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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

उत्तरखण्ड ] * पुरुषोत्तम मासकी 'कमला' और 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य * ६७७ ***************************************************************************************

मुनिश्रेष्ठ ! कार्तिककी 'प्रबोधिनी' एकादशीके दिन बहुत-से फल-फूल, कपूर, अरगजा और कुङ्कुमके द्वारा श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। एकादशी आनेपर धनकी कंजूसी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस दिन दान आदि करनेसे असंख्य पुण्यकी प्राप्ति होती है। 'प्रबोधिनी' को जागरणके समय शङ्खमें जल लेकर फल तथा नाना प्रकारके द्रव्योंके साथ श्रीजनार्दनको अर्घ्य देना चाहिये। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने और सब प्रकारके दान देनेसे जो फल मिलता है, वही 'प्रबोधिनी' एकादशीको अर्घ्य देनेसे करोड़ गुना होकर प्राप्त होता है। देवर्षे ! अर्घ्यके पश्चात् भोजन-आच्छादन और दक्षिणा आदिके द्वारा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य उस दिन श्रीमद्भागवतकी कथा सुनता अथवा पुराणका पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षरपर कपिलादानका फल मिलता है। मुनिश्रेष्ठ ! कार्तिकमें जो मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार शास्त्रोक्त रीतिसे वैष्णवव्रत (एकादशी) का पालन करता है, उसकी मुक्ति अविचल है। केतकीके एक पत्तेसे पूजित होनेपर भगवान् गरुड़ध्वज एक हजार वर्षतक अत्यन्त तृप्त रहते हैं। देवर्षे ! जो अगस्तके फूलसे भगवान् जनार्दनकी पूजा करता है, उसके दर्शनमात्रसे नरककी आग बुझ जाती है। वत्स ! जो कार्तिकमें भगवान् जनार्दनको तुलसीके पत्र और पुष्प अर्पण करते हैं, उनका जन्मभरका किया हुआ सारा पाप भस्म हो जाता है। मुने ! जो प्रतिदिन दर्शन, स्पर्श, ध्यान, नाम-कीर्तन, स्तवन, अर्पण, सेचन, नित्यपूजन तथा नमस्कारके द्वारा तुलसीमें नव प्रकारकी भक्ति करते हैं, वे कोटि सहस्र युगोंतक पुण्यका विस्तार करते हैं।* नारद ! सब प्रकारके फूलों और पत्तोंको चढ़ानेसे जो फल होता है, वह कार्तिक मासमें तुलसीके एक पत्तेसे मिल जाता है। कार्तिक आया देख प्रतिदिन नियमपूर्वक तुलसीके कोमल पत्तोंसे महाविष्णु श्रीजनार्दनका पूजन करना चाहिये। सौ यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करने और अनेक प्रकारके दान देनेसे जो पुण्य होता है, वह कार्तिकमें तुलसीदलमात्रसे केशवकी पूजा करनेपर प्राप्त हो जाता है।


पुरुषोत्तम मासकी 'कमला' और 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य

युधिष्ठिरने पूछा— भगवन् ! अब मैं श्रीविष्णुके व्रतोंमें उत्तम व्रतका, जो सब पापोंको हर लेनेवाला तथा व्रती मनुष्योंको मनोवाञ्छित फल देनेवाला हो, श्रवण करना चाहता हूँ। जनार्दन ! पुरुषोत्तम मासकी एकादशीकी कथा कहिये, उसका क्या फल है ? और उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है ? प्रभो ! किस दानका क्या पुण्य है ? मनुष्योंको क्या करना चाहिये ? उस समय कैसे स्नान किया जाता है ? किस मन्त्रका जप होता है ? कैसी पूजन-विधि बतायी गयी है ? पुरुषोत्तम ! पुरुषोत्तम मासमें किस अन्नका भोजन उत्तम है ?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजेन्द्र ! अधिक मास आनेपर जो एकादशी होती है, वह 'कमला' नामसे प्रसिद्ध है। वह तिथियोंमें उत्तम तिथि है। उसके व्रतके प्रभावसे लक्ष्मी अनुकूल होती हैं। उस दिन ब्राह्म मुहूर्तमें उठकर भगवान् पुरुषोत्तमका स्मरण करे और विधिपूर्वक स्नान करके व्रती पुरुष व्रतका नियम ग्रहण करे। घरपर जप करनेका एक गुना, नदीके तटपर दूना, गोशालामें सहस्रगुना, अग्निहोत्रगृहमें एक हजार एक सौ गुना, शिवके क्षेत्रोंमें, तीर्थोंमें, देवताओंके निकट तथा


* तुलसीदलपुष्पाणि ये यच्छन्ति जनार्दने। कार्तिके सकलं वत्स पापं जन्मार्र्जितं दहेत् ॥
दृष्टा स्पृष्टा च ध्याता कीर्तिता नामतः स्तुता। रोपिता सेचिता नित्यं पूजिता तुलसी नता ॥
नवधा तुलसीभक्तिं ये कुर्वन्ति दिने दिने। युगकोटिसहस्राणि तन्वन्ति सुकृतं मुने॥ (६३। ६१—६३)

६७८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


तुलसीके समीप लाख गुना और भगवान् विष्णुके निकट अनन्त गुना फल होता है।

अवन्तीपुरीमें शिवशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, उनके पाँच पुत्र थे। इनमें जो सबसे छोटा था, वह पापाचारी हो गया; इसलिये पिता तथा स्वजनोंने उसे त्याग दिया। अपने बुरे कर्मोंके कारण निर्वासित होकर वह बहुत दूर वनमें चला गया। दैवयोगसे एक दिन वह तीर्थराज प्रयागमें जा पहुँचा। भूखसे दुर्बल शरीर और दीन मुख लिये उसने त्रिवेणीमें स्नान किया। फिर क्षुधासे पीड़ित होकर वह वहाँ मुनियोंके आश्रम खोजने लगा। इतनेमें उसे वहाँ हरिमित्र मुनिका उत्तम आश्रम दिखायी दिया। पुरुषोत्तम मासमें वहाँ बहुत-से मनुष्य एकत्रित हुए थे। आश्रमपर पापनाशक कथा कहनेवाले ब्राह्मणोंके मुखसे उसने श्रद्धापूर्वक 'कमला' एकादशीकी महिमा सुनी, जो परम पुण्यमयी तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। जयशर्माने विधिपूर्वक 'कमला' एकादशीकी कथा सुनकर उन सबके साथ मुनिके आश्रमपर ही व्रत किया। जब आधी रात हुई तो भगवती लक्ष्मी उसके पास आकर बोलीं—'ब्रह्मन्! इस समय 'कमला' एकादशीके व्रतके प्रभावसे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ और देवाधिदेव श्रीहरिकी आज्ञा पाकर वैकुण्ठधामसे आयी हूँ। मैं तुम्हें वर दूँगी।'

ब्राह्मण बोला— माता लक्ष्मी ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो वह व्रत बताइये, जिसकी कथा-वार्तामें साधु-ब्राह्मण सदा संलग्न रहते हैं।

लक्ष्मीने कहा— ब्राह्मण ! एकादशी-व्रतका माहात्म्य श्रोताओंके सुनने योग्य सर्वोत्तम विषय है। यह पवित्र वस्तुओंमें सबसे उत्तम है। इससे दुःस्वप्नका नाश तथा पुण्यकी प्राप्ति होती है, अतः इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये। उत्तम पुरुष श्रद्धासे युक्त हो एक या आधे श्लोकका पाठ करनेसे भी करोड़ों महापातकोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। जैसे मासोंमें पुरुषोत्तम मास, पक्षियोंमें गरुड़ तथा नदियोंमें गङ्गा श्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार तिथियोंमें द्वादशी तिथि उत्तम है। समस्त देवता आज भी [एकादशी व्रतके ही लोभसे] भारतवर्षमें जन्म लेनेकी इच्छा रखते हैं। देवगण सदा ही रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणका पूजन करते हैं। जो लोग मेरे प्रभु भगवान् नारायणके नामका सदा भक्तिपूर्वक जप करते हैं, उनकी ब्रह्मा आदि देवता सर्वदा पूजा करते हैं। जो लोग श्रीहरिके नाम-जपमें संलग्न हैं, उनकी लीला-कथाओंके कीर्तनमें तत्पर हैं तथा निरन्तर श्रीहरिकी पूजामें ही प्रवृत्त रहते हैं; वे मनुष्य कलियुगमें कृतार्थ हैं। यदि दिनमें एकादशी और द्वादशी हो तथा रात्रि बीतते-बीतते त्रयोदशी आ जाय तो उस त्रयोदशीके पारणमें सौ यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। व्रत करनेवाला पुरुष चक्रसुदर्शनधारी देवाधिदेव श्रीविष्णुके समक्ष निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करके भक्तिभावसे संतुष्टचित्त होकर उपवास करे। वह मन्त्र इस प्रकार है—

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ॥
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
(६४। ३४)

'कमलनयन ! भगवान् अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरण दें।'

उत्तरखण्ड ] * पुरुषोत्तम मासकी 'कमला' और 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य * ६७१


तत्पश्चात् व्रत करनेवाला मनुष्य मन और इन्द्रियोंको वशमें करके गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदिके द्वारा रात्रिमें भगवान्‌के समक्ष जागरण करे। फिर द्वादशीके दिन उठकर स्नानके पश्चात् जितेन्द्रियभावसे विधिपूर्वक श्रीविष्णुकी पूजा करे। एकादशीको पञ्चामृतसे जनार्दनको नहलाकर द्वादशीको केवल दूधमें स्नान करानेसे श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त होता है। पूजा करके भगवान्‌से इस प्रकार प्रार्थना करे—

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव॥
(६४।३९)

'केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो गया हूँ। आप इस व्रतसे प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।'

इस प्रकार देवताओंके स्वामी देवाधिदेव भगवान् गदाधरसे निवेदन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा दे। उसके बाद भगवान् नारायणके शरणागत होकर बलिवैश्वदेवकी विधिसे पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वयं मौन हो अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ भोजन करे। इस प्रकार जो शुद्ध भावसे पुण्यमय एकादशीका व्रत करता है, वह पुनरावृत्तिसे रहित वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन् ! ऐसा कहकर लक्ष्मीदेवी उस ब्राह्मणको वरदान दे अन्तर्धान हो गयीं। फिर वह ब्राह्मण भी धनी होकर पिताके घरपर आ गया। इस प्रकार जो 'कमला' का उत्तम व्रत करता है तथा एकादशीके दिन इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

युधिष्ठिर बोले—जनार्दन ! पापंका नाश और पुण्यका दान करनेवाली एकादशीके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये, जिसे इस लोकमें करके मनुष्य परम पदको प्राप्त होता है।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन् ! शुक्ल या कृष्णपक्षमें जभी एकादशी प्राप्त हो, उसका परित्याग न करे, क्योंकि वह मोक्षरूप सुखको बढ़ानेवाली है। कलियुगमें तो एकादशी ही भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाली, सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाली तथा पापोंका नाश करनेवाली है। एकादशी रविवारको, किसी मङ्गलमय पर्वके समय अथवा संक्रान्तिके ही दिन क्यों न हो, सदा ही उसका व्रत करना चाहिये। भगवान् विष्णुके प्रिय भक्तोंको एकादशीका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। जो शास्त्रोक्त विधिसे इस लोकमें एकादशीका व्रत करते हैं, वे जीवन्मुक्त देखे जाते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।

युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्ण ! वे जीवन्मुक्त कैसे हैं? तथा विष्णुरूप कैसे होते हैं? मुझे इस विषयको जाननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन् ! जो कलियुगमें भक्तिपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार निर्जल रहकर एकादशीका उत्तम व्रत करते हैं, वे विष्णुरूप तथा जीवन्मुक्त क्यों नहीं हो सकते हैं? एकादशीव्रतके समान सब पापोंको हरनेवाला तथा मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला पवित्र व्रत दूसरा कोई नहीं है। दशमीको एक बार भोजन, एकादशीको निर्जल व्रत तथा द्वादशीको पारण करके मनुष्य श्रीविष्णुके समान हो जाते हैं। पुरुषोत्तम मासके द्वितीय पक्षकी एकादशीका नाम 'कामदा' है। जो श्रद्धापूर्वक 'कामदा'के शुभ व्रतका अनुष्ठान करता है, वह इस लोक और परलोकमें भी मनोवाञ्छित वस्तुको पाता है। यह 'कामदा' पवित्र, पावन, महापातकनाशिनी तथा व्रत करनेवालोंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। नृपश्रेष्ठ ! 'कामदा' एकादशीको विधिपूर्वक पुष्प, धूप, नैवेद्य तथा फल आदिके द्वारा भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करनी चाहिये। व्रत करनेवाला वैष्णव पुरुष दशमी तिथिको काँसेके बर्तन, उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, मधु, पराया अन्न, दो बार भोजन तथा मैथुन—इन दसोंका परित्याग करे। इसी प्रकार एकादशीको जूआ, निद्रा, पान, दाँतुन, परायी निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध और असत्य-भाषण—इन ग्यारह दोषोंको त्याग दे तथा द्वादशीके

६८० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ******************************************************************************************************

दिन काँसका बर्तन, उड़द, मसूर, तेल, असत्य-भाषण, व्यायाम, परदेशगमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैलकी पीठपर सवारी, पराया अन्न तथा साग—इन बारह वस्तुओंका त्याग करे। राजन्! जिन्होंने इस विधिसे 'कामदा' एकादशीका व्रत किया और रात्रिमें जागरण करके श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा की है, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। इसके पढ़ने और सुननेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है।


चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन

नारदजीने पूछा— महेश्वर! पृथ्वीपर चातुर्मास्य व्रतके जो प्रसिद्ध नियम हैं, उन्हें मैं सुनना चाहता हूँ; आप उनका वर्णन कीजिये।

महादेवजी बोले— देवर्षे! सुनो, मैं तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। आषाढ़के शुक्लपक्षमें एकादशीको उपवास करके भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रतके नियम ग्रहण करे। श्रीहरिके योगनिद्रामें प्रवृत्त हो जानेपर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिककी पूर्णिमातक भूमिपर शयन करे। इस बीचमें न तो घर या मन्दिर आदिकी प्रतिष्ठा होती है और न यज्ञादि कार्य ही सम्पन्न होते हैं, विवाह, यज्ञोपवीत, अन्यान्य माङ्गलिक कर्म, राजाओंकी यात्रा तथा नाना प्रकारकी दूसरी-दूसरी क्रियाएँ भी नहीं होतीं। मनुष्य एक हजार अश्वमेध यज्ञ करनेसे जिस फलको पाता है, वही चातुर्मास्य व्रतके अनुष्ठानसे प्राप्त कर लेता है। जब सूर्य मिथुन राशिपर हों, तब भगवान् मधुसूदनको शयन कराये और तुला राशिके सूर्य होनेपर पुनः श्रीहरिको शयनसे उठाये। यदि मलमास आ जाय तो निम्नलिखित विधिक अनुष्ठान करे। भगवान् विष्णुकी प्रतिमा स्थापित करे, जो शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाली हो, जिसे पीताम्बर पहनाया गया हो तथा जो सौम्य आकारवाली हो। नारद! उसे शुद्ध एवं सुन्दर पलंगपर, जिसके ऊपर सफेद चादर बिछी हो और तकिया रखी हो, स्थापित करे। फिर दही, दूध, मधु, लावा और घीसे नहलाकर उत्तम चन्दनका लेप करे। तत्पश्चात् धूप दिखाकर मनोहर पुष्पोंसे श्रृङ्गार करे। इस प्रकार उसकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे प्रार्थना करे—

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥
(६६। १५)

'जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सारा जगत् सो जाता है तथा आपके जाग्रत् होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् जाग उठता है।'

नारद! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको स्थापित करके उसीके आगे स्वयं वाणीसे कहकर चातुर्मास्य व्रतके नियम ग्रहण करे। स्त्री हो या पुरुष, जो भगवान्का भक्त हो, उसे हरिबोधिनी एकादशीतक चार महीनोंके लिये नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिये। जितात्मा पुरुष निर्मल प्रभातकालमें दन्तधावनपूर्वक उपवास करके नित्यकर्मका अनुष्ठान करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके समक्ष जिन नियमोंको ग्रहण करता है, उनका तथा उनके पालन करनेवालोंका फल पृथक्-पृथक् बतलाता हूँ।

विद्वन्! चातुर्मास्यमें गुड़का त्याग करनेसे मनुष्यको मधुरताकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार तेलको त्याग देनेसे दीर्घायु संतान और सुगन्धित तेलके त्यागसे अनुपम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। योगाभ्यासी मनुष्य ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। ताम्बूलका त्याग करनेसे मनुष्य भोग-सामग्रीसे सम्पन्न होता और उसका कण्ठ सुरीला होता है। घीके त्यागसे लावण्यकी प्राप्ति होती और शरीर चिकना होता है। विप्रवर! फलका त्याग करनेवालेको बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। जो चौमासेभर पलाशके पत्तेमें भोजन करता है, वह रूपवान् और भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दही-दूध छोड़नेवाले मनुष्यको गोलोक मिलता है। जो मौनव्रत धारण करता है, उसकी आज्ञा भंग नहीं होती। जो स्थालीपाक (बटलोईमें भोजन बनाकर खाने) का त्याग करता है, वह इन्द्रका सिंहासन प्राप्त करता है। नारद! इस प्रकारके त्यागसे धर्मकी सिद्धि होती है। इसके साथ 'नमो नारायणाय' का जप

उत्तरखण्ड ] * चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन * ६८१


करनेसे सौगुने फलकी प्राप्ति होती है। चौमासेका व्रत करनेवाला पुरुष पोखरेमें स्नान करनेमात्रसे गङ्गा-स्नानका फल पाता है। जो सदा पृथ्वीपर भोजन करता है, वह पृथ्वीका स्वामी होता है। श्रीविष्णुकी चरण-वन्दना करनेसे गोदानका फल मिलता है। उनके चरण-कमलोंका स्पर्श करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। प्रतिदिन एक समय भोजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फलभागी होता है। जो श्रीविष्णुकी एक सौ आठ बार परिक्रमा करता है, वह दिव्य विमानपर बैठकर यात्रा करता है। विद्वन्! पञ्चगव्य खानेवाले मनुष्यको चान्द्रायणका फल मिलता है। जो प्रतिदिन भगवान् विष्णुके आगे शास्त्रविनोदके द्वारा लोगोंको ज्ञान देता है, वह व्यासरूप विद्वान् श्रीविष्णुधामको प्राप्त होता है। तुलसीदलसे भगवान्‌की पूजा करके मानव वैकुण्ठ-धाममें जाता है। गर्म जलका त्याग कर देनेसे पुष्कर तीर्थमें स्नान करनेका फल होता है। जो पत्तोंमें भोजन करता है, उसे कुरुक्षेत्रका फल मिलता है। जो प्रतिदिन पत्थरकी शिलापर भोजन करता है, उसे प्रयाग-तीर्थका पुण्य प्राप्त होता है।

चौमासेमें काँसीके बरतनोंका त्याग करके अन्यान्य धातुओंके पात्रोंका उपयोग करे। अन्य किसी प्रकारका पात्र न मिलनेपर मिट्टीका ही पात्र उत्तम है। अथवा स्वयं ही पलाशके पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनावे और उनसे भोजन-पात्रका काम ले। जो पूरे एक वर्षतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है और जो वनमें रहकर केवल पत्तोंमें भोजन करता है, उन दोनोंको समान फल मिलता है। पलाशके पत्तोंमें किया हुआ भोजन चान्द्रायणके समान माना गया है। पलाशके पत्तोंमें एक-एक बारका भोजन त्रिरात्र-व्रतके समान पुण्यदायक और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। एकादशीके व्रतका जो पुण्य है, वही पलाशके पत्तेमें भोजन करनेका भी बतलाया गया है। उससे मनुष्य सब प्रकारके दानों तथा समस्त तीर्थोंका फल पा लेता है। कमलके पत्तोंमें भोजन करनेसे कभी नरक नहीं देखना पड़ता। ब्राह्मण उसमें भोजन करनेसे वैकुण्ठमें जाता है। ब्रह्माजीका महान् वृक्ष—पलाश पापोंका नाशक और सम्पूर्ण कामनाओंका दाता है। नारद ! इसका बिचला पत्ता शूद्र जातिके लिये निषिद्ध है। यदि शूद्र पलाशके बिचले पत्रमें भोजन करता है तो उसे चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त नरकमें रहना पड़ता है; अतः वह बिचले पत्रको त्याग दे और शेष पत्रोंमें भोजन किया करे। ब्रह्मन् ! जो शूद्र बिचले पत्रमें भोजन करता है, वह ब्राह्मणको कपिला गौ दान करनेसे ही शुद्ध होता है, अन्यथा नहीं।

यदि शूद्र अपने घरमें कपिला गौका दोहन करे तो वह दस हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर पशुयोनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र कपिल जातिके बैलको गाड़ीमें जोतकर हाँकता है, वह उस बैलके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक कुम्भीपाकमें पकाया जाता है; यदि शूद्र पानी लानेके लिये किसी ब्राह्मणको घरमें भेजे तो वह जल मदिराके तुल्य होता है और उसे पीनेवाला नरकमें जाता है। जो शूद्र बुलानेपर ब्राह्मणोंके घर भोजन करता है, उसके लिये वह अन्न अमृतके समान होता है और उसे खाकर वह मोक्ष प्राप्त करता है। जो शूद्र लोभवश दूसरेका, विशेषतः ब्राह्मणोंका सोना या चाँदी ले लेता है, वह नरकमें जाता है। शूद्रको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंको दान दे और उनमें विशेषरूपसे भक्तिभाव करे। विशेषतः चौमासेमें जैसे भगवान् विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी। नारद! ब्राह्मणोंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। भाद्रपद मास आनेपर उनकी महापूजा होती है। चौमासेमें भूमिपर शयन करनेवाला मनुष्य विमान प्राप्त करता है। दस हजार वर्षोंतक उसे रोग नहीं सताते। वह मनुष्य बहुत-से पुत्र और धनसे युक्त होता है। उसे कभी कोढ़की बीमारी नहीं होती। बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्नका भोजन करनेसे बावली और कुआँ बनवानेका फल होता है। जो प्राणियोंकी हिंसासे मुँह मोड़कर द्रोहका त्याग कर देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्यका भागी होता है। वेदोंमें बताया गया है कि 'अहिंसा श्रेष्ठ धर्म है।' दान, दया और दम—ये भी उत्तम धर्म हैं, यह बात मैंने सर्वत्र ही सुनी है; अतः बड़े लोगोंको भी

६८२ * अभीष्टस्य हृषीकेशं वदीत्यन्ति परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

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चाहिये कि वे पूरा प्रयत्न करके उक्त धर्मोंका पालन करें। यह चातुर्मास्य व्रत मनुष्योंद्वारा सदा पालन करनेयोग्य है। ब्रह्मन् ! और अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता ? इस पृथ्वीपर जो लोग भगवान् विष्णुके भक्त हैं, वे धन्य हैं ! उनका कुल अत्यन्त धन्य है ! तथा उनकी जाति भी परम धन्य मानी गयी है।

जो भगवान् जनार्दनके शयन करनेपर मधु भक्षण करता है, उसे महान् पाप लगता है; अब उसके त्यागनेका जो पुण्य है, उसका भी श्रवण करो, नाना प्रकारके जितने भी यज्ञ हैं, उन सबके अनुष्ठानका फल उसे प्राप्त होता है। चौमासेमें अनार, नींबू और नारियलका भी त्याग करे। ऐसा करनेवाला पुरुष विमानपर विचरनेवाला देवता होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है। जो मनुष्य धान, जौ और गेहूँका त्याग करता है, वह विधिपूर्वक दक्षिणासहित अश्वमेधादि यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाता है। साथ ही वह धन-धान्यसे सम्पन्न और अनेक पुत्रोंसे युक्त होता है। तुलसीदल, तिल और कुशोंसे तर्पण करनेका फल कोटिगुण बताया गया है। विशेषतः चातुर्मास्यमें उसका फल बहुत अधिक होता है। जो भगवान् विष्णुके सामने वेदके एक या आधे पदका अथवा एक या आध ऋचाका भी गान करते हैं, वे निश्चय ही भगवान्‌के भक्त हैं; इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। नारद ! जो चौमासेमें दही, दूध, पत्र, गुड़ और साग छोड़ देता है, वह निश्चय ही मोक्षका भागी होता है। मुने ! जो मनुष्य प्रतिदिन आँवला मिले हुए जलसे ही स्नान करते हैं, उन्हें नित्य महान् पुण्य प्राप्त होता है। मनीषी पुरुष आँवलेके फलको पापहारी बतलाते हैं। ब्रह्माजीने तीनों लोकोंको तारनेके लिये पूर्वकालमें आँवलेकी सृष्टि की थी। जो मनुष्य चौमासेभर अपने हाथसे भोजन बनाकर खाता है, वह दस हजार वर्षतक इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो मौन होकर भोजन करता है, वह कभी दुःखमें नहीं पड़ता। मौन होकर भोजन करनेवाले राक्षस भी स्वर्गलोकमें चले गये हैं। यदि पके हुए अन्नमें कीड़े-मकोड़े पड़ जायँ तो वह अशुद्ध हो जाता है। यदि मानव उस अपवित्र अन्नको खा ले तो वह दोषका भागी होता है।

मौन होकर भोजन करनेवाला पुरुष निस्सन्देह स्वर्गलोकमें जाता है। जो बात करते हुए भोजन करता है, उसके वार्तालापसे अन्न अशुद्ध हो जाता है, वह केवल पापका भोजन करता है; अतः मौन-धारण अवश्य करना चाहिये। नारद ! मौनावलम्बनपूर्वक जो भोजन किया जाता है, उसे उपवासके समान जानना चाहिये। जो नरश्रेष्ठ प्रतिदिन प्राणवायुको पाँच आहुतियाँ देकर मौन भोजन करता है, उसके पाँच पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मन् ! पितृकर्म (श्राद्ध) में सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। अपवित्र अङ्गपर पड़ा हुआ वस्त्र भी अशुद्ध हो जाता है। मल-मूत्रका त्याग अथवा मैथुन करते समय कमर अथवा पीठपर जो वस्त्र रहता है, उस वस्त्रको अवश्य ही बदल दे। श्राद्धमें तो ऐसे वस्त्रको त्याग देना ही उचित है। मुने ! विद्वान् पुरुषोंको सदा चक्रधारी भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। विशेषतः पवित्र एवं जितेन्द्रिय पुरुषोंका यह आवश्यक कर्तव्य है। भगवान् हृषीकेशके शयन करनेपर तृणशाक (पत्तियोंका साग), कुसुम्भिका (लौकी) तथा सिले हुए कपड़े यत्नपूर्वक त्याग देने चाहिये। जो चौमासेमें भगवान्‌के शयन करनेपर इन वस्तुओंको त्याग देता है, वह कल्पपर्यन्त कभी नरकमें नहीं पड़ता। विप्रवर ! जिसने असत्य-भाषण, क्रोध, शहद तथा पर्वके अवसरपर मैथुनका त्याग कर दिया है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। विद्वन् ! किसी पदार्थको उपभोगमें लानेके पहले उसमेंसे कुछ ब्राह्मणको दान करना चाहिये; जो ब्राह्मणको दिया जाता है, वह धन अक्षय होता है। ब्रह्मन् ! मनुष्य दानमें दिये हुए धनका कोटि-कोटि गुना फल पाता है। जो पुरुष सदा ब्राह्मणकी बतायी हुई उत्तम विधि तथा शास्त्रोक्त नियमोंका पालन करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है, अतः पूर्ण प्रयत्न करके यथाशक्ति नियम और दानके द्वारा देवाधिदेव जनार्दनको संतुष्ट करना चाहिये।

नारदजीने पूछा— विश्वेश्वर ! जिसके आचरणसे

उत्तरखण्ड ] * चातुर्मास्य व्रतकी विधि और उद्यापन * ६८३


भगवान् गोविन्द मनुष्योंपर संतुष्ट होते हैं, वह ब्रह्मचर्य कैसा होता है ? प्रभो ! यह बतलानेकी कृपा करें।

महादेवजीने कहा— विद्वन् ! जो केवल अपनी ही स्त्रीसे अनुराग रखता है, उसे विद्वानोंने ब्रह्मचारी माना है। केवल ऋतुकालमें स्त्रीसमागम करनेसे ब्रह्मचर्यकी रक्षा होती है। जो अपनेमें भक्ति रखनेवाली निर्दोष पत्नीका परित्याग करता है, वह पापी मनुष्य लोकमें भ्रूणहत्याको प्राप्त होता है।

चौमासेमें जो स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजन किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। जो एक अथवा दोनों समय पुराण सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धामको जाता है। जो भगवान्‌के शयन करनेपर विशेषतः उनके नामका कीर्तन और जप करता है, उसे कोटिगुना फल मिलता है। जो ब्राह्मण भगवान् विष्णुका भक्त है और प्रतिदिन उनका पूजन करता है, वही सबमें धर्मात्मा तथा वही सबसे पूज्य है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। मुने ! इस पुण्यमय पवित्र एवं पापनाशक चातुर्मास्य व्रतको सुननेसे मनुष्यको गङ्गास्नानका फल मिलता है।

नारदजीने कहा— प्रभो ! चातुर्मास्य व्रतका उद्यापन बतलाइये; क्योंकि उद्यापन करनेपर निश्चय ही सब कुछ परिपूर्ण होता है।

महादेवजी बोले— महाभाग ! यदि व्रत करनेवाला पुरुष व्रत करनेके पश्चात् उसका उद्यापन नहीं करता, तो वह कर्मोंके यथावत् फलका भागी नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय विशेषरूपसे सुवर्णके साथ अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नके दानसे वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य चौमासेभर पलाशकी पत्तलमें भोजन करता है, वह उद्यापनके समय घीके साथ भोजनका पदार्थ ब्राह्मणको दान करे। यदि उसने अयाचित व्रत (बिना माँगे स्वतः प्राप्त अन्नका भोजन) किया हो तो सुवर्णयुक्त वृषभका दान करे। मुनिश्रेष्ठ ! उड़दका त्याग करनेवाला पुरुष बछड़ेसहित गौका दान करे। आँवलेके फलसे स्नानका नियम पालन करनेपर मनुष्य एक माशा सुवर्ण दान करे। फलोंके त्यागका नियम करनेपर फल दान करे। धान्यके त्यागका नियम होनेपर कोई-सा धान्य (अन्न) अथवा अगहनीके चावलका दान करे। भूमिशयनका नियम पालन करनेपर रूईके गद्दे और तकियेसहित शय्यादान करे। द्विजवर ! जिसने चौमासेमें ब्रह्मचर्यका पालन किया है, उसको चाहिये कि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन दे, साथ ही उपभोगके अन्यान्य सामान, दक्षिणा, साग और नमक दान करे। प्रतिदिन बिना तेल लगाये स्नानका नियम पालन करनेवाला मनुष्य घी और सत्तू दान करे। नख और केश रखनेका नियम पालन करनेपर दर्पण दान करे। यदि जूते छोड़ दिये हों तो उद्यापनके समय जूतोंका दान करना चाहिये। जो प्रतिदिन दीपदान करता रहा हो, वह उस दिन सोनेका दीप प्रस्तुत करे और उसमें घी डालकर विष्णुभक्त ब्राह्मणको दे दे। देते समय यही उद्देश्य होना चाहिये कि मेरा व्रत पूर्ण हो जाय। पान न खानेका नियम लेनेपर सुवर्णसहित कपूरका दान करे। द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार नियमके द्वारा समय-समयपर जो कुछ परित्याग किया हो, वह परलोकमें सुख-प्राप्तिकी इच्छासे विशेषरूपसे दान करे। पहले स्नान आदि करके भगवान् विष्णुके समक्ष उद्यापन कराना चाहिये। शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु आदि-अन्तसे रहित हैं, उनके आगे उद्यापन करनेसे व्रत परिपूर्ण होता है।


६८४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य

नारदजीने कहा— सुरश्रेष्ठ ! अब मेरे हितके लिये आप यमकी आराधना बताइये। देव ! किस उपायसे मनुष्यको एक नरकसे दूसरे नरकमें नहीं जाना पड़ता। सुना जाता है—यमलोकमें वैतरणी नदी है, जो दुर्द्धर्ष, अपार, दुस्तर तथा रक्तकी धारा बहानेवाली है। वह समस्त प्राणियोंके लिये दुस्तर है, उसे सुगमताके साथ किस प्रकार पार किया जा सकता है ?

महादेवजी बोले— ब्रह्मन् ! पूर्वकालकी बात है, द्वारकापुरीके समुद्रमें स्नान करके मैं ज्यों ही निकला, सामनेसे मुझे ब्रह्मचारी मुद्गल मुनि आते दिखायी दिये। उन्होंने प्रणाम किया और विस्मित होकर इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

मुद्गल बोले— देव ! मैं अकस्मात् मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था। उस समय मेरे सारे अङ्ग जल रहे थे। इतनेहीमें यमराजके दूतोंने आकर मुझे बलपूर्वक शरीरसे खींचा। मैं अंगूठेके बराबर पुरुष-शरीर धारण करके बाहर निकला; फिर उन दूतोंने मुझे खूब कसकर बाँधा और उसी अवस्थामें यमराजके पास पहुँचा दिया। मैं एक ही क्षणमें यमराजकी सभामें पहुँचकर देखता हूँ कि पीले नेत्र और काले मुखवाले यम सामने ही बैठे हैं। वे महाभयङ्कर जान पड़ते थे। भयानक राक्षस और दानव उनके पास बैठे और सामने खड़े थे। अनेक धर्माधिकारी तथा चित्रगुप्त आदि लेखक वहाँ मौजूद थे। मुझे देखकर विश्वके शासक यमने अपने किङ्करोंसे कहा—'अरे ! तुमलोग नामके भ्रममें पड़कर मुनिको कैसे ले आये ? इन्हें छोड़ो और कौण्डिन्य नामक ग्राममें जो भीमकका पुत्र मुद्गल नामक क्षत्रिय है, उसको ले आओ; क्योंकि उसकी आयु समाप्त हो चुकी है।'

यह सुनकर वे दूत वहाँ गये और पुनः लौट आये। फिर समस्त यमदूत धर्मराजसे बोले—'सूर्यनन्दन ! वहाँ जानेपर भी हमलोगोंने ऐसे किसी प्राणीको नहीं देखा, जिसकी आयु क्षीण हो चुकी हो। न जाने, कैसे हमलोगोंका चित्त भ्रममें पड़ गया ?'

यमराज बोले— जिन लोगोंने 'वैतरणी' नामक द्वादशीका व्रत किया है, वे तुम यमदूतोंके लिये प्रायः अदृश्य हैं। उज्जैन, प्रयाग अथवा यमुनाके तटपर जिनकी मृत्यु हुई है तथा जिन्होंने तिल, हाथी, सुवर्ण और गौ आदिका दान किया है, वे भी तुमलोगोंकी दृष्टिमें नहीं आ सकते।

दूतोंने पूछा— स्वामिन् ! वह व्रत कैसा है ? आप उसका पूरा-पूरा वर्णन कीजिये। देव ! मनुष्योंको उस समय ऐसा कौन-सा कर्म करना चाहिये जो आपको संतोष देनेवाला हो। जिन्होंने कृष्णपक्षकी एकादशीका व्रत किया है, वे कैसे पापमुक्त हो सकते हैं ?

यमराज बोले— दूतो ! मार्गशीर्ष आदि मासोंमें जो ये कृष्णपक्षकी द्वादशियाँ आती हैं, उन सबमें विधिपूर्वक वैतरणी व्रत करना चाहिये। जबतक वर्ष पूरा न हो जाय, तबतक प्रतिमास व्रतको चालू रखना चाहिये। व्रतके दिन उपवासका नियम ग्रहण करना

उत्तरखण्ड ] * यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य * ६८५


चाहिये, जो भगवान् विष्णुको संतोष प्रदान करनेवाला है। द्वादशीको श्रद्धा और भक्तिके साथ श्रीगोविन्दकी पूजा करके इस प्रकार कहे—'देव ! स्वप्नमें इन्द्रियोंकी विकलताके कारण यदि भोजन और मैथुनकी क्रिया बन जाय तो आप मुझपर कृपा करके क्षमा कीजिये।' इस प्रकार नियम करके मिट्टी, गोमय और तिल लेकर मध्याह्नमें तीर्थ (जलाशय) के पास जाय और व्रतकी पूर्तिके लिये निम्नाङ्कित मन्त्रसे विधिपूर्वक स्नान करे—

अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे ॥
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ।
त्वया हृतेन पापेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
काश्यां चैव तु संभूतास्तिला वै विष्णुरूपिणः।
तिलस्नानेन गोविन्दः सर्वपापं व्यपोहति ॥
विष्णुदेहोद्भवे देवि महापापापहारिणि ।
सर्वपापं हर त्वं वै सर्वौषधि नमोऽस्तु ते ॥
(६८ । ३४—३७)

'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतारके समय भगवान् विष्णुने भी तुम्हें अपने चरणोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने पूर्वजन्ममें जो पाप सञ्चित किया है, मेरा वह सारा पाप तुम हर लो। तुम्हारे द्वारा पापका नाश हो जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तिल काशीमें उत्पन्न हुए हैं तथा वे भगवान् विष्णुके स्वरूप हैं। तिलमिश्रित जलके द्वारा स्नान करनेपर भगवान् गोविन्द सब पापोंका नाश कर देते हैं। देवी सर्वौषधि ! तुम भगवान् विष्णुके देहसे प्रकट हुई तथा महान् पापोंका अपहरण करनेवाली हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे सारे पाप हर लो।'

इस प्रकार मृत्तिका आदिके द्वारा स्नान करके सिरपर तुलसीदल धारण कर तुलसीका नाम लेते हुए स्नान करे। यह स्नान ऋषियोंद्वारा बताया गया है। इसे विधिपूर्वक करना चाहिये। इस तरह स्नान करनेके पश्चात् जलसे बाहर निकलकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। फिर देवताओं और पितरोंका तर्पण करके श्रीविष्णुका पूजन करे। उसकी विधि इस प्रकार है। पहले एक कलशकी, जो फूटा-टूटा न हो, स्थापना करे। उसमें पञ्चपल्लव और पञ्चरत्न डाल दे। फिर दिव्य माला पहनाकर उस कलशको गन्धसे सुवासित करे। कलशमें जल भर दे और उसमें द्रव्य डालकर उसके ऊपर ताँबेका पात्र रख दे। इसके बाद उस पात्रमें देवाधिदेव तपोनिधि भगवान् श्रीधरकी स्थापना करके पूर्वोक्त विधिसे पूजा करे। फिर मिट्टी और गोबर आदिसे सुन्दर मण्डल बनावे। सफेद और धुले हुए चावलोंको पानीमें पीसकर उसके द्वारा मण्डलका संस्कार करे। तत्पश्चात् हाथ-पैर आदि अङ्गोंसे युक्त धर्मराजका स्वरूप बनावे और उसके आगे ताँबेकी वैतरणी नदी स्थापित करके उसकी पूजा करे। उसके बाद पृथक् आवाहन आदि करके यमराजकी विधिवत् पूजा करे।

पहले भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना करे—महाभाग केशव ! मैं विश्वरूपी देवेश्वर यमका आवाहन करता हूँ। आप यहाँ पधारें और समीपमें निवास करें। लक्ष्मीकान्त ! हरे ! यह आसनसहित पाद्य आपकी सेवामें समर्पित है। प्रभो ! विश्वका प्राणि-समुदाय आपका स्वरूप है। आपको नमस्कार है। आप प्रतिदिन मुझपर कृपा कीजिये।' इस प्रकार प्रार्थना करके 'भूतिदाय नमः' इस मन्त्रके द्वारा भगवान् विष्णुके चरणोंका, 'अशोकाय नमः' से घुटनोंका, 'शिवाय नमः' से जाँघोंका, 'विष्णुमूर्तये नमः' से कटिभागका, 'कन्दर्पाय नमः' से लिङ्गका, 'आदित्याय नमः' से अण्डकोषका, 'दामोदराय नमः' से उदरका, 'वासुदेवाय नमः' से स्तनोंका, 'श्रीधराय नमः' से मुखका, 'केशवाय नमः' से केशोंका, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठका, 'वरदाय नमः' से पुनः चरणोंका, 'शङ्खपाणये नमः', चक्रपाणये नमः', 'असिपाणये नमः', 'गदापाणये नमः' और 'परशुपाणये नमः'—इन नाममन्त्रोंद्वारा क्रमशः शङ्ख, चक्र, खड्ग, गदा तथा परशुका तथा 'सर्वात्मने नमः' इस मन्त्रके द्वारा मस्तकका ध्यान करे। इसके बाद यों कहे—'मैं समस्त पापोंकी राशिका नाश करनेके लिये मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध तथा कल्किका पूजन करता हूँ; भगवन् ! इन अवतारोंके रूपमें आपको

६८६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


-नमस्कार है। बारम्बार नमस्कार है।' इन सभी मन्त्रोंके द्वारा श्रीविष्णुका ध्यान करके उनका पूजन करे।*

तत्पश्चात् निम्नाङ्कित नाममन्त्रोंके द्वारा भगवान् धर्मराजका पूजन करना चाहिये—

धर्मराज नमस्तेऽस्तु धर्मराज नमोऽस्तु ते।
दक्षिणाशाय ते तुभ्यं नमो महिषवाहन ॥
चित्रगुप्त नमस्तुभ्यं विचित्राय नमो नमः।
नरकार्तिप्रशान्त्यर्थं कामान् यच्छ ममेप्सितान् ॥
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।
नीलाय चैव दध्नाय नित्यं कुर्यान्नमो नमः ॥
(६८ । ५३—५६)

'धर्मराज ! आपको बारम्बार नमस्कार है। दक्षिण दिशाके स्वामी ! आपको नमस्कार है। महिषपर चलनेवाले देवता ! आपको नमस्कार है। चित्रगुप्त ! आपको नमस्कार है। नरककी पीड़ा शान्त करनेके लिये विचित्र नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। आप मेरी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण करें। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूत-क्षय, वृकोदर, चित्र, चित्रगुप्त, नील और दध्नको नित्य नमस्कार करना चाहिये।'

तदनन्तर वैतरणीकी प्रतिमाको अर्घ्य देते हुए इस प्रकार कहे— 'वैतरणी ! तुम्हें पार करना अत्यन्त कठिन है। तुम पापोंका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हो। महाभागे ! यहाँ आओ और मेरे दिये हुए अर्घ्यको ग्रहण करो। यमद्वारके भयङ्कर मार्गमें वैतरणी नदी विख्यात है। उससे उद्धार पानेके लिये मैं यह अर्घ्य दे रहा हूँ। जो जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे परे है, पापी पुरुषोंके लिये जिसको पार करना अत्यन्त कठिन है, जो समस्त प्राणियोंके भयका निवारण करनेवाली है तथा यातनामें पड़े हुए प्राणी भयके मारे जिसमें डूब जाते हैं, उस भयङ्कर वैतरणी नदीको पार करनेके लिये मैंने यह पूजन किया है। वैतरणी देवी ! तुम्हारी जय हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। जिसमें देवता वास करते हैं, वही वैतरणी नदी है। मैंने भगवान् केशवकी प्रसन्नताके लिये भक्तिपूर्वक उस नदीका पूजन किया है। पापोंका नाश करनेवाली सिन्धु-रूपिणी वैतरणी नदीकी पूजा सम्पन्न हुई। मैं उसे पार करने तथा सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये इस वैतरणी-प्रतिमाका दान करता हूँ।'

इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर भगवान्‌से प्रार्थना करे—

कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ संसारादुद्धरस्य माम् ॥
नामग्रहणमात्रेण सर्वपापं हरस्व मे।
(६८ । ६४-६५)

'कृष्ण ! कृष्ण ! जगदीश्वर ! आप संसारसे मेरा उद्धार कीजिये। अपने नामोंके कीर्तनमात्रसे मेरा सारा पाप हर लीजिये।'

फिर क्रमशः यज्ञोपवीत आदि समर्पण करे। यज्ञोपवीतका मन्त्र इस प्रकार है—

यज्ञोपवीतं परमं कारितं नवतन्तुभिः ॥
प्रतिगृहीष्व देवेश प्रीतो यच्छ ममेप्सितम्।
(६८ । ६५-६६)

'देवेश्वर ! मैंने नौ तन्तुओंसे इस उत्तम


* आवाहयामि देवेशं यमं वै विश्वरूपिणम्। इहाभ्येहि महाभाग सांनिध्यं कुरु केशव ॥
इदं पाद्यं श्रियः कान्त सोपविष्टं हरे प्रभो। विशोधाय नमो नित्यं कृपां कुरु ममोपरि ॥
भूतिदाय नमः पादौ अशोकाय च जानुनी। ऊरू नमः शिवायैति विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥
कन्दर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय फलं तथा। दामोदराय जठरं वासुदेवाय वै स्तनौ ॥
श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति वै नमः। पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति चरणौ वरदाय च ॥
स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदापरशुपाणये। सर्वात्मने नमस्तुभ्यं शिर इत्यभिधीयते ॥
मत्स्यं कूर्मं च वाराहं नारसिंहं च वामनम्। रामं रामं च कृष्णं च बुद्धं कल्किं नमोऽस्तु ते ॥
सर्वपापौघनाशार्थं पूजयामि नमो नमः। एभिश्च सर्वशो मन्त्रैर्विष्णुं ध्यात्वा प्रपूजयेत् ॥ (६८ । ४५—५२)

उत्तरखण्ड ] * यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य * ६८७


यज्ञोपवीतका निर्माण कराया है, आप इसे ग्रहण करें और प्रसन्न होकर मेरा मनोरथ पूर्ण करें।'

ताम्बूल-मन्त्र

इदं दत्तं च ताम्बूलं यथाशक्ति सुशोभनम्॥
प्रतिगृह्णीष्व देवेश मामुद्धर भवार्णवात्।
(६८। ६६-६७)

'देवेश ! मैंने यथाशक्ति उत्तम शोभासम्पन्न ताम्बूल दान किया है, इसे स्वीकार करें और भवसागरसे मेरा उद्धार कर दें।'

दीप-आरतीका मन्त्र

पञ्चवर्तिप्रदीपोऽयं देवेशारार्तिकं तव॥
मोहान्धकारद्युमणे भक्तियुक्तो भवार्तिहन्।
(६८। ६७-६८)

'देवेश ! आप मोहरूपी अन्धकार दूर करनेके लिये सूर्यरूप हैं। भव-बन्धनकी पीड़ा हरनेवाले परमात्मन् ! मैं भक्तियुक्त होकर आपकी सेवामें यह पाँच बत्तियोंका दीपक प्रस्तुत करता हूँ। यह आपके लिये आरती है।'

नैवेद्य-मन्त्र

परमान्नं सुपक्वान्नं समस्तरससंयुतम्॥
निवेदितं मया भक्त्या भगवन् प्रतिगृह्यताम्।
(६८। ६८-६९)

'भगवन् ! मैंने सब रसोंसे युक्त सुन्दर पकवान, जो परम उत्तम अन्न है, भक्तिपूर्वक सेवामें निवेदन किया है; आप इसे स्वीकार करें।'

जप-समर्पण

द्वादशाक्षरमन्त्रेण यथासंख्यजपेन च॥
प्रीयतां मे श्रियः कान्तः प्रीतो यच्छतु वाञ्छितम्।
(६८। ६९-७०)

'द्वादशाक्षर मन्त्रका यथाशक्ति जप करनेसे भगवान् लक्ष्मीकान्त मुझपर प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करें।'

इस प्रकार श्रीहरिका पूजन करनेके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर गौको प्रणाम करे—

पञ्च गावः समुत्पन्ना मथ्यमाने महोदधौ।
तासां मध्ये तु या नन्दा तस्यै धेनवे नमो नमः॥
(६८। ७०-७१)

'समुद्रका मन्थन होते समय पाँच गौएँ उत्पन्न हुई थीं। उनमेंसे जो नन्दा नामकी धेनु है, उसे मेरा बारम्बार नमस्कार है।'

तत्पश्चात् विधिपूर्वक गौकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा एकाग्रचित्त हो अर्घ्य प्रदान करे—

सर्वकामदुहे देवि सर्वार्तिकनिवारिणि।
आरोग्यं संततिं दीर्घां देहि नन्दिनि मे सदा॥
पूजिता च वसिष्ठेन विश्वामित्रेण धीमता।
कपिले हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्॥
गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः।
नाके मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्गयः पयोमुचः॥
सुरभ्यः सौरभेयाश्च सरितः सागरास्तथा।
सर्वदेवमये देवि सुभद्रे भक्तवत्सले॥
(६८। ७२-७५)

'समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा सब प्रकारकी पीड़ा हरनेवाली देवी नन्दिनी ! मुझे सर्वदा आरोग्य तथा दीर्घायु संतान प्रदान करो। कपिले ! महर्षि वसिष्ठ तथा बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने भी तुम्हारी पूजा की है। मैंने पूर्वजन्ममें जो पाप सञ्चित किया है, उसे हर लो। गौएँ मेरे आगे रहें, गौएँ ही मेरे पीछे रहें तथा स्वर्गलोकमें भी सुवर्णमय सींगोंसे सुशोभित, सरिताओं और समुद्रोंकी भाँति दूधकी धारा बहानेवाली सुरभी और उनकी संतानें मेरे पास आवें। सर्वदेवमयी देवी नन्दिनी ! तुम परम कल्याणमयी और भक्तवत्सला हो। तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार विधिवत् पूजा करके गौओंको प्रतिदिन ग्रास समर्पण करे। उसका मन्त्र इस प्रकार है—

सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पापनाशिनीः।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः॥
(६८। ७६-७७)

'सबके हितमें लगी रहनेवाली, पवित्र, पापनाशिनी तथा त्रिभुवनकी माता गौएँ मेरा दिया हुआ ग्रास ग्रहण करें।'

**महादेवजी कहते हैं—**इस प्रकार धर्मराजके मुखसे सुने हुए वैतरणी-व्रतका मेरे आगे वर्णन करके

६८८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


इच्छानुसार भ्रमण करनेवाले द्विजश्रेष्ठ मुद्गल मुनि चले गये।

द्विजवर! जहाँ गोपीचन्दन रहता है, वह घर तीर्थ-स्वरूप है—यह भगवान् श्रीविष्णुका कथन है। जिस ब्राह्मणके घरमें गोपीचन्दन मौजूद रहता है, वहाँ कभी शोक, मोह तथा अमङ्गल नहीं होते। जिसके घरमें रात-दिन गोपीचन्दन प्रस्तुत रहता है, उसके पूर्वज सुखी होते हैं तथा सदा उसकी संतति बढ़ती है। गोपीतालाबसे उत्पन्न होनेवाली मिट्टी परम पवित्र एवं शरीरका शोधन करनेवाली है। देहमें उसका लेप करनेसे सारे रोग नष्ट होते हैं तथा मानसिक चिन्ताएँ भी दूर हो जाती हैं। अतः पुरुषोंद्वारा शरीरमें धारण किया हुआ गोपीचन्दन सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसका ध्यान और पूजन करना चाहिये। यह मल-दोषका विनाश करनेवाला है। इसके स्पर्शमात्रसे मनुष्य पवित्र हो जाता है। वह अन्तकालमें मनुष्योंके लिये मुक्तिदाता एवं परम पावन है। द्विजश्रेष्ठ! मैं क्या बताऊँ, गोपीचन्दन मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् विष्णुका प्रिय तुलसीकाष्ठ, उसके मूलकी मिट्टी, गोपीचन्दन तथा हरिचन्दन— इन चारोंको एकमें मिलाकर विद्वान् पुरुष अपने शरीरमें लगाये। जो ऐसा करता है, उसके द्वारा जम्बूद्वीपके समस्त तीर्थोंका सदाके लिये सेवन हो जाता है। जो गोपीचन्दनको घिसकर उसका तिलक लगाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। जिस पुरुषने गोपीचन्दन धारण कर लिया, उसने मानो गयामें जाकर अपने पिताका श्राद्ध-तर्पण आदि सब कुछ कर लिया।


वैष्णवोंके लक्षण और महिमा तथा श्रवणद्वादशी-व्रतकी विधि और माहात्म्य-कथा

महादेवजी कहते हैं— नारद! सुनो, अब मैं वैष्णवोंके लक्षण बताऊँगा, जिन्हें सुनकर लोग ब्रह्महत्या आदि पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। भक्त भगवान् विष्णुका होकर रहा है, इसलिये वह वैष्णव कहलाता है। समस्त वर्णोंकी अपेक्षा वैष्णवको श्रेष्ठ कहा गया है। जिनका आहार अत्यन्त पवित्र है, उन्हींके वंशमें वैष्णव पुरुष जन्म धारण करता है। ब्रह्मन्! जिनके भीतर क्षमा, दया, तपस्या और सत्यकी स्थिति है, उन वैष्णवोंके दर्शनमात्रके आगसे रूईकी भाँति सारा पाप नष्ट हो जाता है। जो हिंसासे दूर रहता है, जिसकी मति सदा भगवान् विष्णुमें लगी रहती है, जो अपने कण्ठमें तुलसीकाष्ठकी माला धारण करता है, प्रतिदिन अपने अङ्गोंमें बारह तिलक लगाये रहता है तथा विद्वान् होकर धर्म और अधर्मका ज्ञान रखता है, वह मनुष्य वैष्णव कहलाता है। जो सदा वेद-शास्त्रके अभ्यासमें लगे रहते, प्रतिदिन यज्ञोंका अनुष्ठान करते तथा बारम्बार वर्षके चौबीस उत्सव मनाते रहते हैं, उनका कुल परम धन्य है; उन्हींका यश विस्तारको प्राप्त होता है तथा वे ही लोग संसारमें धन्यतम एवं भगवद्भक्त हैं। ब्रह्मन्! जिसके कुलमें एक ही भगवद्भक्त पुरुष उत्पन्न हो जाता है, उसका कुल बारम्बार उस पुरुषके द्वारा उद्धारको प्राप्त होता रहता है। वैष्णवोंके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है। महामुने! इस लोकमें जो वैष्णव पुरुष देखे जाते हैं, तत्त्ववेत्ता पुरुषोंको उन्हें विष्णुके समान ही जानना चाहिये। जिसने भगवान् विष्णुकी पूजा की, उसके द्वारा सबका पूजन हो गया। जिसने वैष्णवोंकी पूजा की, उसने महादान कर लिया। जो वैष्णवोंको सदा फल, पत्र, साग, अन्न अथवा वस्त्र दिया करते हैं, वे इस भूमण्डलमें धन्य हैं। ब्रह्मन्! वैष्णवोंके विषयमें अब और क्या कहा जाय। बारम्बार अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है; उनका दर्शन और स्पर्श—सब कुछ सुखद है। जैसे भगवान् विष्णु हैं, वैसा ही उनका भक्त वैष्णव पुरुष भी है। इन दोनोंमें कभी अन्तर नहीं रहता। ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष सदा वैष्णवोंकी पूजा करे। जो इस पृथ्वीपर एक ही वैष्णव ब्राह्मणको भोजन करा देता है, उसने सहस्रों ब्राह्मणोंको भोजन करा दिया—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

नारदजीने कहा— सुरश्रेष्ठ! जो सदा उपवास

उत्तराखण्ड ] * वैष्णवोंके लक्षण और महिमा तथा श्रवणद्वादशी-व्रतकी विधि और माहात्म्य-कथा * ६८९


करनेमें असमर्थ हैं, उनके लिये कोई एक ही द्वादशीका व्रत, जो पुण्यजनक हो, बताइये।

महादेवजी बोले—भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें जो श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशी होती है, वह सब कुछ देनेवाली पुण्यमयी तथा उपवास करनेपर महान् फल देनेवाली है। जो नदियोंके संगममें नहाकर उक्त द्वादशीको उपवास करता है, वह अनायास ही बारह द्वादशियोंका फल पा लेता है। बुधवार और श्रवण नक्षत्रसे युक्त जो द्वादशी होती है, उसका महत्त्व बहुत बड़ा है। उस दिन किया हुआ सब कुछ अक्षय हो जाता है। श्रवण-द्वादशीके दिन विद्वान् पुरुष जलपूर्ण कलशकी स्थापना करके उसके ऊपर एक पात्र रखे और उसमें श्रीजनार्दनकी स्थापना करे। तत्पश्चात् उनके आगे घीमें पका हुआ नैवेद्य निवेदन करे; साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार जलसे भरे हुए अनेक नये घड़ोंका दान करे। इस प्रकार श्रीगोविन्दकी पूजा करके उनके समीप रात्रिमें जागरण करे। फिर निर्मल प्रभातकाल आनेपर स्नान करके फूल, धूप, नैवेद्य, फल और सुन्दर वस्त्र आदिके द्वारा भगवान् गरुड़ध्वजकी पूजा करे। तदनन्तर पुष्पाञ्जलि दे और इस मन्त्रको पढ़े—

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंयुत।
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव॥
(७०।१०)

'बुधवार और श्रवण नक्षत्रसे युक्त भगवान् गोविन्द! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। मेरी पापराशिका नाश करके आप मुझे सब प्रकारके सुख प्रदान करें।'

तत्पश्चात् वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी, विशेषतः पुराणोंके ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मणको विधिपूर्वक पवित्र अन्नका दान करे। इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष किसी नदीके किनारे एकचित्त होकर उक्त विधिसे सब कार्य पूर्ण करे। इस विषयमें जानकार लोग यह प्राचीन इतिहास कहा करते हैं—एक महान् वनमें जो घटना घटित हुई थी, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो।

विद्वन्! दाशेरक नामका जो देश है, उसके पश्चिम भागमें मरु (मारवाड़) प्रदेश है, जो समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न करनेवाला है। वहाँकी भूमि तपी हुई बालूसे भरी रहती है। वहाँ बड़े-बड़े साँप हैं, जो महादुष्ट होते हैं। वह भूमि थोड़ी छायावाले वृक्षोंसे व्याप्त है। शमी, खैर, पलाश, करील और पीलू—ये ही वहाँके वृक्ष हैं। मजबूत काँटोंसे घिरे हुए वहाँके वृक्ष बड़े भयङ्कर दिखायी देते हैं; तथापि कर्मबन्धनसे बँधे होनेके कारण वहाँ भी सब जीव जीवन धारण करते हैं। विद्वन्! उस देशमें न तो पर्याप्त जल है और न जल धारण करनेवाले बादल ही वहाँ दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे देशमें कोई बनिया भाग्यवश अपने साथियोंसे बिछुड़कर इधर-उधर भटक रहा था। उसके हृदयमें भ्रम छा गया था। वह भूख, प्यास और परिश्रमसे पीड़ित हो रहा था। कहाँ गाँव है? कहाँ जल है? मैं कहाँ जाऊँगा ? यह कुछ भी उसे जान नहीं पड़ता था। इसी समय उसने कुछ प्रेत देखे, जो भूख-प्याससे व्याकुल एवं भयङ्कर दिखायी देते थे। उनमें एक प्रेत ऐसा था, जो दूसरे प्रेतके कंधेपर चढ़कर चलता था तथा और बहुत-से प्रेत उसे चारों ओरसे घेरे हुए थे। प्रेतोंकी भयानक आवाजके साथ वह

६९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


भयङ्कर प्रेत उधर ही आ रहा था। वह उस भयानक जंगलमें मनुष्यको आया देख प्रेतके कंधेसे पृथ्वीपर उतर पड़ा और बनियेके पास आकर उसे प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'इस घोर प्रदेशमें आपका कैसे प्रवेश हुआ?' यह सुनकर उस बुद्धिमान् बनियेने कहा—'दैवयोगसे तथा पूर्वजन्मके किये हुए कर्मकी प्रेरणासे मैं अपने साथियोंसे बिछुड़ गया हूँ। इस प्रकार मेरा यहाँ प्रवेश सम्भव हुआ है। इस समय मुझे बड़े जोरकी भूख और प्यास सता रही है।'

तब उस प्रेतने उस समय अपने अतिथिको उत्तम अन्न प्रदान किया। उसके खानेमात्रसे बनियेको बड़ी तृप्ति हुई। वह एक ही क्षणमें प्यास और संतापसे रहित हो गया। इसके बाद वहाँ बहुत-से प्रेत आ पहुँचे। प्रधान प्रेतने क्रमशः उन सबको अन्नका भाग दिया। दही, भात और जलसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता और तृप्ति हुई। इस प्रकार अतिथि और प्रेतसमुदायको तृप्त करके उसने स्वयं भी बचे हुए अन्नका सुखपूर्वक भोजन किया। उसके भोजन कर लेनेपर वहाँ जो सुन्दर अन्न और जल प्रस्तुत हुआ था, वह सब अदृश्य हो गया। तब बनियेने उस प्रेतराजसे कहा—'भाई ! इस वनमें तो मुझे यह बड़े आश्चर्यकी बात प्रतीत हो रही है। तुम्हें यह उत्तम अन्न और जल कहाँसे प्राप्त हुआ ? तुमने थोड़े-से ही अन्नसे इन बहुत-से जीवोंको तृप्त कर दिया। इस घोर जंगलमें तुमलोग कैसे निवास करते हो ?'

प्रेत बोला— महाभाग ! मैंने अपना पूर्वजन्म केवल वाणिज्य-व्यवसायमें आसक्त होकर व्यतीत किया है। समूचे नगरमें मेरे समान दूसरा कोई दुरात्मा नहीं था। धनके लोभसे मैंने कभी किसीको भीखतक नहीं दी। उन दिनों एक गुणवान् ब्राह्मण मेरे मित्र थे। एक समय भादोंके महीनेमें, जब श्रवण नक्षत्र और द्वादशीका योग आया था, वे मुझे साथ लेकर तापी नदीके तटपर गये, जहाँ उसका चन्द्रभागा नदीके साथ पवित्र संगम हुआ था, चन्द्रभागा चन्द्रमाकी पुत्री है और तापी सूर्यकी। उन दोनोंके मिले हुए शीत और उष्ण जलमें मैंने ब्राह्मणके साथ प्रवेश किया। श्रवण-द्वादशीके योगमें बहुत-से मनुष्योंको संतुष्ट किया। चन्द्रभागाके उत्तम जलसे भरकर ब्राह्मणको जलपात्र दान किया तथा दही और भातके साथ जलसे भरे हुए बहुत-से पुरवे भी ब्राह्मणोंको दिये। इसके सिवा भगवान् शङ्करके समक्ष श्रेष्ठ ब्राह्मणको छाता, जूते, वस्त्र तथा श्रीहरिकी प्रतिमा भी दान की। उस नदीके तीरपर मैंने धनकी रक्षाके लिये व्रत किया था। उपवासपूर्वक एक मनोहर जलपात्र भी दान किया था। यह सब करके मैं घर लौट आया। तदनन्तर, कुछ कालके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। नास्तिक होनेके कारण मुझे प्रेतकी योनिमें आना पड़ा। श्रवण-द्वादशीके योगमें मैंने जलका बड़ा पात्र दान किया था, इसलिये प्रतिदिन मध्याह्नके समय यह मुझे प्राप्त होता है। ये सब ब्राह्मणका धन चुरानेवाले पापी हैं, जो प्रेतभावको प्राप्त हुए हैं। इनमें कुछ परस्त्रीलम्पट और कुछ अपने स्वामीसे द्रोह करनेवाले रहे हैं। इस मरुप्रदेशमें आकर ये मेरे मित्र हो गये हैं। सनातन परमात्मा भगवान् विष्णु अक्षय (अविनाशी) हैं। उनके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय कहा गया है। उस अक्षय अन्नसे ही ये प्रेत पुनः-पुनः तृप्त होते रहते हैं। आज तुम मेरे अतिथिके रूपमें उपस्थित हुए हो। मैं अन्नसे तुम्हारी पूजा करके प्रेत-भावसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होऊँगा, परन्तु मेरे बिना ये प्रेत इस भयङ्कर वनमें कर्मानुसार प्राप्त हुई प्रेतयोनिकी दुःसह पीड़ा भोगेंगे; अतः तुम मुझपर कृपा करनेके लिये इन सबके नाम और गोत्र लिखकर ले लो। महामते ! यहाँसे हिमालयपर जाकर तुम खजाना प्राप्त करोगे। तत्पश्चात् गया जाकर इन सबका श्राद्ध कर देना।

महादेवजी कहते हैं— नारद ! बनियेको इस प्रकार आदेश देकर प्रेतने उसे सुखपूर्वक विदा किया। घर आनेपर उसने हिमालयकी यात्रा की और वहाँसे प्रेतका बताया हुआ खजाना लेकर वह लौट आया। उस खजानेका छठा अंश साथ लेकर वह 'गया' तीर्थमें गया। वहाँ पहुँचकर उस परम बुद्धिमान् बनियेने शास्त्रोक्त विधिसे उन प्रेतोंका श्राद्ध किया। एक-एकके नाम और गोत्रका उच्चारण करके उनके लिये पिण्डदान

उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९१ ************************************************************************************************

किया। वह जिस दिन जिसका श्राद्ध करता था, उस दिन वह आकर स्वप्नमें बनियेको प्रत्यक्ष दर्शन देता और कहता कि 'महाभाग ! तुम्हारी कृपासे मैंने प्रेतभावको त्याग दिया और अब मैं परमगतिको प्राप्त हो रहा हूँ।' इस प्रकार वह महामना वैश्य गया-तीर्थमें प्रेतोंका विधिपूर्वक श्राद्ध करके बारम्बार भगवान् विष्णुका ध्यान करता हुआ अपने घर लौट आया। फिर भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें, जब श्रवण-द्वादशीका योग आया, तब वह सब आवश्यक सामग्री साथ लेकर नदीके संगमपर गया और वहाँ स्नान करके उसने द्वादशीका व्रत किया। स्नान, दान और भगवान् विष्णुका पूजन करनेके अनन्तर ब्राह्मणको उपहार भेंट किया। एकचित्त होकर उस बुद्धिमान् वैश्यने शास्त्रोक्त विधिसे सब कार्य सम्पन्न किया। उसके बाद प्रतिवर्ष भादोंका महीना आनेपर श्रवण-द्वादशीके योगमें नदीके संगमपर जाकर वह भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे पूर्वोक्त प्रकारसे स्नान-दान आदि सब कार्य करने लगा। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गयी। उसने सब मनुष्योंके लिये दुर्लभ परमधामको प्राप्त कर लिया। आज भी वह विष्णुदूतोंसे सेवित हो वैकुण्ठधाममें विहार कर रहा है। ब्रह्मन् ! तुम भी इसी प्रकार श्रवण-द्वादशीका व्रत करो। वह इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाला, उत्तम बुद्धिको देनेवाला तथा सब पापोंको हरनेवाला उत्तम साधन है। जो श्रवण-द्वादशीके योगमें इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह इसके प्रभावसे विष्णुलोकमें जाता है।


नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन

ऋषियोंने कहा— सूतजी ! आपका हृदय अत्यन्त करुणायुक्त है; अतएव श्रीमहादेवजी और देवर्षि नारदका जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे आपने हमलोगोंसे कहा है। हमलोग श्रद्धापूर्वक सुन रहे हैं। अब आप कृपापूर्वक यह बताइये कि महात्मा नारदने ब्रह्माजीसे भगवन्नामोंकी महिमाका किस प्रकार श्रवण किया था।

सूतजी बोले— द्विजश्रेष्ठ मुनियो ! इस विषयमें मैं पुराना इतिहास सुनाता हूँ। आप सब लोग ध्यान देकर सुनें। इसके श्रवणसे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति बढ़ती है। एक समयकी बात है, चित्तको पूर्ण एकाग्र रखनेवाले नारदजी अपने पिता ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये मेरु पर्वतके शिखरपर गये। वहाँ आसनपर बैठे हुए जगत्पति ब्रह्माजीको प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ नारदजीने इस प्रकार कहा—'विश्वेश्वर ! भगवान्‌के नामकी जितनी शक्ति है, उसे बताइये। प्रभो ! ये जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी साक्षात् श्रीनारायण हरि हैं, इन अविनाशी परमात्माके नामकी कैसी महिमा है?'

ब्रह्माजी बोले— बेटा ! इस कलियुगमें विशेषतः नामकीर्तनपूर्वक भगवान्‌की भक्ति जिस प्रकार करनी चाहिये, वह सुनो। जिनके लिये शास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है, उन सभी पापोंकी शुद्धिके

६९२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


लिये एकमात्र विजयशील भगवान् विष्णुका प्रयत्नपूर्वक स्मरण ही सर्वोत्तम साधन देखा गया है, वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।* अतः श्रीहरिके नामका कीर्तन और जप करना चाहिये। जो ऐसा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। जो मनुष्य 'हरि' इस दो अक्षरोंवाले नामका सदा उच्चारण करते हैं, वे उसके उच्चारणमात्रसे मुक्त हो जाते हैं—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तपस्याके रूपमें किये जानेवाले जो सम्पूर्ण प्रायश्चित्त हैं, उन सबकी अपेक्षा श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है। जो मनुष्य प्रातः, सायं, रात्रि तथा मध्याह्न आदिके समय 'नारायण' नामका स्मरण करता है, उसके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।†

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद ! मेरा कथन सत्य है, सत्य है, सत्य है। भगवान्‌के नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'राम-राम-राम-राम' इस प्रकार बारम्बार जप करनेवाला मनुष्य यदि चाण्डाल हो तो भी वह पवित्रात्मा हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उसने नाम-कीर्तन-मात्रसे कुरुक्षेत्र, काशी, गया और द्वारका आदि सम्पूर्ण तीर्थोंका सेवन कर लिया। जो 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !' इस प्रकार जप और कीर्तन करता है, वह इस संसारका परित्याग करनेपर भगवान् विष्णुके समीप आनन्द भोगता है। ब्रह्मन् ! जो कलियुगमें प्रसन्नतापूर्वक 'नृसिंह' नामका जप और कीर्तन करता है, वह भगवद्भक्त मनुष्य महान् पापसे छुटकारा पा जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञ तथा द्वापरमें पूजन करके मनुष्य जो कुछ पाता है, वही कलियुगमें केवल भगवान् केशवका कीर्तन करनेसे पा लेता है। जो लोग इस बातको जानकर जगदात्मा केशवके भजनमें लीन होते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि—ये दस अवतार इस पृथ्वीपर बताये गये हैं। इनके नामोच्चारण-मात्रसे सदा ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल जिस किसी तरह भी श्रीविष्णुनामका कीर्तन, जप तथा ध्यान करता है, वह निस्सन्देह मुक्त होता है, निश्चय ही नरसे नारायण बन जाता है।‡

**सूतजी कहते हैं—**यह सुनकर नारदजीको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे अपने पिता ब्रह्माजीसे बोले—'तात ! तीर्थसेवनके लिये पृथ्वीपर भ्रमण करनेकी क्या आवश्यकता है; जिनके नामका ऐसा माहात्म्य है कि


* दृष्टं परेषां पापानामुक्तानां विशोधनम्। विष्णोर्जिष्णोः प्रयत्नेन स्मरणं पापनाशनम्॥ (७२ । १०)
† ये वदन्ति नरा नित्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्। तस्योच्चारणमात्रेण विमुक्तास्ते न संशयः॥
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि तपःकर्मात्मकानि वै। यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥
प्रातर्निशि तथा सायं मध्याह्नादिषु संस्मरन्। नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयं नरः॥ (७२ । १२—१४)
‡ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं भाषितं मम सुव्रत। नामोच्चारणमात्रेण महापापात्प्रमुच्यते॥
राम रामेति रामेति रामेति च पुनर्जपन्। स चाण्डालोऽपि पूतात्मा जायते नात्र संशयः॥
कुरुक्षेत्रं तथा काशी गया वै द्वारका तथा। सर्वं तीर्थं कृतं तेन नामोच्चारणमात्रतः॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति इति वा यो जपन् पठन्। इहलोकं परित्यज्य मोदते विष्णुसंनिधौ॥
नृसिंहेति मुदा विप्र वर्तते यो जपन् पठन्। महापापात् प्रमुच्येत कलौ भागवतो नरः॥
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥
ये तज्ज्ञात्वा निमग्नाश्च जगदात्मनि केशवे। सर्वपापपरिक्षीणा यान्ति विष्णोः परं पदम्॥
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा। रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की ततः स्मृतः॥
एते दशावताराश्च पृथिव्यां परिकीर्तिताः। एतेषां नाममात्रेण ब्रह्महा शुद्ध्यते सदा॥
प्रातः पठञ्जपन् ध्यायन् विष्णोर्नाम यथा तथा। मुच्यते नात्र संदेहः स वै नारायणो भवेत्॥ (७२ । २०—२९)

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९३


उसे सुननेमात्रसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है, उन भगवान्‌का ही स्मरण करना चाहिये। जिस मुखमें 'राम-राम' का जप होता रहता है, वही महान् तीर्थ है, वही प्रधान क्षेत्र है तथा वही समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। सुव्रत! भगवान्‌के कीर्तन करने-योग्य कौन-कौन-से नाम हैं? उन सबको विशेष रूपसे बताइये।

ब्रह्माजीने कहा— बेटा! ये भगवान् विष्णु सर्वत्रव्यापक सनातन परमात्मा हैं। इनका न आदि है न अन्त। ये लक्ष्मीसे युक्त, सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा तथा समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। जिनसे मेरा प्रादुर्भाव हुआ है, वे भगवान् विष्णु सदा मेरी रक्षा करें। वही कालके भी काल और वही मेरे पूर्वज हैं। उनका कभी विनाश नहीं होता। उनके नेत्र कमलके समान शोभा पाते हैं। वे परम बुद्धिमान्, अविकारी एवं पुरुष (अन्तर्यामी) हैं। सदा शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् विष्णु सहस्रों मस्तकवाले हैं। वे महाप्रभु हैं। सम्पूर्ण भूत उन्हींके स्वरूप हैं। भगवान् जनार्दन साक्षात् विश्वरूप हैं। कैटभ नामक असुरका वध करनेके कारण वे कैटभारि कहलाते हैं। वे ही व्यापक होनेके कारण विष्णु, धारण-पोषण करनेके कारण धाता और जगदीश्वर हैं। नारद! मैं उनका नाम और गोत्र नहीं जानता। तात! मैं केवल वेदोंका वक्ता हूँ, वेदातीत परमात्माका ज्ञाता नहीं, अतः देवर्षे! तुम वहाँ जाओ, जहाँ भगवान् विश्वनाथ रहते हैं। मुनिश्रेष्ठ! वे तुमसे सम्पूर्ण तत्त्वका वर्णन करेंगे। कैलासके स्वामी श्रीमद्महादेवजी ही अन्तर्यामी पुरुष हैं। वे देवताओंके स्वामी और सम्पूर्ण भक्तोंके आराध्यदेव हैं। पाँच मुखोंसे सुशोभित भगवान् उमानाथ सब दुःखोंका विनाश करनेवाले हैं। सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर श्रीविश्वनाथजी सदा भक्तोंपर दया करनेवाले हैं। नारद! वहीं जाओ, वे तुम्हें सब कुछ बता देंगे।

सूतजी कहते हैं— पिताकी बात सुनकर देवर्षि नारद कैलास पर्वतपर, जहाँ कल्याणप्रद भगवान् विश्वेश्वर नित्य निवास करते हैं, गये। देवताओं द्वारा पूजित देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् शङ्कर कैलासके शिखरपर विराजमान थे। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ, प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र तथा हाथोंमें त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग, तीक्ष्ण शूल, खड्ग और पिनाक नामका धनुष शोभा पा रहे थे। बैलपर सवारी करनेवाले वरदाता भगवान् भीम अपने अङ्गोंमें भस्म रमाये सर्पोंकी शोभासे युक्त चन्द्रमाका मुकुट पहने करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान हो रहे थे। नारदजीने देवेश्वर शिवको साष्टाङ्ग दण्डवत् किया। उन्हें देखकर महादेवजीके नेत्रकमल खिल उठे। उस समय वैष्णवोंमें सर्वश्रेष्ठ शिवने ब्रह्मचारियोंमें श्रेष्ठ नारदजीसे पूछा—'देवर्षिप्रवर! बताओ, कहाँसे आ रहे हो?'

नारदजीने कहा— भगवन्! एक समय मैं ब्रह्माजीके पास गया था। वहाँ उनके मुखसे मैंने भगवान् विष्णुके पापनाशक माहात्म्यका श्रवण किया। सुरश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने मेरे सामने भगवान्‌की महिमाका भलीभाँति वर्णन किया। भगवान्‌के नामकी जितनी शक्ति है, वह भी मैंने उनके मुखसे सुनी है। तत्पश्चात् पहले विष्णुके नामोंके विषयमें प्रश्न किया। तब उन्होंने कहा—'नारद! मैं इस बातको नहीं जानता; इसका ज्ञान महारुद्रको है। वे ही सब कुछ बतायेंगे।' यह सुनकर मैं आपके पास आया हूँ। इस घोर कलियुगमें मनुष्योंकी आयु थोड़ी होगी। वे सदा अधर्ममें तत्पर रहेंगे। भगवान्‌के नामोंमें उनकी निष्ठा नहीं होगी। कलियुगके ब्राह्मण पाखण्डी, धर्मसे विरक्त, संध्या न करनेवाले, व्रतहीन, दुष्ट और मलिन होंगे; जैसे ब्राह्मण होंगे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके लोग भी होंगे। प्रायः मनुष्य भगवान्‌के भक्त नहीं होंगे। द्विजोंसे बाहर गिने जानेवाले शूद्र कलियुगमें धर्म-अधर्म तथा हिताहितका ज्ञान भी नहीं रखते; ऐसा जानकर मैं आपके निकट आया हूँ। आप कृपा करके विष्णुके सहस्र नामोंका वर्णन कीजिये, जो पुरुषोंके लिये सौभाग्यजनक, परम उत्तम तथा सर्वदा भक्तिभावको बढ़ानेवाले हैं; इसी प्रकार जो ब्राह्मणोंको ब्रह्मज्ञान, क्षत्रियोंको विजय, वैश्योंको धन तथा शूद्रोंको सदा सुख देनेवाले हैं।

६९४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


सुव्रत ! जो सहस्रनाम परम गोपनीय है, उसका वर्णन कीजिये। वह परम पवित्र एवं सदा सर्वतीर्थमय है; अतः मैं उसका श्रवण करना चाहता हूँ। प्रभो ! विश्वेश्वर ! कृपया उस सहस्रनामका उपदेश कीजिये।

नारदजीके वचन सुनकर भगवान् शङ्करके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। भगवान् विष्णुके नामका बारम्बार स्मरण करके उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे बोले—'ब्रह्मन् ! भगवान् विष्णुके सहस्रनाम परम गोपनीय हैं। इन्हें सुनकर मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।' यों कहकर भगवान् शङ्करने नारदजीको विष्णुसहस्रनामका उपदेश दिया, जिसे पूर्वकालमें वे भगवती पार्वतीजीको सुना चुके थे। इस प्रकार नारदजीने कैलास पर्वतपर भगवान् महेश्वरसे श्रीविष्णुसहस्रनामका ज्ञान प्राप्त किया। फिर दैवयोगसे एक बार वे कैलाससे उतरकर नैमिषारण्य नामक तीर्थमें आये। वहाँके ऋषियोंने ऋषिश्रेष्ठ महात्मा नारदको आया देख विशेष-रूपसे उनका स्वागत-सत्कार किया। उन्होंने विष्णुभक्त विप्रवर नारदजीके ऊपर फूल बरसाये, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया, उनकी आरती उतारी और फल-मूल निवेदन करके पृथ्वीपर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तत्पश्चात् वे बोले—'महामुने ! हमलोग इस वंशमें जन्म लेकर आज कृतार्थ हो गये; क्योंकि आज हमें परम पवित्र और पापोंका नाश करनेवाला आपका दर्शन प्राप्त हुआ। देवर्षे ! आपके प्रसादसे हमने पुराणोंका श्रवण किया है। ब्रह्मन् ! अब आप यह बताइये कि किस प्रकारसे समस्त पापोंका क्षय हो सकता है। दान, तपस्या, तीर्थ, यज्ञ, योग, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और शास्त्र-समुदायके बिना ही कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?'

नारदजी बोले—मुनिवरो ! एक समय भगवती पार्वतीने कैलासशिखरपर बैठे हुए अपने प्रियतम देवाधिदेव जगद्गुरु महादेवजीसे इस प्रकार प्रश्न किया।

पार्वती बोलीं— भगवान् ! आप सर्वज्ञ और सर्वपूजित श्रेष्ठ देवता हैं। जन्म और मृत्युसे रहित, स्वयम्भू एवं सर्वशक्तिमान् हैं। स्वामिन् ! आप सदा किसका ध्यान करते हैं ? किस मन्त्रका जप करते हैं ? देवेश्वर ! इसे जाननेकी मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। सुव्रत ! यदि मैं आपकी प्रियतमा और कृपापात्र हूँ तो मुझसे यथार्थ बात कहिये।

महादेवजी बोले— देवि ! पहले सत्ययुगमें विशुद्ध चित्तवाले सब पुरुष सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर एकमात्र भगवान् विष्णुका तत्त्व जानकर उन्हींके नामोंका जप किया करते थे और उसीके प्रभावसे इस लोक तथा परलोकमें भी परम ऐश्वर्यको प्राप्त करते थे। प्रिये ! तुलादान, अश्वमेध आदि यज्ञ, काशी, प्रयाग आदि तीर्थोंमें किये हुए स्नान आदि शुभकर्म, गयामें किये हुए पितरोंके श्राद्ध-तर्पण आदि, वेदोंके स्वाध्याय आदि, जप, उग्र तप, नियम, यम, जीवोंपर दया, गुरुशुश्रूषा, सत्यभाषण, वर्ण और आश्रमके धर्मोंका पालन, ज्ञान तथा ध्यान आदि साधनोंका कोटि जन्मोंतक भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर भी मनुष्य परम कल्याणमय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुको नहीं पाते। परन्तु जो दूसरेका भरोसा न करके सर्वभावसे पुराण पुरुषोत्तम श्रीनारायणकी शरण ग्रहण करते हैं, वे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग एकमात्र श्रीभगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करते हैं, वे

उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९५


सुखपूर्वक जिस गतिको प्राप्त करते हैं, उसे समस्त धार्मिक भी नहीं पा सकते। अतः सदा भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये, इन्हें कभी भी भूलना नहीं चाहिये। क्योंकि सभी विधि और निषेध इन्हींके किङ्कर हैं—इन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं।* प्रिये ! अब मैं तुमसे भगवान् विष्णुके मुख्य-मुख्य हजार नामोंका वर्णन करूँगा, जो तीनों लोकोंको मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।

विनियोग

अस्य श्रीविष्णुर्नामसहस्रस्तोत्रस्य श्रीमहादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, परमात्मा देवता, ह्रीं बीजम्, श्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, चतुर्वर्गधर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥ १९४ ॥

इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रके महादेवजी ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, परमात्मा देवता, ह्रीं बीज, श्रीं शक्ति और क्लीं कीलक हैं। चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त जप करनेके लिये इस स्तोत्रका विनियोग (प्रयोग) किया जाता है ॥ १९४ ॥

ॐ वासुदेवाय विद्महे, महाहंसाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १९५ ॥

हम श्रीवासुदेवका तत्त्व समझनेके लिये ज्ञान प्राप्त करते हैं, महाहंसस्वरूप नारायणके लिये ध्यान करते हैं, श्रीविष्णु हमें प्रेरित करें—हमारी मन, बुद्धिको प्रेरणा देकर इस कार्यमें लगायें ॥ १९५ ॥

'अङ्गन्यासकरन्यासविधिपूर्वं यदा पठेत् ।
तत्फलं कोटिगुणितं भवत्येव न संशयः ॥ १९६ ॥

यदि पहले अङ्गन्यास और करन्यासकी विधि पूर्ण करके सहस्रनामस्तोत्रका पाठ किया जाय तो निस्सन्देह उसका फल कोटिगुना होता है ॥ १९६ ॥


अङ्गन्यास

श्रीवासुदेवः परं ब्रह्मेति हृदयम्। मूलप्रकृतिरिति शिरः। महावराह इति शिखा। सूर्यवंशध्वज इति कवचम्। ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशव इति नेत्रम्। पार्थार्थखण्डिताशेष इत्यस्त्रम्। नमो नारायणायेति न्यासं सर्वत्र कारयेत् ॥ १९७ ॥

'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' (श्रीवासुदेव परब्रह्म हैं)—यह कहकर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे। 'मूलप्रकृतिः' (मूल प्रकृति) का उच्चारण करके सिरका स्पर्श करे। 'महावराहः' (महान् वराहरूपधारी भगवान् विष्णु)—यह कहकर शिखाका स्पर्श करे। 'सूर्यवंशध्वजः' (सूर्यवंशके ध्वजारूप भगवान् श्रीराम) यों कहकर दोनों हाथोंसे दोनों भुजाओंके मूलभागका स्पर्श करे। 'ब्रह्मादि-काम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः' (अवतार धारण करनेपर जिनका शिशुरूप अपने अनुपम सौन्दर्यसे संसारको आश्चर्यमें डाल देता है तथा ब्रह्मा आदि देवता भी उस रूपमें जिनकी झाँकी करनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे भगवान् विष्णु धन्य हैं) यह कहकर नेत्रोंका स्पर्श करे। 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' (अर्जुनके लिये महाभारतके समस्त वीरोंका संहार करानेवाले श्रीकृष्ण) यों कहकर ताली बजाये। अन्तमें 'नमो नारायणाय' (श्रीनारायणको नमस्कार है)—ऐसा बोलकर सर्वाङ्गका स्पर्श करे ॥ १९७ ॥†

ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने, विशुद्धसत्त्वाय महाहंसाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ १९८ ॥

ॐकाररूप सर्वान्तर्यामी महात्मा नारायणको


* स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव हि किङ्कराः॥ (७२।१००)
† यहाँ अङ्गन्यासकी विधिका उल्लेख किया गया है; इन्हीं मन्त्रोंसे करन्यास भी किया जा सकता है, उसकी विधि इस प्रकार है। 'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' यह कहकर दोनों हाथोंके अँगूठोंको परस्पर मिलाये; इसी तरह 'मूलप्रकृतिः' कहकर दोनों तर्जिनियोंको, 'महावराहः'का उच्चारण करके दोनों बीचकी अँगुलियोंको, 'सूर्यवंशध्वजः' कहकर दोनों अनामिकाओंको, 'ब्रह्मादिकाम्यलालित्य-जगदाश्चर्यशैशवः'का उच्चारण करके दोनों कनिष्ठिका अँगुलियोंको, 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' कहकर दोनों हथेलियोंको तथा 'नमो नारायणाय'का उच्चारण करके हथेलियोंके पृष्ठभागोंको परस्पर स्पर्श कराये।

६९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


नमस्कार है, विशुद्ध सत्त्वमय महाहंसस्वरूप श्रीविष्णुका हम ध्यान करते हैं; अतः श्रीविष्णु देवता हमें सत्कार्यमें प्रेरित करें ॥ ११८ ॥

ह्रीं कृष्णाय विद्महे, ह्रीं रामाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ ११९ ॥

'ह्रीं' रूप श्रीकृष्णतत्त्वको समझनेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं; 'ह्रीं' रूप श्रीरामका हम ध्यान करते हैं; वे देव श्रीरघुनाथजी हमें प्रेरित करें ॥ ११९ ॥

शं नृसिंहाय विद्महे, श्रीकण्ठाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १२० ॥

शम्—कल्याणमय भगवान् नृसिंहका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीकण्ठका ध्यान करते हैं; वे श्रीनृसिंहरूप भगवान् विष्णु हमें प्रेरित करें ॥ १२० ॥

ॐ वासुदेवाय विद्महे, देवकीसुताय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥ १२१ ॥

ॐकाररूप श्रीवासुदेवका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीदेवकीनन्दन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं, वे श्रीकृष्ण हमें प्रेरित करें ॥ १२१ ॥

ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय नमः स्वाहा ॥ १२२ ॥

ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं—सच्चिदानन्दस्वरूप, गोपीजनोंके प्रियतम भगवान् गोविन्दको नमस्कार है; हम उनकी तृप्तिके लिये उत्तम रीतिसे हवन करते हैं—अपना सब कुछ अर्पण करते हैं ॥ १२२ ॥

इति मन्त्र समुच्चार्य यजेद् वा विष्णुमव्ययम् ।
श्रीनिवासं जगन्नाथं ततः स्तोत्रं पठेत् सुधीः ॥
ॐ वासुदेवः परं ब्रह्म परमात्मा परात्परः ॥ १२३ ॥

—उपर्युक्त मन्त्रोंका उच्चारण करके लक्ष्मीके निवासस्थान और संसारके स्वामी अविनाशी भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे; इसके बाद विद्वान् पुरुष सहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ वासुदेवः—सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा समस्त भूतोंमें सर्वात्मरूपसे बसनेवाले, चतुर्व्यूहमें वासुदेवस्वरूप, २ परं ब्रह्म—सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म—निर्गुण परमात्मा, ३ परमात्मा—परम श्रेष्ठ, नित्य-शुद्ध-बुद्ध—मुक्तस्वभाव, ४ परात्परः—पर अर्थात् प्रकृतिसे भी परे विराजमान परमात्मा ॥ १२३ ॥

परं धाम परं ज्योतिः परं तत्त्वं परं पदम् ।
परः शिवः परो ध्येयः परं ज्ञानं परा गतिः ॥ १२४ ॥

५ परं धाम—सर्वोत्तम वैकुण्ठधाम, निर्गुण परमात्मा, ६ परं ज्योतिः—सूर्य आदि ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाले सर्वोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप, ७ परं तत्त्वम्—परम तत्त्व, उपनिषदोंसे जाननेयोग्य सर्वोत्तम रहस्य, ८ परं पदम्—प्राप्त करनेयोग्य सर्वोत्कृष्ट पद, मोक्षस्वरूप, ९ परः शिवः—परम कल्याणरूप, १० परो ध्येयः—ध्यान करनेयोग्य सर्वोत्तम देव, चिन्तनके सर्वश्रेष्ठ आश्रय, ११ परं ज्ञानम्—भ्रान्तिशून्य उत्कृष्ट बोधस्वरूप परमात्मा, १२ परा गतिः—सर्वोत्तम गति, मोक्षस्वरूप ॥ १२४ ॥

परमार्थः परश्रेष्ठः परानन्दः परोदयः ।
परोऽव्यक्तात्परं व्योम परमर्द्धिः परेश्वरः ॥ १२५ ॥

१३ परमार्थः—मोक्षरूप परम पुरुषार्थ, परम सत्य १४ परश्रेष्ठः—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, १५ परानन्दः—परम आनन्दमय, असीम आनन्दकी निधि, १६ परोदयः—सर्वाधिक अभ्युदयशाली, १७ अव्यक्तात्परः—अव्यक्तपदवाच्य मूलप्रकृतिसे परे, १८ परं व्योम—नित्य एवं अनन्त आकाशस्वरूप निर्गुण परमात्मा, १९ परमर्द्धिः—सर्वोत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न, २० परेश्वरः—पर अर्थात् ब्रह्मादि देवताओंके भी ईश्वर ॥ १२५ ॥

निरामयो निर्विकारो निर्विकल्पो निराश्रयः ।
निरञ्जनो निरालम्बो निर्लेपो निरवग्रहः ॥ १२६ ॥

२१ निरामयः—रोग-शोकसे रहित, २२ निर्विकारः—उत्पत्तिः, सत्ता, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश—इन छः विकारोंसे शून्य, २३ निर्विकल्पः—सन्देहरहित, संकल्पशून्य, २४ निराश्रयः—स्वयं ही सबके आश्रय होनेके कारण अन्य किसी आश्रयसे रहित, २५ निरञ्जनः—वासना और आसक्तिरूपी मलसे शून्य, तमोगुणरहित,