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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पुण्यों की कमीमें विकासकी कमी होती है। रगो, रूपों, बुद्धियोंमें खराबी पापोंकी विशेषतासे भी होती है। वैसे ही हर एक जीवमें सब तरहके गुण और शक्तियाँ विद्यमान होती हैं। तपस्या और धर्मकी महिमासे उनका आविर्भाव, अधर्मसे उनका ह्रास हो जाता है। प्रकृतिके विरुद्ध परमेश्वरका जातिपर हाथ लगानेका तो कोई प्रसङ्ग ही नहीं, प्रेम, भक्ति आदिसे भी अनेक परिवर्तन होनेपर भी उस देहके रहते-रहते जाति नहीं बदल सकती, दूसरे जन्ममें तो अभीष्ट जाति-परिवर्तन तीव्र कर्मोंसे हो सकता है। यह भी योगादि शास्त्रोंको सम्मत है। भगवान् भक्तपर अनुग्रह करे, यह भी पक्षपात नहीं है; क्योंकि जैसे अन्यान्य कर्म हैं वैसे ही भक्ति भी मानस कर्मविशेष ही है। अग्निके समीप जो ही जायगा, उसकी शीत- निवृत्ति होगी। वह सभीके लिये समान है। विशेष कर्मों, उपासनादि हेतुओंसे उसी जन्ममें जातिपरिवर्तन होना अपवाद और उस देहमें जातिका न बदलना उत्सर्ग है। फिर किसी पीढ़ीके रूप, रग, मनके परिवर्तनसे जाति बदलनेका कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। जो कहा गया है कि 'परमेश्वर किसी भक्त जातिको ब्राह्मणत्व दे सकता है' यह कहना अनभिज्ञता है, क्योंकि ब्राह्मणत्व भी जाति ही है। फिर एक जातिको दूसरी जाति कैसे मिल सकती है? यह ध्यान देनेकी बात है कि व्यक्ति- को जाति प्राप्त होती है। जातिको जाति कभी भी नहीं मिल सकती, 'जातौ जाते- रनङ्गीकारात्' किसी अन्य जातिके व्यक्तिसे अन्य जाति मिल सकती है, परंतु वह अपवाद है। जो तपस्या और योगकी शक्तिसे प्रकृतिपर अधिकार पा चुके हैं, जो प्राकृतिक तत्त्वोंमें सङ्कल्पमात्रसे परिवर्तन कर सकते हैं, वे शूद्रादि जात्यारम्भक कर्मविशिष्ट भूत, तन्मात्राओं या परमाणुओंको हटाकर ब्राह्मणजात्यारम्भक कर्मविशिष्ट भूतों या परमाणुओंसे ब्राह्मणजातिको व्यक्त कर सकते हैं। परंतु यह सामर्थ्य उन्हीं लोगोंमें सम्भव है, जो अपने सामर्थ्यसे नहुषको अजगर और रम्भाको पहाड़ी बना सकते हैं। उन महर्षियोंके वचनोंमें वह सामर्थ्य रहती है कि जिससे उनके वचनोंका अनुगमन अर्थ करते हैं। वचनोंको अर्थके अनुगमनकी आवश्यकता नहीं होती। वे यदि घटको पट कहें, तो घटको पट होना पड़ता है—'ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति' आद्य महर्षियोंके वचनोंका अनुधावन अर्थ करते हैं। अतएव परमेश्वरद्वारा किसी जातिमे अनियमित परिवर्तनका प्रसङ्ग ही नहीं आता। जो यह कहा गया है कि मिश्रणसे भी रग-रूपमे भेद होता है, जैसे काली मुर्गी ओर श्वेत मुर्गेसे उत्पन्न चार बच्चोंमें एक काला और एक श्वेत होता है, बाकी दो मिश्रित होते हैं। दूसरी पीढ़ीमें सोलह बच्चोंमें एक श्वेत, एक काला और चोदह मिश्र रगके तथा तीसरी पीढ़ीमें चौंसठमें एक काला, एक श्वेत, बाकी सब मिश्र रगके होते हैं। इस तरह मिश्र जातिमें भी शुद्ध विशेषताएँ आ जाती हैं। वैसे ही मनुष्योंमें भी पश्चिमी श्वेत

३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य और पीत मंगोलका मिश्रण होनेपर उनसे कुछ पश्चिमीय रूप-रंगके और कुछ मंगोल रूप-रंगके होते हैं। परंतु अधिकांश पारसी, ईरानी ढंगके होते हैं। इसी दृष्टिसे निश्चित किया जा सकता है कि पारसी जाति इन्ही दोनोंका मिश्रण है। यही स्थिति उत्तर भारतकी उच्च जातियोंमें भी है। वहाँ मिश्रण स्पष्ट है। परंतु ऐसा कहना ठीक नहीं है। जैसे मुर्गोंमें यह देखा जाता है, वैसे ही अन्य जातियोंमे इसका व्यभिचार भी देखा जाता है। 'कलमी आमोंमें कभी भी मूल आमके समान फल नहीं होते। व्यक्तियोंके रूप, रंग, ऊँचाईमे एकता, शरीरके हर एक अङ्गमें स्पष्टता शुद्ध जातिके चिह्न हैं,' यह कथन भी असङ्गत है। शुद्ध जातिका अर्थ क्या है ? क्या सृष्टिकालसे प्रकट होनेवाली कोई आदिम जातिको शुद्ध जाति कहा जाता है ? यदि हाँ, तो उपर्युक्त चिह्न उसीके हैं, इसमें क्या आधार है ? वानर आदि जातियोंके अङ्गोकी अस्पष्टताके कारण क्या उन्हें अशुद्ध माना जाय ? फिर शुद्ध बंदर कौन ? कोई जाति ही स्पष्ट अङ्गवालोकी होती है, कोई अस्पष्ट अङ्गवाली होती है। 'पाँचवी, छठी, सातवीं पीढ़ीमें अशुद्ध संतानोमें फिर शुद्धता आ जाती है,' इसका ठीक अर्थ न समझकर विद्वान् लेखकने व्यर्थ ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रके रक्तका हिसाब-किताब लगा डाला है। 'पाँचवी पीढ़ीमें अशुद्ध संतान शुद्ध हो जाती है,' इसका अभिप्राय यह नहीं है कि किसी तरहसे भी अशुद्ध संतानसे पाँचवीं पीढ़ीकी संतान शुद्ध हो जाती है। उसका अभिप्राय है कि शूद्रकन्याका ब्राह्मणके साथ विवाह हो और फिर उससे कन्या ही हो, उसका विवाह फिर ब्राह्मणसे ही हो, उससे फिर कन्या हो और उसका फिर ब्राह्मणसे ही विवाह हो । इस परम्परासे सातवीं पीढ़ीमें उत्पन्न कन्या ब्राह्मणी होगी । शूद्रकन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न कन्यापरम्परासे ही सातवीं पीढ़ीमें जातिका उत्कर्ष होगा, परंतु शूद्रपुत्रकी परम्परामें उत्कर्ष नहीं हो सकेगा, बल्कि शूद्र यदि उत्कृष्ट वर्णकी कन्यासे उद्वाह करे तो उसका पतन हो सकता है। 'अतः हर तरहसे निकृष्ट संतान भी उत्कृष्ट जातिको प्राप्त हो जाती है,' ऐसा नहीं कहा जा सकता। 'रक्तमिश्रणसे भी जातिमे भेद नही होता,' यह बात नहीं है। प्राचीन कालमें स्त्रियाँ बिल्कुल शुद्ध थी, यह तो कोई भी नही कहता, किंतु जो अशुद्ध थीं, उनसे उत्पन्न संतान अनुलोम, प्रतिलोम सङ्कर कोटिमें गिनी गयीं, जो आज भी अनेक उपजातियोके रूपमें प्रत्यक्ष हैं। शुद्ध जातियोंमें वे मिलायी नहीं गयीं, यही वैदिकोंका कहना है। स्त्रियोंकी शुद्धिपर विश्वास न होनेका कारण भिन्न- भिन्न देशोंका वर्तमान वातावरण ही है। अब भी देखा जाता है कि माता, पिता, भ्राताके पूर्ण नियन्त्रणमें कन्या रहती है। वह नौ-दस वर्षकी अवस्थामें ब्याही जाती है। श्वशुरकुलमें जाते ही पर्देमें रहती है। ज्येष्ठ, श्वशुरतकसे भी नही बोलती, घरके भीतर सदा घूँघटकी आटमें रहती है। जहाँ घूँघटकी प्रथा नही है, वहाँ

भी दृष्टिसवरणरूप पर्दा है ही। बिना कुटुम्बियोंके अकेले उसका कहीं जाना-आना सम्भव ही नहीं, किसी बाहरी व्यक्तिसे बोलनातक जब असम्भव है, तब स्वतन्त्र मिलनेकी तो बात ही क्या ? ऐसी दशामें कुटुम्बमें कहीं व्यभिचार भले ही हो जाय, परन्तु परजातिके साथ सम्बन्ध तो असम्भव ही है। रजस्वला होनेपर स्त्रीके मनमें विकार आनेपर किसीपर मन जा सकता है। इसीलिये रजस्वला होनेके पहले ही विवाह करनेका नियम है। पातिव्रतधर्म, वैधव्य-पालन, सतीधर्म आदिके प्रचारपर जिनकी दृष्टि है, जो आज भी एक-एक गाँवमें सैकड़ों निर्दोष कुलोंको देख रहे हैं, उन्हे स्त्रियो, विशेषतः प्राचीन कुलाङ्गनाओंकी शुद्धिपर अविश्वासका कोई कारण नहीं। जहाँ कहीं कुछ भी गड़बड़ीका संदेह हो, वहाँ उनकी संतानोंको पृथक् करनेका आशय यही था कि जातिकी शुद्धता बनी रहे । सारांश यह है कि रूप, रंग, रक्त, वीर्य आदि सभीका परिवर्तन देश, काल, जल, वायु, प्रारब्ध एवं अन्यान्य आगन्तुक दोषों और गुणोंसे हो जाता है। इतनेहीसे जाति-भेद निराधार और निरर्थक नहीं सिद्ध होता। जैसे काली, श्वेत मृगीमें भी जाति वही रहती है। नील, श्वेत, लाल, सब रंगकी गायोंमें 'गोत्व' और पूज्यत्व रहता ही है, वैसे ही पजावी, मैथिल, वगाली, द्रविड़ ब्राह्मणोंके रूप-रंगमें भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व समान ही रहता है। 'इनमें कौन शुद्ध है, कौन नहीं,' इसका निर्णायक प्रमाण लेखकके साथ क्या है ? पजावियों, वगालियों, युक्तप्रान्तियो, मैथिलो सभीके आकार- मे स्पष्टता है। फिर भी कुछ भेद केवल देश, जल, वायुका ही है। अतएव उन- उन देशोंके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रतकके आकार-प्रकार, भाषामें एक खास समानता होते हुए भी जातिमें भेद है। वगाली, मैथिल, दक्षिणी ब्राह्मणके गोत्र, शाखा, सूत्र समान हैं। एक ही देशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके रूप, रंग वोल- चालमें समानता होनेपर भी गोत्र आदिमे भेद है। कौन चीज बदल सकती है, कौन नहीं, इसका ज्ञान अनुमान और शास्त्रसे सुगम है, पर शास्त्र-अनुमानशून्य केवल कल्पनाकी उड़ान करनेवालेको वह अवश्य दुर्गम है। जब यह स्पष्ट है कि रूप-रंग, मोटापन दुबलापनकी तरह परिवर्तनशील है, मनमें भी सत्त्व, रज, तमकी प्रबलता निर्बलता घट-बढ़ सकती है, तब स्पष्ट ही है कि इनके बदलनेसे ब्राह्मणता आदिमे परिवर्तन नहीं होता। कर्मविपाक और विकासवाद जड़ प्रकृतिसे विश्वका विकास माननेपर ईश्वरवाद और कर्मवादसे विरोध बतलाया जाता है। यह पक्ष उचित ही प्रतीत होता है कि जैसे बीज, धरणी, अनिल और जलके संसर्गसे अपने-आप अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फलसमन्वित होता है, वैसे ही प्रकृति अपने आप ही महदादिक्रमेण समस्त प्रपञ्चाकारेण परिणत होती है ! विद्युत्कणों या परमाणुओंसे बहुत-से सूर्यादि

ग्रह, फिर पृथ्वी और उसपर घास, फूल, वृक्ष, फिर मांसमय ग्रन्थियाँ, फिर जलजन्तु, पक्षी, वानरादि क्रमसे मनुष्यका प्रादुर्भाव हुआ। परंतु ईश्वरवादी कहता है कि जड प्रकृतिको जब कुछ ज्ञान ही नहीं, तब वह सुव्यवस्थित विचित्र विश्वका निर्माण कैसे कर सकती है? अतः सर्वज्ञ ईश्वर मानना चाहिये। साथ ही विश्व वैचित्र्यका निमित्त कर्मवैचित्र्य भी मानना पड़ेगा। वृक्ष, लता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, देवता, दानव, मानव आदिकोंमे सुख-दुःखकी विचित्रताके लिये कर्मोंकी विचित्रता मानना ही चाहिये। कर्मोंको बिना माने वस्तुओंका सौष्ठव, असौष्ठव, भोग-सामग्रीकी बहुलता-हीनता आदि कैसे सिद्ध हो सकते हैं? जडवादी सब कुछ 'प्रकृतिके स्वभाव' से ही मान लेता है; परंतु ईश्वरवादी, धर्मवादी इसे अनुचित मानते हैं। विचार करनेसे ईश्वरवादीके कर्मानुसार व्यवस्थामें भी दोष प्रतिभासित होते हैं। ईश्वरवादी कर्मके अनुसार समस्त व्यवस्थाका उपपादन करते हैं। परंतु कर्म यदि समस्त जन्तुओंको कर्मोंका फल माना जाय तो अनन्त तृण, वीरुध, वृक्ष, ज्ञानशून्य प्राणियोंको कर्मका ज्ञान ही नहीं है, फिर उनके किन कर्मोंके अनुसार उनका अग्रिम जन्मादि माना जायगा? साथ ही पशु-पक्षियों, कीट-पतंगोंको धर्माधर्मका ज्ञान ही नहीं, फिर वे कैसे धर्मका अनुष्ठान और अधर्मका परिवर्जन कर सकते हैं? इसके सिवा सर्प, व्याघ्रादि कितने ही स्वभावानुसारी प्राणियोंसे तो पाप ही अधिक बनता है, फिर तो उनके उद्धारका समय ही न आयेगा। पापकर्मसे अधम योनियाँ, अधम योनियोंसे पुनरपि पाप होता ही जायगा। परंतु कहा जाता है कि कर्मका अधिकारी केवल मनुष्य ही है और सब भोगयोनि हैं। मनुष्यशरीरसे ही प्राणी कर्म करके अनेक योनियोंमें कर्मफलोंको भोगता है। अधम कर्मोंसे अधम योनियोंमें, उत्तम कर्मोंसे देवादि उत्तम योनियोंमें फिर भोगा जाता है। इस कथनके अनुसार यह भी मालूम पड़ता है कि देवता, असुर, राक्षसादिकोंके लिये भी विधि-निषेध नहीं है। वे भी भोग- योनियाँ ही हैं। यहाँतक कि भारतवर्षके ही मनुष्य कर्मके अधिकारी हैं, अतएव उन्हींमें वर्णाश्रमानुसार कर्म एव तद्बोधक वेदादि शास्त्र हैं। तद्भिन्न अष्ट वर्ष, जम्बूद्वीपके और समस्त छः द्वीप तथा त्रयोदश भुवनके सभी प्राण केवल कर्मोंके फल ही भोगते हैं। वे कर्मके अधिकारी नहीं, इसलिये विधि-निषेधके भी अधिकारी नहीं हैं। शास्त्रोंसे यह भी प्रमाणित होता है कि इन्द्रादि देवताओं, असुरो एव राक्षसोमे भी पुण्य-पाप कुछ माना जाता था, अतएव यज्ञादिकोंका अनुष्ठान उनमें भी सुना जाता है। और नहीं तो कुछ माता, दुहिता आदिकोंका सम्भोग आदि पाप और उपासना ज्ञानादि पुण्य तो माने ही जाते थे। इसी तरह सुग्रीव-बालि-जैसे वानरों, जटायु-सम्पाति-जैसे गृध्रादि, गरुड़ादि पक्षियोंमें

भी पुण्य पापकी भावना सुनी जाती है। फिर भी प्रधान सिद्धान्त यही है कि भारतीय मनुष्य ही कर्माधिकारी हैं, अतएव यहींसे भोग, मोक्ष सब कुछ सिद्ध होता है और यहींके समस्त कर्मठ कर्मफलभोगार्थ भिन्न योनियोंमें जाते हैं। कुछको ईश्वरीय सृष्टिके मूल कर्मको माननेवालोंके इस सिद्धान्तपर भी संशय होता है कि “कथञ्चित् उत्तरकुरु-जैसे देशोंके दिव्य मनुष्योंको भले ही भोगयोनि मान लें, पर भारतके बाहर रहनेवाले मनुष्योंको कर्माधिकारी क्यों नहीं माना गया ? कहा जा सकता है कि स्वर्गियोंके समान वे भी कर्मफलोंके भोगार्थ हैं। यदि सर्वत्र कर्म-परम्परा मानते जायेंगे, तब तो फिर कर्मोंकी समाप्ति ही न होगी, अतः कहीं कर्मभोग ही मानकर कर्म न माननेसे भोगद्वारा कर्मोंकी समाप्ति सम्भव है । परंतु आजके यूरोपीय, अमरीकन, रूसी, चीनी, अफ्रीकन आदि मनुष्योंमें तो भारतीयोंसे कुछ भी भेद नहीं है, फिर उन्हें कर्मका अधिकारी क्यों न माना जाय और वहाँ ईश्वरीय वेदादि शास्त्रोंका प्रचार क्यों नहीं हुआ ? यदि कथञ्चित् यह सिद्ध किया जाय कि 'वर्तमान उपलब्ध समस्त पृथ्वी भारतवर्ष ही है, अतएव उपर्युक्त सभी कर्मके अधिकारी हैं, इनमें सर्वत्र वेदका प्रचार भी था, प्रमादवश ही लोग अवैदिक हो गये। ब्राह्मणोंका सम्बन्ध टूटनेसे भक्ष्याभक्ष्यादिके नियम टूट गये, इसीलिये अब भी मानवधर्म, सामान्यधर्म, अहिंसा, सत्यादि नियमों, ईश्वरोपासनादि नियमोंके मनुष्यमात्र अधिकारी हैं,' तो भी यह प्रश्न होगा कि कितनी ही जंगली, हब्शी आदि अनेक मनुष्य जातियाँ हैं, जिनमें मालूम पड़ता है, कभी भी धर्म-कर्मकी भावना ही नहीं थी। उन्हें पुण्य-पाप होता है या नहीं ? यदि नहीं होता, तो क्यों ? यदि 'अज्ञानी होनेसे,' तब तो किसी अंशमें ज्ञानी होना भी अपराध कहा जा सकता है । ज्ञानी होनेसे पुण्यके अनुष्ठानसे स्वर्गादि सुख प्राप्त करना तो अच्छा है, परंतु ज्ञानी होकर पापकर्म करके नरकादि महान् कष्टोंको भोगना तो अनिष्ट ही है। यदि अज्ञानी होनेसे ही वनमानुषादि अनेक जंगली मनुष्य हिंसादि पापोंका फल नहीं भोगते, तब तो हिंदुओंके पापियोंका ज्ञान ही अपराध हुआ । यदि ज्ञान न हो, तो वे भी पापफलसे मुक्त हो जायेंगे, इसलिये पापफलसे डरनेवालोंको चाहिये कि वे अपने बच्चोंको ज्ञानी न होने दें । इसके अतिरिक्त, एक ब्राह्मण बालक ज्ञानी होनेके लिये वेदादि शास्त्रों- का अध्ययन न करे, तो यह भी पाप ही समझा जाता है। इस तरह जगलियोंका भी ज्ञानके लिये प्रयत्न न करना भी पाप ही समझा जाना चाहिये । फिर जैसे राजकीय कानूनमें अपराधका फल भोगना ही पड़ता है, 'मैं नहीं जानता था'; मा० रा० १५-

२. द्वितीय खण्ड: ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग-संघर्ष एवं आर्थिक नियतिवाद का खण्डन

२२६ मार्क्सवाद और रामराज्य यह कहनेसे काम नहीं चल सकता, जैसे विष जाने, बिना जाने अपना फल देता ही है, वैसे ही यदि धर्माधर्म कोई वस्तु हैं, तो वे जाने, बिना जाने अपना फल देंगे। "कहा जा सकता है कि विज्ञान भी एक तरहका कर्म ही है, अतः इसका होना, न होना भी फलोंमें विशेषता सम्पादन करता है। जैसे हथकड़ी-बेड़ीसे जिस व्यक्तिके हस्त-पादादि जकड़े हैं, जो असमर्थ है, उसके लिये करने, न करनेका विधि-निषेध नहीं हो सकता । समर्थके प्रति ही विधि-निषेध होते हैं, अतः जिनमें जो सामर्थ्य है ही नहीं—(जैसे पशुओंमें किसी ग्रन्थ पढ़नेकी ) उन्हे उस सामर्थ्यके सम्पादनका विधान भी नहीं किया जा सकता । अतएव उस विधानके पालन न करनेसे वे अपराधी भी नहीं माने जा सकते । ऐसी स्थितिमें यह आया कि भगवान्‌ने जिनको कर्म करनेके देश-कालमें और कर्म करने एवं तदुपयोगी ज्ञान- सम्पादनमें योग्य—समर्थ बनाया, यदि वे विधि-निषेधका उल्लङ्घन करते हैं तो वे ही अपराधी माने जाते हैं ।' परंतु इससे यह भी सिद्ध होगा कि जो लोग भारतमें भी आर्यों या अन्य धर्मानुयायियोंमें हैं, उन्हे भी ज्ञान-सम्पादनकी सामग्री न मिली, उचित माता-पिता, उचित संग-सहवास न प्राप्त हुआ; अतएव जिज्ञासा ही न हुई । फिर उनके ज्ञान न सम्पादन करनेमें उनका कोई दोष न होना चाहिये। साथ ही उनको पापादिका फल भी न भोगना चाहिये । इसी तरह जंगलियोंमें भी मनुष्य होनेके कारण यद्यपि ज्ञान-सामर्थ्य है, तथापि संग-सहवास आदि ज्ञानकी सामग्री नहीं है अथवा वेदोक्त धर्म, कर्म, ज्ञानके विपरीत ही सामग्री है। तब शुद्ध ज्ञानके न सम्पादन करनेमे उनका क्या दोष है ? फिर यदि वे वेदके विपरीत वेदोंसे निषिद्ध समस्त पातकोंको करे, तो उनका क्या दोष और उनको नरकादि दुःख क्यो होगा ? यदि भावना न होनेसे उनके वेद-निषिद्ध आचरणसे भी कोई दोष न माना जाय, तब तो यह मानना पड़ेगा कि भावना ही धर्मा- धर्म है, उससे भिन्न कोई धर्माधर्म नामकी वस्तु नहीं है। फिर तो यह भी मानना पड़ेगा कि वैदिक धर्म भी किसीकी दृष्टिसे पुण्य, किसीकी दृष्टिसे पाप होगा । उस दशामें धर्मका कोई निश्चित स्वरूप तथा निश्चित फल न रहा और फिर पशुओ, पक्षियोंके समान ही पर-स्त्री-गमनादिमे या तो मनुष्योंको भी पापादि न होगा या तो पक्षी-पशु आदिकोंको भी होगा ही, क्योकि कोई-न-कोई भावना सर्वत्र ही है। "इसके सिवा भारतीयो या मनुष्यमात्रको भी यदि कर्मयोनि मान लें, तो भी कर्मकी व्यवस्था नहीं बैठती; क्योकि मनुष्योंकी संख्या प्रतिपरार्ध एक भी नहीं है । फिर इतने मनुष्य कब हुए जो मनुष्य-शरीरमें कर्म करके उनका फल भोगनेके लिये पशु, पक्षी, कीट, पतंग और तृण-वीरुधोंमें गये ? जब मनुष्य उत्पन्न हुए ही नहीं थे, तभी पहलेसे असंख्य तृण, वीरुध, वृक्ष पृथ्वीपर हैं,

वे भी जीव ही हैं। यदि वे कर्मफल भोग रहे हैं और कर्मयोनि मनुष्य ही है, तो वे कभी मनुष्य रहे होंगे, यह भी मानना पड़ेगा। परंतु कभी भी इतने मनुष्य रहे होंगे, यह कल्पना भी नहीं हो सकती। समुद्रोंमें अपरिगणित जातिके कीट, टिड्डी, पिपीलिका, पतंग ऐसे अचिन्त्य जीव हैं, जिनकी संख्याका कभी भी पता नहीं लग सकता। यह सब कभी मनुष्य रहे होंगे, यह कल्पना नहीं हो सकती। यदि कहा जाय कि 'अनादि सृष्टिमें कभी-न-कभी वे सब मनुष्य रहे होंगे', तो यह भी ठीक नही, क्योकि जब मनुष्य रहे, तब तृणादि तो अवश्य ही रहे होगे। कम- से कम भोजनके लिये अन्न रहे होगे। अन्नकी भी सम्पूर्ण ओषधियाँ जीव ही हैं। वे भी कर्मफल ही भोग रहे हैं। फिर कभी भी जन्तु न रहे हों, यह नहीं कहा जा सकता। वैज्ञानिक लोग जलोंमें भी अपरिगणित कीटोंको दिखलाते हैं, प्राणियों- के रूपोंको भी कीटमय ही बतलाया जाता है। फिर वे सब जीव, मनुष्य जब कभी भी रहा होगा, तब भी अवश्य ही रहे होगे। ऐसी स्थितिमें उन सबका कभी मनुष्य होना कैसे सम्भावित हो सकता है? हाँ यदि कतिपय कल्प या कतिपय ब्रह्माण्ड ऐसे माने जायें, जहाँ केवल मनुष्य ही असंख्येय मात्रामें हों और कोई भी जन्तु या तृणादि वहाँ न हों और वे ही जीव वर्तमान उपलब्ध संसारोंमें तृण, कीटादि रूपमें भोग भोग रहे हैं, तब कुछ समाधान हो सकता है। परंतु इसमें कोई प्रमाण भी तो होना चाहिये। उनके खानेकी चीज क्या थी? तृण, जल, अन्न बिना वे रहते थे, रक्तादि उनके देहमें नहीं थे, कीटोका भी संसर्ग नहीं था, फिर भी वे पाप करते थे, जिससे यहाँके तृणादि हुए। उस ब्रह्माण्डको इतना बड़ा मानना होगा कि इस ब्रह्माण्डके परमाणु प्रदेशपर भी मरे हुए जीव वहाँ मनुष्य बन- कर पाप करें। फिर जब उनको खाना नहीं, रक्त-वीर्य न होनेसे व्यभिचार नहीं, तब पाप ही कैसे और कौन करेंगे? यह सब यदि दृढ़तर प्रमाणसे प्रमाणित हो, तभी कर्मकी व्यवस्था हो सकती है, परंतु कोई भी ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। "कुछ लोग कहते हैं कि 'ज्ञानवान् और समर्थ होनेपर ही जीव कर्ममें स्वतन्त्र होते हैं, इसके पहले वे प्राकृतिक कर्मप्रवाहमें ही बहते रहते हैं। अर्थात् प्रकृति स्वभावसे तमोगुणप्रधाना होकर जिस समय जड राज्यकी ओर प्रवाहित होती है, उस समय प्रायः तदन्तःपाती सभी जीव जडताको प्राप्त हो जाते हैं। फिर स्वभावसे ही वही प्रकृति जब रजोगुणक्रमेण सत्त्वगुणकी ओर प्रवाहित होती है, तब स्वभावसे ही जडता मिटती जाती है, चेतनता विकसित होती जाती है। फिर मनुष्य होनेपर जीव स्वतन्त्र कर्म करके उन्नति या अवनतिकी ओर जा सकता है, अन्यथा प्रकृति-प्रवाहके अनुसार ही उसकी देवादिपर्यन्त उन्नति होती है, क्रिया- ज्ञानशक्तिका विकास चलता है, फिर स्वभावसे ही तमोगुणकी ओर प्रवाह बदलने- से स्थावरान्ता अधोगति होती है। जैसे असमर्थ शिशुका समस्त कार्य माता करती

२२८ मार्क्सवाद और रामराज्य है, वैसे ही जीवोंका समस्त कार्य माया ही करती है।” परंतु यह पक्ष भी संगत नहीं जँचता, क्योंकि एक तो विकासवादसे भिन्न यह कोई पक्ष ही नहीं है, दूसरे यदि हरएक कर्मोंका भी मूल कर्म ही है, तो प्रकृतिका परिणाम भी किंमूलक है ? प्रकृतिकी साम्यावस्था और वैषम्यावस्था क्यों होती है ? क्यों जडराज्यकी ओर उसका प्रवाह होता है ? क्यों चैतन्यराज्यकी ओर परिणाम होता है ? यदि इन सबका मूल कर्म माने, तो वह किसका ? चेतनोंका या अचेतनोंका ? यदि चेतन-सम्बन्ध-शून्य जड़ोंका ही कर्म कहा जाय, तो उसका फल भी उसीको होना चाहिये, चेतन उसका फलभागी क्यों होगा ? यदि इतना महत्त्वपूर्ण कर्म बिना कर्मसे ही हुआ, तो और भी अपेक्षित शय्या, प्रासादादि भी कर्मके बिना ही सम्पन्न हो सकेंगे। फिर उनमें कर्मकी क्या अपेक्षा और फिर ईश्वर कर्म-सापेक्ष ही प्राणियोंको भिन्न-भिन्न कर्मोंमें प्रवृत्त करता है, इसका क्या अर्थ है ? 'एष एव साधुकर्म कारयति यमेभ्योऽधो निनीषते', ( कौषी० उप० ) 'वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्।' ( ब्रह्मसूत्र २ । १ । ३४ ) इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका क्या अर्थ है ? फिर तो वह विकासवाद ही उचित प्रतीत होता है, जिसमें स्वतन्त्र प्रकृतिसे ही विलक्षण प्रकारके पदार्थोंका विकास होता है। प्रकृति या परमाणु आदिकोंसे निर्मित ही किसी विलक्षण प्रपञ्चका प्रादुर्भाव होना भी युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता। जब कोई भी लौकिक शय्या, प्रासाद, यन्त्र, यानादि बिना ज्ञानेच्छाप्रयत्नसम्पन्न चेतनके नहीं बन सकते, तब मन, बुद्धि, इन्द्रिय, मस्तिष्कादिसहित शरीर एव अनेक विचित्र सुख-दुःख सामग्रियाँ जीवको यो ही प्राप्त हो गयीं, यह कैसे कहा जा सकता है ? फिर यदि चेतन जीव देहादिसे भिन्न नित्य है, तो यह जिज्ञासा बनी ही रहेगी कि आखिर उसे शुभाशुभ शरीरोंकी प्राप्तिमें क्या निमित्त है ? अतः 'अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाशादि' अनेक दोषोंके वारणार्थ देहादिसे भिन्न, नित्य, चेतन जीव और उसके विचित्र सुख-दुःख, तत्सामग्री आदिकी प्राप्तिके अनुकूल शुभाशुभ कर्म मानना ही चाहिये। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिकी चेष्टाओंकी विचित्रतासे लोकमें भी फलकी विचित्रता दृष्ट है। आयुर्वेद, शिल्प, विज्ञान, संग्रामादि लौकिक स्थलोंमें कर्मकी विचित्रतासे फलकी विचित्रता सम्प्रतिपन्न है। अतः सम्पूर्ण विश्व-वैचित्र्यका मूल भी कर्मवैचित्र्य ही होगा, यह बात सरलतासे समझमें आ सकती है। जिन विचित्र कार्योंका हेतुभूत विचित्र कर्म दृष्ट नहीं है, वहाँ भी अनुमान करना चाहिये । तथा च समष्टि-व्यष्टि विश्वकी विचित्रताका मूल समष्टि-व्यष्टि प्राणियोंके विचित्र कर्म ही हैं। किस विचित्र कार्यका

हेतु कौन विचित्र कर्म है, यह जाननेके लिये जहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान प्रमाण मिलते हों, वहाँ प्रत्यक्षानुमानसे मानना चाहिये । जहाँ प्रत्यक्षादि प्रमाण न मिलते हों, वहाँ शास्त्रसे जानना चाहिये । देखते ही हैं कि जिन बहुतसे कार्यकारणभावका निर्णय प्राणियोंकी अल्पज्ञ बुद्धि नहीं निर्धारण कर सकती, उनका निर्णय योगियों, महर्षियोंकी बुद्धिसे होता है । कोई भी प्राणी आयुर्वेदोक्त ओषधियोंके गुण-दोषोंका अन्वय- व्यतिरेकादि युक्तियोंसे अनुभव करके सहस्रों जन्मोंमें निर्णय नहीं कर सकता, फिर उन अपरिगणित ओषधियों और उनके अपरिगणित सम्प्रयोग-विप्रयोगसे व्यक्त होने- वाले अपरिगणित गुण-दोषोंका निर्णय कौन कर सकता है ? फिर भी उनका प्रत्यक्ष फल देखकर उनके निर्धारयिताओंकी धर्मयोगादिजन्य विशेषता माननी पड़ती है । यही स्थिति मन्त्रोंकी भी है । विभिन्न वर्णोंकी पौर्वापर्यरूप विचित्र आनुपूर्वीका विचित्र सामर्थ्य प्रत्यक्ष दिखायी देता है । मन्त्र एवं आयुर्वेदादि शास्त्रोंकी सत्यता देखकर उनके निर्माताओंकी विशेषता विदित होती है । फिर आयुर्वेदादि निर्माताओं- द्वारा वेदादि धर्मशास्त्रोंकी महिमा सुनकर वेदोंकी ईश्वरीयता या अपौरुषेयता विदित होती है और उन्हींके द्वारा देहादिसे भिन्न आत्मा, जगदुत्पत्ति, जगत्का वैचित्र्य तथा उसके मूल धर्माधर्मका परिज्ञान होता है । किन कर्मोंसे क्या सुख दुःख एवं तत्सामग्री आदि फल प्राप्त होता है, कौन योनि किन भावना और कर्मोंसे प्राप्त होती है, यह सब शास्त्रोंसे ही मालूम पड़ता है । कुछ कर्म ऐसे हैं जिनकी समाप्ति फल प्राप्त कराकर ही होती है—जैसे गमन, भोजनादि । कुछ कर्म अपना फल कालान्तरमें देते हैं, जैसे क्षेत्रमें बीज बोना आदि । कुछ वस्तुओंका खाना, छूना आदि भी शनैः-शनैः कालान्तरमें ही फल देता है । इसी तरह किन्हीं कर्मोंका फल कर्मकी ही महिमासे दृष्टानुसार होता है । उदाहरणार्थ आयुर्वेदिक, होमियोपैथिक आदि औषधोंका । जैसे कुछ सेवादि कर्म स्वामी आदिकी प्रसन्नता सम्पादनादिद्वारा फलपर्यवसायी होते हैं, वैसे ही कुछ कर्म इसी देहमें फल देते हैं, कुछ परलोकमें दूसरे देहद्वारा फल देते हैं । समष्टि-व्यष्टि जगत्के धारण-पोषण एव लौकिक-पारलौकिक उत्थानके अनुकूल देहेन्द्रियमनोबुद्धि आदिकोकी ईश्वरीय शास्त्रादिष्ट हलचल ही धर्म है । विपरीत कर्म अधर्म है । उन सबको जानकर यथावत् फलप्रदान करनेके लिये ही सर्वत्र सर्वशक्तिमान् परमेश्वर भी मान्य होता है । फिर भी असमर्थके लिये विधि-निषेध नहीं हो सकता, अतएव अन्ध, वधिर, उन्मत्त मनुष्य या विवेकशून्य अन्य प्राणियोंके लिये विधि निषेध सम्भव नहीं है । केवल उनके स्वाभाविक कर्मोंके ही जो सुपरिणाम, दुष्परिणाम होते हैं, वही हो सकते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये शास्त्रोक्त कर्म हैं ही । विशेष सस्कारसे जिन सुग्रीव, वालि-जैसे वानरों और जटायु, सम्पाति जैसे गृध्रों या अन्यान्य खगों, मृगोंको, जिनको धर्माधर्म और अधिकारका ज्ञान है, उन्हें अधि- कारानुसार उन कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे पुण्य-पाप होता है । देवता, असुर, नाग,

२३० मार्क्सवाद और रामराज्य गन्धर्व आदिकोंको भी संस्कारवशात् शास्त्र का बोध है। अतः उन्हे भी यद्यपि वर्णाश्रमधर्मके अनुष्ठानका तो अधिकार नहीं है, तथापि उपासनाओं, विद्याओं तथा कुछ कर्मोंमें अधिकार है। दुहितृ-गमनादि निषिद्ध कर्मोंके अनुष्ठानसे पापादि भी होता है। इस तरह बहुत सी कर्मयोनियाँ हो जाती हैं। उनसे भिन्न कीट, पतंग, वृक्षादि भोग-योनियाँ हो जाती हैं। कर्मयोनि-भोगयोनिका अन्तर माननेसे जीवोके पुनरुत्थानका अवसर बना रहता है। उच्चकोटिकी योनिमें उत्पन्न प्राणियोंके किये हुए कर्मोंसे इतर योनियोंमें भोग भोगनेके लिये जाना पड़ता है। वैसे तो कर्मोंसे ही समस्त योनियोंकी प्राप्ति है, परंतु किसीमें नये कर्म भी बनते हैं, कोई केवल भोगके लिये होती हैं। अधिक पुण्य होनेपर स्वर्गीय देवादि योनियोंकी प्राप्ति होती है। किन्हींसे नरक और कीटादि योनियोंकी प्राप्ति होती है। उत्तम, मध्यम, अधमभेद से त्रिविध-तामस, त्रिविध-राजम, त्रिविध-सात्त्विक योनियाँ होती है। सामान्यरूपसे मनुष्यपर कर्तव्याकर्तव्यकी अधिक जिम्मेदारी रहती है। कानून समर्थ लोगोंसे आशा रखता है कि वे उसे जाने और माने, अतएव वह यह नहीं सुनता कि 'हम इस नियमको नहीं जानते थे।' किसी भी तरह प्रमादवश धर्म-कर्मका ज्ञान और अनुष्ठान मनुष्योसे मिट जाना उनका अक्षम्य अपराध है। धर्म ही एक उनकी विशेषता है। धर्मके बिना तो वे भी पशुओके ही समान होते हैं—'धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः' यद्य

किन्हीं मूषकोंकी शिवमन्दिरमें दीपककी बाती उमका देनेसे, किसी पक्षीकी बाजके भयसे अन्नपूर्णाकी परिक्रमा कर लेनेसे सद्गति हुई है ? इसी तरह बहुत-से ऐसे जीव हैं, जिनके शरीर सूक्ष्म तन्मात्राओके ही बने होते हैं । उनके द्वारा बहुत-से मानस कर्म होते हैं । उनकी संख्या भी अपार है । 'जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहू न समाय' । एक वटबीजके भीतर वटवृक्ष, उसमें अपरिगणित फल, उससे फिर अगणित बीज और उनमें वृक्ष, इस दृष्टिमे जैसे एक वटबीजमें अनन्तकोटि वटवृक्षों की सम्भावना हो सकती है, वैसे ही एक परमाणुके पाँचवें अंग स्पर्शतन्मात्रामें वायु, उसके एक देशमें प्राण और उसके एक देशमें मन और मनमें ब्रह्माण्ड होता है । फिर ब्रह्माण्डके अनन्त मनोंमें अनन्त ब्रह्माण्ड होते हैं। एक क्षणके स्वप्नमें अपरिगणित जीव दिखायी देने लगते हैं । फिर उनके कर्मों और भोगोंका सिवा ईश्वरके और किसको पता लग सकता है ? फिर विद्वान् तो फल बलसे कारण- की कल्पना करते हैं । कार्य देखकर कारणकी कल्पना करनी

  • ा + प + ् + र + क + ् + र + ि + य + ा + क + ो = क्रियाप्रक्रियाको. Wait, is it "क्रियाप्रक्रियाको" or "क्रियाप्रतिक्रियाको"? LOOK CLOSELY AT ! First word: क् + र + ि + य + ा = क्रिया Then: प + ् + र + क + ् + र + ि + य + ा = प्रक्रिया Wait, is there a 'ति' in it? Let's look: क ् र ि य ा प ् र [?] Wait! Between 'प्र' and 'क्रिया' is there a 'ति'? Look at the letter: It's 'प्र', then 'कि'? No, it's: क ् र ि य ा प ् र त ि ? No, look: It is: "क्रियाप्रक्रियाको" or "क्रियाप्रतिक्रियाको"? Wait! Look at the letters: 1: क्रि (kri) 2: या (ya) 3: प्र (pra) 4: क्रि (kri) 5: या (ya) 6: को (ko) Wait, is 4 'क्रि' or 'ति'? Look at letter 4: it has a loop on the left and a curve on the right, with a diagonal slash at the bottom left: that's 'क्र'! And an 'ि' matra on top: 'क्रि'!

ही रहती है । इसका मूल कारण यह है कि उनमें प्रमाणोंका स्पष्ट विश्लेषण नहीं होता । उदाहरण या दृष्टान्तको ही ये कभी-कभी प्रमाण मान बैठते हैं, जो कि पौरस्त्य- दर्शनमें परार्थानुमानके पञ्चावयवमें केवल एक अङ्ग है । चर्चा या विवाद स्वयं कोई प्रमाण नहीं, जिसके आधारपर स्वयं कोई प्रमेय सिद्ध हो सके— ‘लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः ।’ —लक्षण और प्रमाणसे वस्तुसिद्धि होती है, केवल चर्चासे नहीं । पौरस्त्यदर्शनोंमें चर्चा वाद, जल्प, वितण्डा-भेदसे तीन प्रकारकी होती है । तत्त्व-निर्णीषा, विजिगीषा, परपक्ष-निराचिकीर्षासे प्रेरित वादी-प्रतिवादियोंद्वारा परस्पर पक्ष-प्रतिपक्षोंका प्रमाणोंद्वारा साधन बाधन करनेको ‘चर्चा या विवाद’ कहा जा सकता है । प्रामाणिक असंगति और विरोधप्रदर्शन, परपक्षनिराकरण, स्वपक्ष- साधनका एक आंशिक साधनमात्र है । अनुमानके अङ्ग, व्याप्तिनिर्णयमें अनुकूल तर्क अपेक्षित होता है । व्याघात-प्रदर्शन करके संशय-निवृत्तिरूप अनुकूल तर्कसे व्याप्तिज्ञान दृढ़ हो जाता है । फलतः निर्दोष अनुमानसे अनुमेय पदार्थोंकी अनु- मिति होती है । उसीके एक अंशको ‘वाद’ मानकर उसे विचार-क्षेत्रके बाहर लागू करना असंगत ही है । हाँ, अनुमानोंके आधारपर प्राकृतिक पदार्थोंका गुण- स्वभावादि निर्णय करना गुण ही है, फिर इसे कोई खास व्यक्तिका वाद मानना व्यर्थ है । वेदान्ती अन्य मतोंमें असंगति दिखलाकर सर्वमतखण्डनावधि निराकर्ताके प्रत्यगात्माकी स्वतः सिद्धि मानते हैं। इसी पक्षको लेकर हेगेलने अखण्ड नित्यबोधकी सिद्धिमें उसे प्रयुक्त किया है— नेति नेतीति नेतीति शेषितं यत् परं पदम् । निराकर्तुमशक्यत्वात्तदस्मीति सुखी भव ॥ नेति नेति नेति—इन तीन निषेधोंसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण—इन त्रिविध दृश्योंका निषेध कर देनेपर सर्वनिषेधावधि, निषेधाधिष्ठान, निषेधसाक्षी निराकर्ताका प्रत्यगात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है । उसका निषेध अशक्य है, अतः वह स्वतः सिद्ध है । पर इस असंगति-प्रदर्शनमात्रसे किसी गुणधर्मकी सिद्धि शक्य नहीं । किसी भी साध्यकी सिद्धिके लिये प्रमाण अपेक्षित है । मार्क्सवादके अनुसार ‘द्वन्द्वमान’ ( Dieletics ) में एकके द्वारा तर्ककी उत्थापना होती है, फिर उसका खण्डन होता है, पुनः नये तर्ककी उत्थापना होती है । इस प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं। यह क्रमोन्नतिप्रक्रिया है। इसमें स्थिरता नहीं, वेग है । यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान है । मानव-समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये हैं । ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं। यहाँ भी वादी-प्रतिवादियो, तर्क प्रतितर्कोंद्वारा पक्ष-

२३४ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रतिपक्षका साधन-बाधन ही द्वन्द्वमान ठहरता है । 'वाद'मे भी भारतीय प्रणालीके अनुसार नियम होते हैं । मध्यस्थ और सदस्य उसके नियामक होते हैं । निर्दोष तर्कद्वारा सिद्ध पदार्थका तर्कान्तरसे खण्डन नहीं हो सकता । तर्कशतसे भी पदार्थ- स्वभाव नहीं बदलता । यथार्थ-ज्ञान वस्तुतन्त्र होता है, पुरुषतन्त्र नही । केवल तर्क अनवस्थित होता है । उसके आधारपर किसी भी वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती । कुशल तार्किक तर्कद्वारा जिस वस्तुको सिद्ध करता है, दूसरे तार्किक उसे अन्यथा ही उपपादित कर देते हैं— यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (वार्त्तिकसार) प्राग्लोप, अविनिगमकत्व, प्रमाणापगम—इन दोषोसे अनवस्था दोष दुष्ट होते है । मार्क्सीय द्वन्द्वात्मक प्रणालीके मुख्य लक्षण निम्नलिखित है— अतिभूतवादके प्रतिकूल द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति ऐसे पदार्थोंका आकस्मिक सघटन नही जो परस्पर स्वतन्त्र, विच्छिन्न और असम्बद्ध हैं । द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति सम्बद्ध और पूर्ण इकाई है । उसके पदार्थ और बाह्यरूप एक दूसरेपर निर्भर तथा एक दूसरेसे सजीवरूपमें सम्बद्ध हैं और परस्पर एक-दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं। कुछ पदार्थोंका कार्य-कारण- भाव अवश्य मान्य है । पर अनेक संनिहित पदार्थ ऐसे भी हैं, जिनका आपसमें कोई सम्बन्ध नहीं; जैसे पशुके दोनों श्रृङ्गोमें आपसमें कोई कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं, इसीलिये यह भी कहना ठीक नहीं कि 'द्वन्द्वात्मक-प्रणालीका यह सिद्धान्त है कि अपने चारों ओरके सघटनसे अलग करके कोई प्राकृतिक घटना अपने-आप- में समझी नहीं जा सकती । कारण यह है कि उसके चारों ओरकी परिस्थितियोंसे और उनके प्रसङ्गमें उनका विचार न करके वह घटना प्रकृतिके किसी भी प्रदेशकी घटना हमारे लिये निरर्थक सिद्ध होती है । फलतः हम प्रकृतिकी कोई भी घटना तभी समझ सकते तथा उसकी व्याख्या कर सकते हैं, जब हम उसके चारों ओरके संघटनके अविभाज्यरूपमें उसपर विचार करें और हम यह सोचकर उसकी व्याख्या करें कि उसकी रूपरेखा उसके चारों ओरके संघटनसे निश्चित हुई है ।' इससे भी सभी संनिहित पदार्थों या घटनाओंमें परस्पर कार्य-कारण भाव नहीं होता । कई घटनाएँ और पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं, फिर भी उनमें कोई सम्बन्ध नहीं होता । कार्य-कारण निर्णयके लिये अन्वय-व्यतिरेकादि युक्तियाँ अपेक्षित होती हैं । अन्वय-व्यतिरेक दृढ होनेपर अव्यवहित पौर्वापर्य होनेपर भी उसे काकतालीय-न्याय कहा जाता है । जैसे काकके बैठते ही ताल-फल गिरनेसे कई अविवेकी काक एव ताल पतनका कार्य-कारणभाव मान लेते हैं ।

मार्क्सवादी कहते हैं—'अतिभूतवादकी तरह द्वन्द्ववादका यह सिद्धान्त नहीं है कि विराम, गतिहीनता एवं अचल जडता और स्थिरताका माप प्रकृति है।' किंतु इस मतमें प्रकृतिका लक्षण है - 'अविराम गतिशीलता, परिवर्तन एवं नित्य नव- नवोन्मेष-विकास । इस परिवर्तनक्रममें कुछ तत्त्वोंका उन्मेष और विकास होता है, तो कुछका ह्रास और निर्माण होता जाता है। इसलिये द्वन्द्ववाद-प्रणालीके द्वारा प्राकृतिक घटनाओंकी परस्पर निर्भरता और सम्बद्धता ध्यानमें रखकर ही उनपर विचार करना यथेष्ट नहीं। हमें उनकी गति, परिवर्तन, विकास तथा उनके निर्माण और निर्वाण ध्यानमें रखकर उनपर विचार करना चाहिये । भारतीय दर्शनोंके अनुसार सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्था प्रकृति है। तीनों ही स्वप्रकाश चेतनसे भिन्न होनेसे जड अवश्य हैं, परंतु वृत्तिरूप ज्ञान सत्त्वसे होता है, हलचल या क्रिया रजसे होती है और अवष्टम्भ या रुकावट तमसे । अतः तीनों क्रमसे प्रकाश, हलचल एवं अवष्टम्भ स्वभावके माने गये हैं। तीनों गुणोंकी समता भंग होने और विषमता होनेसे सृष्टि होती है। प्रकृति परिणामशील एव गतिशील है, अतएव नियमित परिणाम एव विकास उसका होता है, पर उसका किसी द्वन्द्ववादी सिद्धान्तसे सम्बन्ध नहीं। द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार 'मूलतः वह वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं, जो किसी समय स्थायी मालूम पड़ती है, पर जिसका ह्रास तब भी आरम्भ हो चुका है। महत्त्वपूर्ण वस्तु वह है, जिसका अभ्युदय और विकास हो रहा है, चाहे उस समय वह स्थायी ही प्रतीत होती हो, क्योंकि द्वन्द्वात्मक प्रणाली उसीको अजेय मानती है, जिसका अभ्युदय और विकास हो रहा है। एजिल्सका कहना है कि 'छोटीसे बड़ी- तक वस्तु—बालूसे सूर्यतक, लघुतम जीवकोषसे मनुष्यतक सम्पूर्ण प्रकृति सतत गतिमय और परिवर्तनशील है। उसकी स्थिति-निर्माण और निर्वाणके अविराम प्रवाहमें है।' (एजिल्सका प्रकृति-सम्बन्धी द्वन्द्ववाद) उपर्युक्त बातें आंशिक सत्य हो सकती हैं, पर इनका द्वन्द्वमानसे क्या सम्बन्ध ? द्वन्द्वमान भी कोई प्रमाण नहीं, जिससे ये सब बातें सिद्ध हों। उपर्युक्त बातोंके सम्बन्धमें विचार करनेसे विदित होगा कि मार्क्सवादियोंका 'प्रकृति' शब्द भी भ्रामक है, क्योंकि वे पृथ्वी, तेज, जल, वायु, भूतसमुदायसे भिन्न किसी प्रकृतिका अस्तित्व नहीं मानते । ठीक इसके विपरीत सांख्यमतानुयायी सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं। सम्पूर्ण विभक्त कार्यवर्गका निर्माण करनेवाली अर्थात् महदादि कार्यवर्गके रूपमें परिणत होनेवाली वस्तु प्रकृति है। प्रकृति शब्द उपादानका वाचक है तथाच विश्वके उपादानको प्रकृति कहा जा सकता है। कहा जा चुका है कि किसी भी कार्यकी उत्पत्तिमें प्रकाश, हलचल और अवष्टम्भ (रुकावट) —ये तीन चीजें अपेक्षित होती हैं। प्रकाश,

क्रिया तथा उचित नियन्त्रण बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता । इन्हीं तीनोकी साम्यावस्था प्रकृति है । भूतोत्पत्ति, अहंतत्त्व या महत्तत्त्वकी उत्पत्ति भी इनपर निर्भर है । प्रकृति उपादान है, इसीलिये हर एक विकृतिमें इनका अनु- स्यूत होना उचित ही है । ये सब परस्पर सम्बद्ध होते हैं, यह सांख्यका सिद्धान्त ही है— 'गुणानां सम्भूयार्थक्रियाकारित्वम् ।' गुण मिलकर ही क्रिया कर सकते हैं । गुण चल अर्थात् गतिशील होते हैं । 'चलं च गुणवृत्तम्' यह भी सांख्य-सिद्धान्त है । सत्त्व, रज, तम— तीनों ही गुणोंमें अङ्गाङ्गिभावकी विचित्रतासे ही विचित्र संसार बनता है— 'गुणानां विमर्दवैचित्र्यात् सर्गवैचित्र्यम् ।' यह सभी पौरस्त्य दार्शनिकोंके निश्चित सिद्धान्त हैं । इनमें मार्क्स या एंजिल्सका कोई भी नया आविष्कार नहीं । उन्होंने जो भी नयी बात कही वही असंगत तथा अप्रामाणिक है । जैसे 'प्रकृतिके पदार्थ और बाह्यरूप एक-दूसरेपर निर्भर हैं; एक दूसरेसे सजीवरूपसे सम्बद्ध हैं,' इत्यादि अंश अतिशयोक्तिपूर्ण हैं । यदि सभी सम्बद्ध हों तो सम्बन्धके भावाभावका कोई मूल्य ही नहीं रह जाता । फिर किसका क्या सम्बन्ध है, इस गवेषणाका भी कोई अर्थ नहीं रह जाता । फिर तो खपुष्प, वन्ध्यापुत्र, शशशृङ्गको भी सम्बद्ध ही कहना पड़ेगा । इसी तरह 'एक दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं', यह भी असंगत है । जड़भूत घटादिके समान स्वयं अपनेको ही नहीं जानते, फिर वे दूसरेकी रूप-रेखा क्या निश्चित करेंगे ? निश्चय आदि चेतनके धर्म हैं—'ईक्षतेर्नाशब्दम् ।' ( १।१।५ ) इस ब्रह्मसूत्रमें, जड़ प्रकृतिमें ईक्षणधर्म अनुपपन्न होनेसे उससे ईक्षणपूर्वक सृष्टिका निषेध किया है । जल, वायु, तेजकी प्रवृत्ति विचारपूर्वक नहीं होती । जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथि-अश्वादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, उसी तरह अचेतन वायु आदि भी स्वाधिष्ठाता चेतन देवतासे अधिष्ठित होनेसे प्रवृत्त होते हैं । किसी कार्यमें अवश्य ही अनेकों पार्श्ववर्त्ती कारण हुआ करते हैं । परंतु सभी पार्श्ववर्त्ती कारण हों, तब तो कार्य-कारणभावकी विशेषता ही नष्ट हो जायगी । अणु-परिमाण, पारिमाण्डल्य आदि किसीके प्रति भी कारण नहीं होते । किसी चोरी या हिंसाके अनेक पार्श्ववर्ती कारण होते हैं, तब केवल हिंसक या चोरको ही क्यों दण्ड दिया जाता है ? यह भी विचारणीय है । वस्तुतः शब्दाडम्बरके अतिरिक्त उपर्युक्त मार्क्सीय वादोंमें कोई तत्त्व नहीं । नवनवोन्मेष और विकासपर भी विचार आवश्यक है । उन्मेष या विकास विद्यमान वस्तुका ही होता है । कारण-सामग्री, आवरण,

मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २३७ प्रतिबन्धक आदि हटाकर कार्यको व्यक्त कर देती है। जैसे तिलसे तैल, दुग्धसे नवनीत, तन्तुसे पट आदि। बालूमे तेल, आकाशसे तन्तु या पटका साक्षात् विकास कभी भी सम्भव नहीं। इसीलिये परावर द्रष्टाओके यहाँ केवल विकास ही नहीं। किसी भी कार्यमें 'जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति-अर्थात् उत्पत्ति, अस्तित्व, वर्द्धन, विक्रिया, अपक्षय तथा विनाश-ये छः विकार देखे जाते हैं। स्पष्ट ही है कि कोई मनुष्य, पशु या वनस्पति उत्पन्न होता है, अस्तित्वको प्राप्त होकर वृद्धि, अपक्षय तथा विनाशको प्राप्त होता है। वर्षामें उत्पन्न होनेवाले तृण ग्रीष्मतक विनष्ट हो जाते हैं। बहुत-से जीव प्रतिवर्ष तत्तदृतुओंमें व्यक्त होते हैं। वसन्तके पतझड़, आमोंके बौर, कोकिलाकूजन, ग्रीष्मकी उष्मा, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर- की अपनी-अपनी विशेषताएँ प्रतिवर्ष व्यक्त होती ही हैं। वेद और गीता इसी तरह सृष्टिका पुनः प्रादुर्भाव मानते हैं।—‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमक- ल्पयत्।' पूर्वसृष्टिके समान ही विधाता उत्तरोत्तर सृष्टिमें सूर्य-चन्द्र आदिका विधान करते हैं। 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते' (गीता ८ । १९) यह भूतग्राम पुनः-पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होता है। इसी तरह निर्माण और निर्वाणकी बात भी कोई नयी नहीं। एक ओर मनुष्य उत्पन्न और विकसित होता है, परंतु एक ओर यदि निर्माण निर्वाण-परम्परामें अनुस्यूत एक आत्मा मानकर जन्म, कर्मका सुसम्बद्ध कार्य-कारण भाव माना जाय, तो वह अनियन्त्रित, अप्रामाणिक, असम्बद्ध, निर्माण-निर्वाणकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है। जन्म- कर्मकी परम्परामें अनुस्यूत एक नित्य वस्तु बिना माने 'अकृताभ्यागमकृतविप्रणाश' दोष अनिवार्यरूपसे उपस्थित होता है। जब लोकमें कारण-वैलक्षण्य बिना कार्य- वैलक्षण्य नहीं हो सकता, तब हेतुकी विलक्षणता बिना जन्मों एव तत्सम्बन्धी सुख- दुःखकी विलक्षणता कैसे हो सकेगी ? इसी तरह जब लौकिक कर्मोंका कुछ परिमाण होता है, तब अदृष्टफलवाले कर्म बिना फल दिये कैसे नष्ट हो सकेंगे ? अतः कोई नित्य आत्मा है, जो कि पूर्व पूर्वके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उत्तरोत्तर जन्म ग्रहण करता है। 'अभ्युदयोन्मुख लघु वस्तु भी महत्त्वपूर्ण होती है, पतनोन्मुख महान् वस्तु भी नगण्य होती है', यह भी कोई नयी बात नहीं। प्रतिपदका चन्द्र और पूर्ण चन्द्र इसके उदाहरण हैं, पर इतनेमात्रसे किसी सिद्धान्तका पतन, किसी व्यक्ति या समूहका उत्थान या पतन ऐकान्तिकरूपमे नहीं कहा जा सकता । काल भेदसे एक ही वस्तुके उत्थान और पतनकी स्थिति आती है। सूर्यका ही उदय-अस्त तथा पुनः उदय होता है। चन्द्रमाका ह्रास होता है और पुनः उसीका विकास भी। किसी व्यक्तिका भी जीवनमें कई बार उत्थान और कई बार पतन होता है। जो घटनाएँ व्यष्टिमें होती हैं, वही समष्टिमें होती रहती हैं। काल-भेद हो सकता है। 'अतिभूतवादकी तरह द्वन्द्ववादका यह सिद्धान्त नहीं है कि विकसित होनेका

२३८ मार्क्सवाद और रामराज्य अर्थ सीधे-सीधे बढ़ना है। जब कि परिमाणमें परिवर्तन होनेसे गुणोंमें परिवर्तन नहीं होता, द्वन्द्ववादके अनुसार विकास-क्रममे हम अदृश्य और अकिंचन परिमाण- सम्बन्धी परिवर्तनोंसे स्पष्ट और मौलिक गुणसम्बन्धी परिवर्तनोंतक पहुँच जाते हैं। इस परिवर्तनक्रममे गुणसम्बन्धी परिवर्तन धीरे-धीरे न होकर हठात् एक मजिलसे दूसरे मजिलतक छलाँग मारकर शीघ्रतासे होते हैं । ये परिवर्तन आकस्मिक नहीं होते। वे धीरे-धीरे होनेवाले प्रायः अदृश्य परिमाणसम्बन्धी संघटनके स्वाभाविक परिणाम हैं। इसीलिये द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार विकास-क्रमका यह अर्थ नहीं कि पहले जो हो चुका, अब वही सीधे-सीधे दुहराया जा रहा है और न कोल्हूके बैलकी तरह एक ही जगह चक्कर खानेका नाम ही विकास है। विकासकी गति ऊर्ध्वोन्मुख होती है। पहलेकी गुणात्मक स्थितिसे दूसरी गुणात्मक परिस्थिति- तक संक्रमणका नाम विकास है। विकास साधारणसे संश्लिष्ट और निम्नसे ऊर्ध्वकी ओर होता है।' एजिल्सका कहना है कि 'द्वन्द्ववादकी कसौटी है प्रकृति और आधुनिक विज्ञान । प्रकृतिविज्ञानके विषयमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि उसने इस कसौटीके लिये अत्यन्त मूल्यवान् सामग्री दी है, जो प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इस प्रकार अन्ततोगत्वा प्राकृतिक क्रम द्वन्द्वात्मक ही सिद्ध होता है न कि अतिभूतवादी। यह क्रम किसी चिर अपरिवर्तनशील वृत्तमें चक्कर काटनेकी गति नहीं, बल्कि वास्त- विक इतिहासके निर्माणकी गति है। यहाँपर सबसे पहले डार्विनका उल्लेख करना चाहिये, जिसने प्रकृतिकी अतिभौतिक कल्पनापर दुःसह प्रहार किया था और सिद्ध किया था कि आजका चराचर वनस्पति जीव और मनुष्य भी उस विकास क्रमका परिणाम है, जो करोड़ों वर्षसे लगातार होता चला आ रहा है।' उपर्युक्त बातोंमें भी निर्माण-निर्वाण, उत्पत्ति-विनाशसे भिन्न पदार्थ नहीं। कार्य-मात्रका उत्पत्ति-विनाश अनिवार्य होता है। पर इस भूत-प्रकृतिसे अतीत, नित्य कूटस्थ वस्तु नहीं है, यह सिद्ध नहीं होता। बहुत-सी बाते अतिभूतवादियोके नामसे बेतुकी लिखी गयी हैं। कम-से-कम भारतीय अध्यात्मवादकी दृष्टिमे मार्क्स, एजिल्सकी दुष्कल्पनाएँ सर्वथा उपहासास्पद हैं। भारतीय अध्यात्मवादी हर एक विकासमें क्रमिक एव धीरे-धीरे विकसित होनेका सिद्धान्त नहीं मानते। मेघमण्डलसे महाविद्युत्-प्रकाशका विकास अतिशीघ्रतासे मान्य ही है। इसीको एक मजिलसे दूसरे मजिलपर छलाँग मारनेकी बात कही जा सकती है। उस विकासमें भी क्रम रहता ही है। तापमानके बढ़ जानेसे जलका भाप बन जाना, ताप-मान घट जानेसे बर्फ बन जाना भी इसी कोटिका विकास है। मार्क्सवादियोके शब्दोंमें 'यही प्रकृतिका एक मजिलसे दूसरी मंजिलपर छलाँग मारना है।' अध्यात्मवादी आत्म-परमात्म- सम्बन्धमें ही ऐसी बात करते हैं। ये भौतिकवादियोंको सम्मत न हों, पर भौतिक वस्तुओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षानुमानादिसिद्ध जो भी बाते हैं, उन्हे माननी ही हैं।

दुग्धका दधि परिणाम है, जलका बर्फ परिणाम है। इसी प्रकार विरोधी-कारणोंके कारणमें जलका विलय या शोषण होता है। इसी तरह 'कोल्हूके बैलके समान चक्कर खानेका नाम विकास नहीं', यह भी असंगत है। कौन नहीं जानता कि पुनः-पुनः दिन-रात, सूर्योदयास्त, चन्द्रमाका ह्रास-विकास तथा ग्रीष्म-वसन्तके आगमनमें पुरानी बातें ही दुहरायी जाती हैं। सदासे ही वैचित्र्य-माहात्म्यका ही लक्षण है। जो समझते हैं कि विकासकी गति सदा ऊर्ध्वोन्मुख ही होती है, उनकी दृष्टिमें ऊर्ध्वकी सीमा कोई है या निःसीम ? यदि निःसीम तो इसमें प्रमाण क्या ? पुनश्च जब विकसित वस्तुका भी निर्वाण या विनाश भी मानते ही हैं, तो इस तरह ह्रास-विकासका चक्कर ही परिलक्षित होता है । उदयनाचार्यने 'न्यायकुसुमाञ्जलि' की— 'जन्मसंस्कारविद्यादेः शक्तेः स्वाध्यायकर्मणोः । ह्रासदर्शनातो ह्रासः सम्प्रदायस्य मीयताम्' (२।३) कारिकामें दिखलाया है कि स्वाभाविक रूपसे ह्रास हो रहा है। पूर्वजोंकी बुद्धिशक्तिकी तुलनामें आजकी बुद्धिशक्तिका अत्यन्त ह्रास हो गया है। पहलेके मनुष्य-शरीर तथा आजके मनुष्य-शरीरमें पर्याप्त अन्तर हो गया है। अभी अनेक स्थलोंमें ऐसे भाले और तलवारें मिली हैं, जिन्हें आजके लोग उठा भी नहीं सकते। चारित्रिक स्तर तो इतने नीचे गिर गये हैं कि उनकी पूर्वजोंके सामने कोई तुलना ही नहीं। सृष्टिक्रममें देखते हैं कि कारण कार्यकी अपेक्षा व्यापक, स्वच्छ तथा उच्च कोटिका होता है। कार्य व्याप्य, अस्वच्छ तथा निम्न कोटिका होता है। हाँ, कार्यमें गुण एवं विशेषण आदि बढ़ जाते हैं। घट-पट आदिसे जलानयन, अङ्गप्रावरणादि कार्य सधते हैं, परंतु मृत्तिका, तन्तु आदिसे उक्त कार्य नहीं सधते । फिर भी घटादिकी अपेक्षा मृत्तिका, तेज, जल, वायु आदि कारणोंमें व्यापकता आदि अधिक स्पष्ट हैं । मृत्तिकामें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—ये पाँच गुण हैं । जलमें गन्धको छोड़ चार, तेजमें गन्धादि तीन, वायुमें दो और आकाशमें केवल एक शब्द ही गुण होता है । व्यापकता, स्वच्छता आकाशमें सर्वाधिक है । इसीलिये परम कारण सर्वापेक्षया स्वच्छ, व्यापक तथा उच्चकोटिका मान्य है। विकासवादियोंका यह कथन कि 'पूर्वजोंमें क्रिया, ज्ञानशक्तियाँ पूरी विकसित न हुई', सर्वथा भ्रममात्र हैं। तथ्य तो यह है कि पूर्वजोंमे ही अधिक ज्ञान क्रियाशक्ति उत्तरोत्तरके लोगोंको प्राप्त होती है, पुस्तकोल्लेखन, शिक्षालय- स्थापन तभी सार्थक होंगे। यदि उत्तरोत्तर लोगोंमें ज्ञान-क्रियाशक्तिका विकास अधिक मानते हैं तो वे किनके लिये पुस्तकोल्लेखादि करते हैं ? अल्पज्ञ पूर्वज अतीत हो चुके। उत्तरोत्तर आनेवाली सन्तान पूर्वजोंकी अपेक्षा बुद्धिमान् होगी ही । उनके लिये ज्ञानोपदेश व्यर्थ ही है। खूब ही हो तो भी पिता, पितामहादिको पुत्रादिकोंके ही छात्र होना चाहिये। पुत्रादिकोंको अध्यापक बनना चाहिये। पर नहीं, अध्यात्मवादकी दृष्टिसे ईश्वर पूर्ण सर्वज्ञ है। उसकी सन्तानें ब्रह्मा, वसिष्ठादि तदपेक्षया अल्पज्ञ हैं । जिन लोगोंमें कुछ विशेषता व्यक्त हुई, उनमें ईश्वरके अनुग्रहसे ही। आध्यात्मिकोंकी

२४० मार्क्सवाद और रामराज्य अनभिज्ञता केवल विकासवादियोंको ही सम्मत है, पर विकासवादियोंकी अनभिज्ञता उभयसम्मत है; क्योंकि वे स्वयं ही अपने पुत्रादिकोंकी अपेक्षा अपनेको उसी न्यायसे अनभिज्ञ मानते हैं। 'परिमाणसम्बन्धी विकाससे गुणसम्बन्धी विकासतकका नाम द्वन्द्वात्मक विकास है।' इसकी व्याख्या करते हुए एंजिल्सने लिखा है कि 'भौतिक विज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तनका अर्थ है—परिमाणका गुणमें संक्रमण । जो किसी भी वस्तुमें निहित अथवा प्रविष्ट गतिके परिमाणमें परिवर्तन होता है, वह भी क्रमसे ही होता है। उदाहरणके लिये पानीके ताप-मानका प्रभाव पहले उसके द्रवगुणपर नहीं पड़ता। परंतु उस द्रवगुणका परिमाण ज्यो-ज्यो चढता या गिरता है, त्यों त्यो वह क्षण निकट आता-जाता है, जब पानी या तो बर्फ होगा या भाप बनेगा। जलकी द्रवस्थिति ज्यों-की-त्यों नहीं बनी रहती। प्लेटिनमके तारको भी दहकानेके लिये एक अल्पतम विद्युत्प्रवाह आवश्यक होता है। प्रत्येक धातुका एक निश्चित तापमान होता है, जब वह पिघलने लगती है। आवश्यक तापमान पानेके हमारे पास जो साधन हैं, उनका प्रयोग करके द्रवपदार्थके शीतोष्ण दिन निश्चित कर दिये गये हैं, जब कि यथेष्ट शीतोष्ण प्रभावसे वह पदार्थ जमने या खौलने लगता है। अन्तमें प्रत्येक गैसके लिये वह चरम विन्दु निश्चित है, जब यथावश्यक दबाव और शीतसे वह द्रव पदार्थके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है, भौतिक विज्ञानमें जिन्हें हम स्थिर विन्दु कहते हैं, जहाँसे पदार्थकी स्थिति बदलकर दूसरी हो जाती है; वे अधिकतर और कुछ नहीं, क्रान्ति विन्दुओंके ही नाम हैं, जहाँ गतिके परिमाण-सम्बन्धी ह्रास किंवा वृद्धिसे उस पदार्थकी स्थितिमें एक गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है। फलतः इन क्रान्ति-विन्दुओंपर परिमाणमें गुणका रूपान्तर हो जाता है। एंजिल्सका प्रकृतिसम्बन्धी द्वन्द्ववाद इसी प्रकार एंजिल्सने रसायनशास्त्रके विषयमें लिखा है कि 'पदार्थोंकी अणु- बद्ध रचनामें परिवर्तन होनेसे गुणात्मक परिवर्तन सम्भव होते हैं। इन गुणात्मक परिवर्तनोंके विज्ञानको हम 'रसायनशास्त्र' कह सकते हैं। हेगलको यह मालूम हो चुका था। उदाहरणके लिये आक्सिजनके अणुमे दो परमाणु होते हैं। इन दोके बदले यदि तीन परमाणु कर दिये जायें, तो ओजोन बन जाता है, जो गन्ध और प्रतिक्रियामें साधारण आक्सिजनसे नितान्त भिन्न होता है। जब आक्सिजन विभिन्न अनुपातोंमे नाइट्रोजन या गन्धकसे मिलाया जाता है, तब तो उसका कहना ही क्या ? हर अनुपातसे ऐसा पदार्थ बनता है, जो गुणात्मक दृष्टिसे दूसरे पदार्थोंसे भिन्न होता है।' उपर्युक्त दोनो ही प्रघट्टकोंसे यह सिद्ध होता है कि निर्दिष्ट कारणोंसे वस्तुओंकी अवस्थाओंमें परिवर्तन ही सिद्ध होता है। वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तेजसे ही जल उत्पन्न होता है, शीतके योगसे वह बर्फ बन जाता है। तेजसे जलका शुष्क हो जाना लोकसिद्ध है, परतु फिर भी इन परिणामोंकी निश्चित