष्ठ गङ्गानन्दन भीष्मको प्रणाम करने लगे ॥ १४ १/२ ॥

प्रभावात् तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवाः ॥ १५ ॥
प्रकाशन्तो दिशः सर्वा विस्मयं परमं ययुः ।
उन ऋषियोंकी तपस्याके प्रभावसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित होती देख पाण्डवोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १५ १/२ ॥

महाभाग्यं परं तेषामृषीणामनुचिन्त्य ते ।
पाण्डवाः सह भीष्मेण कथाश्चक्रुस्तदाश्रयाः ॥ १६ ॥

उन महर्षियोंके महान् सौभाग्यका चिन्तन करके पाण्डव भीष्मजीके साथ उन्हींके सम्बन्धमें बातें करने लगे ।। १६ ।।

वैशम्पायन उवाच

कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्ट्वा भीष्मस्य पाण्डवः ।
धर्म्यं धर्मसुतः प्रश्नं पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बातचीतके अन्तमें भीष्मके चरणोंमें सिर रखकर धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने यह धर्मानुकूल प्रश्न पूछा— ।। १७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

के देशाः के जनपदा आश्रमाः के च पर्वताः ।
प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेया नद्यः पितामह ।। १८ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! कौन-से देश, कौन-से प्रान्त, कौन-कौन आश्रम, कौन-से पर्वत और कौन-कौन-सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझने योग्य हैं? ।। १८ ।।

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शिलोञ्छवृत्तेः संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर ।। १९ ।।
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक पुरुषका किसी सिद्ध पुरुषके साथ जो संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास सुनो ।। १९ ।।

इमां कश्चित् परिक्रम्य पृथिवीं शैलभूषणाम् ।
असकृद् द्विपदां श्रेष्ठः श्रेष्ठस्य गृहमेधिनः ।। २० ।।
शिलवृत्तेर्गृहं प्राप्तः स तेन विधिनार्चितः ।
उवास रजनीं तत्र सुमुखः सुखभागृषिः ।। २१ ।।
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात् शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी ।। २०-२१ ।।

शिलवृत्तिस्तु यत् कृत्यं प्रातस्तत् कृतवान् शुचिः ।
कृतकृत्यमुपातिष्ठत् सिद्धं तमतिथिं तदा ।। २२ ।।
सबेरा होनेपर वह शिलवृत्तिवाला गृहस्थ स्नान आदिसे पवित्र होकर प्रातःकालीन नित्यकर्ममें लग गया। नित्यकर्म पूर्ण करके वह उस सिद्ध अतिथिकी सेवामें उपस्थित हुआ। इसी बीचमें अतिथिने भी प्रातःकालके स्नान-पूजन आदि आवश्यक कृत्य पूर्ण कर लिये थे ।। २२ ।।