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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

यात्राप्रकरण १७३ पन्थाराहुचक्र | धर्ममार्ग | अ० | पु० | आश्ले० | वि० | अनु० | ध० | श० | | अर्थमार्ग | भ० | पुन० | म० | स्वा० | ज्ये० | श्र० | पू०भा० | | काममार्ग | कृ० | आ० | पू० फा० | चि० | मू० | अभि० | उ०भा० | | मोक्षमार्ग | रो० | मृ० | उ० फा० | ह० | पू० फा० | उ०फा० | रे० | पन्थाराहुचक्रफल धर्मगे भास्करे वित्तमोक्षे शशी वित्तगे धर्ममोक्षस्थितिः शस्यते । कामगे धर्ममोक्षार्थगः शोभनो मोक्षगे केवलं धर्मगः प्रोच्यते ॥ १९ ॥ अन्वयः—धर्मगे भास्करे, वित्तमोक्षे शशी शस्यते; वित्तगे भास्करे, धर्ममोक्ष- स्थितः शशी; कामगे भास्करे, धर्ममोक्षार्थगः शशी शोभनः; मोक्षगे भास्करे, केवलं धर्मगः शशी शोभनः प्रोच्यते ॥ १९ ॥ धर्ममार्ग में सूर्य हो और अर्थमार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा अर्थमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा काममार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग या अर्थमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा मोक्षमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, और इससे विपरीत अशुभ है ॥ १९ ॥ पौषादि मासों की परीवादि तिथियों में पूर्वादि दिशाओं की यात्रा का शुभाशुभ फल पौषे पक्षत्यादिका द्वादशैकं तिथ्यो माघादौ द्वितीयादिकास्ताः । कामात्तिस्रः स्युस्तृतीयादिवच्च याने प्राच्यादौ फलं तत्र वक्ष्ये ॥ २० ॥ सौख्यं क्लेशो भीतिरर्थागमश्च शून्यं नैस्वं निस्स्वता मिश्रता च । द्रव्यक्लेशो दुःखमिष्टाप्तिरर्थो लाभः सौख्यं मङ्गलं वित्तलाभः ॥ २१ ॥ लाभो द्रव्याप्तिर्धनं सौख्यमुक्तं भीतिर्लाभो मृत्युरर्थागमश्च । लाभः कष्टं द्रव्यलाभः सुखं च कष्टं सौख्यं क्लेशलाभः सुखं च ॥ २२ ॥ सौख्यं लाभः कार्यसिद्धिश्च कष्टं क्लेशः कष्टात्सिद्धिरर्थो धनं च । मृत्युर्लाभो द्रव्यलाभश्च शून्यं शून्यं सौख्यं मृत्युरत्यन्तकष्टम् ॥ २३ ॥

१७४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—पौषे पक्षत्यादिकाः द्वादश तिथ्यः, एवं माघादौ द्वितीयादिकाः ताः [तिथ्यः], च कामात् तिस्रः तृतीयादिवत् ज्ञेयाः । तत्र प्राच्यादौ याने फलं वक्ष्ये । श्लोकक्रमेणैव सुगमः । इदं प्राच्यादौ याने क्रमेण फलं ज्ञेयम् ॥ २०-२३ ॥ खड़ी खींची हुई तेरह रेखाओं के ऊपर आड़ी चौदह रेखा ऐसी खींचे कि जिनसे एकसौ छप्पन कोठोंवाला एक चक्र बन जावे । तदनन्तर उस चक्र की ऊपरवाली पहिली पंक्ति में पौषादि बारह महीने लिखे । उन महीनों में से पौष के नीचे बारह कोठों में क्रम से परीवा से लेकर द्वादशीपर्यन्त बारह तिथियाँ लिखे और जिन कोठों में तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, ये तीन तिथियाँ हों उन्हीं कोठों में त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, ये तीन तिथियाँ भी क्रम से लिखे । ऐसे ही माघ आदि मासों में द्वितीया से लेकर परीवा पर्यन्त बारह तिथियाँ क्रम से और तृतीया आदि तीन तिथियों के कोठों में त्रयोदशी आदि तीन तिथियाँ क्रम से लिखे । वे सब आगे चक्र में स्पष्ट होंगी । अब उन तिथियों में पूर्व आदि दिशाओं के यात्रा करने का फल कहते हैं ॥ २० ॥ पौष की परीवा तिथि में पूर्व दिशा को यात्रा करने में सौख्य, दक्षिण में क्लेश, पश्चिम में भय, उत्तर में धन का लाभ होता है; द्वितीया में पूर्वदिशा में शून्य फल, दक्षिण में धन की हानि, पश्चिम में धन की हानि, उत्तर में मिश्रता अर्थात् कभी हानि, कभी लाभ होता है; तृतीया में पूर्व में द्रव्यक्लेश, दक्षिण में दुःख पश्चिम में वाञ्छित वस्तु का लाभ, उत्तर में धन होता है; चतुर्थी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मंगल, उत्तर में धनलाभ होता है ॥ २१ ॥ पञ्चमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में द्रव्यलाभ, पश्चिम में धन, उत्तर में सौख्य होता है; छठि में पूर्व में भय, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में मरण, उत्तर में धनलाभ होता है; सप्तमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में कष्ट, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में सुख होता है; अष्टमी में पूर्व में कष्ट, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में क्लेश, उत्तर में सुख होता है ॥ २२ ॥ नवमी में पूर्व में सौख्य, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में कार्यसिद्धि, उत्तर में कष्ट होता है; दशमी में पूर्व में क्लेश, दक्षिण में कष्ट से सिद्धि, पश्चिम में धन, उत्तर में धन होता है और एकादशी में पूर्व में मरण, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में शून्य फल होता है; द्वादशी में पूर्व में शून्य फल, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मरण, उत्तर में अत्यन्त कष्ट होता है; त्रयोदशी आदि तीन तिथियों का फल तृतीया आदि तीन तिथियों के समान होता है और माघ आदि महीनों की द्वितीया आदि तिथियों का भी यही फल है । सो भी चक्र में स्पष्ट है ॥ २३ ॥

यात्राप्रकरण १७५ तिथिचक्र

पौ०मा०फा०चै०वै०ज्ये०आ०श्रा०भा०कु०का०आ०पूर्वदक्षिणपश्चिमउत्तर
३।१३४।१४५।१५१०१११२सौख्यक्लेशभीतिअर्थागम
३।१३४।१४५।१५१०१११२शून्यनैःस्वनैःस्वमिश्रता
३।१३४।१४५।१५१०१११२द्रव्यक्लेशदुःखइष्टाप्तिअर्थ
४।१४५।१५१०१११२३।१३लाभसौख्यमंगलवित्तलाभ
५।१५१०१११२३।१३४।१४लाभद्रव्याप्तिधनसौख्य
१०१११२३।१३४।१४५।१५भीतिलाभमृत्युअर्थागम
१०१११२३।१३४।१४५।१५लाभकष्टद्रव्यलाभसुख
१०१११२३।१३४।१४५।१५कष्टसौख्यक्लेशलाभसुख
१०१११२३।१३४।१४५।१५सौख्यलाभकार्यसिद्धिकष्ट
१०१११२३।१३४।१४५।१५क्लेशकष्ट से सि०अर्थधन
१११२३।१३४।१४५।१५१०मृत्युलाभद्रव्यलाभशून्य
१२३।१३४।१४५।१५१०११शून्यसौख्यमृत्युअत्यन्त कष्ट

१७६ मुहूर्त्तचिन्तामणि सर्वाङ्क योग तिथ्यक्षर्वारयुतिरद्रिगजाग्नितष्टा स्थानत्रयेत्र वियति प्रथमेऽतिदुःखी । मध्ये धनक्षतिरथो चरमे मृतिः स्या- त्स्थानत्रयेऽङ्कयुजि सौख्यजयौ निरुक्तौ ॥ २४ ॥ अन्वयः—तिथ्यक्षर्वारयुतिः स्थानत्रये अत्र (स्थाप्या) (क्रमेण) अद्रिगजाग्नितष्टा प्रथमे [स्थाने] वियति शून्ये सति अतिदुःखी स्यात्, मध्ये वियति (सति) धनक्षतिः स्यात्, अथो चरमे वियति मृतिः स्यात्, स्थानत्रये अंकयुजि (सति) सौख्यजयौ निरुक्तौ ॥ २४ ॥ जिस दिन यात्रा करना हो उस दिन शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जो तिथि हो, अश्विनी से लेकर जो नक्षत्र हो और रविवार से लेकर जो दिन हो, उन सबकी संख्याओं के योग को तीन स्थानों में रखे । प्रथम स्थान में सात का, दूसरे स्थान में आठ का, तीसरे स्थान में तीन का भाग दे । उन तीनों स्थानों में या प्रथम स्थान में शून्य शेष रहे तो यात्रा करने- वाला अतिदुःखी होता है, दूसरे स्थान में शून्य शेष रहे तो धन की हानि और तीसरे स्थान में शून्य बचे तो मृत्यु होती है । तीनों स्थानों में यदि अंक शेष हों तो यात्रा करनेवाला सुखी तथा विजयी होता है । उदाहरण—जैसे कार्त्तिक शुक्ल द्वितीया को मंगल दिन, अनुराधा नक्षत्र में यात्रा करना है । यहाँ तिथि की संख्या २, दिन की संख्या ३, नक्षत्र की संख्या १७ हुई । इन सबका योग २२ हुआ । इसको तीन स्थानों में रखे । प्रथम स्थान में सात का भाग देने से एक, दूसरे स्थान में आठ का भाग देने

यात्राप्रकरण १७७ सात का भाग दे। यदि दो अथवा सात शेष रहें तो महाडल दोष होता है, और यदि तीन अथवा छः शेष रहें तो भ्रमण दोष होता है। ये दोनों दोष यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ २५ ॥ हिम्बराख्य योग शशाङ्कभं सूर्यभतोऽत्र गण्यं पक्षादितिथ्या दिनवासरेण । युतं नवाप्तं नगशेषकं चेत्स्याद्धिम्बरं तद्गमनेऽतिशस्तम् ॥ २६ ॥ अन्वयः-सूर्यभतः शशाङ्कभं अत्र गण्यं [तत्] पक्षादितिथ्या दिनवासरेण युतं नवाप्तं चेत् नगशेषकं तदा हिम्बरं स्यात् तत् गमने अतिशस्तं स्यात् ॥ २६ ॥ सूर्य के नक्षत्र से चन्द्रमा के नक्षत्र पर्यन्त जितनी संख्या हो, उसमें शुक्ल या कृष्ण पक्ष की वर्त्तमान तिथि की संख्या जोड़कर नव का भाग देने से यदि सात शेष रहें तो हिम्बरयोग होता है यह यात्रा में अति शुभ होता है ॥ २६ ॥ घातचन्द्र योग भूपञ्चाङ्कद्वयङ्गदिग्वह्निसप्तवेदाष्टेशार्काश्च घा

१७८ मुहूर्त्तचिन्तामणि रूपद्वग्न्यग्निभूरामं द्वयब्ध्यग्न्यब्धियुगाग्नयः । घातचन्द्रे धिष्ण्यपादा मेषाद्वर्ज्या मनीषिभिः ॥ २९ ॥ अन्वयः—आग्नेयत्वाष्ट्रजलपपित्र्यवासवरौद्रभे मूलब्राह्म्याजपादक्षं पित्र्यमूलाजभे क्रमात् मेषादीनां (घातको ज्ञेयः) । मेषात्घातचन्द्रे (क्रमात्) रूपद्वग्न्यग्निभूराम- द्वयब्ध्यग्न्यब्धियुगाग्नयः धिष्ण्यपादाः मनीषिभिः वर्ज्याः ॥ २८-२९ ॥ मेष राशिवाले को कृत्तिका का पहिला चरण घातक है, वृष राशिवाले को चित्रा का दूसरा पाद घातक है, मिथुन राशिवाले को शतभिष का तीसरा पाद घातक है, कर्क राशिवाले को मघा का तीसरा पाद घातक है, सिंह राशिवाले को धनिष्ठा का पहिला पाद घातक है, कन्या राशिवाले को आर्द्रा का तीसरा पाद घातक है, तुला राशिवाले को मूल का दूसरा पाद घातक है, वृश्चिक राशिवाले को रोहिणी का चौथा पाद घातक है, धनु राशिवाले को पूर्वाभाद्रपद का तीसरा पाद घातक है, मकर राशिवाले को मघा का चौथा पाद घातक है, कुम्भ राशिवाले को मूल का दूसरा पाद घातक है और मीन राशिवाले को पूर्वाभाद्रपद का तीसरा पाद घातक होता है। ये कृत्तिका आदि के घातपाद यात्रा आदि में पण्डितों को वर्जित करना चाहिए ॥ २८-२९ ॥ घातक नक्षत्रपाद चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०राशि
कृ०चि०श०म०ध०आ०मू०रो०पू० भा०म०मू०पू० भा०नक्षत्र
पाद
घातक तिथियाँ
गोस्त्रीझषे घाततिथिस्तु पूर्णा भद्रा नृयुक्कर्कटकेऽथ नन्दा ।
कौर्प्याजयोर्नक्रघटे च रिक्ता जया धनुः कुम्भहरौ न शस्ता ॥ ३० ॥
अन्वयः—गोस्त्रीझषे पूर्णा घाततिथिः (स्यात्) तु (तथा) नृयुक्कर्कटके भद्रा घात-
तिथिः, अथ कौर्प्याजयोः नन्दा, नक्रघटे रिक्ता, धनुः कुम्भहरौ जया घाततिथिः (ताः)
न शस्ताः (स्युः) ॥ ३० ॥
वृष, कन्या और मीन राशिवाले को पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी,
अमावास्या ये तिथियाँ घातक हैं । मिथुन और कर्क राशिवाले को द्वितीया,
सप्तमी और द्वादशी घातक हैं । वृश्चिक और मेष राशिवाले को परीवा,
छठि और एकादशी । मकर और तुला राशिवाले को चौथि नवमी और

यात्राप्रकरण १७९ चतुर्दशी। धनु, कुम्भ और सिंह राशिवाले को तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी ये तिथियाँ घातक हैं। इस कारण यात्रा आदि में वर्जित हैं ॥ ३० ॥ घाततिथि चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०राशि
१०१०१०घात
१११५१२१२१३१५१४१११३१४१३१५तिथि

घातक वार नक्रे भौमो गोहरिस्त्रीषु मन्दश्चन्द्रो द्वन्द्वेडर्कोजभे ज्ञश्च कर्के। शुक्रः कोदण्डालिमीनेषु कुम्भजूके जीवो घातवारा न शस्ताः ॥ ३१ ॥ अन्वयः—नक्रे भौमः, गोहरिस्त्रीषु मन्दः, द्वन्द्वे चन्द्रः, अजभे अर्कः, च (तथा) कर्के ज्ञः, कोदण्डालिमीनेषु शुक्रः, कुम्भजूके जीवः, (इमे) घातवाराः न शस्ताः स्युः ॥ ३१ ॥ मकर राशिवालों को मङ्गल; वृष, सिंह और कन्या राशिवालों को शनैश्चर; मिथुन राशिवालों को सोमवार; मेष राशिवालों को रविवार; कर्क राशिवालों को बुध; धनु, मीन और वृश्चिक राशिवालों को शुक्र; तुला और कुम्भ राशिवालों को बृहस्पतिवार घातक होता है। ये यात्रा आदि शुभ कार्य में निषिद्ध हैं ॥ ३१ ॥ घातवार चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०राशि
सू०श०चं०बु०श०श०बृ०शु०शु०मं०बृ०शु०घातवार

घातक नक्षत्र मघाकरस्वातिमैत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभम् । याम्यब्राह्मयेशसार्पञ्च मेषादेर्घातभं न सत् ॥ ३२ ॥ अन्वयः—मघाकरस्वातिमैत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभं च (तथा) याम्यब्राह्मयेशसार्पं मेषादेः (क्रमात्) घातभं न सत् ॥ ३२ ॥ मेष राशिवालों को मघा, वृष राशिवालों को हस्त, मिथुन राशिवालों को स्वाती, कर्क राशिवालों को अनुराधा, सिंह राशिवालों को मूल, कन्या राशिवालों को श्रवण, तुला राशिवालों को शतभिष, वृश्चिक राशिवालों को रेवती, धनु राशिवालों को भरणी, मकर राशिवालों को रोहिणी, कुम्भ

१८० मुहूर्तचिन्तामणि राशिवालों को आर्द्रा और मीन राशिवालों को आश्लेषा नक्षत्र घातक होता है। ये यात्रा आदि में निषिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ घातनक्षत्र चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०राशि
म०ह०स्वा०अनु०मू०श्र०श०रे०भ०रो०आ०श्ले०घातनक्षत्र
तिथियोगिनी
नव ९ भूम्यः १ शिव ११ वह्नयो ३ ऽक्ष ५ विश्वे १३
ऽर्क १२ कृताः ४ शक्र १४ रसा ६ स्तुरङ्ग ७ तिथ्यः १५ ।
द्वि २ दिशो १० ऽमा ३० वसवश्च ८ पूर्वतः स्यु-
स्तिथयः सम्मुखवामगा न शस्ताः ॥ ३३ ॥
अन्वयः—नवभूम्यः, शिववह्नयः, अक्षविश्वे, अर्ककृताः, शक्ररसाः, तुरंगतिथ्यः,
द्विदिशः च (तथा) अमावसवः इमाः तिथयः पूर्वतः (पूर्वदिशमारभ्य क्रमेण) स्युः, एताः
सम्मुखवामगाः न शस्ताः (भवन्ति) ॥ ३३ ॥
नवमी, परीवा पूर्व में; एकादशी, तृतीया आग्नेय में; पञ्चमी, त्रयोदशी
दक्षिण में; द्वादशी, चौथि नैर्ऋत्य में; चतुर्दशी, छठि पश्चिम में; सप्तमी,
पूर्णमासी वायव्य में; द्वितीया, दशमी उत्तर में, अमावास्या, अष्टमी ईशान
दिशा में योगिनी-संज्ञक तिथियाँ हैं। यात्रा आदि में ये सम्मुख और वामभाग
में शुभ नहीं हैं ॥ ३३ ॥
तिथियोगिनी चक्र
ई० ८ । ३०पू० ९ । १आ० ३ । ११
:---::---::---:
उ० २ । १०तिथियोगिनीद० ५ । १३
वा० ७ । १५प० ६ । १४नै० ४ । १२
घातलग्न
भूमि १ द्वय २ ब्ध्य ४ द्रि ७ दिक् १० सूर्या १२
ङ्ग ६ ष्टा ८ ङ्के ९ शा ११ ग्नि ३ सायकाः ५ ।
मेषादिघातलग्नानि यात्रायां वर्जयेत्सुधीः ॥ ३४ ॥

यात्राप्रकरण १८१ अन्वयः-भूमिद्वयब्ध्यद्रिदिक्सूर्याङ्गाष्टांकेशाग्निशायकाः (क्रमात्) मेषादिघात- लग्नानि सुधीः यात्रायां वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ मेष राशिवालों को मेष, वृषराशिवालों को वृष, मिथुन राशिवालों को कर्क, कर्क राशिवालों को तुला, सिंह राशिवालों को मकर, कन्या राशिवालों को मीन, तुला राशिवालों को कन्या, वृश्चिक राशिवालों को वृश्चिक, धनु राशिवालों को धनु, मकर राशिवालों को कुम्भ, कुम्भ-राशिवालों को मिथुन, मीन राशिवालों को सिंह लग्न घातक है। पण्डित को चाहिए कि यात्रा में इन लग्नों का त्याग करे ॥ ३४ ॥ घातलग्न चक्र

मे०वृ०म०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०राशि
मे०वृ०क०तु०म०मी०कं०वृ०ध०कुं०मि०सिं०घातलग्न

कालपाश योग कौबेरीतो वैपरीत्येन कालो वारेऽर्काद्य सम्मुखे तस्य पाशः । रात्रावेतौ वैपरीत्येन गण्यौ यात्रायुद्धे सम्मुखे वर्जनीयौ ॥ ३५ ॥ अन्वयः-कौबेरीतः (उत्तरदिशमारभ्य क्रमेण) अर्काद्ये वारे कालः (स्यात्) तस्य सम्मुखे पाशः (स्यात्) एतौ [कालपाशौ] रात्रौ वैपरीत्येन गण्यौ (तौ) यात्रायुद्धे सम्मुखे वर्जनीयौ ॥ ३५ ॥ रविवार आदि में उत्तर दिशा से लेकर विपरीतक्रम से काल रहता है, अर्थात् रविवार के दिन उत्तर में, सोमवार के दिन वायव्य में, मंगल के दिन पश्चिम में, बुध के दिन नैर्ऋत्य में, बृहस्पति के दिन दक्षिण में, शुक्र के दिन आग्नेय में, शनैश्चर के दिन पूर्व दिशा में काल रहता है, और काल के सम्मुख पाश रहता है, अर्थात् रविवार के दिन दक्षिण में, सोमवार के दिन आग्नेय में, मंगल के दिन पूर्व में, बुध के दिन ईशान में, बृहस्पति के दिन उत्तर में, शुक्र के दिन वायव्य में, शनैश्चर के दिन पश्चिम दिशा में पाश रहता है। ये दोनों रात्रि में इससे विपरीत रहते हैं। जैसे रविवार की रात्रि में काल दक्षिण में और पाश उत्तर में रहता है। ऐसे ही सोमवार आदि में भी जानना चाहिए। ये दोनों यात्रा तथा युद्ध में सम्मुख वर्जनीय हैं ॥ ३५ ॥

१८२ मुहूर्तचिन्तामणि कालपाशचक्र

र०चं०मं०बु०बृ०शु०श०वार
उ०वा०प०नै०द०आ०पू०दिशा दिन में काल
द०आ०पू०ई०उ०वा०प०दिशा दिन में पाश
द०आ०पू०ई०उ०वा०प०दिशा रात्रि में काल
उ०वा०प०नै०द०आ०पू०दिशा रात्रि में पाश
परिघदण्ड दोष
पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु सप्तसप्तानलर्क्षतः ।
वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लङ्घयेत् ॥ ३६ ॥
अन्वयः-अनलर्क्षतः सप्त सप्त [नक्षत्राणि] पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु (ज्ञेयानि) (तत्र)
वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लंघयेत् ॥ ३६ ॥
चतुष्कोण चक्र बनाकर उसमें कृत्तिका से लेकर सात सात नक्षत्र चारों
दिशाओं में लिखे, अर्थात् कृत्तिका से श्लेषा तक पूर्व में, मघा से विशाखा
तक दक्षिण में, अनुराधा से श्रवण तक पश्चिम में और धनिष्ठा से भरणी
तक उत्तर में। उसी चक्र में वायव्य कोण से आग्नेय कोण में गई हुई रेखा
का परिघदण्ड नाम है यात्रा में उसका उल्लंघन न करे, अर्थात् उत्तर
और पूर्व दिशा के नक्षत्रों में दक्षिण और पश्चिम की यात्रा तथा दक्षिण
और पश्चिम दिशा के नक्षत्रों में उत्तर और पूर्व दिशा की यात्रा न
करे ॥ ३६ ॥
परिघदण्ड चक्र
पूर्व
कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले.
उत्तर म. पू. उ. ह. चि. स्वा. वि. दक्षिण
ध. श. पू. उ. रे. अ. भ. परिघदण्ड
अ. अ. मू. पू. उ. श्र.
पश्चिम

यात्राप्रकरण १८३ आग्नेयादि कोणों की यात्रा तथा परिघदण्ड का अपवाद अग्नेर्दिशं नृप इयात्पुरुहूतदिग्भै- रेवं प्रदक्षिणगता विदिशोऽथ कृत्ये । आवश्यकेऽपि परिघं प्रविलङ्घ्य गच्छे- च्छूलं विहाय यदि दिक्तनशुद्धिरस्ति ॥ ३७॥ अन्वयः—नृपः पुरुहूतदिग्भैः अग्नेः दिशं इयात्, एवं प्रदक्षिणगताः विदिशः (इयात्), अथ आवश्यके कृत्ये शूलं विहाय यदि दिक्तनशुद्धिः अस्ति, तदा परिघं प्रविलंघ्य अपि गच्छेत् ॥ ३७॥ राजा को चाहिए कि पूर्व दिशा के नक्षत्रों में आग्नेय कोण की यात्रा करे, दक्षिण दिशा के नक्षत्रों में नैर्ऋत्य कोण की, पश्चिम दिशा के नक्षत्रों में वायव्य कोण की, और उत्तर दिशा के नक्षत्रों में ईशान कोण की यात्रा करे । यदि कोई अत्यावश्यक कार्य हो तो दिक्शूल और परिघदण्ड का उल्लंघन करके भी यात्रा करे । यदि दिग्लग्न शुद्ध हो, अर्थात् मेषादि चार चार राशियां पूर्वादि चारों दिशाओं की स्वामिनी हैं, इस क्रम से यदि लग्न सम्मुख पड़ती हो और लग्न से आठवें आदि स्थानों में कोई अनिष्ट ग्रह न हो । यथा श्रवण नक्षत्र में पूर्व की यात्रा आवश्यक हो तो मेष या सिंह या धन लग्न में करे ॥ ३७ ॥ परिघदण्ड का अन्य अपवाद तथा केन्द्र आदि स्थानों में वक्रीग्रह का निषेध मैत्रार्कपुष्याश्विनिभैर्निरुक्ता यात्रा शुभा सर्वदिशासु तज्ज्ञैः । वक्रीग्रहः केन्द्रगतोऽस्यवर्गो लग्ने दिनं चास्य गमे निषिद्धम् ॥ ३८ ॥ अन्वयः—मैत्रार्कपुष्याश्विनिभैः सर्वदिशासु तज्ज्ञैः यात्रा शुभा निरुक्ता । वक्री ग्रहः केन्द्रगतः (वा) लग्ने अस्य वर्गः च अस्य दिनं गमे निषिद्धम् ॥ ३८ ॥ अनुराधा, हस्त, पुष्य, अश्विनी इन नक्षत्रों में सब दिशाओं की यात्रा पण्डितों ने शुभ कही है । केन्द्र में और लग्न में स्थित वक्रीग्रह का षड्वर्ग और वक्रीग्रह का दिन, ये सब यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ ३८ ॥ अयनशुद्धि सौम्यायने सूर्यविधू तदोत्तरां प्राचीं व्रजेत्तौ यदि दक्षिणायने । प्रत्यग्यमाशां च तयोर्दिवानिशं भिन्नायनत्वेऽथ वधोऽन्यथा भवेत् ॥ ३९ ॥

१८४ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—यदि सूर्यविधू सौम्यायने तदा उत्तरां प्राचीं व्रजेत्, यदि तौ दक्षिणायने तदा प्रत्यग्यमाशां व्रजेत् । अथ च तयोः भिन्नायनत्वे दिवानिशं व्रजेत्, अन्यथा वधः भवेत् ॥ ३६ ॥ जब सूर्य और चन्द्रमा उत्तरायण में हों तब उत्तर और पूर्व की यात्रा, और जब दक्षिणायन में हों तब पश्चिम और दक्षिण की यात्रा करे, और यदि सूर्य और चन्द्रमा का अयन भिन्न हो, अर्थात् एक दक्षिणायन और दूसरा उत्तरायण हो तो कहे हुए क्रम से सूर्य के अयन की दिशाओं की यात्रा दिन में और चन्द्रमा के अयन की दिशाओं की यात्रा रात्रि में करे । इससे अन्यथा यात्रा करनेवाले का नाश होता है ॥ ३९ ॥ सम्मुख शुक्रदोष उदेति यस्यां दिशि यत्र याति गोलभ्रमाद्वाथ ककुब्भसङ्घे । त्रिधोच्यते सम्मुख एव शुक्रो यत्रोदितस्तां तु दिशं न यायात् ॥ ४० ॥ अन्वयः—यस्यां दिशि उदेति गोलभ्रमाद्, वा यत्र दिशि याति, अथवा ककुब्भसंघे (यत्र तिष्ठति), त्रिधा शुक्रः सम्मुख एव उच्यते । शुक्रः यत्र दिशि उदितः तां दिशं तु न यायात् ॥ ४० ॥ जिस दिशा में उदित हो, अथवा गोलभ्रम* वश होकर जिस दिशा में जाता हो, अथवा दिग्द्वार नक्षत्रों के क्रम से जिस दिशा में हो, इन तीन प्रकार से शुक्र सम्मुख कहा जाता है । परन्तु राजा को चाहिए कि जिस दिशा में शुक्र उदित हो उस दिशा की यात्रा न करे ॥ ४० ॥ वक्रनीचादिस्थित शुक्रदोष वक्रास्तनीचोपगते भृगोः सुते राजा व्रजन्याति वशं हि विद्विषाम् । बुधोऽनुकूलो यदि तत्र संचलन् रिपूञ्जयेन्नैव जयः प्रतीन्दुजे ॥ ४१ ॥ अन्वयः—भृगो सुते वक्रास्तनीचोपगते व्रजन् राजा हि विद्विषां वशंयाति । यदि बुधः अनुकूलः तत्र संचलन् रिपून् जयेत्, प्रतीन्दुजे (सम्मुखबुधे) जयः नैव ॥ ४१ ॥ यदि वक्रमार्ग तथा नीचस्थान में शुक्र के रहते यात्रा करे तो राजा शत्रुओं के वशीभूत होता है । परन्तु शुक्र के वक्रादि रहते भी यदि बुध अनुकूल अर्थात् पीछे स्थित हो तो यात्रा करनेवाला राजा शत्रुओं को अवश्य ही जीत लेता है, और यदि बुध सम्मुख हो तो जय नहीं होती ॥ ४१ ॥ *मेष से लेकर कन्याराशि पर्यन्त सूर्य के रहते उत्तर गोल और तुला से लेकर मीनराशिपर्यन्त सूर्य के रहते दक्षिण गोल होता है ।

यात्राप्रकरण १८५ कालविशेष में शुक्रदोषाभाव तथा अस्तादिविचार यावच्चन्द्रः पूषभात्कृत्तिकाद्ये पादे शुकोऽन्धो न दुष्टोऽग्रदक्षे । मध्ये मार्गं भार्गवास्तेऽपि राजा तावत्तिष्ठेत्सम्मुखत्वेऽपि तस्य ॥ ४२ ॥ अन्वयः—पूषभात् कृत्तिकाद्ये पादे यावत् चन्द्रः (तिष्ठति) तावत् शुक्रः अन्धः (भवति तदा) अग्रदक्षे दुष्टः न (भवेत्), मध्ये मार्गं अपि भार्गवास्ते अपि वा तस्य सम्मुखत्वे राजा तावत् तिष्ठेत् ॥ ४२ ॥ जब तक चन्द्रमा रेवती से लेकर कृत्तिका के पहिले चरण तक रहता है तब तक शुक्र अन्धा रहता है । इस कारण सम्मुख व दाहिने दोषकारक नहीं होता । कदाचित् मार्ग ही में शुक्र अस्त हो तो राजा को चाहिए कि जब तक फिर उदित न हो तब तक वहीं टिका रहे और उदित होने पर भी यदि सम्मुख पड़ता हो तो जब तक फिर पीछे या बायें न हो तब तक वहीं टिका रहे ॥ ४२ ॥ लग्नविशेष का त्याग कुम्भकुम्भांशकौ त्याज्यौ सर्वथा यत्नतो बुधैः । तत्र प्रयातुर्नृपतेरर्थनाशः पदे पदे ॥ ४३ ॥ अन्वयः—बुधैः यत्नतः सर्वथा कुम्भकुम्भांशकौ त्याज्यौ, (यतः) तत्र प्रयातुः नृपतेः पदे-पदे अर्थनाशः (स्यात्) ॥ ४३ ॥ पण्डितों को चाहिए कि यत्नपूर्वक कुम्भ लग्न और कुम्भराशि का नवांश इन दोनों को यात्रा में त्याग दें, क्योंकि इनमें यात्रा करनेवाले राजा का धन अथवा प्रयोजन पद-पद में नष्ट होता है ॥ ४३ ॥ मीन और मीन के नवांश का फल तथा शुभलग्न अथ मीनलग्न उत वा तदंशके चलितस्य वक्रमिह वर्त्म जायते । जनिलग्नजन्मभपती शुभग्रहौ भवतस्तदा तदुदये शुभो गमः ॥ ४४ ॥ अन्वयः—अथ मीनलग्ने उत वा तदंशके चलितस्य वर्त्म इह वक्र जायते । यदि जनिलग्नजन्मभपती शुभग्रहौ भवतः तदा तदुदये गमः शुभः (स्यात्) ॥ ४४ ॥ मीन लग्न अथवा मीन राशि के नवांश में यात्रा करनेवाला मार्ग भूलकर टेढ़े मार्ग से यात्रा करता है । जन्म लग्न और जन्मराशि के स्वामी शुभ ग्रह हों और जिस लग्न में स्थित हों उसमें की हुई यात्रा शुभ होती है ॥ ४४ ॥

१८६ मुहूर्तचिन्तामणि अन्य अनिष्ट लग्न जन्मराशितनुतोऽष्टमेऽथवा स्वारिभाच्च रिपुभे तनुस्थिते । लग्नगास्तदधिपा यदाथवा स्युर्गतं हि नृपतेर्मृतिप्रदम् ॥ ४५ ॥ अन्वयः—जन्मराशितनुतः अष्टमे अथवा स्वारिभात् रिपुभे तनुस्थिते, अथवा तदधिपाः यदा लग्नगाः स्युः (तदा) नृपतेः गतं [गमनं ] हि मृतिप्रदं स्यात् ॥ ४५ ॥ जन्मराशि से या जन्मलग्न से आठवीं लग्न में अथवा शत्रु की जन्मराशि या जन्मलग्न से छठी लग्न में अथवा इन राशियों के स्वामी यदि लग्न में हों तो यात्रा करनेवाले राजा की यात्रा मृत्यु देनेवाली होती है ॥ ४५ ॥ अन्य शुभलग्न लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमस्थे यात्रा प्रोक्ता वाञ्छितार्थैकदात्री । अम्भोराशौ वा तदंशे प्रशस्तं नौकायानं सर्वसिद्धिप्रदापि ॥ ४६ ॥ अन्वयः— लग्ने अपि वा चन्द्रे, वर्गोत्तमस्थे वाञ्छितार्थैकदात्री यात्रा प्रोक्ता । अम्भोराशौ वा तदंशे नौकायानं प्रशस्तं सर्वसिद्धिप्रदायि स्यात् ॥ ४६ ॥ मीन और कुम्भ को छोड़ अन्य लग्न, अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवांश में हो तो यात्रा वाञ्छित वस्तु देनेवाली होती है। यदि नाव में यात्रा करना हो तो जलचर लग्न में या जलचर राशि के नवांश में यात्रा करे। सब काम सिद्ध होते हैं ॥ ४६ ॥ सम्मुख तथा पृष्ठ गत लग्न दिग्द्वारभे लग्नगते प्रशस्ता यात्रार्थदात्री जयकारिणी च । हानिं विनाशं रिपुतो भयं च कुर्यात्तथा दिक्प्रतिलोमलग्ने ॥ ४७ ॥ अन्वयः—दिग्द्वारभे लग्नगते सति यात्रा प्रशस्ता अर्थदात्री च पुनः जयकारिणी (स्यात्) तथा दिक्प्रतिलोमलग्ने यात्रा हानिं, विनाशं, च रिपुतः भयं कुर्यात् ॥ ४७ ॥ यात्राकाल में दिग्द्वार राशि लग्न में हो, अर्थात् सम्मुख या दाहिने हो तो यात्रा शुभ, धनादि की देनेवाली तथा विजय करानेवाली होती है, और यदि वही दिग्द्वार राशि पीछे या बायें हो तो यात्रा हानि, विनाश और शत्रु से भय देनेवाली होती है ॥ ४७ ॥ शुभलग्न राशिः स्वजन्मसमये शुभसंयुतो यो यः स्वारिभान्निधनगोऽपि च वेशिसंज्ञः ।

विवाहप्रकरण १८७ लग्नोपगः स गमने जयदोऽथ भूप- योगैर्गमो विजयदो मुनिभिः प्रदिष्टः ॥ ४८ ॥ अन्वयः—स्वजन्मसमये यः राशिः शुभसंयुतः, यः स्वारिभात् निधनगः, अपि च यः वेशिसंज्ञः स लग्नोपगः जयदः (स्यात्) । अथ भूपयोगैः गमः मुनिभिः विजयदः प्रदिष्टः ॥ ४८ ॥ यात्रा करनेवाले के जन्मकाल में जो राशि शुभ ग्रहों से संयुक्त हो, अथवा जो राशि शत्रु की जन्मराशि से या जन्मलग्न से आठवीं हो, अथवा जो राशि वेशिसंज्ञक अर्थात् सूर्य से दूसरे स्थान में हो, इन तीनों में से जो राशि लग्न में हो वह यात्रा में विजय देनेवाली होती है । अथवा जातक में कहे हुए राजयोगों में जो यात्रा होती है उसे भी मुनियों ने विजय देनेवाली कही है ॥ ४८ ॥ दिशाओं के स्वामी सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च । प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमशः प्रदिष्टाः ॥ ४९ ॥ अन्वयः—अथ सूर्यः, सितः, भूमिसुतः, राहुः, शनिः, शशीः, ज्ञः च बृहस्पतिः, दिक्षु, विदिक्षु अपि च प्राच्यादितः दिशां प्रदिष्टाः ॥ ४९ ॥ सूर्य, शुक्र, मंगल, राहु, शनैश्चर, चन्द्रमा, बुध और बृहस्पति ये आठ ग्रह क्रम से पूर्वादि दिशाओं के तथा कोणों के स्वामी कहे गये हैं ॥ ४९ ॥ दिक्स्वामिचक्र

पू०आ०द०नै०प०वा०उ०ई०
सूर्यशुक्रमंगलराहुशनिचन्द्रबुधगुरु
दिगीश कहने का प्रयोजन
केन्द्रे दिगधीशे गच्छेदवनीशः ।
लालाटिनि तस्मिन्नेयादरिसेनाम् ॥ ५० ॥
अन्वयः—दिगधीशे केन्द्रे अवनीशः गच्छेत् । तस्मिन् [दिगधीशे] लालाटिनि
(सति) अरिसेनां न इयात् ॥ ५० ॥
जिस दिशा को यात्रा करनी हो उस दिशा का स्वामी यदि केन्द्र में
स्थित हो तो राजा यात्रा करे और यदि दिशा का स्वामी लालाटिक योग-
कारक हो तो राजा शत्रु की सेना पर चढ़ाई न करे ॥ ५० ॥

१८८ मुहूर्तचिन्तामणि लालाटिक योग प्राच्यादौ तरणिस्तनौ भृगुसुतो लाभव्यये भूसुतः कर्मस्थोऽथ तमो नवाष्टमग़ृहे सौरिस्तथा सप्तमे। चन्द्रः शत्रुगृहात्मजेऽपि च बुधः पातालगो गीष्पति- र्वित्तभ्रातृगृहे विलग्नसदनाल्लालाटिकाः कीर्तिताः ॥ ५१ ॥ अन्वयः—अथ तरणिः तनौ, भृगुसुतः लाभव्ययेः, भूसुतः कर्मस्थः, तमः नवाष्टमग़ृहे, तथा सौरिः सप्तमे, चन्द्रः शत्रुगृहात्मजे, अपि च बुधः पातालगः, गीष्पतिः वित्तभ्रातृगृहे (स्थितः), (इमे) विलग्नसदनात् प्राच्यादौ (क्रमेण) लालाटिकाः कीर्तिताः ॥ ५१ ॥ पूर्व दिशा को यात्रा करनेवाले को लग्न में स्थित सूर्य, आग्नेय दिशा को यात्रा करनेवाले को गेरहवें या बारहवें स्थान में स्थित शुक्र, दक्षिणा को यात्रा करनेवाले को दशवें स्थान में स्थित मंगल, नैर्ऋत्य को यात्रा करनेवाले को नवें या आठवें स्थान में स्थित राहु, पश्चिम को यात्रा करनेवाले को सातवें स्थान में स्थित शनैश्चर, वायव्य दिशा को यात्रा करनेवाले को छठे या पाँचवें स्थान में स्थित चन्द्रमा, उत्तर दिशा को यात्रा करनेवाले को चौथे स्थान में स्थित बुध और ईशान दिशा को यात्रा करनेवाले को तीसरे या दूसरे स्थान में स्थित बृहस्पति लालाटिक हैं। लालाटिक योग में यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५१ ॥ प्रास्थानिक यात्रायोग मृगे गत्वा शिवे स्थित्वादितौ गच्छन् जयेद्रिपून् । मैत्रे प्रस्थाय शाक्रे हि स्थित्वा मूले व्रजंस्तथा ॥ ५२ ॥ प्रस्थाय हस्तेऽनिलतक्षधिष्ण्ये स्थित्वा जयार्थी प्रवसेद्द्विदैवे । वस्वन्त्यपुष्ये निजसीम्नि चैकरात्रोषितः क्ष्मां लभतेऽवनीशः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—मृगे गत्वा शिवे स्थित्वा अदितौ गच्छन् रिपून् जयेत् । तथा मैत्रे प्रस्थाय शाक्रे स्थित्वा मूले व्रजन् हि रिपून् जयेत् ॥ जयार्थी अवनीशः हस्ते प्रस्थाय अनिलत- क्षधिष्ण्ये स्थित्वा द्विदैवे प्रवसेत् च [तथा] वस्वन्त्यपुष्ये निजसीम्नि एकरात्रोषितः अवनीशः क्ष्मां लभते ॥ ५२-५३ ॥ जिस दिशा को यात्रा करना हो उसी दिशा को अपने घर से मृगशिरा नक्षत्र में चलकर आर्द्रा नक्षत्र में किसी के घर में टिककर पुनर्वसु नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे, और अनुराधा नक्षत्र में अपने घर से चलकर ज्येष्ठा नक्षत्र में कहीं टिककर मूल नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे तो शत्रुओं को

यात्राप्रकरण १८९ जीते ॥ ५२ ॥ ऐसे ही हस्त नक्षत्र में अपने घर से चलकर चित्रा, स्वाती इन दो नक्षत्रों में कहीं टिककर विशाखा नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे और धनिष्ठा, रेवती, पुष्य इन नक्षत्रों में अपने घर से चलकर गाँव की सीमा पर एक रात्रि टिककर वहाँ से यात्रा करे तो वह राजा शत्रु का राज्य जीत लेता है ॥ ५३ ॥ समयबल उषःकालो विना पूर्वा गोधूलिः पश्चिमां विना । विनोत्तरां निशीथः सन् याने याम्यां विनाऽभिजित् ॥ ५४ ॥ अन्वयः—पूर्वां विना उषःकालः, पश्चिमां विना गोधूलिः, उत्तरां विना निशीथः याने [यात्रायां] सन् स्यात्, तथा याम्यां विना अभिजित् (मुहूर्तः) सन् स्यात् ॥ ५४ ॥ पूर्व दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए प्रातःकाल, पश्चिम को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए गोधूलिकाल, उत्तर दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए आधी रात का समय और दक्षिण दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए अभिजित् मुहूर्त्त शुभ होता है, अर्थात् प्रातःकाल पूर्व दिशा को, सायंकाल पश्चिम दिशा को, आधीरात में उत्तर दिशा को, मध्याह्न में दक्षिण दिशा को अभिजित् मुहूर्त्त में यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५४ ॥ लग्नादि बारह भावों के नाम लग्नाद्भावाः क्रमाद्देह १ कोश २ धानुष्क ३ वाहनम् ४ । मन्त्रो ५ ऽरि ६ मार्ग ७ आयुश्च ८ हृत् ९ व्यापारा १० गम ११ व्ययाः १२ ॥ ५५ ॥ अन्वयः—देहकोशधानुष्कवाहनम्, मन्त्रः, अरिः, मार्गः, आयुः च [तथा] हृद्व्या- पारागमव्ययाः [इमे] क्रमात् लग्नात् भावाः (ज्ञेयाः) ॥ ५५ ॥ लग्नादि क्रम से देह १, कोश २, धानुष्क ३, वाहन ४, मन्त्र ५, अरि ६, मार्ग ७, आयु ८, हृदय ९, व्यापार १०, आगम ११, व्यय १२ ये बारह भाव होते हैं, अर्थात् लग्न की देह, दूसरे की कोश, तीसरे की धानुष्क, चौथे का वाहन, पाँचवें की मन्त्र, छठे की अरि, सातवें की मार्ग, आठवें की आयु, नवें की हृदय, दशवें की व्यापार, गेरहवें की आगम, बारहवें की व्यय संज्ञा है ॥ ५५ ॥

१९० मुहूर्त्तचिन्तामणि यात्रा में ग्रहों का शुभाशुभफल केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः शुभास्स्युर्याने पापास्त्र्यायषट्खेषु चन्द्रः । नेष्टो लग्नान्त्यारिरन्ध्रे शनिः खेस्ते शुक्रो लग्नेट् नगान्त्यारिरन्ध्रे ॥ ५६ ॥ अन्वयः—केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः, त्र्यायषट्खेषु पापाः याने शुभाः स्युः, लग्ना- न्त्यारिरन्ध्रे चन्द्रः नेष्टः (स्यात्), खे शनिः नेष्टः, अस्ते शुक्रः नेष्टः, नगान्त्यारिरन्ध्रे लग्नेट् नेष्टः स्यात् ॥ ५६ ॥ यात्रा में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें इन स्थानों में स्थित शुभग्रह और तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इन स्थानों में स्थित पापग्रह शुभ होते हैं। लग्न, बारहवें, छठे, आठवें, इन स्थानों में स्थित चन्द्रमा, दशवें स्थान में स्थित शनैश्चर, सातवें स्थान में स्थित शुक्र और सातवें, बारहवें, छठे, आठवें इन स्थानों में स्थित लग्न का स्वामी अशुभ होता है ॥ ५६ ॥ यात्रा के अधिकारी योगात्सिद्धिर्धरणिपतीनामृक्षगुणैरपि भूदेवानाम् । चौराणामपि शकुनैरूक्ता भवति मुहूर्त्तादपि मनुजानाम् ॥ ५७ ॥ अन्वयः—धरणिपतीनां योगात्, भूदेवानां ऋक्षगुणैः, अपि चौराणां शुभशकुनैः सिद्धिः उक्ता, मनुजानां मुहूर्त्तात् अपि सिद्धिः भवति ॥ ५७ ॥ आगे कहे हुए योग-लग्न-बल से राजाओं की, चन्द्र-तारा-बल-सहित विहित नक्षत्रादि में की हुई यात्रा ब्राह्मणों की, आगे कहे हुए शकुनों से चोरों की और मुहूर्त्त-बल से अन्य मनुष्यों की यात्रा सिद्धिदायक होती है ॥ ५७ ॥ योगयात्रा सहजे रविर्दशमे शशी तथा शनिमङ्गलौ रिपुगृहे सितः सुते । हिबुके बुधो गुरुरपीह लग्नगः स जयत्यरीन् प्रचलितोऽचिरान्नृपः ॥ ५८ ॥ अन्वयः—रविः सहजे, शशी दशमे, तथा शनिमगलौ रिपुगृहे, सितः सुते, बुधः हिबुके, गुरुः अपि लग्नगः (यदि स्यात्) इह (अस्मिन् समये यः) नृपः प्रचलितः स अचिरात् अरीन् जयति ॥ ५८ ॥ यदि लग्न से तीसरे स्थान में शुक्र और दशवें स्थान में चन्द्रमा हो, छठे स्थान में शनि, मंगल ये दोनों हों, पाँचवें स्थान में शुक्र, चौथे स्थान में बुध, लग्न में बृहस्पति हो, ऐसे योग में चला हुआ राजा शीघ्र ही अपने शत्रुओं को जीतता है ॥ ५८ ॥

यात्राप्रकरण १९१ भ्रातरि सौरिर्भूमिसुतो वैरिणि लग्ने देवगुरुः । आयगतेऽर्के शत्रुजयश्चेदनुकूलो दैत्यगुरुः ॥ ५९ ॥ अन्वयः—भ्रातरि सौरिः, वैरिणि भूमिसुतः, लग्ने देवगुरुः, आयगतः अर्कः, च (तथा) चेत् दैत्यगुरुः अनुकूलः (तदा) शत्रुजयः स्यात् ॥ ५९ ॥ अथवा तीसरे स्थान में शनैश्चर, छठे स्थान में मंगल, लग्न में बृहस्पति, ग्यारहवें स्थान में सूर्य हो और यदि शुक्र पीछे या वामभाग में हो, ऐसे योग में चले हुए राजा की जय होती है ॥ ५९ ॥ तनौ जीव इन्दुर्मृतौ वैरिगोऽर्कः प्रयातो महीन्द्रो जयत्येव शत्रून् ॥ ६० ॥ अन्वयः—(यदि) तनौ जीवः, मृतौ इन्दुः, अर्कः वैरिगः (तदा) प्रयात: महीन्द्रः शत्रून् जयत्येव ॥ ६० ॥ अथवा लग्न में बृहस्पति, आठवें स्थान में चन्द्रमा, छठे स्थान में सूर्य हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाला राजा शत्रुओं को अवश्य ही जीतता है ॥ ६० ॥ लग्नगतः स्याद्देवपुरोधाः । लाभधनस्थैः शेषनभोगैः ॥ ६१ ॥ अन्वयः—(यदि) देवपुरोधाः लग्नगतः स्यात्, शेषनभोगैः लाभधनस्थैः (तदा राज्ञो विजयः) ॥ ६१ ॥ अथवा यदि लग्न में बृहस्पति हो और गेरहवें, दूसरे इन दोनों स्थानों में शेष सब ग्रह हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा को विजय होती है ॥ ६१ ॥ द्यूने चन्द्रे समुदयगेऽर्के जीवे शुक्रे विदि धनसंस्थे । ईदृग्योगे चलति नरेशो जेता शत्रून् गरुड इवाहीन् ॥ ६२ ॥ अन्वयः—चन्द्रे द्यूने, अर्के समुदयगे, जीवे शुक्रे विदि धनसंस्थे, ईदृग्योगे नरेशः चलति (तदा) गरुडः अहीन् इव शत्रून् जेता ॥ ६२ ॥ अथवा यदि सातवें स्थान में चन्द्रमा, लग्न में सूर्य और गुरु, शुक्र, बुध ये तीनों ग्रह दूसरे स्थान में हों ऐसे योग में चलनेवाला राजा इस प्रकार शत्रुओं को जीतता है जैसे गरुड़ सर्पों को जीतता है ॥ ६२ ॥ वित्तगतः शशिपुत्रो भ्रातरि वासरनाथः । लग्नगते भृगुपुत्रे स्युः शलभा इव सर्वे ॥ ६३ ॥ अन्वयः—शशिपुत्रः वित्तगतः वासरनाथः भ्रातरि (स्थितः), भृगुपुत्रे लग्नगते (सति) सर्वे (शत्रवः) शलभाः इव स्युः ॥ ६३ ॥

१९२ मुहूर्तचिन्तामणि अथवा दूसरे स्थान में बुध, तीसरे स्थान में सूर्य और लग्न में शुक्र हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा के सामने शत्रुगण इस प्रकार के हो जाते हैं जैसे अग्नि के सामने शलभ ॥ ६३ ॥ उदये रविर्यदि सौरिररिगः शशी दशमेऽपि । वसुधापतिर्यदि याति रिपुवाहिनी वशमेति ॥ ६४ ॥ अन्वयः—यदि रविः उदये, सौरिः अरिगः, शशी दशमे अपि (स्थितः) (अत्र) यदि वसुधापतिः याति (तदा) रिपुवाहिनी वशं एति ॥ ६४ ॥ अथवा यदि लग्न में सूर्य, छठे स्थान में शनैश्चर वा दशवें स्थान में चन्द्रमा हो, ऐसे योग में यदि राजा यात्रा करे तो शत्रु की सेना उसके अधीन हो जाती है ॥ ६४ ॥ तनौ शनिकुजौ रविर्दशमभे बुधो भृगुसुतोऽपि लाभदशमे । त्रिलाभरिपुभेषु भूसुतशनौ गुरुज्ञभृगुजास्तथा बलयुताः ॥ ६५ ॥ अन्वयः—तथा तनौ शशिकुजौ, दशमभे रविः, बुधः भृगुसुतोपि लाभदशमे, भूसुतशनौ त्रिलाभरिपुभेषु (स्थितौ) गुरुज्ञभृगुजाः बलयुताः (तदा जयः स्यात्) ॥ ६५ ॥ अथवा यदि लग्न में शनैश्चर, मंगल ये दोनों स्थित हों, दशवें स्थान में सूर्य हो और दशवें या गेरहवें स्थान में बुध वा शुक्र हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है । अथवा तीसरे, छठे, गेरहवें इन तीनों स्थानों में कहीं मंगल, शनैश्चर हों और बृहस्पति, बुध, शुक्र ये बली होकर कहीं भी स्थित हों, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ॥ ६५ ॥ समुदायगे विबुधगुरौ मदनगते हिमकिरणे । हिबुकगतौ बुधभृगुजौ सहजगताः खलखचराः ॥ ६६ ॥ अन्वयः—विबुधगुरौ समुदायगे, हिमकिरणे मदनगते (सति) यदि बुधशुक्रौ हिबुक- गतौ, खलखचराः सहजगताः (तदा जयः स्यात्) ॥ ६६ ॥ अथवा बृहस्पति यदि लग्न में हो और चन्द्रमा सातवें स्थान में हो, और बुध, शुक्र ये दोनों चौथे स्थान में स्थित हों और तीसरे स्थान में पापग्रह स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ॥ ६६ ॥ त्रिदशगुरुस्तनुगो मदने हिमकिरणो रविरायगतः । सितशशिजावपि कर्मगतौ रविसुतभूमिसुतौ सहजे ॥ ६७ ॥