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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

जिनके कार्योंमें धर्म, अर्थ और काम तीनोंका निर्वाह होता है, किसी एककी भी हानि नहीं होने पाती तथा जो सदा शिष्टाचारमें ही संलग्न रहते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २१ ॥
ब्राह्मणाः श्रुतसम्पन्ना ये त्रिवर्गमनुष्ठिताः ।
अलोलुपाः पुण्यशीलास्तान् नमस्यामि केशव ॥ २२ ॥
केशव! जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, धर्म, अर्थ और कामका सेवन करनेवाले, लोलुपतासे रहित और स्वभावतः पुण्यात्मा हैं उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ॥ २२ ॥
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च सुधाभक्षाश्च ये सदा ।
व्रतैश्च विविधैर्युक्तास्तान् नमस्यामि माधव ॥ २३ ॥
माधव! जो नाना प्रकारके व्रतोंका पालन करते हुए केवल पानी या हवा पीकर ही रह जाते हैं तथा जो सदा यज्ञशेष अन्नका ही भोजन करते हैं उनके चरणोंमें मैं प्रणाम करता हूँ॥ २३ ॥
अयोनीनग्नियोनींश्च ब्रह्मयोनींस्तथैव च ।
सर्वभूतात्मयोनींश्च तान् नमस्याम्यहं सदा ॥ २४ ॥
जो स्त्री नहीं रखते अर्थात् ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, जो अग्निहोत्रसे युक्त हैं तथा जो वेदोंको धारण करनेवाले हैं और समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप परमात्माको ही सबका कारण माननेवाले हैं उनकी मैं सदा वन्दना करता हूँ॥ २४ ॥
नित्यमेतान् नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन् ।
लोकज्येष्ठान् कुलज्येष्ठांस्तमोघ्नाँल्लोकभास्करान् ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण! जो लोकोंकी सृष्टि करनेवाले, संसारमें सबसे श्रेष्ठ, उत्तम कुलमें उत्पन्न, अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले तथा सूर्यके समान जगत्‌को ज्ञानालोक प्रदान करनेवाले हैं उन ऋषियोंको मैं सदा मस्तक झुकाता हूँ॥ २५ ॥
तस्मात् त्वमपि वार्ष्णेय द्विजान् पूजय नित्यदा ।
पूजिताः पूजनार्हा हि सुखं दास्यन्ति तेऽनघ ॥ २६ ॥
वार्ष्णेय! अतः आप भी सदा ब्राह्मणोंका पूजन करें। निष्पाप श्रीकृष्ण! वे पूजनीय ब्राह्मण पूजित होनेपर आपको अपने आशीर्वादसे सुख प्रदान करेंगे॥ २६ ॥
अस्मिल्लोके सदा ह्येते परत्र च सुखप्रदाः ।
चरन्ते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव ॥ २७ ॥
ये ब्राह्मण सदा इहलोक और परलोकमें भी सुख प्रदान करते हुए विचरते हैं। ये सम्मानित होनेपर आपको अवश्य ही सुख प्रदान करेंगे॥ २७ ॥
ये सर्वातिथयो नित्यं गोषु च ब्राह्मणेषु च ।
नित्यं सत्ये चाभिरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २८ ॥

जो सबका अतिथि सत्कार करते तथा गौ-ब्राह्मण और सत्यपर प्रेम रखते हैं वे बड़े-बड़े संकटसे पार हो जाते हैं ।। २८ ।।
नित्यं शमपरा ये च तथा ये चानसूयकाः ।
नित्यस्वाध्यायिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। २९ ।।
जो सदा मनको वशमें रखते, किसीके दोषपर दृष्टि नहीं डालते और प्रतिदिन स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं वे दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ।। २९ ।।
सर्वान् देवान् नमस्यन्ति ये चैकं वेदमाश्रिताः ।
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। ३० ।।
जो सब देवताओंको प्रणाम करते हैं, एकमात्र वेदका आश्रय लेते, श्रद्धा रखते और इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं वे भी दुस्तर संकटसे छुटकारा पा जाते हैं ।।
तथैव विप्रप्रवरान् नमस्कृत्य यतव्रताः ।
भवन्ति ये दानरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। ३१ ।।
इसी प्रकार जो नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करते हैं और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उन्हें दान देते हैं वे दुस्तर विपत्ति लाँघ जाते हैं ।। ३१ ।।
तपस्विनश्च ये नित्यं कौमारब्रह्मचारिणः ।
तपसा भावितात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। ३२ ।।
जो तपस्वी, आबालब्रह्मचारी और तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले हैं वे दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ।। ३२ ।।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चार्चने रताः ।
शिष्टान्नभोजिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। ३३ ।।
जो देवता, अतिथि, पोष्यवर्ग तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहते हैं और यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करते हैं वे भी दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ।। ३३ ।।
अग्निमाधाय विधिवत् प्रणता धारयन्ति ये ।
प्राप्ताः सोमाहुतिं चैव दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।। ३४ ।।
जो विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके सदा अग्निदेवकी उपासना और वन्दना करते हुए सर्वदा उस अग्निकी रक्षा करते हैं; तथा उसमें सोमरसकी आहुति देते हैं वे दुस्तर विपत्तिसे पार हो जाते हैं ।। ३४ ।।
मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग् वर्तन्ति ये सदा ।
यथा त्वं वृष्णिशार्दूलेत्युक्त्वैवं विरराम सः ।। ३५ ।।
वृष्णिसिंह! जो आपकी ही भाँति माता-पिता और गुरुके प्रति पूर्णतः न्याययुक्त बर्ताव करते हैं वे भी संकटसे पार हो जाते हैं—ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये ।। ३५ ।।
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्विजातिथीन् ।
सम्यक् पूजयसे नित्यं गतिमिष्टामवाप्स्यसि ।। ३६ ।।

अतः कुन्तीनन्दन! यदि तुम भी सदा देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंका भलीभाँति पूजन एवं सत्कार करते रहोगे तो अभीष्ट गति प्राप्त कर लोगे ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कृष्णनारदसंवादे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्रीकृष्ण-नारदसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

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द्वात्रिंशोऽध्यायः

राजर्षि वृषदर्भ (या उशीनर)-के द्वारा शरणागत कपोतकी रक्षा तथा उस पुण्यके प्रभावसे अक्षयलोककी प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि धर्मं भरतसत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाप्राज्ञ पितामह! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हैं, अतः भरतसत्तम! मैं आपसे ही धर्मविषयक उपदेश सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

शरणागतं ये रक्षन्ति भूतग्रामं चतुर्विधम् ।
किं तस्य भरतश्रेष्ठ फलं भवति तत्त्वतः ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! अब यह बतानेकी कृपा कीजिये कि जो लोग शरणमें आए हुए अण्डज, पिण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारके प्राणियोंकी रक्षा करते हैं उनको वास्तवमें क्या फल मिलता है? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

इदं शृणु महाप्राज्ञ धर्मपुत्र महायशः ।
इतिहासं पुरावृत्तं शरणार्थं महाफलम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— महाप्राज्ञ, महायशस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर! शरणागतकी रक्षा करनेसे जो महान् फल प्राप्त होता है, उसके विषयमें तुम यह एक प्राचीन इतिहास सुनो ॥ ३ ॥

प्रपात्यमानः श्येनेन कपोतः प्रियदर्शनः ।
वृषदर्भं महाभागं नरेन्द्रं शरणं गतः ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, एक बाज किसी सुन्दर कबूतरको मार रहा था। वह कबूतर बाजके डरसे भागकर महाभाग राजा वृषदर्भ (उशीनर)-की शरणमें गया ॥ ४ ॥

स तं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्रासादङ्कमुपागतम् ।
आश्वास्याश्वसिहीत्याह न तेऽस्ति भयमण्डज ॥ ५ ॥
भयके मारे अपनी गोदमें आये हुए उस कबूतरको देखकर विशुद्ध अन्तःकरणवाले राजा उशीनरने उस पक्षीको आश्वासन देकर कहा—'अण्डज! शान्त रह। यहाँ तुझे कोई भय नहीं है ॥ ५ ॥

भयं ते सुमहत् कस्मात् कुत्र किं वा कृतं त्वया ।
येन त्वमिह सम्प्राप्तो विसंज्ञो भ्रान्तचेतनः ॥ ६ ॥

'बता, तुझे यह महान् भय कहाँ और किससे प्राप्त हुआ है? तूने क्या अपराध किया है? जिससे तेरी चेतना भ्रान्त-सी हो रही है तथा तू यहाँ बेसुध-सा होकर आया है ।। ६ ।।

नवनीलोत्पलापीडचारुवर्ण सुदर्शन । दाडिमाशोकपुष्पाक्ष मा त्रसस्वाभयं तव ।। ७ ।।

'नूतन नील-कमलके हारकी भाँति तेरी मनोहर कान्ति है। तू देखनेमें बड़ा सुन्दर है। तेरी आँखें अनार और अशोकके फूलोंकी भाँति लाल हैं। तू भयभीत न हो। मैं तुझे अभय दान देता हूँ ।। ७ ।।

मत्सकाशमनुप्राप्तं न त्वां कश्चित् समुत्सहेत् । मनसा ग्रहणं कर्तुं रक्षाध्यक्षपुरस्कृतम् ।। ८ ।।

'अब तू मेरे पास आ गया है; अतः रक्षाध्यक्षके सामने है। यहाँ तुझे कोई मनसे भी पकड़नेका साहस नहीं कर सकता ।। ८ ।।

⬅ विषय-सूची (TOC)

भयभीत कबूतर महाराज शिबिकी गोदमें

काशीराज्यं तदद्यैव त्वदर्थं जीवितं तथा । त्यजेयं भव विश्रब्धः कपोत न भयं तव ॥ ९ ॥ ‘कबूतर! आज ही मैं तेरी रक्षाके लिये यह काशिराज्य अर्थात् प्रकाशमान उशीनर देशका राज्य तथा अपना जीवन भी निछावर कर दूँगा। तू इस बातपर विश्वास करके निश्चिन्त हो जा। अब तुझे कोई भय नहीं है’ ॥ ९ ॥

श्येन उवाच

ममैतद् विहितं भक्ष्यं न राजंस्त्रातुमर्हसि । अतिक्रान्तं च प्राप्तं च प्रयत्नाच्चोपपादितम् ॥ १० ॥ इतनेहीमें बाज भी वहाँ आ गया और बोला—राजन्! विधाताने इस कबूतरको मेरा भोजन नियत किया है। आप इसकी रक्षा न करें। इसका जीवन गया हुआ ही है; क्योंकि अब यह मुझे मिल गया है। इसे मैंने बड़े प्रयत्नसे प्राप्त किया है ॥ १० ॥

मांसं च रुधिरं चास्य मज्जा मेदश्च मे हितम् । परितोषकरो ह्येष मम मास्याग्रतो भव ॥ ११ ॥ इसके रक्त, मांस, मज्जा और मेदा सभी मेरे लिये हितकर हैं। यह कबूतर मेरी क्षुधा मिटाकर मुझे पूर्णतः तृप्त कर देगा; अतः आप इस मेरे आहारके आगे आकर विघ्न न डालिये ॥ ११ ॥

तृष्णा मे बाधतेऽत्युग्रा क्षुधा निर्दहतीव माम् । मुञ्चैनं न हि शक्ष्यामि राजन् मन्दयितुं क्षुधाम् ॥ १२ ॥ मुझे बड़े जोरकी प्यास सता रही है। भूखकी ज्वाला मुझे दग्ध-सा किये देती है। राजन्! उसे छोड़ दीजिये। मैं अपनी भूखको दबा नहीं सकूँगा ॥ १२ ॥

मया ह्यनुसृतो ह्येष मत्पक्षनखविक्षतः । किंचिदुच्छ्वासनिःश्वासं न राजन् गोप्तुमर्हसि ॥ १३ ॥ मैं बड़ी दूरसे इसके पीछे पड़ा हुआ हूँ। यह मेरे पंखों और पंजोंसे घायल हो चुका है। अब इसकी कुछ-कुछ साँस बाकी रह गयी है। राजन्! ऐसी दशामें आप इसकी रक्षा न करें ॥ १३ ॥

यदि स्वविषये राजन् प्रभुस्त्वं रक्षणे नृणाम् । खेचरस्य तृषार्तस्य न त्वं प्रभुरथोत्तम् ॥ १४ ॥ श्रेष्ठ नरेश्वर! अपने देशमें रहनेवाले मनुष्योंकी ही रक्षा करनेके लिये आप राजा बनाये गये हैं। भूख-प्याससे पीड़ित हुए पक्षीके आप स्वामी नहीं हैं ॥ १४ ॥

यदि वैरिषु भृत्येषु स्वजनव्यवहारयोः । विषयेष्विन्द्रियाणां च आकाशे मा पराक्रम ॥ १५ ॥

यदि आपमें शक्ति है तो वैरियों, सेवकों, स्वजनों, वादी-प्रतिवादीके व्यवहारों (मुद्दई-मुद्दालहोंके मामलों) तथा इन्द्रियोंके विषयोंपर पराक्रम प्रकट कीजिये। आकाशमें रहनेवालोंपर अपने बलका प्रयोग न कीजिये ॥ १५ ॥

प्रभुत्वं हि पराक्रम्य सम्यक् पक्षहरेषु ते। यदि त्वमिह धर्मार्थी मामपि द्रष्टुमर्हसि ॥ १६ ॥ जो लोग आपकी आज्ञाभंग करनेवाले शत्रुकोटिके अन्तर्गत हैं उनपर पराक्रम करके अपनी प्रभुता प्रकट करना आपके लिये उचित हो सकता है। यदि धर्मके लिये आप यहाँ कबूतरकी रक्षा करते हों तो मुझ भूखे पक्षीपर भी आपको दृष्टि डालनी चाहिये ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

श्रुत्वा श्येनस्य तद् वाक्यं राजर्षिर्विस्मयं गतः। सम्भाव्य चैनं तद्वाक्यं तदर्थी प्रत्यभाषत ॥ १७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बाजकी यह बात सुनकर राजर्षि उशीनरको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसके कथनकी प्रशंसा करके कपोतकी रक्षाके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥

राजोवाच

गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा। त्वदर्थमद्य क्रियतां क्षुधाप्रशमनाय ते ॥ १८ ॥ **राजाने कहा—**बाज! तुम चाहो तो तुम्हारी भूख मिटानेके लिये आज तुम्हारे भोजनके निमित्त बैल, भैंसा, सूअर अथवा मृग प्रस्तुत कर दिया जाय ॥ १८ ॥

शरणागतं न त्यजेयमिति मे व्रतमाहितम्। न मुञ्चति ममाङ्गानि द्विजोऽयं पश्य वै द्विज ॥ १९ ॥ विहंगम! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता—यह मेरा व्रत है। देखो, यह पक्षी भयके मारे मेरे अंगोंको छोड़ नहीं रहा है ॥ १९ ॥

श्येन उवाच

न वराहं न चोक्षाणं न चान्यान् विविधान् द्विजान्। भक्षयामि महाराज किमन्याद्येन तेन मे ॥ २० ॥ **बाजने कहा—**महाराज! मैं न तो सूअर, न बैल और न दूसरे ही नाना प्रकारके पक्षियोंका मांस खाऊँगा। जो दूसरोंका भोजन है उसे लेकर मैं क्या करूँगा ॥ २० ॥

यस्तु मे विहितो भक्ष्यः स्वयं देवैः सनातनः। श्येनाः कपोतान् खादन्ति स्थितिरेषा सनातनी ॥ २१ ॥

साक्षात् देवताओंने सनातनकालसे मेरे लिये जो खाद्य नियत कर दिया है वही मुझे मिलना चाहिये। प्राचीनकालसे लोग इस बातको जानते हैं कि बाज कबूतर खाते हैं ।। २१ ।।

उशीनर कपोते तु यदि स्नेहस्तवानघ । ततस्त्वं मे प्रयच्छाद्य स्वमांसं तुलया धृतम् ।। २२ ।। निष्पाप महाराज उशीनर! यदि आपको इस कबूतरपर बड़ा स्नेह है तो आप मुझे इसके बराबर अपना ही मांस तराजूपर तौलकर दे दीजिये ।। २२ ।।

राजोवाच

महाननुग्रहो मेऽद्य यस्त्वमेवमिहात्थ माम् । बाढमेव करिष्यामीत्युक्त्वासौ राजसत्तमः ।। २३ ।। उत्कृत्योत्कृत्य मांसानि तुलया समतोलयत् । राजाने कहा—'बाज! तुमने ऐसी बात कहकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा।' यों कहकर नृपश्रेष्ठ उशीनरने अपना मांस काट-काटकर तराजूपर रखना आरम्भ किया ।। २३ १/२ ।।

अन्तःपुरे ततस्तस्य स्त्रियो रत्नविभूषिताः ।। २४ ।। हाहाभूता विनिष्क्रान्ताः श्रुत्वा परमदुःखिताः । यह समाचार सुनकर अन्तःपुरकी रत्नविभूषित रानियाँ बहुत दुःखी हुईं और हाहाकार करती हुई बाहर निकल आयीं ।। २४ १/२ ।।

तासां रुदितशब्देन मन्त्रिभृत्यजनस्य च ।। २५ ।। बभूव सुमहान् नादो मेघगम्भीरनिःस्वनः । उनके रोनेके शब्दसे तथा मन्त्रियों और भृत्यजनोंके हाहाकारसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २५ १/२ ।।

निरुद्धं गगनं सर्वं शुभ्रं मेघैः समन्ततः ।। २६ ।। मही प्रचलिता चासीत् तस्य सत्येन कर्मणा । सारा शुभ्र आकाश सब ओरसे मेघोंद्वारा आच्छादित हो गया। उनके सत्यकर्मके प्रभावसे पृथ्वी काँपने लगी ।। २६ १/२ ।।

स राजा पार्श्वतश्चैव बाहुभ्यामूरुतश्च यत् ।। २७ ।। तानि मांसानि संच्छिद्य तुलां पूरयतेऽशनैः । तथापि न समस्तेन कपोतेन बभूव ह ।। २८ ।। राजा अपनी पसलियों, भुजाओं और जाँघोंसे मांस काटकर जल्दी-जल्दी तराजू भरने लगे। तथापि वह मांसराशि उस कबूतरके बराबर नहीं हुई ।। २७-२८ ।।

अस्थिभूतो यदा राजा निर्मांसो रुधिरस्रवः ।

तुलां ततः समारूढः स्वं मांसक्षयमुत्सृजन् ॥ २९ ॥ जब राजाके शरीरका मांस चुक गया और रक्तकी धारा बहाता हुआ हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया तब वे मांस काटनेका काम बंद करके स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये ॥ २९ ॥

ततः सेन्द्रास्त्रयो लोकास्तं नरेन्द्रमुपस्थिताः । भेर्यश्चाकाशगैस्तत्र वादिता देवदुन्दुभिः ॥ ३० ॥ फिर तो इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोकोंके प्राणी उन नरेन्द्रके पास आ पहुँचे। कुछ देवता आकाशमें ही खड़े होकर दुन्दुभियाँ बजाने लगे ॥ ३० ॥

अमृतेनावसिक्तश्च वृषदभों नरेश्वरः । दिव्यैश्च सुसुखैर्माल्यैरभिवृष्टः पुनः पुनः ॥ ३१ ॥ कुछ देवताओंने राजा वृषदर्भको अमृतसे नहलाया और उनके ऊपर अत्यन्त सुखदायक दिव्य पुष्पोंकी बारंबार वर्षा की ॥ ३१ ॥

देवगन्धर्वसंघातैरप्सरोभिश्च सर्वतः । नृत्तैश्चोपगीतश्च पितामह इव प्रभुः ॥ ३२ ॥ देव-गन्धर्वोंके समुदाय और अप्सराएँ सब ओरसे उन्हें घेरकर गाने और नाचने लगीं। वे उनके बीचमें भगवान् ब्रह्माजीके समान शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥

हेमप्रासादसम्बाधं मणिकाञ्चनतोरणम् । स वैडूर्यमणिस्तम्भं विमानं समधिष्ठितः ॥ ३३ ॥ इतनेहीमें एक दिव्य विमान उपस्थित हुआ जिसमें सुवर्णके महल बने हुए थे। सोने और मणियोंकी बन्दनवारें लगी थीं और वैडूर्यमणिके खम्भे शोभा पा रहे थे ॥ ३३ ॥

स राजर्षिर्गतः स्वर्गं कर्मणा तेन शाश्वतम् । राजर्षि उशीनर उस विमानमें बैठकर उस पुण्यकर्मके प्रभावसे सनातन दिव्यलोकको प्राप्त हुए ॥ ३३ १/२ ॥

शरणागतेषु चैवं त्वं कुरु सर्वं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥ भक्तानामनुरक्तानामाश्रितानां च रक्षिता । दयावान् सर्वभूतेषु परत्र सुखमेधते ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिर! तुम भी शरणागतोंके लिये इसी प्रकार अपना सर्वस्व निछावर कर दो। जो मनुष्य अपने भक्त, प्रेमी और शरणागत पुरुषोंकी रक्षा करता है तथा सब प्राणियोंपर दया रखता है वह परलोकमें सुख पाता है ॥ ३४-३५ ॥

साधुवृत्तो हि यो राजा सद्वृत्तमनुतिष्ठति । किं न प्राप्तं भवेत् तेन स्वव्याजेनेह कर्मणा ॥ ३६ ॥ जो राजा सदाचारी होकर सबके साथ सद्बर्ताव करता है वह अपने निश्छल कर्मसे किस वस्तुको नहीं प्राप्त कर लेता ॥ ३६ ॥

स राजर्षिर्विशुद्धात्मा धीरः सत्यपराक्रमः । काशीनामीश्वरः ख्यातस्त्रिषु लोकेषु कर्मणा ॥ ३७ ॥ सत्यपराक्रमी, धीर और शुद्ध हृदयवाले काशीनरेश राजर्षि उशीनर अपने पुण्यकर्मसे तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये ॥ ३७ ॥

योऽप्यन्यः कारयेदेवं शरणागतरक्षणम् । सोऽपि गच्छेत तामेव गतिं भरतसत्तम ॥ ३८ ॥ भरतश्रेष्ठ! यदि दूसरा कोई भी पुरुष इसी प्रकार शरणागतकी रक्षा करेगा तो वह भी उसी गतिको प्राप्त करेगा ॥ ३८ ॥

इदं वृत्तं हि राजर्षेर्वृषदर्भस्य कीर्तयन् । पूतात्मा वै भवेत् लोके शृणुयाद् यश्च नित्यशः ॥ ३९ ॥ राजर्षि वृषदर्भ (उशीनर)-के इस चरित्रका जो सदा श्रवण और वर्णन करता है वह संसारमें पुण्यात्मा होता है ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्येनकपोतसंवादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बाज और कबूतरका संवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

किं राज्ञः सर्वकृत्यानां गरीयः स्यात् पितामह ।
कुर्वन् किं कर्म नृपतिरुभौ लोकौ समश्रुते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! राजाके सम्पूर्ण कृत्योंमें किसका महत्त्व सबसे अधिक है? किस कर्मका अनुष्ठान करनेवाला राजा इहलोक और परलोक दोनोंमें सुखी होता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

एतद् राज्ञः कृत्यतममभिषिक्तस्य भारत ।
ब्राह्मणानामनुष्ठानमत्यन्तं सुखमिच्छता ॥ २ ॥
कर्तव्यं पार्थिवेन्द्रेण तथैव भरतर्षभ ।
**भीष्मजीने कहा—**भारत! राजसिंहासनपर अभिषिक्त होकर राज्यशासन करनेवाले राजाका सबसे प्रधान कर्तव्य यही है कि वह ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करे। भरतश्रेष्ठ! अक्षय सुखकी इच्छा रखनेवाले नरेशको ऐसा ही करना चाहिये ॥ २ ½ ॥
श्रोत्रियान् ब्राह्मणान् वृद्धान् नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥ ३ ॥
पौरजानपदांश्चापि ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान् ।
सान्त्वेन भोगदानेन नमस्कारैस्तथार्चयेत् ॥ ४ ॥
राजा वेदज्ञ ब्राह्मणों तथा बड़े-बूढ़ोंका सदा ही आदर करे। नगर और जनपदमें रहनेवाले बहुश्रुत ब्राह्मणोंको मधुर वचन बोलकर, उत्तम भोग प्रदानकर तथा सादर शीश झुकाकर सम्मानित करे ॥ ३-४ ॥
एतत् कृत्यतमं राज्ञो नित्यमेवोपलक्षयेत् ।
यथाऽऽत्मानं यथा पुत्रांस्तथैतान् प्रतिपालयेत् ॥ ५ ॥
राजा जिस प्रकार अपनी तथा अपने पुत्रोंकी रक्षा करता है उसी प्रकार इन ब्राह्मणोंकी भी करे। यही राजाका प्रधान कर्तव्य है; जिसपर उसे सदा ही दृष्टि रखनी चाहिये ॥ ५ ॥
ये चाप्येषां पूज्यतमास्तान् दृढं प्रतिपूजयेत् ।
तेषु शान्तेषु तद् राष्ट्रं सर्वमेव विराजते ॥ ६ ॥
जो इन ब्राह्मणोंके भी पूजनीय हों उन पुरुषोंका भी सुस्थिर चित्तसे पूजन करे; क्योंकि उनके शान्त रहनेपर ही सारा राष्ट्र शान्त एवं सुखी रह सकता है ॥
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या मान्यास्ते पितरो यथा ।

तेष्वेव यात्रा लोकानां भूतानामिव वासवे ॥ ७ ॥ राजाके लिये ब्राह्मण ही पिताकी भाँति पूजनीय, वन्दनीय और माननीय है। जैसे प्राणियोंका जीवन वर्षा करनेवाले इन्द्रपर निर्भर है उसी प्रकार जगत्‌की जीवन-यात्रा ब्राह्मणोंपर ही अवलम्बित है ॥ ७ ॥
अभिचारैरुपायैश्च दहेयुरपि चेतसा ।
निःशेषं कुपिताः कुर्यु‌रुग्राः सत्यपराक्रमाः ॥ ८ ॥
ये सत्य-पराक्रमी ब्राह्मण जब कुपित होकर उग्ररूप धारण कर लेते हैं उस समय अभिचार या अन्य उपायोंद्वारा संकल्पमात्रसे अपने विरोधियोंको भस्म कर सकते हैं और उनका सर्वनाश कर डालते हैं ॥ ८ ॥
नान्तमेषां प्रपश्यामि न दिशश्चाप्यपावृताः ।
कुपिताः समुदीक्षन्ते दावेष्वग्निशिखा इव ॥ ९ ॥
मुझे इनका अन्त दिखायी नहीं देता। इनके लिये किसी भी दिशाका द्वार बंद नहीं है। ये जिस समय क्रोधमें भर जाते हैं उस समय दावानलकी लपटोंके समान हो जाते हैं और वैसी ही दाहक दृष्टिसे देखने लगते हैं ॥
बिभ्यत्येषां साहसिका गुणास्तेषामतीव हि ।
कूपा इव तृणच्छन्ना विशुद्धा द्यौरिवापरे ॥ १० ॥
बड़े-बड़े साहसी भी इनसे भय मानते हैं; क्योंकि इनके भीतर गुण ही अधिक होते हैं। इन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ तो घास-फूससे ढके हुए कूपकी तरह अपने तेजको छिपाए रखते हैं और कुछ निर्मल आकाशकी भाँति प्रकाशित होते रहते हैं ॥ १० ॥
प्रसह्यकारिणः केचित् कार्पासमृदवो परे ।
(मान्यास्तेषां साधवो ये न निन्द्याश्चाप्यसाधवः ।)
सन्ति चैषामतिशठास्तथैवान्ये तपस्विनः ॥ ११ ॥
कुछ हठी होते हैं और कुछ रूईकी तरह कोमल। इनमें जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उनका सम्मान करना चाहिये; परंतु जो श्रेष्ठ न हों, उनकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। इन ब्राह्मणोंमें कुछ तो अत्यन्त शठ होते हैं और दूसरे महान् तपस्वी ॥ ११ ॥
कृषिगोरक्ष्यमप्येके भैक्ष्यमन्येऽप्यनुष्ठिताः ।
चौराश्चान्येऽनृताश्चान्ये तथान्ये नटनर्तकाः ॥ १२ ॥
कोई-कोई ब्राह्मण खेती और गोरक्षासे जीवन चलाते हैं, कोई भिक्षापर जीवन-निर्वाह करते हैं, कितने ही चोरी करते हैं, कोई झूठ बोलते हैं और दूसरे कितने ही नटोंका तथा नाचनेका कार्य करते हैं ॥ १२ ॥
सर्वकर्मसहाश्चान्ये पार्थिवेष्वितरेषु च ।
विविधाकारयुक्ताश्च ब्राह्मणा भरतर्षभ ॥ १३ ॥

भरतश्रेष्ठ! कितने ही ब्राह्मण राजाओं तथा अन्य लोगोंके यहाँ सब प्रकारके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं और अनेक ब्राह्मण नाना प्रकारके आकार धारण करते हैं ।। १३ ।। नानाकर्मसु रक्तानां बहुकर्मोपजीविनाम् । धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तयेत् ।। १४ ।। नाना प्रकारके कर्मोंमें संलग्न तथा अनेक कर्मोंसे जीविका चलानेवाले उन धर्मज्ञ एवं सत्पुरुष ब्राह्मणोंका सदा ही गुण गाना चाहिये ।। १४ ।। पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम् । पुराप्येते महाभागा ब्राह्मणा वै जनाधिप ।। १५ ।। नरेश्वर! प्राचीनकालसे ही ये महाभाग ब्राह्मण-लोग देवता, पितर, मनुष्य, नाग और राक्षसोंके पूजनीय हैं ।। १५ ।। नैते देवैर्न पितृभिर्न गन्धर्वैर्न राक्षसैः । नासुरैर्न पिशाचैश्च शक्या जेतुं द्विजातयः ।। १६ ।। ये द्विज न तो देवताओं, न पितरों, न गन्धर्वों, न राक्षसों, न असुरों और न पिशाचोंद्वारा ही जीते जा सकते हैं ।। १६ ।। अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् । यमिच्छेयुः स राजा स्याद् ये नेष्टः स पराभवेत् ।। १७ ।। ये चाहें तो जो देवता नहीं है उसे देवता बना दें और जो देवता हैं उन्हें भी देवत्वसे गिरा दें। ये जिसे राजा बनाना चाहें वही राजा रह सकता है। जिसे राजाके रूपमें ये न देखना चाहें उसका पराभव हो जाता है ।। १७ ।। परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतसः । सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशयः ।। १८ ।। राजन्! मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं वे नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है ।। १८ ।। निन्दाप्रशंसाकुशलाः कीर्त्यकीर्तिपरायणाः । परिकुप्यन्ति ते राजन् सततं द्विषतां द्विजाः ।। १९ ।। निन्दा और प्रशंसामें निपुण तथा लोगोंके यश और अपयशको बढ़ानेमें तत्पर रहनेवाले द्विज अपने प्रति सदा द्वेष रखनेवालोंपर कुपित हो उठते हैं ।। १९ ।। ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति पुरुषः स प्रवर्धते । ब्राह्मणैर्यः पराकृष्टः पराभूयात् क्षणाद्धि सः ।। २० ।। ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं; उस पुरुषका अभ्युदय होता है और जिसको वे शाप देते हैं; उसका एक क्षणमें पराभव हो जाता है ।। २० ।। शका यवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।। २१ ।।

शक, यवन और काम्बोज आदि जातियाँ पहले क्षत्रिय ही थीं; किंतु ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे वञ्चित होनेके कारण उन्हें वृषल (शूद्र एवं म्लेच्छ) होना पड़ा ॥ २१ ॥
द्राविडाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः ।
कोलिसर्पा माहिषकास्तास्ताः क्षत्रियजातयः ॥ २२ ॥
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।
श्रेयान् पराजयस्तेभ्यो न जयो जयतां वर ॥ २३ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! द्राविड़, कलिंग, पुलिन्द, उशीनर, कोलिसर्प और माहिषक आदि क्षत्रिय जातियाँ भी ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टि न मिलनेसे ही शूद्र हो गयीं। ब्राह्मणोंसे हार मान लेनेमें ही कल्याण है, उन्हें हराना अच्छा नहीं है ॥ २२-२३ ॥
यस्तु सर्वमिदं हन्याद् ब्राह्मणं च न तत्समम् ।
ब्रह्मवध्या महान् दोष इत्याहुः परमर्षयः ॥ २४ ॥
जो इस सम्पूर्ण जगत्‌को मार डाले तथा जो ब्राह्मणका वध करे, उन दोनोंका पाप समान नहीं है। महर्षियोंका कहना है कि ब्रह्महत्या महान् दोष है ॥ २४ ॥
परिवादो द्विजातीनां न श्रोतव्यः कथंचन ।
आसीताधोमुखस्तूष्णीं समुत्थाय व्रजेच्च वा ॥ २५ ॥
ब्राह्मणोंकी निन्दा किसी तरह नहीं सुननी चाहिये। जहाँ उनकी निन्दा होती हो, वहाँ नीचे मुँह करके चुपचाप बैठे रहना या वहाँसे उठकर चल देना चाहिये ॥ २५ ॥
न स जातोऽजनिष्यद् वा पृथिव्यामिह कश्चन ।
यो ब्राह्मणविरोधेन सुखं जीवितुमुत्सहेत् ॥ २६ ॥
इस पृथ्वीपर ऐसा कोई मनुष्य न तो पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ही जो ब्राह्मणके साथ विरोध करके सुखपूर्वक जीवित रहनेका साहस करे ॥ २६ ॥
दुर्ग्राह्यो मुष्टिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी ।
दुर्धरा पृथिवी राजन् दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २७ ॥
राजन्! हवाको मुट्ठीमें पकड़ना, चन्द्रमाको हाथसे छूना और पृथ्वीको उठा लेना जैसे अत्यन्त कठिन काम है, उसी तरह इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंको जीतना दुष्कर है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसा नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसा नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठक १/३ श्लोक मिलाकर २७ १/३ श्लोक हैं)

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंसा

भीष्म उवाच

ब्राह्मणानैव सततं भृशं सम्परिपूजयेत् ।
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका सदा ही भलीभाँति पूजन करना चाहिये। चन्द्रमा इनके राजा हैं। ये मनुष्यको सुख और दुःख देनेमें समर्थ हैं ॥ १ ॥

एते भोगैरलङ्कारैरन्यैश्चैव किमिच्छकैः ।
सदा पूज्या नमस्कारै रक्ष्याश्च पितृवन्नृपैः ॥ २ ॥
ततो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् ।
राजाओंको चाहिये कि वे उत्तम भोग, आभूषण तथा पूछकर प्रस्तुत किये गये दूसरे मनोवांछित पदार्थ देकर नमस्कार आदिके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करें और पिताके समान उनके पालन-पोषणका ध्यान रखें। तभी इन ब्राह्मणोंसे राष्ट्रमें शान्ति रह सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्रसे वृष्टि प्राप्त होनेपर समस्त प्राणियोंको सुख-शान्ति मिलती है ॥ २ १/२ ॥

जायतां ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मणः शुचिः ॥ ३ ॥
महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः ।
सबको यह इच्छा करनी चाहिये कि राष्ट्रमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पवित्र ब्राह्मण उत्पन्न हो और शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियकी उत्पत्ति हो ॥ ३ १/२ ॥

ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् ॥ ४ ॥
वासयेत गृहे राजन् न तस्मात् परमस्ति वै ।
राजन्! विशुद्ध जातिसे युक्त तथा तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मणको अपने घरमें ठहराना चाहिये। इससे बढ़कर दूसरा कोई पुण्यकर्म नहीं है ॥ ४ १/२ ॥

ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्तं प्रतिगृह्णन्ति देवताः ॥ ५ ॥
पितरः सर्वभूतानां नैतेभ्यो विद्यते परम् ।
ब्राह्मणोंको जो हविष्य अर्पित किया जाता है उसे देवता ग्रहण करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके पिता हैं। इनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ ५ १/२ ॥

आदित्यश्चन्द्रमा वायुरापो भूरम्बरं दिशः ॥ ६ ॥
सर्वे ब्राह्मणमाविश्य सदान्नमुपभुञ्जते ।

सूर्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशा—इन सबके अधिष्ठाता देवता सदा ब्राह्मणके शरीरमें प्रवेश करके अन्न भोजन करते हैं ।। ६ १/२ ।। न तस्याश्नन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुञ्जते ।। ७ ।। देवाश्चाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मणद्विषः । ब्राह्मण जिसका अन्न नहीं खाते उसके अन्नको पितर भी नहीं स्वीकार करते। उस ब्राह्मणद्रोही पापात्माका अन्न देवता भी नहीं ग्रहण करते हैं ।। ७ १/२ ।। ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितरः सदा ।। ८ ।। तथैव देवता राजन् नात्र कार्या विचारणा । राजन्! यदि ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो पितर तथा देवता भी सदा प्रसन्न रहते हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। ८ १/२ ।। तथैव तेऽपि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धविः ।। ९ ।। न च प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् । इसी प्रकार वे यजमान भी प्रसन्न होते हैं जिनकी दी हुई हवि ब्राह्मणोंके उपयोगमें आती है। वे मरनेके बाद नष्ट नहीं होते हैं, उत्तम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ।। ९ १/२ ।। येन येनैव हविषा ब्राह्मणांस्तर्पयेन्नरः ।। १० ।। तेन तेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा । मनुष्य जिस-जिस हविष्यसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसी-उसीसे देवता और पितर भी तृप्त होते हैं ।। १० १/२ ।। ब्राह्मणादेव तद् भूतं प्रभवन्ति यतः प्रजाः ।। ११ ।। यतश्चायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति । वेदैष मार्गं स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च ।। १२ ।। आगतानागते चोभे ब्राह्मणो द्विपदं वरः । ब्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वधर्मं चैव वेद यः ।। १३ ।। जिससे समस्त प्रजा उत्पन्न होती है, वह यज्ञ आदि कर्म ब्राह्मणोंसे ही सम्पन्न होता है। जीव जहाँसे उत्पन्न होता है और मृत्युके पश्चात् जहाँ जाता है, उस तत्त्वको, स्वर्ग और नरकके मार्गको तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको ब्राह्मण ही जानता है। ब्राह्मण मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ है। भरतश्रेष्ठ! जो अपने धर्मको जानता है और उसका पालन करता है, वही सच्चा ब्राह्मण है ।। ११—१३ ।। ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् । न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ।। १४ ।। जो लोग ब्राह्मणोंका अनुसरण करते हैं उनकी कभी पराजय नहीं होती तथा मृत्युके पश्चात् उनका पतन नहीं होता। वे अपमानको भी नहीं प्राप्त होते हैं ।। १४ ।।

यद् ब्राह्मणमुखात् प्राप्तं प्रतिगृह्णन्ति वै वचः । भूतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम् ॥ १५ ॥ ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ॥ क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च । ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च बलानि च ॥ १६ ॥ अपने तेज और बलसे तपते हुए क्षत्रियोंके तेज और बल ब्राह्मणोंके सामने आनेपर ही शान्त होते हैं ॥ भृगवस्तालजंघांश्च नीपानाङ्गिरसोऽजयन् । भरद्वाजो वैहत्तव्यानैलांश्च भरतर्षभ ॥ १७ ॥ भरतश्रेष्ठ! भृगुवंशी ब्राह्मणोंने तालजंघोंको, अंगिराकी संतानोंने नीपवंशी राजाओंको तथा भरद्वाजने हैहयोंको और इलाके पुत्रोंको पराजित किया था ॥ १७ ॥ चित्रायुधांश्चाप्यजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजाः । प्रक्षिप्याथ च कुम्भान् वै पारगामिनमारभेत् ॥ १८ ॥ क्षत्रियोंके पास अनेक प्रकारके विचित्र आयुध थे तो भी कृष्णमृगचर्म धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंने उन्हें हरा दिया। क्षत्रियको चाहिये कि ब्राह्मणोंको जलपूर्ण कलश दान करके पारलौकिक कार्य आरम्भ करे ॥ १८ ॥ यत् किंचित् कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेऽपि वा । सर्वं तद् ब्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १९ ॥ संसारमें जो कुछ कहा-सुना या पढ़ा जाता है वह सब काठमें छिपी हुई आगकी तरह ब्राह्मणोंमें ही स्थित है ॥ १९ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥ भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें जानकार लोग भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे । केनस्वित् कर्मणा पापं व्यपोहति नरो गृही ॥ २१ ॥ श्रीकृष्णने पूछा—शुभे! तुम सम्पूर्ण भूतोंकी माता हो, इसलिये मैं तुमसे एक संदेह पूछ रहा हूँ। गृहस्थ मनुष्य किस कर्मके अनुष्ठानसे अपने पापका नाश कर सकता है? ॥ २१ ॥

पृथिव्युवाच

ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्रं ह्येतदुत्तमम् । ब्राह्मणान् सेवमानस्य रजः सर्वं प्रणश्यति । अतो भूतिरतः कीर्तिरतो बुद्धिः प्रजायते ॥ २२ ॥ **पृथ्वीने कहा—**भगवन्! इसके लिये मनुष्यको ब्राह्मणोंकी ही सेवा करनी चाहिये। यही सबसे पवित्र और उत्तम कार्य है। ब्राह्मणोंकी सेवा करनेवाले पुरुषका समस्त रजोगुण नष्ट हो जाता है। इसीसे ऐश्वर्य, इसीसे कीर्ति और इसीसे उत्तम बुद्धि भी प्राप्त होती है ॥ २२ ॥

महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः । इति मां नारदः प्राह सततं सर्वभूतये ॥ २३ ॥

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पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद