भारतकोश
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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ श्रीहरिः ॥

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संक्षिप्त

पद्मपुराण

[ केवल हिन्दी ]


गीताप्रेस, गोरखपुर

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संक्षिप्त

पद्मपुराण

(सचित्र, केवल हिन्दी)


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


सम्पादक तथा संशोधक
जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक—गोबिन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर


सं० २०४३ से २०५६ तक — ७५,०००
सं० २०५८ बारहवाँ संस्करण — ५,०००
योग ८०,०००


मूल्य—एक सौ बीस रुपये


मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
फोन : ( ०५५१ ) ३३४७२१; फैक्स ३३६९९७
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नम्र निवेदन

शास्त्रोंमें पुराणोंकी बड़ी महिमा है। उन्हें साक्षात् श्रीहरिका रूप बताया गया है। जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌को आलोकित करनेके लिये भगवान् सूर्यरूपमें प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकार—भीतरी अन्धकारको दूर करनेके लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैं।* जिस प्रकार त्रैवर्णिकोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय नित्य करनेकी विधि है, उसी प्रकार पुराणोंका श्रवण भी सबको नित्य करना चाहिये—‘पुराणं शृणुयान्नित्यम्’। पुराणोंमें अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारोंका बहुत ही सुन्दर निरूपण हुआ है और चारोंका एक-दूसरेके साथ क्या सम्बन्ध है—इसे भी भलीभाँति समझाया गया है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है—

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते ।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥

<div align="right">(१।२।९-१०)</div>

‘धर्मका फल है—संसारके बन्धनोंसे मुक्ति, भगवान्‌की प्राप्ति। उससे यदि कुछ सांसारिक सम्पत्ति उपार्जन कर ली तो यह उसकी कोई सफलता नहीं है। इसी प्रकार धनका फल है—एकमात्र धर्मका अनुष्ठान; वह न करके यदि कुछ भोगकी सामग्रियाँ एकत्र कर लीं तो यह कोई लाभकी बात नहीं है।

भोगकी सामग्रियोंका भी यह लाभ नहीं है कि उनसे इन्द्रियोंको तृप्त किया जाय; जितने भोगोंसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतने ही भोग हमारे लिये पर्याप्त हैं तथा जीवन-निर्वाहका—जीवित रहनेका फल यह नहीं है कि अनेक प्रकारके कर्मोंके पचड़ेमें पड़कर इस लोक या परलोकका सांसारिक सुख प्राप्त किया जाय। उसका परम लाभ तो यह है कि वास्तविक तत्त्वको—भगवत्तत्त्वको जाननेकी शुद्ध इच्छा हो।’

यह तत्त्व-जिज्ञासा पुराणोंके श्रवणसे भलीभाँति जगायी जा सकती है। इतना ही नहीं, सारे साधनोंका फल है—भगवान्‌की प्रसन्नता प्राप्त करना। यह भगवत्प्रीति भी पुराणोंके श्रवणसे सहजमें ही प्राप्त की जा सकती है। पद्मपुराणमें लिखा है—

तस्माद्यदि हरेः प्रीतेरुत्पादे धीयते मतिः ।
श्रोतव्यमनिशं पुम्भिः पुराणं कृष्णरूपिणः ॥

<div align="right">(पद्म० स्वर्ग० ६२।६२)</div>

‘इसलिये यदि भगवान्‌को प्रसन्न करनेका मनमें सङ्कल्प हो तो सभी मनुष्योंको निरन्तर श्रीकृष्णके अङ्गभूत पुराणोंका श्रवण करना चाहिये।’ इसीलिये पुराणोंका हमारे यहाँ इतना आदर रहा है।

वेदोंकी भाँति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि माने गये हैं। उनका रचयिता कोई नहीं है। सृष्टिकर्ता


* यथा सूर्यवपुर्भूत्वा प्रकाशाय चरेद्धरिः। सर्वेषां जगतामेव हरिरालोकहेतवे ॥
तथैवान्तःप्रकाशाय पुराणावयवो हरिः। विचरेदिह भूतेषु पुराणं पावनं परम् ॥

<div align="right">(पद्म० स्वर्ग० ६२।६०-६१)</div>


ब्रह्माजी भी उनका स्मरण ही करते हैं। पद्मपुराणमें लिखा है—‘पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।’ इनका विस्तार सौ करोड़ (एक अरब) श्लोकोंका माना गया है—‘शतकोटिप्रविस्तरम्।’ उसी प्रसङ्गमें यह भी कहा गया है कि समयके परिवर्तनसे जब मनुष्यकी आयु कम हो जाती है और इतने बड़े पुराणोंका श्रवण और पठन एक जीवनमें मनुष्योंके लिये असम्भव हो जाता है, तब उनका संक्षेप करनेके लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापर युगमें व्यासरूपसे अवतीर्ण होते हैं और उन्हें अठारह भागोंमें बाँटकर चार लाख श्लोकोंमें सीमित कर देते हैं। पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही भूलोकमें प्रकाशित होता है। कहते हैं स्वर्गादि लोकोंमें आज भी एक अरब श्लोकोंका विस्तृत पुराण विद्यमान है।* इस प्रकार भगवान् वेदव्यास भी पुराणोंके रचयिता नहीं, अपितु संक्षेपक अथवा संग्राहक ही सिद्ध होते हैं। इसीलिये पुराणोंको ‘पञ्चम वेद’ कहा गया है—‘इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्’ (छान्दोग्य-उपनिषद् ७।१।२)। उपर्युक्त उपनिषद्वाक्यके अनुसार यद्यपि इतिहास-पुराण दोनोंको ही ‘पञ्चम वेद’ की गौरवपूर्ण उपाधि दी गयी है, फिर भी वाल्मीकीय रामायण और महाभारत जिनकी इतिहास संज्ञा है, क्रमशः महर्षि वाल्मीकि तथा वेदव्यासद्वारा प्रणीत होनेके कारण पुराणोंकी अपेक्षा अर्वाचीन ही हैं। इस प्रकार पुराणोंकी पुराणता सर्वापेक्षया प्राचीनता सुतरां सिद्ध हो जाती है। इसीलिये वेदोंके बाद पुराणोंका ही हमारे यहाँ सबसे अधिक सम्मान है। बल्कि कहीं-कहीं तो उन्हें वेदोंसे भी अधिक गौरव दिया गया है। पद्मपुराणमें ही लिखा है—

यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः।
पुराणं च विजानाति यः स तस्माद्विचक्षणः ॥

<p align="right">(सृष्टि० २।५०-५१)</p>

‘जो ब्राह्मण अङ्गों एवं उपनिषदोंसहित चारों वेदोंका ज्ञान रखता है; उससे भी बड़ा विद्वान् वह है जो पुराणोंका विशेष ज्ञाता है।’ यहाँ श्रद्धालुओंके मनमें स्वाभाविक भी यह शङ्का हो सकती है कि उपर्युक्त श्लोकोंमें वेदोंकी अपेक्षा भी पुराणोंके ज्ञानको श्रेष्ठ क्यों बतलाया है। इस शङ्काका दो प्रकारसे समाधान किया जा सकता है। पहली बात तो यह है कि उपर्युक्त श्लोकके ‘विद्यात्’ और ‘विजानाति’—इन दो क्रियापदोंपर विचार करनेसे यह शङ्का निर्मूल हो जाती है। बात यह है कि ऊपरके वचनमें वेदोंके सामान्य ज्ञानकी अपेक्षा पुराणोंके विशिष्ट ज्ञानका वैशिष्ट्य बताया गया है, न कि वेदोंके सामान्य ज्ञानकी अपेक्षा पुराणोंके सामान्य ज्ञानका अथवा वेदोंके विशिष्ट ज्ञानकी अपेक्षा पुराणोंके विशिष्ट ज्ञानका। पुराणोंमें जो कुछ है, वह वेदोंका ही तो विस्तार—विशदीकरण है। ऐसी दशामें पुराणोंका विशिष्ट ज्ञान वेदोंका ही विशिष्ट ज्ञान है और वेदोंका विशिष्ट ज्ञान वेदोंके सामान्य ज्ञानसे ऊँचा होना ही चाहिये। दूसरी बात यह है कि जो बात वेदोंमें सूत्ररूपसे कही गयी है, वही पुराणोंमें विस्तारसे वर्णित है। उदाहरणके लिये परम तत्त्वके निर्गुण-निराकार रूपका तो वेदों (उपनिषदों) में विशद वर्णन मिलता है, परन्तु सगुण-साकार तत्त्वका बहुत ही संक्षेपमें कहीं-कहीं वर्णन मिलता है। ऐसी दशामें जहाँ पुराणोंके विशिष्ट ज्ञाताको सगुण-निर्गुण दोनों तत्त्वोंका विशिष्ट ज्ञान होगा, वेदोंके सामान्य ज्ञाताको केवल निर्गुण-निराकारका ही सामान्य ज्ञान होगा। इस प्रकार उपर्युक्त श्लोककी संगति भलीभाँति बैठ जाती है और पुराणोंकी जो महिमा शास्त्रोंमें वर्णित है, वह अच्छी तरह समझमें आ जाती है। अस्तु,

पुराणोंमें पद्मपुराणका स्थान बहुत ऊँचा है। इसे श्रीभगवान्‌के पुराणरूप विग्रहका हृदयस्थानीय माना


* कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य तदा विभुः। व्यासरूपस्तदा ब्रह्मा संग्रहार्थं युगे युगे॥
चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे जगौ। तदाष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रकाशितम्॥
अद्यापि देवलोकेषु शतकोटिप्रविस्तरम्। (पद्म० सृष्टि० १।५१—५३)


गया है—‘हृदयं पद्मसंज्ञकम्।’ वैष्णवोंका तो यह सर्वस्व ही है। इसमें भगवान् विष्णुका माहात्म्य विशेषरूपसे वर्णित होनेके कारण ही यह वैष्णवोंको अधिक प्रिय है। परन्तु पद्मपुराणके अनुसार सर्वोपरि देवता भगवान् विष्णु होनेपर भी उनका ब्रह्माजी तथा भगवान् शङ्करके साथ अभेद प्रतिपादित हुआ है। उसके अनुसार स्वयं भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होतेहैं तथा जबतक कल्पकी स्थिति बनी रहती है, तबतक वे भगवान् विष्णु ही युग-युगमें अवतार धारण करके समूची सृष्टिकी रक्षा करते हैं। पुनः कल्पका अन्त होनेपर वे ही अपना तमःप्रधान रुद्ररूप प्रकट करते हैं और अत्यन्त भयानक आकार धारण करके सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करते हैं। इस प्रकार सब भूतोंका नाश करके संसारको एकार्णवके जलमें निमग्न कर वे सर्वरूपधारी भगवान् स्वयं शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं। पुनः जागनेपर ब्रह्माका रूप धारण करके वे नये सिरेसे संसारकी सृष्टि करने लगते हैं। इस तरह एक ही भगवान् जनार्दन सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव नाम धारण करते हैं।* पद्मपुराणमें तो भगवान् श्रीकृष्णके यहाँतक वचन हैं—सूर्य, शिव, गणेश, विष्णु और शक्तिके उपासक सभी मुझको ही प्राप्त होते हैं। जैसे वर्षाका जल सब ओरसे समुद्रमें ही जाता है, वैसे ही इन पाँचों रूपोंके उपासक मेरे ही पास आते हैं। वस्तुतः मैं एक ही हूँ। लीलाके अनुसार विभिन्न नाम धारण कर पाँच रूपोंमें प्रकट हूँ। जैसे एक ही देवदत्त नामक व्यक्ति पुत्र-पिता आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है, वैसे ही मुझको भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारते हैं।† ऐसी ही बातें अन्यान्य पुराणोंमें भी पायी जाती हैं। वैष्णवपुराणोंमें शिव और ब्रह्माजीको विष्णुसे तथा शैवपुराणोंमें भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माजीको शङ्करजीसे अभिन्न माना गया है। अतएव जो लोग पुराणोंमें साम्प्रदायिकताका गन्ध पाते हैं, वे वास्तवमें भूल करते हैं—यही प्रमाणित होता है।

पद्मपुराणमें भगवान् विष्णुके माहात्म्यके साथ-साथ भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके अवतार-चरित्रों तथा उनके परात्पर रूपोंका भी विशदरूपसे वर्णन हुआ है। पातालखण्डमें भगवान् श्रीरामके अश्वमेध यज्ञकी कथाका तो बहुत ही विस्तृत और अद्भुत वर्णन है। इतना ही नहीं, उसमें श्रीअयोध्या और श्रीधाम वृन्दावनका माहात्म्य, श्रीराधा-कृष्ण एवं उनके पार्षदोंका वर्णन, वैष्णवोंकी द्वादशशुद्धि, पाँच प्रकारकी पूजा, शालग्रामके स्वरूप और महिमाका वर्णन, तिलककी विधि, भगवत्सेवा-अपराध और उनसे छूटनेके उपाय, तुलसीके वृक्ष तथा भगवन्नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवान्‌के चरण-चिह्नोंका परिचय तथा प्रत्येक मासमें भगवान्‌की विशेष आराधनाका वर्णन, मन्त्रचिन्तामणिका उपदेश तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन, दीक्षा-विधि, निर्गुण एवं सगुण-ध्यानका वर्णन, भगवद्भक्तिके लक्षण, वैशाख-मासमें माधव-पूजनकी महिमा, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़में जलस्थ श्रीहरिके पूजनका माहात्म्य, अश्वत्थकी महिमा, भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान, पवित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासोंमें श्रीहरिकी पूजामें काम आनेवाले विविध पुष्पोंका वर्णन, बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा, गङ्गाकी महिमा, त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा, गोपीचन्दनके तिलककी महिमा, जन्माष्टमी-व्रतकी महिमा, बारह महीनोंकी एकादशियोंके नाम तथा माहात्म्य, एकादशीकी विधि, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन, भगवद्-भक्तिकी श्रेष्ठता, वैष्णवोंके लक्षण और महिमा, भगवान् विष्णुके दसों अवतारोंकी कथा, श्रीनृसिंहचतुर्दशीके व्रतकी महिमा, श्रीमद्भगवद्गीताके अठारहों अध्यायोंका अलग-अलग माहात्म्य, श्रीमद्भागवतका माहात्म्य तथा


* सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः । स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ (पद्म० सृष्टि० २। १९४)
† सौराश्च शैवा गाणेशा वैष्णवाः शक्तिपूजकाः । मामेव प्राप्नुवन्तीह वर्षापः सागरं यथा ॥
एकोऽहं पञ्चधा जातः क्रीडया नामभिः किल । देवदत्तो यथा कश्चित् पुत्राद्याह्वाननामभिः ॥ (पद्म० उत्तर० ९० । ६३-६४)

  • ६ *

श्रीमद्भागवतके सप्ताह-पारायणकी विधि, नीलाचल-निवासी भगवान् पुरुषोत्तमकी महिमा आदि-आदि ऐसे अनेकों विषयोंका समावेश हुआ है, जो वैष्णवोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं। इसीलिये वैष्णवोंमें पद्मपुराणका विशेष समादर है।

इनके अतिरिक्त सृष्टिक्रमका वर्णन, युग आदिका काल-मान, ब्रह्माजीके द्वारा रचे हुए विविध सर्गोंका वर्णन, मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र तथा स्वायम्भुव मनु आदिकी उत्पत्ति और उनकी सन्तान-परम्पराका वर्णन, देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंकी उत्पत्तिका वर्णन, मरुद्गणोंकी उत्पत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन, पृथुके चरित्र तथा सूर्यवंशका वर्णन, पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्गोंका वर्णन, श्राद्धोपयोगी तीर्थोंका वर्णन, विविध श्राद्धोंकी विधि, चन्द्रमाकी उत्पत्ति, पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमा तथा उन तीर्थोंमें वास करनेवालोंके द्वारा पालनीय नियम, आश्रमधर्मका निरूपण, अन्नदान एवं दम आदि धर्मोंकी प्रशंसा, नाना प्रकारके व्रत, स्नान और तर्पणकी विधि, तालाबोंकी प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणकी विधि, सत्सङ्गकी महिमा, उत्तम ब्राह्मण तथा गायत्री-मन्त्रकी महिमा, अधम ब्राह्मणोंका वर्णन, ब्राह्मणोंके जीविकोपयोगी कर्म और उनका महत्त्व तथा गौओंकी महिमा और गोदानका फल, द्विजोचित आचार तथा शिष्टाचारका वर्णन, पितृभक्ति, पातिव्रत्य, समता, अद्रोह और विष्णु-भक्तिरूप पाँच महायज्ञोंके विषयमें पाँच आख्यान, पतिव्रताकी महिमा और कन्यादानका फल, सत्यभाषणकी महिमा, पोखरे खुदाने, वृक्ष लगाने, पीपलकी पूजा करने, पौसले चलाने, गोचरभूमि छोड़ने, देवालय बनवाने और देवताओंकी पूजा करनेका माहात्म्य, रुद्राक्षकी उत्पत्ति और महिमा, श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल, मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुए दैत्य एवं देवताओंके लक्षण, भगवान् सूर्यका तथा संक्रान्तिमें दानका माहात्म्य, भगवान् सूर्यकी उपासना और उसका फल, विविध प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्गधर्म तथा धर्मात्मा एवं पापियोंकी मृत्युका वर्णन, नैमित्तिक तथा आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन, देहकी उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण और जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन, पापों और पुण्योंके फलोंका वर्णन, नरक और स्वर्गमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन, ब्रह्मचारीके पालन करने योग्य नियम, ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म, स्नातक एवं गृहस्थके धर्मोंका वर्णन, गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दानधर्मका वर्णन, वानप्रस्थ एवं संन्यास-आश्रमोंके धर्मोंका वर्णन, संन्यासीके नियम, स्त्री-सङ्गकी निन्दा, भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण और गङ्गाकी महत्ता, जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवश्यकता, तीर्थयात्राकी विधि, माघ, वैशाख तथा कार्तिक मासोंका माहात्म्य, यमराजकी आराधना, गृहस्थाश्रमकी प्रशंसा, दीपावली-कृत्य, गोवर्धन-पूजा तथा यमद्वितीयाके दिन करने योग्य कृत्योंका वर्णन, वैराग्यसे भगवद्भजनमें प्रवृत्ति आदि-आदि अनेकों सर्वोपयोगी तथा सबके लिये ज्ञातव्य एवं धारण करने योग्य धार्मिक विषयोंका वर्णन हुआ है, जिनके कारण पद्मपुराण आस्तिक हिन्दूमात्रके लिये परम आदरकी वस्तु है।

पद्मपुराणकी इस सर्वोपयोगिताको लक्ष्यमें रखकर ही 'कल्याण' में इसका संक्षिप्त अनुवाद छापनेकी आयोजना की गयी थी। इससे भारतकी धार्मिक जनताका यदि कुछ भी उपकार हुआ होगा तो हम अपने प्रयासको सफल तथा अपनेको धन्य मानेंगे। अनुवादका कार्य आदिसे अन्ततक पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने बड़े परिश्रम एवं मनोयोगके साथ किया है तथा अनुवादकी आवृत्ति तथा सम्पादन करने एवं प्रूफ-संशोधन आदि करनेमें सम्पादकीय विभागके सभी बन्धुओं तथा अन्य कई प्रेमी महानुभावोंका प्रेमपूर्ण एवं बहुमूल्य सहयोग प्राप्त हुआ है, जिसके लिये उन्हें धन्यवाद देना तो उनके कार्यके महत्त्वको घटाना होगा। ये सभी महानुभाव अपने ही हैं; ऐसी दशामें उनकी बड़ाई अपनी ही बड़ाई होगी। अन्तमें हम अपना यह क्षुद्र प्रयास श्रीभगवान्‌के पावन चरणोंमें अर्पित करते हैं और अपनी त्रुटियोंके लिये पुनः सबसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हैं। हरिः ॐ तत्सत्॥

\hfill विनीत—जयदयाल गोयन्दका

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॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
सृष्टि-खण्ड१९-नाना प्रकारके व्रत, स्नान और तर्पणकी विधि तथा अन्नादि पर्वतोंके दानकी प्रशंसामें राजा धर्ममूर्तिकी कथा ......................७५
१-ग्रन्थका उपक्रम तथा इसके स्वरूपका परिचय२०-भीमद्वादशी-व्रतका विधान ............८१
२-भीष्म और पुलस्त्यका संवाद—सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान् विष्णुकी महिमा ......२१-आदित्य-शयन और रोहिणी-चन्द्र-शयन-व्रत, तड़ागकी प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणकी विधि तथा सौभाग्य-शयन-व्रतका वर्णन ..........८३
३-ब्रह्माजीकी आयु तथा युग आदिका कालमान, भगवान् वराहद्वारा पृथ्वीका रसातलसे उद्धार और ब्रह्माजीके द्वारा रचे हुए विविध सर्गोंका वर्णन ...............................२२-तीर्थ-महिमाके प्रसङ्गमें वामन-अवतारकी कथा, भगवान्‌का बाष्कल दैत्यसे त्रिलोकीके राज्यका अपहरण ......................९१
४-यज्ञके लिये ब्राह्मणादि वर्णों तथा अन्नकी सृष्टि, मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र तथा स्वायम्भुव मनु आदिकी उत्पत्ति और उनकी संतान-परम्पराका वर्णन .......................१०२३-सत्सङ्गके प्रभावसे पाँच प्रेतोंका उद्धार और पुष्कर तथा प्राची सरस्वतीका माहात्म्य ...९७
५-लक्ष्मीजीके प्रादुर्भावकी कथा, समुद्र-मन्थन और अमृत-प्राप्ति .....................१२२४-मार्कण्डेयजीके दीर्घायु होनेकी कथा और श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मण और सीताके साथ पुष्करमें जाकर पिताका श्राद्ध करना तथा अजगन्ध शिवकी स्तुति करके लौटना .....१०२
६-सतीका देहत्याग और दक्ष-यज्ञ-विध्वंस ...१४२५-ब्रह्माजीके यज्ञके ऋत्विजोंका वर्णन, सब देवताओंको ब्रह्माद्वारा वरदानकी प्राप्ति, श्रीविष्णु और श्रीशिवद्वारा ब्रह्माजीकी स्तुति तथा ब्रह्माजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें अपने नामों और पुष्करकी महिमाका वर्णन .....१०९
७-देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंकी उत्पत्तिका वर्णन ......................१७२६-श्रीरामके द्वारा शम्बूकका वध और मरे हुए ब्राह्मण-बालकको जीवनकी प्राप्ति ......११४
८-मरुद्गणोंकी उत्पत्ति, भिन्न-भिन्न समुदायके राजाओं तथा चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन ....१९२७-महर्षि अगस्त्यद्वारा राजा श्वेतके उद्धारकी कथा११६
९-पृथुके चरित्र तथा सूर्यवंशका वर्णन ......२२२८-दण्डकारण्यकी उत्पत्तिका वर्णन .........११९
१०-पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्गोंका वर्णन२६२९-श्रीरामका लङ्का, रामेश्वर, पुष्कर एवं मथुरा होते हुए गङ्गातटपर जाकर भगवान् श्रीवामनकी स्थापना करना .......................१२२
११-एकोद्दिष्ट आदि श्राद्धोंकी विधि तथा श्राद्धोपयोगी तीर्थोंका वर्णन ............३२३०-भगवान् श्रीनारायणकी महिमा, युगोंका परिचय, प्रलयके जलमें मार्कण्डेयजीको भगवान्‌के दर्शन तथा भगवान्‌की नाभिसे कमलकी उत्पत्ति ............................१३०
१२-चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा यदुवंश एवं सहस्रार्जुनके प्रभावका वर्णन ..........३७३१-मधु-कैटभका वध तथा सृष्टि-परम्पराका वर्णन१३३
१३-यदुवंशके अन्तर्गत क्रोष्टु आदिके वंश तथा श्रीकृष्णावतारका वर्णन ...............३९३२-तारकासुरके जन्मकी कथा, तारककी तपस्या, उसके द्वारा देवताओंकी पराजय और ब्रह्माजीका देवताओंको सान्त्वना देना .........१३४
१४-पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहाँ वास करनेवाले लोगोंके लिये नियम तथा आश्रम-धर्मका निरूपण ............................४३३३-पार्वतीका जन्म, मदन-दहन, पार्वतीकी तपस्या और उनका भगवान् शिवके साथ विवाह ..१३८
१५-पुष्कर क्षेत्रमें ब्रह्माजीका यज्ञ और सरस्वतीका प्राकट्य ...........................४९
१६-सरस्वतीके नन्दा नाम पड़नेका इतिहास और उसका माहात्म्य .....................५५
१७-पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महर्षि अगस्त्यके प्रभावका वर्णन .............६३
१८-सप्तर्षि-आश्रमके प्रसङ्गमें सप्तर्षियोंके अलोभका वर्णन तथा ऋषियोंके मुखसे अन्नदान एवं दम आदि धर्मोंकी प्रशंसा .............६९

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
३४-गणेश और कार्तिकेयका जन्म तथा कार्तिकेय-द्वारा तारकासुरका वध१४६५१-सोमशर्माकी पितृभक्ति२२१
३५-उत्तम ब्राह्मण और गायत्री-मन्त्रकी महिमा१५०५२-सुव्रतकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें सुमना और शिवशर्माका संवाद—विविध प्रकारके पुत्रोंका वर्णन तथा दुर्वासाद्वारा धर्मको शाप२२४
३६-अधम ब्राह्मणोंका वर्णन, पतित विप्रकी कथा और गरुड़कीका चरित्र१५५५३-सुमनाके द्वारा ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्ग धर्म तथा धर्मात्मा और पापियोंकी मृत्युका वर्णन२२८
३७-ब्राह्मणोंके जीविकोपयोगी कर्म और उनका महत्त्व तथा गौओंकी महिमा और गोदानका फल१६०५४-वसिष्ठजीके द्वारा सोमशर्माके पूर्वजन्म सम्बन्धी शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तथा उन्हें भगवान्‌के भजनका उपदेश२३१
३८-द्विजोचित आचार, तर्पण तथा शिष्टाचारका वर्णन१६६५५-सोमशर्माके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी आराधना, भगवान्‌का उन्हें दर्शन देना तथा सोमशर्माका उनकी स्तुति करना२३३
३९-पितृभक्ति, पातिव्रत्य, समता, अद्रोह और विष्णुभक्तिरूप पाँच महायज्ञोंके विषयमें ब्राह्मण नरोत्तमकी कथा१७०५६-श्रीभगवान्‌के वरदानसे सोमशर्माको सुव्रत नामक पुत्रकी प्राप्ति तथा सुव्रतका तपस्यासे माता-पितासहित वैकुण्ठलोकमें जाना२३६
४०-पतिव्रता ब्राह्मणीका उपाख्यान, कुलटा स्त्रियोंके सम्बन्धमें उमा-नारद-संवाद, पतिव्रताकी महिमा और कन्यादानका फल१८२५७-राजा पृथुके जन्म और चरित्रका वर्णन२४०
४१-तुलाधारके सत्य और समताकी प्रशंसा, सत्य-भाषणकी महिमा, लोभ-त्यागके विषयमें एक शूद्रकी कथा और मूक चाण्डाल आदिका परमधाम-गमन१८९५८-मृत्युकन्या सुनीथाको गन्धर्वकुमारका शाप, अङ्गकी तपस्या और भगवान्‌से वर-प्राप्ति२४४
४२-पोखरे खुदाने, वृक्ष लगाने, पीपलकी पूजा करने, पौसले (प्याऊ) चलाने, गोचरभूमि छोड़ने, देवालय बनवाने और देवताओंकी पूजा करनेका माहात्म्य१९३५९-सुनीथाका तपस्याके लिये वनमें जाना, रम्भा आदि सखियोंका वहाँ पहुँचकर उसे मोहिनी विद्या सिखाना, अङ्गके साथ उसका गान्धर्व-विवाह, वेनका जन्म और उसे राज्यकी प्राप्ति२४८
४३-रुद्राक्षकी उत्पत्ति और महिमा तथा आँवलेके फलकी महिमामें प्रेतोंकी कथा और तुलसी-दलका माहात्म्य१९६६०-छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जैन-धर्मका वर्णन, उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापमें प्रवृत्ति और सप्तर्षियोंद्वारा उसकी भुजाओंका मन्थन२५२
४४-तुलसी-स्तोत्रका वर्णन२०२६१-वेनकी तपस्या और भगवान् श्रीविष्णुके द्वारा उसे दान-तीर्थ आदिका उपदेश२५४
४५-श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति२०३६२-श्रीविष्णुद्वारा नैमित्तिक और आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन और पलीतीर्थके प्रसङ्गमें सती सुकलाकी कथा२५७
४६-गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल२०७६३-सुकलाका रानी सुदेवाकी महिमा बताते हुए एक शूकर और शूकरीका उपाख्यान सुनाना, शूकरीद्वारा अपने पतिके पूर्वजन्मका वर्णन२६१
४७-सञ्जय-व्यास-संवाद—मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुए दैत्य और देवताओंके लक्षण२०९६४-शूकरीद्वारा अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन तथा रानी सुदेवाके दिये हुए पुण्यसे उसका उद्धार२६७
४८-भगवान् सूर्यका तथा संक्रान्तिमें दानका माहात्म्य२११६५-सुकलाका सतीत्व नष्ट करनेके लिये इन्द्र और काम आदिकी कुचेष्टा तथा उनका असफल होकर लौट आना२७३
४९-भगवान् सूर्यकी उपासना और उसका फल—भद्रेश्वरकी कथा२१३
भूमि-खण्ड
५०-शिवशर्माके चार पुत्रोंका पितृ-भक्तिके प्रभावसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होना२१७

[ ९ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
६६-सुकलाके स्वामीका तीर्थयात्रासे लौटना और धर्मकी आज्ञासे सुकलाके साथ श्राद्धादि करके देवताओंसे वरदान प्राप्त करना ....२७९स्वर्ग-खण्ड
६७-पितृतीर्थके प्रसङ्गमें पिप्पलकी तपस्या और सुकर्माकी पितृभक्तिका वर्णन, सारसके कहनेसे पिप्पलका सुकर्माके पास जाना और सुकर्माका उन्हें माता-पिताकी सेवाका महत्त्व बताना२८१७७-आदि सृष्टिके क्रमका वर्णन ............३३२
६८-सुकर्मद्वारा ययाति और मातलिके संवादका उल्लेख—मातलिके द्वारा देहकी उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण और जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन२८६७८-भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर तीर्थकी महिमाका बखान३३३
६९-पापों और पुण्योंके फलोंका वर्णन२९४७९-जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमरकण्टक पर्वत तथा कावेरी-सङ्गमकी महिमा३३६
७०-मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन, मातलिको विदा करके राजा ययातिका वैष्णवधर्मके प्रचारद्वारा भूलोकको वैकुण्ठतुल्य बनाना तथा ययातिके दरबारमें काम आदिका नाटक खेलना२९८८०-नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन३३८
७१-ययातिके शरीरमें जरावस्थाका प्रवेश, कामकन्यासे भेंट, पूरुका यौवन-दान, ययातिका कामकन्याके साथ प्रजावर्गसहित वैकुण्ठधाम-गमन३०२८१-विविध तीर्थोंकी महिमाका वर्णन३४४
७२-गुरुतीर्थके प्रसङ्गमें महर्षि च्यवनकी कथा—कुञ्जल पक्षीका अपने पुत्र उज्ज्वलको ज्ञान, व्रत और स्तोत्रका उपदेश ............३१०८२-धर्मतीर्थ आदिकी महिमा, यमुना-स्नानका माहात्म्य—हेमकुण्डल वैश्य और उसके पुत्रोंकी कथा एवं स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन३४९
७३-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्ज्वलको उपदेश—महर्षि जैमिनिका सुबाहुसे दानकी महिमा कहना तथा नरक और स्वर्गमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन३१५८३-सुगन्ध आदि तीर्थोंकी महिमा तथा काशीपुरीका माहात्म्य ............३५८
७४-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्ज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना ............३१८८४-पिशाचमोचनकुण्ड एवं कपर्दीश्वरका माहात्म्य—पिशाच तथा शङ्कुकर्ण मुनिके मुक्त होनेकी कथा और गया आदि तीर्थोंकी महिमा३६१
७५-कुञ्जल पक्षी और उसके पुत्र कपिञ्जलका संवाद—कामोदाकी कथा और विहुण्ड दैत्यका वध ............३२२८५-ब्रह्मस्तूणा आदि तीर्थों तथा प्रयागकी महिमा; इस प्रसङ्गके पाठका माहात्म्य ............३६६
७६-कुञ्जलका च्यवनको अपने पूर्व-जीवनका वृत्तान्त बताकर सिद्ध पुरुषके कहे हुए ज्ञानका उपदेश करना, राजा वेनका यज्ञ आदि करके विष्णुधाममें जाना तथा पद्मपुराण और भूमिखण्डका माहात्म्य ............३२७८६-मार्कण्डेयजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको प्रयागकी महिमा सुनाना ............३६८
८७-भगवान्‌के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा३७५
८८-ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम३७८
८९-ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म ............३८३
९०-स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन३८७
९१-व्यावहारिक शिष्टाचारका वर्णन३९०
९२-गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दानधर्मका वर्णन ............३९३
९३-वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन ........३९७
९४-संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन ........३९९
९५-संन्यासीके नियम ............४००
९६-भगवद्भक्तिकी प्रशंसा, स्त्री-सङ्गकी निन्दा, भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण और गङ्गाकी महत्ता, जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवश्यकता ............४०३
९७-श्रीहरिके पुराणमय स्वरूपका वर्णन तथा पद्मपुराण और स्वर्ग-खण्डका माहात्म्य ....४०८

[ १० ]

विषयपृष्ठ-संख्या
पाताल-खण्ड
९८-शेषजीका वात्स्यायन मुनिसे रामाश्वमेधकी कथा आरम्भ करना, श्रीरामचन्द्रजीका लङ्कासे अयोध्याके लिये विदा होना .........४१०
९९-भरतसे मिलकर भगवान् श्रीरामका अयोध्याके निकट आगमन .........४१२
१००-श्रीरामका नगर-प्रवेश, माताओंसे मिलना, राज्य ग्रहण करना तथा रामराज्यकी सुव्यवस्था४१४
१०१-देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान देना तथा रामराज्यका वर्णन४१७
१०२-श्रीरामके दरबारमें अगस्त्यजीका आगमन, उनके द्वारा रावण आदिके जन्म तथा तपस्याका वर्णन और देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान्‌का अवतार लेना .........४२०
१०३-अगस्त्यका अश्वमेध यज्ञकी सलाह देकर अश्वकी परीक्षा करना तथा यज्ञके लिये आये हुए ऋषियोंद्वारा धर्मकी चर्चा .........४२४
१०४-यज्ञसम्बन्धी अश्वका छोड़ा जाना और श्रीरामका उसकी रक्षाके लिये शत्रुघ्नको उपदेश करना४२७
१०५-शत्रुघ्न और पुष्कल आदिका सबसे मिलकर सेनासहित घोड़ेके साथ जाना, राजा सुमंदकी कथा तथा सुमंदके द्वारा शत्रुघ्नका सत्कार ..४३०
१०६-शत्रुघ्नका राजा सुमंदको साथ लेकर आगे जाना और च्यवनमुनिके आश्रमपर पहुँचकर सुमतिके मुखसे उनकी कथा सुनना—च्यवनका सुकन्यासे ब्याह .........४३७
१०७-सुकन्याके द्वारा पतिकी सेवा, च्यवनको यौवन-प्राप्ति, उनके द्वारा अश्विनीकुमारोंको यज्ञभाग-अर्पण तथा च्यवनका अयोध्या-गमन४४०
१०८-सुमतिका शत्रुघ्नसे नीलाचलनिवासी भगवान् पुरुषोत्तमकी महिमाका वर्णन करते हुए एक इतिहास सुनाना .........४४४
१०९-तीर्थयात्राकी विधि, राजा रत्नग्रीवकी यात्रा तथा गण्डकी नदी एवं शालग्रामशिलाकी महिमाके प्रसंगमें एक पुष्कसकी कथा .........४४९
११०-राजा रत्नग्रीवका नीलपर्वतपर भगवान्‌का दर्शन करके रानी आदिके साथ वैकुण्ठको जाना तथा शत्रुघ्नका नीलपर्वतपर पहुँचना४५५
१११-चक्राङ्गा नगरीके राजकुमार दमनद्वारा घोड़ेका पकड़ा जाना तथा राजकुमारका प्रतापाग्र्यको युद्धमें परास्त करके स्वयं पुष्कलके द्वारा पराजित होना .........४६०
११२-राजा सुबाहुका भाई और पुत्रोंसहित युद्धमें आना तथा सेनाका क्रौञ्च-व्यूहनिर्माण .....४६३
११३-राजा सुबाहुकी प्रशंसा तथा लक्ष्मीनिधि और सुकेतुका द्वन्द्व-युद्ध .........४६४
११४-पुष्कलके द्वारा चित्राङ्गका वध, हनुमान्‌जीके चरण-प्रहारसे सुबाहुका शापोद्धार तथा उनका आत्मसमर्पण .........४६६
११५-तेजःपुरके राजा सत्यवान्‌की जन्मकथा—सत्यवान्‌का शत्रुघ्नको सर्वस्व-समर्पण४७०
११६-शत्रुघ्नके द्वारा विद्युन्माली और उग्रदंष्ट्रका वध तथा उसके द्वारा चुराये हुए अश्वकी प्राप्ति४७५
११७-शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना, मुनिकी आत्म-कथामें रामायणका वर्णन और अयोध्यामें जाकर उनका श्रीरघुनाथजीके स्वरूपमें मिल जाना४७८
११८-देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओंमें युद्ध और पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना४८८
११९-हनुमान्‌जीके द्वारा वीरसिंहकी पराजय, वीरभद्रके हाथसे पुष्कलका वध, शङ्करजीके द्वारा शत्रुघ्नका मूर्छित होना, हनुमान्‌के पराक्रमसे शिवका सन्तोष, हनुमान्‌जीके उद्योगसे मरे हुए वीरोंका जीवित होना, श्रीरामका प्रादुर्भाव और वीरमणिका आत्मसमर्पण .........४९३
१२०-अश्वका गात्र-स्तम्भ, श्रीरामचरित्र-कीर्तनसे एक स्वर्गवासी ब्राह्मणका राक्षस्योनिसे उद्धार तथा अश्वके गात्र-स्तम्भकी निवृत्ति४९८
१२१-राजा सुरथके द्वारा अश्वका पकड़ा जाना, राजाकी भक्ति और उनके प्रभावका वर्णन, अङ्गदका दूत बनकर राजाके यहाँ जाना और राजाका युद्धके लिये तैयार होना ........५०२
१२२-युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्कलका बाँधा जाना, हनुमान्‌जीका चम्पकको मूर्छित करके पुष्कलको छुड़ाना, सुरथका हनुमान् और शत्रुघ्न आदिको जीतकर अपने नगरमें ले जाना तथा श्रीरामके आनेसे सबका छुटकारा होना५०६

[ ११ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१२३-वाल्मीकिके आश्रमपर लवद्वारा घोड़ेका बँधना और अश्व-रक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना५१११३५-भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा व्रज तथा द्वारकामें निवास करनेवालोंकी मुक्ति, वैष्णवोंकी द्वादश शुद्धि, पाँच प्रकारकी पूजा, शालग्रामके स्वरूप और महिमाका वर्णन, तिलककी विधि, अपराध और उनसे छूटनेके उपाय, हविष्यान्न और तुलसीकी महिमा५६१
१२४-गुप्तचरोंसे अपवादकी बात सुनकर श्रीरामका भरतके प्रति सीताको वनमें छोड़ आनेका आदेश और भरतकी मूर्च्छा५१३१३६-नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवान्‌के चरण-चिह्नोंका परिचय तथा प्रत्येक मासमें भगवान्‌की विशेष आराधनाका वर्णन५६५
१२५-सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त५१८१३७-मन्त्रचिन्तामणिका उपदेश तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन५६८
१२६-सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी भी मूर्च्छा, लक्ष्मणका दुःखित चित्तसे सीताको जंगलमें छोड़ना और वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म एवं अध्ययन५२११३८-दीक्षाकी विधि तथा श्रीकृष्णके द्वारा रुद्रको युगल-मन्त्रकी प्राप्ति५७१
१२७-युद्धमें लवके द्वारा सेनाका संहार, कालजित्‌का वध तथा पुष्कल और हनुमान्‌जीका मूर्च्छित होना५२८१३९-अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन५७५
१२८-शत्रुघ्नके बाणसे लवकी मूर्च्छा, कुशका रण-क्षेत्रमें आना, कुश और लवकी विजय तथा सीताके प्रभावसे शत्रुघ्न आदि एवं उनके सैनिकोंकी जीव-रक्षा५३११४०-भगवद्भक्तिके लक्षण तथा वैशाख-स्नानकी महिमा५८०
१२९-शत्रुघ्न आदिका अयोध्यामें जाकर श्रीरघुनाथजीसे मिलना तथा मन्त्री सुमतिका उन्हें यात्राका समाचार बतलाना५३७१४१-वैशाख-माहात्म्य५८३
१३०-वाल्मीकिजीके द्वारा सीताकी शुद्धता और अपने पुत्रोंका परिचय पाकर श्रीरामका सीताको लानेके लिये लक्ष्मणको भेजना, लक्ष्मण और सीताकी बातचीत, सीताका अपने पुत्रोंको भेजकर स्वयं न आना, श्रीरामकी प्रेरणासे पुनः लक्ष्मणका उन्हें बुलानेको जाना तथा शेषजीका वात्स्यायनको रामायणका परिचय देना५३९१४२-वैशाख-स्नानसे पाँच प्रेतोंका उद्धार तथा 'पाप-प्रशमन' नामक स्तोत्रका वर्णन५८५
१३१-सीताका आगमन, यज्ञका आरम्भ, अश्वकी मुक्ति, उसके पूर्वजन्मकी कथा, यज्ञका उपसंहार और रामभक्ति तथा अश्वमेध-कथा-श्रवणकी महिमा५४६१४३-वैशाख मासमें स्नान, तर्पण और श्रीमाधव-पूजनकी विधि एवं महिमा५८९
१३२-वृन्दावन और श्रीकृष्णका माहात्म्य५५०१४४-यम-ब्राह्मण-संवाद—नरक तथा स्वर्गमें ले जानेवाले कर्मोंका वर्णन५९३
१३३-श्रीराधा-कृष्ण और उनके पार्षदोंका वर्णन तथा नारदजीके द्वारा व्रजमें अवतीर्ण श्रीकृष्ण और राधाके दर्शन५५४१४५-तुलसीदल और अश्वत्थकी महिमा तथा वैशाख-माहात्म्यके सम्बन्धमें तीन प्रेतोंके उद्धारकी कथा५९६
१३४-भगवान्‌के परात्पर स्वरूप—श्रीकृष्णकी महिमा तथा मथुराके माहात्म्यका वर्णन५५८१४६-वैशाख-माहात्म्यके प्रसङ्गमें राजा महीरथकी कथा और यम-ब्राह्मण-संवादका उपसंहार५९९
१४७-भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान६०६
उत्तरखण्ड
१४८-नारद-महादेव-संवाद—बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा६१०
१४९-गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा और हरिद्वारका माहात्म्य६११
१५०-गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति ..६१३
१५१-तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य६१९

[ १२ ]


विषयपृष्ठ-संख्या
१५२-त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा६२१
१५३-अन्नदान, जलदान, तड़ाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा ......६२३
१५४-मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने और सुपात्रको दान देनेसे होनेवाली सद्गतिके विषयमें एक आख्यान तथा गोपीचन्दनके तिलककी महिमा६२६
१५५-संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा६२८
१५६-जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विविध प्रकारके दान आदिकी महिमा .....६३१
१५७-महाराज दशरथका शनिको संतुष्ट करके लोकका कल्याण करना ............६३५
१५८-त्रिस्पृशाव्रतकी विधि और महिमा .......६३७
१५९-पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य६३९
१६०-एकादशीके जया आदि भेद, नक्तव्रतका स्वरूप, एकादशीकी विधि, उत्पत्तिकथा और महिमाका वर्णन ...................६४३
१६१-मार्गशीर्ष शुक्लपक्षकी 'मोक्षा' एकादशीका माहात्म्य .....................६४७
१६२-पौष मासकी 'सफला' और 'पुत्रदा' नामक एकादशीका माहात्म्य .............६४९
१६३-माघ मासकी 'षट्तिला' और 'जया' एकादशीका माहात्म्य .............६५१
१६४-फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य .............६५३
१६५-चैत्र मासकी 'पापमोचनी' तथा 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य .............६५८
१६६-वैशाख मासकी 'वरूथिनी' और 'मोहिनी' एकादशीका माहात्म्य .............६६०
१६७-ज्येष्ठ मासकी 'अपरा' तथा 'निर्जरा' एकादशीका माहात्म्य .............६६२
१६८-आषाढ़ मासकी 'योगिनी' और 'शयिनी' एकादशीका माहात्म्य .............६६५
१६९-श्रावण मासकी 'कामिका' और 'पुत्रदा' एकादशीका माहात्म्य .............६६७
१७०-भाद्रपद मासकी 'अजा' और 'पद्मा' एकादशीका माहात्म्य .............६६९
१७१-आश्विन मासकी 'इन्दिरा' और 'पापाङ्कुशा' एकादशीका माहात्म्य .............६७१
१७२-कार्तिक मासकी 'रमा' और 'प्रबोधिनी' एकादशीका माहात्म्य .............६७४
१७३-पुरुषोत्तम मासकी 'कमला' और 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य .............६७७
१७४-चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन ....६८०
१७५-यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य ...................६८४
१७६-वैष्णवोंके लक्षण और महिमा तथा श्रवण-द्वादशी-व्रतकी विधि और माहात्म्य-कथा६८८
१७७-नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनाम-स्तोत्रका वर्णन ..................६९१
१७८-गृहस्थ-आश्रमकी प्रशंसा तथा दान-धर्मकी महिमा ......................७२४
१७९-गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन ......७२५
१८०-ऋषिपञ्चमी-व्रतकी कथा, विधि और महिमा७२८
१८१-न्याससहित अपामार्जन नामक स्तोत्र और उसकी महिमा .................७३०
१८२-श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा ......................७३५
१८३-श्रीगङ्गाजीकी महिमा, वैष्णव पुरुषोंके लक्षण तथा श्रीविष्णु-प्रतिमाके पूजनका माहात्म्य ..७४२
१८४-चैत्र और वैशाख मासके विशेष उत्सवका वर्णन, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़में जलस्थ श्रीहरिके पूजनका महत्त्व ........७४५
१८५-पवित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासमें श्रीहरिकी पूजामें काम आनेवाले विविध पुष्पोंका वर्णन ..................७४७
१८६-कार्तिक-व्रतका माहात्म्य—गुणवतीको कार्तिकव्रतके पुण्यसे भगवान्‌की प्राप्ति ...७५०
१८७-कार्तिककी श्रेष्ठताके प्रसङ्गमें शङ्खासुरके वध, वेदोंके उद्धार तथा 'तीर्थराज'के उत्कर्षकी कथा७५३
१८८-कार्तिक मासमें स्नान और पूजनकी विधि७५६
१८९-कार्तिक-व्रतके नियम और उद्यापनकी विधि७५९
१९०-कार्तिक-व्रतके पुण्यदानसे एक राक्षसीका उद्धार७६२
१९१-कार्तिक-माहात्म्यके प्रसङ्गमें राजा चोल और विष्णुदासकी कथा .............७६५

\mathbf{[ १३ ]}

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
**१९२-**पुण्यात्माओंके संसर्गसे पुण्यकी प्राप्तिके प्रसङ्गमें धनेश्वर ब्राह्मणकी कथा $\dots\dots\dots\dots\dots$७६९**२१६-**श्रीमद्भगवद्गीताके नवें और दसवें अध्यायोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$८२८
**१९३-**अशक्तावस्थामें कार्तिक-व्रतके निर्वाहका उपाय७७३**२१७-**श्रीमद्भगवद्गीताके ग्यारहवें अध्यायका माहात्म्य८३२
**१९४-**कार्तिक मासका माहात्म्य और उसमें पालन करने योग्य नियम $\dots\dots\dots\dots\dots$७७४**२१८-**श्रीमद्भगवद्गीताके बारहवें अध्यायका माहात्म्य८३५
**१९५-**प्रसङ्गतः माघस्नानकी महिमा, शूकरक्षेत्रका माहात्म्य तथा मासोपवास-व्रतकी विधिका वर्णन७७७**२१९-**श्रीमद्भगवद्गीताके तेरहवें और चौदहवें अध्यायोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$८३७
**१९६-**शालग्रामशिलाके पूजनका माहात्म्य $\dots\dots\dots$७७८**२२०-**श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें तथा सोलहवें अध्यायोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$८४०
**१९७-**भगवत्पूजन, दीपदान, यमतर्पण, दीपावली-कृत्य, गोवर्धन-पूजा और यमद्वितीयाके दिन करने योग्य कृत्योंका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots$७८०**२२१-**श्रीमद्भगवद्गीताके सत्रहवें और अठारहवें अध्यायोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$८४२
**१९८-**प्रबोधिनी एकादशी और उसके जागरणका महत्त्व तथा भीष्मपञ्चक-व्रतकी विधि एवं महिमा७८२**२२२-**देवर्षि नारदकी सनकादिसे भेंट तथा नारदजीके द्वारा भक्ति, ज्ञान और वैराग्यके वृत्तान्तका वर्णन८४५
**१९९-**भक्तिका स्वरूप, शालग्रामशिलाकी महिमा तथा वैष्णव पुरुषोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$७८४**२२३-**भक्तिका कष्ट दूर करनेके लिये नारदजीका उद्योग और सनकादिके द्वारा उन्हें साधनकी प्राप्ति८४९
**२००-**भगवत्स्मरणका प्रकार, भक्तिकी महत्ता, भगवत्तत्त्वका ज्ञान, प्रारब्धकर्मकी प्रबलता तथा भक्तियोगका उत्कर्ष $\dots\dots\dots\dots\dots$७८६**२२४-**सनकादिद्वारा श्रीमद्भागवतकी महिमाका वर्णन तथा कथा-रससे पुष्ट होकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्यका प्रकट होना $\dots\dots\dots\dots\dots$८५२
**२०१-**पुष्कर आदि तीर्थोंका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots$७९०**२२५-**कथामें भगवान्का प्रादुर्भाव, आत्मदेव ब्राह्मणकी कथा—धुन्धुकारी और गोकर्णकी उत्पत्ति तथा आत्मदेवका वनगमन $\dots\dots\dots\dots\dots$८५६
**२०२-**वेत्रवती और साभ्रमती (साबरमती) नदीका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$७९१**२२६-**गोकर्णजीकी भागवत-कथासे धुन्धुकारीका प्रेतयोनिसे उद्धार तथा समस्त श्रोताओंको परमधामकी प्राप्ति $\dots\dots\dots\dots\dots$८६१
**२०३-**साभ्रमती नदीके अवान्तर तीर्थोंका वर्णन७९५**२२७-**श्रीमद्भागवतके सप्ताह-पारायणकी विधि तथा भागवत-माहात्म्यका उपसंहार $\dots\dots\dots\dots\dots$८६५
**२०४-**अग्नितीर्थ, हिरण्यसंगमतीर्थ, धर्मतीर्थ आदिकी महिमा $\dots\dots\dots\dots\dots$७९७**२२८-**यमुना-तटवर्ती 'इन्द्रप्रस्थ' नामक तीर्थकी माहात्म्य-कथा $\dots\dots\dots\dots\dots$८७०
**२०५-**साभ्रमती-तटके कपीश्वर, एकधार, सप्तधार और ब्रह्मवल्ली आदि तीर्थोंकी महिमाका वर्णन७९९**२२९-**निगमोद्बोध नामक तीर्थकी महिमा—शिवशर्माके पूर्वजन्मकी कथा $\dots\dots\dots\dots\dots$८७३
**२०६-**साभ्रमती-तटके बालार्क, दुर्धर्षेश्वर तथा खड्गधार आदि तीर्थोंकी महिमाका वर्णन $\dots$८०२**२३०-**देवल मुनिका शरभको राजा दिलीपकी कथा सुनाना—राजाको नन्दिनीकी सेवासे पुत्रकी प्राप्ति $\dots\dots\dots\dots\dots$८७५
**२०७-**वात्रघ्नी आदि तीर्थोंकी महिमा $\dots\dots\dots\dots\dots$८०६**२३१-**शरभको देवीकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्ति; शिवशर्माके पूर्वजन्मकी कथाका और निगमोद्बोधक तीर्थकी महिमाका उपसंहार $\dots\dots$८७९
**२०८-**श्रीनृसिंहचतुर्दशीके व्रत तथा श्रीनृसिंहतीर्थकी महिमा $\dots\dots\dots\dots\dots$८१०**२३२-**इन्द्रप्रस्थके द्वारका, कोसिला, मधुवन, बदरी, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, काशी, काञ्ची और गोकर्ण आदि तीर्थोंका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots$८८०
**२०९-**श्रीमद्भगवद्गीताके पहले अध्यायका माहात्म्य८१४
**२१०-**श्रीमद्भगवद्गीताके दूसरे अध्यायका माहात्म्य८१५
**२११-**श्रीमद्भगवद्गीताके तीसरे अध्यायका माहात्म्य८१७
**२१२-**श्रीमद्भगवद्गीताके चौथे अध्यायका माहात्म्य८२०
**२१३-**श्रीमद्भगवद्गीताके पाँचवें अध्यायका माहात्म्य८२२
**२१४-**श्रीमद्भगवद्गीताके छठे अध्यायका माहात्म्य८२३
**२१५-**श्रीमद्भगवद्गीताके सातवें तथा आठवें अध्यायोंका माहात्म्य८२५

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
२३३- वसिष्ठजीका दिलीपसे तथा भृगुजीका विद्याधरसे माघस्नानकी महिमा बताना तथा माघस्नानसे विद्याधरकी कुरूपताका दूर होना८८४मन्थनसे लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव और एकादशी-द्वादशीका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९३५
२३४- मृगशृङ्ग मुनिका भगवान्‌से वरदान प्राप्त करके अपने घर लौटना $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$८८७२५०- नृसिंहावतार एवं प्रह्लादजीकी कथा $\dots\dots\dots$९३९
२३५- मृगशृङ्ग मुनिके द्वारा माघके पुण्यसे एक हाथीका उद्धार तथा मरी हुई कन्याओंका जीवित होना $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$८९०२५१- वामन-अवतारके वैभवका वर्णन $\dots\dots\dots\dots$९४५
२३६- यमलोकसे लौटी हुई कन्याओंके द्वारा वहाँकी अनुभूत बातोंका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots\dots$८९५२५२- परशुरामावतारकी कथा९४७
२३७- महात्मा पुष्करके द्वारा नरकमें पड़े हुए जीवोंका उद्धार $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९००२५३- श्रीरामावतारकी कथा—जन्मका प्रसङ्ग $\dots$९४९
२३८- मृगशृङ्गका विवाह, विवाहके भेद तथा गृहस्थ-आश्रमका धर्म $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९०२२५४- श्रीरामका जातकर्म, नामकरण, भरत आदिका जन्म, सीताकी उत्पत्ति, विश्वामित्रकी यज्ञरक्षा तथा राम आदिका विवाह $\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९५१
२३९- पतिव्रता स्त्रियोंके लक्षण एवं सदाचारका वर्णन९०७२५५- श्रीरामके वनवाससे लेकर पुनः अयोध्यामें आनेतकका प्रसङ्ग $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९५४
२४०- मृगशृङ्गके पुत्र मृकण्डु मुनिकी काशी-यात्रा, काशी-माहात्म्य तथा माताओंकी मुक्ति $\dots\dots$९१०२५६- श्रीरामके राज्याभिषेकसे परमधामगमनतकका प्रसङ्ग $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९६०
२४१- मार्कण्डेयजीका जन्म, भगवान् शिवकी आराधनासे अमरत्व-प्राप्ति तथा मृत्युञ्जय-स्तोत्रका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९१२२५७- श्रीकृष्णावतारकी कथा—व्रजकी लीलाओंका प्रसङ्ग $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९६४
२४२- माघस्नानके लिये मुख्य-मुख्य तीर्थ और नियम९१७२५८- भगवान् श्रीकृष्णकी मथुरा-यात्रा, कंसवध और उग्रसेनका राज्याभिषेक $\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९६९
२४३- माघ मासके स्नानसे सुव्रतको दिव्यलोककी प्राप्ति $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९१९२५९- जरासन्धकी पराजय, द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका वध और मुचुकुन्दकी मुक्ति $\dots\dots$९७५
२४४- सनातन मोक्षमार्ग और मन्त्रदीक्षाका वर्णन $\cdot$९२१२६०- सुधर्मा-सभाकी प्राप्ति, रुक्मिणी-हरण तथा रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह९७७
२४५- भगवान् विष्णुकी महिमा, उनकी भक्तिके भेद तथा अष्टाक्षर मन्त्रके स्वरूप एवं अर्थका निरूपण९२३२६१- भगवान्‌के अन्यान्य विवाह, स्यमन्तकमणिकी कथा, नरकासुरका वध तथा पारिजातहरण९७९
२४६- श्रीविष्णु और लक्ष्मीके स्वरूप, गुण, धाम एवं विभूतियोंका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९२७२६२- अनिरुद्धका ऊषाके साथ विवाह९८२
२४७- वैकुण्ठधाममें भगवान्‌की स्थितिका वर्णन, योगमायाद्वारा भगवान्‌की स्तुति तथा भगवान्‌के द्वारा सृष्टि-रचना $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९३०२६३- पौण्ड्रक, जरासन्ध, शिशुपाल और दन्तवक्त्र-का वध, व्रजवासियोंकी मुक्ति, सुदामाको ऐश्वर्यप्रदान तथा यदुकुलका उपसंहार $\dots\dots\dots$९८४
२४८- देवसर्ग तथा भगवान्‌के चतुर्व्यूहका वर्णन९३२२६४- श्रीविष्णु-पूजनकी विधि तथा वैष्णवोचित आचारका वर्णन $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९८९
२४९- मत्स्य और कूर्म अवतारोंकी कथा, समुद्र-२६५- श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९९४
२६६- त्रिदेवोंमें श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्थका उपसंहार $\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots$९९८
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भगवान् विष्णु

सृष्टिखण्ड

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

संक्षिप्त पद्मपुराण


सृष्टिखण्ड


ग्रन्थका उपक्रम तथा इसके स्वरूपका परिचय

स्वच्छं चन्द्रवदातं करिकरमकरक्षोभसंजातफेनं
  ब्रह्मोद्भूतिप्रसक्तैर्व्रतनियमपरैः सेवितं विप्रमुख्यैः।
ॐकारालङ्कृतेन त्रिभुवनगुरुणा ब्रह्मणा दृष्टिपूतं
  संभोगाभोगरम्यं जलमशुभहरं पौष्करं नः पुनातु ॥*

श्रीव्यासजीके शिष्य परम बुद्धिमान् लोमहर्षणजीने एकान्तमें बैठे हुए [अपने पुत्र] उग्रश्रवा नामक सूतसे कहा—'बेटा! तुम ऋषियोंके आश्रमोंपर जाओ और उनके पूछनेपर सम्पूर्ण धर्मोंका वर्णन करो। तुमने मुझसे जो संक्षेपमें सुना है, वह उन्हें विस्तारपूर्वक सुनाओ। मैंने महर्षि वेदव्यासजीके मुखसे समस्त पुराणोंका ज्ञान प्राप्त किया है और वह सब तुम्हें बता दिया है; अतः अब मुनियोंके समक्ष तुम उसका विस्तारके साथ वर्णन करो। प्रयागमें कुछ महर्षियोंने, जो उत्तम कुलोंमें उत्पन्न हुए थे, साक्षात् भगवान्‌से प्रश्न किया था। वे [यज्ञ करनेके योग्य] किसी पावन प्रदेशको जानना चाहते थे। भगवान् नारायण ही सबके हितैषी हैं, वे धर्मानुष्ठानकी इच्छा रखनेवाले उन महर्षियोंके पूछनेपर बोले—'मुनिवरो! यह सामने जो चक्र दिखायी दे रहा है, इसकी कहीं तुलना नहीं है। इसकी नाभि सुन्दर और स्वरूप दिव्य है। यह सत्यकी ओर जानेवाला है। इसकी गति सुन्दर एवं कल्याणमयी है। तुमलोग सावधान होकर नियमपूर्वक इसके पीछे-पीछे जाओ। तुम्हें अपने लिये हितकारी स्थानकी प्राप्ति होगी। यह धर्ममय चक्र यहाँसे जा रहा है। जाते-जाते जिस स्थानपर इसकी नेमि जीर्ण-शीर्ण होकर गिर पड़े, उसीको पुण्यमय प्रदेश समझना।' उन सभी महर्षियोंसे ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और वह धर्म-चक्र नैमिषारण्यके गङ्गावर्त नामक स्थानपर गिरा। तब ऋषियोंने निमि शीर्ण होनेके कारण उस स्थानका नाम 'नैमिष' रखा और नैमिषारण्यमें दीर्घकालतक चालू रहनेवाले यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया। वहीं तुम भी जाओ और ऋषियोंके पूछनेपर उनके धर्म-विषयक संशयोंका निवारण करो।"

तदनन्तर ज्ञानी उग्रश्रवा पिताकी आज्ञा मानकर उन मुनीश्वरोंके पास गये तथा उनके चरण पकड़कर हाथ जोड़कर उन्होंने प्रणाम किया। सूतजी बड़े बुद्धिमान् थे,


* जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और स्वच्छ है, जिसमें हाथीकी सूँड़के समान आकारवाले नाकोंके इधर-उधर वेगपूर्वक चलने-फिरनेसे फेन पैदा होता रहता है, ब्रह्माजीके प्रादुर्भावकी कथा-वार्तामें लगे हुए व्रत-नियम-परायण श्रेष्ठ ब्राह्मण जिसका सदा सेवन करते हैं, ॐकार-जपसे विभूषित त्रिभुवनगुरु ब्रह्माजीने जिसे अपनी दृष्टिसे पवित्र किया है, जो पीनेमें स्वादिष्ट है और अपनी विशालताके कारण रमणीय जान पड़ता है, वह पुष्करतीर्थका पापहारी जल हमलोगोंको पवित्र करे।

२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


उन्होंने अपनी नम्रता और प्रणाम आदिके द्वारा महर्षियोंको सन्तुष्ट किया। वे यज्ञमें भाग लेनेवाले महर्षि भी सदस्योंसहित बहुत प्रसन्न हुए तथा सबने एकत्रित होकर सूतजीका यथायोग्य आदर-सत्कार किया।

**ऋषि बोले—**देवताओंके समान तेजस्वी सूतजी ! आप कैसे और किस देशसे यहाँ आये हैं ? अपने आनेका कारण बतलाइये।

**सूतजीने कहा—**महर्षियो ! मेरे बुद्धिमान् पिता व्यास-शिष्य लोमहर्षणजीने मुझे यह आज्ञा दी है कि 'तुम मुनियोंके पास जाकर उनकी सेवामें रहो और वे जो कुछ पूछें, उसे बताओ।' आपलोग मेरे पूज्य हैं। बताइये, मैं कौन-सी कथा कहूँ ? पुराण, इतिहास अथवा भिन्न-भिन्न प्रकारके धर्म—जो आज्ञा दीजिये, वही सुनाऊँ।

सूतजीका यह मधुर वचन सुनकर वे श्रेष्ठ महर्षि बहुत प्रसन्न हुए। अत्यन्त विश्वसनीय, विद्वान् लोमहर्षण-पुत्र उग्रश्रवाको उपस्थित देख उनके हृदयमें पुराण सुननेकी इच्छा जाग्रत् हुई। उस यज्ञमें यजमान थे महर्षि शौनक, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ, मेधावी तथा [वेदके] विज्ञानमय आरण्यक-भागके आचार्य थे। वे सब महर्षियोंके साथ श्रद्धाका आश्रय लेकर धर्म सुननेकी इच्छासे बोले।

**शौनकने कहा—**महाबुद्धिमान् सूतजी ! आपने इतिहास और पुराणोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यासजीकी भलीभाँति आराधना की है। उनकी पुराण-विषयक श्रेष्ठ बुद्धिसे आपने अच्छी तरह लाभ उठाया है। महामते ! यहाँ जो ये श्रेष्ठ ब्राह्मण विराजमान हैं, इनका मन पुराणोंमें लग रहा है। ये पुराण सुनना चाहते हैं। अतः आप इन्हें पुराण सुनानेकी ही कृपा करें। ये सभी श्रोता, जो यहाँ एकत्रित हुए हैं, बहुत ही श्रेष्ठ हैं। भिन्न-भिन्न गोत्रोंमें इनका जन्म हुआ है। ये वेदवादी ब्राह्मण अपने-अपने वंशका पौराणिक वर्णन सुनें। इस दीर्घकालीन यज्ञके पूर्ण होनेतक आप मुनियोंको पुराण सुनाइये। महाप्राज्ञ ! आप इन सब लोगोंसे पद्मपुराणकी कथा कहिये। पद्मकी उत्पत्ति कैसे हुई, उससे ब्रह्माजीका आविर्भाव किस प्रकार हुआ तथा कमलसे प्रकट हुए ब्रह्माजीने किस तरह जगत्‌की सृष्टि की—ये सब बातें इन्हें बताइये।

उनके इस प्रकार पूछनेपर लोमहर्षण-कुमार सूतजीने सुन्दर वाणीमें सूक्ष्म अर्थसे भरा हुआ न्याययुक्त वचन कहा—'महर्षियो ! आपलोगोंने जो मुझे पुराण सुनानेकी आज्ञा दी है, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; यह मुझपर आपका महान् अनुग्रह है। सम्पूर्ण धर्मोंके पालनमें लगे रहनेवाले पुराणवेत्ता विद्वानोंने जिनकी भलीभाँति व्याख्या की है, उन पुराणोक्त विषयोंको मैंने जैसा सुना है, उसी रूपमें वह सब आपको सुनाऊँगा। सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें सूत जातिका सनातन धर्म यही है कि वह देवताओं, ऋषियों तथा अमिततेजस्वी राजाओंकी वंश-परम्पराको धारण करे—उसे याद रखे तथा इतिहास और पुराणोंमें जिन ब्रह्मवादी महात्माओंका वर्णन किया गया है, उनकी स्तुति करे; क्योंकि जब वेनकुमार राजा पृथुका यज्ञ हो रहा था, उस समय सूत और मागधने पहले-पहल उन महाराजकी स्तुति ही की थी। उस स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर महात्मा पृथुने उन दोनोंको वरदान दिया। वरदानमें उन्होंने सूतको सूत नामक देश और मागधको मगधका राज्य प्रदान किया था। क्षत्रियके वीर्य और ब्राह्मणीके गर्भसे जिसका जन्म होता है, वह सूत कहलाता है। ब्राह्मणोंने मुझे पुराण सुनानेका अधिकार दिया है। आपने धर्मका विचार करके ही मुझसे पुराणकी बातें पूछी हैं; इसलिये इस भूमण्डलमें जो सबसे उत्तम एवं ऋषियोंद्वारा सम्मानित पद्मपुराण है, उसकी कथा आरम्भ करता हूँ। श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी साक्षात् भगवान् नारायणके स्वरूप हैं। वे ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सम्पूर्ण लोकोंमें पूजित तथा अत्यन्त तेजस्वी हैं। उन्हींसे प्रकट हुए पुराणोंका मैंने अपने पिताजीके पास रहकर अध्ययन किया है। पुराण सब शास्त्रोंके पहलेसे विद्यमान हैं। ब्रह्माजीने [कल्पके आदिमें] सबसे पहले पुराणोंका ही स्मरण किया था। पुराण त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और कामके साधक एवं परम पवित्र हैं। उनकी रचना सौ करोड़ श्लोकोंमें हुई

२-भीष्म और पुलस्त्यका संवाद—सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान् विष्णुकी महिमा

सृष्टिखण्ड ] * भीष्म और पुलस्त्यका संवाद—सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान् विष्णुकी महिमा *


है।* समयके अनुसार इतने बड़े पुराणोंका श्रवण और पठन असम्भव देखकर स्वयं भगवान् उनका संक्षेप करनेके लिये प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यासरूपसे अवतार लेते हैं और पुराणोंको अठारह भागोंमें बाँटकर उन्हें चार लाख श्लोकोंमें सीमित कर देते हैं। पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही इस भूमण्डलमें प्रकाशित होता है। देवलोकोंमें आज भी सौ करोड़ श्लोकोंका विस्तृत पुराण मौजूद है।

अब मैं परम पवित्र पद्मपुराणका वर्णन आरम्भ करता हूँ। उसमें पाँच खण्ड और पचपन हजार श्लोक हैं। पद्मपुराणमें सबसे पहले सृष्टिखण्ड है। उसके बाद भूमिखण्ड आता है। फिर स्वर्गखण्ड और उसके पश्चात् पातालखण्ड है। तदनन्तर परम उत्तम उत्तरखण्डका वर्णन आया है। इतना ही पद्मपुराण है। भगवान्‌की नाभिसे जो महान् पद्म (कमल) प्रकट हुआ था, जिससे इस जगत्‌की उत्पत्ति हुई है, उसीके वृत्तान्तका आश्रय लेकर यह पुराण प्रकट हुआ है। इसलिये इसे पद्मपुराण कहते हैं। यह पुराण स्वभावसे ही निर्मल है, उसपर भी इसमें श्रीविष्णुभगवान्‌के माहात्म्यका वर्णन होनेसे इसकी निर्मलता और भी बढ़ गयी है। देवाधिदेव भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें ब्रह्माजीके प्रति जिसका उपदेश किया था तथा ब्रह्माजीने जिसे अपने पुत्र मरीचिको सुनाया था वही यह पद्मपुराण है। ब्रह्माजीने ही इसे इस जगत्में प्रचलित किया है।

भीष्म और पुलस्त्यका संवाद—सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान् विष्णुकी महिमा

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! जो सृष्टिरूप मूल प्रकृतिके ज्ञाता तथा इन भावात्मक पदार्थोंके द्रष्टा हैं, जिन्होंने इस लोककी रचना की है, जो लोकतत्त्वके ज्ञाता तथा योगवेत्ता हैं, जिन्होंने योगका आश्रय लेकर सम्पूर्ण चराचर जीवोंकी सृष्टि की है और जो समस्त भूतों तथा अखिल विश्वके स्वामी हैं, उन सच्चिदानन्द परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। फिर ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, अन्य लोकपाल तथा सूर्यदेवको एकाग्रचित्तसे नमस्कार करके ब्रह्मस्वरूप वेदव्यासजीको प्रणाम करता हूँ। उन्हींसे इस पुराण-विद्याको प्राप्त करके मैं आपके समक्ष प्रकाशित करता हूँ। जो नित्य, सदसत्स्वरूप, अव्यक्त एवं सबका कारण है, वह ब्रह्म ही महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त विशाल ब्रह्माण्डकी सृष्टि करता है। यह विद्वानोंका निश्चित सिद्धान्त है। सबसे पहले हिरण्यमय (तेजोमय) अण्डमें ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। वह अण्ड सब ओर जलसे घिरा है। जलके बाहर तेजका घेरा और तेजके बाहर वायुका आवरण है। वायु आकाशसे और आकाश भूतादि (तामस अहंकार) से घिरा है। अहंकारको महत्तत्त्वने घेर रखा है और महत्तत्त्व अव्यक्त—मूल प्रकृतिसे घिरा है। उक्त अण्डको ही सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिका आश्रय बताया गया है। इसके सिवा, इस पुराणमें नदियों और पर्वतोंकी उत्पत्तिका बारम्बार वर्णन आया है। मन्वन्तरों और कल्पोंका भी संक्षेपमें वर्णन है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने महात्मा पुलस्त्यको इस पुराणका उपदेश दिया था। फिर पुलस्त्यने इसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) में भीष्मजीको सुनाया था। इस पुराणका पठन, श्रवण तथा विशेषतः स्मरण धन, यश और आयुको बढ़ानेवाला एवं सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। जो द्विज अङ्गों और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंका ज्ञान रखता है, उसकी अपेक्षा वह अधिक विद्वान् है जो केवल इस पुराणका ज्ञाता है।† इतिहास और पुराणोंके सहारे ही वेदकी व्याख्या करनी चाहिये; क्योंकि वेद अल्पज्ञ विद्वान्‌से यह सोचकर डरता रहता है कि कहीं यह मुझपर प्रहार न कर बैठे—अर्थका अनर्थ न कर बैठे। [तात्पर्य यह कि पुराणोंका अध्ययन किये बिना वेदार्थका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता।] ‡


* पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ (१।५३)
† यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः। पुराणं च विजानाति यः स तस्माद् विचक्षणः॥ (२।५०-५१)
‡ इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्। बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥ (२।५१-५२)