मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
के कार्यों को तो अभिमान से त्याग देता है और ज़हर समान कड़वा फल प्रदान करने वाले गन्दे और अनात्म कार्यों से ही प्रेम करता है।
महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर ।
जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ॥
मन को अन्तःकरण में घेर कर दबा लो, मार लो। जब भी यह गलत जगह भागे, गलत इच्छाएँ करे तो गुरु के नाम का अंकुश लगाकर इसे ठीक जगह फेर दो।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार ।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥
इस मन ने मनुष्य, मुनिजन, देवतालोग सबको धोखा दिया है। मन ने ही अवतार धारण किये हैं और रक्षक बनकर सामने आया है। जो कोई इस मन के धोखे को समझकर इससे बचकर सद्गुरु की शरण में आ जाता है, वो तीन-लोक से न्यारा होकर चौथे-लोक (अमर-लोक) में चला जाता है।
बात बनाई जग ठग्यो, मन परमोधा नाहिं ।
कहैं कबीर मन लै गया, लख चौरासी माहिं ॥
पाप-पुण्य की बातों में उलझाकर मन सारे संसार को ठगता रहा है। इसे कोई भी समझ नहीं पाया। साहिब कहते हैं कि मन ने ही संसार के सब जीवों को चौरासी की धारा में डाला हुआ है।
यह काम परम-पुरुष (साहिब) का नहीं है। वो किसी को नहीं ठगता, किसी को कष्ट नहीं देता।
बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥
जिस तरह बाजीगर बन्दर को साथ लेकर घर-घर नचाता फिरता है, इसी तरह मन रूपी बाजीगर भी जीवात्मा को बन्दर की तरह जैसा भी नाच चाहे, नचवा लेता है।
काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय ।
कहैं कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥
साहिब कह रहे हैं कि मैंने तो बहुत समझाया कि मन रूपी काल जीव को खा रहा है, पर कोई मेरी बात को मान ही नहीं रहा है, अब मैं क्या करूँ !
कबीर यह मन लालची, समझौं नहीं गँवार ।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार ॥
यह मन बहुत लालची है, समझाने से समझता नहीं है। भजन करने में तो आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।
मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साथ ।
जो माने गुरु वचन को, ताका मता अगाध ॥
सारा संसार मन का दास है, जो जो मन कहता है, वो-वो ही करता जाता है..... उसी की आज्ञा में रहता है, पर गुरु का दास कोई बिरला साधु ही होता है। जो गुरु की आज्ञा को मानता हुआ चलता है, वो गंभीर विचार वाला है।
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक ।
जो यह मन गुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक ॥
मन ही दाता बन जाता है, मन ही लालची बन जाता है, मन ही राजा समान हृदय वाला हो जाता है और मन ही कंजूस हृदय का बन जाता है। यदि यह मन गुरु में लग जाए तो निश्चय ही गुरु की प्राप्ति हो जाए।
मन चलता तन भी चलै, ताते मन को घेर ।
तन मन दोऊ बस करै, होय राई सुमेर ॥
मन के चलाने से ही शरीर चलता है, इसलिए मन को घेरकर काबू में कर। जब शरीर और मन दोनों बस में हो जायेंगे तो बहुत ऊँचा
उठ जायेगा ।
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास ।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, फिरि माया के पास ॥
यह मन तो पंछी की तरह है, जो कभी अच्छा बनकर आकाश में ऊँचा चला जाता है, पर दूसरे ही क्षण फिर नीचे आकर माया में लिपट जाता है.....गन्दा हो जाता है ।
जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर ।
सहजै हीरा नीपजै, जो मन आवै ठौर ॥
जितनी समुद्र में लहरे हैं, उतनी ही मन में इच्छाएँ हैं । बहुत ही चंचल है यह मन । यदि इच्छाएँ समाप्त होकर यह मन शान्त हो जाए तो आत्म-ज्ञान रूपी हीरा सहज ही प्राप्त हो जाए ।
पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हँसा भया, मोती चुनि चुनि खात ॥
गुरु का नाम मिलने से पहले तो यह मन कौवे की तरह था.....अन्य जीवों को मारता फिरता था, पर अब यह कौवे से हँस बन गया है.....ज्ञान रूपी मोती चुन-चुन कर खाता है ।
बिना सीस का मिरग है, चहुँ दिशि चरने जाय ।
बाँधि लगाओ गुरु ज्ञानसों, राखो तत्व समाय ॥
यह मन बिना सिर का पशु है, जो चारों ओर विषय-विकारों की घास चरता रहता है । इसे गुरु ज्ञान की रस्सी से बाँध कर नाम रूपी तत्व में लीन कर दो ।
धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर ।
तन फाटै को औषधी, मन फाटै नहिं ठौर ॥
धरती फट जाए तो जल बरसने से मिल जाती है, कपड़ा फट जाए तो धागे से मिला लिया जाता है, तन फट जाए तो औषध से ठीक हो जाता है, पर यदि मन फट जाए तब कोई रास्ता नहीं है.....फिर नहीं
कबीर मन मरकट भया, कहूँ न नेक ठहराय ।
सत्य नाम बाँधे बिना, जित भावे तित जाय ॥
साहिब कहते हैं कि यह मन तो बन्दर की तरह उछल-कूद करने वाला है । यह कभी अच्छा बनकर नहीं रह सकता । सच्चे नाम से बाँधे बिना तो यह जहाँ दिल करे, चला जायेगा ।
सबद
सोई काल धरे औतारा
राम कृष्ण औतारी आहीं । भोगे कर्म जाड़ तन माहीं ॥
दस औतार निरंजन धरिया । सोऊ काल बस भौं में परिया ॥
सोई निरंजन सोई निरंकारा । सोई काल धरै औतारा ॥
कर्म भाव तिन देही पाई । करै भोग भौं में भरमाई ॥
सारा जग बेदन भरमैया । औतारी साँचे गोहरैया ॥
दीनदयाल पुरुष है न्यारा । निराकार काल के पारा ॥
निरंकार तह काल न जावै । वहँ की गम जोती नहिं पावै ॥
वो स्वामी है अगम अगाही । जह संतन ने सुरति समाई ॥
सुरति समाड़ पुरुष को देखा । मिला पुरुष गम अगम अलेखा ॥
उनका लेखा बेद न पावै । नेति नेति चारों गोहरावै ॥
पंचम बेद सुषम नहिं जाना । षष्ठम प्रसंग बेद कहै नाना ॥
चारि बेद पुनि गुप्त रहाई । तामें कागद लगै न स्याही ॥
तुम पुनि पुरुष भेद नहिं जाना । दसो बेद कहै नहिं पहिचाना ॥
दसो बेद से भेद न्यारा । पुरुष भेद नहिं पावै पारा ॥
निरंकार जोती नहिं जाना । जहँ पहुँचे कोड़ संत सुजाना ॥
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा । पाया अगम गम्य का चीन्हा ॥
पत्थर पानी दूर बहावा। तब घर अगम राह को पावा ॥
बेद कितेब पुरान उठाये। तब लिखि सुरति अगम को धाये ॥
नेम अचार चार नहीं माना। बोलै सब घट माहिं दिखाना ॥
बोल अबोल दोऊ के पारा। तहँवा तुलसी सुरति सवारा ॥
छर अच्छर निःअच्छर पारा। देखा तुलसी निरखि निहारा ॥
अगम अगाध पुरुष दरबारा। तुलसी मिलै सुरति की लारा ॥
तन में देखि ब्रह्मण्ड पसारा। सो हिये हेर सुरति की लारा ॥
हिये में हेर फोड़ ब्रह्मण्ड। हिये की लार सार नौखण्डा ॥
अंतर हेर हिये के माई। अंड फोड़ ब्रह्मण्ड दिखाई ॥
अंतर खोज कीन्ह हिये माई। अंतर हिये माहि दरसाई ॥
तन में तोड़ फोड़ हिये कीन्हा। अंतर सार हिये में चीन्हा ॥
दस औतार काल के भाई
दस औतार काल के भाई। तामें नरसिंह है दस माहीं ॥
हरनाकुस का उदर बिदारा। ये जानौ सब काल पसारा ॥
वे दयाल एक सब माहीं। वो कहौ केहि का मारन जाई ॥
हरनाकुस कौ मारि बिदारा। पुनि पहलाद राज बैठारा ॥
राज भोग जिन कीन्हा भाई। सो तेहि पुत्र बिलोचन राई ॥
वे लोचन केवलि भयौ सोई। जा को बावन बाँधे जोई ॥
जो मुक्ति वा की होड़ जाते। बली छुड़ावन केहि विधि आते ॥
आवागमन मुक्ति नहीं भाई। बली छुड़ावन कस कस आई ॥
भागवत में देखौ यह सारखी। बली काज आये अस भारखी ॥
जो पहलाद मुक्ति को जाता। आवागमन केहि कारन आता ॥
सहाय करी नरसिंह बतावा। पिता मारि राज जिन पावा ॥
राज करै सो नरकै जाई। कस कस ताकी मुक्ति बताई ॥
जो नरसिंध जिवत ले जाता। तौ ता की हम मानै बाता ॥
राज थापि तेहि भोग करावा। भोग भोग भौ खानै आवा ॥
ताकी मुक्ति साखि बतलावौ। कहि झूठी झूठी समझावौ ॥
सुवा पढ़ावत गनिका तारी। सहजै होत जक्त सब मुक्ति ॥
सुवा सुवा घर घर में होते। तौ मुक्ति का सोच न करते ॥
धूू तप की तुम साखि बताई। गोपीचंद भरथरी भाई ॥
पढ़ पढ़ सुवा मुक्ति जो होते। तौ पुनि राज काहे को तजते ॥
धूू को तप की बिधि बताया। राज छाड़ि तन खाक मिलाया ॥
गनिका मुक्ति सहज बतलावौ। धूू जी राज गये किमि गावौ ॥
कभि सुवा पढ़ते सहज बतावा। कभि कभि कष्ट तपस्या गावा ॥
ये तौ बिधि मिली नहीं भाई। ये सब झूठ झूठ सी गाई ॥
काल के फंद की खबर नाहीं
अंध रे अंध संसार सब अंध है, काल के फंद की खबर नाहीं।
करत उन्माद विष स्वाद संसार का, मगन मस्तान है तासु माहीं ॥
नैन मद अंध अरु बैन मुख छार है, चलन गुमान में छाँह देखै ॥
कहैं कबीर नर नारि सब एक से, काल चपेट हैं नाहिं पेखै ॥
सारा संसार अंधा है। किसी को भी काल के जाल का पता नहीं है। सभी संसार के विषय-विकारों रूपी विष का सेवन कर पागल बने रहते हैं, जिसके फलस्वरूप उनकी विवेक की आँखें फूट चुकी हैं, मुख से कड़वी बातें ही निकलती रहती हैं। वो घमण्ड के साथ चलते हैं और समझते हैं कि वे सही दिशा में जा रहे हैं। साहिब कहते हैं कि स्त्री-पुरुष सब काल के जाल में फँसे हुए हैं और उसके जाल को समझ नहीं पा रहे हैं।
निरंजन ख्याल पसारा हो
सुनो कोई साधु प्रेम लगाय के, निरंजन ख्याल पसारा हो ॥
धरती आकाश रचा अमृत मण्डल, तीन लोक विस्तारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर प्रगटे, इनके सिर दीना भारा हो ॥
ठोर ठोर तीरथ ब्रत थापत, ठगवत को संसारा हो।
लख चौरासी जीव भुलाना, कोई न पावे पारा हो ॥
बार बार भस्म कर डारे, फिर फिर देड़ अवतारा हो।
सतगुरु मिले तो शब्द लखावे, भवसागर करे पारा हो ॥
सतगुरु के शब्द चीन्हे बिना रे, बहो जाय संसारा हो।
माया मोहि सकल जग बँधा, कोई न पावे पारा हो ॥
भागत जीव ठोर नहीं पावत, अटकत काल के द्वारा हो।
देख करामात सब कोई भूले, सिद्ध साध बेवहारा हो ॥
अमर लोक में पुरुष विदेही, रोकत उनका द्वारा हो।
सेवा कीन पुरुष वर दीना, धर्मराय बटपारा हो ॥
विषया रूप आप बन बैठे, जीवन करत आहारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महादेव कहे यह, नहीं पावे कोऊ पारा हो ॥
इन तीनों से निरंजन पारा, निरंजन से पुरुष निन्यारा हो।
कठिन काल से बचा चाहो, गहो शब्द टकसारा हो ॥
कहे कबीर अमर लो होवे, जो निज होय हमारा हो।
कठिन काल सों लेहु उबारी, बहुरि न आवे संसारा हो ॥
कह रहे हैं कि निरंजन ने धरती, आकाश, स्वर्ग आदि तीन लोक में बनाकर अपना जाल फैलाया हुआ है। उस निरंजन और उसकी शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उत्पन्न हुए, जिनके सिर पर उसने सारा भार दे दिया है। जगह-जगह पर उसने तीर्थ स्थान, ब्रत आदि दुनिया को ठगने के लिए बना रखे हैं। चौरासी लाख योनियों के सभी जीव इसकी दुनिया में भूले हुए हैं और कोई भी इसका पार नहीं पा रहा है। यह बार-बार जीवों को भस्म करके फिर-फिर प्रगट करता है। यदि सद्गुरु मिल जाएँ तो वो सार-शब्द देकर भवसागर से पार कर देते हैं। बिना सद्गुरु के सार-शब्द के जीव संसार-सागर में बह जाता है। माया-मोह आदि में सारा संसार बँधा हुआ है और कोई भी इससे पार नहीं पा
रहा है। जीव जगह-जगह बचने के लिए भाग रहे हैं, भटक रहे हैं, पर काल के द्वार पर ही माथा पटक रहे हैं, वहीं अटक रहे हैं। कोई सिद्धि शक्तियों को देख भ्रमित हो रहा है, कोई किसी साधु की करामात देखकर भ्रमित हो रहा है। ये सब निरंजन के ही जाल हैं, जो जीव को अमर-लोक के सच्चे साहिब के द्वार पर नहीं जाने देते हैं। परम-पुरुष की सेवा करके इस निरंजन ने उनसे तीन लोक में राज्य करने का वर माँग लिया है। यह स्वयं विषयों का आनन्द लेता है और फिर उनका कष्ट जीवों को देकर उन्हें खा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी उसकी इस चाल को नहीं समझते हैं। इन त्रिदेव से निरंजन न्यारा है और निरंजन से भी परम-पुरुष न्यारा है। यदि इस कठिन काल निरंजन से बचना चाहते हो तो सद्गुरु के सार-शब्द को पकड़े रहो। क्योंकि फिर वो हमारा हंस हो जाता है और दुबारा काल के इस संसार में नहीं आता।
साधो यह मन है बड़ा जालिम
साधो यह मन है बड़ा जालिम।
जा को मन से काम परो है, तिसही है है मालूम॥
मन कारन जो उनको छाया, तेहि छाया में अटकै।
निरगुन सरगुन मन की बाजी, खरे सयाने अटकै॥
मन ही चौदह लोक बनाया, पाँच तत्त्व गुन कीन्है।
तीन लोक जीवन बस कीन्है, परै न काहू चीन्है।
जो कोउ कहै हम मन को मारा, जाके रूप न रेखा।
छिन छिन में कितनौ रंग ल्यावै, जे सपनेहु नहिं देखा॥
रसातल इकइस ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै।
षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै॥
सब के ऊपर नाम निअच्छर, तहैं लै मन को राखै।
तब मन की गति जान परै यह, सत कबीर मुख भाखै॥
साहिब कह रहे हैं कि विचार करो ! यह मन बड़ा ही जालिम है । जिसका इस मन से पाला पड़ता है, वो ही इसे समझ सकता है । मन के कारण ही संसार का भ्रम दिखाई दे रहा है । इसी भ्रम में सब अटक के हैं । सगुण-निर्गुण दोनों मन का खेल है, जिसमें बड़े-बड़े चतुर भी अटक हुए हैं । ये 14 लोक भी मन ने ही पाँच तत्व और तीन गुण से बनाए हैं । 14 लोक में जीवों को फँसा दिया है, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा है । जो कोई कहे कि उसने मन को मार लिया है, तो समझो कि झूठ बोल रहा है, क्योंकि मन की कोई रूप-रेखा नहीं है । यह तो एक पल में इतने रंग दिखाता है कि जो सपने भी नहीं देखे होते । यह 21 ब्रह्माणों में सब पर शासन चलाता है । जितने भी रस हैं, उन सब का भोग करने वाला मन राजा ही है, फिर उसे बस में कैसे किया जा सकता है ! सबके परे एक निःअच्छर नाम है, जब उसमें मन को लगाया जाता है, तब ही यह मन समझ में आता है । साहिब कह रहे हैं कि यह बात मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूँ ।
यह मन जालिम जोर रे
बरजे नहीं माने, यह मन जालिम जोर रे ॥
जो कोई मन को पकड़ा चाहे, भागत साँकर तोड़ रे ॥
सुर नर मुनि सब पछि पछि हारे, हाथ न आवे चोर रे ॥
जो हँसा सतगुरु के होई, राखे ममता छोट रे ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बचो गुरु की ओट रे ॥
हे हँसा ! यह मन बड़ा जालिम और ताकतवर है, रोके नहीं रुकता । कोई उसे पकड़ने की कोशिश करे, वश में करने का प्रयास करे तो यह जंजीर तोड़ कर भाग जाता है । सुर, नर, मुनि सब इसे वश में करते-करते हार गये, पर यह चोर किसी के वश में नहीं आया । जो हँस सद्गुरु की शरण ग्रहण करता है, वो संसार की ममता को त्यागकर इसे अपने वश कर लेता है । इसलिए साहिब कह रहे हैं मेरी बात सुनकर उस पर विचार करो और सद्गुरु की शरण में आकर बच लो ।
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दो शब्द संगत की ओर से
आप जब इस संसार में आए, तब महाकलयुग शुरू हो गया था। आम आदमी ही नहीं, भक्ति करने वाला इंसान भी भटक चुका था। आपने आकर केवल धार्मिक क्रांति ही नहीं लाई बल्कि समाज सुधार का काम भी किया। जहाँ धर्म में व्यवसाय, राजनीति, रोमांस आदि ने स्थान ले लिया था, वहीं समाज में हिंसा, छल, कपट, ठगी, बेईमानी, चरित्रहीनता सहित अनेक बुराइयाँ अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थीं। कहीं सयाने बाबे हमारी माँ, बहन, बेटियों को नचा रहे थे तो कहीं नकली ज्योतिषि समाज को भटका रहे थे। आपने समाज को जगाया, बचो इनसे। इसके लिए आपको इस महाकलयुग में पाखण्डियों द्वारा बहुत निंदा झेलनी पड़ी।
कहीं उग्रवादी कहा गया। दुनिया भी कितनी भोली है, मान लिया। फौज में नौकरी करने वाले को उग्रवादी कहा। कितने बेवकूफ थे पाखण्डी। फिर मानने वाले तो भोले भाले थे, विचार भी नहीं किया। कहीं आपको मजनू कहा गया। आप तो किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करते हैं और न ही आपने शादी की। यदि आपको जरूरत होती तो शादी कर लेते। यह भी किसी ने विचार नहीं किया। कहीं चमार कहा गया। आपके गुरु के लिए भी किसी की यह सोच रही थी। किसी ने उनकी जाति पूछी थी। आपके गुरु जी ने कहा कि जाति पाति पूछे न कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।। तो उसने कहा कि यह तो रविदास जी ने कहा था, क्योंकि वे जाति से चमार थे। तब आपका दिल हुआ कि बता दूँ कि गुरु जी ब्राह्मण हैं, पर गुरु जी ने इशारे से मना कर दिया। बाद में कहा कि अपनी जाति बतानी ही नहीं है। आप तो स्वयं साहिब हैं, फिर आपकी जाति जो पूछे वो मूर्ख ही है। फिर पाखण्डियों ने आपको अनेक यातनाएं
देने की कोशिश की, कहीं जहर दिया, कहीं जिंदा जलाने का प्रयास किया, कहीं तलवारों से मरवाने की कोशिश की, पर आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका।
साहिब आए काल जगत में, निंदे सबही कोय।
महाकलयुग देत है दस्तक, पाखण्ड जय जय होय ॥
पर आप चुप नहीं हुए, जो संदेश समाज को शुरू से दिया, उससे कभी हटे नहीं, कहीं आपने अपने शब्दों में बदलाव नहीं लाया। महाकलयुग में आप अनेक यातनाएं सहते हुए समाज को बुराइयों से, पाखण्डियों से बचा रहे हैं। इस कलयुग में जो काम आप कर रहे हैं, न आज कोई कर रहा, न आगे कर पायेगा।
इस अनथक बेमिसाल शूरवीर सदगुरु मधु परमहंस जी के चरणों में अर्पण दो शब्द लिखने के लिए हमारी कलम नहीं रुक रही। जिसने 17 साल की आयु से ही भारत की थल सेना के महार गुप में रह कर अपनी देश सेवा के दौरान ही संसार के, भूले भटके लोगों को भक्ति का ठीक रास्ता दिखाने के लिए संत सम्राट् सदगुरु कबीर साहिब द्वारा दिया सच का प्रतीक, 'सत्य का झंडा' उठाया। निरंजन की भक्ति को छोड़कर सत्य पुरुष की भक्ति करने को कहा है।
मिठास के प्रतीक 'मधु' परमहंस जी के विशाल हृदय से निकलने वाली निर्मल धारा ने भक्ति के क्षेत्र में एक सैलाब व क्रांति ला रखी है। जिसने पाखण्डवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।
मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन
गुरु और सतगुरु में अंतर
और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं 'नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा'। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।
“जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।”
सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥
पूरे संसार में गुरु और सतगुरु को एक ही सत्ता पर
स्थापत कर एक ही बात बोला जा रहा है।
आओ गुरु और सतगुरु के रहस्य को जाने
कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा
कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा
मैंं सिरजौं मैंं मारऊँ, मैंं जारौं मैंं खाऊँ ।
जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥
मैंं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ ।
मैंं ही विमूढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ ।
मैंं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ ।
मैंं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ ।
मैंं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ ॥
मैंं ही आद्यशक्ति का पति शरीरों का रचयिता हूँ ।
मैंं ही त्रिदेवों का पिता-गुरु और आराध्य हूँ ।
मैंं ही वायु ध्वनि से वेद-शब्द शून्य में ओंकार हूँ ।
मैंं ही वेदों में परमेश्वर और पंचतत्व आधार हूँ ।
मैंं 'मन' ही सृष्टि से परे रारंकार हूँ ॥
मैंं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ ।
मैंं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ ।
मैंं ही सप्त आकाश और सप्तसागर पाताल हूँ ।
मैंं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ ।
मैं 'मन' ही सकल सृष्टि का करतार हूँ॥
मैं ही शून्य मण्डलों से परे घनघोर अंधकार हूँ॥
मैं ही त्रिदेवों दशावतारों का विधाता ध्यान हूँ॥
मैं ही आत्म शक्ति के बन्धन का जीवों में कर्म विधान हूँ॥
मैं ही माया संग शरीरों में आत्मावरण और ज्ञान हूँ॥
मैं 'मन' ही जीवात्मा की गुण अवगुण पहचान हूँ॥
मैं ही शुभ अशुभ और पुण्य-पाप का सृजक हूँ॥
मैं ही तीरथ व्रत यज्ञ जप तप कर्म निर्माता हूँ॥
मैं ही धर्म अधर्म के जीवन कर्मों का व्याख्याता हूँ॥
मैं ही वैकुण्ठ और स्वर्ग-नरक कर्मफल प्रदाता हूँ॥
मैं 'मन' ही कर्म संचय स्रोत बन जाता हूँ॥
मैं ही एक उज्ज्वल पक्ष, दया करूणा का वरदान हूँ॥
मैं ही जीवों में तम रूप काम-क्रोध की खान हूँ॥
मैं ही तपस्वी ऋषि मुनि योगी का सिद्धिदाता हूँ॥
मैं ही मनुष्य की मनोकामना, सुख-दुःख हो जाता हूँ॥
मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ॥
मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ॥
मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ॥
मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ॥
पुस्तक सूची
हिन्दी में
<table style="width: 100%; border-collapse: collapse;"> <tbody> <tr> <td style="width: 50%; vertical-align: top;"> 1. परा रहस्या<br> 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु<br> 3. पावन प्रार्थनाएँ<br> 4. सद्गुरु चालीसा<br> 5. वार्षिक डायरी<br> 6. सद्गुरु भक्ति<br> 7. कहाँ से तू आया और कहाँ<br> तुझे जाना रे?<br> 8. सत्संग सुधारस<br> 9. नाम अमृत सागर<br> 10. अमृत वाणी<br> 11. सद्गुरु नाम जहाज़ है<br> 12. चल हंसा सतलोक<br> 13. कोटि नाम संसार में तिनते<br> मुक्ति न होय<br> 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला<br> कोय<br> 15. गुरु सुमित्रै सो पार<br> 16. तीन लोक से न्यारा<br> 17. सेहत के लिए ज़रूरी </td> <td style="width: 50%; vertical-align: top;"> 18. सहजे सहज पाइये<br> 19. रोगों से छुटकारा<br> 20. सद्गुरु महिमा<br> 21. भक्ति के चोर<br> 22. अनुरागसागर वाणी<br> 23. भक्ति सागर<br> 24. हरि सेवा युग चार है, गुरु<br> सेवा पल एक<br> 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे<br> पतित अनेक<br> 26. काग पलट हंसा कर दीना<br> 27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग<br> खोजे बन माहिं<br> 28. गुरु पारस गुरु परस है<br> 29. गुरु अमृत की खान<br> 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो<br> भी सस्ता जान<br> 31. मूल सुरति<br> 32. भृंग मता होय जिहि पास,<br> सोई गुरु सत्य धर्मदासा </td> </tr> </tbody> </table>- मैं कहता हूँ आँखिन देखी
- गुरु संजीवन नाम बतावे
- नाम बिना नर भटक मरे
- रोगों की पहचान
- यह संसार काल को देशा
- न्यारी भक्ति
- साहिब तेरी साहिबी सब
घट रही समय - जाप मरे अजपा मरे अनहद
भी मर जाए - आयुर्वेद का कमाल रोगों के
निदान में - सुरति समानी नाम में
- सबकी गठरी लाल है, कोई
नहीं कंगाल - निन्दक जीवे युगन युग
काम हमारा होय। - निराले सदगुरु
- कुँजड़ों की हाट में हीरे का
क्या मोल - जीवड़ा तू तो अमर लोक का
पड़ा काल बस आई हो - मुझे है काम 'सदगुरु से
जगत रूठे तो रूठन दे' - जेहि खोजत कल्पो भये
घटहि माहिं सो मूर - आत्म ज्ञान बिना नर भटके
- बिन सतगुरु बाँचे नहीं
कोटिन करे उपाय - अँधी सुरति नाम बिन जानो
- सत्यनाम निज औषधि
सदगुरु दर्ई बताय - सेहत संजीवनी
- भक्ति दान गुरु दीजिए
- मन पर जो सवार है ऐसा
ऐसा विरला कोई - सत्यनाम है सार बूझौ सन्त
विवेक करि - रोग निवारक
- मुक्ति भेद मैं कहौं विचारी
- "तेरा बैरी कोई नहीं
तेरा बैरी मन" - सुरति का खेल सारा है
- सार शब्द निहअक्षर सारा
- करूँ जगत से न्यार
- बिन सत्संग विवेक न होई
- सत्य नाम को जनि कर दूजा
देई बहा - सुरत कमल सदगुरु स्थाना
- मनहिं निरंजन सबै नचाए
- सत्यपुरुष को जानसी
तिसका सतगुरु नाम