मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १५३ * | ५९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| क्षणाल्लब्धचित्ताः स्वयं विष्णुशक्रा-<br>नलाद्याः सुसंहत्य तीक्ष्णैः पृषत्कैः।<br>प्रचक्रुः प्रचण्डेन दैत्येन सार्धं<br>महासङ्गरं सङ्गरग्रासकल्पम्॥ १८९<br>अथानम्य चापं हरीस्तीक्ष्णबाणै-<br>र्हनत्सारथिं दैत्यराजस्य हृद्यम्।<br>ध्वजं धूमकेतुः किरीटं महेन्द्रो<br>धनेशो धनुः काञ्चनानद्धपृष्ठम्।<br>यमो बाहुदण्डं रथाङ्गानि वायु-<br>र्निशाचारिणामीश्वरस्यापि वर्म॥ १९० | थोड़ी देर बाद चेतना प्राप्त होनेपर स्वयं भगवान् विष्णु, इन्द्र, अग्नि आदि देवगण सुसंगठित होकर तीखे बाणोंद्वारा उस प्रचण्ड दैत्यके साथ विषके ग्रासके समान भीषण संग्राम करने लगे। उस समय श्रीहरिने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर तीखे बाणोंद्वारा दैत्यराजके प्रिय सारथिको यमलोकका पथिक बना दिया। पुनः अग्निने उसके ध्वजको, महेन्द्रने किरीटको, कुबेरने पृष्ठभागपर स्वर्णजटित धनुषको, यमने भुजाओंको और वायुने रथाङ्गों तथा उस असुरराजके कवचको भी काट गिराया॥ १८४-१९०॥ |
| दृष्ट्वा तद् युद्धममरैरकृत्रिमपराक्रमम्।<br>दैत्यनाथः कृतं संख्ये स्वबाहुयुगबान्धवः॥ १९१<br>मुमोच मुद्गरं भीमं सहस्राक्षाय सङ्गरे।<br>दृष्ट्वा मुद्गरमायान्तमनिवार्यमथाम्बरे॥ १९२<br>रथादाप्लुत्य धरणीमगमत् पाकशासनः।<br>मुद्गरोऽपि रथोपस्थे पपात परुषस्वनः॥ १९३<br>स रथं चूर्णयामास न ममार च मातलिः।<br>गृहीत्वा पट्टिशं दैत्यो जघानोरसि केशवम्॥ १९४<br>स्कन्धे गरुत्मतः सोऽपि निषसाद विचेतनः।<br>खड्गेन राक्षसेन्द्रस्य निचकर्त च वाहनम्॥ १९५<br>यमं च पातयामास भूमौ दैत्यो भुशुण्डिना।<br>वह्निं च भिन्दिपालेन ताडयामास मूर्धनि॥ १९६<br>वायुं च दोर्भ्यामुत्क्षिप्य पातयामास भूतले।<br>धनेशं च धनुष्कोट्या कुट्टयामास कोपनः॥ १९७<br>ततो देवनिकायानामेकैकं समरे ततः।<br>जघानास्त्रैरसंख्येयैर्दैत्येन्द्रोऽमितविक्रमः ॥ १९८ | तदनन्तर अपनी दोनों भुजाएँ ही जिसकी सहायक थीं, उस दैत्यराज तारकने युद्धस्थलमें देवताओंद्वारा किये गये उस युद्ध और उनके सत्य पराक्रमको देखकर रणभूमिमें इन्द्रके ऊपर अपना भयंकर मुद्गर चला दिया। उस अनिवार्य मुद्गरको आकाशमार्गसे आते हुए देखकर इन्द्र रथसे कूदकर पृथ्वीपर खड़े हो गये और वह मुद्गर कठोर शब्द करता हुआ रथके पिछले भागपर जा गिरा। उसने रथको तो चूर्ण कर दिया, पर मातलिके प्राण बच गये। फिर उस दैत्यने पट्टिश लेकर केशवकी छातीपर आघात किया, जिससे वे भी चेतनारहित होकर गरुड़के कंधेपर लुढ़क गये। पुनः उस दैत्यने तलवारसे राक्षसराज निर्ऋतिके वाहनको काट डाला, भुशुण्डिके प्रहारसे यमराजको धराशायी कर दिया, भिन्दिपालसे अग्निके मस्तकपर चोट की, वायुको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक दिया और कुपित होकर कुबेरको धनुषके सिरेसे कूट डाला। तदुपरान्त उस अनुपम पराक्रमी दैत्यराजने समर भूमिमें देवसमूहोंमेंसे प्रत्येकपर असंख्य अस्त्रोंसे प्रहार किया॥ १९१-१९८॥ |
| लब्धसंज्ञः क्षणाद् विष्णुश्चक्रं जग्राह दुर्धरम्।<br>दानवेन्द्रवसासिक्तं पिशिताशनकोन्मुखम्॥ १९९<br>मुमोच दानवेन्द्रस्य दृढं वक्षसि केशवः।<br>पपात चक्रं दैत्यस्य हृदये भास्करद्युति॥ २००<br>व्यशीर्यत ततः काये नीलोत्पलमिवाश्मनि।<br>ततो वज्रं महेन्द्रस्तु प्रमुमोचार्चितं चिरम्॥ २०१ | तत्पश्चात् क्षणभर बाद चेतना प्राप्त होनेपर भगवान् विष्णुने अपने दुर्धर्ष चक्रको, जो दानवेन्द्रोंकी मज्जासे अभिषिक्त तथा मांसभोजी असुरोंका संहार करनेके लिये उन्मुख था, हाथमें लिया। फिर केशवने उसे सुदृढ़रूपसे दानवराजके वक्षःस्थलपर छोड़ दिया। वह सूर्यके समान तेजस्वी चक्र दैत्यके हृदयपर जा गिरा, किंतु उसके शरीरपर गिरते ही वह इस प्रकार टूट-फूट गया, जैसे पत्थरपर गिरा हुआ नीला कमल छिन्न-भिन्न हो जाता है। |
| ६०० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्मिञ्जयाशा शक्रस्य दानवेन्द्ररणे त्वभूत्।<br>तारकस्य सुसम्प्राप्य शरीरं शौर्यशालिनः॥ २०२<br><br>व्यशीर्यत विकीर्णार्चिः शतधा खण्डतां गतम्।<br>विनाशमगमन्मुक्तं वायुनासुरवक्षसि॥ २०३<br><br>ज्वलितं ज्वलनाभासमङ्कुशं कुलिशं यथा।<br>विनाशमागतं दृष्ट्वा वायुश्चाङ्कुशमाहवे॥ २०४<br><br>रुष्टः शैलेन्द्रमुत्पाट्य पुष्पितद्रुमकन्दरम्।<br>चिक्षेप दानवेन्द्राय पञ्चयोजनविस्तृतम्॥ २०५<br><br>महीधरं तमायान्तं दैत्यः स्मितमुखस्तदा।<br>जग्राह वामहस्तेन बालकन्दुकलीलया॥ २०६<br><br>ततो दण्डं समुद्यम्य कृतान्तः क्रोधमूर्च्छितः।<br>दैत्येन्द्रं मूर्ध्नि चिक्षेप भ्राम्य वेगेन दुर्जयः॥ २०७<br><br>सोऽसुरस्यापतन्मूर्ध्नि दैत्यस्तं च न बुद्धवान्।<br>कल्पान्तदहनालोकामजय्यां ज्वलनस्ततः॥ २०८ | तदुपरान्त महेन्द्रने अपने चिरकालसे अर्चित वज्रको छोड़ा, जिसपर उन्हें इस दानवराजके साथ युद्धमें विजयकी पूरी आशा थी, परंतु वह पराक्रमशाली तारकके शरीरसे टकराकर चिनगारियाँ बिखेरता हुआ सैकड़ों टुकड़ोंमें तितर-बितर हो गया। फिर वायुने उस असुरके वक्षःस्थलपर अग्निके समान तेजस्वी प्रज्वलित अंकुश फेंका, किंतु वह भी वज्रकी ही भाँति विनष्ट हो गया। इस प्रकार युद्धभूमिमें अपने अंकुशको विनष्ट हुआ देखकर वायुने क्रुद्ध हो खिले हुए वृक्षों एवं कन्दराओंसे युक्त एक विशाल पर्वतको उखाड़ लिया, जो पाँच योजनमें विस्तृत था। फिर उसे दानवराजपर फेंक दिया। उस समय उस पर्वतको आते हुए देखकर दैत्यने मुसकराते हुए बालकोंकी गेंदक्रीडाके समान उसे बायें हाथसे पकड़ लिया। तदनन्तर अत्यन्त कुपित हुए दुर्जय यमराजने अपना दण्ड उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर दैत्येन्द्रके मस्तकपर फेंक दिया। वह दण्ड असुरके मस्तकपर गिरा तो अवश्य, परंतु दैत्यको उसका कुछ भी ज्ञान न हुआ॥ १९९-२०७ ½॥ |
| शक्तिं चिक्षेप दुर्धर्षां दानवेन्द्राय संयुगे।<br>नवा शिरीषमालेव सास्य वक्ष्यस्यराजत॥ २०९<br><br>ततः खड्गं समाकृष्य कोपादाकाशनिर्मलम्।<br>भासितासितदिग्भागं लोकपालोऽपि निर्ऋतिः॥ २१०<br><br>चिक्षेप दानवेन्द्राय तस्य मूर्ध्नि पपात च।<br>पतितश्चागमत् खड्गः स शीघ्रं शतखण्डताम्॥ २११<br><br>जलेशस्तूग्रदुर्धर्षं विषपावकभैरवम्।<br>मुमोच पाशं दैत्यस्य भुजबन्धाभिलाषकः॥ २१२<br><br>स दैत्यभुजमासाद्य सर्पः सद्यो व्यपद्यत।<br>स्फुटितक्रकचक्रूरदशनालिर्महानुः॥ २१३<br><br>ततोऽश्विनौ समरुतः ससाध्याः समहोरगाः।<br>यक्षराक्षसगन्धर्वा दिव्यनानाश्रपाणयः॥ २१४<br><br>जघ्नुर्दैत्येश्वरं सर्वे सम्भूय सुमहाबलाः।<br>न चास्त्राण्यस्य सज्जन्त गात्रे वज्राचलोपमे॥ २१५ | तदुपरान्त अग्निने युद्धभूमिमें दानवेन्द्रपर अपनी शक्ति छोड़ी, जो प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्विनी, अजेय और दुर्धर्ष थी, किंतु वह उसके वक्षःस्थलपर नवीन शिरीष-पुष्पोंकी मालाकी तरह सुशोभित हुई। तत्पश्चात् लोकपाल निर्ऋतिने भी अपने आकाशके समान निर्मल एवं समस्त दिशाओंको उद्भासित करनेवाले खड्गको म्यानसे खींचकर उस दानवेन्द्रपर चला दिया और वह उसके मस्तकपर जा गिरा, परंतु गिरते ही वह खड्ग शीघ्र ही सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर हो गया। इसके बाद वरुणने उस दैत्यकी भुजाओंको बाँध देनेकी अभिलाषासे अपना दुर्धर्ष तथा विष एवं अग्निके समान भयंकर पाश फेंका, किंतु वह सर्प-पाश दैत्यकी भुजापर पहुँचकर तुरंत ही नष्ट हो गया, उसकी आरेके समान क्रूर दन्तपङ्क्ति तथा विशाल ठोड़ी टूट-फूटकर नष्ट हो गयी। तदनन्तर अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, बड़े-बड़े नाग, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व—ये सभी महाबली देवगण हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र धारण कर एक साथ उस दैत्यराजपर प्रहार करने लगे, परंतु वज्र एवं पर्वत-सरीखे उसके शरीरपर उन अस्त्रोंका कोई प्रभाव न पड़ा॥ २०८-२१५॥ |
| ततो रथादवप्लुत्य तारको दानवाधिपः।<br>जघान कोटिशो देवान् करपार्ष्णिभिरेव च॥ २१६ | तत्पश्चात् दानवराज तारकने रथसे कूदकर घूँसों एवं पैरोंकी ठोकरोंसे करोड़ों देवताओंका कचूमर निकाल |
| * अध्याय १५४ * | ६०१ |
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| हतशेषाणि सैन्यानि देवानां विप्रदुद्रुवुः।<br>दिशो भीतानि संत्यज्य रणोपकरणानि तु॥ २१७<br>लोकपालांस्ततो दैत्यो बबन्धेन्द्रमुखान् रणे।<br>सकेशवान् दृढैः पाशैः पशुमारः पशूनिव॥ २१८<br>स भूयो रथमास्थाय जगाम स्वकमालयम्।<br>सिद्धगन्धर्वसंघृष्टविपुलाचलमस्तकम् ॥ २१९<br>स्तूयमानो दितिसुतैरप्सरोभिर्विनोदितः।<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीस्तद्देशे प्राविशत् स्वपुरं यथा॥ २२०<br>निषसादासने पद्मरागरत्नविनिर्मिते।<br>ततः किन्नरगन्धर्वनागनारीविनोदितैः।<br>क्षणं विनोद्यमानस्तु प्रचलन्मणिकुण्डलः॥ २२१ | दिया। मरनेसे बचे हुए देवताओंके सैनिकसमूह भयभीत हो युद्ध-सामग्रियोंका त्याग कर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए। तब उस दैत्यने रणभूमिमें केशवसहित इन्द्र आदि सभी लोकपालोंको सुदृढ़ पाशसे उसी प्रकार बाँध लिया, जैसे कसाई पशुओंको बाँध लेता है। फिर वह रथपर बैठकर अपने उस निवासस्थानकी ओर चल पड़ा, जो सिद्धों एवं गन्धर्वोंसे सेवित एक विशाल पर्वतके शिखरपर अवस्थित था। उस समय उसके मनोरञ्जनके लिये दैत्यगण एवं अप्सराएँ उसकी स्तुति कर रही थीं। उस देशमें त्रिलोकीकी लक्ष्मी इस प्रकार प्रविष्ट हो रही थी मानो अपने नगरमें जा रही हो। वहाँ पहुँचकर वह पद्मराग मणि एवं रत्नोंसे बने हुए सिंहासनपर विराजमान हुआ। तब किंनर, गन्धर्व और नागोंकी स्त्रियाँ उसका मनोविनोद करने लगीं। मन बहलाते समय उसके मणिनिर्मित कुण्डल झलमला रहे थे॥ २१६—२२१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे तारकजयलाभो नाम त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें तारक-जयलाभ नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५३॥
एक सौ चौवनवाँ अध्याय
तारकके आदेशसे देवताओंकी बन्धन-मुक्ति, देवताओंका ब्रह्माके पास जाना और अपनी विपत्तिगाथा सुनाना, ब्रह्माद्वारा तारक-वधके उपायका वर्णन, रात्रिदेवीका प्रसङ्ग, उनका पार्वतीरूपमें जन्म, काम-दहन और रतिकी प्रार्थना, पार्वतीकी तपस्या, शिवपार्वती-विवाह तथा पार्वतीका वीरकको पुत्ररूपमें स्वीकार करना*
| सूत उवाच<br>प्रादुरासीत् प्रतीहारः शुभ्रनीलाम्बुजाम्बरः।<br>स जानुभ्यां महीं गत्वा पिहितास्यः स्वपाणिना॥ १<br>उवाचानाविलं वाक्यमल्पाक्षरपरिस्फुटम्।<br>दैत्येन्द्रमर्कवृन्दानां विभ्रतं भास्वरं वपुः॥ २<br>कालनेमिः सुरान् बद्धांश्चादाय द्वारि तिष्ठति।<br>स विज्ञापयति स्थेयं क्व बन्दिभिरिति प्रभो॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! तदनन्तर स्वच्छ नीले कमल-सा वस्त्र धारण किये द्वारपाल तारकके सम्मुख उपस्थित हुआ। वह अपने हाथसे मुखको ढके हुए था। उसने घुटनोंके बल पृथ्वीपर माथा टेककर सूर्यसमूहोंके-से उद्दीप्त शरीर धारण करनेवाले दैत्येश्वर तारकसे स्वल्प किंतु स्पष्ट शब्दोंमें निवेदन किया—'प्रभो ! कालनेमि देवताओंको बंदी बनाकर साथ लिये हुए द्वारपर खड़ा है। वह पूछ रहा है कि इन बंदियोंको कहाँ रखा जाय।' |
* मत्स्यपुराणका यह अध्याय पुराण-साहित्यमें सबसे बड़ा दीखता है। पर ये सभी श्लोक ठीक इसी प्रकार शिवपुराण पार्वतीखण्ड १—१०, स्कन्दपुराण महेश्वरखण्ड, केदारखण्ड २५—३५, कौमारिकाखण्ड २१—३१, कालिकापुराण ४४—५०, पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ३१—३२ आदिमें भी प्राप्त होते हैं।
६०२ * मत्स्यपुराण *
| तन्निशाम्याब्रवीद् दैत्यः प्रतीहारस्य भाषितम्।<br>यथेष्टं स्थीयतामेभिर्गृहं मे भुवनत्रयम्॥ ४<br>केवलं पाशबन्धेन विमुक्तैरविलम्बितम्।<br>एवं कृते ततो देवा दूयमानेन चेतसा॥ ५<br>जग्मुर्जगद्गुरुं द्रष्टुं शरणं कमलोद्भवम्।<br>निवेदितास्ते शक्राद्याः शिरोभिर्धरणिं गताः।<br>तुष्टुवुः स्पष्टवर्णार्थैर्वचोभिः कमलासनम्॥ ६ | द्वारपालके उस कथनको सुनकर दैत्यराजने कहा—'अरे! ये स्वेच्छानुसार कहीं भी स्थित रहें, इन्हें शीघ्र ही केवल बन्धन-मुक्त कर दिया जाय; क्योंकि अब तो तीनों भुवन मेरा गृह है अर्थात् पूरे विश्वपर मेरा ही अधिकार है।' इस प्रकार बन्धन-मुक्त होनेके पश्चात् देवगण दुःखी चित्तसे जगद्गुरु कमलजन्मा ब्रह्माका दर्शन करनेके लिये उनकी शरणमें गये। वहाँ पहुँचकर उन इन्द्र आदि देवताओंने पृथ्वीपर सिर टेककर ब्रह्माको प्रणाम किया और उनसे अपनी करुण-कहानी कह सुनायी। तत्पश्चात् वे स्पष्ट अक्षरों एवं अर्थोंसे युक्त वचनोंद्वारा ब्रह्माकी स्तुति करने लगे॥ १—६॥ | | देवा ऊचुः<br>त्वमोंकारोऽस्यङ्कुराय प्रसूतो<br>विश्वस्यात्मानन्तभेदस्य पूर्वम्।<br>सम्भूतस्यानन्तरं सत्त्वमूर्ते<br>संहारेच्छोस्ते नमो रुद्रमूर्ते॥ ७<br>व्यक्तिं नीत्वा त्वं वपुः स्वं महिम्ना<br>तस्मादण्डात् स्वाभिधानादचिन्त्यः।<br>द्यावापृथ्व्योरूर्ध्वखण्डावराभ्यां<br>ह्याण्डादस्मात् त्वं विभागं करोषि॥ ८<br>व्यक्तं मेरौ यजनायुस्तवैभू-<br>र्देवं विद्मस्त्वत्प्रणीतश्चकास्ति ।<br>व्यक्तं देवाजन्मनः शाश्वतस्य<br>द्यौस्ते मूर्धा लोचने चन्द्रसूर्यौ॥ ९<br>व्यालाः केशाः श्रोत्ररन्धा दिशस्ते<br>पादौ भूमिर्नाभिरन्ध्रे समुद्राः।<br>मायाकारः कारणं त्वं प्रसिद्धो<br>वेदैः शान्तो ज्योतिषा त्वं हि युक्तः॥ १० | देवगण बोले—सत्त्वमूर्ते! आप ओंकारस्वरूप हैं। आप विश्वकी रचनाके लिये प्रकट सर्वप्रथम अङ्कुर हैं और इस अनन्त भेदोंवाले विश्वके आत्मा अर्थात् मूलस्वरूप हैं। रुद्रमूर्ते! अन्तमें इस उत्पन्न हुए विश्वका संहार भी आप ही करते हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप अपनी महिमासे अपने शरीरको अपने ही नामसे युक्त अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डके रूपमें प्रकटकर उसी ब्रह्माण्डसे ऊपर एवं नीचेके दो खण्डोंद्वारा आकाश और पृथ्वीका विभाजन करते हैं। हमलोग स्पष्टरूपसे ऐसा जानते हैं कि मेरुपर्वतपर आपने जो देवादि प्राणियोंकी आयु-सीमा निर्धारित की थी, वही कर्तव्यता आदि आपद्वारा निर्मित विधान अब भी प्रचलित है। देव! यह स्पष्ट है कि आप अजन्मा और अविनाशी हैं। आकाश आपका मस्तक, चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्र, सर्प केश, दिशाएँ कानोंके छिद्र, पृथ्वी दोनों चरण और समुद्र नाभिछिद्र हैं। आप मायाके रचयिता तथा जगत्के कारणरूपसे प्रसिद्ध हैं। वेदोंका कहना है कि आप परमज्योतिसे युक्त एवं शान्तस्वरूप हैं॥ ७—१०॥ | | वेदार्थेषु त्वां विवृण्वन्ति बुध्वा<br>हृत्पद्मान्तःसंनिविष्टं पुराणम्।<br>त्वामात्मानं लब्धयोगा गृणन्ति<br>सांख्यैर्यास्ताः सप्त सूक्ष्माः प्रणीताः॥ ११<br>तासां हेतुर्याष्टमी चापि गीता<br>तस्यां तस्यां गीयसे वै त्वमन्तम्।<br>दृष्ट्वा मूर्तिं स्थूलसूक्ष्मां चकार<br>देवैर्भावाः कारणैः कैश्चिदुक्ताः॥ १२ | विद्वान्लोग आपको वेदार्थोंमें खोजते हैं और आपको जानकर अपने हृदयकमलके भीतरी भागमें स्थित पुराणपुरुष बतलाते हैं। योगके ज्ञाता आपको आत्मस्वरूप कहते हैं तथा सांख्यज्ञोंद्वारा जो सात सूक्ष्म मूर्तियाँ निर्मित की गयी हैं तथा उनकी हेतुभूता जो आठवीं कही गयी है, उन सभीके अन्तमें आपकी ही स्थिति मानी गयी है। यह देखकर आपने ही स्थूल एवं सूक्ष्म मूर्तियोंका आविष्कार किया था। किन्हीं अज्ञात कारणवश देवताओंने उन भावोंका वर्णन किया था। |
- अध्याय १५४ * | ६०३ ---|--- सम्भूतास्ते त्वत्त एवादिसर्गे<br>भूयस्तां तां वासनां तेऽभ्युपेयुः।<br>त्वत्संकल्पेनानन्तमायाविमूढः<br>कालोऽमेयो ध्वस्तसंख्याविकल्पः ॥ १३<br>भावाभावव्यक्तिसंहारहेतु-<br>स्त्वं सोऽनन्तस्तस्य कर्तासि चात्मन्।<br>येऽन्ये सूक्ष्माः सन्ति तेभ्योऽभिगीतः<br>स्थूला भावाश्चावतारश्च तेषाम् ॥ १४<br>तेभ्यः स्थूलैस्तैः पुराणैः प्रतीतो<br>भूतं भव्यं चैवमुद्भूतिभाजाम्।<br>भावे भावे भावितं त्वा युनक्ति<br>युक्तं युक्तं व्यक्तिभावान्निरस्य।<br>इत्थं देवो भक्तिभाजां शरण्य-<br>स्त्राता गोप्ता नो भवानन्तमूर्तिः ॥ १५ | वे सभी आदिसृष्टिके समय आपसे ही प्रकट हुए थे और आपके संकल्पके अनुसार उन्हें पुनः वैसी-वैसी वासना प्राप्त हुई थी। आप अनन्त मायाओंद्वारा निगूढ़, अप्रमेय कालस्वरूप एवं कल्पित संख्यासे अतीत हैं। आप भाव और अभावकी उत्पत्ति और संहारके कारण हैं। आत्मस्वरूप भगवन्! आप अनन्त विश्व-ब्रह्माण्डके कर्ता हैं। अन्यान्य जितने सूक्ष्म, स्थूल तथा उनको भी ढकनेवाले अर्थात् उनसे उत्कृष्ट भाव हैं, उनके द्वारा भी आपका गुणगान किया गया है। उनसे बढ़कर जो स्थूल एवं प्राचीन हैं, उनके द्वारा भी आप जाने गये हैं। आप उन्नतिशीलोंके भूत एवं भविष्य-रूप हैं। आप प्रत्येक भावमें अनुप्रविष्ट होकर व्यक्त होते हैं और व्यक्तिभावका निरसन कर उसमें अवस्थित रहते हैं। इस प्रकार अनन्त मूर्ति धारण करनेवाले देवाधिदेव! आप हम भक्तजनोंके लिये शरणदाता, रक्षक और सहायक होइये ॥११-१५॥ विरिञ्चिममराः स्तुत्वा ब्रह्माणमविकारिणम्।<br>तस्थुर्मनोभिरिष्टार्थसम्प्राप्तिप्रार्थनास्ततः ॥ १६<br>एवं स्तुतो विरिञ्चिस्तु प्रसादं परमं गतः।<br>अमरान् वरदेनाह वामहस्तेन निर्दिशन् ॥ १७ | इस प्रकार देवगण अविकारी ब्रह्माकी स्तुति करके मनमें अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करते हुए खड़े रहे। देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर ब्रह्मा परम प्रसन्न हुए और अपने वरदायक बायें हाथसे देवताओंको निर्देश करते हुए बोले ॥१६-१७॥ ब्रह्मोवाच<br>नारीवाभर्तृका कस्मात् तनुस्ते त्यक्तभूषणा।<br>न राजते तथा शक्र म्लानवक्त्रशिरोरुहा ॥ १८ | **ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! भूषणोंसे रहित तथा मलिन मुख एवं बालोंसे युक्त तुम्हारा शरीर पतिविहीना स्त्रीकी तरह शोभा नहीं पा रहा है। हुताशन विमुक्तोऽपि न धूमेन विराजसे।<br>भस्मनेव प्रतिच्छन्नो दग्धदावाग्निरोषितः ॥ १९ | हुताशन! धूमसे रहित होनेपर भी तुम्हारी शोभा नहीं हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम चिरकालसे जलकर शान्त हो गये हो और राखसे ढक गये हो। यमामयमये नैव शरीरे त्वं विराजसे।<br>दण्डस्यालम्बनेनेव ह्यकृच्छ्रस्तु पदे पदे ॥ २० | यमराज! इस रोगी शरीरमें तुम्हारी शोभा नहीं हो रही है। ऐसा ज्ञात होता है, मानो तुम पग-पगपर कठिनाईका अनुभव करते हुए कालदण्डके सहारे चल रहे हो। रजनीचरनाथोऽपि किं भीत इव भाषसे।<br>राक्षसेन्द्र क्षताराते त्वमरातिविक्षतो यथा ॥ २१ | राक्षसेन्द्र निर्ऋति! तुम राक्षसोंके स्वामी होकर भी भयभीतकी तरह क्यों बोल रहे हो? अरे शत्रुसंहारक! तुम तो शत्रुओंद्वारा घायल किये हुए-से दीख रहे हो। तनुस्ते वरुणोच्छुष्का परीतस्येव वह्निना।<br>विमुक्तरुधिरं पाशं फणिभिः प्रविलोकयन् ॥ २२ | वरुण! तुम्हारा शरीर अग्निसे घिरे हुएकी तरह अत्यन्त शुष्क दीख रहा है। ऐसा लग रहा है मानो सर्पोंने तुम्हारे पाशमेंसे खून उगल दिया है। वायो भवान् विचेतस्कस्त्वं स्निग्धैरिव निर्जितः।<br>किं त्वं बिभेषि धनद संन्यस्यैव कुबेरताम् ॥ २३ | वायुदेव! तुम स्नेहीजनोंद्वारा पराजित हुएकी तरह अचेत-से दीख रहे हो। कुबेर! तुम अपने यक्षाधिपत्यको त्यागकर क्यों भयभीत हो रहे हो? रुद्रास्त्रिशूलिनः सन्तो वदध्वं बहुशूलताम्।<br>भवन्तः केन तत्क्षिप्तं तेजस्तु भवतामपि ॥ २४ | रुद्रगण! तुमलोग तो त्रिशूलधारी थे, बताओ तो सही, तुम्हारे त्रिशूलकी विशिष्ट क्षमता कहाँ
६०४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अकिञ्चित्करतां यातः करस्ते न विभासते।<br>अलं नीलोत्पलाभेन चक्रेण मधुसूदन॥ २५<br><br>किं त्वयानुदरालीनभुवनप्रविलोकनम्।<br>क्रियते स्तिमिताक्षेण भवता विश्वतोमुख॥ २६ | चली गयी? तुमलोगोंके भी उस तेजको किसने नष्ट कर दिया? मधुसूदन! आपका हाथ कर्तव्यहीन हो गया है, जिससे इसकी शोभा नहीं हो रही है। इस नीले कमलकी-सी कान्तिवाले चक्रके धारण करनेसे क्या लाभ? विश्वतोमुख! इस समय आप नेत्र बंद करके अपने उदरमें विलीन हुए भुवनोंका अवलोकन क्यों कर रहे हैं?॥ १८—२६॥ |
| एवमुक्ताः सुरास्तेन ब्रह्मणा ब्रह्ममूर्तिना।<br>वाचां प्रधानभूतत्वान्मारुतं तमचोदयन्॥ २७<br><br>अथ विष्णुमुखैर्देवैः श्वसनः प्रतिबोधितः।<br>चतुर्मुखं तदा प्राह चराचरगुरुं विभुम्॥ २८ | उन वेदमूर्ति ब्रह्माद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर देवताओंने वाणी-शक्तिके मुख्य कारण वायुको प्रेरित किया। उस समय विष्णु आदि देवताओंने वायुको भलीभाँति समझा दिया, तब वे ऐश्वर्यशाली एवं चराचर प्राणियोंके गुरु ब्रह्मासे बोले— ॥ २७-२८॥ |
| न तु वेत्सि चराचरभूतगतं<br>भवभावमतीव महानुच्छितः प्रभवः।<br>पुनरर्थिवचोऽभिविस्तृत-<br>श्रवणोपमकौतुकभावकृतः॥ २९<br><br>त्वमनन्त करोषि जगद्द्रवतां<br>सचराचरगर्भविभिन्नगुणाम्।<br>अमरासुरमेतदशेषमपि<br>त्वयि तुल्यमहो जनकोऽसि यतः।<br>पितुरस्ति तथापि मनोविकृतिः<br>सगुणो विगुणो बलवानबलः॥ ३०<br><br>भवतो वरलाभनिवृत्तभयः<br>कुलिशाङ्गसुतो दितिजोऽतिबलः।<br>सचराचर निर्मथने किमिति<br>कितवस्तु कृतो विहितो भवता॥ ३१<br><br>किल देव त्वया स्थितये जगतां<br>महदद्भुतचित्रविचित्रगुणाः।<br>अपि तुष्टिकृतः श्रुतकामफला<br>विहिता द्विजनायक देवगणाः॥ ३२<br><br>अपि नाकमभूत् किल यज्ञभुजां<br>भवतो विनियोगवशात् सततम्।<br>अपहृत्य विमानगणं स कृतो<br>दितिजेन महामरुभूमिसमः॥ ३३ | 'भगवन्! चराचर प्राणियोंके मनोंमें उत्पन्न हुए भावोंको आप न जानते हों—ऐसी बात नहीं है। आप अत्यन्त महान्, सर्वोपरि और जगत्के उत्पत्तिस्थान हैं। यह तो आपने केवल याचकोंके वचनोंको विस्तारपूर्वक सुननेके लिये कुतूहलका भाव प्रकट किया है। अनन्त! आप चराचर प्राणियोंसे युक्त विभिन्न गुणवाली विश्व-सृष्टि करते हैं। यद्यपि ये सम्पूर्ण देवता और असुर आपकी दृष्टिमें एक-से हैं; क्योंकि आप ही सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, तथापि पिताके मनमें भी पुत्रोंके सगुण-निर्गुण एवं सबल-निर्बलरूप पक्षको लेकर अन्तर रहता ही है। आपसे वरदान प्राप्त कर निर्भय हुआ वज्राङ्गका पुत्र महाबली धूर्त दैत्य तारक चराचर जगत्का नाश करनेके लिये क्या कर रहा है, यह आपको (भलीभाँति) विदित है। देव! क्या आपने जगत्की स्थितिके लिये महान् एवं अद्भुत चित्र-विचित्र गुणोंसे युक्त, संतुष्ट करनेवाले एवं वाञ्छित अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाले देवगणोंकी सृष्टि नहीं की थी? द्विजनायक! क्या आपके आदेशानुसार स्वर्गलोक सदा यज्ञभोजी देवताओंके अधिकारमें नहीं रहता आया है, किंतु उस दैत्यने विमानसमूहोंको छीनकर उसे महान् मरुस्थल-सा बना दिया है॥ २९—३३॥ |
* अध्याय १५४ * ६०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कृतवानसि सर्वगुणातिशयं<br>यमशेषमहीधरराजतया ।<br>सममिङ्गितभावविधिः स गिरि-<br>र्गगनेन सदोच्चयतां हि गतः ॥ ३४<br><br>अधिवासविहारविधावुचितो<br>दितिजेन पविक्षतशृङ्गतटः ।<br>परिलुण्ठितरत्नगुहानिवहो<br>बहुदैत्यसमाश्रयतां गमितः ॥ ३५<br><br>सुरराज स तस्य भयेन गतं<br>व्यदधादशरीर इतोऽपि वृथा ।<br>उपयोग्यतया विवृतं सुचिरं<br>विमलद्युतिपूरितदिग्वदनम् ॥ ३६<br><br>भवतैव विनिर्मितमादियुगे<br>सुरहेतिसमूहमकुण्ठमिदम् ।<br>दितिजस्य शरीरमवाप्य गतं<br>शतधा मतिभेदमिवाल्पमनः ॥ ३७ | जिस हिमालयको समस्त पर्वतोंका राजा होनेके कारण आपने सर्वगुण-सम्पन्न बनाया, जो ऊँचाईमें आकाशतक व्याप्त था और संकेतानुसार चलनेवाला था, उसके शिखरके तटप्रान्तको उस दैत्यने वज्रसे तोड़-फोड़कर अपने निवास और विहारके उपयुक्त बना लिया है। उसकी गुफाओंके रत्न लूट लिये गये और अब वह बहुत-से दैत्योंका निवासस्थान बन गया है। उस दैत्यके भयसे वह शरीरहीन होनेपर भी इससे भी बढ़कर बुरे कामोंमें लगाया जा रहा है। सुरराज! कृतयुगके आदिमें आपने ही देवताओंके लिये उपयोगी समझकर जिन विशाल, चिरस्थायी, अपनी निर्मल कान्तिसे दिशाओंको उद्भासित करनेवाले एवं अप्रतिहत अस्त्रसमूहोंका निर्माण किया था, वे अस्त्र भी उस दैत्यके शरीरपर गिरकर कायरकी बुद्धि-भिन्नताकी तरह सैकड़ों टुकड़ोंमें टूट-टूट कर चूर हो गये॥ ३४-३७॥ |
| आसारधूलिध्वस्ताङ्गा द्वारस्थाः स्मः कदर्थिनः ।<br>लब्धप्रवेशाः कृच्छ्रेण वयं तस्यामरद्विषः ॥ ३८ | देवेश! (इतना ही नहीं) उस देवद्रोहीके द्वारपर कीचड़ और धूलिसे भरे हुए अङ्गवाले हमलोग तिरस्कार-पूर्वक बैठाये गये थे और बड़ी कठिनाईसे हमलोगोंको उसकी सभामें प्रवेश करनेका अवसर मिला था। |
| सभायाममरा देव निकृष्टेऽप्युपवेशिताः ।<br>वेत्रहस्तैरजल्पन्तस्ततोऽपहसितास्तु तैः ॥ ३९ | उस सभामें भी देवगण निकृष्ट आसनोंपर बैठाये गये थे। वहाँ यद्यपि हमलोग कुछ बोल नहीं रहे थे, तथापि उसके बेंतधारी भृत्योंद्वारा हमलोगोंका उपहास किया जा रहा था। |
| महार्थाः सिद्धसर्वार्था भवन्तः स्वल्पभाषिणः ।<br>चाटुयुक्तमथो कर्म ह्यमरा बहुभाषत ॥ ४० | वे कह रहे थे—'देवगण! आपलोग बड़े सम्मानित एवं सभी प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले हैं, इसीलिये थोड़ा बोलते हैं न?' उनकी इन व्यङ्ग्यपूर्ण बातोंका उत्तर भी देवगण अनेक प्रकारकी चाटुताभरी बातोंद्वारा देते थे। |
| सभेयं दैत्यसिंहस्य न शक्रस्य विसंस्थुला ।<br>वदतेति च दैत्यस्य प्रेष्यैर्विहसिता बहु ॥ ४१ | 'यह दैत्यसिंह तारककी सभा है, इन्द्रकी लड़खड़ानेवाली सभा नहीं है, बोलो, बोलो।' इस प्रकार उस दैत्यके परिचारकोंद्वारा हमलोगोंकी बहुत हँसी उड़ायी गयी है। |
| ऋतवो मूर्तिमन्तस्तमुपासन्ते ह्यहर्निशम् ।<br>कृतापराधसंत्रासं न त्यजन्ति कदाचन ॥ ४२ | वहाँ छहों ऋतुएँ शरीर धारणकर रात-दिन उसकी सेवामें लगी हैं। वे कोई अपराध न हो जाय—इस भयसे उसे कभी नहीं छोड़तीं। |
| तन्त्रीत्रयलयोपेतं सिद्धगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>सुरागमुपधा नित्यं गीयते तस्य वेश्मसु ॥ ४३ | सिद्ध, गन्धर्व और किंनर उसके महलोंमें निष्कपरूपसे नित्य वीणापर तीनों लयोंसमेत सुन्दर राग अलापते रहते हैं। |
| ६०६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हन्ताकृतोपकरणैर्मित्रारिगुरुलघवौः ।<br>शरणागतसंत्यागी त्यक्तसत्यपरिश्रयः ॥ ४४<br>इति निःशेषमथवा निःशेषं वै न शक्यते।<br>तस्याविनयमाख्यातुं स्रष्टा तत्र परायणम् ॥ ४५<br>इत्युक्तः स्वात्मभूर्देवः सुरैर्दैत्यविचेष्टितम् ।<br>सुरानुवाच भगवांस्ततः स्मितमुखाम्बुजः ॥ ४६ | उस दैत्यका मित्र और शत्रुके प्रति भी बड़े-छोटेका विचार नहीं रह गया है। वह शरणमें आये हुएका भी त्याग कर देता है और सत्यका तो उसने व्यवहार ही छोड़ दिया है। यही सब उसकी बुराइयाँ हैं अथवा उसकी उद्दण्डता तो पूर्णरूपसे कही ही नहीं जा सकती। उसे तो ब्रह्मा ही जानें। इस प्रकार देवताओं द्वारा उस दैत्यकी कृतियोंका वर्णन किये जानेपर देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माके मुखकमलपर मुसकराहट आ गयी, तब वे देवताओंसे बोले—॥ ३८–४६ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>अवध्यस्तारको दैत्यः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>यस्य वध्यः स नाद्यापि जातस्त्रिभुवने पुमान् ॥ ४७<br>मया स वरदानेन च्छन्दयित्वा निवारितः।<br>तपसः साम्प्रतं राजा त्रैलोक्यदहनात्मकात् ॥ ४८<br>स च वव्रे वधं दैत्यः शिशुतः सप्तवासरात् ।<br>स सप्तदिवसो बालः शंकराद् यो भविष्यति ॥ ४९<br>तारकस्य निहन्ता स भास्कराभो भविष्यति।<br>साम्प्रतं चाप्यपत्नीकः शंकरो भगवान् प्रभुः ॥ ५०<br>यच्चाहमुक्तवान् यस्या ह्युत्तानकरता सदा।<br>उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सदैव तु ॥ ५१<br>हिमाचलस्य दुहिता सा तु देवी भविष्यति।<br>तस्याः सकाशाद् यः शर्वस्त्वरण्यां पावको यथा ॥ ५२<br>जनयिष्यति तं प्राप्य तारकोऽभिभविष्यति।<br>मयाप्युपायः स कृतो यथैवं हि भविष्यति ॥ ५३<br>शेषश्चाप्यस्य विभवो विनश्येत् तदनन्तरम् ।<br>स्तोककालं प्रतीक्षध्वं निविशङ्केन चेतसा ॥ ५४ | ब्रह्माजीने कहा— देवगण! दैत्यराज तारक सभी देवताओं एवं राक्षसोंद्वारा अवध्य है। जो उसका वध कर सकता है, वह पुरुष अभी त्रिभुवनमें उत्पन्न ही नहीं हुआ है। मैंने ही उस दैत्यराजको वरदान देकर त्रिलोकीको भस्म करनेवाले उस तपसे निवारण किया था। उस समय उस दैत्यने सात दिनके बालकद्वारा अपनी मृत्युका वरदान माँगा था। वह सप्तदिवसीय बालक जो शंकरजीसे उत्पन्न होगा, सूर्यके समान तेजस्वी होगा। वही तारकका वध करनेवाला होगा, किंतु इस समय सामर्थ्यशाली भगवान् शंकर पत्नी-रहित हैं। इसके लिये मैंने पहले जिस देवीके विषयमें उत्तानकरताकी बात कही थी, वही देवी हिमाचलकी कन्याके रूपमें प्रकट होगी। उस देवीका वह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा। उस देवीके सम्पर्कसे शंकरजी अरणीमें अग्निकी तरह जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगे, उसे सम्मुख पाकर तारक पराजित हो जायगा। मैंने भी पहलेसे ही वैसा उपाय कर रखा है, जिससे यह सब वैसा ही होगा। तदनन्तर उसका यह सारा वैभव नष्ट हो जायगा। तुमलोग निःशङ्क चित्तसे थोड़े-से कालकी और प्रतीक्षा करो ॥ ४७–५४ ॥ |
| इत्युक्तास्त्रिदशास्तेन साक्षात्कमलजन्मना।<br>जग्मुस्तं प्रणिपत्येशं यथायोग्यं दिवौकसः ॥ ५५<br>ततो गतेषु देवेषु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>निशा सस्मार भगवान् स्वतनोः पूर्वसम्भवाम् ॥ ५६<br>ततो भगवती रात्रिरुपतस्थे पितामहम्।<br>तां विविक्ते समालोक्य ब्रह्मोवाच विभावरीम् ॥ ५७ | कमलजन्मा साक्षात् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर स्वर्गवासी देवगण उन देवेश्वरको प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने जिसे पहले अपने शरीरसे उत्पन्न किया था, उस निशाका स्मरण किया। तब भगवती रात्रिदेवी पितामहके निकट उपस्थित हुईं। उस विभावरी (रात्रि)-को एकान्तमें उपस्थित देखकर ब्रह्मा बोले ॥ ५५–५७ ॥ |
| * अध्याय १५४ * | ६०७ |
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| ब्रह्मोवाच | **ब्रह्माजीने कहा—*विभावरि (रात्रिदेवी)! इस समय देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य आ उपस्थित हुआ है। देवि! उसे तुम्हें अवश्य पूरा करना है। अब उस कार्यका निर्णय सुनो। दैत्यराज तारक देवताओंका कट्टर शत्रु है, वह अजेय है। उसका विनाश करनेके लिये भगवान् शंकर जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगे, वही उस तारकका वध करनेवाला होगा। उधर शंकरजीकी पत्नी जो दक्षपुत्री सती थी, वह देवी किसी कारणवश कुपित होकर शरीरको भस्म कर चुकी है। वही लोकसुन्दरी देवी हिमाचलकी कन्याके रूपमें प्रकट होगी। भगवान् शंकर उसके वियोगसे तीनों लोकोंको शून्य समझकर हिमाचलकी सिद्धोंद्वारा सेवित कन्दरामें तपस्या कर रहे हैं। वे उस देवीके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ कुछ कालतक निवास करेंगे। उत्कृष्ट तप करनेवाले उन दोनों (शिव-पार्वती)-से जो महाबली पुत्र उत्पन्न होगा, वही तारक दैत्यका विनाशक होगा। शुभानने! वह सुन्दरी देवी जन्म लेनेके पश्चात् थोड़ा होश सँभालनेपर जब विरहसे उत्कण्ठित होकर गाढ़ रूपसे शंकरजीके समागमकी लालसासे युक्त हो जायगी तब उन दोनों घोर तपस्वियोंका संयोग होगा। उस समय उन दोनोंमें थोड़ा वाक्-कलह भी हो जायगा जिससे तारकके विनाशके प्रति पुनः संशय दिखायी पड़ने लगेगा, अतः उन दोनोंके संयुक्त होनेपर सुरतकी आसक्तिके अवसरपर तुम्हें जैसा विघ्न उपस्थित करना होगा, उसे भी सुन लो॥ ५८—६७॥ | | विभावरि महत्कार्यं विबुधानामुपस्थितम्।<br>तत्कर्तव्यं त्वया देवि शृणु कार्यस्य निश्चयम्॥ ५८<br>तारको नाम दैत्येन्द्रः सुरकेतुरनिर्जितः।<br>तस्याभावाय भगवान्जनयिष्यति चेश्वरः॥ ५९<br>सुतं स भविता तस्य तारकस्यान्तकारकः।<br>शंकरस्याभवत् पत्नी सती दक्षसुता तु या॥ ६०<br>सा मृता कुपिता देवी कस्मिंश्चित्कारणान्तरे।<br>भविता हिमशैलस्य दुहिता लोकभाविनी॥ ६१<br>विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यं जगत्त्रयम्।<br>तपस्यन् हिमशैलस्य कन्दरे सिद्धसेविते॥ ६२<br>प्रतीक्षमाणस्तज्जन्म कञ्चित् कालं निवत्स्यति।<br>तयोः सुतमतपोर्भाविता यो महाबलः॥ ६३<br>स भविष्यति दैत्यस्य तारकस्य विनाशकः।<br>जातमात्रा तु सा देवी स्वल्पसंज्ञा च भामिनी॥ ६४<br>विरहोत्कण्ठिता गाढं हरसङ्गमलालसा।<br>तयोः सुतमतपसोः संयोगः स्याच्छुभानने॥ ६५<br>ततस्ताभ्यां तु जनितः स्वल्पो वाक्कलहो भवेत्।<br>ततोऽपि संशयो भूयस्तारकं प्रति दृश्यते॥ ६६<br>तयोः संयुक्तयोस्तस्मात् सुरतासक्तिकारणे।<br>विघ्नस्त्वया विधातव्यो यथा ताभ्यां तथा शृणु॥ ६७ | | | गर्भस्थाने च तन्मातुः स्वेन रूपेण रञ्जय।<br>ततो विहाय शर्वस्तां विश्रान्तो नर्मपूर्वकम्॥ ६८<br>भर्त्सयिष्यति तां देवीं ततः सा कुपिता सती।<br>प्रयास्यति तपश्चर्तुं तत्तस्मात् तपसे पुनः॥ ६९<br>जनयिष्यति यः शर्वादमितद्युतिमण्डितम्।<br>स भविष्यति हन्ता वै सुरारीणामसंशयम्॥ ७०<br>त्वयापि दानवा देवि हन्तव्या लोकदुर्जयाः।<br>यावच्च न सती देहसंक्रान्तगुणसञ्चया॥ ७१ | उस समय तुम उसकी माताके गर्भस्थानमें प्रवेश करके उसपर अपने रूपकी छाप डाल दो। तब शंकरजी उसे छोड़कर विश्राम करने लगेंगे और परिहासमें उस देवीकी भर्त्सना करेंगे जिससे कुपित होकर वह पुनः तपस्या करनेके लिये चली जायगी। पुनः उस तपस्यासे लौटनेपर वह शंकरजीके सम्पर्कसे जिस उत्कृष्ट कान्तिसे सुशोभित पुत्रको उत्पन्न करेगी, वह निःसंदेह देव-शत्रुओंका संहारक होगा। देवि! तुम्हें भी इन लोकदुर्जय दानवोंका संहार करना चाहिये, किंतु जबतक तुम सतीके समागमसे उसके शरीरसे संक्रमित हुए गुणसमूहोंसे युक्त नहीं हो जाओगी, |
* इन मूल श्लोकोंका ऋग्वेद, अथर्ववेद एवं आथर्वणपरिशिष्टप्रोक्त रात्रिसूक्तादिसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। पूर्ण जानकारीके लिये यहाँका भी अर्थ ध्येय है। ये श्लोक बृहद्धर्मपुराणमें भी हैं।
| ६०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्सङ्गमेन तावत् त्वं दैत्यान् हन्तुं न शक्यसे।<br>एवं कृते तपस्तप्त्वा सृष्टिसंहारकारिणी ॥ ७२<br>समाप्तनियमा देवी यदा चोमा भविष्यति।<br>तदा स्वमेव तद्रूपं शैलजा प्रतिपत्स्यते ॥ ७३<br>तनुस्तवापि सहजा सैकानंशा भविष्यति।<br>रूपांशेन तु संयुक्ता त्वमुमायां भविष्यसि ॥ ७४<br>एकानंशेति लोकस्त्वां वरदे पूजयिष्यति।<br>भेदैर्बहुविधाकारैः सर्वगा कामसाधिनी ॥ ७५ | तबतक दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकोगी। ऐसा करनेपर जब सृष्टिका संहार करनेवाली वह देवी तपस्या करनेके पश्चात् नियमोंको समाप्त कर उमारूपसे प्रकट होगी, तब पार्वती अपने उसी रूपको प्राप्त करेंगी। साथ ही तुम्हारा जो यह प्राकृतिक शरीर है, वह भी एकानंशा नामसे प्रसिद्ध होगा और तुम उमाके रूपके अंशसे युक्त होकर उमासे प्रकट होओगी। वरदायिनि ! संसार 'एकानंशा' नामसे तुम्हारी पूजा करेगा। तुम अनेकों प्रकारके भेदोंद्वारा सर्वगामिनी एवं कामनाओंको सिद्ध करनेवाली होओगी ॥ ६८-७५ ॥ |
| ओंकारवक्त्रा गायत्री त्वमिति ब्रह्मवादिभिः।<br>आक्रान्तिरूजिताकारा राजभिश्च महाभुजैः ॥ ७६<br>त्वं भूरिति विशां माता शूद्रैः शैवीति पूजिता।<br>क्षान्तिर्मुनीनामक्षोभ्या दया नियमिनामिति ॥ ७७<br>त्वं महोपायसंदोहा नीतिर्नयविसर्पणाम्।<br>परिच्छित्तिस्त्वमर्थानां त्वमीहा प्राणिहृच्छया ॥ ७८<br>त्वं मुक्तिः सर्वभूतानां त्वं गतिः सर्वदेहिनाम्।<br>त्वं च कीर्तिमतां कीर्तिस्त्वं मूर्तिः सर्वदेहिनाम् ॥ ७९<br>रतिस्त्वं रक्तचित्तानां प्रीतिस्त्वं हृष्टदर्शिनाम्।<br>त्वं कान्तिः कृतभूषाणां त्वं शान्तिर्दुःखकर्मणाम् ॥ ८०<br>त्वं भ्रान्तिः सर्वभूतानां त्वं गतिः क्रतुयाजिनाम्।<br>जलधीनां महावेला त्वं च लीला विलासिनाम् ॥ ८१<br>सम्भूतिस्त्वं पदार्थानां स्थितित्वं लोकपालिनी।<br>त्वं कालरात्रिर्निःशेषभुवनावलिनाशिनी ॥ ८२<br>प्रियकण्ठग्रहानन्ददायिनी त्वं विभावरी।<br>इत्यनेकविधैर्देवि रूपैर्लोके त्वमर्चिता ॥ ८३<br>ये त्वां स्तोष्यन्ति वरदे पूजयिष्यन्ति वापि ये।<br>ते सर्वकामानाप्स्यन्ति नियता नात्र संशयः ॥ ८४ | इसी प्रकार ब्रह्मवादी विप्रगण तुम्हें ओंकाररूप मुखवाली गायत्री और महाबाहु नृपतिवृन्द उन्नतिशीला शक्ति कहेंगे। तुम पृथ्वीरूपसे वैश्योंकी माता कहलाओगी और शूद्र 'शैवी' कहकर तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम मुनियोंकी क्षुब्ध न की जा सकनेवाली क्षमा, नियमधारियोंकी दया, नीतिज्ञोंकी महान् उपायोंसे परिपूर्ण नीति, अर्थ-साधनाकी सीमा, समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाली इच्छा, समस्त प्राणियोंकी मुक्ति, सम्पूर्ण देहधारियोंकी गति, कीर्तिमान् जनोंकी कीर्ति, अखिल देहधारियोंकी मूर्ति, अनुरागीजनोंकी रति, हर्षसे परिपूर्ण लोगोंकी प्रीति (प्रसन्नता), शृङ्गारसे सुसज्जित प्राणियोंकी कान्ति (शोभा), दुःखिजनोंके लिये शान्तिरूपा, निखिल प्राणियोंकी भ्रान्ति, यज्ञानुष्ठान करनेवालोंकी गति, समुद्रोंकी विशाल वेला (तट), विलासियोंकी लीला, पदार्थोंकी सम्भूति (उत्पत्तिस्थान), लोकोंका पालन करनेवाली स्थिति, सम्पूर्ण भुवनसमूहोंको नाश करनेवाली कालरात्रि तथा प्रियतमके गलेसे लगनेपर उत्पन्न हुए आनन्दको देनेवाली रात्रिके रूपमें सम्मानित होओगी। देवि ! इस प्रकार तुम संसारमें अनेक प्रकारके रूपोंद्वारा पूजित होओगी। वरदे ! जो लोग नियमपूर्वक तुम्हारा स्तवन-पूजन करेंगे, वे सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ७६-८४ ॥ |
| इत्युक्ता तु निशा देवी तथेत्युक्त्वा कृताञ्जलिः।<br>जगाम त्वरिता तूर्णं गृहं हिमगिरेः परम् ॥ ८५ | ब्रह्माद्वारा इस प्रकार आदेश दिये जानेपर विभावरी (रात्रि) देवी हाथ जोड़कर 'अच्छा, ऐसा ही करूँगी' यों कहकर तुरंत ही बड़े वेगसे हिमाचलके उस सुन्दर भवनकी ओर प्रस्थित हुई। |
| तत्रासीनां महाहर्म्ये रत्नभित्तिसमाश्रयाम्।<br>ददर्श मेनामापाण्डुच्छविवक्त्रसरोरुहाम् ॥ ८६ | वहाँ पहुँचकर उसने एक विशाल अट्टालिकापर रत्ननिर्मित दीवालके सहारे बैठी हुई मेनाको देखा। उस समय उनके मुखकमलकी कान्ति कुछ पीली पड़ गयी थी। |
| किंचिच्छ्याममुखोदग्रस्तनभारावनामिताम् ।<br>महौषधिगणाबद्धमन्त्रराजनिषेविताम् ॥ ८७ | वे कुछ काले रंगवाले चूचुकोंसे युक्त स्तनके भारसे झुकी हुई थीं। उनके गलेमें जीव- |
| * अध्याय १५४ * | ६०९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उद्वहन् कनकोन्नद्धजीवकक्षामहोरगाम्।<br>मणिदीपगणज्योतिर्महालोकप्रकाशिते ॥ ८८<br><br>प्रकीर्णबहुसिद्धार्थे मनोजपरिवारके।<br>शुचि न्यंशुकसंछन्नभूशय्यास्तरणोज्ज्वले ॥ ८९<br><br>धूपाभोदमनोरम्ये सर्जग्रन्थोपयोगिके।<br>ततः क्रमेण दिवसे गते दूरं विभावरी ॥ ९०<br><br>व्यजृम्भत सुखोदर्के ततो मेनामहागृहे।<br>प्रसुप्तप्रायपुरुषे निद्राभूतोपचारिके ॥ ९१<br><br>स्फुटालोके शशभृति भ्रान्तिरात्रिविहङ्गमे।<br>रजनीचरभूतानां सङ्घैरावृतचत्वरे ॥ ९२<br><br>गाढकण्ठग्रहालग्नसुभगेष्टजने ततः।<br>किंचिदाकुलतांप्राप्ते मेनानेत्राम्बुजद्वये ॥ ९३<br><br>आविवेश मुखे रात्रिः सुचिरस्फुटसंगमा।<br>जन्मदाया जगन्मातुः क्रमेण जठरान्तरे ॥ ९४<br><br>आविवेशान्तरं जन्म मन्यमाना क्षपा तु वै।<br>अरञ्जयच्छविं देव्या गुहारण्ये विभावरी ॥ ९५ | रक्षाके निमित्त एक स्वर्णनिर्मित विशाल सर्पके-से आकारवाली माला लटक रही थी, जिसमें महौषधियोंके समूह और अभिमन्त्रित मन्त्रराज बँधे हुए थे। उनका वह महल मणिनिर्मित दीपसमूहोंकी ज्योतिके उत्कट प्रकाशसे उद्भासित था। वहाँ प्रयोजन-सिद्धिके लिये बहुत-से पदार्थ रखे हुए थे, जिससे वह कामदेवके परिवार-जैसा लग रहा था। वहाँ भूतलपर शय्या बिछी थी, जिसपर शुद्ध एवं श्वेत रेशमी चद्दर बिछी हुई थी तथा सर्जकी गन्धके समान मनको लुभानेवाले धूपकी सुगन्ध फैल रही थी। तदनन्तर क्रमशः दिनके व्यतीत होनेपर विभावरी मेनाके उस सुखमय विशाल गृहमें अपना प्रसार करने लगी। तत्पश्चात् जब शयनके लिये बिछी हुई शय्याओंपर पुरुषगण प्रायः कुछ निद्रामग्न-से होने लगे, चाँदनी स्पष्टरूपसे बिखर गयी, रात्रिमें विचरनेवाले पक्षी निर्भय होकर इधर-उधर घूमने लगे, चबूतरों (चौराहों)-पर राक्षसों और भूत-प्रेतोंका जमघट लग गया, पति-पत्नी गाढ़रूपसे गले लगकर नींदके वशीभूत हो गये, तब मेनाके भी दोनों नेत्रकमल नींदसे कुछ व्याकुल हो गये। ऐसा अवसर पाकर चिरकालसे स्पष्टरूपसे संगमकी इच्छा रखनेवाली रात्रि देवी जगन्माता पार्वतीकी जन्मदायिनी मेनाके मुखमें प्रवेश कर गयी और उसने क्रमशः सारे उदरपर अधिकार जमा लिया। अपने प्रवेशके अनन्तर देवीका जन्म मानती हुई विभावरी रात्रिने जंगली गुफाकी तरह उस उदरमें देवीकी कान्तिको अपने रंगसे रँग दिया॥ ८५–९५ ॥ |
| ततो जगत्परित्राणहेतुर्हिमगिरिप्रिया।<br>ब्राह्मे मुहूर्ते सुभगे व्यसूत गुहारणिम् ॥ ९६<br><br>तस्यां तु जायमानायां जन्तवः स्थाणुजङ्गमाः।<br>अभवन् सुखिनः सर्वे सर्वलोकनिवासिनः ॥ ९७<br><br>नारकाणामपि तदा सुखं स्वर्गसमं महत्।<br>अभवत् क्रूरसत्त्वानां चेतः शान्तं च देहिनाम् ॥ ९८<br><br>ज्योतिषामपि तेजस्त्वमभवत् सुरतोन्नता।<br>वनाश्रिताश्चौषधयः स्वादुवन्ति फलानि च ॥ ९९<br><br>गन्धवन्ति च माल्यानि विमलं च नभोऽभवत्।<br>मारुतश्च सुखस्पर्शो दिशश्च सुमनोहराः ॥ १००<br><br>तेन चोद्भूतफलितपरिपाकगुणोज्ज्वलाः।<br>अभवत् पृथिवी देवी शालिमालाकुलापि च ॥ १०१ | तदनन्तर जगत्के परिरक्षणकी हेतुभूता हिमाचलप्रिया मेनाने सुन्दर ब्राह्ममुहूर्तमें स्कन्दकी माता पार्वतीको जन्म दिया। पार्वतीके उत्पन्न होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके निवासी एवं सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी सुखी हो गये। उस समय नरक-निवासियोंको भी स्वर्गके समान महान् सुखका अनुभव हुआ। क्रूर स्वभाववाले प्राणियोंका चित्त शान्त हो गया। ज्योतिर्गणोंका तेज बढ़ गया। देवसमूहोंकी उन्नति हुई। जंगली ओषधियाँ विकसित हो गयीं और फल स्वादिष्ट हो गये। पुष्पोंमें सुगन्ध बढ़ गयी और आकाश निर्मल हो गया। सुखस्पर्श शीतल, मंद, सुगन्ध वायु चलने लगी। दिशाएँ अत्यन्त मनोहारिणी हो गयीं। वे कुछ उत्पन्न हुए, कुछ फले हुए और कुछ पके हुए पदार्थोंके गुणोंसे युक्त होनेके कारण चमक रही थीं। पृथ्विदेवी भी धान्यसमूहोंसे व्याप्त हो गयी। |
६१० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तपांसि दीर्घचीर्णानि मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>तस्मिन् गतानि साफल्यं काले निर्मलचेतसाम्॥ १०२<br>विस्मृतानि च शस्त्राणि प्रादुर्भावं प्रपेदिरे।<br>प्रभावस्तीर्थमुख्यानां तदा पुण्यतमोऽभवत्॥ १०३<br>अन्तरिक्षे सुराश्चासन् विमानेषु सहस्रशः।<br>समहेन्द्रहरिब्रह्मवायुवह्निपुरोगमाः ॥ १०४<br>पुष्पवृष्टिं प्रमुमुचुस्तस्मिंस्तु हिमभूधरे।<br>जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ १०५ | निर्मल-चित्त एवं शुद्धात्मा मुनियोंकी दीर्घकालसे चली आती हुई तपस्याएँ उस समय सफल हो गयीं। भूले हुए शस्त्र पुनः प्रकट होने लगे। प्रधान-प्रधान तीर्थोंका प्रभाव परम पुण्यमय हो गया। उस समय महेन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा, वायु, अग्नि आदि हजारों देवता विमानोंपर चढ़कर आकाशमें उपस्थित थे। वे उस हिमाचलपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे, प्रधान-प्रधान गन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं॥ ९६—१०५॥ |
| मेरुप्रभृतयश्चापि मूर्तिमन्तो महाबलाः।<br>तस्मिन्महोत्सवे प्राप्ते दिव्यप्रभृतपाणयः॥ १०६<br>सरितः सागराश्चैव समाजग्मुश्च सर्वशः।<br>हिमशैलोऽभवल्लोके तथा सर्वैश्चराचरैः॥ १०७<br>सेव्यश्चाप्यभिगम्यश्च स श्रेयांश्चाचलोत्तमः।<br>अनुभूयोत्सवं देवा जग्मुः स्वानालयान्मुदा ॥ १०८<br>देवगन्धर्वनागेन्द्रशैलशीलावनीगुणैः ।<br>हिमशैलसुता देवी स्वयंपूर्विकया ततः॥ १०९<br>क्रमेण वृद्धिमानीता लक्ष्मीवानलसैर्बुधैः।<br>क्रमेण रूपसौभाग्यप्रबोधैर्भुवनत्रयम् ॥ ११०<br>अजयद् भूषयच्चापि निःसाधारणैरात्मजा।<br>एतस्मिन्नन्तरे शक्रो नारदं देवसम्मतम्॥ १११<br>देवर्षिमथ सस्मार कार्यसाधनसत्वरम्।<br>स्मृतिं शक्रस्य विज्ञाय जातां तु भगवांस्तदा ॥ ११२<br>आजगाम मुदा युक्तो महेन्द्रस्य निवेशनम्।<br>तं स दृष्ट्वा सहस्राक्षः समुत्थाय महासनात्॥ ११३<br>यथार्हेण तु पाद्येन पूजयामास वासवः।<br>शक्रप्रणीतां तां पूजां प्रतिगृह्य यथाविधि ॥ ११४<br>नारदः कुशलं देवमपृच्छत पाकशासनम्।<br>पृष्टे च कुशले शक्रः प्रोवाच वचनं प्रभुः॥ ११५ | उस महोत्सवक अवसरपर महाबली सुमेरु आदि पर्वत शरीर धारणकर और हाथमें (उपहारके लिये) दिव्य पदार्थ लिये हुए तथा नदियों और सागरोंके दल सब ओरसे उपस्थित हुए। उस समय हिमाचल जगत्में सभी चराचर प्राणियोंद्वारा सेव्य तथा अभिगमन करने योग्य बन गये। वे श्रेष्ठ पर्वतके रूपमें मङ्गलरूप हो गये। तत्पश्चात् देवगण उस उत्सवका आनन्द लेकर हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर हिमाचलकन्या पार्वतीदेवी आलस्यरहित एवं बुद्धिमान् पुरुषोंकी लक्ष्मीकी भाँति क्रमशः दिन-प्रति-दिन बढ़ने लगीं। पार्वती ने अपने देव, गन्धर्व, नागेन्द्र, पर्वत और पृथ्वीके शीलस्वभावसे युक्त गुणों तथा रूप, सौभाग्य और ज्ञानद्वारा क्रमशः तीनों लोकोंको जीत लिया और असाधारणरूपसे विभूषित भी किया। इसी बीच इन्द्रने देवताओंके अनुकूलवर्ती एवं शीघ्र ही कार्य-साधनमें जुट जानेवाले देवर्षि नारदका स्मरण किया। तब अपनेको इन्द्रद्वारा स्मरण किया गया जानकर भगवान् नारद हर्षपूर्वक महेन्द्रके निवासस्थानपर आये। उन्हें आया हुआ देखकर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने सिंहासनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने यथायोग्य पाद्य आदिद्वारा नारदजीकी पूजा की। इन्द्रद्वारा विधिपूर्वक की गयी उस पूजाको ग्रहणकर नारदने देवराज इन्द्रसे कुशल-प्रश्न किया। तब कुशल पूछे जानेपर सामर्थ्यशाली इन्द्रने इस प्रकार कहा—॥ १०६—११५॥ |
| इन्द्र उवाच<br>कुशलस्याङ्कुरे तावत् सम्भूते भुवनत्रये।<br>तत्फलोद्भवसम्पत्तौ त्वं भवातन्द्रितो मुने ॥ ११६<br>वेत्सि चैतत्समस्तं त्वं तथापि परिचोदकः।<br>निर्वृतिं परमां याति निवेद्यार्थं सुहृज्जने ॥ ११७ | **इन्द्र बोले—**मुने! त्रिभुवनके कल्याणके लिये अङ्कुर तो उत्पन्न हो गया है, किंतु उससे फलरूपी सम्पत्तिकी उत्पत्तिके निमित्त आप सावधान हो जायँ। यद्यपि आप यह सब कुछ जानते हैं, तथापि कहनेवाला अपने मित्रसे अपना प्रयोजन निवेदित करके परम संतोषका अनुभव करता है। |
| * अध्याय १५४ * | ६११ |
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| तद्यथा शैलजा देवी योगं यायात् पिनाकिना।<br>शीघ्रं तदुद्यमः सर्वैरस्मत्पक्षैर्विधीयताम्॥ ११८<br>अवगम्यार्थमखिलं तत आमन्त्र्य नारदः।<br>शक्रं जगाम भगवान् हिमशैलनिवेशनम्॥ ११९<br>तत्र द्वारे स विप्रेन्द्रश्चित्रवेत्रलताकुले।<br>वन्दितो हिमशैलेन निर्गतेन पुरो मुनिः॥ १२०<br>सह प्रविश्य भवनं भुवो भूषणतां गतम्।<br>निवेदिते स्वयं हैमे हिमशैलेन विस्तृते॥ १२१<br>महासने मुनिवरो निषसादातुलद्युतिः।<br>यथार्हं चार्च्यपाद्यं च शैलस्तस्मै न्यवेदयत्॥ १२२<br>मुनिस्तु प्रतिजग्राह तमर्घं विधिवत् तदा।<br>गृहीतार्घं मुनिवरमपृच्छच्छ्लक्ष्णया गिरा॥ १२३<br>कुशलं तपसः शैलः शनैः फुल्लाननाम्बुजः।<br>मुनिरप्यद्रिराजानमपृच्छत् कुशलं तदा॥ १२४ | इसलिये पार्वतीदेवी जिस प्रकार शीघ्र ही शंकरजीसे संयुक्त हो जायँ, वह उपाय हमारे पक्षके सभी लोगोंको करना चाहिये। तत्पश्चात् सारा प्रयोजन समझकर और इन्द्रसे सलाह करके भगवान् नारद हिमाचलके भवनकी ओर चल पड़े। थोड़ी ही देरमें वे द्विजवर चित्र-विचित्र बेंतकी लताओंसे आच्छादित भवन-द्वारपर जा पहुँचे। वहाँ पहलेसे ही भवनके बाहर निकले हुए हिमाचलने मुनिकी वन्दना की। फिर वे हिमाचलके साथ पृथ्वीके भूषणस्वरूप उनके भवनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ अनुपम कान्तिवाले मुनिवर नारद स्वयं हिमाचलद्वारा निवेदित किये गये एक स्वर्णनिर्मित विशाल सिंहासनपर विराजमान हुए। तब शैलराजने उन्हें यथायोग्य पाद्य और अर्घ्य निवेदित किया। मुनिने विधिपूर्वक उस अर्घ्यको स्वीकार किया। उस समय शैलराजका मुख खिले हुए कमलके समान हर्षसे खिल उठा। तब उन्होंने अर्घ्य ग्रहण करनेके पश्चात् मुनिवरसे मधुर वाणीमें धीरेसे उनकी तपस्याके विषयमें कुशल पूछी। इसके बाद मुनिने भी पर्वतराजसे कुशल-समाचार पूछा॥ ११६-१२४॥ | | नारद उवाच<br>अहोऽवतारिताः सर्वे संनिवेशे महागिरे।<br>पृथुत्वं मनसा तुल्यं कंदराणां तथाचल॥ १२५<br>गुरुत्वं ते गुणौघानां स्थावरादतिरिच्यते।<br>प्रसन्नता च तोयस्य मनसोऽप्यधिका च ते॥ १२६<br>न लक्ष्यामः शैलेन्द्र शिष्यते कन्दरोदरात्।<br>न च लक्ष्मीस्तथा स्वर्गे कुत्राधिकतया स्थिता॥ १२७<br>नाना तपोभिर्मुनिभिर्ज्वलन्नार्कसमप्रभैः ।<br>पावनैः पावितो नित्यं त्वत्कन्दरसमाश्रितैः॥ १२८<br>अवमत्य विमानानि स्वर्गवासविरागिणः।<br>पितुर्गृह इवासन्ना देवगन्धर्वकिन्नराः॥ १२९<br>अहो धन्योऽसि शैलेन्द्र यस्य ते कंदरं हरः।<br>अध्यास्ते लोकनाथोऽपि समाधानपरायणः॥ १३०<br>इत्युक्तवति देवर्षौ नारदे सादरं गिरा।<br>हिमशैलस्य महिषी मेना मुनिदिदृक्षया॥ १३१<br>अनुयाता दुहित्रा तु स्वल्पालिपरिचारिका।<br>लज्जाप्रणयनम्राङ्गी प्रविवेश निवेशनम्॥ १३२ | **नारदजी बोले—**महाचल! तुम्हारे इस भवनको देखकर आश्चर्य होता है। तुमने इस भवनमें सभी पदार्थोंको संगृहीत कर रखा है। पर्वतराज ! तुम्हारी कन्दराओंकी पृथुता तो मनके समान गम्भीर है। तुम्हारे अन्यान्य गुणसमूहोंकी गुरुता अन्य स्थावरोंसे कहीं बढ़-चढ़कर है। तुम्हारे जलकी निर्मलता मनसे भी अधिक है। शैलराज ! मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं देख रहा हूँ, जो तुम्हारी कन्दराओंके भीतर वर्तमान न हो। स्वर्गमें कहीं भी तुमसे बढ़कर लक्ष्मी नहीं है। तुम अपनी गुफाओंमें निवास करनेवाले, नाना प्रकारकी तपस्याओंमें निरत, अग्नि एवं सूर्यकी-सी कान्तिवाले पावन मुनियोंद्वारा नित्य पवित्र होते रहते हो। देवता, गन्धर्व और किन्नरवृन्द स्वर्गवाससे विरक्त हो विमानोंकी अवहेलना कर पिताके गृहकी तरह तुम्हारे यहाँ निवास कर रहे हैं। अहो! शैलेन्द्र ! तुम धन्य हो; क्योंकि तुम्हारी कन्दरामें लोकपति शंकर भी समाधिमें लीन होकर निवास कर रहे हैं। देवर्षि नारद इस प्रकार आदरपूर्ण वाणी बोल ही रहे थे कि उसी समय पर्वतराज हिमाचलकी पटरानी मेना अपनी कन्याके साथ मुनिका दर्शन करनेके लिये वहाँ आयीं। उनके साथ कुछ सखियाँ और सेविकाएँ भी थीं। उन्होंने लज्जा और प्रेमसे विनम्र हो उस भवनमें प्रवेश किया, |
६१२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यत्र स्थितो मुनिवरः शैलेन सहितो वशी।<br>दृष्ट्वा तु तेजसो राशिं मुनिं शैलप्रिया तदा॥ १३३<br>ववन्दे गूढवदना पाणिपद्मकृताञ्जलिः। | जहाँ जितेन्द्रिय मुनिवर नारद हिमाचलके साथ बैठे हुए थे। तब हिमाचल-पत्नी मेनाने तेजके पुञ्जभूत मुनिको देखकर लज्जावश मुखको छिपाये हुए करकमलोंकी अञ्जलि बाँधकर मुनिकी वन्दना की॥ १२५-१३३ १/२॥ |
| तां विलोक्य महाभागो महर्षिरमितद्युतिः॥ १३४<br>आशीर्भरमृतोद्गाररूपाभिस्तां व्यवर्धयत्।<br>ततो विस्मितचित्ता तु हिमवद्गिरिपुत्रिका॥ १३५<br>उदैक्षन्नारदं देवी मुनिमद्भुतरूपिणम्।<br>एहि वत्सेति चाप्युक्ता ऋषिणा स्निग्धया गिरा॥ १३६<br>कण्ठे गृहीत्वा पितरमुत्सङ्गे समुपाविशत्।<br>उवाच माता तां देवीमभिवन्द्य पुत्रिके॥ १३७<br>भगवन्तं ततो धन्यं पतिमाप्स्यसि सम्मतम्।<br>इत्युक्ता तु ततो मात्रा वस्त्रान्तपिहितानना॥ १३८<br>किञ्चित्कम्पितमूर्धा तु वाक्यं नोवाच किञ्चन।<br>ततः पुनरुवाचेदं वाक्यं माता सुतां तदा॥ १३९<br>वत्से वन्दय देवर्षिं ततो दास्यामि ते शुभम्।<br>रत्नक्रीडनकं रम्यं स्थापितं यच्चिरं मया॥ १४०<br>इत्युक्ता तु ततो वेगादुद्धृत्य चरणौ तदा।<br>ववन्दे मूर्ध्नि संधाय करपङ्कजकुड्मलम्॥ १४१ | अमित कान्तिसम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली महर्षि नारदने तब मेनाको देखकर अमृतके उद्गारस्वरूप आशीर्वादनोंद्वारा उनकी शुभकामना की। हिमाचलकी पुत्री पार्वतीदेवी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं। वे अद्भुत रूपवाले नारदमुनिकी ओर एकटक देख रही थीं। उस समय देवर्षि नारदने 'बेटी! आओ' ऐसी स्नेहपूर्ण वाणीसे पुकारा भी, किंतु वे पिताके गलेको पकड़कर उनकी गोदमें छिपकर बैठ गयीं। यह देखकर माता मेनाने पार्वती देवीसे कहा—'बेटी! भगवान् नारदको प्रणाम करो, इससे तुम अपने मनके अनुकूल योग्य पति प्राप्त करोगी।' माताद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने वस्त्रके छोरसे अपने मुखको ढक लिया और मस्तकको थोड़ा झुका दिया, परंतु मुखसे कुछ नहीं कहा। तत्पश्चात् माताने पुनः अपनी कन्यासे इस प्रकार कहा—'बेटी! यदि तुम देवर्षि नारदको प्रणाम कर लो तो मैं तुम्हें बड़ी सुन्दर वस्तु दूँगी। मैं तुम्हें वह सुन्दर रत्ननिर्मित खिलौना दूँगी, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे छिपाकर रखा है।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने शीघ्र ही अपने कमल-मुकुल-सदृश दोनों हाथोंसे मुनिके दोनों चरणोंको उठाकर मस्तकपर रख कर प्रणाम किया॥ १३४—१४१॥ |
| कृते तु वन्दने तस्या माता सखीमुखेन तु।<br>चोदयामास शनकैस्तस्याः सौभाग्यशंसिनाम्॥ १४२<br>शरीर लक्षणानां तु विज्ञानाय तु कौतुकात्।<br>स्त्रीस्वभावाद्वददुहितुश्चिन्तां हृदि समुद्वहन्॥ १४३<br>ज्ञात्वा तदिङ्गितं शैलो महिष्या हृदयेन तु।<br>अनुदीर्णोऽक्षतिर्मेने रम्यमेतदुपस्थितम्॥ १४४ | पार्वतीके प्रणाम कर लेनेके पश्चात् माता मेनाने कुतूहलवश कन्याके सौभाग्यसूचक शरीर-लक्षणोंकी जानकारी प्राप्त करनेके लिये धीरेसे सखीद्वारा मुनिसे अनुरोध किया; क्योंकि स्त्री-स्वभाववश उनके हृदयमें कन्याविषयिणी चिन्ता उठ खड़ी हुई थी। पर्वतराज अपनी पत्नीके उस संकेतको जानकर मनमें परम प्रसन्न हुए कि यह तो बड़ा सुन्दर विषय उपस्थित हुआ। इसमें उन्हें कोई हानि नहीं दीख पड़ी, अतः वे स्वयं कुछ न बोले। |
| चोदितः शैलमहिषीसख्या मुनिवरस्तदा।<br>स्मिताननो महाभागो वाक्यं प्रोवाच नारदः॥ १४५<br>न जातोऽस्याः पतिर्भद्रे लक्षणैश्च विवर्जिता।<br>उत्तानहस्ता सततं चरणैर्व्यभिचारिभिः।<br>स्वच्छायया भविष्येयं किमन्यद् बहु भाष्यते॥ १४६ | तब हिमाचल-पत्नीकी सखीद्वारा अनुरोध किये जानेपर महाभाग मुनिवर नारद मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'भद्रे! इसका पति तो अभी जगत्में पैदा ही नहीं हुआ है। यह सभी शुभ लक्षणोंसे रहित है। इसकी हथेली सदा उत्तान ही रहती है तथा चरण भी कुलक्षणोंसे युक्त हैं। यह अपनी छायाके साथ अर्थात् अकेली ही रहेगी। इसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय।' |
* अध्याय १५४ * ६१३
| श्रुत्वैतत् संभ्रमाविष्टो ध्वस्तधैर्यो महाचलः।<br>नारदं प्रत्युवाचाथ साश्रुकण्ठो महागिरिः॥ १४७ | यह सुनकर पर्वतराज हिमाचल व्याकुल हो गये। उनका सारा धैर्य जाता रहा। तब वे अश्रुगद्गद कण्ठसे नारदजीसे बोले॥ १४२—१४७॥ | | हिमवानुवाच<br>संसारस्यातिदोषस्य दुर्विज्ञेया गतिर्यतः।<br>सृष्ट्यां चावश्यभाविन्यां केनाप्यतिशयात्मना॥ १४८<br>कर्त्रा प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम्।<br>यो जायते हि यद्बीजाज्जनेतुः स ह्यसार्थकः॥ १४९<br>जनिता चापि जातस्य न कश्चिदिति यत्स्फुटम्।<br>स्वकर्मणैव जायन्ते विविधा भूतजातयः॥ १५०<br>अण्डजो ह्यण्डजाज्जातः पुनर्जायेत मानवः।<br>मानुषाच्च सरीसृप्यां मनुष्यत्वेन जायते॥ १५१<br>तत्रापि जातौ श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेन तु।<br>अपुत्रजन्मिनः शेषाः प्राणिनः समवस्थिताः॥ १५२<br>मनुजास्तत्र जायन्ते यतो न गृहधर्मिणः।<br>क्रमेणाऽऽश्रमसम्प्राप्तिर्ब्रह्मचारिव्रतादनु ॥ १५३<br>तस्य कर्तुर्नियोगेन संसारो येन वर्धितः।<br>संसारस्य कुतो वृद्धिः सर्वे स्युर्यदतिग्रहाः॥ १५४<br>अतः कर्त्रा तु शास्त्रेषु सुतलाभः प्रशंसितः।<br>प्राणिनां मोहनाथार्य नरकत्राणसंश्रयात्॥ १५५<br>स्त्रिया विरहिता सृष्टिर्जन्तूनां नोपपद्यते।<br>स्त्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा दैन्यभाषिणी।<br>शास्त्रालोचनसामर्थ्यमुज्झितं तासु वेधसा॥ १५६ | हिमवान्ने कहा—देवर्षे! इस अत्यन्त दोषपूर्ण संसारकी गति दुर्विज्ञेय है। इस अवश्यम्भाविनी सृष्टिमें किसी कर्ता महापुरुषद्वारा जो मर्यादा स्थापित की गयी है, वह संसारी जीवोंके लिये स्थिर है। जो जिसके बीजसे उत्पन्न होता है, वह उस पैदा करनेवालेके लिये निरर्थक होता है, उसी प्रकार पैदा करनेवाला भी पैदा हुएका कोई नहीं है—यह तो स्पष्ट है; क्योंकि प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही उत्पन्न होती हैं। एक ही जीव अण्डजके सम्पर्कसे अण्डजयोनिमें पैदा होता है और वही पुनः मनुष्यके संयोगसे मानव-योनिमें उत्पन्न होता है। फिर मानव-योनिसे भी उलटकर सर्प आदि रेंगनेवाली योनियोंमें जन्म लेता है। वहाँ भी धर्मकी उत्कृष्टतासे उत्तम जातिमें जन्म होता है। शेष जो अधार्मिक प्राणी होते हैं, वे पुत्रहीन होते हैं। उनमें गृहस्थधर्मका सुचारुरूपसे पालन न करनेवाले मानवोंको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। इन आश्रमोंकी प्राप्ति उसी कर्ताकी व्यवस्थासे, जिसने संसारकी वृद्धि की है, क्रमशः ब्रह्मचर्य व्रतके बाद होती है। यदि सभी प्राणी आश्रमधर्मका त्याग कर दें तो संसारकी वृद्धि कैसे हो सकती है। इसीलिये सृष्टिकर्ताने शास्त्रोंमें नरकसे त्राण करनेका लोभ दिखाकर प्राणियोंको मोहित करनेके लिये पुत्रप्राप्तिकी प्रशंसा की है; परंतु प्राणियोंकी सृष्टि स्त्रीके बिना हो नहीं सकती और वह स्त्री-जाति स्वभावसे ही दयनीय और दीनतापूर्वक बोलनेवाली होती है। इसीलिये ब्रह्माने उन स्त्रियोंको शास्त्रालोचनकी शक्ति नहीं दी है॥ १४८—१५६॥ | | शास्त्रेषूक्तमसंदिग्धं बहुवारं महाफलम्।<br>दशपुत्रसमा कन्या या न स्याच्छीलवर्जिता॥ १५७<br>वाक्यमेतत् फलभ्रष्टं पुंसि ग्लानिकरं परम्।<br>कन्या हि कृपणा शोच्या पितुर्दुःखविवर्धिनी॥ १५८<br>यापि स्यात् पूर्णसर्वाढ्या पतिपुत्रधनादिभिः।<br>किं पुनर्दुर्भागा हीना पतिपुत्रधनादिभिः॥ १५९<br>त्वं चोक्तवान् सुताया मे शरीरे दोषसंग्रहम्।<br>अहो मुह्यामि शुष्यामि ग्लामि सीदामि नारद ॥ १६० | इसी प्रकार शास्त्रोंमें अनेकों बार निश्चितरूपसे इस महान् फलका वर्णन किया गया है कि जो कन्या शील-सदाचारसे रहित न हो, वह दस पुत्रोंके समान मानी गयी है; किंतु यह वाक्य निष्फल है और पुरुषके लिये अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न करनेवाला है; क्योंकि जो कन्या पति, पुत्र, धन आदि सभी सुख-साधनोंसे पूर्ण सम्पन्न होनेपर भी जब कृपण, शोचनीय और पिताके दुःखको बढ़ानेवाली होती है, तब जो पति, पुत्र, धन आदिसे हीन अभागिनी हो तो उसके विषयमें क्या कहना है। नारदजी! आपने मेरी कन्याके शरीरमें तो दोष-समूहका ही वर्णन किया है, इसी कारण मैं मोहमें पड़ा हूँ, मेरा शरीर सूखा जा रहा |
| ६१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अयुक्तमथ वक्तव्यमप्राप्यमपि साम्प्रतम्।<br>अनुग्रहेण मे छिन्धि दुःखं कन्याश्रयं मुने॥ १६१॥<br><br>परिच्छिन्नेऽप्यसंदिग्धे मनः परिभवाश्रयम्।<br>तृष्णामुष्णातिनिष्णाता फललोभाश्रयाशुभा॥ १६२॥<br><br>स्त्रीणां हि परमं जन्म कुलानामुभयात्मनाम्।<br>इहामुत्र सुखायोक्तं सत्पतिप्राप्तिसंज्ञितम्॥ १६३॥<br><br>दुर्लभः सत्पतिः स्त्रीणां विगुणोऽपि पतिः किल।<br>न प्राप्यते विना पुण्यैः पतिर्नार्या कदाचन॥ १६४॥<br><br>यतो निःसाधनो धर्मः परिमाणोज्झिता रतिः।<br>धनं जीवितपर्याप्तं पत्यौ नार्याः प्रतिष्ठितम्॥ १६५॥ | है, मनमें ग्लानि हो रही है और कष्ट पा रहा हूँ। मुने! इस समय मुझपर अनुग्रह करके (कन्याके कष्ट-निवारक उपाय) यदि अयुक्त अथवा दुष्प्राप्य भी हो तो बतलाइये और मेरे कन्याविषयक दुःखको दूर कीजिये; क्योंकि निःसंदेहरूपसे कार्य-सिद्धिकी सम्भावना होनेपर भी फलके लोभमें आसक्त एवं कार्य-साधनमें निपुण अशुभ तृष्णा मेरे परिभवयुक्त मनको ठग रही है। स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिकी प्राप्ति ही उनके सौभाग्यशाली जन्मकी सूचक है तथा वह पितृकुल एवं प्रतिकुल—दोनों कुलोंके लिये इहलोक और परलोकमें सुखका साधन बतलायी गयी है। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिका मिलना तो दुर्लभ है ही, परंतु गुणहीन पति भी नारीको पुण्यके बिना कभी नहीं प्राप्त होता; क्योंकि नारीको साधनरहित धर्म, प्रचुर मात्रामें कामवासनाकी प्राप्ति और जीवन-निर्वाहके लिये धन पतिके द्वारा ही प्राप्त होते हैं॥ १५७—१६५॥ |
| निर्धनो दुर्भगो मूर्खः सर्वलक्षणवर्जितः।<br>दैवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सदैव हि॥ १६६॥<br><br>त्वया चोक्तं हि देवर्षे न जातोऽस्याः पतिः किल।<br>एतद्दौर्भाग्यमतुलमसंख्यं गुरु दुःसहम्॥ १६७॥<br><br>चराचरे भूतसर्गे यद्यद्यापि च नो मुने।<br>न संजात इति ब्रूषे तेन मे व्याकुलं मनः॥ १६८॥ | पति निर्धन, अभागा, मूर्ख और सभी शुभ लक्षणोंसे रहित क्यों न हो, किंतु वह नारीके लिये सदैव परम देवता कहा गया है। देवर्षे! आपने कहा है कि मेरी पुत्रीका पति पैदा ही नहीं हुआ है, यह तो इसका अतुलनीय एवं बहुत बड़ा दुःसह दुर्भाग्य है। मुने! आप जो ऐसा कह रहे हैं कि चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें वह अभीतक उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इससे मेरा मन व्याकुल हो गया है। |
| मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम्।<br>लक्षणं हस्तपादादौ विहितैर्लक्षणैः किल॥ १६९॥<br><br>सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुङ्गव।<br>उत्तानहस्तता प्रोक्ता याचतामेव नित्यदा॥ १७०॥<br><br>शुभोदयानां धन्यानां न कदाचित्प्रयच्छताम्।<br>स्वच्छाययास्याश्चरणौ त्वयोक्तो व्यभिचारिणौ॥ १७१॥<br><br>तत्रापि श्रेयसी ह्याशा मुने न प्रतिभाति नः।<br>शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक् फलनिवेदिनः॥ १७२॥<br><br>सौभाग्यधनपुत्रायुःपतिलाभानुशंसनम् ।<br>तैश्च सर्वैर्विहीनेयं त्वमात्थ मुनिपुङ्गव॥ १७३॥ | मनुष्यों एवं देवजातियोंके शुभाशुभसूचक लक्षण हाथों एवं पैरोंमें चिह्नित लक्षणोंद्वारा जाने जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस विषयमें भी आपने इसे उत्तानहस्ता बतलाया है। यह उत्तानहस्ता सदा याचकोंकी ही कही गयी है, किंतु जो सौभाग्यशाली, धन्यवादके पात्र और दानी होते हैं, उनके हाथ कभी उत्तान नहीं रहते। मुने! आपने यह भी कहा है कि इसके चरण अपनी छायासे युक्त होनेके कारण दोषी हैं, अतः इस विषयमें भी हमें कल्याणकारिणी आशा नहीं प्रतीत हो रही है। शरीरके अन्यान्य लक्षण पृथक्-पृथक् फल सूचित करते हैं। उनमें जो सौभाग्य, धन, पुत्र, आयु और पति-प्राप्तिके सूचक होते हैं, उन सभी लक्षणोंसे मेरी यह कन्या हीन है—ऐसा आप कह रहे हैं। |
| त्वं मे सर्वं विजानासि सत्यवागसि चाप्यतः।<br>मुह्यामि मुनिशार्दूल हृदयं दीर्यतीव मे॥ १७४॥ | मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी सारी मनोगत अभिलाषाओंको जानते हैं। मुनिशार्दूल! आप सत्यवादी हैं, इसी कारण (आपकी बात सुनकर) मैं मोहित हो रहा हूँ और मेरा हृदय |
* अध्याय १५४ *
६१५
| इत्युक्त्वा विरतः शैलो महादुःखविचारणात्।<br>श्रुत्वैतदखिलं तस्माच्छैलराजमुखाम्बुजात्।<br>स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवपूजितः॥ १७५<br><br>नारद उवाच<br><br>हर्षस्थानेऽपि महति त्वया दुःखं निरूप्यते।<br>अपरिच्छिन्नवाक्यार्थे मोहं यासि महागिरे॥ १७६<br>इमां शृणु गिरं मत्तो रहस्यपरिनिष्ठिताम्।<br>समाहितो महाशैल मयोक्तस्य विचारणे॥ १७७<br>न जातोऽस्याः पतिर्देव्या यन्मयोक्तं हिमाचल।<br>न स जातो महादेवो भूतभव्यभवोद्भवः।<br>शरण्यः शाश्वतः शास्ता शंकरः परमेश्वरः॥ १७८<br>ब्रह्माविष्ण्विन्द्रमुनयो जन्ममृत्युजरार्दिताः।<br>तस्यैते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे॥ १७९<br>आस्ते ब्रह्मा तदिच्छात्तः सम्भूतो भुवनप्रभुः।<br>विष्णुर्युगे युगे जातो नानाजातिर्महातनूः॥ १८०<br>मन्यसे मायया जातं विष्णुं चापि युगे युगे।<br>आत्मनो न विनाशोऽस्ति स्थावरान्तेऽपि भूधर॥ १८१<br>संसारे जायमानस्य म्रियमाणस्य देहिनः।<br>नश्यते देह एवात्र नात्मनो नाश उच्यते॥ १८२<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं संसारो यः प्रकीर्तितः।<br>स जन्ममृत्युदुःखार्तो ह्यवशः परिवर्तते॥ १८३<br>महादेवोऽचलः स्थाणुर्न जातो जनकोऽजरः।<br>भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथो निरामयः॥ १८४<br>यदुक्तं च मया देवी लक्षणैर्वर्जिता तव।<br>शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्त्वेन विचारणम्॥ १८५<br>लक्षणं दैविको ह्यङ्कः शरीरावयवाश्रयः।<br>सर्वायुर्धनसौभाग्यपरिमाणप्रकाशकः ॥ १८६ | फटा-सा जा रहा है। ऐसा कहकर हिमाचल उस महान् दुःखी कल्पनासे विरत हो गये। उस शैलराजके मुखकमलसे निकली हुई ये सारी बातें सुनकर देवपूजित नारदजी मुसकराते हुए इस प्रकार बोले॥ १६६—१७५॥<br><br>**नारदजीने कहा—**गिरिराज! आप तो महान् हर्षका अवसर उपस्थित होनेपर भी दुःखकी गाथा गा रहे हैं और मेरे अस्पष्ट वाक्यके अर्थको समझे बिना मोहको प्राप्त हो रहे हैं। शैलराज! इस रहस्यपूर्ण वाणीका तात्पर्य मुझसे सुनिये और मेरे द्वारा कही हुई बातपर सावधानीपूर्वक विचार कीजिये। हिमाचल! मैंने जो यह कहा है कि इस देवीका पति उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इसका अभिप्राय यह है कि जो भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों कालोंमें वर्तमान रहनेवाले, जीवोंके शरणदाता, अविनाशी, नियामक, कल्याणकर्ता और परमेश्वर हैं, वे महादेव उत्पन्न नहीं हुए हैं अर्थात् वे अनादि हैं, उनका जन्म नहीं होता। पर्वतराज! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, मुनि आदि जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे ग्रस्त हैं। ये सभी उस परमेश्वरके खिलौनेमात्र हैं। उन्हींकी इच्छासे त्रिभुवनके स्वामी ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और विष्णु प्रत्येक युगमें विशाल शरीर धारण करके नाना प्रकारकी जातियोंमें उत्पन्न होते हैं। पर्वतराज! प्रत्येक युगमें मायाका आश्रय लेकर उत्पन्न हुए विष्णुको तो तुम भी मानते ही हो। स्थावर योनिमें जन्म लेनेपर भी शरीरान्त होनेपर आत्माका विनाश नहीं होता। संसारमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए प्राणीका शरीरमात्र नष्ट होता है, आत्माका नाश नहीं कहा जाता। ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त जो यह संसार कहा जाता है, उसमें उत्पन्न हुए प्राणी जन्म-मृत्युके दुःखसे पीड़ित होकर पराधीन रहते हैं, किंतु महादेव स्थाणुकी भाँति अचल हैं। वे वृद्धावस्थासे रहित तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, किंतु स्वयं किसीसे उत्पन्न नहीं होते। वे ही निर्दोष जगदीश्वर शङ्कर इस कन्याके पति होंगे॥ १७६—१८४॥<br><br>साथ ही मैंने तुमसे जो यह कहा था कि यह देवी लक्षणोंसे रहित है, उस वाक्यका अभिप्राय भी सम्यक्-रूपसे सुनो। पर्वतराज! शरीरके अवयवोंमें अङ्कित लक्षण दैविक चिह्न होता है। वह सभीके आयु, धन और सौभाग्यके परिणामको प्रकट करनेवाला होता है, |
६१६ * मत्स्यपुराण *
| अनन्तस्याप्रमेयस्य सौभाग्यस्यास्य भूधर।<br>नैवाङ्गे लक्षणाकारः शरीरे संविधीयते॥ १८७<br>अतोऽस्या लक्षणं गात्रे शैल नास्ति महामते।<br>यथाहमुक्तवान् तस्या ह्युत्तानकरतां सदा॥ १८८<br>उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सदैव तु।<br>सुरासुरमुनिव्रातवरदेयं भविष्यति॥ १८९<br>यथा प्रोक्तं तदा पादौ स्वच्छायव्यभिचारिणौ।<br>अस्याः शृणु ममात्रापि वाग्युक्तिं शैलसत्तम॥ १९०<br>चरणौ पद्मसंकाशावस्याः स्वच्छनखोज्ज्वलौ।<br>सुरासुराणां नमतां किरीटमणिकान्तिभिः॥ १९१<br>विचित्रवर्णैर्भासन्तौ स्वच्छायप्रतिबिम्बितौ।<br>भार्या जगद्गुरोर्ह्येषा वृषाङ्कस्य महीधर॥ १९२<br>जननी लोकधर्मस्य सम्भूता भूतभाविनी।<br>शिवेयं पावनायैव त्वत्क्षेत्रे पावकद्युतिः॥ १९३<br>तद्यथा शीघ्रमेवैषा योगं यायात् पिनाकिना।<br>तथा विधेयं विधिवत्त्वया शैलेन्द्रसत्तम।<br>अत्यन्तं हि महत् कार्यं देवानां हिमभूधर॥ १९४ | किंतु इसके शरीरमें इस अनन्त एवं अप्रमेय सौभाग्यके किसी लक्षणाकार चिह्नका संविधान नहीं किया गया है, इसीलिये मैंने कहा है कि इसके शरीरमें लक्षण नहीं है। महाबुद्धिमान् हिमाचल! जो मैंने इसकी सदा उत्तानकरताका कथन किया था, उसका तात्पर्य यह है कि इस देवीका यह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा, जिससे यह सुर, असुर और मुनिसमूहके लिये वरदायिनी होगी। पर्वतश्रेष्ठ! उस समय मैंने जो ऐसा कहा था कि इसके चरण अपनी छायामें रहनेके कारण दोषी हैं, इस विषयमें भी तुम मेरे वचनोंकी युक्ति सुनो। इसके कमल-सदृश चरण स्वच्छ उज्ज्वल नखोंसे सुशोभित हैं। जब वे नमस्कार करनेवाले सुरों एवं असुरोंके किरीटोंमें जड़ी हुई मणियोंकी विचित्र वर्णकी कान्तिसे उद्भासित होंगे, तब अपनी छायासे प्रतिबिम्बित कहलायेंगे। महीधर! आपकी यह कन्या जगद्गुरु वृषभध्वज शङ्करकी भार्या, लोकधर्मकी जननी, प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली, कल्याणस्वरूपा और अग्निके समान कान्तिमती है। यह तुम्हारे क्षेत्रमें तुम्हें पावन करनेके लिये प्रकट हुई है। इसलिये श्रेष्ठ पर्वतराज! जिस प्रकार यह शीघ्र-से-शीघ्र पिनाकधारी शङ्करजीके साथ संयुक्त हो जाय, तुम्हें विधिपूर्वक वैसा ही विधान करना चाहिये। हिमाचल! इससे देवताओंका अत्यन्त महान् कार्य सिद्ध हो जायगा॥ १८५—१९४॥ |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! नारदजीके मुखसे ये सारी बातें सुनकर उस समय मेनाके प्राणपति शैलराज अपनेको पुनः उत्पन्न हुआ-सा अनुभव करने लगे। तत्पश्चात् हर्षसे फूले हुए हिमाचल भी उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव वृषभध्वजको नमस्कार करके नारदजीसे बोले॥१९५-१९६॥ |
| एवं श्रुत्वा तु शैलेन्द्रो नारदात् सर्वमेव हि।<br>आत्मानं स पुनर्जातं मेने मेनापतिस्तदा॥ १९५<br>नमस्कृत्य वृषाङ्काय तदा देवाय धीमते।<br>उवाच सोऽपि संहृष्टो नारदं तु हिमाचलः॥ १९६ | |
| हिमवानुवाच | **हिमवान्ने कहा—**मुने! आपने तो मुझे घोर दुस्तर नरकसे उबार लिया है और पाताललोकसे निकालकर सातों लोकोंका अधिपति बना दिया है। मुनिवर! इस समय आपने हिमाचलपर जो अचल गुणवाली समृद्धि उत्पन्न कर दी है, इससे मैं सचमुच हिमाचल नामसे विख्यात कर दिया गया हूँ। मुने! इस समय मेरा हृदय आनन्दमय दिनका अनुभव कर रहा है, जिससे यह आपके कृत्योंका विभागपूर्वक विचार करनेमें सक्षम नहीं हो रहा है। यदि मैं वाणीके अधीश्वर बृहस्पति हो जाऊँ तो भी आपके गुणोंका विचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। |
| दुस्तरान्नरकाद् घोरादुद्धृतोऽस्मि त्वया मुने।<br>पातालादहमुद्धृत्य समलोकाधिपः कृतः॥ १९७<br>हिमाचलोऽस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना।<br>हिमाचलेऽचलगुणां प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम्॥ १९८<br>आनन्ददिवसाहारि हृदयं मेऽधुना मुने।<br>नाध्यवस्यति कृत्यानां प्रविभागविचारणम्॥ १९९<br>यदि वाचामधीशः स्यां त्वद्गुणानां विचारणे॥ २०० |
* अध्याय १५४ * <span style="float: right;">६१७</span>
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| भवद्विधानां नियतममोघं दर्शनं मुने।<br>तवास्मान् प्रति चापल्यं व्यक्तं मम महामुने॥ २०१<br>भवद्भिरेव कृत्योऽहं निवासायात्मरूपिणाम्।<br>मुनीनां देवतानां च स्वयं कर्तापि कल्मषम्॥ २०२<br>तथापि वस्तुन्येकस्मिन्नाज्ञा मे सम्प्रदीयताम्।<br>इत्युक्तवति शैलेन्द्रे स तदा हर्षनिर्भरै॥ २०३<br>तथा च नारदो वाक्यं कृतं सर्वमिति प्रभो।<br>सुरकार्ये य एवार्थस्तवापि सुमहत्तरः॥ २०४<br>इत्युक्त्वा नारदः शीघ्रं जगाम त्रिदिवं प्रति।<br>स गत्वा शक्रभवनममरेशं ददर्श ह॥ २०५<br>ततोऽभिरूपे स मुनिरुपविष्टो महासने।<br>पृष्टः शक्रेण प्रोवाच हिमजासंश्रयां कथाम्॥ २०६ | मुने! आप-जैसे महर्षियोंका दर्शन निश्चय ही अमोघ होता है। महामुने! हमलोगोंके प्रति आपकी अस्थिरता तो मुझे स्पष्टरूपसे ज्ञात है। आप लोगोंद्वारा ही मैं आत्मस्वरूप मुनियों एवं देवताओंके निवास-योग्य बनाया गया हूँ। यद्यपि मैं स्वयं भी पाप करनेवाला हूँ, तथापि किसी एक वस्तुके लिये मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये। उस समय हर्षसे भरे हुए शैलराजके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने कहा—'प्रभो! तुमने सब कुछ कर लिया। (अब मुझे यही कहना है कि) देवताओंके कार्यका जो प्रयोजन है, वह तुम्हारे लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा।' ऐसा कहकर नारदजी शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ इन्द्रके भवनमें जाकर वे देवराज इन्द्रसे मिले। जब वे एक सुन्दर सिंहासनपर आसीन हो गये, तब इन्द्रने उनसे जिज्ञासा प्रकट की। फिर तो वे पार्वती-सम्बन्धी कथाका वर्णन करने लगे॥ १९७—२०६॥ |
| नारद उवाच<br>समूह्य यत्तु कर्तव्यं तन्मया कृतमेव हि।<br>किंतु पञ्चशरस्यैव समयोऽयमुपस्थितः॥ २०७<br>इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना।<br>चूताङ्कुरास्त्रं सस्मार भगवान् पाकशासनः॥ २०८<br>संस्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता।<br>उपतस्थे रतियुतः सविलासो झषध्वजः।<br>प्रादुर्भूतं तु तं दृष्ट्वा शक्रः प्रोवाच सादरम्॥ २०९ | नारदजी बोले— देवराज! संगठित होकर सबके द्वारा जो काम किया जाना चाहिये, उसे तो मैंने अकेले ही कर दिया; किंतु इस अवसरपर अब कामदेवकी आवश्यकता आ पड़ी है। कार्यदर्शी नारद मुनिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज भगवान् इन्द्रने आमके बौरके अङ्कुरको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाले कामदेवका स्मरण किया। सहस्रनेत्रधारी बुद्धिमान् इन्द्रद्वारा स्मरण किये जानेपर झषकेतु कामदेव अपनी पत्नी रतिके साथ विलासपूर्वक शीघ्र ही उपस्थित हुआ। उसे उपस्थित देखकर इन्द्रने आदरपूर्वक उससे कहा॥ २०७—२०९॥ |
| शक्र उवाच<br>उपदेशेन बहुना किं त्वां प्रति वदे प्रियम्।<br>मनोभवोऽसि तेन त्वं वेत्सि भूतमनोगतम्॥ २१०<br>तद्यथार्थकमेव त्वं कुरु नाकसदाम् प्रियम्।<br>शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरिपुत्र्या मनोभव।<br>संयुतो मधुना चैव ऋतुराजेन दुर्जय॥ २११<br>इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये।<br>प्रोवाच पञ्चबाणोऽथ वाक्यं भीतः शतक्रतुम्॥ २१२ | इन्द्र बोले— मनोभव! तुम तो अजेय हो और मनसे ही उत्पन्न होते हो, अतः सभी प्राणियोंके मनोगत भावोंको भलीभाँति जानते हो। ऐसी दशामें तुम्हारे प्रति अधिक उपदेश करनेसे क्या लाभ? मैं तुमसे एक प्रिय बात कह रहा हूँ। तुम स्वर्गवासियोंके उस प्रिय कार्यको अवश्य पूर्ण करो। (वह यह है कि) तुम चैत्रमास और ऋतुराज वसन्तको साथ लेकर शङ्करजीका गिरिराजकुमारी पार्वतीके साथ शीघ्र ही संयोग स्थापित करा दो। अपनी स्वार्थसिद्धिके निमित्त इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पञ्चबाण कामदेव भयभीत होकर इन्द्रसे इस प्रकार बोला॥ २१०—२१२॥ |
६१८ * मत्स्यपुराण *
| काम उवाच | कामदेवने कहा— जगन्नाथ! क्या आप यह नहीं जानते कि मुनियों और दानवोंको भयभीत करनेवाली इस देवसामग्रीसे देवाधिदेव शङ्करको वशमें कर लेना सहज नहीं है। उन महादेवकी इन्द्रियाँ विकाररहित हैं, इसका भी ज्ञान तो आपको है ही। साथ ही महापुरुषोंकी प्रसन्नता और क्रोध भी महान् होता है। इस समय आप जो सम्पूर्ण उपभोगोंकी सारभूता स्वर्गमें उत्पन्न होनेवाली सुन्दरी अप्सराओं तथा बिना चेष्टा किये ही प्राप्त होनेवाले सुखदायक पदार्थोंका उपभोग कर रहे हैं, वह शङ्करजीके प्रति प्रमाद करनेसे नष्ट हो जायगा। थोड़ा इसपर भी विचार कर लीजिये; क्योंकि सामान्य प्राणियोंको भी कार्यफलकी सम्भावना पहलेसे ही दीखने लगती है। इन्द्रदेव! जो लोग सामान्यको छोड़कर विशेषकी आकाङ्क्षा करते हैं, उनका सामान्यसे पतन हो जाना ही फल है। (विशेष तो अप्राप्त है ही।) कामदेवके इस कथनको सुनकर देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उससे कहा—॥ २१३—२१७॥ |
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| अनया देवसामग्र्या मुनिदानवभीमया।<br>दुःसाध्यः शङ्करो देवः किं न वेत्सि जगत्प्रभो ॥ २१३ | |
| तस्य देवस्य वेत्थ त्वं करणं तु यदव्ययम्।<br>प्रायः प्रसादः कोपोऽपि सर्वो हि महतां महान् ॥ २१४ | |
| सर्वोपभोगसारा हि सुन्दर्यः स्वर्गसम्भवाः।<br>अध्याश्रितं च यत्सौख्यं भवता नष्टचेष्टितम् ॥ २१५ | |
| प्रमादादथ विभ्रंश्येदीदृशं प्रतिविचिन्त्यताम्।<br>प्रागेव चेह दृश्यन्ते भूतानां कार्यसम्भवाः ॥ २१६ | |
| विशेषं काङ्क्षतां शक्र सामान्याद् भ्रंशनं फलम्।<br>श्रुत्वैतद्वचनं शक्रस्तमुवाचामरैर्वृतः ॥ २१७ | |
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— रतिवल्लभ! तुम्हारे इस कथनके लिये हमलोग प्रमाण हैं। तुम्हारे कथनमें कोई संदेह नहीं है, किंतु (निर्मित वस्तुके) आकार-प्रकारके बिना लोहार अथवा कारीगरकी शक्तिका पता नहीं चलता तथा किसीकी भी शक्ति किसी विशेष विषयमें ही सफलरूपसे देखी जाती है, सर्वत्र नहीं। इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर रतिसहित कामदेव सहायकरूपमें अपने मित्र मधुमास (अथवा वसन्त)-को साथ लेकर प्रस्थित हुआ और शीघ्र ही हिमाचलके शिखरपर जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह कार्यकी सिद्धिके लिये उपायपूर्वक चिन्ता करने लगा। उसने सोचा कि जो लोग महान् लक्ष्यसे युक्त और अटल निश्चयवाले हैं, उनके मनको जीतना अत्यन्त कठिन है। अतः सर्वप्रथम उसीको ही संक्षुब्ध कर निश्चयरूपसे विजय प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि पूर्वकालमें मनको शुद्ध करके ही लोगोंने उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। (किंतु कठिनाई तो यह है कि) क्रूरतर प्राणियोंके सङ्गसे अनेकों प्रकारके भावोंद्वारा द्वेषका अनुगमन किये बिना क्रोध कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसके लिये मैं भयंकर ईर्ष्या नामकी महासखीको चपलताके मस्तकपर स्थापित करूँगा, तत्पश्चात् धैर्यके प्रवाहको विध्वस्त करनेवाली, महान् बलवती मनकी उस उत्कृष्ट विकृतिको शङ्करजीपर विनियुक्त करूँगा। |
| वयं प्रमाणस्ते ह्यत्र रतिकान्त न संशयः।<br>संदर्शेन विना शक्तिरयस्कारस्य नेष्यते।<br>कस्यचिच्च क्वचिद् दृष्टं सामर्थ्यं न तु सर्वतः ॥ २१८ | |
| इत्युक्तः प्रययौ कामः सखायं मधुमाश्रितः।<br>रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तु हिमभूभृतः ॥ २१९ | |
| स तु तत्राकरोचिन्तां कार्यस्योपायपूर्वकम्।<br>महार्था ये हि निष्कम्पा मनस्तेषां सुदुर्जयम् ॥ २२० | |
| तदादावेव संक्षोभ्य नियतं सुजयो भवेत्।<br>संसिद्धिं प्राप्नुयुश्चैव पूर्वे संशोध्य मानसम् ॥ २२१ | |
| कथं च विविधैर्भावैर्द्वेषानुगमनं विना।<br>क्रोधः क्रूरतरासङ्गाद् भीषणेष्यों महासखीम् ॥ २२२ | |
| चापल्यमूर्ध्नि विध्वस्तधैर्यधारां महाबलाम्।<br>तामस्य विनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिं पराम् ॥ २२३ |