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भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

दशवां अध्याय। ३८१

दशवां अध्याय। ३८१
निषादो मार्गवं सूते दासं नौकर्मजीविनम् ।
कैवर्त्तमिति यं प्राहुरार्यावर्त्तनिवासिनः ॥ ३४ ॥
मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च ।
भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ॥ ३५ ॥
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते ।
वैदेहिकान्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥ ३६ ॥
चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।
आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ ३७ ॥
चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् ।
पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ ३८ ॥
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।
श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ३९ ॥
दस्यु से आयोगवी में 'सैरन्ध्र' जाति का पुत्र होता है । वह
दास न होकर भी केश सँभालना·हाथ-पैर दाबना वगैरह काम
करे और जाल से मृग आदि को पकड़े । वैदेह से आयोगवी स्त्री
में 'मैत्रेयक' जाति का पुत्र होता है । वह मधुरभाषी, सूर्योदय-स-
मय में घंटा आदि का शब्द करके राजा आदि भद्र पुरुषों की प्र-
शंसा का काम करे । निषाद, आयोगवी में मार्गव जाति का पुत्र
पैदा करता है वह दास भी कहाता है, नौका से जीविका करता
है और आर्यावर्त्तदेशनिवासी उसको 'कैवर्त्त' कहते हैं । इसी
प्रकार मृत मनुष्य वस्त्र पहननेवाली, क्ररस्वभाव, जूठने खाने
वाली आयोगवी में अपने पिता के भेद से अधम जातीय सैरन्ध्र,
मैत्रेय और मार्गवजाति के तीन पुत्र पैदा होते हैं । निषाद से
वैदेहीकन्या में कारावर जाति का पुत्र होता है, वह मोची का
काम करे । वैदेहिक से वैदेही में आंध्र और मेदजाति के पुत्र होते

[Header: ३८२ मनुस्मृति ।]

हैं वे गांव से बाहर रहें । चाण्डाल से वैदेही में पाण्डुसोपाक पैदा
होता है, वह वृक्षों की छाल से पंखा, सूप, आदि से जीविका
करे । निषाद से वैदेही में आहिण्डक, चाण्डाल से पुक्कसी में, सो-
पाक और चांडाल से निषादस्त्री में अन्त्यावसायी जाति के पुत्र
होते हैं । ये जल्लादी का काम करें, मरघटमें रहें । ये सब महादूषित
होते हैं ॥ ३२-३६ ॥

संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।
प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः॥४०॥
सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजधर्मिणः ।
शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाःस्मृताः ४१ ॥
तपो बीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे ।
उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ ४२ ॥
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ४३ ॥
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदापह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ४४ ॥
मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः ।
म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ४५ ॥
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः ।
ते निन्दितैर्वर्त्तेयुर्द्विजानामेव कर्मभिः ॥ ४६ ॥
सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सनम् ।
वैदेहकानां स्त्रीकार्यं मागधानां वणिक्पथः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार वर्णसंकरों की जातियां उनके माता-पिता के साथ

दसवां अध्याय। ३८३

दसवां अध्याय। ३८३
कही गई हैं। इन में छिपी या प्रकट जातियों को उनके कर्मों से
जानना चाहिए। अपनी जाति और पिछली जाति की स्त्री में द्विज
के पैदाकिए छः पुत्र उपनयन संस्कार के योग्य होते हैं। और प्रति-
लोम से उत्पन्न हुए सब शूद्र के समान माने जाते हैं। तप के प्रभाव
से (विश्वामित्र) और बीज के प्रभाव से (ऋष्यशृङ्ग) सब युगों
में मनुष्यजन्म की उंचाई और निचाई को प्राप्त होते हैं। पुंड्र, उड्र,
द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्व, चीन, किरात, दरद
और खसदेश के क्षत्रियगण धीरे धीरे धर्मक्रियाओं को छोड़ देने
से और धर्मोपदेशक ब्राह्मणों का संग न करने से वृषल-म्लेच्छ-
पने को प्राप्त होगये। इस जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-
जाति के पुरुष जो क्रिया के लोप से पतित जाति के होगए हों, वे
आर्यभाषा बोलें या म्लेच्छभाषा, पर उन को ‘दस्यु’ चोर सम-
झना चाहिए *। द्विजों में जिनको अपसद् वा वर्णसंकर कहा
है वे द्विजों के ही दूषित कामों से जीविका करें। सूतों का काम,
घोड़े का सारथि होना, अम्बष्ठों का चिकित्सा, वैदेहों का अन्तःपुर
का काम और मागधों का व्यापार कर्म है॥ ४०-४७॥
मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च।
मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् ॥ ४८ ॥
क्षत्तूग्रपुक्कसानां तु बिलौको वधबन्धनम् ।
धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥ ४९ ॥
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च ।

  • इसीलिए जिन देशों में ब्राह्मणादि आर्यजन निवास नहीं करते वे देश ‘कीकट’
    आदि निंद्य शब्दों से वेद में लिखे हैं। जैसा—‘किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः’।
    यास्क मुनि ने निरुक्त में व्याख्या की है—‘कीकटो नाम देशोऽनार्यनिवासः...’।
    शक, यवन आदि म्लेच्छों के भाषा शब्द हमारी आर्यभाषा से बहुत मिलते हैं।
    इससे अनुमान होता है सबका मूल कुटुम्ब एक ही था। देश और कर्म त्याग से
    अनार्य होगये हैं।

३८४ मनुस्मृति ।
वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ ५० ॥
चण्डालश्वपचानां तु बहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः ।
अपपात्राश्च कर्त्तव्या धनमेषां श्वगर्दभम् ॥ ५१ ॥
वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् ।
कार्ष्णाय समलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ ५२ ॥
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् ।
व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥ ५३ ॥
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने ।
रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ ५४ ॥
दिवाचरेयुः कार्यार्थ चिह्निता राजशासनैः ।
अबान्धवं चैव शवं निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥ ५५ ॥
निषादों का काम मछली मारना, आयोगव का लकड़ी काटना,
मेद, आंध्र, चंचु और मद्गुका वनपशुओंको मारना, क्षत्ता, उग्र और
पुक्कस का बिलों में रहनेवाले साँप, नौला को मारना वा पकड़ना ।
धिग्वसों का मोची का काम और वेणों का बाजा बनाने का काम
है । क्षत्ता आदि जातिवाले गाँव के पास प्रसिद्ध वृक्ष के नीचे,
श्मशान में, पर्वत पर, बगीचे में रहकर अपनी अपनी जीविका को
करें । चाण्डाल और श्वपच गाँव के बाहर रहें, इनके पात्रों को
काम में न लाना । कुत्ता, गधा आदि इनके धन हैं । ये मुरदा के
कफ़न धारण करें, फूटे पात्रों में भोजन करें, लोह के गहने पहनें
और रोज़ गांवों में घूमा करें । पुरुष को धर्माचरण के समय इन
चाण्डालों का दर्शन भी न करना चाहिए, इनका व्यवहार और
विवाह समान-जातिवालों में होना चाहिए । इनका भोजन परा-
धीन होवे, फूटे पात्रों में खाने को अन्न देवे और ये लोग रात में
गाँव या नगर में न फिरें । राजा की आज्ञा से चपड़ास पाए हुए

दसवां अध्याय । ३८५

दसवां अध्याय । ३८५
काम के लिए दिन में घूमैं और वे वारिश मुरदों को ले जावैं ।
यह मर्यादा है ॥ ४८-५५ ॥
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ।
वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ ५६ ॥
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् ।
आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ ५७ ॥
अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता ।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ ५८ ॥
पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।
न कथंचन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ ५६ ॥
कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ ६० ॥
यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः ।
राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ६१ ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः ।
स्त्रीबालाभ्युपपत्तौ च बाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ ६२ ॥
जिनको राजाज्ञा से फाँसी का दण्ड हुआ हो उनको शास्त्रानु-
सार मारे और उनके वस्त्र, शय्या, आभूषणों को लेवे । जातिभ्रष्ट,
वर्णसङ्कर, अपरिचित और आर्य मालूम होनेवाला ऐसे अनार्यों को
उनके कर्मों से पहचाने । असभ्यता, कठोरपन, क्रूरता और अना-
चार से लोक में पुरुष की वर्णसङ्करता प्रकट होती है । वर्णसङ्कर
अपने पिता का या माता का अथवा दोनों का स्वभाव पाता है ।
वह अपने स्वभाव-शील को किसी भांति छिपा नहीं सकता । वर्ण-
सङ्कर उत्तम कुल में पैदा होने पर भी अपने उत्पादक के स्वभाव
४६

३८६ मनुस्मृति ।
को कुछ न कुछ पाता ही है। जिस देश में ये वर्णदूषक सन्तान होते
हैं वह देश प्रजा के साथ जल्द ही बिगड़ जाता है। ब्राह्मण, गौ,
स्त्री और बालरक्षा के लिए निष्कामभाव से प्राण छोड़ने से प्रति-
लोमजों को उत्तम जाति में जन्म मिलता है ॥ ५६-६२ ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः ॥ ६३ ॥
चारों वर्णों के धर्म-कर्म-जीविका आदि।
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, पवित्रता और इन्द्रिय-निग्रह
यह चारों वर्णों का संक्षिप्त-धर्म मनुजी ने कहा है ॥ ६३ ॥
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत्प्रजायते ।
अश्रेयान् श्रेयसीं जातिं गच्छत्यासप्तमाद्युगात् ॥ ६४॥
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ६५ ॥
अनार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणात्तु यदृच्छया ।
ब्राह्मण्यामप्यनार्याच्च श्रेयस्त्वं केति चेद्भवेत् ॥ ६६ ॥
जातो नार्यामनार्यायामार्यादार्यो भवेद्गुणैः ।
जातोऽप्यनार्यादार्यायामनार्य इति निश्चयः ॥ ६७ ॥
तावुभावप्यसंस्कार्याविति धर्मो व्यवस्थितः ।
वैगुण्याज्जन्मनः पूर्व उत्तरः प्रतिलोमतः ॥ ६८ ॥
ब्राह्मण से शूद्रा में कन्या हो, वह कन्या ब्राह्मण को विवाहित
हो, उसके भी कन्या हो और वह भी ब्राह्मण को दी जाय, यों सा-
तवीं पुस्त में जो पुरुष उत्पन्न होगा, उसका पूर्वज पारशव होने पर
भी वह पुरुष ब्राह्मण माना जाता है। शूद्र जैसे ब्राह्मणता को पाता

दशवां अध्याय । ३८७

दशवां अध्याय । ३८७
है वैसे ही ब्राह्मण शूद्रता को पाता है । ऐसे ही क्षत्रिय से शूद्रा में
उत्पन्न पुत्र छठी पीढ़ी में शूद्र होता है और वैश्य से शूद्रा में उ-
त्पन्न पांचवीं पीढ़ी में शूद्र होता है। ब्राह्मण से शूद्रा में और शूद्र
से ब्राह्मणी में दैवेच्छा से पुत्र पैदा हो, उनमें श्रेष्ठता इस प्रकार है-
ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र यज्ञादि कर्म करताहो तो 'आर्य'
कहलाता है। और शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ, 'अनार्य' कह -
लाता है। पहला नीच जाति में होने से और दूसरा प्रतिलोम होने
से दोनों संस्कार के अयोग्य हैं। यह धर्म की मर्यादा है ॥ ६४-६८॥
सुवीजं चव सुक्षेत्रे जातं संपद्यते यथा ।
तथाऽऽर्याज्जात आर्यायां सर्वं संस्कारमर्हति ॥ ६६ ॥
वीजमेके प्रशंसन्ति क्षेत्रमन्ये मनीषिणः ।
वीजक्षेत्रे तथैवान्ये तत्रेयं तु व्यवस्थितिः ॥ ७० ॥
अक्षेत्रे वीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति ।
अवीजकमपि क्षेत्रं केवलं स्थण्डिलं भवेत् ॥ ७१ ॥
अच्छा बीज अच्छे खेत में बोने से जैसे अच्छा होता है, वैसे आर्य
से आर्या में पैदा हुआ पुत्र सब संस्कार के योग्य होता है। कोई वि-
द्वान् बीज की प्रशंसा करते हैं, कोई क्षेत्र की प्रशंसा करते हैं, कोई
बीज और क्षेत्र दोनों की प्रशंसा करते हैं, उसमें व्यवस्था यों है-
ऊसर में बोया बीज बीच ही में नष्ट हो जाता है और विना बीज के
खेत कोरा-सपाट पड़ा रहता है ॥ ६६-७१ ॥
यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन् ।
पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ॥ ७२ ॥
अनार्यमार्यकर्माणमार्यं चानार्यकर्मिणम् ।
संप्रधार्याब्रवीद्धाता न समौ नासमाविति ॥ ७३ ॥

३८८ मनुस्मृति ।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।
ते सम्यगुपजीवेयुः षट् कर्माणि यथाक्रमम् ॥ ७४ ॥
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ ७५ ॥
षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका ।
याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥ ७६ ॥
त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति ।
अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ७७ ॥
वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।
न तौ प्रति हि तान् धर्मान् मनुरह प्रजापतिः ॥ ७८ ॥
शस्त्रास्त्रभृत्वं क्षत्रस्य वणिक्पशुकृषिर्विशः ।
आ जीवनार्थं धर्मस्तु दानमध्ययनं यजिः ॥ ७६ ॥
क्योंकि बीज केही प्रभाव से हरिणी आदि में ऋष्यशृङ्ग उत्पन्न
हुए और माननीय-पूज्य हुए इसलिए बीज उत्तम माना जाता है।
शूद्र द्विज का कर्म और द्विज शूद्र का कर्म करता हो तो दोनों की
तुलना करके ब्रह्मा ने कहा है-शूद्र द्विजकर्म में अनधिकारी होने से और
ब्राह्मण निषिद्ध आचरण करने से समान नहीं है। क्योंकि गुण-
स्वभाव के बिना केवल कर्म से अनार्य, आर्य नहीं होसकते । जो
ब्रह्मयोनिज ब्राह्मण हैं, वे अच्छे प्रकार इन छः कर्मों का अनुष्ठान करें
पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना।
ब्राह्मण के ये छः कर्म हैं । इनमें यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्धदान
लेना ये तीन कर्म जीविका हैं। ब्राह्मण के धर्मों से क्षत्रिय के तीन
धर्म छूटे हैं पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना । अर्थात् इन कामों
को क्षत्रिय न करें । और वैश्य भी न करें, यही शास्त्रमर्यादा है।
क्योंकि प्रजापति ने क्षत्रिय, वैश्य के लिए ये धर्म नहीं कहे हैं।

दशवां अध्याय। ३८६

दशवां अध्याय। ३८६
शस्त्र, अस्त्र धारण करना क्षत्रिय की और व्यापार, पशुपालन,
खेती वैश्य की आजीविका के लिए हैं और दान देना, वेद पढ़ना,
यज्ञकरना, इन दोनों का धर्म है ॥ ७२-७९ ॥
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् ।
वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥ ८० ॥
अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा ।
जीवेत्क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ८१ ॥
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥ ८२ ॥
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा ।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ८३ ॥
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्भिगर्हिता ।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयोमुखम् ॥ ८४ ॥
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम् ।
विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ ८५ ॥
सर्वान् रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह ।
अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ ८६ ॥
सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च ।
अपि चेत्स्युररक्तानि फलमूले तथौषधीः ॥ ८७ ॥
ब्राह्मण का वेदाभ्यास करना, क्षत्रिय का रक्षा करना और वैश्य
का व्यापार करना ये अपने अपने कर्मों में विशेष कर्म हैं। ब्राह्मण
यदि वेद पढ़ाकर अपनी जीविका न करसके तो क्षत्रिय के कर्म से
जीविका करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों के कर्मों से जीविका न

३६० मनुस्मृति ।
करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे।
ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी
खेती को कभी न करे। कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह
सत्पुरुषों में निन्दित है। क्योंकि इसमें हलसे जीव हिंसा, अवर्षा-
सूखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है। ब्राह्मण और क्षत्रिय की
जीविका अपने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे
वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें। ब्राह्मण सब भांति के रस,
सब अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुओं को न बेंचे। सब प्रकार के
लाल वस्त्र, सन-अलसी-ऊन के विनारँगे वस्त्र, फल, कंद, औषधों
को न बेंचे ॥ ८०-८७ ॥
अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥
आरण्यांश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च ।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥
काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।
विक्रीणीत तिलाञ्छुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥
भोजनाभ्यञ्जनादानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः ।
कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च ।
त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥
इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।
ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥
जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध,
शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु,
पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका

दशवां अध्याय। ३६१

दशवां अध्याय। ३६१
व्यापार न करे। ब्राह्मण किसान खेती करके तिल पैदा किये हो तो
उसको यज्ञादि के लिए बेंच डाले। जो पुरुष भोजन, दान और
स्नान के सिवा, दूसरे कामों में तिलका उपयोग करता है वह कीड़ा
होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में डूबता है। मांस, लाख
और लोन बेंचने से ब्राह्मण तुरंत पतित होजाता है। और दूध
बेंचने से तीन दिनमें शूद्र होजाता है ॥ ८८-९३ ॥
रसा रसैर्निसातव्या न त्वेव लवणं रसैः ।
कृतान्नं चाकृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः ॥ ९४॥
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः ।
न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ ९५ ॥
ऊपर गिनाये पदार्थों को छोड़कर, दूसरे शास्त्र में निषिद्ध पदार्थों
को यदि ब्राह्मण इच्छा से बेंचता है, तो वह सात रात्रि के बाद,
वैश्यपने को पाता है। गुड़ आदि रसोंका घी आदि रसोंसे बदला
करे, किन्तु लोन का रसों से बदला न करे। पका अन्न, कच्चा अन्न
से और तिल दूसरे अन्न से बदल लेवे। इन विधियों से आपत्ति
में पड़ा क्षत्रिय भी वैश्यवृत्ति से जीवन निर्वाह करे। परन्तु ब्राह्मण
की जीविका से कभी जीविका न करे ॥ ९४-९५ ॥
यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः ।
तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ ९६ ॥
वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ।
परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ॥ ९७ ॥
वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् ।
अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ ९८ ॥
अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम् ।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः ॥ ९९ ॥

३६२ मनुस्मृति ।
यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः ।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१००॥
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्शितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः ।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥
जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी-
विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना
धर्म किसी अंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म
सर्वांग पूर्ण भी अच्छा नहीं । क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका
करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी
वृत्ति से जीविका न कर सके तो शूद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर
सकता है । पर जूठा खाना आदि न करे और दुःख के दिन बीत
जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शूद्र द्विजोंकी सेवा न कर सके
औरउसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हों तो शिल्प कार्य से जीविका करे।
जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश
मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में
स्थित, जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे ।
क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता ।
आपत्तिकाल में, निंदित को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे
दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और
जल के समान पवित्र हैं ॥ ९६-१०३ ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥

दशवां अध्याय। ३६३

दशवां अध्याय। ३६३
अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पद् बुभुक्षितः ।
न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ १०५ ॥
श्वमांसमिच्छन्नार्त्तोऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ॥ १०६ ॥
भरद्वाजः क्षुधार्तस्तु सपुत्रो विजने वने ।
बह्वीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्षणो महातपाः ॥ १०७ ॥
क्षुधार्त्तश्चात्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् ।
चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ॥ १०८ ॥
प्राणान्त दुःख न पड़कर, जो पुरुष मनमाना अन्न खाता है,
वह कीच से आकाश के समान, पाप से लिप्त नहीं होता। भूखसे
दुःखी अजीगर्त ऋषि (सौ गो के लोभ से) पुत्र मारने को तैयार
हुए थे पर उन्हें दोष नहीं लगा। धर्माधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि
क्षुधा से प्राणरक्षार्थ कुत्ता का मांस खाना चाहा। महातपस्वी
भरद्वाज पुत्रसहित निर्जन वन में क्षुधा से पीड़ित होकर, वृधु-
नामक बढ़ई से बहुत गौ दान में लीथीं। धर्माधर्म के ज्ञाता, विश्वा-
मित्र भूख से दुःखी होकर, चाण्डाल के हाथ से कुत्ता की जाँघ
लेकर, खाने को उद्यत हुए थे ॥ १०४-१०८ ॥
प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि ।
प्रतिग्रहः प्रत्यंवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ॥ १०६ ॥
याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम् ।
प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ॥ ११० ॥
जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम् ।
प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ॥ १११ ॥
५०

३६४ मनुस्मृति ।
दान लेना, यज्ञ कराना और वेद पढ़ाना इनमें दान लेना अधम
है और ब्राह्मण को मृत्यु के बाद परलोक में दुःख देता है।
क्योंकि याजन और अध्यापन संस्कार वालों को कराये जाते हैं।
और प्रतिग्रह शूद्र से भी लिया जाता है । अनुचित-याजन और
अध्यापन का पाप जप, होम से दूर होता है और प्रतिग्रह का पाप
वस्तु के त्याग से या तप से दूर होता है ॥ १०६-१११ ॥
शिलोञ्छमप्याददीत विप्रोऽजीवन्यतस्ततः ।
प्रतिग्रहाच्छिलः श्रेयांस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते ॥११२॥
सीदद्भिः कुप्यमिच्छद्भिर्धनं वा पृथिवीपतिः ।
याच्यः स्नातकैर्विप्रैरदित्संस्त्यागमर्हति ॥ ११३ ॥
अकृतं च कृतात्क्षेत्राद्गौरजाविकमेव च ।
हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्वं पूर्वमदोषवत् ॥ ११४ ॥
सप्तवित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः ।
प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ११५ ॥
विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः ।
धृतिर्भैक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ ११६ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं चैव प्रयोजयेत् ।
कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम् ॥११७॥
चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि ।
प्रजा रक्षन् परं शक्त्या किल्बिषात् प्रतिमुच्यते ॥११८॥
स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात्पराङ्मुखः ।
शस्त्रेण वैश्यान् रक्षित्वा धर्म्यमाहारयेद्बलिम्॥११९॥
किसी उपाय से जीविका न कर सके तो ब्राह्मण शिल, उञ्छको

दशवां अध्याय। ३६५

दशवां अध्याय। ३६५
भी ले लेय। क्योंकि प्रतिग्रहसे शिल श्रेष्ठहै और उञ्छ उससे भी श्रेष्ठ
माना जाता है। जो स्नातक ब्राह्मण निर्धनता से दुःख भोगता हो
वह राजा से अन्न, वस्त्र या धन मांगे यदि न दे तो उसको
त्यागदे। बिना जोता खेत, गौ, बकरा, मेढ़ा, सोना, कच्चा और
पक्का अन्न इनमें अगले अगले से पहले पहले निर्दोष माने जाते
हैं। दायभाग का दावा आदि से मिले, बेचने में मिले, विजय से
मिले, ब्याज में मिले, परिश्रम से मिले या सत्पुरुषों से दान मिले
ये सात प्रकार की धन की प्राप्ति धर्मानुकूलहै। विद्या, कारीगरी,
नौकरी, सेवा, पशुपालन, व्यापार, खेती, सन्तोष, भिक्षा और
ब्याज ये दश जीविका के साधनहैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय आपत्ति
में भी ब्याजपर धन न दें। परन्तु धर्मार्थ किसान वगैरह को थोड़े
ब्याजपर कुछ द्रव्य दे देवे। राजा आपत्ति में भी चौथा भाग ले-
कर यदि प्रजा की पूरी रक्षा करे तो पातकों से छूट जाता है।
युद्ध करना क्षत्रिय का निजधर्म है, इसलिए युद्ध से मुँह न फेरे।
वैश्यों की शस्त्र से रक्षा करके, अपने राजकीय-कर को ग्रहण
करे ॥ ११२-११६ ॥
धान्येऽष्टमं विंशं शुल्कं विंशं कार्षापणावरम् ।
कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ॥ १२० ॥
शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षन् क्षत्रमाराधयेद्यदि ।
धनिनं वाप्युपाराध्य वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत् ॥१२१॥
स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः ।
जातब्राह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १२२ ॥
विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्टं कर्म कीर्त्यते ।
यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम् ॥ १२३ ॥
प्रकल्प्या अस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद्यथार्हतः ।
शक्तिं चावेक्ष्य दाक्ष्यं च भृत्यानां च परिग्रहम् ॥१२४॥

३६६ मनुस्मृति ।
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च ।
पुल्काश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः॥१२५॥
न शूद्रे पातकं किञ्चिन्न च संस्कारमर्हति ।
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥१२६॥
राजा वैश्यों से अन्नका आठवां भाग लेय और कार्षापण तक
सराफ़ी के लाभ पर बीसवां भाग ले और शूद्र मज़दूर, कारी-
गरोंसे काम कराले। ब्राह्मण की सेवासे शूद्र जीविका न करसके तो
क्षत्रिय वा धनी वैश्य की सेवा करके, जीविका करे । परन्तु लोक
परलोक दोनों में सुख चाहनेवाला शूद्र ब्राह्मण की सेवा करे ।
अमुक शूद्र अमुक ब्राह्मण का आश्रित है, ऐसा कहलाने से ही
शूद्र कृतार्थ होता है। ब्राह्मणसेवाही शूद्र का प्रधान कर्म है । इस
के सिवा उसके कर्म निष्फल हैं । ब्राह्मण सेवकों की काम करनेकी
शक्ति, बुद्धिमानी और परिवार को देखकर योग्यतानुसार अन्न,
वस्त्र, पुराने ओढ़ने, बिछौने वगैरह देवे । सेवक शूद्र को लसुन
आदि अभक्ष्य-भक्षण से कोई पातक नहीं लगता । उनका उपनयन
आदि संस्कार भी नहीं होता । अग्निहोत्रादि धर्म में उनका अधि-
कार नहीं है और बिना मन्त्र होम आदि का निषेध भी नहीं है ।
वह भक्तिसे करसकता है ॥ १२०-१२६ ॥
धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तमनुष्ठिताः ।
मन्त्रवर्ज्यं न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ॥ १२७ ॥
यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः ।
तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ॥१२८॥
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचयः ।
शूद्रोऽपि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ॥ १२६ ॥
एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।

दशवां अध्याय । ३६७

दशवां अध्याय । ३६७
यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्ति परमां गतिम् ॥ १३०॥
एष धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वर्ण्यस्य कीर्तितः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ १३१ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
धर्मज्ञ शूद्र धर्म संपादन की इच्छा से मन्त्र के विना सत्पुरुषों
के आचरण करते हुए दोष नहीं किन्तु प्रशंसा को प्राप्त होते हैं।
शूद्र जैसे जैसे सदाचार का पालन करता है वैसे वैसे लोक में
प्रशंसा पाता है और मरकर उत्तम लोक का भागी होता है।
समर्थ भी शूद्र धनसंग्रह न करे, क्योंकि शूद्र धन पाकर ब्राह्मणों
को दुःख देता है। इसप्रकार ये सब चारों वर्णों के आपत्काल
के धर्म कहे गए हैं। जो अपने अपने धर्म का भलीभांति सेवन
करते हैं वे परमगति को पाते हैं। यह चारों वर्गों की धर्मविधि
पूरी हुई। अब प्रायश्चित्त की विधि कहेंगे ॥ १२७-१३१ ॥
दशवां अध्याय समाप्त ॥

३६८ मनुस्मृति।
अथ एकादशोऽध्यायः।
सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सर्ववेदसम् ।
गुर्वर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायार्थ्युपतापिनौ ॥ १ ॥
नवैतान् स्नातकान् विद्याद्ब्राह्मणान् धर्मभिक्षुकान् ।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ॥ २ ॥
एतेभ्योऽपि द्विजाग्र्येभ्यो देयमन्नं सदक्षिणम् ।
इतरेभ्यो बहिर्वेदि कृतान्नं देयमुच्यते ॥ ३ ॥
सर्वरत्नानि राजा तु यथार्हं प्रतिपादयेत् ।
ब्राह्मणान् वेदविदुषो यज्ञार्थं चैव दक्षिणाम् ॥ ४ ॥
कृतदारोऽपरान् दारान् भिक्षित्वा योऽधिगच्छति ।
रतिमात्रं फलं तस्य द्रव्यदातुस्तु संततिः ॥ ५ ॥
धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत् ।
वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्गं समश्नुते ॥ ६ ॥
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये ।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ७ ॥
ग्यारहवां अध्याय।
धर्म-भिक्षुक !
सन्तानार्थ विवाह करनेवाला, यज्ञ करने की इच्छावाला, मार्ग
चलनेवाला, यज्ञ में सर्वस्व दक्षिणा देनेवाला, गुरु, माता और
पिता के लिए धन का अर्थी, विद्यार्थी और रोगी इन नौ स्नातक
ब्राह्मणों को धर्मभिक्षुक जानना चाहिए । ये सब निर्धन हों तो
विद्या के अनुसार इनको दान देना चाहिए । इन ब्राह्मणों को

ग्यारहवां अध्याय । ३६६

ग्यारहवां अध्याय । ३६६
दक्षिणा के साथ अन्न देना और दूसरों को यज्ञ वेदी के बाहर
पकाया अन्न देना कहा है। राजा यज्ञ-दक्षिणा में उत्तम वस्तुओं
को योग्यता के अनुसार देवे। जो विवाहित पुरुष भीख मांगकर
दूसरा विवाह करता है उसको रतिमात्र फल है और उसकी
सन्तान द्रव्य देनेवाले की होती है। जो लोग विरक्त-वेदज्ञ-ब्रा-
ह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं। जिस
के पास कुटुम्बियों के निर्वाहार्थ तीन साल तक का या अधिकं
अन्न हो, वह सोमयाग करने योग्य होता है ॥ १-७ ॥
अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः ।
स पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम् ॥ ८ ॥
शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि ।
मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ॥ ६ ॥
भृत्यानामुपरोधेन यत्करोत्यौर्ध्वदैहिकम् ।
तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितस्य मृतस्य च ॥ १० ॥
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ११ ॥
यो वैश्यः स्याद्बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात्तस्य तद् द्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ॥ १२ ॥
आहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
नहि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ॥ १३ ॥
इससे कम द्रव्य होने में जो द्विज सोमयाग करता है उसका
पहला सोमयज्ञ भी नहीं पूरा पड़ता। इसलिए दूसरा कभी न करे।
जो कुटुम्ब को दुःखी होते दूसरों को धन देता है, वह पहले तो
अच्छा लगता है, परन्तु परिणाम में विष के स्वाद सा भयानक
मालूम होता है। यह केवल धर्म का झूंडारूप है। कुटुम्बियों को

४०० मनुस्मृति ।
दुःख देकर, जो पुरुष परलोक के लिए दानादि करता है, वह
लोक-परलोक में दुःख फल को करता है । धार्मिक राजा के होते
हुए क्षत्रियादि यजमानों का विशेष करके ब्राह्मण का यज्ञ किसी
अङ्ग से रुका हो तो धनी वैश्य से जो सोमयज्ञ से रहित हो, उस
के धन से मदद ले लेनी चाहिए। यज्ञ में दो वा तीन अङ्ग अधूरे
हों और वैश्य से उतना धन न मिले तो शूद्र के घर से यथेच्छ
धन ले लेय, क्योंकि शूद्र का यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं
है ॥ ८-१३ ॥
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ १४ ॥
आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः ।
तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ॥ १५ ॥
तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता ।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ १६ ॥
जो अग्निहोत्री नहीं है ओर सौ १०० गौ का धन रखता है
और जिसने यज्ञ न किया हो, पर हज़ार १००० गौ का धन हो,
उन दोनों के घर से भी धन लेना चाहिए । जो ब्राह्मण नित्य दान
लेता हो पर दान देता न हो, वहभी यज्ञार्थ धन दे तो ले लेना
चाहिए । इस कर्म से उसका यश और धर्म बढ़ता है । जिसने तीन
दिन तक भोजन न किया हो वह सातवीं खुराक धर्महीन पुरुष से
भी अन्न ले लेवे तो कोई दोष नहीं है ॥ १४-१६ ॥
खलात्क्षेत्राद्गाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते ।
आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति ॥ १७ ॥
ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन ।
दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन् हर्तुमर्हति ॥ १८ ॥