पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३३
स्नान शौच तथा भिक्षायात्रा जप या वेदान्त का पाठ किया करो,
यह मेरी बुद्धि विष्णु का ध्यान करो या ब्रह्मानन्द में गोता लगाकर
बैठ जाओ, मैं तो साक्षी हूँ मैं कुछ करता या करवाता नहीं हूँ। कृत-
कृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की खुशी जब उसके अन्दर नहीं समाती
है तब मन में यह विचार किया करता है कि मैं धन्य हूँ क्योंकि मैं
अपने नित्य आत्मतत्व को ठीक ठीक समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ
क्योंकि मुझे आज स्पष्ट ही ब्रह्मानन्द समुद्र दीख पड़ रहा है। मैं
धन्य हूँ क्योंकि मुझे आज कोई भी सांसारिक दुःख दीखता नहीं
है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरा अज्ञान दिगन्त को पलायन कर
गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह आज सभी सिद्ध
हो गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरे समान धन्य कौन निक-
लेगा ? मैं धन्य हूँ मैं धन्य हूँ मैं वार वार धन्य हूँ। ओहो ! आज
मेरे पुण्यों के ढेर एक साथ ही फल पड़े हैं। पुण्यों की इस महती
सम्पत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा हुआ झोटे
ले रहा हूँ। मुझे ज्ञान कराने वाले शास्त्र, मुझे मार्ग दिखाने वाले गुरु,
मेरा वह ज्ञान और मेरा वह आनन्द जिनके कारण आज यह धन्य
अवस्था मुझे हाथ आयी है, सभी धन्य हैं। वे सबके सब आज मुझे
मेरा पद देकर समुत्तीर्ण हो गये। उनकी महिमा गाने के लिये
मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ? ऊपर कहा हुआ ऐसा विद्यानन्द
(ज्ञानानन्द) जब तक न उमड़ पड़े तब तक ब्रह्माभ्यास करते ही
जाना चाहिये।
15. Vishayananda
[ १५ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप
अब ब्रह्मानन्द के ही एक अंश बने हुए विषयानन्द का निरू-
पण इसलिये करेंगे कि वह भी तो ब्रह्मज्ञान को समझने का ही एक
लौकिक द्वार है। श्रुति ने स्वयं उसको ब्रह्मानन्द का ही एक अंश
बताया है। वह कहती है कि—शेष सब प्राणी उसी ब्रह्मानन्द की
मात्रा [कण] को चाट रहे हैं। मन की 'शान्त' 'घोर' तथा 'मूढ़' ये
तीन तरह की वृत्तियां होती हैं। वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त'
वृत्तियां कहाती हैं। तृष्णा, स्नेह, राग तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां
मानी जाती हैं। सम्मोह और भय आदि 'तामस' वृत्तियां बतायी
जाती हैं। इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म का केवल चित्स्वभाव आ गया
है। शान्तवृत्तियों में इतनी और अधिकता है कि इनमें ब्रह्मतत्व का
सुख भी प्रतिबिम्बित हो गया है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव'इत्यादि
श्रुतियों का भी यही अभिप्राय है कि वह आत्मतत्व किसी में चैतन्य
रूप से और किसी में चैतन्य तथा सुख दोनों रूपों से और किसी
में सत्ता चैतन्य और सुख तीनों रूपों से समाकर उन उनके प्रतिरूप
बन गया है। यह भी कहा है कि—भूतात्मा एक ही है वही सब
भूतों में व्यवस्थित हो रहा है। वह एकरूप से उन्हें दीखता है जो
ज्ञानी हों। परन्तु जिन्हें तत्व का पता नहीं होता उन्हें तो वह जलों
के चाँदोंने की तरह बहुत रूपों में दीखा करता है। कीचड़ वाले जल
में वही चांद अस्फुट दीखता है, निर्मल जल में वही चांद सुस्पष्ट
दीखने लगता है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्मतत्व भी शुद्ध और अशुद्ध
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ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३५
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वृत्तियों में दो तरह का हो जाता है। इसी को विस्तार से यों समझो
कि मलिन होने के कारण 'घोर' और 'मूढ' वृत्तियों में ब्रह्म का
सुखभाग ढका रहता है—दीखता नहीं। उनमें क्योंकि थोड़ी सी ही
निर्मलता रहती है इस कारण केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब पड़ा
करता है। दूसरा उदाहरण यह भी है कि निर्मल जल में अग्नि की
गरमी तो आ जाती है प्रकाश नहीं आता। इसी तरह 'घोर' और
'मूढ' वृत्तियों में केवल चेतनभाग का ही उद्भव होता है सुखभाग
का नहीं होता। काष्ठ में जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत
हो जाते हैं, इसी तरह 'शान्त' वृत्तियों में सुख और चैतन्य दोनों
ही उद्भूत हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर तो हम
यही देंगे कि इनका स्वभाव ही ऐसा है। इनके इस स्वभाव को
देखकर नियामक को ढूँढ निकालो। देखते हैं कि—'घोर' या 'मूढ'
कोई सी भी अवस्था जब हो—उस समय सुख का अनुभव होता
ही नहीं। यह भी देखा जाता है कि—'शान्त' वृत्तियों में तो सुखा-
नुभव होता ही है। घर या खेत आदि की कामना जब किसी के
मन में जाग जाती है तब वह राजस काम, घोर होने से सुख को
उद्भूत होने ही नहीं देता। देखलो कि—यह मेरा काम सिद्ध होगा
या नहीं ? यह विचार जब आता है तब दुःख होने लगता है। जब
काम सिद्ध नहीं होता तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस
काम में रुकावट डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब अपनी
कामना के विरुद्ध बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने
लगता है। जब वह उसका कुछ इलाज नहीं कर सकता तब उस
समय जो विषाद होता है वह 'तामस' है। इन क्रोधादियों में तो
बड़ा ही दुःख होता है। इनमें सुख की तो थोड़ी सी भी संभावना
नहीं होती। काम्य पदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाय
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उस समय जो हर्षवृत्ति उत्पन्न होती है, उसमें बड़ा सुख होता है।
उसका भोग करना मिल जाय तो और भी बड़ा सुख होता है। उस
काम्य पदार्थ के मिलने की सभावना हो जाय तो थोड़ा सा ही सुख
होता है। उसकी ओर से वैराग्य हो जाय तो बहुत ही बड़ा सुख
होता है—जिसका वर्णन हमने विद्यानन्द नाम के प्रकरण में विस्तार
पूर्वक किया है। क्रोध को भगा देने वाली क्षमा और लोभ को मार-
भगाने वाली उदारता में भी बड़ा सुख होता है। परन्तु यह बात
कभी न भूलनी चाहिये कि जो भी कोई सुख होता है वह सब
ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्म ही है। इष्ट भोग जब मिलता
है और प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब वह ब्रह्मतत्व उन
अन्तर्मुख वृत्तियों में निर्विघ्नता के साथ प्रतिबिम्बित हो जाया करता
है। बस यही.तो प्राणियों का 'सुख' कहाता है। 'सत्ता' चैतन्य
और 'सुख' ये ब्रह्म के तीन स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदियों में
केवल सत्ता ही प्रकट होती है, चैतन्य और सुख नहीं। 'घोर' और
'मूढ़' बुद्धिवृत्तियों में 'सत्ता' और 'चैतन्य' दो गुण प्रकट हो जाते
हैं। 'शान्त' वृत्तियों में तो 'सत्ता' 'चैतन्य' और 'सुख' तीनों ही
व्यक्त हो जाते हैं। प्रपंच में मिश्रित ब्रह्मतत्व का निरूपण यहां तक
किया गया। उस ब्रह्म को यदि कोई अमिश्ररूप में देखना चाहे तो
'ज्ञान' और 'योग' से ही उसे देखा जा सकता है। उन दोनों का
वर्णन पहले आ चुका है—ब्रह्मानन्द के प्रथम अध्याय में 'योग' का
वर्णन है। ब्रह्मानन्द के दूसरे [आत्मानन्द] तथा तीसरे [अद्वैतानन्द]
अध्याय में 'ज्ञान' का बखान किया गया है। 'असत्ता' 'जड़ता' और
'दुःख' ये तीनों ही माया के रूप हैं। 'असत्ता'[मिथ्यापन] मनुष्य के
सींग आदि पदार्थों में है। 'जड़ता' काष्ठ पाषाण आदि में पायी जाती
है। घोर और मूढ़ वृत्तियों में दुःख पाया जाता है। यों सब जगह
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३७
माया का राज्य विस्तृत हो रहा है । बुद्धि की जो शान्त वृत्तियां हैं
उनके साथ एकता को प्राप्त हुआ हो जाने से उसको 'मिश्रब्रह्म'
कहा है ।
ब्रह्म की स्थिति तो हमने साफ़ साफ़ समझा दी है । अब जो
कोई पुरुष ब्रह्म का ध्यान करना चाहे, वह नृशृंग आदि जैसे पदार्थों
की तो उपेक्षा करता जाय और फिर जो तत्व शेष रह गया हो, उसी
का यथायोग्य रीति से ध्यान करे । वह यों कि—शिला आदियों में
नाम और रूपों [आकारों] को छोड़कर केवल सन्मात्र की ही चिन्ता
किया करे । घोर और मूढ बुद्धियों के दुःख-भाग को छोड़कर उनमें
के सत् और चित् के चिन्तन में लग जाय । शान्त वृत्तियों में तो
सच्चिदानन्द नामक तीनों की ही चिन्ता करने लगे । ये उक्त तीन
प्रकार की चिन्तायें क्रम से 'कनिष्ठ' 'मध्यम' और 'उत्कृष्ट' चिन्ता
कहाती हैं ।
जिन मन्दलोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार
ही नहीं है, वे लोग व्यवहार काल में भी मिश्र ब्रह्म का चिन्तन करें,
तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है। ऐसा मिश्रब्रह्मचिन्तन बताने के
लिये ही विषयानन्द नाम का यह प्रकरण लिखा गया है ।
उदासीन अवस्था में जब बुद्धिवृत्ति ढीली पड़ जाती हैं, तब तो
विना वृत्ति का ध्यान होने लगता है। वह ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे
दर्जे का है। इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार
का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का तो सवृत्तिक ध्यान तथा
एक विना वृत्ति का ध्यान, यों चार प्रकार का ध्यान हो गया । जड
पदार्थों में सत्ता, मूढ़वृत्ति में सत्ता तथा चैतन्य, सात्विकवृत्ति में सत्ता
चैतन्य तथा आनन्द, यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान हो जाता है।
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इस ब्रह्मानन्द नाम के पांच अध्याय वाले ग्रन्थ में 'ज्ञान' और
'योग'के द्वारा जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान तो ब्रह्मविद्या
ही है। उसका वर्णन तो हमने यों किया है कि ध्यान से जब चित्त
एकाग्र हो जाता है तब उस चित्त में ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है।
ब्रह्मविद्या के स्थिर हो जाने पर ये 'सत्' 'चित्' 'आनन्द' पहले की
तरह अलग अलग नहीं दीखते। तब तो ये अखण्ड एकरस होकर
दीखने लगते हैं। क्योंकि उस समय भेद करने वाली उपाधियां नहीं
रहतीं। भेद करने वाली उपाधियें तो ये शान्त घोर वृत्तियां और
शिलादि पदार्थ ही हैं। इन उपाधियों को यदि कोई हटाना चाहे तो
'योग' या 'विवेक' से ही ऐसा कर सकता है। जब उपाधिरहित
स्वयं प्रकाश अद्वैत ब्रह्मतत्त्व भासने लगता है तब यह प्रत्यक्ष दीख
पड़ने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि तब उसे
'भूमानन्द' भी कह देते हैं।
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का वर्णन समाप्त हुआ। मन्दाधि-
कारी लोग इसी को द्वार बनाकर आत्मधाम में घुस जांय।