मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
५४ मुहूर्त्तचिन्तामणि संक्रान्तिप्रकरण ——————:०:—————— दिन और नक्षत्र के भेद से संक्रान्तियों के नाम और फल घोरार्कसंक्रमणमुग्ररवौ हि शूद्रान् ध्वाङ्क्षी विशो लघुविधौ च चरर्क्षभौमे । चौरान् महोदरयुता नृपतीन् ज्ञमैत्रे मन्दाकिनी स्थिरगुरौ सुखयेच्च मन्दा ॥ १ ॥ विप्रांश्च मिश्रभभृगौ तु पशूंश्च मिश्रा तीक्ष्णार्कजेऽन्त्यजसुखा खलु राक्षसी च । अन्वयः—[यदि] उग्ररवौ अर्कसंक्रमणं (स्यात्) (तदा) घोरा (नाम्नीसंक्रान्तिः) (सा) शूद्रान् सुखयेत्, लघुविधौ ध्वाङ्क्षी [सा] विशः, च (पुनः) चरर्क्षभौमे महोदर- युता (संक्रान्तिः) (सा) चौरान्, ज्ञमैत्रे मन्दाकिनी (सा) नृपतीन्, स्थिरगुरौ मन्दा (सा) विप्रान्, तु (पुनः) मिश्रभभृगौ मिश्रा (सा) पशून् सुखयेत्, तीक्ष्णार्कजे राक्षसी (सा) अन्त्यजसुखा (स्यात्) ॥ १ ॥ तीनों पूर्वा, भरणी या मघा नक्षत्र में रविवार को जो सूर्य की संक्रान्ति होती है, उसका घोरा नाम होता है। वह शूद्रों को सुख देती है। हस्त, अश्विनी, पुष्य या अभिजित् नक्षत्र में सोमवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका नाम ध्वांक्षी होता है। वह वैश्यों को सुख देती है। स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा वा शतभिष नक्षत्र में मंगलवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका महोदरी नाम होता है। वह चोरों को सुख देती है। मृगशिरा, रेवती, चित्रा वा अनुराधा नक्षत्र में बुधवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका मन्दाकिनी नाम होता है। वह क्षत्रियों को सुख देती है। तीनों उत्तरा वा रोहिणी नक्षत्र में बृहस्पति के दिन जो सक्रान्ति होती है, उसका मन्दा नाम होता है। वह ब्राह्मणों को सुख देती है ॥ १ ॥ विशाखा अथवा कृत्तिका नक्षत्र में शुक्रवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका मिश्रा नाम होता है। वह पशुओं को सुख देती है। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा या आश्लेषा नक्षत्र में शनैश्चर को जो संक्रान्ति होती है, उसका राक्षसी नाम होता है। वह चाण्डालादि को सुख देती है।
संक्रान्तिप्रकरण ५५ संक्रान्तिचक्र
| घोरा | ध्वांक्षी | महोदरी | मन्दाकिनी | मन्दा | मिश्रा | राक्षसी |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
| पू० ३<br>भरणी<br><br>मघा | हस्त<br>अश्विनी<br>पुष्य<br>अभिजित् | स्वाती<br>पुनर्वसु<br>श्रवण<br>धनिष्ठा<br>शतभिष | मृगशिरा<br>रेवती<br>चित्रा<br>अनुराधा | उत्तरा ३<br>रोहिणी | विशाखा<br>कृत्तिका | मूल ज्येष्ठा<br>आर्द्रा<br>आश्लेषा |
| शूद्र<br>सुखदा | वैश्य<br>सुखदा | चोर सुखदा | क्षत्रिय<br>सुखदा | ब्राह्मण<br>सुखदा | पशु<br>सुखदा | चांडालादि<br>सुखदा |
| दिन-रात्रि के विभाग से संक्रान्तियों का शुभाशुभ फल | ||||||
| त्र्यंशे दिनस्य नृपतीन्प्रथमे निहन्ति | ||||||
| मध्ये द्विजानपि विशोऽपरके च शूद्रान् ॥ २ ॥ | ||||||
| अस्ते निशाप्रहरकेषु पिशाचका- | ||||||
| दीन्नक्तंचरानपि नटान् पशुपालकांश्च । | ||||||
| सूर्योदये सकललिङ्गिजनं च सौम्य | ||||||
| याम्ययनं मकरकर्कटयोर्निरुक्तम् ॥ ३ ॥ | ||||||
| **अन्वयः—**दिनस्य प्रथमे त्र्यंशे (अर्कसंक्रमणं) नृपतीन् निहन्ति, मध्ये (त्र्यंशे) | ||||||
| द्विजान्, अपरके (त्र्यंशे) विशः, अस्ते शूद्रान् । निशाप्रहरकेषु (क्रमेण) पिशाचकादीन्, | ||||||
| नक्तंचरान्, नटान् अपि, पशुपालकान् च निहन्ति, सूर्योदये (अर्कसंक्रान्तिः) सकललिङ्गि- | ||||||
| जनं निहन्ति । मकरकर्कटयोः (क्रमेण) सौम्ययाम्ययानम् निरुक्तम् ॥ २-३ ॥ | ||||||
| दिनमान के तीन भाग करके यह विचार करना चाहिए कि प्रथमभाग | ||||||
| में सूर्यसंक्रान्ति हो तो क्षत्रियों का, दूसरे भाग में हो तो ब्राह्मणों का, तीसरे | ||||||
| भाग में हो तो वैश्यों का और सूर्यास्तकाल में हो तो शूद्रों का नाश करती | ||||||
| है । रात्रि के पहले पहर में संक्रान्ति हो तो पिशाचों और भूतों का, दूसरे | ||||||
| पहर में हो तो राक्षसों का, तीसरे पहर में हो तो नटों का चौथे पहर में | ||||||
| पशुपालकों अर्थात् अहीरों का और सूर्योदय काल में पाखण्डियों का नाश |
५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि करती है। मकर की संक्रान्ति को उत्तरायण और कर्क की संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं ॥ २-३ ॥ शेष संक्रान्तियों के नाम षडशीत्याननं चापनृयुक्कन्याझषे भवेत् । तुलाजौ विषुवं विष्णुपदं सिंहालिगोघटे ॥ ४ ॥ अन्वयः—चापनृयुक्कन्याझषे षडशीत्याननं, तुलाजौ विषुवं, सिंहालिगोघटे विष्णुपदं (नाम संक्रमणं) भवेत् ॥ ४ ॥ धनु, मिथुन, कन्या और मीन की संक्रान्ति का षडशीतिमुख नाम है; तुला और मेष की संक्रान्ति का विषुव नाम है तथा सिंह, वृश्चिक, वृष और कुम्भ की संक्रान्ति का विष्णुपद नाम है ॥ ४ ॥ संक्रान्ति का पुण्यकाल संक्रान्तिकालादुभयत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडशषोडशोष्णगोः । अन्वयः—उष्णगोः (यः संक्रान्तिकालः तस्मात्) संक्रान्तिकालात् उभयत्र षोडश षोडष नाडिकाः पुण्या मताः । सूर्य की संक्रान्ति जिस समय हो उससे पहले और पश्चात् सोलह- सोलह दण्ड पुण्यकाल मानना चाहिए । गणित से पुण्यकाल जानने की यह रीति है कि सूर्य के बिम्ब की कलाओं को साठ से गुणा करके सूर्य की गति का भाग देने से जो लब्ध हो वही संक्रान्ति से पूर्व-पर पुण्यकाल होता है । रात्रि में संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल निशीथतोऽर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्वभागयोः ॥ ५ ॥ अन्वयः—निशीथतः अर्वागपरत्र संक्रमे (सति) (क्रमेण) पूर्वापराहान्तिमपूर्व- भागयोः (पुण्यघटिका भवन्ति) ॥ ५ ॥ यदि आधी रात्रि से पूर्व संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन का उत्तरार्द्ध पुण्यकाल और यदि आधी रात्रि के उपरांत संक्रान्ति हो तो पर दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता है ॥ ५ ॥ आधी रात्रि में होनेवाली संक्रान्ति का पुण्यकाल पूर्णे निशीथे यदि संक्रमः स्याद्दिनद्वयं पुण्यमथोदयास्तात् । पूर्वं परस्ताद्यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये ॥ ६ ॥
२. षोडश संस्कार (गर्भाधान, पुंसवन, नामकरण, उपनयन, विवाह) मुहूर्त
संक्रान्तिप्रकरण ५७ अन्वयः—यदि पूर्णे निशीथे संक्रमः स्यात् (तदा) दिनद्वयं पुण्यं, अथ उदयास्तात् पूर्वं परस्तात् यदि याम्यसौम्यायने (संक्रान्ती भवतः) (तदा) तु परे पूर्वदिने पुण्ये (स्याताम्) ।। ६ ।। यदि ठीक आधी रात्रि में संक्रान्ति हो तो पूर्व और पर दोनों दिन पुण्यकाल होता है। यदि सूर्योदय से पूर्व कर्क संक्रान्ति हो तो पूर्व ही दिन सम्पूर्ण पुण्यकाल और सूर्यास्त के बाद मकर संक्रान्ति हो तो पर ही दिन सम्पूर्ण पुण्यकाल होता है ।। ६ ।। सन्ध्याकाल का प्रमाण सन्ध्या त्रिनाडीप्रमितार्कबिम्बादधोदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । चेद्याम्यसौम्ये अयने क्रमात्तस्तः पुण्यौ तदानीं परपूर्वघस्रौ ।। ७ ।। अन्वयः—अर्द्धोदितास्तात् अर्कबिम्बात् अधः ऊर्ध्वं त्रिणाडीप्रमिता सन्ध्या (कथिता) अत्र चेद्याम्यसौम्ये अयने (संक्रमणे भवतः) तदानी परपूर्वघस्रौ पुण्यौ स्तः ।। ७ ।। सूर्य का आधा बिम्ब उदय होने से पूर्व तीन दण्ड प्रातः सन्ध्या और आधा बिम्ब अस्त होने के बाद तीन दण्ड सायं सन्ध्या जानना चाहिए। यदि प्रातःसन्ध्या में कर्क संक्रान्ति हो तो सूर्योदय के अनन्तर सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल और यदि सायंसन्ध्या में मकर संक्रांति हो तो सूर्यास्त से पूर्व सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होता है ।। ७ ।। संक्रान्तियों का विशेष पुण्यकाल याम्यायने विष्णुपदे चाद्या मध्यास्तुलाजयोः । षडशीत्यानने सौम्ये परा नाड्योऽतिपुण्यदाः ।। ८ ।। अन्वयः—याम्यायने विष्णुपदे च आद्याः नाड्यः, तुलाजयोः मध्याः नाड्यः, षडशीत्यानने (तथा) सौम्ये पराः नाड्यः अतिपुण्यदाः (भवन्ति) ।। ८ ।। कर्क, वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ संक्रान्ति जिस समय हो उससे पूर्व सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है। तुला और मेष संक्रान्ति जिस समय हो उससे पूर्व सोलह दण्ड और पर सोलह दण्ड मिलकर बत्तिस दण्ड अथवा पूर्व आठ और पर आठ मिलकर सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है। मिथुन, कन्या, धनु, मीन और मकर संक्रान्ति जिस समय हो उससे पर सोलह दण्ड पुण्यकाल होता है ।। ८ ।।
५८ मुहूर्तचिन्तामणि सायन संक्रान्तियों का पुण्यकाल तथायनांशाः खरसाहताश्च स्पष्टार्कगत्या विहृता दिनाद्यैः । मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युर्दाने जपादौ बहुपुण्यदास्ते ॥ ९ ॥ अन्वयः—अयनांशाः खरसाहताः च स्पष्टार्कगत्या विहृताः (लब्धैः) दिनाद्यैः मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युः, ते दाने तथा जपादौ बहुपुण्यदाः ॥ ९ ॥ साठ से गुणे हुए अयनांशों में सूर्य की स्पष्ट गति से भाग देने पर जितने दिनादि लब्ध हों, मेषादि संक्रान्तिकाल से उतने ही दिनादि पूर्व चलसंक्रम अर्थात् अयन संक्रान्तियाँ होती हैं। वे अयन संक्रान्तियाँ दान, जप, होम और श्राद्धादि पुण्य कर्म करने के लिए बहुत पुण्यदायक हैं ॥ ९ ॥ नक्षत्रों की सम, बृहत्, जघन्य संज्ञा समं मृदुक्षिप्रवसुश्रवोग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं बृहत्स्यात् । ध्रुवद्विदैवादितभं जघन्यं सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यम् ॥ १० ॥ अन्वयः—मृदुक्षिप्रवसुश्रवोऽग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं समं स्यात्, ध्रुवद्विदैवादितभं बृहत् स्यात्, सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यं जघन्यं स्यात् ॥ १० ॥ मृगशिरा, रेवती, अनुराधा, चित्रा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, धनिष्ठा, श्रवण, कृत्तिका, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद और मूल नक्षत्र की सम संज्ञा, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, विशाखा और पुनर्वसु की बृहत्संज्ञा तथा आश्लेषा, शतभिष, आर्द्रा, स्वाती, ज्येष्ठा और भरणी की जघन्य संज्ञा है ॥ १० ॥ उक्त संज्ञाओं का प्रयोजन जघन्यभे संक्रमणे मुहूर्त्ताः शरेन्दवो बाणकृता बृहत्सु । खरामसंख्या समभे महर्घं समर्धसाम्यं विधुदर्शनेऽपि ॥ ११ ॥ अन्वयः—जघन्यभे संक्रमणे शरेन्दवः मुहूर्त्ताः, बृहत्सु बाणकृताः मुहूर्त्ताः, समभे खरामसङ्ख्याः मुहूर्त्ताः, (तत्र) महर्घसमर्घसाम्यं (क्रमात्फलं ज्ञेयम्) । विधुदर्शनेऽपि (एवं फलं भवति) ॥ ११ ॥ १—वर्त्तमान शाके में चारसौ चवालीस घटाकर उसमें साठ का भाग देने से अयनांश स्पष्ट होता है। यथा शाके १८१४ में ४४४ घटाया, १३७० शेष रहे, इनमें साठ का भाग दिया तो २२ । ५० हुए, यही लब्ध अयनांश हुआ।
संक्रान्तिप्रकरण ५९ जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पन्द्रह मुहूर्त्त, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पैंतालिस मुहूर्त्त और समसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो तीस मुहूर्त्त होते हैं। जिस महीने की संक्रान्ति में पन्द्रह मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न महँगा और जिस महीने की संक्रान्ति में पैंतालिस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न सस्ता और जिस महीने की संक्रान्ति में तीस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न न महँगा न सस्ता, किन्तु समभाव बिकता है। चन्द्रोदय में भी ऐसे ही अन्न का भाव जानना चाहिए अर्थात् जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में प्रथम चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने भर अन्न महँगा, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न सस्ता और समसंज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न समभाव बिकता है ॥ ११ ॥ • कर्क संक्रान्ति के रविवारादि में अब्दविंशोपक अर्कादिवारे संक्रान्तौ कर्कस्याब्दविंशोपकाः । दिशो नखा गजाः सूर्या धृत्योऽष्टादश सायकाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—अर्कादिवारे कर्कस्य संक्रान्तौ (क्रमात्) दिशः, नखाः, गजाः, सूर्याः, धृत्यः अष्टादश, सायकाः, (एते) अब्दविंशोपकाः (ज्ञेयाः) ॥ १२ ॥ कर्क की संक्रान्ति यदि रविवार को हो तो दश, सोमवार को बीस, मंगल को आठ, बुधवार को बारह, बृहस्पति को अठारह, शुक्रवार को भी अठारह और शनैश्चर को पाँच अब्दविंशोपक होते हैं ॥ १२ ॥ कर्क संक्रान्ति में अब्दविंशोपकचक्र
| रविवार | सोमवार | मंगलवार | बुधवार | बृहस्पति | शुक्रवार | शनैश्चर |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | २० | ८ | १२ | १८ | १८ | ५ |
| स्यात्तैतिले नागचतुष्पदे रविः सुप्तो निविष्टस्तु गरादिपञ्चके । | ||||||
| किंस्तुघ्न ऊर्ध्वः शकुनौ सकौलवेऽनिष्टः समः श्रेष्ठ इहार्घवर्षणे ॥ १३ ॥ | ||||||
| अन्वयः—तैतिले नागचतुष्पदे (करणे) रविः सुप्तः (सन् संक्रमितः स्यात्) तु | ||||||
| (पुनः) गरादिपञ्चके निविष्टः (सन् संक्रमितः स्यात्) किंस्तुघ्ने (तथा) सकौलवे | ||||||
| शकुनौ ऊर्ध्व (सन् संक्रमितः स्यात्) इह अर्घवर्षणे (क्रमात्) नेष्टः, समः, श्रेष्ठः | ||||||
| (स्यात्) ॥ १३ ॥ |
६० मुहूर्त्तचिन्तामणि तैतिल, नाग और चतुष्पद करण में सोते हुए; गर, वणिज, भद्रा, बव और बालव में बैठे हुए; किंस्तुघ्न, शकुनि और कौलव में खड़े हुए सूर्य संक्रान्ति करते हैं। सोते हुए सूर्य अन्नादि की महँगी और अवर्षणकारक होते हैं, बैठे हुए सूर्य सम अर्थात् इष्टानिष्ट कुछ नहीं करते और खड़े हुए सूर्य श्रेष्ठ अर्थात् अन्नादि की सस्ती और वर्षा करते हैं ।। १३ ।। संक्रान्तियों के वाहन, वस्त्र, आयुध, भक्ष्य, लेपन, जाति और पुष्प सिंहव्याघ्रवराहरासभगजा वाहद्विषद्घोटकाः श्वाजौ गौश्चरणायुधश्च बवतो वाहा रवेः संक्रमे । वस्त्रं श्वेतसुपीतहारितकपाण्ड्वारक्तकालासितं चित्रं कम्बलदिग्धनाभमथ शस्त्रं स्याद्भुशुण्डी गदा ।। १४ ।। खङ्गोदण्डशरासतोमरमथो कुन्तश्च पाशोऽङ्कुशो- ऽस्त्रं बाणस्त्वथ भक्ष्यमन्नपरमान्नं भैक्षपक्वान्नकम् । दुग्धं दध्यपि चित्रितान्नगुडमध्वाज्यं तथा शर्करा- ऽथो लेपो मृगनाभिकुङ्कुममथो पाटीरमृद्रोचनम् ।। १५ ।। यावश्चोतुमदो निशाञ्जनमथो कालागुरुश्चन्द्रको जातिर्देवतभूतसर्पविहगाः पश्वेणविप्रास्ततः । क्षत्रियवैश्यकशूद्रसंकरभवाः पुष्पं च पुन्नागकं जातीबाकुलकेतकानि च तथा बिल्वार्कदूर्वाम्बुजम् ।। १६ ।। स्यान्मल्लिकापाटलिकाजपा च संक्रान्तिवस्त्राशनवाहनादेः । नाशश्च तद्वृत्त्युपजीविनां च स्थितोपविष्टस्वपतां च नाशः ।। १७ ।। **अन्वयः—**बवतः [बवमारभ्य] रवेः संक्रमे (सति) (क्रमात्) सिंहव्याघ्रवराह- रासभगजाः द्विषद्घोटकाः श्वा अजः गौःचरणायुधः (एते) वाहाः (ज्ञेयाः), (तथा) श्वेतसुपीतहारितकपाण्डुरक्तकालासितं चित्रं कम्बलदिग्धनाभं [एतद्वस्त्रं ज्ञेयं], अथ भुशुण्डी गदा खङ्गः दण्डशरासतोमरं अथो कुन्तः पाशः अंकुशः अस्त्रं बाणः (एतत्) शस्त्रं स्यात्, अथ अन्नपरमान्नं भैक्ष्यपक्वान्नकम् दुग्धं, दधि अपि (तथा) चित्रितान्नगुडमध्वाज्य तथा शर्करा (एतत्) भक्ष्यं (ज्ञेयम्), अथ मृगनाभिकुङ्कुमं अथो पाटीरमृद्रोचनम् यावः च (पुनः) ओतुमदः निशाञ्जनं अथ कालागुरुः चन्द्रकः (एषः) लेपः, (तथा) दैवतभूतसर्पविहगाः पश्वेणविप्राः ततः क्षत्रियवैश्यकशूद्रसंकरभवाः [एषा] जातिः (ज्ञेया), च (पुनः) पुन्नागकं जातीबाकुलकेतकानि च (तथा) विल्वार्कदूर्वाम्बुज मल्लिका पाटलिका च (पुनः) जपा (एतत्) पुष्पं स्यात्, च (पुनः) संक्रांतिवस्त्रासन-
संक्रान्तिप्रकरण ६१ वाहनादेः तद्वृत्त्युपजीविनां च नाशः (स्यात्), च (तथा) स्थितोपविष्टस्वपतां नाशः (स्यात्) ॥ १४-१७॥ बवादि सात चर और शकुनि आदि चार स्थिर मिलकर ग्यारह करणों में होनेवाली सूर्य संक्रान्तियों के क्रम से सिंहादि वाहन, श्वेतादि वस्त्र, भुशुण्डी आदि आयुध, अन्नादि भक्ष्य, कस्तूरी आदि लेपन, देवतादि जाति और पुन्नागादि पुष्प होते हैं। बव करण में होनेवाली संक्रान्ति सिंह पर सवार, श्वेतवस्त्र धारण किये, भुशुण्डी हाथ में लिये, अन्न का भक्षण करती हुई, कस्तूरी का लेप देह में लगाये, देवताजातिवाली, नागकेसर का फूल हाथ में लिये होती है। बालव करण में होनेवाली संक्रान्ति व्याघ्र पर सवार, पीले वस्त्र धारण किये, गदा हाथ में लिये, खीर भक्षण करती हुई, कुंकुम का लेप देह में लगाये, भूतजातिवाली, चमेली का फूल हाथ में लिये होती है। कौलव करण में होनेवाली संक्रान्ति वराह पर सवार, हरे वस्त्र धारण किये, तलवार हाथ में लिये, भीख माँगने से मिले हुए अन्नादि का भक्षण करती हुई, लाल चन्दन का लेप देह में लगाये सर्पजातिवाली, मौलसिरी का फूल हाथ में लिये होती है। तैतिल करण में होनेवाली संक्रान्ति गधे पर सवार, थोड़ा पीला वस्त्र धारण किये, दण्ड हाथ में लिये, पुआ आदि पक्वान्न का भक्षण करती हुई, मिट्टी का लेप देह में लगाये, पक्षीजातिवाली, केतकी का फूल हाथ में लिये होती है। गर करण में होनेवाली संक्रान्ति हाथी पर सवार, लाल वस्त्र धारण किये, धनुष हाथ में लिये, दूध का भक्षण करती हुई, गोरोचन का लेप देह में लगाये, पशुजातिवाली, बेल का फूल हाथ में लिये होती है। वणिज करण में होनेवाली संक्रान्ति भैंसे पर सवार, श्याम रंग वस्त्र धारण किये, तोमर हाथ में लिये, दही का भक्षण करती हुई, महावर का लेप देह में लगाये, मृगजातिवाली, मदार का फूल हाथ में लिये होती है। विष्टि करण में होनेवाली संक्रान्ति घोड़े पर सवार, काला वस्त्र धारण किये, बरछी हाथ में लिये, चित्रान्न अर्थात् एक में पके हुए चावल, मूँग, मसूर, हलदी का भक्षण करती हुई, बिलार के पसीने का लेप देह में लगाये, ब्राह्मणजातिवाली, दूब हाथ में लिये होती है। शकुनि करण में होनेवाली संक्रान्ति कुत्ते पर सवार, अनेक रंगवाला वस्त्र धारण किये, पाश हाथ में लिये, गुड़ का भक्षण करती हुई, हलदी का लेप देह में लगाये, क्षत्रिय जातिवाली, कमल का फूल हाथ में लिये होती है। चतुष्पद करण में
६२ मुहूर्त्तचिन्तामणि होनेवाली संक्रान्ति मेढ़े पर सवार, कम्बल धारण किये, अंकुश हाथ में लिये, मधु का भक्षण करती हुई, सुरमा का लेप देह में लगाये, वैश्य- जातिवाली, चमेली के फूल हाथ में लिये होती है। नाग करण होने- वाली संक्रान्ति बैल पर सवार, नंगी, अस्त्र हाथ में लिये, घी का भक्षण करती हुई, अगर का लेप देह में लगाये, शूद्रजातिवाली, पाढरि का फूल हाथ में लिये होती है। किंस्तुघ्न करण में होनेवाली संक्रान्ति चरणा- युध अर्थात् मुर्ग पर सवार, मेघ के समान वस्त्र धारण किये, बाण हाथ में लिये, शक्कर का भक्षण करती हुई, कपूर का लेप देह में लगाये, वर्णसंकर- जातिवाली, गुड़हर का फूल हाथ में लिये होती है। जिस महीने की संक्रान्ति के जो वाहन, वस्त्र, भक्षणादि कहे हैं, उस महीने में उन सबका नाश अथवा उन वस्तुओं से जीविका करनेवालों का नाश होता है। संक्रान्ति करते समय सूर्य की सुप्त, उपविष्ट और स्थित, ये तीन अवस्थाएँ कही हैं, उन अवस्थाओं में वर्तमान अर्थात् सोते हुए, बैठे हुए और खड़े हुए प्राणियों का भी नाश होता है ॥ १४-१७ ॥ संक्रान्तिवश से शुभाशुभ फल संक्रान्तिधिष्ण्याधरधिष्ण्यतस्त्रिभे स्वभे निरुक्तं गमनं ततोऽङ्गभे । सुखं त्रिभ पीडनमङ्गभेंऽशुकं त्रिभेऽर्थहानी रसभे धनागमः ॥ १८ ॥ अन्वयः—संक्रान्तिधिष्ण्याधरधिष्ण्यतः त्रिभे स्वभे गमनं निरुक्तम्, ततः अङ्गभे सुखम्, (ततः) त्रिभे पीडनम्, (ततः) अङ्गभे अंशुकम्, (ततः) त्रिभे अर्थहानिः, (ततः) रसभे धनागमः (स्यात्) ॥ १८ ॥ संक्रान्ति जिस नक्षत्र में हो उसके पूर्वनक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिने । यदि प्रथम तीन नक्षत्रों में से जन्मनक्षत्र हो तो कहीं जाना पड़े, चौथे से लेकर छः नक्षत्रों में हो तो सुख, दशवें से लेकर तीन नक्षत्रों में शरीरपीड़ा, तेरहवें से लेकर छः नक्षत्रों में वस्त्र की प्राप्ति, उन्नीसवें से लेकर तीन नक्षत्रों में द्रव्यादि की हानि और बाइसवें से लेकर छः नक्षत्रों में धन की प्राप्ति होती है ॥ १८ ॥ संक्रान्ति के नक्षत्र से जन्मनक्षत्र चक्र | ३ | ६ | ३ | ६ | ३ | ६ | | गमन | सुख | व्यथा | वस्त्रप्राप्ति | हानि | धनप्राप्ति |
संक्रान्तिप्रकरण ६३ सूर्यादि के बली रहते कार्य और संक्रान्ति करते हुए ग्रहों का बल नृपेक्षणं सर्वकृतिश्च संगरः शास्त्रं विवाहो गमदीक्षणे रवेः । वीर्येऽथ ताराबलतः शुभोविधुर्विधोर्बलेऽर्कोऽर्कंबले कुजादयः ॥ १९ ॥ अन्वयः—रवेः (सकाशात्) वीर्ये (क्रमेण) नृपेक्षणं, सर्वकृतिः, संगरः, शास्त्रं, विवाहः, गमदीक्षणे (शुभे भवतः), ताराबलतः (विधुः) (शुभः), विधोः बलात् रविः (शुभः), तद्बलतः कुजादयः शुभाः (भवन्ति) ॥ १९ ॥ सूर्य के बली रहते अथवा रविवार को राजा का दर्शन, चन्द्रमा के बली रहते अथवा सोमवार को सब कार्य, मङ्गल के बली रहते अथवा मङ्गल के दिन युद्ध, बुध के बली रहते अथवा बुधवार को शास्त्र पढ़ना, बृहस्पति के बली रहते अथवा बृहस्पति के दिन विवाह करना, शुक्र के बली रहते अथवा शुक्र के दिन यात्रा करना और शनैश्चर के बली रहते अथवा शनैश्चर के दिन यज्ञादि की दीक्षा लेना चाहिए । यदि चन्द्रमा की संक्रान्ति के काल में तारा बली हो तो अशुभ भी चन्द्रमा सवा दो दिन तक शुभदायक होता है । सूर्य की संक्रान्ति के समय यदि चन्द्रमा बली हो तो अशुभ भी सूर्य एक महीने तक शुभ होता है । मंगल की संक्रान्ति के काल में यदि सूर्य बली हो तो अशुभ भी मंगल डेढ़ महीने तक शुभ होता है । ऐसे ही बुधादि को भी जानना चाहिए ॥ १९ ॥ अधिकमास और क्षयमास का निर्णय स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीन उक्तो मासोऽधिमासः क्षयमासकस्तु । द्विसंक्रमस्तत्र विभागयोः स्तस्तिथेर्हि मासौ प्रथमान्त्यसंज्ञौ ॥ २० ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ संक्रान्तिप्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥ अन्वयः—स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीनः मासः अधिमासः उक्तः, तु (तथा) द्विसंक्रमः मासः क्षयमासकः (स्यात्) तत्र तिथेः विभागयोः प्रथमान्त्यसंज्ञौ मासौ स्तः ॥ २० ॥ शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या पर्यन्त चान्द्रमास होता है । जिस चान्द्रमास में स्पष्ट सूर्यसंक्रान्ति न हो वह मास अधिमास अर्थात् मलमास कहा जाता है और जिस मास में स्पष्ट सूर्य की दो संक्रान्तियाँ हों वह क्षयमास कहा जाता है । क्षयमास में तिथि के पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध भागों के सम्बन्ध से पहिला और दूसरा मास जानना चाहिए अर्थात् उस एक ही
६४ मुहूर्तचिन्तामणि क्षयमास में दो मास माने जाते हैं। शुक्लपक्ष को पहिला और कृष्णपक्ष को दूसरा मास। यदि तिथि के पूर्वार्द्ध में किसी का जन्म अथवा मरण हुआ हो तो उसका जन्मदिन अथवा क्षयाह श्राद्ध पहिले मास में और यदि तिथि के उत्तरार्द्ध में किसी का जन्म अथवा मरण हुआ हो तो उसका जन्मदिन अथवा क्षयाह श्राद्ध दूसरे मास में होता है ॥ २० ॥ ————— गोचरप्रकरण —:०:— सूर्यो रसान्त्ये खयुगेऽग्निनन्दे शिवाक्षयोर्भौमशनी तमश्च । रसाङ्कयोर्लाभशरे गुणान्त्ये चन्द्रोऽम्बराब्धौ गुणनन्दयोश्च ॥ १ ॥ लाभाष्टमे चाद्यशरे रसान्त्ये नगद्वये ज्ञो द्विशरेऽब्धिरामे । रसाङ्कयोर्नागविधौ खनागे लाभव्यये देवगुरुः शराब्धौ ॥ २ ॥ द्वधन्त्ये नवांशे द्विगुणे शिवाग्नौ शुक्रः कुनागे द्विनगेऽग्निरूपे । वेदाऽम्बरे पञ्चनिधौ गजेषौ नन्देशयोर्भानुरसे शिवाग्नौ ॥ ३ ॥ क्रमाच्छुभो विद्ध इति ग्रहः स्यात्पितुः सुतस्यात्र न वेधमाहुः । अन्वयः—स्वजन्मराशेः सूर्यः रसान्त्ये, खयुगे, अग्निनन्दे, शिवाक्षयोः। च (तथा) भौमशनी (तथा) तमः रसाङ्कयोः, लाभशरे, गुणान्त्ये। च (तथा) चन्द्रः अम्बराब्धौ, गुणनन्दयोः, लाभाष्टमे, आद्यशरे, रसान्त्ये, नगद्वये, (तथा) ज्ञः द्विशरे, अब्धिरामे, रसाङ्कयोः, नागविधौ, खनागे, लाभव्यये। (तथा) देवगुरुः शराब्धौ, द्वद्यन्त्ये, नवांशे, द्विगुणे, शिवाग्नौ। (तथा) शुक्रः कुनागे, द्वनगे, अग्निरूपे, वेदाम्बरे, पञ्चनिधौ, गजेषौ, नन्देशयोः, भानुरसे, शिवाग्नौ, इति (एवं) क्रमात् ग्रहः शुभः स्यात् विद्धः स्यात्। अत्र पितुः सुतस्य वेधं न आहुः ॥ १-३ ॥ सूर्यादि ग्रह छठे बारहवें आदि स्थानों में क्रम से शुभ और विद्ध होते हैं अर्थात् जन्मराशि से छठी राशि में स्थित सूर्य शुभ और यदि जन्म राशि से बारहवें स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही दशवें स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि चौथे स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि नवें स्थान में शनैश्चर को छोड़
गोचरप्रकरण ६५ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि पाँचवें स्थान में शनैश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। मंगल, शनैश्चर, राहु, केतु ये ग्रह जन्मराशि से छठे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। गेरहवें स्थान में शुभ और यदि पाँचवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। तीसरे स्थान में शुभ और यदि बारहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। परन्तु शनैश्चर भी सूर्य से विद्ध नहीं होता; क्योंकि आगे कहा है कि गोचर में पिता पुत्र का वेध नहीं होता। जन्मराशि से दशवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ और यदि चौथे स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ १ ॥ ऐसे ही गेरहवें स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि आठवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही पहले स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि पाँचवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही छठे स्थान में चन्द्रमा शुभ और यदि बारहवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही सातवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ और यदि दूसरे स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्म- राशि से दूसरे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि पाँचवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही चौथे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि तीसरे स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही छठे स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि नवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही आठवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि पहले स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दशवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि आठवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित बुध शुभ और यदि बारहवें स्थान में चन्द्रमा को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्म राशि से पाँचवें
६६ मुहूर्तचिन्तामणि स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि चौथे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ २ ॥ ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि बारहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही नवें स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि दशवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित बृहस्पति शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। जन्मराशि से पहिले स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि आठवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही दूसरे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि सांतवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि पहिले स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही चौथे स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि दशवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही पाँचवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि नवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही आठवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि पाँचवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही नवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि गेरहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही बारहवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि छठे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित शुक्र शुभ और यदि तीसरे स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ ३ ॥ वामवेध और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा का बल दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणे शुभदः सितेऽब्जः ॥ ४ ॥ अन्वयः—(तथा) दुष्टः अपि खेटः विपरीतवेधात् शुभः (स्यात्) । तथासिते [शुक्लपक्षे ] अब्जः द्विकोणे शुभदः स्यात् ॥ ४ ॥ अशुभ भी ग्रह विपरीत वेध से शुभ हो जाता है, अर्थात् जन्मराशि से बारहवें, चौथे, नवें, पाँचवें स्थान में स्थित सूर्य अशुभ होता है परन्तु यदि छठे, दशवें, तीसरे, गेरहवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही नवें, पाँचवें, बारहवें स्थान में स्थित मङ्गल, शनैश्चर, राहु, केतु ये ग्रह अशुभ होते हैं, परन्तु छठे, गेरहवें, तीसरे स्थान में स्थित किसी
गोचरप्रकरण ६७ ग्रह से यदि विद्ध हों तो शुभ हो जाते हैं। ऐसे ही चौथे, नवें, आठवें, पांचवें, बारहवें और दूसरे स्थान में स्थित चंद्रमा अशुभ होता है परन्तु दशवें, तीसरे, गेरहवें, पहिले, छठे, सातवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही पाँचवें, तीसरे, नवें, पहिले, आठवें, बारहवें स्थान में स्थित बुध अशुभ होता है, परन्तु दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, दशवें, गेरहवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही चौथे, बारहवें, दशवें, तीसरे स्थान में स्थित बृहस्पति अशुभ होता है परन्तु पाँचवें, दूसरे, नवें और गेरहवें स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही आठवें, सातवें, पहिले, दशवें, नवें, पाँचवें, गेरहवें, छठे और तीसरे स्थान में स्थित शुक्र अशुभ होता है, परन्तु पहिले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, आठवें, नवें, बारहवें, गेरहवें, स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध हो तो शुभ हो जाता है। शुक्लपक्ष में छठे, आठवें, चौथे स्थान में स्थित किसी ग्रह से यदि विद्ध न हो तो दूसरे, नवें, पाँचवें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ होता है। इस वामवेध में भी पिता-पुत्र का वेध नहीं होता ॥४॥ क्रमवेध और विपरीतवेध में मतभेद स्वजन्मराशेरिह वेधमाहुरन्ये ग्रहाधिष्ठितराशितः सः । हिमाद्रिविन्ध्यान्तर एव वेधो न सर्वदेशेष्विति काश्यपोक्तिः ॥५॥ अन्वयः—इह अन्ये (आचार्याः) स्वजन्मराशेः वेधं आहुः स वेधः ग्रहाधिष्ठित- राशित एव तथा हिमाद्रिविन्ध्यान्तरे [देशे] एव ज्ञेयः, सर्वदेशेषु न इति काश्य- पोक्तिः ॥५॥ नारदादि आचार्यों ने जन्मराशि से उक्त दोनों वेध कहे हैं और कश्यपादि आचार्यों ने जिस राशि में ग्रह स्थित हो उस राशि से उक्त दोनों वेध कहे हैं। यथा जन्मराशि से छठे स्थान में स्थित सूर्य शुभ होता है, परन्तु जिस राशि में वह स्थित हो उससे बारहवीं रार्श में शनि को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही जन्मराशि से बारहवें स्थान में स्थित सूर्य अशुभ होता है, परन्तु वह जिस राशि में स्थित हो उससे छठी राशि में शनि को छोड़ अन्य ग्रह यदि स्थित हों तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही चन्द्रादि के भी दोनों प्रकार के वेधों को जानना चाहिए। इन वेधों का दोष हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यवर्ती देशों में
६८ मुहूर्त्तचिन्तामणि ही होता है, अन्य देशों में नहीं, ऐसा कश्यपजी का वचन है। परन्तु बृहस्पतिजी ने क्रमवेध जन्मराशि से और विपरीतवेध ग्रह-स्थान से कहा है। हमारी समझ में भी यही माननीय है ॥ ५ ॥ ग्रहण-नक्षत्र का फल जन्मर्क्षे निधनं ग्रहे जनिभतो घातः क्षतिः श्रीर्व्यथा चिन्तासौख्यकलत्रदौस्थ्यमृत्यवः स्युर्माननाशः सुखम् । लाभोऽपाय इति क्रमात्तदशुभध्वस्त्यै जपः स्वर्णगो- दानं शान्तिरथो ग्रहं त्वशुभदं नो वीक्ष्यमाहुः परे ॥ ६ ॥ अन्वयः—जन्मर्क्षे ग्रहे निधनं, जनिभतः ग्रहणे घातः, क्षतिः, श्रीः, व्यथा, चिन्ता, सौख्य-कलत्रदौस्थ्यमृत्यवः, माननाशः, सुखं, लाभः, अपाय इति क्रमात् स्युः। तदशुभ- ध्वस्त्यै जपः, स्वर्णगोदानं, शान्तिः, अथो परे [आचार्याः] अशुभदं ग्रहं नो वीक्ष्यं आहुः ॥ ६ ॥ जिसके जन्मनक्षत्र में सूर्य या चन्द्रमा का ग्रहण हो उसका मरण होता है। जन्मराशि से लेकर बारह राशियों में ग्रहण हो तो इस क्रम से घातादि फल होता है, अर्थात् जन्मराशि में चन्द्रमा वा सूर्य का ग्रहण हो तो शरीर- पीड़ा, जन्मराशि से दूसरी राशि में हो तो हानि, तीसरी में लक्ष्मी, चौथी में व्यथा, पाँचवीं में पुत्रादि की चिंता, छठी में सौख्य, सातवीं में स्त्रीमरण, आठवीं राशि में अपना मरण, नवीं राशि में माननाश, दसवीं राशि में सुख, गेरहवीं राशि में लाभ और बारहवीं राशि में मरण होता है। चन्द्र-सूर्य-ग्रहण दोष के नाश के लिए त्र्यम्बकादि मन्त्रों का जप, सोने वा गौ का दान यही शान्ति है। अशुभ फल देनेवाले ग्रहण को नहीं देखना चाहिए, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं ॥ ६ ॥ चन्द्रमा का विशेष शुभाशुभत्व पापान्तः पापयुग्द्यूने पापाच्चन्द्रः शुभोऽप्यसन् । शुभांशे चाधिमित्रांशे गुरुदृष्टोऽशुभोऽपि सत् ॥ ७ ॥ अन्वयः—चन्द्रः पापान्तः पापयुक्, पापात् द्यूने, शुभोऽपि असत् [अशुभः], वा शुभांशे, अधिमित्रांशे, वा गुरुदृष्टः, अशुभोऽपि सत् [शुभः] (स्यात्) ॥ ७ ॥ दो पापग्रहों के मध्य में स्थित, अथवा पापग्रहसंयुक्त, अथवा पापग्रह के स्थान से सातवें स्थान में स्थित शुभ भी चन्द्रमा अशुभ फल देता है।
गोचरप्रकरण ६९ और यदि शुभग्रहों के नवांश में अथवा अपने अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और बृहस्पति देखता हो तो अशुभ भी चन्द्रमा शुभ फल देता है ॥ ७ ॥ प्रकारान्तर से चन्द्रमा का शुभाशुभफल सितासितादौ सद्दृष्टे चन्द्रे पक्षौ शुभावुभौ । व्यत्यासे चाशुभौ प्रोक्तौ संकटेऽब्जबलं त्विदम् ॥ ८ ॥ अन्वयः—सितासितादौ सद्दृष्टे चन्द्रे उभौ पक्षौ शुभौ प्रोक्तौ । व्यत्यासे च अशुभौ प्रोक्तौ, इदं अब्जबलं संकटे विचार्यम् ॥ ८ ॥ शुक्लपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा शुभ होता है उसका पक्षभर शुभ ही रहता है और कृष्णपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा अशुभ होता है उसका भी पक्षभर शुभ ही रहता है और इससे विपरीत अर्थात् शुक्लपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा अशुभ होता है उसका सम्पूर्ण पक्ष अशुभ रहता है और कृष्णपक्ष की परीवा में जिसका चन्द्रमा शुभ होता है उसका सम्पूर्ण पक्ष अशुभ रहता है । यह चन्द्रमा का बल किसी संकट के समय अर्थात् अत्यन्त आवश्यक विवाह वा यात्रादि करने में यदि तात्कालिक चन्द्रशुद्धि न हो तो विचारना चाहिए, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ ग्रहों की शान्ति के लिए नवरत्न धारण वज्रं शुक्रेऽब्जे सुमुक्ता प्रवालं भौमेऽगौ गोमेदमाकौँ सुनीलम् । केतौ वैडूर्यं गुरौ पुष्पकं ज्ञे पाचिः प्राङ्माणिक्यमर्के तु मध्ये ॥ ९ ॥ अन्वयः—शुक्रे वज्रं, अब्जे सुमुक्ता, भौमे प्रवालं, अगौ गोमेदं, आकौँ सुनीलं, केतौ वैडूर्यं, गुरौ पुष्पकं, ज्ञे पाचिः (इति) प्राक् (क्रमेण रत्नानि धार्याणि) अर्के मध्ये माणिक्यं (धार्यम्) ॥ ६ ॥ नव कोष्ठोंवाला एक सोने का यन्त्र बनवाकर उसके पूर्व कोष्ठ में शुक्र की प्रसन्नता के लिए हीरा, आग्नेय कोष्ठ में चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए
७० मुहूर्तचिन्तामणि प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता के लिए माणिक्यादि का धारण माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि गारुत्मकं पुष्पकवज्रनीलम् । गोमेदवैदूर्यकमर्कतः स्यूरतनान्यथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् ॥ १० ॥ धार्यं लाजावर्त्तकं राहुकेत्वो रौप्यं शुक्रेन्द्रोश्च मुक्ता गुरोस्तु । लोहं मन्दस्यारभान्वोः प्रवालं तारा जन्मर्क्षात्त्रिरावृत्तितःस्यात् ॥ ११ ॥ अन्वयः—माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमणि, गारुत्मकं, पुष्पकवज्रनीलं, गोमेदवैदूर्यकम् (क्रमण) अर्कतः सकाशात् रत्नानि (धार्याणि) अथो ज्ञस्य मुदे सुवर्णम् (धार्यम्) । राहुकेत्वोः (मुदे) लाजवर्तकं धार्यम्, शुक्रेन्द्रोः रौप्यं, गुरोश्च मुक्ता, तु (तथा) मन्दस्य लोह, आरभान्वोः प्रवालं (धार्यम्) तथा जन्मर्क्षात् त्रिरावृत्तितः तारा स्यात् ॥ १०-११ ॥ माणिक्य, मोती, मूँगा, मरकत, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, वैडूर्य ये प्रत्येक रत्न, सूर्यादि प्रत्येक ग्रहों की प्रसन्नता के लिए धारण करना चाहिए । बहुमूल्य रत्न न मिलें तो अल्पमूल्य वस्तुएँ धारण करने को कहते हैं । बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, राहु और केतु की प्रसन्नता के लिए लाजावर्त मणि, शुक्र और चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए चाँदी, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए मोती, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए लोहा, मंगल और सूर्य की प्रसन्नता के लिए मूँगा धारण करना चाहिए । अब तारा कहते हैं । जन्मनक्षत्र से दिननक्षत्र तक तीन आवृत्ति करने से तारा सिद्ध होती है, अर्थात् जिस दिन जिसकी तारा विचारना हो, उसके जन्मनक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिने, जितनी संख्या हो उसमें नव का भाग देने पर जितने शेष रहें वही तारा होगी ॥ १०-११ ॥ ताराओं के नाम और फल जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः । वधमैत्रातिमैत्राः स्युस्तारानामसदृक्फलाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—जन्माख्यसंपद्विपदः क्षेमप्रत्यरिसाधकाः वधमैत्रातिमैत्राः (एता) नाम- सदृक्फलाः तारा स्युः ॥ १२ ॥ एक शेष हो तो तारा का नाम जन्मर्क्ष, दो शेष हों तो संपत्, तीन शेष हों तो विपत्, चार शेष हों तो क्षेम, पाँच शेष हों तो प्रत्यरि, छः शेष हों तो साधक, सात शेष हों तो वध, आठ शेष हों तो मैत्र, नव शेष हों तो अति- मैत्र होता है । ये सब तारा नाम के समान फल देनेवाली होती हैं ॥ १२ ॥
गोचरप्रकरण ७१ दुष्ट तारा का परिहार मृत्यौ स्वर्णतिलान्विपद्यपि गुडं शाकं त्रिजन्मस्वथो दद्यात्प्रत्यरितारकासु लवणं सर्वं विपत्प्रत्यरिः । मृत्युश्चादिमपर्यये न शुभदोऽथैषां द्वितीयेऽंशका- नादिप्रान्त्यतृतीयका अथ शुभाः सर्वे तृतीये स्मृताः ॥ १३ ॥ अन्वयः—मृत्यौ (वधतारायां) स्वर्णतिलान् दद्यात्, विपदि (तारायां) गुडं, त्रिजन्मसु शाकं, प्रत्यरितारकासु लवणं दद्यात् । (अथ) आदिमपर्यये विपत्, प्रत्यरिः, मृत्युश्च, सर्वः न शुभदः । अथ एषां [विपत्प्रत्यरिमृत्यूनां] द्वितीये [द्वितीयावृत्तौ] आदिप्रान्त्यतृतीयकाः अंशकाः (क्रमेण) न (शुभदाः) अथ तृतीये [पर्यये] सर्वे शुभाः स्मृताः ॥ १३ ॥ मृत्युनामक सातवीं तारा हो तो सुवर्णयुक्त तिलों का, विपत्नामक तीसरी तारा हो तो गुड़ का, जन्मसंज्ञक तारा में शाक का और प्रत्यरिनामक पाँचवीं तारा हो तो नमक का दान करने से तारादोष शान्त होता है । अब तारादोष का दूसरा परिहार कहते हैं । जन्मनक्षत्र से सत्ताइसवें नक्षत्र तक तीन आवृत्ति होती हैं, अठारहवें तक दो आवृत्ति और नवें नक्षत्र तक एक आवृत्ति होती है । पहिली आवृत्ति में विपत्, प्रत्यरि, मृत्यु अर्थात् तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण अशुभ है । दूसरी आवृत्ति में इन्हीं तीनों ताराओं का पहिला, दूसरा, तीसरा अंश शुभ नहीं होता अर्थात्, तीसरी तारा के पहिले बीस अंश अशुभ और चालीस अंश शुभ होते हैं । पाँचवीं तारा में मध्य के बीस अंश अशुभ और आदि के बीस अंश तथा अंत के बीस अंश शुभ होते हैं । सातवीं तारा में अन्त के बीस अंश अशुभ और आदि के चालीस अंश शुभ होते हैं । तीसरी आवृत्ति में तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण शुभ होती हैं ॥ १३ ॥ चन्द्रमा की अवस्था षष्टि ६० घ्नं गतभं भुक्तघटीयुक्तं युगा ४ हतम् । शराब्धि ४५ हृल्लब्धतोऽर्कशेषेऽवस्थाः क्रमाद्विधोः ॥ १४ ॥ अन्वयः—गतभं षष्टिघ्नं भुक्तघटीयुक्तं युगाहतं, शराब्धिहृल्लब्धतः अर्कशेषे क्रमात् (मेषात् क्रमेण) विधोः अवस्थाः स्युः ॥ १४ ॥ अश्विन्यादि व्यतीत नक्षत्रों की संख्या को साठ से गुणा करके वर्त्तमान
७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि नक्षत्र की भुक्त घटी जोड़े। फिर उसे चार से गुणा करे और पैंतालिस का भाग दे। जो लब्ध हों वे मेषादि राशियों में स्थित चन्द्रमा की भुक्त अवस्था होगी और शेष वर्त्तमान अवस्था होगी और यदि लब्ध बारह से अधिक हों तो उनमें बारह का भाग देकर जो शेष रहें वह भुक्त अवस्था होगी ॥ १४ ॥ अवस्थाओं के नाम और फल प्रवासनाशौ मरणं जयश्च हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः । ज्वराख्यकम्पस्थिरता अवस्था मेषात्क्रमात्नामसदृक्फलाःस्युः ॥ १५ ॥ अन्वयः—प्रवासनाशौ मरणं जयः हास्यारतिक्रीडितसुप्तभुक्ताः ज्वराख्यकम्प- स्थिरताः (एताः) मेषात् क्रमात् नामसदृक्फला अवस्थाः स्युः ॥ १५ ॥ प्रवास, नाश, मरण, जय, हास्या, रति, क्रीड़ा, सुप्त, भुक्त, ज्वर, कम्प स्थिरता ये उक्त अवस्थाओं के नाम हैं। ये मेषादि क्रम से अर्थात् चन्द्रमा मेष में हो तो प्रवासादि क्रम से, वृष में हो तो नाशादि क्रम से, मिथुन में हो तो मरणादि क्रम से, कर्क में हो तो जयादि क्रम से, सिंह में हो तो हास्यादि क्रम से, कन्या में हो तो रत्यादि क्रम से, तुला में हो तो क्रीड़ादि क्रम से, वृश्चिक में हो तो सुप्तादि क्रम से, धन में हो तो भुक्तादि क्रम से, मकर में हो तो ज्वरादि क्रम से, कुम्भ में हो तो कम्पादि क्रम से और मीन में हो तो स्थिरतादि क्रम से होती हैं। इनका फल इन्हीं नामों के समान होता है ॥ १५ ॥ ग्रह-दोष-शान्ति के लिए औषधयुक्त जल से स्नान लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैर्निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैर्जलैर्निगदितं स्नानं ग्रहोत्थघहृत् । धेनुःकम्ब्वरुणो वृषश्च कनकं पीताम्बरं घोटकः श्वेतो गौरसिता महासिरज इत्येता रवेर्दक्षिणाः ॥ १६ ॥ अन्वयः—लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धार्थैः निशादारुभिः पुङ्खालोध्रयुतैः जलैः ग्रहोत्थाघहृत् स्नानं निगदितम्, धेनुः, कम्बु, अरुणो वृषः च कनकं, पीताम्बरं, श्वेतः घोटकः, असिता गौः, महासिः, अजः इति एताः रवेः (क्रमेण) दक्षिणाः (ज्ञेयाः) ॥ १६ ॥ लज्जावती, कूट, बरियारा, काकुनि, मुस्ता, सरसो, हल्दी, देवदारु, शरपुंखा, लोध इन ओषधियों से युक्त जल से स्नान करना ग्रहों के दोष का हरण करनेवाला कहा गया है। अब सूर्यादि ग्रहों की दक्षिणा कहते हैं। सूर्य
गोचरप्रकरण ७३ की प्रसन्नता के लिए धेनु, चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए शंख, मंगल की प्रसन्नता के लिए लाल बैल, बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए पीताम्बर, शुक्र की प्रसन्नता के लिए श्वेत घोड़ा, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए काली गौ, राहु की प्रसन्नता के लिए तलवार और केतु की प्रसन्नता के लिए बकरा ब्राह्मण को देना चाहिए ॥ १६ ॥ ग्रह गन्तव्य राशि का फल कितने दिन पहले देने लगते हैं सूर्यारसौम्यास्फुजितोक्षनागसप्ताद्रिघस्रान्विधुरग्निनाडी । तमोयमेज्यास्त्रिरसाश्विमासान् गन्तव्यराशेः फलदाः पुरस्तात् ॥ १७ ॥ अन्वयः—सूर्यारसौम्यास्फुजितः गन्तव्यराशेः पुरस्तात् (क्रमेण) अक्षनागसप्ताद्रि- घस्रान् फलदाः, विधुः अग्निनाडीः (फलदः) तमोयमेज्याः (क्रमेण) त्रिरसाश्विमासान् फलदाः ॥ १७ ॥ सूर्य अगली राशि में जाने से पाँच दिन पहले, मंगल आठ दिन, बुध सात दिन, शुक्र सात दिन, चन्द्रमा तीन दण्ड, राहु तीन मास, शनैश्चर छः मास और बृहस्पति दो मास पहले उस राशि का फल देने लगते हैं ॥ १७ ॥ दुष्ट योगादि की शान्ति के लिए दान दुष्टे योगे हेम चन्द्रे च शङ्खं धान्यं तिथ्यर्द्धे तिथौ तण्डुलांश्च । वारे रत्नं भे चगांहेम नाड्यां दद्यात्सिन्धूत्थंचतारासु राजा ॥ १८ ॥ अन्वयः—योगे दुष्टे हेम, चन्द्रे दुष्टे शङ्खं, तिथ्यर्धे धान्यं, तिथौ तण्डुलान्, वारे रत्नं, भे गां, नाड्यां हेम, तारासु [दुष्टासु] राजा सिन्धूत्थं दद्यात् ॥ १८ ॥ यदि किसी आवश्यक यात्रादि काल में दुष्ट योग हो तो सुवर्ण, चन्द्रमा अशुभ हो तो शंख, करण दुष्ट हो तो धान्य, तिथि दुष्ट हो तो चावल, वार दुष्ट हो तो रत्न, राशि दुष्ट हो तो गौ, नाड़ी अर्थात् मुहूर्त्त दुष्ट हो तो सुवर्ण और तारा दुष्ट हो तो सेंधानमक देकर राजा यात्रादि करे ॥ १८ ॥ राश्यन्तर में गए हुए ग्रहों के फल देने का काल राश्यादिगौ रविकुजौ फलदौ सितेज्यौ मध्ये सदा शशिसुतश्चरमेऽब्जमन्दौ । अध्वान्नवृद्धिभयसन्मतिवस्त्रसौख्य- दुःखानि मासि जनिभे रविवासरादौ ॥ १९ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ गोचरप्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥