भारतकोश
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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

२७६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

अन्य समस्त राजाओंको भी बाँध लीजिये।' उन सबकी यह बात सुनकर वीरपुत्रा वीराने, जो वीरवंशमें उत्पन्न एवं वीर पतिकी पत्नी थी, हर्षमें भरकर कहा—'राजाओ ! मेरे पुत्रने समस्त राजाओंको जीतकर जो बलपूर्वक कन्याको अपने अधिकारमें कर लिया है, यह ठीक ही किया है। इसके लिये मनमें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। उसका युद्धमें बन्दी होना प्रशंसाकी ही बात है। अब तुमलोगोंके मस्तकपर भी अस्त्र-शस्त्रोंके गिरनेका समय आ पहुँचा है। युद्धके लिये शीघ्रता करो। अपने-अपने रथोंपर सवार हो जाओ। हाथी, घोड़े और सारथियोंको भी जल्दी तैयार करो। विलम्ब नहीं होना चाहिये। जो सबको परास्त करके शोभा पाता है, वही शूर है। जैसे सूर्य अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, उसी प्रकार शूरवीर शत्रुओंको हराकर यशस्वी होता है।'

इस प्रकार पत्नीके उत्साहित करनेपर राजा करन्धमने पुत्रके शत्रुओंका वध करनेके लिये सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर उनका विशाल और उनके साथियोंके साथ घोर युद्ध हुआ। तीन दिनतक युद्ध होनेके पश्चात् विशाल और उनके सहायक राजाओंका मण्डल जब प्रायः पराजित हो गये, तब राजा विशाल हाथमें अर्घ्य लेकर महाराज करन्धमके पास आये। उन्होंने बड़े प्रेमसे करन्धमका पूजन किया। उनका पुत्र अवीक्षित बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। राजाने एक रात वहाँ बड़े सुखसे व्यतीत की। दूसरे दिन राजा विशाल अपनी कन्याको साथ लेकर महाराज करन्धमके पास उपस्थित हुए। उस समय अवीक्षितने अपने पिताके सामने ही कहा—'मैं इसको तथा दूसरी किसी युवतीको भी अब नहीं ग्रहण करूँगा, क्योंकि इसके देखते-देखते शत्रुओंद्वारा युद्धमें परास्त हो गया। अब आप किसी औरके साथ इसका विवाह कर दें अथवा यह उस पुरुषका वरण करे, जिसका यश और पराक्रम अखण्डित हो तथा जिसे शत्रुओंके हाथसे अपमानित न होना पड़ा हो। पुरुष सबल होनेके कारण स्वतन्त्र होता है और स्त्रियाँ अबला होनेके कारण सदा परतन्त्र रहती हैं। परन्तु जहाँ पुरुष भी दूसरेके परतन्त्र हो गया, वहाँ उसमें मनुष्यता ही क्या रह गयी। जब इसके सामने ही राजाओंने मुझे पृथ्वीपर गिरा दिया, तब अब मैं इसे अपना मुँह कैसे दिखाऊँगा?' अवीक्षितके ऐसा कहनेपर राजा विशालने अपनी पुत्रीसे कहा—'बेटी! इन महात्माकी बात तुमने सुनी है न? शुभे! जिसमें तुम्हारी रुचि हो, ऐसे किसी दूसरे पुरुषको पतिरूपमें वरण करो अथवा हम जिसे तुम्हें दे दें, उसीका तुम आदर करो।'

कन्या बोली—पिताजी! यद्यपि संग्राममें इनके यश और पराक्रमकी हानि हुई है, तथापि ये उसमें धर्मानुकूल बर्ताव करते रहे हैं। वे अकेले थे तो भी बहुतोंने मिलकर इन्हें परास्त किया है; अतः वास्तवमें इनकी पराजय हुई, यह कहना ठीक नहीं है। युद्धके लिये जब बहुत-से राजा आये, तब ये उनमें सिंहकी भाँति अकेले घुस गये और निरन्तर डटकर सामना करते रहे। इससे इनका महान् शौर्य प्रकट हुआ है। ये वीरता और पराक्रमसे युक्त होकर धर्मयुद्धमें संलग्न थे। ऐसे समयमें समस्त राजाओंने मिलकर इनपर अधर्मपूर्वक विजय पायी है। अतः इसमें इनके लिये लज्जाकी कौन-सी बात है। तात! मैं इनके रूप मात्रपर लुभा गयी हूँ, ऐसी बात नहीं है, इनकी वीरता, पराक्रम और धीरता आदि सद्गुण मेरे चित्तको चुराये लेते हैं। अतः अब अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है। आप मेरे लिये महाराजसे इन्हीं

• स्तूप, विविक्त, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७७

महानुभावकी याचना कीजिये। इनके सिवा दूसरा कोई पुरुष मेरा पति नहीं हो सकता।

विशालने कहा—राजकुमार! मेरी पुत्रीने बहुत अच्छी बातें कही हैं। इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारे जैसा वीर कुमार इस भूतलपर दूसरा कोई नहीं है। तुम्हारे शौर्यकी कहीं समता नहीं है। तुम्हारा पराक्रम अनन्त है। वीर! तुम मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके मेरे कुलको पवित्र करो।

तब महाराज करन्धमने अपने पुत्रको समझाते हुए कहा—'बेटा! तुम राजा विशालकी कन्याको स्वीकार करो। इस सुन्दरीका तुम्हारे प्रति अत्यन्त दृढ़ अनुराग है।'

राजकुमारने कहा—पिताजी! मैंने पहले कभी आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं किया है; अतः ऐसी आज्ञा दीजिये, जिसका मैं पालन कर सकूँ।

उस राजकुमारका अत्यन्त निश्चित विचार देख विशालने व्याकुल होकर अपनी कन्यासे कहा—'बेटी! अब तुम इनकी ओरसे अपना मन हटा लो और दूसरेको पतिरूपमें वरण करो। यहाँ बहुत-से राजकुमार हैं।'

कन्या बोली—पिताजी! यदि ये मुझको नहीं ग्रहण करना चाहते तो मैं तपस्या करके इन्हें अपना पति बनाऊँगी। इस जन्ममें इनके सिवा दूसरा कोई मेरा पति नहीं होगा।

तदनन्तर राजा करन्धम राजा विशालके साथ प्रसन्नतापूर्वक तीन दिनोंतक टिके रहे, फिर अपने नगरको लौट आये। अवीक्षितको उनके पिता तथा अन्य राजाओंने प्राचीन दृष्टान्तोंके द्वारा बहुत कुछ समझाया। इससे वे भी उनके साथ नगरमें लौट आये। राजकन्या वैशालिनी अपने बन्धु-बान्धवोंसे विदा ले वनमें चली गयी और वहाँ दृढ़ वैराग्यमें स्थित हो निराहार रहकर तपस्या करने लगी। तीन महीनोंतक उपवास करनेके बाद उसको बड़ी पीड़ा हुई। वह अत्यन्त दुबली हो गयी और उसके शरीरकी एक-एक नाड़ी दिखायी देने लगी। उसका उत्साह मन्द पड़ गया। वह मरणासन्न हो चली। तब उस राजकुमारीने शरीर त्याग देनेका विचार किया। उसका अभिप्राय जानकर देवताओंने उसके पास एक दूत भेजा। दूतने वहाँ आकर कहा—'राजकुमारी! मैं देवताओंका दूत हूँ। देवताओंने तुम्हारे पास मुझे जिस कार्यके लिये भेजा है, उसे सुनो। यह मानव-शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। तुम अकारण इसका परित्याग न करो। कल्याणी! तुम चक्रवर्ती राजाकी जननी होओगी। तुम्हारा पुत्र अपने शत्रुओंका संहार करके सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका अखण्ड राज्य भोगेगा। कहीं भी उसकी आज्ञाका उल्लङ्घन न होगा। वह चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें स्थापित करके उन सबका पालन करेगा। लुटेरों, म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करेगा। उत्तम दक्षिणाओंसे पूर्ण नाना प्रकारके यज्ञ करेगा। उसके द्वारा अश्वमेध आदि यज्ञोंका छः हजार बार अनुष्ठान होगा।'

वह दूत आकाशमें ही खड़ा था। उसके शरीरपर दिव्य हार और चन्दन शोभा पा रहे थे। उसे इस रूपमें देख राजकन्याने कोमल वाणीमें कहा—'तुम देवताओंके दूत हो, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। सचमुच ही तुम स्वर्गसे यहाँ आये हो; किन्तु तुम्हीं बताओ, पतिके बिना मुझे पुत्र कैसे होगा? मैंने पिताके समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि इस जन्ममें अवीक्षितके सिवा दूसरा कोई पुरुष मेरा पति नहीं होगा; किन्तु वे अवीक्षित मेरे पिताके, अपने पिताके तथा स्वयं मेरे कहनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण करना चाहते।'

देवदूतने कहा—'महाभागे! बहुत कहनेसे क्या लाभ है। तुम्हें पुत्र अवश्य होगा। तुम अधर्मपूर्वक इस शरीरका त्याग न करो। इसी

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वनमें रहो और अपने दुर्बल शरीरका पोषण करो। तपस्याके प्रभावसे तुम्हारा सब कुछ भला ही होगा।

यों कहकर देवदूत जैसे आया था, लौट गया तथा वह सुन्दरी प्रतिदिन अपने शरीरका पोषण करने लगी।

उधर अवीक्षितकी वीरप्रसविनी माता वीराने किसी शुभ दिनको अपने पुत्र अवीक्षित्‌को पास बुलाया और इस प्रकार कहा—'बेटा! मैं तुम्हारे पिताकी आज्ञासे एक व्रत करूँगी। उसका नाम किमिच्छक व्रत है, किन्तु वह है बहुत दुष्कर। फिर भी उसके करनेसे कल्याण ही होगा। यदि तुम कुछ बल और पराक्रम दिखाओ तो वह अवश्य साध्य हो जायगा। तुम्हारे लिये वह असाध्य हो या दुःसाध्य, यदि तुम उसके लिये प्रतिज्ञा कर लोगे तो मैं उसका अनुष्ठान आरम्भ कर दूँगी। अब तुम्हारा जो विचार हो, सो कहो।'

अवीक्षित बोले—माँ! यदि पिताजीने तुम्हें आज्ञा दे दी है तो तुम निश्चिन्त होकर किमिच्छक व्रतका अनुष्ठान करो। मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता न करो।

तदनन्तर महारानी वीराने उपवासपूर्वक उस व्रतका आरम्भ किया तथा शास्त्रोंमें बताये अनुसार कुबेरकी, सम्पूर्ण निधियोंकी, निधिपालगणोंकी और लक्ष्मीजीकी बड़ी भक्तिके साथ पूजा की। उन्होंने अपने मन, वाणी और शरीरको काबूमें कर लिया था। उधर महाराज करन्धम जब एकान्त घरमें बैठे हुए थे, उस समय नीति-शास्त्र-विशारद मन्त्रियोंने उनके पास जाकर कहा—'राजन्! इस पृथ्वीका शासन करते हुए आपकी वृद्धावस्था आ गयी। आपके एक ही पुत्र हैं अवीक्षित, जिन्होंने स्त्रीका सम्पर्क ही छोड़ दिया है; इससे आपका वंश अब लुप्त हो जायगा। पितरोंको पिण्ड और पानी देनेवाला कोई नहीं रहेगा। अतः आप ऐसा कोई यत्न कीजिये, जिससे आपका पुत्र पितरोंका उपकार करनेवाली बुद्धि ग्रहण करे—विवाह करनेपर राजी हो जाय।'

इसी समय राजा करन्धमके कानोंमें एक आवाज आयी। रानी वीराके पुरोहित याचकोंसे कह रहे थे, 'कौन क्या चाहता है? किसके लिये कौन-सी वस्तु दुःसाध्य है, जिसका साधन किया जाय? महाराज करन्धमकी रानी किमिच्छक व्रतका अनुष्ठान करती हैं; अतः जिसकी जो इच्छा हो, वह पूर्ण की जायगी।' पुरोहितकी बात सुनकर राजकुमार अवीक्षित्‌ने भी राजद्वारपर आये हुए समस्त याचकोंसे कहा—'मेरी परम सौभाग्यवती माता किमिच्छक-व्रत कर रही हैं; अतः मेरे शरीरसे किसीका कोई कार्य सिद्ध होनेवाला हो तो वह बतलावे। सब याचक सुन लें, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ। इस किमिच्छक-व्रतके अनुष्ठानके अवसरपर तुमलोग क्या चाहते हो, बताओ! उसे मैं दूँगा।'

अपने बेटेके मुखसे यह बात सुनकर महाराज करन्धम तुरंत सामने आये और बोले—'मैं याचक हूँ। मुझे मेरी माँगी हुई वस्तु दो।'

अवीक्षित बोले—तात! आपको क्या देना है? बतलाइये। मेरा कर्तव्य दुष्कर हो, साध्य हो अथवा अत्यन्त दुःसाध्य हो; बताइये मैं उसे पूर्ण करूँगा।

राजाने कहा—यदि तुम सत्यप्रतिज्ञ हो और सबको इच्छानुसार दान देते हो तो मेरी गोदमें पौत्रका मुँह दिखलाओ।

अवीक्षित बोले—महाराज! मैं आपका एक ही पुत्र हूँ और ब्रह्मचर्यका पालन मेरा व्रत है। मेरे कोई पुत्र है ही नहीं, फिर आपको पौत्रका मुख कैसे दिखाऊँ?

• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७९


राजाने कहा—बहुत कहनेसे क्या लाभ, तुम ब्रह्मचर्यको छोड़ो और अपनी माताके इच्छानुसार मुझे पौत्रका मुख दिखाओ।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—जब पुत्रके बहुत कहनेपर भी राजाने दूसरी कोई वस्तु नहीं माँगी, तब उन्होंने कहा—'पिताजी! मैं आपको किमिच्छक दान देकर बड़े सङ्कटमें पड़ गया। अब निर्लज्ज होकर फिर विवाह करूँगा। स्त्रीके सामने परास्त हुआ और पृथ्वीपर गिराया गया; फिर भी मुझे स्त्रीका स्वामी बनना पड़ेगा, यह बड़ा ही दुष्कर कर्म है। तथापि मैं क्या करूँ, सत्यके बन्धनमें बँधा हूँ। आपने जो आज्ञा दी है, वह करूँगा।'

एक दिन राजकुमार अवीक्षित शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ वे हरिण, वराह तथा व्याघ्र आदि जन्तुओंको अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे। इतनेमें ही उन्हें सहसा किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुनायी दिया। वह भयसे गद्गदवाणीमें उच्चस्वरसे बार-बार क्रन्दन करती हुई त्राहि-त्राहिकी रट लगा रही थी। राजकुमार अवीक्षितने 'मत डरो, मत डरो' ऐसा कहते हुए अपने घोड़ेको उसी ओर बढ़ाया, जिधरसे वह शब्द आ रहा था। उस निर्जन वनमें दनुके पुत्र दृढ़केशके द्वारा पकड़ी गयी वह कन्या विलाप करती हुई कह रही थी, 'मैं महाराज करन्धमके पुत्र अवीक्षितकी पत्नी हूँ, किन्तु यह नीच दानव मुझे हरकर लिये जाता है। जिन महाराजके समक्ष समस्त राजा, गन्धर्व तथा गुह्यक भी खड़े होनेकी शक्ति नहीं रखते, जिनका क्रोध मृत्यु और पराक्रम इन्द्रके समान है, उन्हींकी पुत्रवधू होकर आज मैं एक दानवके द्वारा हरी जा रही हूँ।'

वह इस प्रकार कह-कहकर रो ही रही थी कि राजकुमार अवीक्षित तुरंत वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने देखा, एक अत्यन्त मनोहर कन्या है, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे शोभा पा रही है और हाथमें डंडा लिये दनु-पुत्र दृढ़केशने उसे पकड़ रखा है तथा वह करुण स्वरमें 'त्राहि-त्राहि' पुकार रही है। यह देखकर अवीक्षितने उससे कहा—'तुम भय न करो।' फिर उस दानवसे कहा—'ओ दुष्ट! अब तू मारा जायगा। भूमण्डलके समस्त राजा जिनके प्रतापके सामने मस्तक झुकाते हैं, उन महाराज करन्धमके राज्यमें कौन दुष्ट जीवित रह सकता है।' राजकुमारको श्रेष्ठ धनुष लिये आया देख वह कृशाङ्गी युवती बार-बार कहने लगी, 'आप मुझे बचाइये। यह दुष्ट मुझे हरकर लिये जाता है। मैं महाराज करन्धमकी पुत्रवधू और अवीक्षितकी पत्नी हूँ। सनाथ हूँ तो भी इस वनमें यह दुष्ट मुझे अनाथकी भाँति हरकर लिये जाता है।'

यह सुनकर अवीक्षित उसकी बातपर विचार करने लगे—'यह किस प्रकार मेरी भार्या तथा पिताजीकी पुत्रवधू हुई? अथवा इस समय तो इसे छुड़ाऊँ, फिर समझ लूँगा। पीड़ितोंकी रक्षा करनेके लिये ही क्षत्रिय हथियार धारण करते हैं।' ऐसा निश्चय करके वीर अवीक्षितने उस खोटी बुद्धिवाले दानवसे कुपित होकर कहा—'पापी! यदि जीवित रहना चाहता है तो इसे छोड़कर चला जा; अन्यथा तेरे प्राण नहीं बचेंगे।' इतना सुनते ही वह दानव उस कन्याको छोड़कर डंडेको ऊपर उठा अवीक्षितकी ओर दौड़ा। तब उन्होंने भी बाणोंकी वर्षासे उसे ढँक दिया। दानव दृढ़केश अत्यन्त मदसे मतवाला हो रहा था। राजकुमारके बाणोंसे रोके जानेपर भी उसने सौ कीलोंसे युक्त वह डंडा उनपर दे मारा; किन्तु राजकुमारने अपनी ओर आते हुए उस डंडेके बाण मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर दानवने कुपित होकर राजकुमारपर जो-जो हथियार चलाया, वह सब उन्होंने अपने बाणोंसे काट गिराया। डंडे और हथियारोंके कट

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जानेपर उसे बड़ा क्रोध हुआ और वह मुक्का तानकर राजकुमारकी ओर दौड़ा। पास आते ही राजकुमारने वेतसपत्र नामक बाणसे उसका मस्तक काट गिराया। इस प्रकार उस दुराचारी दानवके मारे जानेपर समस्त देवताओनि अवीक्षितको साधुवाद दिया और वर माँगनेके लिये कहा। तब उन्होंने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे एक महापराक्रमी पुत्र माँगा।

देवता बोले- राजकुमार ! जिसका तुमने अभी उद्धार किया है, इसी कन्याके गर्भसे तुम्हें महाबली चक्रवर्ती पुत्रकी प्राप्ति होगी।

राजकुमारने कहा- देवगण ! राजाओंसे परास्त होनेपर मैंने विवाहका विचार छोड़ दिया था, किन्तु पिताद्वारा सत्यके बन्धनमें बाँधे जानेपर मैं अब पुत्रकी अभिलाषा करता हूँ। पहले राजा विशालकी कन्याको मैंने त्याग दिया था, किन्तु उसने मेरे ही लिये दूसरे किसी पुरुषको पति बनानेका विचार छोड़ रखा है। अतः उस त्यागमयी देवीको छोड़कर क्रूरहृदय हो मैं दूसरी स्त्रीको कैसे अपनी पत्नी बना सकूँगा?

देवता बोले- यही राजा विशालकी कन्या और तुम्हारी भार्या है, जिसको तुम सदा प्रशंसा करते हो। यह सुन्दरी तुम्हारे लिये ही तप करती रही है। इसके गर्भसे तुम्हारे चक्रवर्ती एवं वीर पुत्र उत्पन्न होगा। वह सातों द्वीपोंका शासक तथा सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला होगा।

करन्धम-कुमार अवीक्षितसे यों कहकर समस्त देवता वहाँसे चले गये। तब उन्होंने उस स्त्रीसे कहा— भीरु ! कहो तो यह क्या बात है! तब वैशालिनीने अपना वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया—'नाथ! आपने जब मुझे त्याग दिया तो इस जीवनसे वैराग्य हो गया और मैं बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर वनमें चली आयी। वीर ! यहाँ तपस्या करते-करते मैंने अपना शरीर सुखा दिया और तब इसे त्याग देनेको उद्यत हो गयी। इसी समय देवताओंके दूतने आकर मुझे रोका और कहा—'तुम्हें महाबलवान् चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा, जो देवताओंको तृप्त करेगा और असुरोंका संहार करेगा।' इस प्रकार देवदूतने जब देवताओंकी आज्ञा सुनायी, तब आपके समागमकी आशासे मैंने इस देहका त्याग नहीं किया।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं— वैशालिनीके ये वचन सुनकर तथा किमिच्छक व्रतमें की हुई प्रतिज्ञाके समय पिताके कहे हुए उत्तम वचनोंका स्मरण करके अवीक्षितने उस कन्यासे प्रेमपूर्वक कहा—'देवि ! उस समय शत्रुओंसे पराजित होनेके कारण मैंने तुम्हारा त्याग किया था और अब फिर शत्रुओंको जीतकर ही तुम्हें पाया है। अब बताओ, क्या करूँ?' इसी अवसरपर मय नामक गन्धर्व श्रेष्ठ अप्सराओं तथा अन्य गन्धर्वोंके साथ वहाँ आया।

गन्धर्व बोला— राजकुमार ! यह कन्या वास्तवमें मेरी पुत्री भामिनी है। महर्षि अगस्त्यके शापसे यह राजा विशालकी पुत्री हुई थी। बचपनमें खेलते समय इसने अगस्त्य मुनिको कुपित कर दिया था। तब उन्होंने शाप देते हुए कहा—'जा, तू मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होगी।' तब हमलोगोंने मुनिको प्रसन्न करते हुए कहा—'ब्रह्मर्षे! अभी यह निरी बालिका है, इसे भले-बुरेका विवेक नहीं है, तभी इसके द्वारा आपका अपराध बन गया है। अतः इसके ऊपर कृपा कीजिये।' तब उन महामुनिने कहा—'बालिका समझकर ही मैंने इसे बहुत थोड़ा शाप दिया है। अब यह टल नहीं सकता।' यही महर्षिका शाप था, जिससे यह मेरी पुत्री भामिनी राजा विशालके भवनमें उत्पन्न हुई। इसके लिये ही मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। आप

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मेरी इस कन्याको ग्रहण कीजिये। इससे आपको चक्रवर्ती पुत्रकी प्राप्ति होगी।

तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजकुमारने विधिपूर्वक उसका पाणिग्रहण किया। उस समय वहाँ तुम्बुरु मुनिने हवन किया। देवता और गन्धर्व गीत गाते रहे। मेघोंने फूलोंकी वर्षा की और देवताओंके बाजे बजते रहे। विवाहके पश्चात् दोनों दम्पति महात्मा मयके साथ गन्धर्वलोकमें गये। अवीक्षित अपनी पत्नीके साथ कभी अत्यन्त रमणीय नगरोद्यानमें और कभी पर्वतकी उपत्यकामें बिहार करने लगे। वहाँ मुनि, गन्धर्व और किन्नरलोग उन दोनोंके लिये भोजनकी सामग्री, चन्दन, वस्त्र, माला तथा पीनेयोग्य पदार्थ आदि उत्तम वस्तुएँ प्रस्तुत किया करते थे। मनुष्योंके लिये दुर्लभ गन्धर्वलोकमें अवीक्षित इस प्रकार भामिनीके साथ बिहार करते रहे। कुछ समयके बाद भामिनीने वीर अवीक्षितके पुत्रको जन्म दिया। उस महापराक्रमी पुत्रका जन्म होनेपर उससे कार्यसिद्धिकी अपेक्षा रखनेवाले गन्धर्वोंके यहाँ बड़ा भारी उत्सव हुआ। उसमें सब देवता तथा निर्मल देवर्षि भी पधारे। पातालसे नागराज शेष, वासुकि और तक्षक भी आये। देवता, असुर, यक्ष और गुह्यकोंमें जो-जो प्रधान थे, वे सब उपस्थित हुए। सभी मरुद्गण भी पधारे थे। तुम्बुरुने उस बालकका जातकर्म आदि करके स्तुतिपूर्वक स्वस्तिवाचन किया और कहा— 'आयुष्मन्! तुम चक्रवर्ती, महापराक्रमी, महाबाहु एवं महाबलवान् होकर समस्त पृथ्वीका शासन करो। वीर! ये इन्द्र आदि लोकपाल तथा महर्षि तुम्हारा कल्याण करें और तुम्हें शत्रुनाशक शक्ति प्रदान करें। पूर्व दिशामें बहनेवाले मरुत्, जिनमें धूलका समावेश नहीं होता, तुम्हारा कल्याण करें। दक्षिण दिशाके निर्मल मरुत् तुम्हें स्वस्थ रखें। पश्चिमके मरुत् उत्तम पराक्रम दें तथा उत्तरके मरुत् तुम्हें उत्कृष्ट बल प्रदान करें।'

इस प्रकार स्वस्त्ययनके पश्चात् आकाशवाणी हुई, 'पुरोहितने 'मरुत् तव' (मरुत् तुम्हारा कल्याण करें)-का अनेक बार प्रयोग किया है, इसलिये यह बालक पृथ्वीपर 'मरुत्त' के नामसे विख्यात होगा। भूमण्डलके सभी राजा इसकी आज्ञाके अधीन रहेंगे और यह वीर सब राजाओंका सिरमौर बना रहेगा। अन्य भूपालोंको जीतकर यह महापराक्रमी चक्रवर्ती होगा और सात द्वीपोंवाली समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा। यज्ञ करनेवाले राजाओंमें यह प्रधान होगा तथा समस्त नरेशोंमें इसका शौर्य और पराक्रम सबसे अधिक होगा।'

देवताओंमेंसे किसीने यह आकाशवाणी की थी। इसे सुनकर ब्राह्मण, गन्धर्व तथा बालकके माता-पिता बहुत प्रसन्न हुए। तदनन्तर राजकुमार अवीक्षित अपने प्रिय पुत्रको गोदमें ले गन्धर्वोंके साथ ही अपने पिताके नगरमें आये। पिताके घरमें पहुँचकर उन्होंने उनके चरणोंमें आदरपूर्वक मस्तक झुकाया तथा लज्जावती भामिनीने भी श्वशुरके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय राजा करन्धम धर्मासनपर विराजमान थे। अवीक्षितने पुत्रको लेकर कहा—'पिताजी! माताके किमिच्छक-व्रतमें मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार अब आप गोदमें लेकर इस पौत्रका मुख देखिये।' यों कहकर उन्होंने पिताकी गोदमें बालकको रख दिया और उसके जन्मका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया। राजा करन्धमके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उन्होंने पौत्रको छातीसे लगाकर अपने भाग्यकी प्रशंसा करते हुए कहा—'मैं बड़ा ही सौभाग्यशाली हूँ।' इसके बाद उन्होंने वहाँ आये हुए गन्धर्वोंका अर्घ्य आदिके द्वारा सत्कार किया। उस समय उनको और किसी

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बातकी बात नहीं रही! उस नगरमें, पुरवासियोंके घर-घरमें महान् आनन्द छा गया। सब प्रसन्न होकर कहते थे—'हमारे महाराजके पोता हुआ है।' राजा करन्धमने हर्षमग्न होकर ब्राह्मणोंको रत्न, धन, गौ, वस्त्र और आभूषण दान किये। वह बालक शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। उसे देखकर पिता आदिको बड़ी प्रसन्नता होती थी। वह सब लोगोंका प्यारा था। कुछ बड़ा होनेपर उपनयनके बाद उसने आचार्योंके पास रहकर पहले वेदोंकी, फिर समस्त शास्त्रोंकी तथा अन्तमें धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात् भृगुपुत्र शुक्राचार्यसे अन्यान्य अस्त्रविद्याओंका ज्ञान प्राप्त किया। वह गुरुके समक्ष विनीतभावसे मस्तक झुकाता तथा सदा उन्हें प्रसन्न रखनेकी चेष्टामें संलग्न रहता था। वह अस्त्रविद्याका ज्ञाता, वेदका विद्वान्, धनुर्वेदमें पारङ्गत तथा सब विद्याओंमें निष्णात था। उस समय मरुत्तसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं था।

राजा विशालको भी जब अपनी पुत्रीका सारा समाचार ज्ञात हुआ तथा दौहित्रकी उत्तम योग्यता सुनायी पड़ी, तब उनका मन आनन्दमें निमग्न हो गया। पौत्रको देखकर महाराज करन्धमका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अनेक यज्ञ किये और याचकोंको बहुत दान दिये। तदनन्तर वन जानेके लिये उत्सुक होकर उन्होंने अपने पुत्र अवीक्षित्‌से कहा—'बेटा! मैं बूढ़ा हो गया, अब वनमें तपस्याके लिये जाऊँगा। तुम मुझसे यह राज्य ले लो। मैं कृतकृत्य हूँ। तुम्हारा राजतिलक करनेके अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य शेष नहीं है।' यह सुनकर राजकुमार अवीक्षित्‌ने बड़ी नम्रताके साथ पितासे कहा—'तात! मैं पृथ्वीका पालन नहीं कर सकूँगा; मेरे मनसे लज्जा अभी दूर नहीं होती। आप इस राज्यपर किसी औरको नियुक्त कीजिये। मैं बन्धनमें पड़नेपर पिताके हाथों मुक्त हुआ हूँ, अपने बलसे नहीं। अतः मुझमें क्या पौरुष है। जिनमें पौरुष हो, वे ही इस पृथ्वीका पालन कर सकते हैं। जब मैं अपनी भी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हूँ, तब इस पृथ्वीकी रक्षा कैसे कर सकूँगा। इसलिये राज्य किसी औरको दे दीजिये।'

पिता बोले—'बेटा! पुत्रके लिये पिता और पिताके लिये पुत्र भिन्न नहीं है। यदि पिताने तुम्हें बन्धनसे छुड़ाया तो यही मानना चाहिये कि किसी दूसरेने नहीं छुड़ाया है।'

पुत्रने कहा—महाराज! मेरे हृदयका भाव बदल नहीं सकता। जो पिताकी कमायी हुई सम्पत्ति भोगता है, जो पिताके बलसे ही संकटसे उद्धार पाता है तथा पिताके नामपर ही जिसकी ख्याति होती है, अपने गुणोंसे नहीं—ऐसा मनुष्य कभी कुलमें उत्पन्न न हो। जो स्वयं ही धनका उपार्जन करते, स्वयं ख्याति पाते और स्वयं ही संकटोंसे मुक्त होते हैं, ऐसे पुरुषोंकी जो गति होती है, वही मेरी भी हो।

पिताके बहुत कहनेपर भी जब अवीक्षित् पूर्वोक्त उत्तर ही देते चले गये, तब महाराज करन्धमने उनके पुत्र मरुत्तको ही राजा बना दिया। पिताकी आज्ञाके अनुसार पितामहसे राज्य पाकर मरुत्त अपने सुहृदोंका आनन्द बढ़ाते हुए उसका भलीभाँति पालन करने लगे। राजा करन्धम अपनी पत्नी वीराको साथ ले वनमें तपस्याके लिये चले गये। वहाँ मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर उन्होंने एक हजार वर्षोंतक दुष्कर तपस्या की और अन्तमें शरीर त्यागकर वे इन्द्रलोकमें चले गये। उनकी पत्नी वीराने सौ वर्ष बादतक कठोर तप किया। उसके सिरपर जटाएँ बढ़ी हुई थीं, शरीरपर मैल जम गयी थी। वह स्वर्गमें गये हुए अपने महात्मा पतिके सालोक्य

  • क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र * | २८३ ---|---

पारती हुई फल-मूलका आहार करके भार्गवके आश्रमपर तपस्या करती थीं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंमें रहकर उनकी सेवामें तत्पर रहती थीं।

क्रौष्टुकि बोले— भगवन्! आपने करन्धम और अवीक्षितके चरित्रका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन किया। अब मैं अवीक्षितकुमार महात्मा मरुत्तका चरित्र सुनना चाहता हूँ। सुना जाता है, उनका चरित्र अलौकिक था। वे चक्रवर्ती, महान् सौभाग्यशाली, शूरवीर, सुन्दर, परम बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, धर्मात्मा तथा पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करनेवाले थे।

मार्कण्डेयजीने कहा— पिताके आदेशसे पितामहका राज्य पाकर मरुत्त जिस प्रकार पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार प्रजाजनोंका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। ऋत्विजों और पुरोहितके आदेशसे प्रसन्न होकर बहुत-से यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया और उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दीं। उनका शासन-चक्र सातों द्वीपोंमें अबाधरूपसे फैला हुआ था। आकाश, पाताल और जल आदिमें भी उनकी गति कुण्ठित नहीं होती थी। राजा तो यज्ञ करते ही थे, चारों वर्णोंके अन्य लोग भी अपने-अपने कर्ममें आलस्य छोड़कर संलग्न रहते और महाराजसे धन प्राप्त कर इष्टापूर्त आदि पुण्य-क्रियाएँ करते थे। राजा मरुत्तने सौ यज्ञ करके देवराज इन्द्रको भी मात कर दिया। उनके पुरोहित अङ्गिरानन्दन संवर्तजी थे, जो बृहस्पतिजीके भाई एवं तपस्याके भण्डार थे। मुञ्जवान् नामसे प्रसिद्ध एक सोनेका पर्वत था, जहाँ देवता निवास करते थे। महाराज मरुत्तने उसका शिखर तोड़कर गिरा दिया और उसे अपने यहाँ मँगा लिया। उसके द्वारा उन्होंने यज्ञकी सब सामग्री—भू-विभाग और महल आदि सोनेके ही बनवाये। सदा स्वाध्याय करनेवाले महर्षि मरुत्तके चरित्रके विषयमें सदा यह गाथा गाते रहते हैं—'महाराज मरुत्तके समान यजमान इस भूतलपर दूसरा कोई नहीं हुआ, जिनके यज्ञमें समस्त यज्ञमण्डप और महल सुवर्णके ही बने थे; उसमें ब्राह्मण पर्याप्त दक्षिणा पाकर तृप्त हो गये। इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता उसमें ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका काम करते थे। राजा मरुत्तके यज्ञमें जैसा समारोह था, वैसा किस राजाके यज्ञमें हुआ है, जहाँ रत्नोंसे घर भरा रहनेके कारण ब्राह्मणोंने दक्षिणामें मिला हुआ सारा सुवर्ण त्याग दिया। उस छोड़े हुए धनको पाकर कितने ही लोगोंका मनोरथ पूरा हो गया और वे भी उसी धनसे अपने-अपने देशमें पृथक्-पृथक् अनेक यज्ञ करने लगे।'

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले राजा मरुत्तके पास एक दिन कोई तपस्वी आया और इस प्रकार कहने लगा—'महाराज! आपकी पितामही वीरा देवीने तपस्वियोंको मदोन्मत्त सर्पोंके विषसे पीड़ित देख आपके पास यह सन्देश दिया है—'राजन्! तुम्हारे पितामह स्वर्गवासी हो गये। मैं और्व मुनिके आश्रमपर रहकर तपस्या करती हूँ। मुझे तुम्हारे राज्य-शासनमें बहुत बड़ी त्रुटि दिखायी देती है। पातालसे सर्पोंने आकर यहाँ दस मुनिकुमारोंको डँस लिया है तथा जलाशयोंके जलको भी दूषित कर दिया है। ये पसीने, मूत्र और विष्ठासे हविष्यको दूषित कर देते हैं। यद्यपि महर्षि इन सबको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखते हैं, किन्तु किसीको दण्ड देनेका अधिकार इनका नहीं है। इसके अधिकारी तो तुम्हीं हो। राजकुमारोंको तभीतक भोगजनित सुखकी प्राप्ति होती है, जबतक उनके मस्तकपर राज्याभिषेकका जल नहीं पड़ता। कौन मित्र हैं, कौन शत्रु हैं, मेरे शत्रुका बल कितना है, मैं कौन हूँ? मेरे मन्त्री कौन हैं, मेरे

२८४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


पक्षमें कौन-कौन से राजा हैं, वे मुझसे विरक्त हैं या अनुरक्त? शत्रुओंने उन्हें फोड़ तो नहीं लिया है? शत्रुपक्षके लोगोंकी भी क्या स्थिति है, मेरे इस नगर अथवा राज्यमें कौन मनुष्य श्रेष्ठ है, कौन धर्म-कर्मका आश्रय लेता है, कौन मूढ़ है तथा किसका बर्ताव उत्तम है, किसको दण्ड देना चाहिये, कौन पालन करने योग्य है, किन मनुष्योंपर सदा मुझे दृष्टि रखनी चाहिये—इन सब बातोंपर सदा विचार करते रहना राजाका कर्तव्य है। देश-कालकी अवस्थापर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह सब ओर कई गुप्तचर लगाये रखे। वे गुप्तचर परस्पर एक-दूसरेसे परिचित न हों। उनके द्वारा यह जाननेकी चेष्टा करे कि कोई राजा अपने साथ की हुई सन्धिका भंग तो नहीं करता। राजा अपने समस्त मन्त्रियोंपर भी गुप्तचर लगा दे। इन सब कार्योंमें सदा मन लगाते हुए राजा अपना समय व्यतीत करे। उसे दिन-रात भोगासक्त नहीं होना चाहिये। भूपाल! राजाओंका शरीर भोग भोगनेके लिये नहीं होता, वह तो पृथ्वी और स्वधर्मके पालनपूर्वक भारी क्लेश सहन करनेके लिये मिलता है। राजन्! पृथ्वी और स्वधर्मका भलीभाँति पालन करते समय जो इस लोकमें महान् कष्ट होता है, वही स्वर्गमें अक्षय एवं महान् सुखकी प्राप्ति करानेवाला होता है। अतः नरेश्वर! तुम इस बातको समझो और भोगोंका त्याग करके पृथ्वीका पालन करनेके लिये कष्ट उठाना स्वीकार करो। तुम्हारे शासन-कालमें ऋषियोंको सर्पोंकी ओरसे जो भारी संकट प्राप्त हुआ है, उसे तुम नहीं जानते। मालूम होता है तुम गुप्तचररूपी नेत्रसे अन्धे हो। अधिक कहनेसे क्या लाभ, तुम दुष्टोंको दण्ड दो और सज्जन पुरुषोंका पालन करो। इससे तुम प्रजाके धर्मके छठे अंशके भागी हो सकोगे। यदि तुम प्रजाजनोंकी रक्षा नहीं करोगे तो दुष्टलोग उच्छृङ्खलतावश जो कुछ भी पाप करेंगे, वह सब तुम्हींको भोगना पड़ेगा—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो वह करो।' महाराज! आपकी पितामहीने जो कुछ कहा था, वह सब मैंने सुना दिया। अब आपको जैसी रुचि हो, वैसा करें।''

तपस्वीकी यह बात सुनकर राजा मरुत्तको बड़ी लज्जा हुई, 'सचमुच ही मैं गुप्तचररूपी नेत्रसे अन्धा हूँ। मुझे धिक्कार है'—यों कहकर लंबी साँस ले उन्होंने धनुष उठाया और तुरंत ही और्वके आश्रमपर पहुँचकर अपनी पितामही वीराको तथा अन्यान्य तपस्वी महात्माओंको प्रणाम किया। उन सबने आशीर्वाद देकर राजाका अभिनन्दन किया। तत्पश्चात् सर्पोंके काटनेसे मरकर पृथ्वीपर पड़े हुए सात तपस्वियोंको देख उन सबके सामने मरुत्तने बारंबार अपनी निन्दा की और कहा—'मेरे पराक्रमकी अवहेलना करके ब्राह्मणोंके साथ द्वेष करनेवाले दुष्ट सर्पोंकी मैं जो दुर्दशा करूँगा, उसे देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण संसार देखे।'

यों कहकर राजाने कुपित हो पाताललोक-निवासी सम्पूर्ण नागोंका संहार करनेके लिये संवर्तक नामक अस्त्र उठाया। तब उस महान् अस्त्रके तेजसे सारा नागलोक सब ओरसे सहसा जल उठा। उस समय जो घबराहट हुई, उसमें नागोंके मुखसे 'हा तात! हा माता! हा वत्स!' की पुकार सुनायी देती थी। किन्हींके पूँछ जलने लगे और किन्हींके फण। कुछ सर्प अपने वस्त्र और आभूषण छोड़कर स्त्री-पुत्रोंको साथ ले पाताल त्यागकर मरुत्तकी माता भामिनीकी शरणमें गये, जिसने पूर्वकालमें उन्हें अभय-दान दे रखा था। भामिनीके पास पहुँचकर भयसे व्याकुल हुए

  • क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र * २८५

समस्त सर्पोंने प्रणामपूर्वक गद्गदवाणीमें कहा—'वीरजननी! आजसे पहले रसातलमें हमलोगोंने जो आपका सत्कार किया था और आपने हमें अभय-दान दिया, उसके पालनका यह समय आ पहुँचा है। हमारी रक्षा कीजिये। यशस्विनि! आपके पुत्र मरुत्त अपने अस्त्रके तेजसे हमलोगोंको दग्ध कर रहे हैं। इस समय आपके सिवा और कोई हमें शरण देनेवाला नहीं है। आप हमपर कृपा कीजिये।'

सर्पोंकी यह बात सुनकर और पहले अपने दिये हुए वचनको याद करके साध्वी भामिनीने तुरंत ही अपने पतिसे कहा—'नाथ! मैं पहले ही आपको वह बात बता चुकी हूँ कि नागोंने पातालमें मेरा सत्कार करके मेरे पुत्रसे प्राप्त होनेवाले भयकी चर्चा की थी और मैंने इनकी रक्षाका वचन दिया था। आज ये भयभीत होकर मेरी शरणमें आये हैं। मरुत्तके अस्त्रसे ये सब लोग दग्ध हो रहे हैं। जो मेरे शरणागत हैं, वे आपके भी हैं; क्योंकि मेरा धर्माचरण आपसे पृथक् नहीं है तथा मैं स्वयं भी आपकी शरणमें हूँ। अतः आप अपने पुत्र मरुत्तको आदेश देकर रोकिये, मैं भी उससे अनुरोध करूँगी। मेरा विश्वास है, वह अवश्य शान्त हो जायगा।'

अवीक्षित बोले—देवि! निश्चय ही किसी भारी अपराधके कारण मरुत्त कुपित हुआ है, अतः मैं तुम्हारे पुत्रका क्रोध शान्त करना कठिन मानता हूँ।

नागोंने कहा—राजन्! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हमपर कृपा करें। पीड़ितोंकी रक्षा करनेके लिये ही क्षत्रियलोग शस्त्र धारण करते हैं।

शरण चाहनेवाले नागोंकी यह बात सुनकर तथा पत्नीके प्रार्थना करनेपर महायशस्वी अवीक्षितने कहा—'मैं तुरंत चलकर नागोंकी रक्षाके लिये तुम्हारे पुत्रसे कहता हूँ, क्योंकि शरणागतोंका त्याग करना उचित नहीं है। यदि राजा मरुत्त मेरे कहनेसे अपने शस्त्रको नहीं लौटायेगा तो मैं अपने अस्त्रोंसे उसके अस्त्रका निवारण करूँगा।' यह कहकर क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ अवीक्षित धनुष ले अपनी स्त्रीके साथ तुरंत ही और्व मुनिके आश्रमपर गये।

वहाँ पहुँचकर अवीक्षितने देखा, भामिनीका पुत्र अपने हाथमें एक श्रेष्ठ धनुष लिये हुए है, उसका अस्त्र बड़ा ही भयानक है, उसकी ज्वालासे समस्त दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं। वह अपने अस्त्रसे आग उगल रहा है, जो समस्त भूमण्डलको जलाती हुई पातालके भीतर पहुँच गयी है। वह अग्नि अत्यन्त भयानक और असह्य है। राजा मरुत्तको भौंहें टेढ़ी किये खड़ा देख अवीक्षितने कहा—'मरुत्त! क्रोध न करो, अपने अस्त्रको लौटा लो।' यह बात उन्होंने बार-बार कही और इतनी शीघ्रतासे कही कि उतावलीके कारण कितने ही अक्षरोंका उच्चारण नहीं हो पाता था।

पिताकी बात सुनकर और बारंबार उन्हें देखकर हाथमें धनुष लिये हुए मरुत्तने माता और पिता दोनोंको प्रणाम किया और इस प्रकार उत्तर दिया—'पिताजी! मेरा शासन होते हुए भी सर्पोंने मेरे बलकी अवहेलना करके भारी अपराध किया है। इन महर्षियोंके आश्रममें घुसकर नागोंने दस मुनिकुमारोंको डँस लिया है। इतना ही नहीं, इन दुराचारियोंने हविष्यको भी दूषित किया है तथा यहाँ जितने जलाशय हैं, उन सबको विष मिलाकर खराब कर दिया है। ये सभी सर्प ब्रह्महत्यारे हैं, अतः इनका वध करनेसे आप हमें न रोकें।'

अवीक्षित बोले—'राजन्! ये सर्प मेरी शरणमें आ गये हैं, अतः मेरे गौरवका ध्यान रखते हुए ही तुम इस अस्त्रको लौटा लो। क्रोध करनेकी आवश्यकता नहीं है।

२८६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


मरुत्तने कहा—'पिताजी! ये दुष्ट और अपराधी हैं; इन्हें क्षमा नहीं करूँगा। जो राजा दण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देता और साधु पुरुषोंका पालन करता है, वह पुण्यलोकोंमें जाता है तथा जो अपने कर्तव्यकी उपेक्षा करता है, वह नरकोंमें पड़ता है।

अवीक्षित बोले—राजन्! ये सर्प भयभीत होकर मेरी शरणमें आये हैं और मैं तुम्हें मना करता हूँ; फिर भी इन नागोंकी हिंसा करते हो तो मैं तुम्हारे अस्त्रका प्रतिकार करता हूँ। मैंने भी अस्त्र-विद्या सीखी है। पृथ्वीपर केवल तुम्हीं अस्त्रवेत्ता नहीं हो। भला, मेरे आगे तुम्हारा पुरुषार्थ क्या है।

यह कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये अवीक्षितने धनुष चढ़ाया और उसपर कालास्त्रका सन्धान किया; फिर तो समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वी, जो संवर्ताग्निसे सन्तप्त हो रही थी, कालास्त्रका सन्धान होते ही काँप उठी। मरुत्तने भी पिताद्वारा उठाये हुए कालास्त्रको देखकर कहा—'तात! मैंने तो दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये यह अस्त्र उठाया है, आपका वध करनेके लिये नहीं। फिर आप मुझपर कालास्त्रका प्रयोग क्यों करते हैं? महाभाग! मुझे प्रजाजनोंका पालन करना है। आप क्यों मेरा वध करनेके लिये अस्त्र उठाते हैं?'

अवीक्षित बोले—हम शरणागतोंकी रक्षा करनेपर तुल गये हैं और तुम इसमें विघ्न डालनेवाले हो; अतः मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा। जो शरणमें आये हुए पीड़ित मनुष्यपर, वह शत्रुदलका ही क्यों न हो, दया नहीं दिखाता, उस पुरुषके जीवनको धिक्कार है। मैं क्षत्रिय हूँ। ये भयभीत होकर मेरी शरणमें आये हैं और तुम्हीं इनके अपकारी हो। फिर तुम्हारा वध क्यों न किया जाय ?

मरुत्तने कहा—मित्र, बान्धव, पिता अथवा गुरु भी यदि प्रजा पालनमें विघ्न डाले तो राजाके द्वारा वह मार डालने योग्य है। अतः पिताजी! मैं आपपर प्रहार करूँगा। आप मुझपर क्रोध न कीजियेगा। मुझे अपने धर्मका पालनमात्र करना है। आपपर मेरा रत्तीभर भी क्रोध नहीं है।

उन दोनोंको एक दूसरेका वध करनेके लिये दृढ़संकल्प देख भार्गव आदि मुनि बीचमें आ पड़े और मरुत्तसे बोले—'तुम्हें अपने पितापर हथियार चलाना उचित नहीं है।' फिर अवीक्षितसे बोले—'आपको भी अपने विख्यात पुत्रका वध नहीं करना चाहिये।'

मरुत्तने कहा—ब्राह्मणो! मैं राजा हूँ, मुझे दुष्टोंका वध और साधु पुरुषोंकी रक्षा करनी है। ये सर्पलोग दुष्ट हैं। अतः मेरा इसमें क्या अपराध है?

अवीक्षित बोले—मुझे शरणागतोंकी रक्षा करनी है और यह उन्हीं शरणागतोंका वध करता है; अतः मेरा पुत्र होनेपर भी अपराधी है।

ऋषियोंने कहा—ये नाग कह रहे हैं कि दुष्ट सर्पोंने जिन ब्राह्मणोंको काट खाया है, उन्हें हम जीवित किये देते हैं। अतः युद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं है। आप दोनों श्रेष्ठ राजा प्रसन्न हों।

इसी समय वीराने आकर अपने पुत्र अवीक्षितसे कहा—'वत्स! मेरे कहनेसे ही तुम्हारा पुत्र इन नागोंका वध करनेके लिये उद्यत हुआ है। यदि मरे हुए ब्राह्मण जीवित हो जाते हैं तो अपना कार्य सिद्ध हो जायगा और तुम्हारे शरणागत सर्प जीवित छूट जायेंगे।' तब नागोंने विष खींचकर दिव्य ओषधियोंके प्रयोगसे उन ब्राह्मणोंको जीवित कर दिया। तदनन्तर राजा मरुत्तने पुनः अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। अवीक्षितने भी मरुत्तको प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया और कहा—'वत्स! तुम शत्रुओंका मान मर्दन करो, चिरकालतक पृथ्वीका पालन करते रहो। पुत्र और

  • राजा नरिष्यन्त और दमका चरित्र * २८७

पौत्रोंके साथ आनन्द भोगो तथा तुम्हारे कोई शत्रु न हों।'

इसके बाद ब्राह्मणों और वीराकी आज्ञा ले अवीक्षित्, मरुत्त और भामिनी रथपर आरूढ़ हो अपनी राजधानीको चले गये। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागा पतिव्रता वीरा भी भारी तपस्या करके पतिके लोकमें चली गयीं। राजा मरुत्तने भी काम, क्रोध आदि छः शत्रुओंको जीतकर धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया। महाबली महाराज मरुत्तका ऐसा ही पराक्रम था। सातों द्वीपोंमें कहीं भी उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं होता था। उनके समान दूसरा कोई राजा न हुआ है, न होगा। वे सत्त्व तथा पराक्रमसे युक्त और महान् तेजस्वी थे। द्विजश्रेष्ठ! महात्मा मरुत्तके उत्तम जन्म एवं चरित्रकी यह कथा सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।


राजा नरिष्यन्त और दमका चरित्र

मार्कण्डेयजी कहते हैं— मरुत्तके अठारह पुत्रोंमें नरिष्यन्त सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ थे। क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ महाराज मरुत्तने पचासी हजार वर्षोंतक समूची पृथ्वीका राज्य किया। धर्मपूर्वक राज्यका पालन और उत्तमोत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करके मरुत्तने अपने ज्येष्ठ पुत्र नरिष्यन्तको राजपद्पर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें चले गये। वहाँ एकाग्रचित्त होकर उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और अपने सुयशसे पृथ्वी एवं आकाशको व्याप्त करके वे स्वर्गलोकमें चले गये। तदनन्तर उनके बुद्धिमान् पुत्र नरिष्यन्तने अपने पिता तथा अन्य पूर्वजोंके चरित्रकी आलोचना करके मन-ही-मन सोचा—वंशकी मान मर्यादाका पालन, लज्जाकी रक्षा, शत्रुओंपर क्रोध, सबको अपने-अपने धर्ममें लगाना और युद्धसे कभी पीठ न दिखाना—इन सब बातोंका मेरे पूर्वपुरुषोंने तथा पिताजीने जैसा पालन किया है, वैसा दूसरा कौन कर सकता है। मेरे पूर्वजोंने कौन ऐसा शुभ कर्म नहीं किया है, जिसको मैं करूँ। वे बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले जितेन्द्रिय, संग्रामसे पीछे न हटनेवाले, बड़े-बड़े युद्धोंमें भाग लेनेवाले तथा अनुपम पुरुषार्थी थे, मैं निष्काम कर्मका अनुष्ठान करूँगा। मेरे पहलेके राजाओंने स्वयं ही निरन्तर यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, दूसरोंसे नहीं कराया है; मैं ऐसा करूँगा, जिससे दूसरे भी यज्ञ करें।

यों विचारकर महाराज नरिष्यन्तने धन-दानसे सुशोभित एक ऐसा यज्ञ किया, जिसके समान यज्ञ दूसरे किसीने नहीं किया था। उन्होंने ब्राह्मणोंके जीवन-निर्वाहके लिये बहुत बड़ी सम्पत्ति देकर उसकी अपेक्षा सौगुना अन्न दान किया। इस भूमिपर रहनेवाले प्रत्येक ब्राह्मणको धन और अन्न देनेके अतिरिक्त गौ, वस्त्र, आभूषण तथा धान्य भण्डार आदि भी दिये। इसके बाद जब राजाने दूसरा यज्ञ आरम्भ करना चाहा, तब इसके लिये उन्हें कहीं ब्राह्मण ही नहीं मिले। वे जिस-जिस ब्राह्मणका वरण करते, वही उत्तर देता, 'हम तो स्वयं ही यज्ञ कर रहे हैं। आप दूसरे किसी ब्राह्मणका वरण कीजिये। आपने पहले ही यज्ञमें हमें इतना धन दे दिया है, जो अनेक यज्ञ करनेपर भी समाप्त नहीं होगा। अब हमें और धनकी आवश्यकता नहीं।'

जब एक भी ऋत्विज् ब्राह्मण नहीं मिला, तब महाराजने बहिर्वेदीमें दान देनेका आयोजन किया तथापि अन्नसे घर भरा रहनेके कारण ब्राह्मणोंने वह दान नहीं ग्रहण किया। उस समय राजाने यह

२८८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


उद्गार प्रकट किया—'अहो! इस पृथ्वीपर कहीं एक भी निर्धन ब्राह्मण नहीं है, यह कितनी सुन्दर बात है!' तदनन्तर उन्होंने भक्तिपूर्वक बारंबार प्रणाम करके कुछ ब्राह्मणोंको ऋत्विज् बनाया और बहुत बड़ा यज्ञ आरम्भ किया। उस समय बड़े आश्चर्यकी बात यह हुई कि भूमण्डलके सभी ब्राह्मण यज्ञ करने लगे, इसलिये राजाके यज्ञ-मण्डपमें कोई सदस्य न बन सका। कुछ ब्राह्मण यजमान थे और कुछ यज्ञ करानेवाले पुरोहित बन गये। राजा नरिष्यन्तने जिस समय यज्ञ आरम्भ किया, उस समय पृथ्वीके समस्त ब्राह्मण उन्हींके दिये हुए धनसे यज्ञ करने लगे। पूर्व दिशामें अठारह करोड़, पश्चिममें सात करोड़, दक्षिणमें चौदह करोड़ और उत्तरमें पंद्रह करोड़ यज्ञ एक ही समय आरम्भ हुए। इस प्रकार मरुत्तनन्दन राजा नरिष्यन्त बड़े धर्मात्मा हुए। वे अपने बल और पुरुषार्थके लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे।

नरिष्यन्तके दम नामक पुत्र हुआ, जो दुष्ट शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसमें इन्द्रके समान बल और मुनियोंके समान दया एवं शील था। बभ्रुकी कन्या इन्द्रसेना नरिष्यन्तकी पत्नी थी। उसीके गर्भसे दमका जन्म हुआ था। उस महायशस्वी पुत्रने नौ वर्षतक माताके गर्भमें रहकर उनके द्वारा दमका पालन कराया तथा स्वयं भी दमशील था। इसीलिये त्रिकालवेत्ता पुरोहितने उसका नाम 'दम' रखा। राजकुमार दमने दैत्यराज वृषपर्वासे सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा पायी। तपोवनिवासी दैत्यराज दुन्दुभिसे सम्पूर्ण अस्त्र प्राप्त किये। महर्षि शक्तिसे वेदों तथा समस्त वेदाङ्गोंका अध्ययन किया और राजर्षि आर्ष्टिषेणसे योगविद्या प्राप्त की। वे सुन्दर रूपवान्, महात्मा, अस्त्रविद्याके ज्ञाता और महान् बलवान् थे; अतः राजकुमारी सुमनाने पिताद्वारा आयोजित स्वयंवरमें उन्हें अपना पति चुन लिया। वह दशार्ण देशके बलवान् राजा चारुवर्माकी पुत्री थी। उसकी प्राप्तिके लिये वहाँ जितने राजा आये थे, सब देखते ही रह गये और उसने दमका वरण कर लिया। मद्रराजकुमार महानन्द, जो बड़ा बलवान् और पराक्रमी था, सुमनाके प्रति अनुरक्त हो गया था; इसी प्रकार विदर्भ देशके राजा संक्रन्दनका राजकुमार वपुष्मान् तथा उदारबुद्धि महाधनु भी सुमनाकी ओर आकृष्ट थे। उन सबने देखा, सुमनाने दुष्ट शत्रुओंका दमन करनेवाले दमका वरण कर लिया; तब कामसे मोहित होकर आपसमें सलाह की—'हमलोग इस सुन्दरी कन्याको बलपूर्वक पकड़कर घर ले चलें। वहाँ यह स्वयंवरकी विधिसे हममेंसे जिसको वरण करेगी, उसीकी पत्नी होगी।'

ऐसा निश्चय करके उन तीनों राजकुमारोंने दमके पास खड़ी हुई उस सुन्दरी कन्याको पकड़ लिया। उस समय जो राजा दमके पक्षमें थे, उन्होंने बड़ा कोलाहल मचाया। कुछ लोग कुपित होकर रह गये और कुछ लोग मध्यस्थ बन गये। इस घटनासे दमके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने चारों ओर खड़े हुए राजाओंको देखकर कहा—'भूपालगण! स्वयंवरको धार्मिक कार्योंमें गणना है, किन्तु वह वास्तवमें अधर्म है या धर्म? इस कन्याको इन लोगोंने जो बलपूर्वक पकड़ लिया है—यह उचित है या अनुचित? यदि स्वयंवर अधर्म है, तब तो मुझे इससे कोई मतलब नहीं है; यह भले ही दूसरेकी पत्नी हो जाय। किन्तु यदि वह धर्म है, तब तो वह मेरी पत्नी हो चुकी; उस दशामें इन प्राणोंको धारण करके क्या होगा, जो शत्रुको उपेक्षा करके बचाये जाते हैं।' तब दशार्णनरेश चारुवर्माने कोलाहल शान्त कराकर सभासदोंसे पूछा—'राजाओ! दमने जो

  • राजा नरिष्यन्त और दमका चरित्र * २८९

यह धर्म और अधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली बात पूछी है, इसका उत्तर आपलोग दें, जिससे इनके और मेरे धर्मका लोप न हो।'

तब कुछ राजाओंने कहा—'परस्पर अनुराग होनेपर गान्धर्व-विवाहका विधान है। परन्तु यह क्षत्रियोंके लिये ही विहित है; वैश्य, शूद्र और ब्राह्मणोंके लिये नहीं। दमका वरण कर लेनेसे आपकी इस कन्याका गन्धर्व-विवाह सम्पन्न हो गया। इस प्रकार धर्मकी दृष्टिसे आपकी पुत्री दमकी पत्नी हो चुकी। जो मोहवश इसके विपरीत आचरण करता है, वह कामासक्त है।' यह सुनकर दमके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने धनुषको चढ़ाया और यह वचन कहा—'यदि मेरी पत्नी मेरे देखते-देखते बलवान् राजाओंके द्वारा हर ली जाय तो मुझ-जैसे नपुंसकके उत्तम कुलसे तथा इन दोनों भुजाओंसे क्या लाभ हुआ। उस दशामें तो मेरे अस्त्रोंको, शौर्यको, बाणोंको, धनुषको तथा महात्मा मरुत्तके कुलमें प्राप्त हुए जन्मको भी धिक्कार है।' यों कहकर दमने महानन्द आदि समस्त शत्रुओंसे कहा—'भूपालो! यह बाला अत्यन्त सुन्दरी और कुलीन है। यह जिसकी पत्नी नहीं हुई, उसका जन्म लेना व्यर्थ है—यह विचारकर तुमलोग युद्धमें इस प्रकार यत्न करो, जिससे युद्धमें मुझे परास्त करके इसे अपनी पत्नी बना सको।'

यह कहकर राजकुमार दमने वहाँ बाणोंकी बौछार आरम्भ की। जैसे अन्धकार वृक्षोंको ढक देता है, उसी प्रकार दमने उन राजाओंको बाणोंसे आच्छादित कर दिया। वे भी वीर थे; अतः बाण, शक्ति, ऋष्टि तथा मुद्गरोंकी वर्षा करने लगे। किन्तु दमने उनके चलाये हुए सब हथियारोंको खेल-खेलमें ही काट डाला। तब महापराक्रमी महानन्द वहाँ आ पहुँचा और उनके साथ युद्ध करने लगा। तत्र दमने उसकी छातीमें एक कालरात्रिके समान भयङ्कर बाण मारा। उससे उसकी छाती विदीर्ण हो गयी; तो भी उसने उस बाणको खींचकर निकाल दिया और दमके ऊपर चमचमाती हुई तलवार फेंकी। उसे उल्काके समान अपनी ओर आते देख दमने शक्तिके प्रहारसे काट डाला और श्वेतसपत्र नामक बाणसे महानन्दका मस्तक धड़से अलग कर दिया। महानन्दके मारे जानेपर अधिकांश राजा पीठ दिखाकर भाग गये; केवल कुण्डिनपुरका स्वामी वपुष्मान् डटा रहा और दमके साथ युद्ध करने लगा। युद्ध करते समय उसकी भयङ्कर तलवारको दमने बड़ी फुर्तीसे काट दिया तथा उसके सारथिके मस्तक और ध्वजाको भी काट गिराया। तलवार कट जानेपर वपुष्मान्ने एक गदा उठायी, जिसमें बहुत सी काँटियाँ गड़ी हुई थीं; किन्तु दमने उसको भी उसके हाथमें ही काट डाला। फिर वपुष्मान् ज्यों ही कोई श्रेष्ठ आयुध हाथमें लेने लगा, त्यों ही दमने उसे बाणोंसे बींधकर पृथ्वीपर गिरा दिया। पृथ्वीपर गिरते ही उसका सारा शरीर व्याकुल हो गया। वह थर-थर काँपने लगा। अब युद्ध करनेका उसका विचार न रहा। उसको इस अवस्थामें देखकर दमने जीवित छोड़ दिया और प्रसन्नचित्त हो सुमनाको साथ ले वहाँसे चल दिया। तब दशार्ण देशके राजा चारुवर्माने प्रसन्न होकर दम और सुमनाका विधिपूर्वक विवाह कर दिया। तदनन्तर कुछ काल ठहरनेके पश्चात् दम अपनी स्त्रीसहित अपने घरको चले गये। दशार्णराजने भी बहुत से हाथी, घोड़े, रथ, गौ, खच्चर, ऊँट, दास-दासियाँ, वस्त्र, आभूषण और धनुष आदि श्रेष्ठ सामग्री तथा बहुत-से बर्तन दहेजमें देकर वर-वधूको विदा किया।

महामुने ! दम सुमनाको पत्नीरूपमें पाकर बड़े प्रसन्न थे। घर आकर उन्होंने माता-पिताके चरणोंमें

२९० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

प्रणाम किया। सुमनाने भी सास-ससुरके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तब उन दोनोंने भी आशीर्वाद देकर नव-दम्पतिका अभिनन्दन किया। फिर तो नरिष्यन्तके नगरमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। दशार्णराज सम्बन्धी हुए और बहुत-से राजा पुत्रके हाथों युद्धमें परास्त हो गये, यह सुनकर महाराज नरिष्यन्त बहुत प्रसन्न हुए। दशार्णराजकुमारी सुमना दमके साथ बहुत समयतक विहार करती रही। फिर उसने गर्भ धारण किया। राजा नरिष्यन्त भी सब भोगोंको भोगकर वृद्धावस्थामें पहुँच चुके थे, इसलिये वे दमको राजपदपर अभिषिक्त करके स्वयं वनमें चले गये। उनकी यशस्विनी पत्नी इन्द्रसेनाने भी उनका ही अनुसरण किया। नरिष्यन्त वहाँ वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए रहने लगे।

एक दिन दक्षिण देशका दुराचारी राजकुमार वपुष्मान्, जो संक्रन्दनका पुत्र था, थोड़ी-सी सेना साथ ले वनमें शिकार खेलनेके लिये गया। उसने तपस्वी नरिष्यन्त तथा उनकी पत्नी इन्द्रसेनाको तपस्याके कारण दुर्बल देखकर पूछा—'आप वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य हैं? मुझे बताइये।' राजा नरिष्यन्तने मौन-व्रत धारण कर लिया था, इसलिये उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया; किन्तु उनकी पत्नी इन्द्रसेनाने सब बातें सच-सच बता दीं। परिचय पाकर वपुष्मान्ने सोचा, अब तो मैं अपने शत्रुके पिताको पा गया हूँ। यह विचारकर उसने कुपित हो नरिष्यन्तकी जटा पकड़ ली। इन्द्रसेना आँसू बहाती हुई गद्गदकण्ठसे रोने और हाहाकार करने लगी। वपुष्मान्ने म्यानसे तलवार निकाल ली और यह बात कही, 'जिसने युद्धमें मुझे परास्त किया और मेरी सुमनाको हर लिया, उस दमके पिताको आज मैं मार डालूँगा। अब वह आकर इनकी रक्षा करे।'

यह कहकर उस दुराचारीने इन्द्रसेनाको रोती-बिलखती छोड़ नरिष्यन्तका मस्तक काट डाला, तब समस्त मुनि तथा अन्य वनवासी भी उसे धिक्कारने लगे। वपुष्मान् अपने नगरको लौट गया। उसके चले जानेपर इन्द्रसेनाने एक शुद्ध तपस्वीको अपने पुत्रके पास भेजा और कहा—'तुम शीघ्र जाकर मेरे पुत्रसे यह सब हाल कहो। मेरा सन्देश इस प्रकार कहना—'महाराजकी इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण हिंसा देखकर मैं बहुत दुखी हूँ। राजा होनेका अधिकार उसीको है, जो चारों वर्णों और आश्रमोंकी रक्षा करे। तुम जो तपस्वियोंकी रक्षा नहीं करते, क्या यही तुम्हारे लिये उचित है? तुम्हारे महाराज नरिष्यन्तके विषयमें यह बात प्रसिद्ध हो गयी कि बिना किसी अपराधके उनके केश पकड़कर वपुष्मान्ने उनकी हत्या की; ऐसी स्थितिमें तुम वही कार्य करो, जिससे तुम्हारे धर्मका लोप न हो। इससे आगे मुझे कुछ नहीं कहना है, क्योंकि मैं तपस्विनी हूँ। तुम्हारे मन्त्री धीर तथा सब शास्त्रोंके ज्ञाता हैं; उन सबके साथ विचार करके इस समय जो करना उचित हो, वह करो। अपने पिता शक्तिको राक्षसके हाथसे मारा गया सुनकर महर्षि पराशरने समस्त राक्षस-कुलको अग्निकुण्डमें होमकर भस्म कर दिया था। मैं तो ऐसा मानती हूँ कि तुम्हारे पिता नहीं, तुम मारे गये; उनके ऊपर नहीं, तुम्हारे ऊपर वह तलवार गिरी है। यह तुम्हारी ही मर्यादाका उल्लङ्घन किया गया है। अब तुम्हें भृत्य, कुटुम्ब और बन्धु-बान्धवोंसहित वपुष्मान्के प्रति जो बर्ताव करना उचित हो, वह करो।'

इस प्रकार संदेश दे इन्द्रसेनाने शुद्ध तपस्वीको विदा किया और स्वयं पतिके शरीरको गोदमें ले वे अग्निमें प्रवेश कर गयीं। इन्द्रसेनाकी आज्ञाके

  • राजा नरिष्यन्त और दमका चरित्र * २११

अनुसार क्षुद्र तापसने वहाँ जाकर दमसे उनके पिताके मारे जानेका सब समाचार कहा। यह सुनकर दम क्रोधसे जल उठा। जैसे घी डालनेपर आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार दम क्रोधाग्निसे जलते हुए हाथ-से-हाथ मलने लगे और इस प्रकार बोले—'ओह! मुझ पुत्रके जीते-जी उस नृशंस वपुष्मान्ने मेरे पिताको अनाथकी भाँति मार डाला और इस प्रकार मेरे कुलका अपमान किया। यदि मैं बैठकर शोक मनाऊँ या क्षमा कर दूँ तो यह मेरी नपुंसकता है। दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन—यही मेरा कर्तव्य है। मेरे पिताको मारा गया देखकर भी यदि शत्रु जीवित है तो अब 'हा तात! हा तात!' कहकर बहुत अधिक विलाप करनेसे क्या होगा। इस समय जो करना आवश्यक है, वही मैं करूँगा। उस कायर, पापी एवं दुष्ट दक्षिण-देशनिवासी शत्रुको युद्धमें मारकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगूँगा। यदि उसे न मार सका तो स्वयं ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा। यदि देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लिये स्वयं ही इस युद्धमें पधारें, भयङ्कर दण्ड लिये साक्षात् यमराज भी कुपित होकर आ जायें, कुबेर, वरुण और सूर्य भी वपुष्मान्की रक्षाका यत्न करें तो भी मैं अपने तीखे बाणोंसे उसका वध कर डालूँगा। जो नियतात्मा, निर्दोष, वनवासी, अपने आप गिरे हुए फलका आहार करनेवाले तथा सब प्राणियोंके मित्र थे—ऐसे मेरे पिताकी जिसने मुझ जैसे शक्तिशाली पुत्रके रहते हुए हिंसा की है, उसके मांस और रक्तसे आज गृध्र तृप्त हों।'

इस प्रकार प्रतिज्ञा करके नरिष्यन्तकुमार दमने मन्त्रियों तथा पुरोहितको बुलाकर कहा—'क्षुद्र तपस्वीने जो समाचार कहा है, उसे आपलोगोंने सुन लिया होगा। पिताजी तो स्वर्गधाममें जा पहुँचे। अब मेरे लिये जो उचित हो, सो बताओ। आज मैं वही करूँगा, जिसके लिये मेरी माताने आज्ञा दी है। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसे युक्त चतुरङ्गिणी सेना तैयार करो। पिताके वैरका बदला लिये बिना, पिताके हत्यारेका प्राण लिये बिना तथा माताजीकी आज्ञाका पालन किये बिना मुझे जीवित रहनेका उत्साह नहीं है।' राजाकी वह बात सुनकर खिन्नचित्त हुए मन्त्रियोंने सेवकों और वाहनोंसहित सेनाको कूचके लिये तैयार किया और त्रिकालवेत्ता पुरोहितसे आशीर्वाद ले सब लोग तलवार, शक्ति और ऋष्टि आदि आयुध लिये नगरसे बाहर निकले। महाराज दम नागराजकी भाँति फुफकारते हुए वपुष्मान्की ओर चले। उन्होंने वपुष्मान्के सीमारक्षकों तथा सामन्तोंका वध करते हुए, बड़े वेगसे दक्षिण दिशामें चढ़ाई की। संक्रन्दनकुमार वपुष्मान्को यह पता लग गया कि दम दल-बलसहित आ रहा है। इससे उसके मनमें तनिक भी भय या कम्प नहीं हुआ। उसने भी अपनी सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश दिया और नगरसे बाहर निकलकर दमके पास दूत भेजा। दूतने वहाँ जाकर कहा—'क्षत्रियाधम! तू शीघ्रतापूर्वक मेरे समीप आ। नरिष्यन्त अपनी स्त्रीके साथ तेरी प्रतीक्षा करते हैं। मेरी भुजाओंसे छूटे हुए बाण, जो शानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये गये हैं, तेरे शरीरमें घुसकर युद्धमें तेरा रक्तपान करेंगे।'

दूतकी कही हुई सारी बातें सुनकर दमने अपनी पूर्वोक्त प्रतिज्ञाका पुनः स्मरण किया और सर्पकी भाँति फुफकारते हुए वेगसे पैर बढ़ाया। कुण्डिनपुरके पास पहुँचकर दमने वपुष्मान्को युद्धके लिये ललकारा। फिर तो दोनोंमें भयङ्कर संग्राम छिड़ गया। रथी रथसवारके साथ, हाथीसवार हाथीसवारके साथ और घुड़सवार घुड़सवारके

२९२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

साथ भिड़ गये। इस प्रकार समस्त देवताओं, सिद्धों और गन्धर्व आदिके देखते-देखते दोनों दलोंमें घमासान युद्ध हुआ। जब दम क्रोधपूर्वक युद्ध करने लगे, उस समय पृथ्वी काँप उठी। कोई हाथीसवार, रथी या घुड़सवार ऐसा नहीं मिला, जो उनका बाण सह सके। तदनन्तर वपुष्मान्‌का सेनापति दमके साथ युद्ध करने लगा। दमने अपने बाणसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी, जिससे वह गिरकर प्राणोंसे हाथ धो बैठा। सेनाध्यक्षके गिरते ही राजासहित सारी सेनामें भगदड़ पड़ गयी। तब दमने कहा—'ओ दुष्ट! तू मेरे तपस्वी पिताका, जिनके हाथमें कोई शस्त्र नहीं था, अकारण वध करके कहाँ भागा जाता है। यदि क्षत्रिय है तो लौट आ।' तब वपुष्मान् अपने छोटे भाईके साथ लौट आया। साथमें उसके पुत्र, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव भी थे। वह रथपर आरूढ़ हो दमके साथ युद्ध करने लगा। दम अपने पिताके वधसे कुपित हो रहे थे। उन्होंने वपुष्मान्‌के चलाये हुए समस्त बाणोंको काट डाला और उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गको बींध डाला। फिर एक-एक बाण मारकर उसके सात पुत्रों, भाइयों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंको यमराजके घर भेज दिया। पुत्रों और भाइयोंके मारे जानेपर वपुष्मान्‌को बड़ा क्रोध हुआ और वह सर्पोंके समान विषैले बाणोंसे दमके साथ युद्ध करने लगा। दमने उसके बाणोंको काट डाला और उसने भी दमके बाण टुकड़े-टुकड़े कर डाले। दोनों ही अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे लड़ रहे थे। परस्परके बाणोंकी चोटसे दोनोंके धनुष कट गये, फिर दोनों तलवार हाथमें लेकर पैंतरे बदलने लगे। दमने क्षणभर अपने मरे हुए पिताका ध्यान किया, फिर दौड़कर वपुष्मान्‌की चोटी पकड़ ली। तत्पश्चात् उसे धरतीपर पटककर एक पैरसे उसका गला दबा दिया और अपनी भुजा उठाकर कहा—'समस्त देवता, मनुष्य, सिद्ध और नाग देखें, मैं इस नीच क्षत्रिय वपुष्मान्‌की छाती चीरे डालता हूँ।'

यों कहकर दमने अपनी तलवारसे उसकी छाती चीर डाली। इस प्रकार अपने पिताके वैरका बदला लेकर वे पुनः अपने नगरको लौट आये। सूर्यवंशके राजा ऐसे ही पराक्रमी हुए। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से शूरवीर, विद्वान्, यज्ञकर्ता और धर्मज्ञ राजा हो गये हैं। वे सभी वेदान्तके पारङ्गत पण्डित थे। मैं उनकी संख्या बतलानेमें असमर्थ हूँ। इन सब राजाओंका चरित्र श्रवण करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है।


श्रीमार्कण्डेयपुराणका उपसंहार और माहात्म्य

पक्षी कहते हैं—जैमिनिजी! महातपस्वी मार्कण्डेय मुनिने यह सब कथा सुनाकर क्रौष्टुकिजीको विदा कर दिया। उसके बाद मध्याह्नकालकी क्रिया समाप्त की। महामुने! हमने भी उनसे जो कुछ सुना था, वह सब आपको कह सुनाया। यह अनादिसिद्ध पुराण ब्रह्माजीने पहले मार्कण्डेय मुनिको सुनाया था। वही हमने आपसे कहा है। यह पुण्यमय, पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। जो इसका पाठ और श्रवण करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। आपने प्रारम्भमें जो कई प्रश्न किये थे, उसके उत्तरमें हमने पिता-पुत्र-संवाद, ब्रह्माजीके द्वारा रची हुई सृष्टि, मनुओंकी उत्पत्ति तथा राजाओंके चरित्र सुनाये हैं। यह सब बात तो हम बता चुके।

* श्रीमार्कण्डेयपुराणका उपसंहार और माहात्म्य *


अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? जो मनुष्य इन सब प्रसङ्गोंका श्रवण तथा जनसमुदायमें पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है। पितामह ब्रह्माजीने जो अठारह पुराण कहे हैं, उनमें इस विख्यात मार्कण्डेयपुराणको सातवाँ पुराण समझना चाहिये। पहला ब्रह्मपुराण, दूसरा पद्मपुराण, तीसरा विष्णुपुराण, चौथा शिवपुराण, पाँचवाँ श्रीमद्भागवतपुराण, छठा नारदीय पुराण, सातवाँ मार्कण्डेयपुराण, आठवाँ अग्निपुराण, नवाँ भविष्यपुराण, दसवाँ ब्रह्मवैवर्तपुराण, ग्यारहवाँ नृसिंहपुराण, बारहवाँ वाराहपुराण, तेरहवाँ स्कन्दपुराण, चौदहवाँ वामनपुराण, पंद्रहवाँ कूर्मपुराण, सोलहवाँ मत्स्यपुराण, सत्रहवाँ गरुडपुराण और अठारहवाँ ब्रह्माण्डपुराण माना गया है। जो प्रतिदिन अठारह पुराणोंका नाम लेता तथा प्रतिदिन तीनों समय उनका जप करता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। मार्कण्डेयपुराण चार प्रश्नोंसे युक्त है। इसके श्रवणसे सौ करोड़ कल्पोंके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्महत्या आदि पाप तथा अन्य अशुभ इसके श्रवणसे उसी प्रकार नष्ट होते हैं, जैसे हवाका झोंका लगनेसे रूई उड़ जाती है। इसके श्रवणसे पुष्करतीर्थमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त होता है।*

वन्ध्या अथवा मृतवत्सा स्त्री यदि यथावत् इस पुराणका श्रवण करे तो वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र प्राप्त करती है। इसका श्रवण करनेसे मनुष्य आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, धान्य, पुत्र तथा अक्षय वंश प्राप्त करता है। ब्रह्मन्! इस पुराणको पूरा सुन लेनेके बाद जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सुनो। विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे; पुराणस्वरूप भगवान् गोविन्दका हृदयकमलमें ध्यान करके गन्ध, पुष्प, माला, वस्त्र तथा नैवेद्य आदिके द्वारा पूजन करे। वाचककी पत्नीसहित पूजा करे। तत्पश्चात् उन्हें दूध देनेवाली सवत्सा गौ, खेतोंसे भरी हुई भूमि, सुवर्ण और चाँदी आदि वस्तुएँ यथाशक्ति दान करनी चाहिये। राजाओंको उचित है कि उन्हें ग्राम आदि तथा सवारी भी दें। वाचकको संतुष्ट करके उसके द्वारा स्वस्ति कहलाये। जो वाचककी पूजा न करके एक श्लोक भी सुनता है, वह उसके पुण्यका भागी नहीं होता; विद्वानोंने उसे शास्त्रचोर कहा है। मार्कण्डेयपुराणकी समाप्तिपर भारी उत्सव कराये और सब पापोंसे मुक्त होनेके लिये दूध देनेवाली गौ दान करे। साथ ही सपत्नीक ब्राह्मणको वस्त्र, रत्न, कुण्डल, अंगा, पगड़ी, ओढ़ने-बिछौने आदिसहित शय्या, जूता, कमण्डलु, सोनेकी अँगूठी, सप्तधान्य, भोजनके लिये काँसेकी थाली और घृतपात्र दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो उत्तम विधिके साथ इसका श्रवण करता है, वह हजार


* ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा। तथान्यन्नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्तमम्॥
आग्नेयमष्टमं प्रोक्तं भविष्यं नवमं स्मृतम्। दशमं ब्रह्मवैवर्त्तं नृसिंहैकादशं तथा॥
वाराहं द्वादशं प्रोक्तं स्काान्दञ्च त्रयोदशम्। चतुर्दशं वामनकं कौर्मं पञ्चदशं तथा॥
मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम्। अष्टादशपुराणानां नामधेयानि यः पठेत्॥
त्रिसन्ध्यं जपते नित्यं सोऽश्वमेधफलं लभेत्। चतुःप्रश्नसमोपेतं पुराणं मार्कण्डेयांजकम्।
श्रुतेन नश्यते पापं कल्पकोटिशतैः कृतम्। ब्रह्महत्यादिकान्यपि ह्यन्यान्यशुभानि च॥
तानि सर्वाणि नश्यन्ति तूलं वाताहतं यथा। पुष्करस्नानजं पुण्यं श्रवणादस्य जायते॥
(१३७। ८-१४)

२२४
संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण

अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाता है। उसे न यमराजसे भय होता है न नरकोंसे। वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होकर कृतार्थ हो जाता है। इस पृथ्वीपर उसका वंश-परम्परा सदा कायम रहती है तथा वह इन्द्रलोक एवं सनातन ब्रह्मलोकमें जाता है। वहाँसे पुनः च्युत होकर मनुष्य-योनिमें उसे नहीं आना पड़ता।

इस पुराणके श्रवणसे ही मनुष्य परम योग प्राप्त कर लेता है। नास्तिक, वेदनिन्दक शूद्र, गुरुद्रोही, व्रत-भंग करनेवाले, माता-पिताके त्यागी, सुवर्णचोर, मर्यादा भंग करनेवाले तथा जातिको कलङ्कित करनेवाले पुरुषोंको प्राण कण्ठमें आ जायं तो भी इस पुराणका उपदेश नहीं देना चाहिये। यदि लोभ, मोह अथवा विशेषतः भयके कारण कोई उक्त मनुष्योंको यह पुराण सुनाता अथवा पढ़ाता है तो वह निश्चय ही नरकमें पड़ता है।*

जैमिनि बोले—‘पक्षियो! महाभारतमें मेरे जिस सन्देहका निवारण नहीं हो सका, उसका निवारण आपलोगोंने मित्रभावसे किया है; ऐसा दूसरा कौन करेगा। आपलोग दीर्घायु, नीरोग तथा उत्तम वृत्तिसे युक्त हों। सांख्ययोगमें आपकी बुद्धि अविचलभावसे स्थित रहे। पिताके शापजनित दोषसे जो आपके मनमें दुःख रहता है, वह दूर हो जाय।’

यों कहकर महाभाग जैमिनि उन श्रेष्ठ पक्षियोंकी प्रशंसा करके अपने आश्रमपर चले गये। वे उन पक्षियोंद्वारा किये हुए परम उदार उपदेशका सदा चिन्तन करने लगे।


श्रीमार्कण्डेयपुराण सम्पूर्ण


* पुराणश्रवणादेव परं योगमवाप्नुयात्। नास्तिकाय न दातव्यं वृषले वेदनिन्दके॥
गुरुविद्वेषके चैव तथा भग्नव्रतेषु च। पितृमातृपरित्यागे सुवर्णस्तेयिने तथा॥
भिन्नमर्यादके चैव तथैव जातिदूषके। एतेषां नैव दातव्यं प्राज्ञैः कण्ठगतैरपि॥
लोभाद्वा यदि वा मोहाद् भयाद्वापि विशेषतः। पठेद्वा पाठयेद्वापि स गच्छेन्नरकं ध्रुवम्॥
(१३७। ३२—३५)

'कल्याण' के पुराने, लोकप्रिय पुनर्मुद्रित विशेषाङ्कः

ईश्वराङ्क [कल्याण वर्ष ७, सन् १९३२ ई०]—मनुष्यमात्रके मनमें इस जगत्‌के सृजक, पालक एवं संहारक सत्ताके विषयमें शाश्वत प्रश्न सदैव ही गूँजा करते हैं। अखिल सृष्टिके उसी कारण-सत्ताको ईश्वर कहा जाता है। ईश्वर-विषयक समस्त प्रश्नोंके समाधानके लिये 'कल्याण'में 'ईश्वराङ्क'का पूर्व प्रकाशन किया गया था। इस अङ्कमें ईश्वर-तत्त्व, ईश्वरमें विश्वास, ईश्वर-महिमा, ईश्वर और उसकी प्राप्ति, परमात्मा और जीवात्मा, ईश्वर-निरूपण, ईश्वरका अस्तित्व, विज्ञान और ईश्वर आदि अनेक विषयोंपर देश-विदेशके मूर्धन्य विद्वानों, सन्त-महापुरुषोंके लेखोंका अद्भुत संग्रह है। इसके अतिरिक्त अनेक सिद्ध महात्माओंके द्वारा ईश्वर-सम्बन्धी प्रश्नोंका प्रश्नोत्तर-शैलीमें सुन्दर समाधान भी है।

शिवाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ८, सन् १९३४ ई०]—यह शिवतत्त्व तथा शिव-महिमापर विशद विवेचनसहित शिवार्चन, पूजन, व्रत एवं उपासनापर तात्त्विक और ज्ञानप्रद मार्ग-दर्शन कराता है। यह एक मूल्यवान् अध्ययन-सामग्री है। द्वादश ज्योतिर्लिङ्गोंका सचित्र परिचय तथा भारतके सुप्रसिद्ध शैव-तीर्थोंका प्रामाणिक वर्णन इसके अन्यान्य महत्त्वपूर्ण (पठनीय) विषय हैं।

शक्ति-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ९, सन् १९३५ ई०]—इसमें परब्रह्म परमात्माके आद्याशक्ति-स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, महादेवीकी लीला-कथाएँ एवं सुप्रसिद्ध शाक्त-भक्तों और साधकोंके प्रेरणादायी जीवन-चरित्र तथा उनकी उपासना-पद्धतिपर उत्कृष्ट उपयोगी सामग्री संगृहीत है। इसके अतिरिक्त भारतके सुप्रसिद्ध शक्ति-पीठों तथा प्राचीन देवी-मन्दिरोंका सचित्र दिग्दर्शन भी इसकी उल्लेखनीय विषय-वस्तुके महत्त्वपूर्ण अङ्ग हैं।

योगाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १०, सन् १९३६ ई०]—इसमें योगकी व्याख्या तथा योगका स्वरूप-परिचय एवं प्रकार और योग-प्रणालियों तथा अङ्ग-उपाङ्गोंपर विस्तारसे प्रकाश डाला गया है। साथ ही अनेक योग-सिद्ध महात्माओं और योग-साधकोंके जीवन-चरित्र तथा साधना-पद्धतियोंपर रोचक, ज्ञानप्रद वर्णन हैं। यह विशेषाङ्क योगके कल्याणकारी और योग-सिद्धियोंके चमत्कारी प्रभावोंकी ओर आकृष्ट कर 'योग' के सर्वमान्य महत्त्वसे परिचय कराता है।

संत-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १२, सन् १९३८ ई०]—इसमें उच्चकोटिके अनेक संतों—प्राचीन, अर्वाचीन, मध्ययुगीन एवं कुछ विदेशी भगवद्विश्वासी महापुरुषों तथा त्यागी-वैरागी महात्माओंके ऐसे आदर्श जीवन-चरित्र हैं, जो पारमार्थिक गतिविधियोंके लिये प्रेरित करनेके साथ-साथ उनके सार्वभौमिक सिद्धान्तों, त्याग-वैराग्यपूर्ण तपस्वी जीवन-शैलीको उजागर करके उच्चकोटिके पारमार्थिक आदर्श, जीवन-मूल्योंको रेखाङ्कित करते हैं।

साधनाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १५, सन् १९४१ ई०]—यह अङ्क उच्चकोटिके विचारकों, वीतराग महात्माओं, एकनिष्ठ साधकों एवं विद्वान् मनीषियोंके साधनापयोगी अनुभूत विचार और उनके साधनापरक बहुमूल्य मार्ग-दर्शनसे ओतप्रोत-महत्त्वपूर्ण है। इसमें साधना-तत्त्व, साधनाके विविध स्वरूप—ईश्वरोपासना, योगसाधना, प्रेमोपासना आदि अनेक कल्याणकारी साधनों और उनके अङ्ग-उपाङ्गोंका शास्त्रीय विवेचन है। यह सभीके लिये उत्तमोत्तम दिशा-निर्देशक है।

भागवताङ्क [कल्याण वर्ष १६, सन् १९४२ ई०]—भारतीय संस्कृतिकी अनुपम निधि श्रीमद्भागवत संस्कृति-वाङ्मयकी सर्वोत्कृष्ट परिणति है। इसमें वर्णित भगवान्‌की दिव्य-लीला, उत्कृष्ट काव्य, समाज-संगठन-प्रणाली, अध्यात्म, भक्त-चरित्र आदि संसारके लिये अनुकरणीय आदर्श है। श्रद्धालु भक्तोंके लिये तो यह साक्षात् भगवद्विग्रह एवं आश्रय-स्थान है। इसीलिये गीताप्रेससे कल्याणके सोलहवें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें 'भागवताङ्क' का पूर्व प्रकाशन किया गया था। इसमें भारतके उत्कृष्ट संत-महात्माओं-विद्वान् तथा चिन्तकोंके श्रीमद्भागवतके विभिन्न पक्षोंपर सुन्दर लेखोंके साथ सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतका हिन्दी अनुवाद भी है।

संक्षिप्त महाभारत (सचित्र, सजिल्द दो खण्डोंमें) [वर्ष १७, सन् १९४३ ई०]—धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके महान् उपदेशों एवं प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओंके उल्लेखसहित इसमें ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, योग, नीति, सदाचार, अध्यात्म, राजनीति, कूटनीति आदि मानव-जीवनके उपयोगी विषयोंका विशद वर्णन और विवेचन है। इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण विषयोंके समावेशके कारण इसे शास्त्रों में 'पञ्चम वेद' और विद्वत्समाजमें भारतीय ज्ञानका 'विश्वकोश' कहा गया है।