फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
५०० | फलदीपिका
| नक्षत्र चरण (घ) | नक्षत्र चरण (ङ) | नक्षत्र चरण (च) | पूर्ण आयु वर्ष | देहाधिप | जीवाधिप |
|---|---|---|---|---|---|
| ४८. उ. फा. चं० | ४९. ह० प्र० | ७२. ज्ये० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ४७. ,, तृ० | ५०. ,, द्वि० | ७१. ,, तृ० | ८५ | शनि | बुध |
| ४६. ,, द्वि० | ५१. ,, तृ० | ७०. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ४५. उ. फा. प्र० | ५२. ,, चं० | ६९. ज्ये० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ४४. पू. फा. चं० | ५३. चि० प्र० | ६८. अनु० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ४३. ,, तृ० | ५४. ,, द्वि० | ६७. ,, प्र० | ८५ | शनि | बुध |
| ४२. ,, द्वि० | ५५. ,, तृ० | ६६. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ४१. पू. फा. प्र० | ५६. ,, चं० | ६५. अनु० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ४०. मघा चं० | ५७. स्वा० प्र० | ६४. वि० चं० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ३९. ,, तृ० | ५८. ,, द्वि० | ६३. ,, तृ० | ८५ | शनि | बुध |
| ३८. ,, द्वि० | ५९. ,, तृ० | ६२. ,, द्वि० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ३७. मघा प्र० | ६०. ,, चं० | ६१. वि० प्र० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०१
| नक्षत्र चरण (छ) | नक्षत्र चरण (ज) | नक्षत्र चरण (झ) | पूर्ण आयु वर्ष | देहाधिप | जीवाधिप |
|---|---|---|---|---|---|
| ७३. मू० प्र० | ९६. शत० च० | ९७. पू. भा. प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ७४. " द्वि० | ९५. " तृ० | ९८. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ७५. " तृ० | ९४. " द्वि० | ९९. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ७६. " च० | ९३. शत० प्र० | १००. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ७७. पू. षा. प्र० | ९२. धनि० च० | १०१. उ. भा. प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ७८. " द्वि० | ९१. " तृ० | १०२. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ७९. " तृ० | ९०. " द्वि० | १०३. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ८०. " च० | ८९. धनि० प्र० | १०४. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
| ८१. उ. षा. प्र० | ८८. श्रव० च० | १०५. रेव० प्र० | १०० | मंगल | बृहस्पति |
| ८२. " द्वि० | ८७. " तृ० | १०६. " द्वि० | ८५ | शनि | बुध |
| ८३. " तृ० | ८६. " द्वि० | १०७. " तृ० | ८३ | शुक्र | बुध |
| ८४. " च० | ८५. श्रव० प्र० | १०८. " च० | ८६ | चन्द्र | बृहस्पति |
५०२ फलदीपिका कालचक्रदशाक्रम (सारिणी ख) अश्विनी आदि २७ नक्षत्र हैं। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं। भिन्न-भिन्न चरण में उत्पन्न होने से दशाक्रम भिन्न-भिन्न होता है। किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से दशाक्रम क्या होता है, यह नीचे दिया जा रहा है :— १. अश्विनी प्र. च. (०-०-० से ०-३-२०) मे. वृष. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृ. ध. २. द्वि. च. (०-३-२० से ०-६-४०) म० कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ३. तृ. च. (०-६-४० से ०-१०-०) वृष मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृष मि० ४. च. च. (०-१०-० से ०-१३-२०) कर्क, सिं., कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ५. भरणी प्र. च. (०-१३-२० से ०-१६-४०) वृश्चि. तु. कन्या कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ६. द्वि. च. (०-१६-४० से ०-२०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क स. कन्या ७. तृ. च. (०-२०-० से ०-२३-४०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ८. च. च. (०-२३-२० से ०-२६-४०) कर्क, सिंह. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. ७ वर्ष कर्क २१ वर्ष० | तु० १६ व० | म० ४ व० वृ १६ ,, सि ५ ,, | वृ० ७ ,, | कुं. ४ ,, मि. ९ ,, कन्या ९ ,, | ध. १० ,, | मी. १० ,,
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०३ ९. कृत्तिका प्र. च. (०-२६-४० से १-०-०) मे. वृ. मि. कक, सिं. कन्या. तु. वृ. ध. १०. द्वि. च. (१-०-० से १-३-२०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ११. तृ. च. (१-३-२० से से १-६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १२. च. च. (१-६-४० से १-१०-०) कर्क, सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. १३. रोहिणी प्र. च. (१-१०-० से १-१३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क १४. द्वि. च. (१-१३-२० से १-१६-४०) कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. १५. तृ. च. (१-१६-४० से १-२०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. १६. च. च. (१-२०-० से १-२३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. १७. मृगशिर प्र. च. (१-२३-२० से १-२६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क १८. द्वि. च. (१-२६-४० से २-०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. १९. तृ. च. (२-०-० से २-३-२०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृ. मी. कुं. म. २०. च. च. (२-३-२० से २-६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क, मि. वृ. मे.
५०४ फलदीपिका २१. आर्द्रा प्र. च. (२-६-४० से २-१०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. क. २२. द्वि. च. (२-१०-० से २-१३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. २३. तृ. च. (२-१३-२० से २-१६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. २४. च. च. (२-१६-४० से २-२०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या. सिं. कर्क, मि. वृ. मे. २५. पुनर्वसु प्र. च. (२-२०-० से २-२३-२०) मे. वृ. मि. कर्क. सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. २६. द्वि. च. (२-२३-२० से २-२६-४०) म. कु. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. २७. तृ. च. (२-२६-४० से ३-०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. २८. च. च. (३-०-० से ३-३-२०) कर्क, सिं. कन्या, तु, वृश्चि. ध. म. कुं. मी. २९. पुष्य प्र. च. (३-३-२० से ३-६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ३०. द्वि. च. (३-६-४० से ३-१०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या ३१. तृ. च. (३-१०-० से ३-१३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृ. तु. कन्या. ३२. च. च. (३-१३-२० से ३-१६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध.
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५०५ ३३. आश्लेषा प्र. च. (३-१६-४० से ३-२०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तृ. वृश्चि. ध. ३४. द्वि. च. (३-२०-० से ३-२३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ३५. तृ. च. (३-२३-२० से ३-२६-४०) वृष. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ३६. च. च. (३-२६-४० से ४-०-०) कर्क, सिं. कन्या तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ३७. मघा प्र. च. (४-०-० से ४-३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ३८. द्वि. च. (४-३-२० से ४-६-४०) कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. ३९. तृ. च. (४-६-४० से ४-१०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ४०. च. च. (४-१०-० से ४-१३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ४१. पूर्वाफाल्गुनी प्र. च. (४-१३-२० से ४-१६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क. ४२. द्वि. च. (४-१६-४० से ४-२०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ४३. तृ. च. (४-२०-० से ४-२३-२०) मि. सिं. कर्क. कन्या, तु. वृ. मी. कुं. म. ४४. च. च. (४-२३-२० से ४-२६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क, मि. वृ. मे.
५०६ फलदीपिका ४५. उत्तरा फाल्गुनी प्र. च. (४-२६-४० से ५-०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिंह, कर्क ४६ द्वि. च. (५-०-० से ५-३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ४७. तृ. च. (५-३-२० से ५-६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ४८. च. च. (५-६-४० से ५-१०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ४९. हस्त प्र. च. (५-१०-० से ५-१३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ५०. द्वि. च. (५-१३-२० से ५-१६-४०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ५१. तृ. च. (५-१६-४० से ५-२०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ५२. च. च. (५-२०-० से ५-२३-२०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. मं. कुं. मी. ५३. चित्रा प्र. च. (५-२३-२० से ५-२६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ५४. द्वि. च. (५-२६-४० से ६-०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिंह, कन्या ५५. तृ. च. (६-०-० से ६-३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ५६. च. च. (६-३-२० से ६-६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध.
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०७ ५७. स्वाती प्र. च. (६-६-४० से ६-१०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ५८. द्वि. च. (६-१०-० से ६-१३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तृ. कन्या, कर्क, सिं. मि. ५९. तृ. च. (६-१३-२० से ६-१६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ६०. च. च. (६-१६-४० से ६-२०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ६१. विशाखा प्र. च. (६-२० से ६-२३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ६२ द्वि. च. (६-२३-२० से ६-२६-४०) कन्या. तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चिव. तु. ६३. तृ. च. (६-२६-४० से ७-०-०) कन्या, सिं. कर्क मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ६४. च. च. (७-०-० से ७-३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ६५. अनुराधा प्र. च. (७-३-२० से ७-६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क ६६. द्वि. च. (७-६-४० से ७-१०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ६७. तृ. च. (७-१०-० से ७-१३-२०) मि. सिं. कर्क कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ६८. च. च. (७-१३-२० से ७-१६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क मि. वृ. मे. ६९. ज्येष्ठा प्र. च. (७-१६-४० से ७-२०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क
५०८ फलदीपिका ७०. द्वि. च. (७-२०-० से ७-२३-२०) मि. वृ. मे. घ. म. कुं. मी. मे. वृ. ७१. तृ. च. (७-२३-२० से ७-२६-४०) मि. सि. कर्क कन्या तु. वृश्चि. मी. कु. म. ७२. च. च. (७-२६-४० से ८-०-०) घ. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ७३. मूल प्र. च. (८-०० से ८-३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. ७४. द्वि. च. (८-३-२० से ८-६-४०) भ. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. ७५. तृ. च. (८-६-४० से ८-१०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ७६. च. च. (८-१०-० से ८-१३-२०) कर्क सिं. कन्या, तु. वृ. ध. म. कुं. मी. ७७. पूर्वाषाढ प्र. च. (८-१३-२० से ८-१६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. ७८. द्वि. च. (८-१६-४० से ८-२०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या. ७९. तृ. च. (८-२०-० से ८-२३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या ८०. च. च. (८-२३-२० से ८-२६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. ८१. उत्तराषाढ प्र. च. (८-२६-४० से ९-०-०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या, तु.० वृश्चि. ध.
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५०९ ८२. द्वि. च. (९-०-० से ९-३-२०) मं. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या कर्क सिं. मि. ८३. तृ. च. (९-३-२० से ९-६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. ८४. च. च. (९-६-४० से ९-१०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. ८५. श्रवण प्र. च. (९-१०-० से ९-१३-२०) ध. म. कुं. मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क ८६. द्वि. च. (९-१३-२० से ९-१६-४०) कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. ८७. तृ. च. (९-१६-४० से ९-२०-०) कन्या, सिं. कर्क, मि. वृ. मे. ध. म. कुं. ८८. च. च. (९-२०-० से ९-२३-२०) मी. मे. वृ. मि. सिं. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. ८९. धनिष्ठा प्र. च. (९-२३-२० से ९-२६-४०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क ९०. द्वि. च. (९-२६-४० से १०-०-०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ९१. तृ. च. (१०-०-० से १०-३-२०) मि. म. कर्क, कन्या, तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ९२. च. च. (१०-३-२० से १०-६-४०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ९३. शतभिषा प्र. च. (१०-६-४० से १०-१०-०) मी. कुं. म. ध. वृश्चि. तु. कन्या, सिं. कर्क
५१० फलदीपिका ९४. द्वि. च. (१०-१०-० से १०-१३-२०) मि. वृ. मे. ध. म. कुं. मी. मे. वृ. ९५. तृ. च. (१०-१३-२० से १०-१६-४०) मि. सिं. कर्क, कन्या तु. वृश्चि. मी. कुं. म. ९६. च. च. (१०-१६-४० से १०-२०-०) ध. वृश्चि. तु. कन्या सिं. कर्क मि. वृ. मे. ९७. पूर्वाभाद्र प्र. च. (१०-२०-० से १०-२३-२०) मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध. ९८. द्वि. च. (१०-२३-२० से १०-२६-४०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क सिं. मि. ९९. तृ. च. (१०-२६-४० से ११-०-०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १००. च. च. (११-०-० से ११-३-२०) कर्क, सिं, कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. १०१. उत्तराभाद्र प्र. च. (११-३-२० से ११-६-४०) वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. १०२. द्वि. च. (११-६-४० से ११-१०-०) कुं. म. ध. मे. वृ. मि. कर्क, सिं. कन्या। . १०३. तृ. च. (११-१०-० से ११-१३-२०) तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या १०४. च. च. (११-१३-२० से ११-१६-४०) कर्क, सिं. मि. वृ. मे. मी. कुं. म. ध. १०५. रेवती प्र. च. (११-१६-४० से ११-२०-०) मे. वृ. मि. कर्क. सिं. कन्या. तु. वृश्चि. ध.
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५११ १०६. द्वि. च. (११-२०-० से ११-२३-२०) म. कुं. मी. वृश्चि. तु. कन्या, कर्क, सिं. मि. १०७. तृ. च. (११-२३-२० से ११-२६-४०) वृ. मे. मी. कुं. म. ध. मे. वृ. मि. १०८. च. च. (११-२६-४० से १२-०-०) कर्क, सिं. कन्या, तु. वृश्चि. ध. म. कुं. मी. किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से कितने वर्ष की महादशा होती है यह ४९९-५०१ पृष्ठों पर बताया गया है। बिना उसके भी ऊपर के विवरण से पाठक जान सकते हैं कि किस नक्षत्र चरण में जन्म होने से कितने वर्ष की दशा हुई। उदाहरण के लिये किसी मनुष्य का जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ तो दशा मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु ७ + १६ + ९ + २१ + ५ + ९ + १६ + ७ + १० = १०० वर्ष की हुई। पहिले बताया जा चुका है कि मेष के ७ वर्ष, वृष के १६ वर्ष.... इत्यादि होते हैं। इसी कारण जिस राशि की दशा के जितने वर्ष बताये गये हैं वे राशियों के नीचे लिख कर जोड़ा तो कुल १०० वर्ष हुए। अब मान लीजिये जन्म के दिन (पहिला दिन या दूसरा दिन भी शामिल करके) रेवती का कुल नक्षत्र मान ५६ घड़ी है। तो रेवती का एक चरण (चौथाई) १४ घड़ी का हुआ इसमें से ७ घड़ी बीत चुका है ७ घड़ी बाकी है। तो भुक्त भोग्य कितनी दशा हुई ? इसमें दो मत हैं। (१) एक मत तो यह है कि रेवती नक्षत्र प्रथम चरण में सबसे पहिले मेष की दशा आती है। मेष की दशा—कुल ७ वर्ष हैं। प्रथम चरण का आधा व्यतीत हो चुका है इस कारण ३½ वर्ष बीत गये बाकी ३½ वर्ष मेष के भोग्य, उसके बाद १६ वर्ष वृष के योग्य, फिर मिथुन के ९ वर्ष
५१२ फलदीपिका इत्यादि। इस मत को हम उतना मान्य नहीं मानते। क्योंकि जब एक चरण की महादशा १०० वर्ष की है तो आधा चरण बीत जाने से केवल ३ १/२ वर्ष भुक्त हुए बाकी ९६ १/२ वर्ष भोग्य हुए यह असंगत प्रतीत होता है। परन्तु फिर भी बहुत-से लोग इस मत को भी मानते हैं। (२) दूसरा मत जो हमारे विचार से अधिक मान्य है वह यह है कि एक चरण के १०० वर्ष हुए : आधा चरण बीत गया है। इस कारण १०० का आधा पचास वर्ष बीत गये। बाकी पचास वर्ष रहे। अब गिनिये, मेष के ७ वर्ष, वृषभ के १६ वर्ष, मिथुन के ९ वर्ष, और कर्क के २१ कुल ७+१६+९+२१=५३ वर्ष हुए। ५० बीत गये— इस कारण ७+१६+९+१८=५० वर्षों में से १८ वर्ष कर्क के बीते हैं। ३ वर्ष कर्क के बाकी हैं। इसलिये भोग्य दशा—जो जातक को भोगनी पड़ेगी वह होगी। कर्क भोग्य सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु ३ + ५ + ९ + १६ + ७ + १० = ५० वर्ष जब जातक ५० वर्ष का हो जावेगा तब कौन-सी दशा चलेगी ? देखिये रेवती प्रथम चरण के बाद रेवती द्वितीय चरण होता है। इस कारण ५० वर्ष के बाद रेवती के द्वितीय चरण की जो दशा बतायी गयी है—अर्थात् मकर के ४ वर्ष, उसके बाद कुंभ के ४ वर्ष, तब मीन के १० वर्ष, वृश्चिक के ७ वर्ष, यह दशायें आवेंगी। यदि रेवती के अन्तिम (चतुर्थ चरण) में जन्म होवे और उसमें भोग्य —मान लीजिये केवल ४० वर्ष हो, तो उसके बाद अश्विनी के प्रथम चरण में जो दशा दी गई है वे आवेंगी। पुस्तक के अन्त में चन्द्र स्पष्ट से भुक्त, भोग्य महादशा निकालने की सारणियां नं. १,२,३,४ दी जा रही हैं।
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१३ सारिणी नं. ५ कलाओं का दशामान चन्द्र पूर्ण आयु ८५ वर्ष ८३ वर्ष ८६ वर्ष कला १०० वर्ष वर्ष-मास-दिन व. मा. दि. व. मा. दि. व. मा. दि. १ ०-६-० ०- ५- ३ ०- ४-२९ ०- ५- ५ २ १-०-० ०-१०- ६ ०- ९-२९ ०-१०-१० ३ १-६-० १- ३- ९ १- २-२८ १- ३-१४ ४ २-०-० १- ८-१२ १- ७-२८ १- ८-१९ ५ २-६-० २- १-१५ २- ०-२७ २- १-२४ ६ ३-०-० २- ६-१८ २- ५-२६ २- ६-२९ ७ ३-६-० २-११-२१ २-१०-२६ ३- ०- ४ ८ ४-०-० ३- ४-२४ ३- ३-२५ ३- ५- ८ ९ ४-६-० ३- ९-२७ ३- ८-२५ ३-१०-१३ १० ५-०-० ४- ३- ० ४- १-२४ ४- ३-१८ ११ ५-६-० ४- ८- ३ ४- ६-२३ ४- ८-२३ १२ ६-०-० ५- १- ६ ४-११-२३ ५- १-२८ १३ ६-६-० ५- ६- ९ ५- ४-२२ ५- ७- २ १४ ७-०-० ५-११-१२ ५- ९-२२ ६- ०- ७ १५ ७-६-० ६- ४-१५ ६- २-२१ ६- ५-१२ १६ ८-०-० ६- ९-१८ ६- ७-२० ६-१०-१७ १७ ८-६-० ७- २-२१ ७- ०-२० ७- ३-२२ १८ ९-०-० ७- ७-२४ ७- ५-१९ ७- ८-२६ १९ ९-६-० ८- ०-२७ ७-१०-१९ ८- २- १ २० १०-०-० ८- ६- ० ८- ३-१८ ८- ७- ६
५१४ फलदीपिका चन्द्र १०० वर्ष ८५ वर्ष ८३ वर्ष ८६ वर्ष कला .२१ १०- ६- ० ८-११- ३ ८- ८-१७ ९- ०-११ २२ ११- ०- ० ९- ४- ६ ९- १-१७ ९- ५-१६ २३ ११- ६- ० ९- ९- ९ ९- ६-१६ ९-१०-२० २४ १२- ०- ० १०- २-१२ ९-११-१६ १०- ३-२५ २५ १२- ६- ० १०- ७-१५ १०- ४-१५ १०- ९- ० नोट :—जहाँ आधे से अधिक दिन अर्थात् ३० घड़ी से अधिक आया है उसको १ दिन मान लिया गया है और जहाँ आधे दिन से कम अर्थात् ३० घड़ी से कम समय आया है--उन दिनों को छोड़ दिया गया है। उदाहरण : मान लीजिये किसी का स्पष्ट चन्द्र ११-२०-३९ है। अर्थात् जन्म के समय चन्द्रमा मीन राशि के २० अंश ३९ कला पर था। यह रेवती नक्षत्र के द्वितीय चरण में हुआ । देखिये सारिणी 'क' । रेवती द्वितीय चरण की परमायु ८५ वर्ष है । ८५ वर्ष वाली सारिणी न० २ में देखिये । यह सारिणी पुस्तक के अन्त में दी गई है। व. मा. दि ११-२०-२५ की भोग्य दशा ७४-४-१५ है ११-२०-५० की भोग्य दशा ६३-९- ० हमें ११-२०-३९ की भोग्य दशा निकालनी है। अब चाहे ११-२०-२५ में से (३९-२५ = १४) चौदह कला का मान निकाल दीजिये, चाहे ११-२०-५० में (५०-३९ = ११) ग्यारह कला का मान जोड़िये—भोग्य दशा निकल आवेगी ।
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१५ व. मा. दि. ११-२०-२५ = ७४-४-१५ घटाइये ०- ०-१४ कला का मान = ५-११-१२ (यह ८५ के नीचे १४ के आगे सारिणी नं० ५ में देखिये) पृ० ५१३। भोग्यदशा ६८-५-३ दूसरा प्रकार व. मा. दिन १०-२०-५० = ६३-९-० (सारिणी नं० २) जोड़िये ११ कला का मान ४-८-३ (सारिणी नं० ५ में ८५ के नीचे ११ के सामने पृ० ५१३) ―――――― ६८-५-३ इस प्रकार से भी वही भोग्य आ गया। अब देखिये सारिणी 'ख'। रेवती द्वितीय नक्षत्र का मान ८५ वर्ष है। इसमें ९ दशा होती हैं। मकर शनि + कुंभ शनि + मीन बृहस्पति + वृश्चिक मंगल + तुला शुक्र ४ + ४ + १० + ७ + १६
- कन्या बुध + कर्क चन्द्र + सिंह रवि + मिथुन बुध
- ९ + २१ + ५ + ९ = ८५ वर्ष भोग्य ६८ वर्ष--५ मास ३ दिन है। इसको ८५ में से घटाया। ८५-०-० ६८-५-३ ―――――― १६-६-२७ अर्थात् १६ वर्ष ६ मास २७ दिन भुक्त हुए, यानी जब जातक पैदा हुआ तब बीत चुके थे।
५१६ फलदीपिका। मकर-शनि के ४, कुंभ-शनि के ४ और ८ वर्ष ६ मास २७ दिन मीन-बृहस्पति के इस प्रकार कुल १६ व. ६ मा. २७ दि. भुक्त हुए। मीन बृहस्पति के कुल १० वर्ष हैं। इसमें से ८ वर्ष ६ मास २७ दिन घटाये तो १ वर्ष ५ मास ३ दिन शेष रहे। यह मीन-बृहस्पति के भोग्य हुए फिर वृश्चिक मंगल के ७ वर्ष इत्यादि। इस व्यक्ति की महादशा सारिणी निम्नलिखित हुई । देह राशि-मकर कालचक्र महादशा जीवराशि मिथुन देहाधिप-शनि जीवाधिप बुध राशि तथा राशि स्वामी वर्ष मास दिन मीन बृहस्पति १-५-३ वृश्चिक मंगल ७-०-० तुला शुक्र १६-०-० कन्या बुध ९-०-० कर्क चन्द्र २१-०-० सिंह सूर्य ५-०-० मिथुन बुध ९-०-० ६८-५-३ इसके बाद रेवती तृतीय नक्षत्र की जो सारिणी दी गई है वह चलेगी। देखिये सारिणी ख में रेवती तृतीय नक्षत्र की राशि दशायें वृष शुक्र से प्रारम्भ होती हैं इसलिये देह राशि वृष, देहाधिप शुक्र हो जावेगा। रेवती तृतीय नक्षत्र की जो राशिया दी गई हैं उनका अन्त मिथुन से होता है। इसलिये जीव राशि मिथुन और इसका स्वामी बुध जीवाधिप हुआ; ६८ वर्ष ५ मास ३ दिन के बाद ।
बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५१७ देह राशि वृष जीवराशि मिथुन देहाधिप शुक्र जीवाधिप बुध वृष शुक्र १६-०-० मेष मंगल ७-०-०
९१-५-३ यह दशाक्रम आया । अन्तर्दशा मानलीजिये आपको वृश्चिक मंगल में अन्तर्दशा लगाना है । यह १ वर्ष ५ मास ३ दिन की आयु पर लगी । अन्तर्दशाचक्र समय उम्र तक व. मा. दि. व. मा. दि. मीन बृहस्पति १-५- ३ १-५- ३ वृश्चिक मंगल में वृश्चिक मंगल ०-६-२७ २-०- ० वृश्चिक मंगल में तुलाशुक्र १-३-२४ ३-३-२४ ,, ,, कन्या बुध ०-८-२७ ४-०-२१ ,, ,, कर्क-चन्द्र १-८-२३ ५-९-१४ ,, ,, सिंह-सूर्य ०-४-२८ ६-२-१२ ,, ,, मिथुन-बुध ०-८-२७ ६-११-९ ,, ,, मकर-शनि ०-३-२९ ७-३-८ ,, ,, कुंभ-शनि ०-३-२९ ७-७-७ ,, ,, मीन-बृहस्पति ०-९-२६ ८-५-३
५१८ फलदीपिका अब कालचक्र दशा का गणित प्रकरण समाप्त किया जाता है। आशा है-पुस्तक के अन्त में दी गई सारणियों से भुक्त, भोग्य दशा तथा किस दशा के बाद क्या दशा आती है यह गणित, पाठकों की समझ में आ गया होगा । फलित विचार अब कालचक्र दशा में राशियों का शुभ या अशुभ फल देखने के लिये कुछ नियम बताए जाते हैं :-- (१) जिस राशि की दशा का विचार करना हो--वह राशि बलवान् हो उसमें शुभ ग्रह बैठे हों--उसका स्वामी उस राशि में बैठा हो, उस राशि पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, जन्म लग्न से वह राशि अच्छे स्थान में हो, उस राशि का स्वामी बलवान् हो, शुभ ग्रहों से सम्बन्ध करता हो, जन्म लग्न से अच्छे स्थान में बैठा हो तो उस राशि की दशा अच्छी कही जाती है। (२) यदि राशि कमज़ोर हो, उसमें पाप ग्रह बैठे हों, उसका स्वामी शत्रु राशि या पाप राशि में बैठा हो, उस राशि पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, जन्म लग्न से वह राशि अनिष्ट स्थान में हो, उस राशि का स्वामी कमजोर हो (अस्त, नीच राशि नीच या शत्रु नवांश आदि) उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो या पाप ग्रहों से युत हो, जन्म लग्न से अनिष्ट स्थान में उस राशि का स्वामी बैठा हो तो उस राशि की दशा अनिष्ट फल करती है । अब जन्म लग्न से जिस स्थान पर वह राशि है, इसके तारतम्य से दशा फल बतलाया जाता है । (१) यदि लग्न में हो तो शरीर का आरोग्य, सुख, यश, भूषण उत्तम पद, धन, पुत्र, स्त्री का सुख । यदि इस राशि का स्वामी शुभ ग्रह है तो शुभ फल यदि पाप ग्रह की राशि है तो शुभ फल नहीं होता। यदि पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों लग्न-राशि में बैठे हों तो
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ५१९ मिश्र फल। यदि पाप ग्रह अधिक हों तो अधिक कष्ट, यदि शुभ ग्रह अधिक हों तो शुभ फल अधिक—यह मिश्र फल का अभिप्राय है आगे जहाँ भी, 'मिश्र फल' शब्द आवे यही फल समझना चाहिये। यदि लग्न में उच्च राशि का, अपनी राशि का, मित्र क्षेत्री (मित्र की राशि में) कोई ग्रह हो तो बहुत उत्तम पद प्राप्त होता है—राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त होता है। यदि ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि या अस्त होकर लग्न-राशि में हो तो पुत्र कष्ट, स्त्री कष्ट आदि निकृष्ट फल होते हैं। (२) यदि जिस राशि का विचार कर रहे हों वह जन्म लग्न से दूसरे घर में हो तो धन और धान्य की वृद्धि, उत्तम भोजन, स्त्री, पुत्र सुख, नयी भूमि की प्राप्ति, राजा से सत्कार, विद्या प्राप्ति, वोलने में प्रवीणता, अच्छे आदमियों की गोष्ठी (सोसायटी) में समय व्यतीत होना आदि शुभ फल—यदि राशि शुभ हो तो होते हैं। पाप राशि होने से उलटा फल होता है। (३) विचारणीय राशि यदि लग्न से तीसरे घर में हो तो महान् सुख, उत्तम भोजन, पराक्रम तथा धैर्य वृद्धि, विशेष उत्साह, मन पर संयम—यदि शुभ राशि हो तो यह सब शुभ फल होते हैं। (४) यदि चतुर्थ घर में राशि हो तो, सवारी प्राप्ति, भूषण, मकान या जमीन में वृद्धि, तीर्थ यात्रा, बड़े आदमियों की सोसायटी, चित्त शुद्धि, उत्साह वृद्धि, खेती बाड़ी विशेष हो, स्त्री और पुत्र का सुख, बन्धुओं में वृद्धि, नवीन जायदाद प्राप्ति, शरीर सुख, लाभ—यदि शुभ राशि हो तो यह सब शुभ फल होते हैं। पाप-राशि हो तो चतुर्थ भाव सम्बन्धी अनेक प्रकार के कष्ट और नाश। (५) यदि राशि लग्न से पाँचवें घर में पड़ती हो तो राजा से सत्कार, उत्तम पद प्राप्ति, स्त्री, पुत्र सुख, धैर्य, आरोग्य, बन्धुओं का पोषण अन्नदान, यश, आनन्द और उत्सव के अवसर, धनलाभ, अन्य जनों का उपकार करना आदि शुभफल होते हैं। यदि पंचम घर में शुभ