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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

यमन्तर्धारयन्त्यापो दीप्तोऽग्निर्न दहत्यपि। शापयत्यभिशापं तं किल्विषी स्यादतोऽन्यथा॥ २४० ॥ असत्यवक्ता से कहना चाहिए—यदि तुम सत्य पर स्थित हो, तो अग्नि का स्पर्श करो, अग्नि तुम्हें नहीं जलायेगी, जल हाथ में लो, जल स्थिर रहेगा, देवों को साक्षी मानकर कहो, यदि तुम्हारा कथन सत्य होगा, तो तुम्हें उनका शाप उद्विग्न नहीं करेगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो अथवा अग्नि आदि द्वारा जलाये जाते हो, तो निश्चित है कि तुम पापी हो। अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे। न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया ॥ २४१ ॥ निर्जन वन में, रात के अन्धकार में तथा घर के भीतर अकेलेपन में किये गये साहसिक बलात्कार—डाका, शीलहरण—आदि को उगलवाने के लिए तथा धरोहर में रखी वस्तु को लौटाने के लिए दिव्य-क्रिया—अग्नि, जल, इन्द्र, वरुण तथा यम आदि की शपथ दिलाना, मृत्यु के उपरान्त भीषण नरक-यातना झेलना आदि—का प्रयोग करना चाहिए। स्त्रीणां शीलाभियोगेषु स्तेयसाहसयोरपि ॥ एष एव विधिर्दृष्टः सर्वार्थापह्नवेषु च ॥ २४२ ॥ इसी प्रकार स्त्रियों के शील-भंग, बलात्कार अथवा अपमान सम्बन्धी विवाद में, चोरी-डकैती के अभियोग में तथा धरोहर को नकारने-हड़पने के व्यवहार में दैवी प्रयोगों—सत्य न बोलने पर मरने के बाद अग्नि तुम्हारे देह को जलायेगी नहीं, तुम्हें अन्न-जल सुलभ नहीं होगा, देवों का प्रकोप तुम्हारे वंश को लील लेगा, दरिद्रता तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी, तुम्हें कोढ़ लग जायेगा आदि शपथों—का प्रयोग करना चाहिए। शपथा ह्यपि देवानाम्ऋषीणामपि च स्मृताः। वसिष्ठः शपथं शेपे यातुधानेन शङ्कितः ॥ २४३ ॥ स्मृतियों के आधार पर शपथ लेने की प्रथा का देवों और ऋषियों में भी प्रचलन सिद्ध होता है, अर्थात् ऋषि अपने को सत्यनिष्ठ सिद्ध करने के लिए शपथ लेते थे तथा देव शपथ लेकर उच्चरित वचन की सत्यता पर पूर्ण विश्वास करते थे—इतिहास इसका साक्षी है। एक समय जब एक राक्षस ने वसिष्ठजी को घेर लिया था, तो उन्होंने इसी प्रकार शपथ—ऋषि का शाप तुम्हें अनन्तकाल तक भटकाता रहेगा—देकर उसके अत्याचार से मुक्ति पायी थी। अभिप्राय यह है कि दैवी उपायों का व्यक्ति पर अनुकूल और निश्चित प्रभाव पड़ता है—इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। 124 / नारदस्मृति

सप्तर्षयस्तथेन्द्रेण पुष्करार्थेन शङ्किताः । शेपुः शपथमव्यग्राः परस्परविशुद्धये ॥ २४४ ॥ इसी प्रकार पुष्कर के विषय में इन्द्र द्वारा डराये गये सप्तर्षियों ने भी दैवी प्रयोग का आश्रय लिया था। सप्तर्षियों ने इन्द्र को दुर्गति का पात्र बनने, नरक भोगने, पतित होने जैसे शाप के रूप में चेताया था और इन्द्र ने इसे गम्भीरता से लेते हुए अपनी भूल को स्वीकार किया था और पश्चात्ताप करते हुए भविष्य में कभी ऐसा औद्धत्य न करने का आश्वासन देते हुए क्षमायाचना का निवेदन किया था। अयुक्तं साहसं कृत्वा प्रत्यापत्तिं भजेत् यः । ब्रूयात् स्वयं वा सदिति तस्यार्धविनयः स्मृतः ॥ २४५ ॥ अकरणीय एवं अवाञ्छनीय दुष्कर्म अथवा साहसिक कर्म करके स्वयं ही अपनी भूल को स्वीकार करने वाले, पश्चात्ताप करने वाले तथा दण्ड के लिए आत्मसमर्पण करने वाले को उसके अपराध के लिए निर्धारित दण्ड का आधा दण्ड देना चाहिए। वस्तुतः दण्ड का उद्देश्य व्यक्ति को सुधारना और सत्पथ पर लाना है। सुधारकों और मनोवैज्ञानिकों ने दण्ड के भय से सुधार की सम्भावना में अपनी आस्था प्रकट नहीं की। उनके अनुसार भय किसी भी बुराई को मिटाने का प्रभावी एवं स्थायी समाधान नहीं। इसकी अपेक्षा शिक्षा एवं उपदेश अधिक उपयोगी हैं। इस सन्दर्भ में अपना अपराध स्वीकार करने वाला तो क्षमा का पात्र है; क्योंकि उसने दण्ड से पूर्व ही दण्ड के उद्देश्य को पूरा कर दिया तथा न्याय-प्रक्रिया को जांच-परख के झंझट से बचा दिया। निष्कर्षतः दण्ड में न्यूनता लाने का स्मृतिकार का मत व्यावहारिक एवं युक्तिसंगत है। गृह्यमानस्तु वैचित्र्याद्यदि पापः स जीयते। सभ्यास्तस्य न तुष्यन्ति तीव्रो दण्डश्च पात्यते ॥ २४६ ॥ विचित्र ढंग से अनोखी चर्चा करके न्याय-प्रक्रिया को भटकाने की चेष्टा करने वाले अपराधी मनोवृत्ति के वादी अथवा प्रतिवादी अथवा साक्षी के असन्तुष्ट एवं खिन्न सभ्यों (न्यायाधिकारियों) को उसे उसके अपराध के लिए निर्धारित दण्ड से दुगुना दण्ड देकर भली प्रकार अनुशासित करना चाहिए। यदा साक्षी न विद्येत विवादे वदतां नृणाम्। तदा दिव्यैः परीक्ष्येत शपथैश्च पृथग्विधैः ॥ २४७ ॥ विवाद करने वाले वादी-प्रतिवादी के साक्षीविहीन होने पर शपथों तथा दिव्य उपायों-धर्म और ईश्वर को साक्षी मानकर सत्य बोलने का अनुरोध, असत्य बोलने पर दैवी प्रकोप का भय दिखाना तथा वंश-नाश की आशंका आदि द्वारा यथार्थ को जानने और तदनुरूप निर्णय पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। नारदस्मृति / 125

देवतापितृपादांश्च दत्तानि सुकृतानि च ॥ 248 ॥

सत्यं वाहनशस्त्राणि गोबीजकनकानि च। देवतापितृपादांश्च दत्तानि सुकृतानि च ॥ 248 ॥ साक्ष्य सुलभ न होने पर अभियुक्त से सत्य उगलवाने के लिए वाहन, शस्त्र आदि तथा गाय, बीज, कनक, देवता, पितर और सुकृत (पुण्य) आदि की शपथ दिलानी चाहिए। इनका अभीष्ट परिणाम निकलता है—इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं। महापराधे दिव्यानि दापयेत्तु महीपतिः । अल्पेषु तु नृपश्रेष्ठ शपथैः श्रावयेन्नरम् ॥ 249 ॥ राजाओं से जब कभी जाने अनजाने कोई महान् अपराध हो गया है, तो उन्होंने पश्चात्ताप के रूप में देवों की आराधना की है, दिव्य प्रयोगों का आश्रय लिया है और साधारण अथवा छोटा-मोटा अपराध हो जाने पर दुःख प्रकट करते हुए भविष्य में ऐसा न करने की शपथ ली है। इस प्रकार देवाराधन और शपथों से उन्हें विहित अपराधों के दण्ड-भोग से निवृत्ति मिली है। अतः अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होकर प्रायश्चित्त भी दण्ड-भोग का रूप बन जाता है। टिप्पणी—महर्षि याज्ञवल्क्य ने निम्नोक्त को परमपवित्र मानते हुए इनकी शपथ लेने का विधान किया है। झूठी शपथ लेने का अर्थ होता है—इनसे वञ्चित होना, देवों के प्रकोप को आमन्त्रित करना तथा अपना सर्वनाश सुनिश्चित करना— सत्यं वाहनमस्त्राणि गोबीजकनकानि च। देवब्राह्मणपादांश्च पुत्रदारशिरांसि च॥ अर्थात् वाहन—रथ, अश्व, गज आदि, अस्त्र—धनुष, बाण, भाला आदि गाय, बीज, स्वर्ण, देव, ब्राह्मण के चरण, पुत्र, पत्नी तथा अपने सिर की झूठी क़सम कभी नहीं खानी चाहिए। इत्येते शपथाः प्रोक्ता मनुना स्वल्पकारणे । पातकेऽष्टाभियोगे च विधिर्दिव्यः प्रकीर्त्तितः ॥। 250 ।। मनु आदि स्मृतिकारों ने छोटे-मोटे अपराधों के लिए शपथों का विधान किया है, अर्थात् भविष्य में ऐसा अपराध न करने की शपथ लेने को पर्याप्त माना है, परन्तु बड़े तथा जान-बूझकर किये गये अपराधों में तो दिव्य प्रयोग—घोर प्रायश्चित्त— का करना ही अपेक्षित है। सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां प्रच्छन्नेषु विशेषतः । दैवं पञ्चविधं ज्ञेयमित्याह भगवान्मनुः ॥ 251 ॥ भगवान् मनु ने सन्दिग्ध, विशेषतः आपराधिक मामलों में, अभियुक्त से सत्य उगलवाने तथा यथार्थ का पता लगाने के लिए निम्नोक्त पांच प्रकार के दिव्य उपाय बतलाये हैं। 126 / नारदस्मृति

घटोऽग्निरुदकं चैव विषं कोशश्च पञ्चमः। उक्तान्येतानि दिव्यानि विशुद्ध्यर्थं महात्मनाम् ॥ 252 ॥ महात्माओं की विशुद्धि के निर्णय के लिए घट, अग्नि, उदक, विष और कोश की शपथ ही पांच दिव्य प्रयोग हैं। सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां विशुद्ध्यर्थं दुरात्मनाम्। प्रोक्तानि नारदेनेह सत्यानृतविशुद्धये ॥ 253 ॥ सन्देह के आरोप में घिरे दुर्जन अभियुक्तों की वास्तविकता—सच्चा है अथवा झूठा—को जानने के लिए निम्नोक्त दिव्य प्रयोग अपनाने चाहिए। वर्षासु वह्निरित्युक्तः शिशिरे तु घटः स्मृतः। ग्रीष्मे सलिलमित्युक्तं विषं काले तु शीतले ॥ 254 ॥ वर्षा ऋतु में अग्नि दिव्य का, शिशिर ऋतु में घट दिव्य का, ग्रीष्म ऋतु में जल दिव्य का तथा शीतकाल में विष दिव्य का प्रयोग करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि वर्षा ऋतु में अभियुक्त को अग्नि प्रकट करने को कहना चाहिए। प्राचीनकाल में अरणि-मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती थी। वर्षा ऋतु में लकड़ियां गीली होती हैं, अतः अग्नि का प्रकट होना दुष्कर होता है। यदि अभियुक्त सच्चा है, तो अग्निदेव प्रकट हो जायेंगे, अग्नि को प्रकट करने में विफलता का अर्थ उसका झूठा होना है। इसी प्रकार अन्य दिव्य प्रयोगों से सत्यासत्य का निष्कर्ष निकालना चाहिए। नार्तानां तोयशुद्धिः स्यान्न विषं पित्तरोगिणाम्। श्वित्र्यन्धकुनखानां च नाग्निशुद्धिर्विधीयते ॥ 255 ॥ रोगपीड़ित अभियुक्तों की सत्यता-असत्यता के निर्णय के लिए जल दिव्य का प्रयोग करना चाहिए, अर्थात् उन्हें जल में एक निश्चित समय के लिए खड़ा रखना चाहिए। उनके सच्चा होने पर शीतल जल से उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचेगी और झूठा होने पर कंपकंपी होने लगेगी। इसी प्रकार पित्तरोगियों पर विष का प्रयोग करना चाहिए। सच्चे व्यक्ति को विष के सेवन से कोई हानि नहीं पहुंचेगी और झूठा अभियुक्त मृत्यु का ग्रास बन जायेगा। कुष्ठरोगी, अन्धे और गन्दे नाखून वालों को अग्नि दिव्य का प्रयोग करना चाहिए। यदि वे सच्चे हैं, तो अग्नि की दाहकता अपना प्रभाव नहीं दिखायेगी, अन्यथा वे ज्वलन की विषम वेदना से तड़पते दिखाई देंगे। टिप्पणी—आज के युग में इन दिव्य प्रयोगों की प्रासंगिकता स्वीकार नहीं की जा सकती। इन्हें तो अमानवीय और अवाञ्छनीय ही कहा जायेगा। पता नहीं, क्या प्राचीनकाल में सचमुच सच्चे व्यक्ति के लिए अग्नि शीतल बन जाती होगी ? नारदस्मृति / 127

वह अपना दाहक धर्म त्याग देती होगी ? आज का प्रबुद्ध व्यक्ति इस मान्यता पर विश्वास कर सकेगा—इसमें सन्देह ही है। सव्रतानां भृशार्तानां व्याधितानां तपस्विनाम् । स्त्रीणां च न भवेद्दिव्यं यदि धर्मस्त्ववेक्षते ॥ 256 ॥ धर्म की रक्षा में तत्पर राजा—न्यायाधिकारी—को व्रतशीलों, आचार परायण व्यक्तियों, रोग-पीड़ितों, शोकग्रस्त लोगों, तपस्वियों तथा स्त्रियों को कभी दिव्य प्रयोगों के लिए नहीं कहना चाहिए। टिप्पणी—रामायण के अनुसार श्रीराम ने लंकाविजय के उपरान्त सीता को अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा देने का निर्देश दिया था। रजक के कथन पर परित्यक्ता सीता ने पुनः अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए धरती से फट जाने का अनुरोध किया था। इन दो उद्धरणों से प्राचीनकाल में इस प्रकार के दिव्य प्रयोगों का प्रचलन सिद्ध होता है। शिरोवर्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते । कारणैः सहितं प्रोक्तं न दिव्यं चार्थिनान्नृणाम् ॥ 257 ॥ अभियुक्त के अपराधी सिद्ध न होने तक उसे दिव्य प्रयोगों का दण्ड कदापि नहीं देना चाहिए; क्योंकि दिव्य प्रयोगों का अकारण प्रवर्तन सर्वथा अनुचित है, उनका तो केवल सकारण प्रयोग ही वाञ्छनीय होता है। तत्राज्ञेन विनीतेन धार्मिकेण विजानता। उभयानुमते देयं दिव्यं सर्वं प्रयत्नतः ॥ 258 ॥ दिव्य दण्ड देना न्यायाधिकारी का एकाधिकार कदापि नहीं है। इस प्रयोग को दोनों—वादी तथा प्रतिवादी—की स्वीकृति लेकर तथा विवेकसम्पन्न, बुद्धिमान्, विनीत, धार्मिक, उदार तथा राग द्वेष से मुक्त न्यायशास्त्रियों और सभ्यों द्वारा भली प्रकार सोच-विचार के उपरान्त ही करना चाहिए। न शीते तोयशुद्धिः स्यान्नोष्णकालेऽग्निशोधनम् । न प्रावृषि विषं दद्यात् प्रवाते न तुलां नृणाम् ॥ 259 ॥ शीतकाल में जल दिव्य का और ग्रीष्मकाल में अग्नि दिव्य का, वर्षा ऋतु में विष दिव्य का और प्रचण्ड वायु के चलते समय तुला दिव्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए; क्योंकि इन ऋतुओं में ये प्रयोग असह्य ही नहीं होते, अपितु अमानवीय भी होते हैं। इसके अतिरिक्त प्राणों के मूल्य पर सत्य का ज्ञान कोई महंगा सौदा नहीं है। विचार्य धर्मनिपुणैः सर्वधर्मविशारदैः । इदं सर्वर्तुकं प्रोक्तं पण्डितैर्घटधारणम् ॥ 260 ॥ 128 / नारदस्मृति

वास्तव में धर्मनिष्ठ, न्याय-विशारद, लोकप्रतिष्ठित, बुद्धिमान् एवं सदाचारी विद्वानों ने दिव्य प्रयोग सम्बन्धी दण्ड के रूप में सभी ऋतुओं में घट दिव्य को अपनाने का ही एकमत से समर्थन किया है। हस्तद्वयं तु निख्येमुक्तं मुण्डकयोः सदा। षड्ढस्तं तु तयोर्दृष्टं प्रमाणं परिणाहतः ॥ 261 ॥ घट दिव्य में छह हाथ विस्तृत दो दण्डों को दो हाथ गहरे गड्डों में दबाया जाता है। चतुर्हस्ता घटतुला पादौ चापि प्रकीर्तितौ । पादयोरन्तरं हस्तो भवेद्ध्यार्धमेव च ॥ 262 ॥ दो ऊंचे स्तम्भों के मध्य लगी तुला में चार हाथ ऊंचे पलड़े लटकते रहते हैं। दो पलड़ों के बीच डेढ़ हाथ की दूरी रहती है। एक पलड़े में अभियुक्त को बिठाया जाता है और दूसरे पलड़े में उसके शरीर के भार के समकक्ष स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह अथवा नकदी रखी जाती है। यही भार क्षति-पूर्ति के रूप में वादी को दिया जाता है। ऋज्वी घटतुला कार्या खादिरी तन्दुकापि वा। चतुरस्रा त्रिभिः स्थानैर्घटकर्कटकादिभिः ॥ 263 ॥ घट की तुला खदिर अथवा तन्दुक आदि की सीधी लकड़ी से बनानी चाहिए। विशेष प्रकार की चौकोर तराजू में तीन स्थानों पर कील लगे रहते हैं। इस लकड़ी पर लटके रहने के कारण तराजू के पलड़े झूलते रहते हैं। खादिरं कारयेत्तं च निर्व्रणं शुष्कवर्जितम् । शांशपं तदभावे च शालं वा कोटरैर्विना ॥ 264 ॥ तराजू बनाने के काम में लायी जाने वाली खदिर की लकड़ी सूखी, सीधी और गांठों से रहित होनी चाहिए। खदिर की लकड़ी न मिलने पर-शांशप की लकड़ी का तथा उसके भी सुलभ न होने पर-शाल की लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए। ध्यान यह रखना चाहिए कि तराजू बनाने के काम में आने वाली लकड़ी में खुरदरापन कदापि नहीं होना चाहिए। रन्दा से सही न हो सकने वाली लकड़ी का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। एवंविधानि काष्ठानि घटार्थे परिकल्पयेत् । समाराजकुलद्वारे सुरायतन चत्वरे ॥ 265 ॥ राजदरबार में, राजभवन में तथा देवमन्दिर में जहां कहीं भी घटतुला लगानी पड़े, वहां इसी प्रकार उपर्युक्त ढंग से निर्दिष्ट लकड़ी और खम्भों की व्यवस्था करनी चाहिए। निखेयो निश्चलः कार्यो गन्धमाल्यानुलेपनः । दध्यक्षतहविर्गन्धकृतपावनमङ्गलः ॥ 266 ॥ नारदस्मृति / 129

तुलाखण्ड को इस प्रकार स्थापित करना चाहिए, जिससे वह स्थिर और

तुलाखण्ड को इस प्रकार स्थापित करना चाहिए, जिससे वह स्थिर और निश्छल खड़ा रह सके। उसे गन्ध, माला और चन्दनादि के लेप से सजाना चाहिए, दही, अक्षत, गन्ध और हवि आदि से उसे पवित्र और मंगलमय स्वरूप प्रदान करना चाहिए। रक्षार्थमाहूतैर्लोकै लोकपालैरधिष्ठितः । सर्वदा स तु देयः स्यात् सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ 267 ॥ तुला की रक्षा के लिए लोकपालों का आवाहन करके उन्हें वहां अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिए। तुला के सम्बन्ध में सारी कार्यवाही सार्वजनिक रूप में, अर्थात् सभी लोगों की उपस्थिति में करनी चाहिए। अहोरात्रोषिते स्नाते आद्रवाससि मानवे । पूर्वाह्ने सर्वदिव्यानां प्रदानमनुकीर्तितम् ॥ 268 ॥ दिव्य परीक्षा देने वाले को दिन-रात का उपवास रखना होता है, उसे स्नान करके गीले वस्त्र पहने हुए पूर्वाह्न में ही तुला दिव्य कर्म करना होता है। शिरोपस्थायिनि नरे अभियोक्तर्युपस्थिते । दिव्यप्रदानं विहितमन्यत्र नृपहिंसनम् ॥ 269 ॥ दिव्य कर्म अभियोक्ता की उपस्थिति में ही किया जाना चाहिए। राजगृह में किसी प्रकार की सम्भावित हिंसा को टालने के लिए अभियोक्ता की अनुपस्थिति में भी दिव्य कर्म किया जा सकता है। अशिरंस्यपि दिव्यानि राजा भृत्येषु दापयेत् । अभियोगाभियुक्तानामन्येषां तु यथाक्रमम् ॥ 270 ॥ राजा (न्यायाधिकारी) अभियोग का विषय बने तथा दण्ड ग्रहण के अनिच्छुक अपने सेवकों को दिव्य परीक्षा देने के लिए बाध्य कर सकता है। सेवकों से भिन्न अभियुक्तों को दण्ड ग्रहण करने अथवा दिव्य कर्म से अपने को निर्दोष करने की छूट रहती है। राजा के सेवकों को यह छूट नहीं रहती। शिक्यद्वयं समासज्य घटकर्कटयोर्दृढम् । एकत्र शिक्ये पुरुषमन्यत्र तुलयेच्छिलाम् ॥ 271 ॥ घट के दोनों किनारों पर ठोकी गयी कील से उसे सुदृढ़ रूप देकर एक ओर शिला को रखकर, उसके दूसरी ओर बैठे परीक्षा देने वाले अभियुक्त को तोलना चाहिए। धारयेदुत्तरे पार्श्वे पुरुषं दक्षिणे शिलाम् । पिटिकां पूरयेत्तस्मिनिष्टकालोष्टपांशुभिः ॥ 272 ॥ घट के उत्तर पार्श्व में पुरुष को बिठाना चाहिए और दक्षिण-पार्श्व में शिला रखनी चाहिए। शिला धारण करने वाले पलड़े को पिटिका कहा जाता है। इस 130 / नारदस्मृति

पिटिका में शिला के स्थान पर उसी भार की ईंटें, मिट्टी का ढेला अथवा राख आदि को भी रखा जा सकता है। प्रथमारोपणे ग्राह्यं प्रमाणं निपुणैः सह। तुलाशिलाभ्यां तुल्यं च तोरणं न्यस्तलक्षणम् ॥ 273 ॥ पहली बार जब शिला अथवा ईंटों के भार के साथ पुरुष के भार की तुलना की जाती है, तो भार की जांच-परख में निपुण लोगों को वहां उपस्थित रहना चाहिए और यदि तुला और शिला का भार बराबर हो, अर्थात् तराजू के दोनों पलड़े समरूप हों, तो उस स्थिति को 'तोरण' का नाम देना चाहिए। सुवर्णकारा वणिजः कुशलाः कांस्यकारकाः। अवेक्षेरन् घटतुलां तुलाधारणकोविदाः ॥ 274 ॥ घट दिव्य के समय, तुला-धारण में विशिष्ट निपुणता प्राप्त स्वर्णकारों, कांस्यकारों, व्यापारियों तथा व्यवसायियों को घट तुला के निरीक्षण और सत्यापन के लिए निमन्त्रित ही नहीं करना चाहिए, अपितु उनकी उपस्थिति को सुनिश्चित भी करना चाहिए। तुलयित्वा नरं पूर्वं चिह्नं कृत्वा घटस्य च। कक्षास्थाने यदा तुल्यमवतार्य ततो घटात् ॥ 275 ॥ प्रथम पुरुष को तोलते हुए तुला में उत्कीर्ण चिह्नों पर उसके भार को अंकित कर देना चाहिए और पुनः व्यक्ति को तुला से उतार लेना चाहिए। समयैः परिगृह्यार्थं पुरारोपयेन्नरम्। निर्वाते वृष्टिरहिते शिरस्यारोप्य पत्रकम् ॥ 276 ॥ थोड़े समय के अन्तराल के पश्चात् पुरुष को फिर तुला पर चढ़ाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न तो वृष्टि होनी चाहिए और न ही पवन आन्दोलित होना चाहिए; क्योंकि आंधी-वर्षा में तुला के पलड़ों का अविचल रहना सम्भव नहीं होता। शान्त और निश्चल परिवेश में तोले जाने वाले व्यक्ति के सिर में एक लिखित पत्र रख देना चाहिए। इस पत्र के रखने का अभिप्राय यह है कि अभियुक्त अपने सिर पर किसी प्रकार का कोई भार रखकर कृत्रिम रूप से अपने वजन को बढ़ा हुआ न दिखा सके। तस्मिन्नेव समारूढे धृत्वा कक्षां द्विजो वदेत्। धर्मपर्यायवचनैर्घट इत्यभिधीयते ॥ 277 ॥ घट (तुला के पलड़े) में समारूढ़ होने के उपरान्त सच्चा सिद्ध होने वाला व्यक्ति लोक में धर्म के पर्यायवाची शब्द 'घट' नाम से अभिहित होता है। टिप्पणी—जिस प्रकार आज मुसलमान हज-मक्का-तीर्थ यात्रा करने के उपरान्त सम्मानसूचक 'हाजी' पदवी को धारण करता है, उसी प्रकार तुला- नारदस्मृति / 131

परीक्षा में खरा उतरने वाले व्यक्ति भी 'घटारोही' के रूप में लोक में प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्धि प्राप्त करता है। 'घट' को धर्म के पर्यायवाची शब्द के रूप में ही ग्रहण किया जाता है। घट-तुला के साथ हेराफेरी अथवा बेईमानी करने वाले के सम्बन्ध में 'सरस्वती विलास' ग्रन्थ में लिखा है- ब्रह्मघ्नेये स्मृता लोका ये लोकाः कूटसाक्षिणः। तुलाधारस्य ते लोकास्तुलां धारयतो मृषा॥ ब्रह्महत्या और मिथ्यासाक्ष्य देने वाले के समकक्ष ही तुला के साथ बेईमानी जघन्य पाप है। इन सब अपराधों का एक-समान भयंकर दण्ड मिलता है। त्वं वेत्सि सर्वभूतानां पापानि सुकृतानि च। व्यवहाराभिशस्तोष्यं मानवस्तुल्यते त्वया॥ 278॥ घट-तुला के समय विनम्र शब्दों में प्रार्थना करनी चाहिए-तुलादेव! तुम सभी प्राणियों के पाप-पुण्यों को भली प्रकार जानते हो, व्यवहार में अभिशस्त मनुष्य आपके द्वारा तुलित होता है, आप उसकी वास्तविकता के ज्ञाता हो, हमें उस सत्य से परिचित कराने की कृपा करो। देवासुरमनुष्याणां सत्ये त्वमतिरिच्यसे। त्वं तुले सत्यधामासि पुरा देवैर्विनिर्मिता॥ 279॥ तुलादेव! सत्य-ज्ञान तथा उसके प्रकाशन के सम्बन्ध में तो आप देवों से भी आगे हो। आप सत्य के धाम एवं अधिष्ठान हो। पूर्वकाल में देवों की रचना के समय ही आपकी भी रचना हुई थी-ऐसी लोकमान्यता है। तत्सत्यं वद कल्याणि संशयान्मां विमोचय। यद्यहं पापकर्मास्मि तदा त्वं मामधो नय॥ 280॥ अभियुक्त को तुला पर आरूढ़ होने से पूर्व प्रार्थना करनी चाहिए-तुलादेव! आप सत्य के ज्ञाता हो, मेरे सत्य को प्रकाशित करके मुझ पर लगे लाञ्छन से मुझे मुक्त करो। मुझे सन्देह के आवरण से बाहर निकालो। यदि मुझसे अनजाने में कोई पाप हो गया हो, तो उसके लिए मुझे क्षमा प्रदान करो। मुझे लोक में अपमानित होने से बचा लो। आप तो भली-भांति जानते हैं कि मैंने जान बूझकर कोई अपराध नहीं किया और फिर अनजाने में हो गये किसी कर्म पर मेरा वश नहीं है। इस प्रकार आप मेरी सहायता एवं रक्षा करो। शुद्धं चैवं विजानासि तत ऊर्ध्वं गृहाण माम्। तदेनं संशयारूढं धर्मतस्त्रातुमर्हसि॥ 281॥ यदि आप मुझे निष्पाप एवं निर्दोष मानते हैं, तो मेरे भार को हल्का करते हुए मुझे ऊपर उठाने की कृपा करें। सन्देह और संशय का केन्द्र बने मेरे सम्मान की

रक्षा आपके ही हाथ में है। मैं आपका शरणागत हूं, मेरा उद्धार करो। इत्यादि कृतश्रावणं लोकपालैः सुरैश्च वै। पुरुषं पुनरारूढं समुद्धृत्य निरीक्षयेत ॥ 282 ॥ इस प्रकार अभियुक्त द्वारा तुलादेव के अतिरिक्त दिक्पालों और लोकपालों की प्रार्थना करने के उपरान्त उसे तुला के पलड़े में बिठाना चाहिए और फिर पलड़े के उठने-न उठने को देखना-परखना चाहिए। तुलिता यदि वर्धेत स शुद्धः स्यान्न संशयः । समो वा हीयमानो वा अविशुद्धो भवेन्नरः ॥ 283 ॥ तुला के दूसरे पलड़े में रखी शिला के भार से अभियुक्त के पलड़े के ऊपर उठ जाने पर उसे असन्दिग्ध रूप से सर्वथा निर्दोष एवं निष्पाप मानना चाहिए। इसके विपरीत अभियुक्त वाले पलड़े के शिला वाले पलड़े के बराबर अथवा नीचे रहने पर उसे अशुद्ध-पापकर्ता घोषित करना चाहिए। कक्षाच्छेदे तुलाभङ्गे घटकर्कटयोस्तथा। रज्जुच्छेदेऽक्षभङ्गे च मूर्तितः शुद्धिमादिशेत् ॥ 284 ॥ तुला के आधार (दोनों पलड़ों को थामने वाला साधन-लकड़ी, लौह आदि) के चटक जाने पर, पलड़ों के चरमरा जाने पर, शिलाखण्ड के गिर-टूट जाने पर, रस्सी अथवा श्रृंखला के छिन्न-भिन्न हो जाने पर तथा खम्भों के गिर जाने पर अभियुक्त को निर्दोष समझना चाहिए। इनमें किसी के भी टूटने-फूटने अथवा गिरने-चटकने का अर्थ अभियुक्त को तोलने के रूप में अपमानित न होने देना है। तुलादेव, लोकपालों एवं दिक्पालों को यह सब सहज-स्वीकार्य नहीं है। अतः परं प्रवक्ष्यामि विधिमग्नेस्तथोत्तमम् । द्वात्रिंशदङ्गुलं प्राहुर्मण्डलान्मण्डलान्तरम् ॥ 285 ॥ अब हम तुला दिव्य के उपरान्त अग्नि दिव्य की विधि का वर्णन करेंगे। यहां संक्षेप में इतने कथन को पर्याप्त समझना चाहिए कि एक मण्डल से दूसरे मण्डल की दूरी बत्तीस अंगुल होती है। अष्टभिर्मण्डलैरवमङ्गुलानां शतद्वयम् । षट्पञ्चाशत्समधिकं भूमेस्तु परिकल्पना ॥ 286 ॥ दो सौ छप्पन अंगुलियों की परिसीमा-कनिष्ठिका अंगुलियों को अंगूठे तक फैलाया जाये, तो उसका विस्तार लगभग एक फुट होगा। इस प्रकार दो सौ छप्पन विस्तार का अर्थ लगभग पचासी गज़ लम्बी और पचासी गज़ चौड़ी धरती का घेराव होगा-में आठ मण्डलों का निर्माण करना चाहिए। सप्ताश्वत्थस्य पत्राणि अभियुक्तस्य हस्तयोः । कृत्वा न्यसेत्तु पत्राणि सप्तभिः सूत्रतन्तुभिः ॥ 287 ॥ नारदस्मृति / 133

दिव्य कर्म करने वाले के दोनों हाथों में पवित्र पीपल के सात पत्ते रखे जाते हैं और उन पत्तों को सात धागों से बांधा जाता है। जात्यैव लोहकारो यः कुशलश्चाग्निकर्मणि। दृष्टयोगश्चान्यत्रापि तेनायोऽग्नौ प्रतापयेत्॥ 288 ॥ जाति से लोहार तथा अग्निकर्म में कुशल होने के अतिरिक्त पहले से इस कार्य के अनुभवी-अभ्यस्त व्यक्ति को अग्नि में लोहे का गोला तैयार करने के लिए नियुक्त करना चाहिए। अग्निवर्णमयः पिण्डं सस्फुलिङ्गं सुरक्तिकम्। पञ्चाशत्पलिकं भूयः कृत्वैवं तं शुचिर्द्विजः ॥ 289 ॥ लोहे के गोले को इतना अधिक तपाना चाहिए कि वह लाल हो जाये और उससे चिंगारियां निकलने लगें। ऐसा हो जाने पर एक आचारनिष्ठ शुद्ध-पवित्र ब्राह्मण को अभियुक्त को शपथपूर्वक सचेत करते हुए इस प्रकार कहना चाहिए— तृतीयतापतातं तं ब्रूयात् सत्यपुरस्कृतः। श्रूयतां मानवो धर्मो लोकपालैरधिष्ठितः ॥ 290 ॥ भद्र ! मैं तुम्हें सचेत करता हूं और यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जितना तुम समझते हो, उससे तीन गुना अधिक ताप इस लौहपिण्ड में विद्यमान है, अर्थात् यह स्पर्शमात्र से दाहक है, परन्तु सत्यनिष्ठ के लिए शीतल है। इस सम्बन्ध में मनु तथा लोकपालों द्वारा अधिष्ठित महर्षियों द्वारा निर्दिष्ट निरूपित सत्य को सुनो। त्वमग्ने सर्वदेवानां पवित्रं परमं सुखम्। त्वमेतत् सर्वभूतानां हृदिस्थो वेत्सि चेष्टितम् ॥ 291 ॥ सभी वेदवेत्ता महात्माओं का मानना है कि अग्नि सभी देवों का परम पवित्र मुख है। वह सभी प्राणियों के मनोभावों, विचारों तथा चेष्टाओं का प्रत्यक्ष द्रष्टा एवं ज्ञाता है। सत्यानृते च जिह्वायास्त्वत्तः समुपजायते। वेदादिभिरिदं प्रोक्तं नान्यथा कर्त्तुमर्हसि ॥ 292 ॥ जिह्वा से उच्चरित होने वाला सत्य तथा असत्य अग्निदेव से छिपा नहीं रहता—वेदशास्त्रों का यह सर्वसम्मत मत है। अतः हे अग्निदेव ! इस अभियुक्त के भी सच्चा-झूठा होने का निर्धारण आपको ही करना है। अनेनायमिदं प्रोक्तो मिथ्या चेदमथाब्रवीत्। सर्वथा च यथा मिथ्या तथाग्निं धारयाम्यहम् ॥ 293 ॥ हे अग्निदेव ! अभियोक्ता ने अभियुक्त को अपना अपराध स्वीकार करने के लिए पर्याप्त समझाया-बुझाया है और आपसे अपनी वास्तविकता को छिपा न पाने के प्रति भी भली प्रकार सतर्क किया है, फिर भी वह अपने हठ पर अडिग है और 134 / नारदस्मृति

आपको (अग्नि को) धारण कर एवं साक्षी मानकर अपनी निर्दोषिता सिद्ध करने के लिए उद्यत है। एष धारयते च त्वां सत्येनानेन मानवः। तदस्य सत्यवाक्यस्य शीतो भव हुताशन ॥ 294 ॥ हे अग्निदेव ! अभियुक्त अपनी निर्दोषिता को प्रमाणित करने के लिए आपको धारण करने जा रहा है। यदि यह व्यक्ति सचमुच निर्दोष एवं शुद्ध चरित्र है, तो आप अपनी दाहकता को त्याग कर शीतल हो जायें। अमुमर्थं च पत्रस्थमभिलिख्य यथार्थतः। श्रावितस्यैवं तन्मूर्ध्नि तस्य देयं यथाक्रमम् ॥ 295 ॥ उपर्युक्त प्रार्थना को यथार्थ में लिखकर अभियुक्त को और उपस्थित व्यक्तियों को सुनाना चाहिए तथा प्रार्थना-पत्र को अभियुक्त के सिर पर बांध देना चाहिए। तत्पश्चात् यथानिर्दिष्ट विधि से क्रमानुसार उसे लौहपिण्ड देना चाहिए। स्नातश्च मण्डलस्थश्च ततः संगृह्य पावकम्। स्थित्वैकस्मिन् ततोऽन्यानि व्रजेत् सप्त शनैःशनै ॥ 296 ॥ अभियुक्त को स्नान-ध्यान के उपरान्त एक मण्डल पर खड़ा हो जाना चाहिए और फिर हाथ में लौहपिण्ड को धारण कर एक से दूसरे मण्डल पर धीरे-धीरे चल कर-भागकर कदापि नहीं - आगे बढ़ना चाहिए। पातयेन्न तमप्राप्य या भूमिः परिकल्पिता। अष्टमं मण्डलं गत्वा ततोऽग्निं विसृजेन्नरः ॥ 297 ॥ एक मण्डल से दूसरे मण्डल पर जाने के लिए घेरी गयी धरती पर पैर बढ़ाते समय लौहपिण्ड को फेंक नहीं देना चाहिए, अपितु पूरा समय, अर्थात् आठ मण्डलों पर पहुंचने तक, लौहपिण्ड धारण किये रहना चाहिए। आठवें मण्डल पर पहुंचने के उपरान्त ही लौहपिण्ड का विसर्जन करना चाहिए। टिप्पणी - 'सरस्वती विलास' के अनुसार अभियुक्त को एक-एक मण्डल पार करते समय हाथ पर बंधे पीपल के सात पत्तों को भी एक-एक कर फेंकते जाना चाहिए। इस प्रकार एक-एक पत्ते के फेंकने को एक-एक परीक्षा में उत्तीर्णता समझना चाहिए। आठवें मण्डल पर पहुंचना, निर्दोषिता की सिद्धि को सार्वजनिक करना होगा। यस्तु पातयते त्रासादग्धो वा न विभाष्यते। पुनस्तं धारयेदग्निं स्थितिरेव दृढीकृता ॥ 298 ॥ भय से लौहपिण्ड को सहसा अथवा देर में फेंक देने वाला अथवा हाथ जला बैठने वाला अभियुक्त वैसे तो अपराधी निर्णीत माना जाता है, फिर भी उसके अनुरोध करने पर उसे एक बार फिर अपने को निर्दोष सिद्ध करने का अवसर देना नारदस्मृति / 135

चाहिए—ऐसा शास्त्रसम्मत निर्देश है। शास्त्र के अनुसार सहमे अभियुक्त द्वारा अनुरोध न किये जाने पर उससे एक बार पुनः प्रयास करने की इच्छा अनिच्छा के सम्बन्ध में पूछना चाहिए। टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार—भय के कारण लौहपिण्ड के अभियुक्त के हाथ से गिर जाने तथा हाथ के जलने न जलने के सम्बन्ध में अनिश्चय होने पर अभियुक्त की जय पराजय को निर्णीत नहीं मान लेना चाहिए। सन्देह की निवृत्ति के लिए उसे पुनः एक अवसर देना चाहिए—त्रासात्पातितदिव्ये दग्धादग्धसंशये च न जयो नापराधः न पराजय इत्यर्थः। अतस्तं परं पुनर्द्दिव्यं धारयेन्निःसंशयार्थमिति। मण्डलस्य प्रमाणं तु कुर्यात्तत्पद सम्मितम्। न मण्डलमत्तिक्रामेन्नाप्यर्वाक् स्थापयेत्पदम्॥ २९९॥ मण्डलों का क्षेत्रफल—लम्बाई, चौड़ाई (घेराव)—अभियुक्त के पैर की चाल—एक पग कितना लम्बा रखता है—के अनुसार बनाना चाहिए। यदि इस तथ्य की उपेक्षा करके घेरा (सर्कल) बनाया जाता है, तो अभियुक्त सभी मण्डलों तक पहुंच नहीं पाता। उसके लिए सारे क्षेत्र को पार करना कठिन हो जाता है अथवा यदि उसका पैर अधिक बड़ा है, तो एक साथ दो मण्डलों को घेर लेता है। इस प्रकार अभियुक्त की गति क्षमता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपितु उसके आधार पर ही क्षेत्र के आकार का निर्धारण करना चाहिए। टिप्पणी—स्मृतिचन्द्रिकाकार ने अग्नि दिव्य के सम्बन्ध में एक अन्य सावधानी बरतने के प्रति सतर्क किया है। उसके अनुसार—तप्त लौहपिण्ड को हाथों में लेने वाले अभियुक्त के दोनों हाथों की भली प्रकार परीक्षा करते हुए यह देखना चाहिए कि उन हाथों में कोई घाव तो नहीं है अथवा कोई गुप्त चर्मरोग तो नहीं है अथवा उसने अग्नि की दाहकता से बचने के लिए कोई औषध तो नहीं लगा रखी है। लक्षयेत्तस्य चिह्नानि हस्तयोरुभयोरपि। प्राकृतानि च गूढानि सव्रणान्यव्रतानि च॥ अनेन विधिना कार्यो हुताशः समयः सदा। ऋते ग्रीष्मात् सदा युक्तः कालेऽन्यत्र सुशीतले॥ ३००॥ ग्रीष्म ऋतु और शीत ऋतु को छोड़कर शेष ऋतुओं—हेमन्त, शिशिर, वसन्त और वर्षा—में उपर्युक्त विधि से अग्नि दिव्य किया जाता है। हस्तक्षतेषु सर्वेषु कुर्यात् काकपदानि च। तान्येव पुनरवेक्षेद्व्रस्तौ बिन्दुविचित्रितौ॥ ३०१॥ अग्नि दिव्य करने वाले अभियुक्त के हाथों के क्षत-विक्षत हो जाने पर व्रणों 136 / नारदस्मृति

पर कौए के पंख से काले पैरों के चिह्न बना देने चाहिए। इस प्रकार बिन्दुओं से चिह्नित उन हाथों का भली प्रकार निरीक्षण करना चाहिए। यत्पुनर्न विभाव्येते दग्धावेतौ करौ तदा। व्रीहीन् प्रगृह्य यत्नेन सप्त वारांस्तु मर्दयेत् ॥ 302 ॥ अग्नि दिव्य में उपर्युक्त क्रिया से काम न चलने पर अभियुक्त के दोनों हाथों में अथवा दोनों में से एक दायें अथवा बायें हाथ के जलने न जलने के सम्बन्ध में सन्देह अथवा विवाद उत्पन्न हो जाने पर शरद ऋतु में पके धान्य को अभियुक्त के हाथों पर सात बार रगड़ना-मलना चाहिए। इससे वास्तविकता स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आ जायेगी। मर्दितैर्यदि नो दग्धः सभ्यैरेवं विनिश्चितः। मोच्यः स शुद्धः सत्कृत्य दग्धो दण्ड्यो यथाक्रमम् ॥ 303 ॥ अभियुक्त के हाथों पर धान्य के मर्दन के उपरान्त सभ्यों द्वारा हाथों के न जला होने का निर्णय करना चाहिए और इसके विपरीत हाथ के दग्ध पाये जाने पर उसे नियमानुसार दण्डित करना चाहिए। अतः परं प्रवक्ष्यामि पानीयविधिमुत्तमम्। हेमन्तकालादन्यत्र शिशिराच्च यथाक्रमम् ॥ 304 ॥ अग्नि दिव्य के वर्णन के उपरान्त अब हम जल दिव्य की विधि का परिचय देंगे। यह जल दिव्य हेमन्त और शिशिर ऋतु में नहीं करना चाहिए! शेष ऋतुओं में इसका प्रयोग उपयोग किया जा सकता है। नदीषु नातिवेगासु सागरेषु वहेषु च। ह्रदेषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च ॥ 305 ॥ जल दिव्य निम्नोक्त सभी प्रकार के जल-स्रोतों में किया जा सकता है, परन्तु विचारणीय केवल यह है कि निर्वाचित जल-स्रोत का प्रवाह अतितीव्र न हो, अर्थात् व्यक्ति जल के बीच ठहरने में असुविधा अनुभव न करे। ये जल-स्रोत हैं- नदियां, सागर, नद (दरिया), हृद (कच्चे तालाब, जोहड़), बावलियां, झीलें, सरोवर, प्रस्रवण तथा प्रपात (झरना) आदि। नाति क्रूरेण धनुषा प्रेषयित्वा शरत्रयम्। पानीयमज्जनं कार्यं कियच्च विपश्चितः ॥ 306 ॥ विद्वानों के अनुसार जल स्रोतों की गहराई ऊंचे क़द वाले व्यक्ति के चार हाथों की लम्बाई से, मध्यम स्तर के लम्बे शरीर वाले व्यक्ति के पांच हाथों की लम्बाई से और छोटे क़द-काठी व्यक्ति वाले के छह हाथों की लम्बाई से अधिक नहीं होनी चाहिए। अधिक गहरे पानी में व्यक्ति का ठहर पाना सम्भव ही नहीं हो पाता। वस्तुतः यह कहना चाहिए कि जल स्रोत की गहराई व्यक्ति की कमर अथवा अधिक से अधिक सीने तक ही होनी चाहिए। नारदस्मृति / 137

जल में स्थित अभियुक्त को साधारण धनुष से तीन छोड़े गये बाणों से बींधा जाता है। इससे उसका जल में डूबने लगना न लगना ही उसके सच्चा-झूठा होने का निर्णायक तत्त्व है। क्रूरं धनुः सप्तशतं मध्यमं षट्शतं स्मृतम्। मन्दं पञ्चशतं ज्ञेयमेष ज्ञेयो धनुर्विधिः ॥ 307 ॥ सात सौ, छह सौ और पांच सौ अंगुल लम्बे धनुषों को क्रमशः क्रूर, मध्यम और मन्द (साधारण) माना गया है। नाभिमात्रे जले स्थाप्यः पुरुषः स्तम्भवद्बली। तस्योरू सम्प्रगृह्याय निमज्जेदभिशस्तवन् ॥ 308 ॥ एक बलवान् पुरुष को नाभि तक गहरे पानी में स्तम्भ की भांति ठहरा दिया जाता है। अभिशस्त व्यक्ति बलवान् व्यक्ति के घुटने को पकड़कर डुबकी लगाता है। शरप्रक्षेपणस्थानाद्युवा जवसमन्वितः। गच्छेत् परमया शक्त्या यत्र स्यान्मध्यमः शरः ॥ 309 ॥ एक युवक अपनी पूरी शक्ति को लगाकर भारी वेग से दौड़ता हुआ शर के प्रक्षेपण स्थल से शर-स्थान की ओर जाता है। मध्यमं तु शरं गृह्य पुरुषोऽन्यस्तथाविधिः। प्रत्यागच्छेत वेगेन यतः स पुरुषो गतः ॥ 310 ॥ दूसरा पुरुष मध्यम शर को लेकर ठीक उसी स्थान पर आ जाता है, जहां पहला व्यक्ति ठहरा हुआ है। आगतश्च शरग्राही न पश्यति यदा जले। अन्तर्जलं यदा सम्यक् तदा शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ 311 ॥ अभिशस्त पुरुष द्वारा शर को लाने वाले पुरुष को न देख पाना, अर्थात् इस अवधि में जल में डूबे रहना अभिशस्त की शुद्धि का प्रमाण माना जाता है। अन्यथा न विशुद्धः स्यादेकाङ्गस्यापि दर्शनात्। स्थानाद्वान्यत्र गमनाद्यस्मिन् पूर्वं निवेशितः ॥ 312 ॥ इसके विपरीत अभिशस्त व्यक्ति के समग्र शरोर के अथवा कुछ अंगों के दीख जाने पर अथवा उसके बहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने पर उसे निर्दोष घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसे व्यक्ति को अपराधी मानकर दण्ड देना ही उचित है। न मज्जनीयं स्त्रीबालं धर्मशास्त्रविशारदैः। रोगिणश्चापि वृद्धाश्च पुमांसो ये च दुर्बलाः ॥ 313 ॥ धर्मशास्त्रकारों के अनुसार-स्त्रियों, बालकों, वृद्धों तथा रोगियों को जल दिव्य-अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने के लिए जल में डुबोना-की अनुमति कदापि नहीं देनी चाहिए। 138 / नारदस्मृति

निरुत्साहान् रुजा क्लिष्यन्तार्ताँश्च न निमज्जयेत्। सद्यो म्रियन्ते मजन्तः स्वल्पप्राणा हि ते स्मृताः ॥ 314 ॥ उत्साहहीन लोगों, रोग-पीड़ितों तथा दुःख-शोक-सन्तप्तों को भी जल दिव्य की अनुमति नहीं देनी चाहिए; क्योंकि ये लोग अपने मनोबल के क्षीण होने के कारण तत्काल घबरा जाते हैं और तनावग्रस्त होकर पानी में स्थिर नहीं रह पाते, अपितु डूबकर शीघ्र ही मर जाते हैं। साहसेनागतानेतानैव तोये निमज्जयेत्। न चापि साधयेदग्निं न विषेण विशोधयेत् ॥ 315 ॥ जल दिव्य के लिए साहस जुटाकर सहमत होने पर भी जल में उतरने से बिदक जाने वालों की निर्दोषिता की सिद्धि के लिए अग्नि दिव्य तथा विष दिव्य आदि साधनों-उपायों को कदापि नहीं अपनाना चाहिए। सत्यानृताविभागस्य तोयाग्नी स्पष्टकृत्तमौ। अद्भ्यश्चाग्निरभूद्यस्मात्तस्मात्तोये विशेषतः ॥ 316 ॥ वस्तुतः किसी भी अभियुक्त के सच्चा-झूठा होने के निर्णय के लिए अग्नि और जल आदि स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष प्रमाणों के समान कोई दूसरा साधन नहीं है। अग्नि की उत्पत्ति जल से हुई है, अतः जल की विशिष्टता-महत्ता तो असन्दिग्ध एवं निर्विवाद भी है। क्रियते धर्मतत्त्वज्ञैर्दूषितानां विशोधनम्। तस्मात् सत्येन भगवज्जलेश त्रातुमर्हसि ॥ 317 ॥ अतः धर्म-तत्त्वज्ञ सिद्ध-पुरुष तथाकथित दोषियों को अपनी निर्दोषिता को प्रमाणित करने के लिए जल दिव्य को अपनाने का परामर्श देते हैं। उनके अनुसार अभिशस्त व्यक्ति को जल देवता से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे वरुणदेव! मैं आपकी शरण में आया हूं, आप तो सर्वज्ञ हैं, आप मेरी वास्तविकता से भी परिचित हैं। अतः आप ही मुझ पर लगे मिथ्या आरोप के कलंक से मुझे मुक्त एवं शुद्ध कर सकते हैं। आप मुझे अपनी कृपा से वञ्चित न करें। अतः परं प्रवक्ष्यामि विषस्य विधिमुत्तमम्। यस्मिन् काले यथा प्रोक्तं यादृशं परिकीर्तितम् ॥ 318 ॥ अब हम सही ढंग से विष विधि का परिचय देंगे और यह बतायेंगे कि कब, कैसे और किस रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। यावन्मात्रं समुद्दिष्टं धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः। तुलयित्वा शरत्काले देयमेतद्धिमागमे ॥ 319 ॥ नारदस्मृति / 139

विष दिव्य के अन्तर्गत धर्मशास्त्रियों ने विष के जितने परिमाण के सेवन का उल्लेख किया है, हेमन्त ऋतु में विष का उतना वज़न तुला में तोलकर रख देना चाहिए और शरद ऋतु के आने पर उसका उपयोग करना चाहिए। नापराह्ने न सन्ध्यायां न मध्याह्ने तु धर्मवित्। शरदग्रीष्मवसन्तेषु वर्षासु च विवर्जयेत् ॥ ३२०॥ धर्मशास्त्रियों के मतानुसार विष दिव्य के प्रयोग के उपयुक्त समय हैं— अपराह्न, सन्ध्याकाल, मध्याह्न, शरद ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वसन्त ऋतु तथा वर्षा ऋतु। अभिप्राय यह है कि शरद, वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में मध्याह्न, अपराह्न तथा सन्ध्याकाल में विष दिव्य का प्रयोग करना उचित है। भग्नं च चारितं चैव धूपितं मिश्रितं तथा। कालकूटमलाबुं च विषं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ३२१॥ सभी शास्त्रकारों ने एक मत से तिल-घी से चुपड़े-लिथड़े, गरम-तप्त किसी सुगन्धित पदार्थ में मिले घुले तथा कालकूट और अलाबु से बनने वाले विष के प्रयोग का निषेध किया है। वस्तुतः ऐसे विष व्यक्ति के शरीर पर घाव, खुजली, पीड़ा आदि के अतिरिक्त चमड़ी को झुलसाने वाले होते हैं। मानवीय आधार पर भी इनका प्रयोग सर्वथा अवाञ्छनीय होता है। शार्ङ्गं हैमवतं शस्तं वर्णगन्धरसान्वितम्। अभिन्नं तत् . प्रदातव्यं क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥ ३२२॥ उत्तम वर्ण, गन्ध व रस वाला विष हिमालय के शृंग (शिखर) पर उत्पन्न होता है, जो 'शार्ङ्ग' नाम से जाना जाता है। यह प्राकृतिक विष है, इसमें किसी प्रकार की कोई कृत्रिमता नहीं है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अभियुक्त-अभिशस्त होने पर उन्हें विष दिव्य के अन्तर्गत इसी प्राकृतिक विष का सेवन कराना चाहिए। विषस्य पलषड्भागाद्भागो विंशतिमस्तु यः। तमष्टभागहीनं तु शोध्ये दद्यात् घृतप्लुतम् ॥ ३२३ ॥ विष दिव्य के अन्तर्गत कितने वज़न में और किस रूप में विष देना चाहिए— इस सम्बन्ध में आचार्यों का मत है कि सात जौ के परिमाण भर विष ही पर्याप्त है। इसे शास्त्रीय भाषा में इस प्रकार कहा गया है—एक सौ साठ यवों का एक पल होता है। इस पल के छठे भाग लगभग 27 यवों में से बीस यव निकाल देने चाहिए। अब बचे सात यवों में से भी आठवां भाग निकाल देना चाहिए, इस प्रकार 6 7 यवों के भार बराबर विष में घी मिलाकर सेवन कराना चाहिए। रूखा विष कभी नहीं देना चाहिए। वर्षासु षड्यवा मात्रा ग्रीष्मे पञ्च यवाः स्मृताः। हेमन्ते सप्त चाष्टौ वा शरद्यस्यापि नेष्यते ॥ ३२४॥ 140 / नारदस्मृति

वर्षा ऋतु में छह यव, ग्रीष्म ऋतु में पांच यव और हेमन्त ऋतु में सात अथवा आठ यव परिमाण जितने विष का सेवन कराना चाहिए, शरद् ऋतु में विष का सेवन सर्वथा वर्जित है। त्वं विषं ब्रह्मणः पुत्रः सत्यधर्मव्यवस्थितः। शोधयेत्तं नरं पापात् सत्येनास्यामृतो भव॥ 325 ॥ विष सेवन कराने से पूर्व विष को हाथ में लेकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए—हे विष! आप ब्रह्माजी की सन्तान होने से सत्स्वरूप हैं। धर्म और सत्य की व्यवस्था का भार आपके सिर पर है। अमुक अभियुक्त आपकी शरण में आया है, आप उसके लिए अमृत बनकर उसकी सत्यता को प्रकाशित करके व उसकी निष्पापता को सार्वजनिक करके उसे कृतकृत्य कर दें। छायानिवेशितो रक्ष्यो दिनशेषमभोजनः। विषवेगकलमातीतः शुद्धोऽसौ मनुरब्रवीत् ॥ 326 ॥ मनु महाराज के अनुसार विष सेवन करने वाले अभियुक्त को दिन के समय एक तो शीतल स्थान पर—वृक्ष की छाया, भवन के भीतर—रखना चाहिए तथा दूसरे, उसे खाने के लिए कुछ नहीं देना चाहिए, अर्थात् उपवास कराना चाहिए। विष के प्रभाव से अभियुक्त के मुख की कान्ति के मलिन न पड़ने, अर्थात् पूर्ववत् तेजोमय बने रहने तथा व्यक्ति के स्वास्थ्य में विकार न आने, अर्थात् पूर्ववत् स्फूर्त बने रहने पर उसे शुद्ध एवं निर्दोष प्रमाणित मानना चाहिए। अतः परं प्रवक्ष्यामि कोशस्य विधिमुत्तमम्। शास्त्रविद्भिर्र्यथा प्रोक्तं सर्वकालाविरोधि यत्॥ 327 ॥ अब हम सर्वोत्तम दिव्य कोश की विधि का वर्णन करेंगे। यहां इतना समझना चाहिए कि सभी देशों और कालों के सभी आचार्यों ने इस विधि को एकमत से सर्वश्रेष्ठ दिव्य घोषित किया है। इसका प्रयोग सर्वत्र समान रूप से मान्य एवं प्रचलित है। पूर्वाह्ने सोपवासस्य स्नातस्यार्द्रपटस्य च। सशूकस्याव्यसनिनः कोशपानं विधीयते॥ 328 ॥ उल्लेखनीय यह है कि इस दिव्य का अधिकार केवल आस्तिक और व्यसनमुक्त व्यक्ति को है। वेदों और ईश्वर पर आस्था न रखने वाले तथा किसी दुर्व्यसन का शिकार बने व्यक्ति को तो इस दिव्य के सम्बन्ध में सोचना ही नहीं चाहिए। यद्भक्तः सोऽभियुक्तः स्यात्तद्दैवतं तु पापयेत्। अभ्यर्च्य देवतां स्नाप्य जलस्य प्रसृतित्रयम्॥ 329 ॥ किसी भक्त के अभियुक्त होने पर उसके स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होने पर उसे उसके आराध्य देव का पाद्य अर्घ्य तथा आचमनीय आदि के उपरान्त धूप नारदस्मृति / 141

दीप, नैवेद्य आदि से अर्चन-पूजन करने के लिए कहना चाहिए। इस पूजन से निवृत्त हुए भक्त को तीन बार उसके आराध्य देव के चरणोदक का आचमन कराना चाहिए। सप्ताहाभ्यन्तरे यस्य द्विसप्ताहेन वाशुभम्। प्रत्यात्मिकं तु दृश्येत सैव तस्य विभावना ॥ 330 ॥ कोश दिव्य के प्रति समर्पित अभियुक्त व्यक्ति की स्वयं की अथवा उसके किसी आत्मीय व्यक्ति की एक सप्ताह अथवा दो सप्ताहों के भीतर हानि होने अथवा क्षति पहुंचने पर उसे झूठा और दोषी समझना चाहिए, अन्यथा उसे सर्वथा शुद्ध, निर्दोष और सच्चा प्रमाणित मानना चाहिए। ऊर्ध्वं यस्य द्विसप्ताहान्महदप्यशुभं भवेत्। नाभियोज्यः स केनापि कृतकालव्यतिक्रमात् ॥ 331 ॥ दो सप्ताहों के उपरान्त अभियुक्त के साथ घटने वाली किसी अशुभ घटना का सम्बन्ध कोश दिव्य के साथ नहीं जोड़ना चाहिए; क्योंकि परीक्षा के लिए निर्धारित समय बीत चुका होता है और एक बार निर्दोष घोषित व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। अभियुक्त समय-सीमा के लिए प्रतिबद्ध होता है, न कि जीवन-भर के लिए उत्तरदायी होता है। महापराधे निर्धर्मे कृतघ्ने क्लीवकुत्सिते। नास्तिकव्रात्यदासेषु कोशपानं विवर्जयेत् ॥ 332 ॥ कोशपान सामान्य अपराधों के लिए है, किसी बहुत बड़े अपराध, यथा ब्रह्महत्या, गोवध व गुरुपत्नी-गमन आदि के हो जाने पर इस दिव्य का प्रयोग वर्जित है। किसी धर्मरहित स्थल—द्यूतशाला तथा वेश्यागृह आदि—में हुए पाप में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कृतघ्न, क्लीव, कुत्सित, नास्तिक, व्रात्य (आचार-भ्रष्ट तथा अतिच्युत) और दासों के लिए भी यह प्रयोग निषिद्ध है। केवल धर्मनिष्ठ एवं आचार-परायण द्विजों के लिए ही यह प्रयोग है। संक्षेपतः धर्मभीरु पुरुषों पर लगे साधारण अपराधों के आरोप की सत्यता- असत्यता के निर्णय के लिए कोशपान का विधान है। यथोक्तेन विधानेन पञ्चदिव्यानि धर्मवित्। दत्त्वा राजाभिशस्तानां प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ 333 ॥ राजा उपर्युक्त विधि के अनुसार पांच दिव्यों—घट दिव्य, अग्नि दिव्य, जल दिव्य, विष दिव्य तथा कोश दिव्य—से अभियुक्तों को अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने का अवसर देने के रूप में न्याय की रक्षा करने के पुण्य के फलस्वरूप इस लोक में तथा परलोक में सुख भोगता है और यश अर्जित करता है। 142 / नारदस्मृति

ग्रीष्मे तु सलिलं प्रोक्तं विषं काले सुशीतले। ब्राह्मणस्य घटो देयः क्षत्रियस्याग्निरुच्यते ॥ 334 ॥ जल दिव्य का प्रयोग केवल ग्रीष्मकाल में और विष दिव्य का प्रयोग केवल शीतकाल में ही करना चाहिए। ब्राह्मण के लिए घट दिव्य का तथा क्षत्रिय के लिए अग्नि दिव्य का प्रयोग शास्त्र-सम्मत है। वैश्यं तु सलिलं देयं विषं शूद्रे प्रदापयेत्। न ब्राह्मणं विषं दद्यान्न लोहं क्षत्रियो हरेत् ॥ 335 ॥ ब्राह्मण को विष दिव्य और क्षत्रिय को लौह दिव्य कभी नहीं देना चाहिए। वैश्य को जल दिव्य और शूद्र को विष दिव्य दिया जाता है। कोशान्तानि तुलादीनि गुरुष्वर्थेषु दापयेत्। शतार्धं दापयेच्छुद्धावशुद्धो दण्डभागभवेत् ॥ 336 ॥ बड़े पापों के मामलों में भी अभियुक्त द्वारा तुला दिव्य से कोश दिव्य तक किसी दिव्य को अपनाने—अपने को उस दिव्य द्वारा निर्दोष सिद्ध करने का अवसर प्रदान करने—का आग्रह करने पर उसे अवसर तो देना चाहिए, परन्तु यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उसके शुद्ध-निर्दोष सिद्ध होने पर भी उसे वादी को एक सौ पचास पणों का भुगतान करना पड़ेगा। तण्डुलानां प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणचोदितम्। चौर्ये तु तण्डुला देया नान्यत्रेति विनिश्चयः ॥ 337 ॥ अब हम तण्डुलों के सेवन से सम्बन्धित दिव्य विधि की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। तण्डुल एकान्त में चोरी से दिये जाते हैं। तण्डुलों के आदान-प्रदान को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। तण्डुलान् कारयेच्छुक्लाञ्छालेर्नान्यस्य कस्यचित्। मृण्मये भाजने कृत्वा भास्करस्याग्रतः शुचिः ॥ 338 ॥ चावलों को भूसी से अलग और साफ़ सुथरा करके मिट्टी के पात्र में भर देना चाहिए और उस पात्र को सूर्यदेव के सामने रख देना चाहिए। स्नानोदकेन सम्पृक्तान् रात्रौ तत्रैव वासयेत्। प्रभातायां रजन्यां तु त्रिः कृत्वा प्राङ्मुखाय च ॥ 339 ॥ रात्रि में स्नान करके व चावलों को शुद्ध करके जल में भिगोकर रख देना चाहिए। प्रातःकाल उठकर पूर्वाभिमुख होकर उन्हें शुद्ध जल से तीन बार भली प्रकार धोकर साफ़ करना चाहिए। स्नानाय सोपवासाय दद्याद्देवार्चकः स्वयम्। स्वयं कार्यं समुद्दिश्य सत्यासत्यपरीक्षणे ॥ 340 ॥ तण्डुल दिव्य करने वाले को स्नान आदि से शुद्ध होकर व उपवास रखकर नारदस्मृति / 143