भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

उत्तरमेघः २८५

गर्जन्ति शरदि न वर्षन्ति, वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।
नीचो वदति न कुरुते, न वदति सुजनः करोत्येव॥

नैषधचरित में इसी भाव का कथन है—
ब्रुवते हि फलेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगिताम्।
(नैषध०, २।४८।)

अलङ्कारः—यहाँ तृतीय चरणोक्त वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण कथित वाक्य के द्वारा होता है। अतः ‘अर्थान्तरन्यास’ नामक अलङ्कार है।

एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे
सौहार्दाद्वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या।
इष्टान्देशान् विचर जलद ! प्रावृषा सम्भृतश्री-
र्माभूदेवं क्षणमपि च ते विद्युता विप्रयोगः ॥५२॥

अन्वयः—हे जलद ! सौहार्दात्, वा, विधुर इति वा, मयि, अनुक्रोशबुद्ध्या, वा, अनुचितप्रार्थनावर्तिनो, मे, एतत्, प्रियम्, कृत्वा, प्रावृषा, संभृतश्रीः, इष्टान्, देशान्, विचर। क्षणमपि, ते, विद्युता, विप्रयोगः, एवम्, मा, भूत् ॥ ५२ ॥

व्याख्या—इदानीं यक्षः स्वकार्यार्थं मेघं प्रार्थमानः तं विसृजति एतदिति। हे जलद !=हे पयोधर ! सौहार्दात् =मित्रभावात्, वा = अथवा, विधुर इति वा =प्रियावियुक्त इति कारणात्, वा =अथवा, मयि=यक्षे, (विषये) अनुक्रोशबुद्ध्या =दयामत्या, वा =अथवा, अनुचितप्रार्थनावर्तिनः=अननुरूपयाचकस्य, मे =यक्षस्य, एतत् = सन्देशहरणरूपम्, प्रियम् =अभिप्सितं कार्यम्, कृत्वा = सम्पादयित्वा; प्रावृषा =वर्षाभिः, संभृतश्रीः =परिवर्धितशोभः सन्, इष्टान् = निजाभिलषितान्, देशान् =प्रान्तान्, विचर =गच्छ, अन्ते च मेघमाशिषमुक्त्वा स्ववक्तव्यं यक्ष उपसंहरति माभूदिति। क्षणमपि =निमेषमात्रमपि, ते =मेघस्य, विद्युता =चपलया, प्रेयसीरूपयेति भावः, विप्रयोगः =वियोगः, एवम् =मत्सदृशम्, माभूत् =न भवेत् ॥ ५२ ॥

१९ मे० दूत०

२८६ | मेघदूतम्

**शब्दार्थः—**हे जलद ! हे मेघ, सौहार्दात् = मित्र भाव से, वा = अथवा, विधुर इति = ( मेरे ) प्रिया वियुक्त होने के कारण, वा = अथवा, मयि = मेरे विषय में, अनुक्रोशबुद्ध्या = करुणाबुद्धि से, अनुचितप्रार्थनावर्तिनः = अनुपयुक्त प्रार्थना करने वाले, मे = मेरे, एतत् = इस सन्देश पहुँचाने रूप, प्रियम् = अभिलषित कार्य को, कृत्वा = करके, प्रावृषा = वर्षारितु के कारण, संभृतश्रीः = समृद्ध शोभा वाला, ( होता हुआ ) इष्टान् = अभिलषित, देशान् = देशों में, विचर = विहार करो ( घूमो ) । अन्त में आशीर्वाद देकर यक्ष अपना वक्तव्य समाप्त करता है । क्षणमपि = एक मिनट भी, ते = तुम्हारा, विद्युता = बिजली से अर्थात् अपनी प्रियतमा से, विप्रयोगः = वियोग, एवं = मेरे जैसा, माभूत् = न हो ॥ ५२ ॥

**भावार्थः—**हे मेघ ! मित्रभावाद्वा, एष प्रिया-विप्रयुक्त इति कारणाद्वा मद्द्विषये करुणाबुद्ध्या वा मत्प्रिया-सन्देशहरणरूपमभीष्टकृत्यं सम्पाद्य वर्षर्तुनोपचितशोभस्त्वं स्वाभिलषितान्देशान् विहर । मत्सदृशः ते विद्युत्कान्ता-वियोगः एकं क्षणमपि न भवेदिति ॥ ५२ ॥

**हिन्दी—**हे मेघ ! मित्र-भाव से, या यह 'प्रिया से बिछुड़ा हुआ है' इस कारण अथवा मेरे विषय में करुणाबुद्धि से अनुचित प्रार्थना करने वाले मेरे इस 'प्रिया सन्देश हरण' रूप अभिलषित कार्य को करके अपने अभिलषित देशों में विहार करो । ( अन्त में यक्ष आशीर्वाद देकर अपना वक्तव्य समाप्त करता है ) ।

मेरे समान तेरा अपनी प्रियतमा बिजली से एक क्षण भी वियोग न हो ॥ ५२ ॥

**समासः—**जलं ददातीति जलदः ( उपपद० ) तत्सम्बुद्धौ । शोभनं हृदयं यस्य सः सुहृत् ( बहु० ) । अनुक्रोशस्य बुद्धिः अनुक्रोशबुद्धिः ( ष० तत्० ) तया न उचिता = अनुचिता ( नञ्० ) अनुचितः चासौ प्रार्थना = अनुचित-प्रार्थना ( कर्म० धा० ) । संभृता श्रीर्यस्य सः सम्भृतश्रीः ( बहु० ) ।

**कोशः—**विधुरन्तु प्रविश्लेषे, इत्यमरः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः । स्त्रियां प्रावृट् स्त्रिया भूम्नि वर्षा, इत्यमरः । कृपाद्याऽनुकम्पा स्यादनुक्रोशः, इत्यमरः ।

उत्तरमेघः २८७

टिप्पणी—जलद—जल उपपद पूर्वक ‘दा’ धातु से ‘क’ प्रत्यय करके धातु के आकार का लोप करके जलद ऐसा रूप बनता है। सुहृत्—यहाँ ‘हृदय’ शब्द के स्थान पर ‘सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः’ इस सूत्र से ‘हृत्’ शब्द निपातन किया जाता है। सुहृदो भावः सौहार्दः यहाँ ‘सुहृत्’ शब्द से अण् प्रत्यय करके ‘हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्व-पदस्य च’ इस सूत्र से ‘सु’ के उ को औ, एवं ‘हृ’ के ऋ को आर्, वृद्धि करके ‘सौहार्दं’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। विधुरम्—‘वि’ उपसर्गपूर्वक ‘धुर्’ शब्द को ‘विगतो धूर्यस्य’ इस उपपद समास के पश्चात् ‘ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे’ इस सूत्र से समासान्त ‘अ’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ शब्द बनता है। पुनः विधुरमस्यास्तीति इस विग्रह में ‘अर्शआदिभ्योऽच्’ इस सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है, जिसका ‘वियुक्त’ अर्थ होता है। अनुचितप्रार्थनावर्तिनः—अनुचितप्रार्थनायां वर्तते तच्छीलः इस विग्रह में अनुचित प्रार्थना उपपद पूर्वक ‘वृत्’ धातु से ‘ताच्छील्य’ अर्थ में ‘णिनि’ प्रत्यय करके ‘अनुचित प्रार्थनावर्ती’ ऐसा शब्द निष्पन्न होता है, प्रकृत रूप षष्ठी विभक्ति का है। प्रार्थना में अनुचित विशेषण देने का तात्पर्य यह है कि कहाँ तो मैं अभिशप्त यक्ष और कहाँ तुम देवताओं के राजा इन्द्र के मन्त्री, प्रधान पुरुष हो और तुमसे प्रिया के पास सन्देश पहुँचाने के लिए प्रार्थना करना अनुचित होता है। क्योंकि कहा गया है—न हि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः। इति।

संभृतश्रीः—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘भृ’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में ‘टाप्’ करके ‘संभृता’ ऐसा रूप बनता है। संभृता श्रीर्यस्य स संभृतश्रीः।

देशान्—यहाँ ‘वि’ उपसर्गपूर्वक विहार अर्थ में विद्यमान अकर्मक ‘चर्’ धातु के योग होने के कारण ‘अकर्मकधातुभिर्योगे देशः कालो भावो गन्तव्योऽध्वा च कर्म इति वाच्यम्’ इस वार्तिक से कर्म संज्ञा हुई है। और ‘कर्मणि द्वितीया’ इस सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है। यह बहुवचन का रूप है। यह ‘चर’ धातु यद्यपि अकर्मक है, परन्तु उक्त कारण से ‘देश’ यह पद ‘विचर’ का कर्म हुआ। उदाहरण-स्वरूप देखिए—‘अधिज्यधन्वाविचचार दावम्’ रघुवंश द्वितीय सर्ग में भी ‘दाव’ यह पद ‘विचचार’ का कर्म है। विप्रयोग

२८८ मेघदूतम्

‘वि’ एवं ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक योगार्थक ‘युज्’ धातु से घञ् प्रत्यय करके ‘विप्र-योग’ रूप निष्पन्न होता है। मा भूत्—यहाँ ‘मा’ के योग में ‘भू’ धातु से आशीर्वाद अर्थ में ‘माङि लुङ्’ इस सूत्र से लुङ् लकार आया है और ‘लुङ्लङ्-लृङ्क्ष्वडुदात्तः’ इस सूत्र से प्राप्त अट् आगम का निषेध ‘न माङ् योगे’ इस सूत्र से हो गया है। यह एकवचन का रूप है।

अलङ्कारः—यहाँ लिङ्ग-साम्य अर्थात् मेघ में पुंलिङ्ग होने के कारण नायकत्व का एवं स्त्रीलिङ्ग होने के कारण ‘विद्युत्’ में नायिकात्व का समारोप होने के कारण ‘समासोक्ति’ नामक अलङ्कार है॥ ५२ ॥

इस प्रकार कविकुलगुरु कालिदास ने वियोगी यक्ष के द्वारा अचेतन मेघ को कहे गये सन्देश-वार्ता संकलन रूप ‘मेघदूत’ की समाप्ति यहीं पर कर दी है। महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने भी यहीं तक के श्लोकों की टीका की है। आगे के श्लोकों द्वारा प्रतिपादित अर्थ की असंभाव्यता के कारण एवं कालिदास की शैली के अभाव के कारण उन्होंने आगे के प्रक्षिप्त श्लोकों की टीका नहीं की है। परन्तु कुछ टीकाकारों ने जिन दो श्लोकों की टीका की है उनकी टीका मैं भी कर दे रहा हूँ।

[ तं संदेशं जलधरवरो दिव्यवाचाऽचचक्षे प्राणांस्तस्या जनहितरतो रक्षितुं यक्षवध्वाः । प्राप्योदन्तं प्रमुदितमनाः साऽपि तस्थौ स्वभर्तुः केषां न स्यादभिमतफला प्रार्थना ह्युत्तमेषु ॥१॥ ]

अन्वयः—जनहितरतः, जलधरवरः, तस्याः, यक्षवध्वाः प्राणान्, रक्षितुम्, दिव्यवाचा, तम्, सन्देशम्, आचचक्षे। सा, अपि, स्वभर्तुः, उदन्तम्, प्राप्य, प्रमुदितमनाः, तस्थौ, हि, उत्तमेषु, प्रार्थना, केषाम्, अभिमतफला, न स्यात् ?

व्याख्या—जनहितरतः = लोककल्याणतत्परः जलधरवरः = मेघश्रेष्ठः, तस्याः = पूर्वकथितायाः, यक्षवध्वाः = यक्षप्रियायाः, प्राणान् = जीवितान्, रक्षितुम् = पालयितुम्, दिव्यवाचा = लोकोत्तरवाण्या, तम् = यक्ष-कथितम्, सन्देशम् = =वार्ताम्, आचचक्षे = उवाच। सा अपि = यक्षप्रिया अपि, स्वभर्तुः = निजप्रियतमस्य

उत्तरमेघः २८९

उदन्तम् = वृत्तान्तम्, प्राप्य = लब्ध्वा, प्रमुदितमनाः = प्रफुल्लहृदया, तस्थौ = स्थिता, हि = यतः, उत्तमेषु = महत्सु (विषये) प्रार्थना = याच्ञा, केषाम् = जना- नाम्, अभिमतफला = प्राप्तकामा, न भवेत् = न स्यात्, सर्वेषाम् प्रार्थना महत्सु लब्धकामा, भवत्येवेति भावः ॥ १ ॥

शब्दार्थः—जनहितरतः = लोकोपकार में लगे, जलधरवरः = श्रेष्ठ मेघ ने, तस्याः = उस, यक्षवध्वाः = यक्षप्रिया के, प्राणान् = प्राणों की, रक्षितुम् = रक्षा के लिए, दिव्यवाचा = अलौकिक वाणी से, तम् = उस यक्ष के द्वारा कहे गये, सन्देशम् = सन्देश को, आचचक्षे = कहा। सा अपि = वह यक्षपत्नी भी, स्वभर्तुः = अपने प्रियतम के, उदन्तम् = वृत्तान्त को, प्राप्य = पाकर, प्रमुदित- मनाः = प्रसन्न हृदय वाली, तस्थौ = हुई। हि = क्योंकि, उत्तमेषु = बड़ों से, प्रार्थना = की गयी याचना, केषाम् = किनकी, अभिमतफला = सफल, न स्यात् = न हो ? अर्थात् सबों की प्रार्थना सफल होती ही है ॥ १ ॥

भावार्थः—लोकोपकारी मेघश्रेष्ठो यक्षपत्न्याः प्राणरक्षार्थं यक्षोक्तं सन्देशं लोकोत्तरवाण्या तस्यै जगाद। यक्ष-प्रियाऽपि स्वभर्तुवृत्तान्तं श्रुत्वा प्रमुदित- मना बभूव। महत्सु केषां प्रार्थना सफला न भवत्यपितु सर्वेषां भवत्येवेति- भावः ॥ १ ॥

हिन्दी—लोक के उपकार में संलग्न श्रेष्ठ मेघ ने उस यक्षपत्नी के प्राणों की रक्षा के लिए यक्ष के द्वारा कहे गये सन्देश को अलौकिक वाणी से यक्षप्रिया को कहा। वह यक्षप्रिया भी अपने पति के वृत्तान्त को सुनकर प्रसन्न मन वाली हो गयी। क्योंकि महापुरुषों से की गयी किसकी प्रार्थना सफल नहीं होती। अर्थात् सबों की होती है।

समासः—जनहितेः रतः=जनहितरतः (स० तत्०), जलानां धराः = जल- धराः ( ष० तत्० ) तेषु श्रेष्ठः जलधरश्रेष्ठः ( स० तत्० )। यक्षस्य वधूः यक्षवधूः ( ष० तत्० ) तस्याः। दिव्या चासौ वाक् = दिव्यवाक् (कर्म० धा०) तया। स्वस्य भर्ता = स्वभर्ता ( ष० तत्० ) तस्य। प्रमुदितं मनो यस्याः सा प्रमुदितमना ( बहु० )। अभिमतं फलं यस्याः सा अभिमतफला ( बहु० )।

२९० मेघदूतम्

**कोशः—**योषा नारी सीमन्तनी वधूः, इत्यमरः। सन्देशवाक् वाचिकं स्यात्, इत्यमरः। वार्ताप्रवृत्तिवृत्तान्तमुदन्तं स्यात्, इत्यमरः। स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः।

टिप्पणी—जनहितरतः—'जनेभ्यो हितम्' यहाँ जन शब्द से हित के योग में 'हितयोगे च' इस सूत्र से चतुर्थी विभक्ति आयी है। पश्चात् 'चतुर्थी तदर्थार्थ-बलि-हित-सुखरक्षितैः' इस सूत्र से चतुर्थी समास होकर 'भ्यस्' का लोप किया गया है। 'पश्चात् सप्तमी समास किया गया है। **जलधर—**धरतीति धराः 'धृ' धातु से पचाद्यच् करके 'धराः' ऐसा रूप बनता है और उसके योग में 'कर्तृकर्मणोः कृति' इस सूत्र से 'जल' शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई है। यहाँ यदि द्वितीया समास किया गया तो 'कर्मण्यण्' इस सूत्र से अण् प्रत्यय होकर णित्वात् धातु के आकार को वृद्धि होने लगेगी। यदि 'जलधार' रूप स्वीकार कर भी लिया जाय तो छन्दोभङ्ग होने लगेगा। रक्षितुम्—'रक्ष्' धातु से 'तुमुन्' प्रत्यय करके 'रक्षितुम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। आचचक्षे—'आङ्' उपसर्गपूर्वक चक्ष् ( इङ् ) धातु के लिट् लकार का 'आचचक्षे' रूप है। ङित्वात् आत्मनेपद हुआ है। प्राप्य—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान में 'ल्यप्' करके 'प्राप्य' ऐसा रूप बनता है। तस्थौ—'स्था' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है 'तस्थौ'।

**अलङ्कारः—**यहाँ तृतीय चरणोक्त विशेष अर्थ का चतुर्थ चरणोक्त सामान्य के द्वारा समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है।

श्रुत्वा वार्तां जलदकथितां तां धनेशोऽपि सद्यः शापस्यान्तं सदयहृदयः संविधायाऽस्तकोपः । संयोज्यैतौ विगलितशुचौ दम्पती हृष्टचित्तौ, भोगानिष्टानविरतसुखं भोजयामास शश्वत् ॥ २ ॥

**अन्वयः—**धनेशः, अपि, जलदकथिताम्, ताम्, वार्ताम्, श्रुत्वा, सदयहृदयः

उत्तरमेघः २९१

अस्तकोपः, सद्यः, शापस्य, अन्तम्, संविधाय, विगलितशुचौ, हृष्टचित्तो, एतौ, दम्पती, संयोज्य, इष्टान्, भोगान्, अविरतसुखम्, शश्वत्, भोजयामास ॥२॥

व्याख्या—धनेशः अपि = कुबेरोऽपि, जलदकथिताम् = मेघव्याहृताम्, ताम् = पूर्व-प्रतिपादिताम्, वार्ताम् = प्रवृत्तिम्, श्रुत्वा = आकर्ण्य, सदयहृदयः = सकरुणचित्तः, अस्तकोपः = विगतमन्युः, सन्, सद्यः = तत्क्षण एव, शापस्य = शपनस्य, अन्तम् = समाप्तिं, संविधाय = कृत्वा, विगलितशुचौ = अपगतशोको, हृष्टचित्तौ = प्रसन्नहृदयौ; एतौ = पूर्वोक्तो, दम्पती = जायापती, अज्ञातनामानं यक्षं तस्य पत्नीञ्च, संयोज्य = सम्मेल्य, इष्टान् = प्रियान्, भोगान् = भोग्यपदार्थान्, अविरतसुखम् = निरन्तरसुखम्, यथा स्यात्तथा, शश्वत् = पुनः पुनः, भोजयामास = अनुभवायाम्बभूव ॥ २ ॥

शब्दार्थः—धनेशः = कुबेर, अपि = भी, जलद-कथिताम् = मेघ के द्वारा कहे गये, ताम् = उस, वार्ताम् = सन्देश को, श्रुत्वा = सुनकर, सदयहृदयः = करुणहृदय, अतएव; अस्तकोपः = शान्तक्रोध (वाला होकर) सद्यः = तुरत ही; शापस्य = (अपने द्वारा दिये गये) शाप का, अन्तम् = अन्त, संविधाय = करके, विगलितशुचौ = विनष्ट शोक वाले, अतएव, प्रहृष्टचित्तौ = प्रसन्न मन वाले, एतौ = इन, दम्पती = पति-पत्नी को, संयोज्य = मिलाकर, इष्टान् = अभिलषित, भोगान् = भोग्य पदार्थों का, अविरतसुखम् = जिस प्रकार निरन्तर सुख मिलता रहे, शश्वत् = बार-बार, भोजयामास = उपभोग कराया ॥ २ ॥

भावार्थः—कुबेरोऽपि मेघोक्तं यक्षसन्देशमाकर्ण्य सकरुणः विगतमन्युः सन् शापस्य तत्क्षणमेवावसानं कृत्वा निर्गतशोको प्रसन्नमानसावेतौ जायापती सम्मेल्य निरन्तरं यथाऽऽनन्दं स्यात्तथा पुनः पुनः अभिलषितभोग्यपदार्थान् भोजयामास ॥ २ ॥

हिन्दी—कुबेर भी मेघ द्वारा कहे गये यक्ष के सन्देश को सुनकर करुणा से शान्त क्रोध वाला होकर अपने शाप को तुरंत समाप्त करके विनष्ट-दुःख वाले अतः प्रसन्न हृदय वाले उन दोनों यक्ष एवं उसकी पत्नी को मिलाकर जिससे उन्हें सर्वदा आनन्द मिलता रहे, इस प्रकार पुनः पुनः उन दोनों को अभिलषित भोग्य पदार्थों का उपभोग कराया ।

समासः—दयया सहितम् = सदयम् (तुल्ययोग बहु०)। सदयं हृदयं यस्य

२९२ मेघदूतम्

सः सदयहृदयः (बहु०) । अस्तः कोपो यस्मात्सः अस्तकोपः (बहु०) । विगलिता शुक्=भयस्तौ विगलितशुचौ ( बहु० ) । जाया च पति च दम्पत्ती (द्वन्द्व) तौ । न विरतम् = अविरतम् ( नञ्० ) । अविरतं सुखं यस्मिन् तद्यथा स्यात्तथा अविरतसुखम् ( बहु० ) ।

कोशः—दम्पती जम्पती जायापती भार्यापती च तौ, इत्यमरः। सतता-ऽनारताऽश्रान्तसन्तताऽविरताऽनिशम्, इत्यमरः।

टिप्पणीअस्त—अस् धातु से क्त प्रत्यय करके ‘अस्त’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। हृष्टः—हृष् धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ष्टुत्व आदि करके ‘हृष्टः’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। दम्पती—जाया च पतिश्च इस विग्रह में द्वन्द्व समास होने के पश्चात् ‘राजदन्तादिषु परम्’ इस सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘दम्’ भाव निपातन होता है, तब दम्पती यह रूप बनता है। जहाँ उसी सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘जम्’ भाव निपातन होता है वहाँ ‘जम्पती’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। संयोज्य—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘युज्’ धातु से ‘णिच्’ प्रत्यय करके धातु संज्ञा करके पश्चात् क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में ‘ल्यप्’ आदेश करके ‘संयोज्य’ ऐसा रूप उपपन्न होता है। भोजयामास—णिजन्त ‘भोजी’ धातु से लिट् लकार लाकर पुनः तिप् णलादि करके उसका लोप इत्यादि करके आम आदि लाकर, पुनः ‘कृञ् चानुपयुज्यते लिटि’ इस सूत्र से लिट् परक ‘अस्’ का अनुप्रयोग करके गुण अयादेश आदि करके, ‘भोजयामास’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है ॥ २ ॥

इति शम् ॥

सीता-महो-मण्डल-मध्यवर्ती,
ग्रामोऽलपूरा' बुधवास-भूमिः ।
निवासिना तस्य कृताऽत्र टीका,
श्रीवैद्यनाथेन प्रपूरितैषा ॥

इति श्रीकविकुलगुरुमहाकविकालिदास विरचित-मेघदूतस्य मधुवनीमण्डलान्त-र्गत ‘अलपूरा’ ग्राम-निवासिना झोपाह्ववैद्यनाथेन कृतया ‘इन्दुकला’ टीकया भगवान् विश्वेश्वरः प्रसीदतु ॥
इति शम् ॥

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page) है।

इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है (यह पृष्ठ रिक्त है)।