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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

२६ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ जिनप्रासाद के मंडपो का क्रम .... ३१ प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान .... ४८ जिनप्रासाद मे देवकुलिका का क्रम .. ३१ १४४ भाग का मंडोवर (दीवार) ... ४९ बावन जिनालय .... ३२ १४४ भाग के मडोवर का दिग्दर्शन ... ५१ बहत्तर देवकुलिका ... ३२ चार प्रकार की जंघा ... ५२ चौबीस देवकुलिका .... ३२ मेरु मंडोवर और उसका चित्र ... ५३ रुप और मठाका स्थान .... ३२ सामान्य मंडोवर का चित्र . ५४ शिवलिंग के आगे अन्य देव ... ३३ सामान्य मंडोवर . ५५ देव के सम्मुख न्यदेव ... ३३ २७ भाग का मडोवर सचित्र .. ५५ परस्पर दृष्टिबंध ... ३४ मडोवर की मोटाई . ५५ दृष्टिबंध का परिहार ... ३४ शुभाशुभ गर्भगृह .... ५६ शिवस्नानोदक .... ३४ लव चौरस शुभ गर्भगृह ... ५७ देवो की प्रदक्षिणा ... ३५ स्तंभ और मडोवर का समन्वय ... ५७ जनमार्ग (पनाला) .. ३५ गर्भगृह के उदय का मान और गूम्बज .... ५७ मण्डप स्थित देवो की नाली .. ३६ उदुम्बर (देहली) की ऊंचाई ... ५८ पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव .. ३६ उदुम्बर की रचना ... ५८ दक्षिणाभिमुखदेव .. ३७ कुम्भा से हीन उदुम्बर और तल ... ५८ पश्चिमाभिमुख देव .. ३७ अर्द्धचन्द्र (शखावत्र्त) .. ६० सूर्य आयतन ... ३७ उत्तरंग .. ६१ गणेश आयतन ... ३८ नागरप्रासाद का द्वारमान ... ६२ विष्णु आयतन ... ३८ भूमिजादि प्रासाद का द्वारमान ... ६३ चण्डी आयतन ... ३८ द्राविड़ प्रासाद का द्वारमान ... ६४ शिव पञ्चायतन ... ३८ अन्यजाति के प्रासाद का द्वारमान ... ६४ त्रिदेव स्थापन क्रम ... ३९ द्वार शाखा ... ६४ त्रिदेवो का न्यूनाधिकमान ... ३९ शाखा के आय ६५ शाखा से द्वार का नाम और परिचय ६५ तीसरा अध्याय त्रिशाखा द्वार का चित्र ६६ न्यूनाधिक शाखामान ६७ प्रासाद धारिणी तरशिला . ४१ त्रिशाखा ६७ तरशिला का मान ... ४१ शाखा स्तंभ का निर्गम . ६७ भिट्टमान .... ४२ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश ६७ भिट्ट का निर्गम . ४२ त्रि पंच सप्त नव शाखा का चित्र ६८ पीठ का उदयमान ... ४३ शाखा के द्वारपाल का मान . ६८ पीठोदय का थरमान . . ४५ शाखाके रूप ६९ थरो का निर्गम मान ... ४६ पञ्च शाखा ६९ कामपीठ और कणपीठ ... ४६ सप्त शाखा . . ७० प्रासाद का उदयमान (मडोवर) .... ४७

३० विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ नव शाखा ७० सुवर्णपुरुष का मान और उसकी रचना .. ८६ उत्तरंग के देव . ७१ कलश की उत्पत्ति और स्थापना .. ८७ कलश का उदयमान .. ८८ चौथा अध्याय कलश का विस्तारमान . . ८८ ध्वजादंड रखने का स्थान .. ८६ द्वारमान से मूर्ति और पवासन का मान . ७२ ध्वजाधार (स्तम्भवेध) का स्थान .... ८६ गर्भगृह का मान . ७३ ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका .. ८६ गर्भगृह के मान से मूर्ति का मान . ७३ ध्वजाधार, ध्वजदड और ध्वजा का चित्र .. ६० देवो का दृष्टि स्थान . ७३ ध्वजादड का उदयमान .... ६० देवो का पद स्थान . ७४ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान .. ६१ प्रहार थर . ७५ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान .... ६१ छाद्य ( छजा ) के थर मान ७५ ध्वजादंड का विस्तारमान . . ६१ शृङ्ग क्रम .. ७५ ध्वजादंड की रचना .... ६२ उरु शृङ्ग का क्रम सचित्र ७६ विषमपर्व वाले ध्वजादड के तेरह नाम ... ६२ शिखर निर्माण . ७६ ध्वजादंड की पाटली .... ६२ २५६ रेखा की साधना सचित्र .. ७७ ध्वजा का मान ... ६३ उदय भेदोद्भव रेखा . . ७८ ध्वजा का महात्म्य ... ६३ कलाभेदोद्भव रेखा . ७८ रेखाचक्र .. ७६ पांचवां अध्याय त्रिखंडा कला रेखा .. ७६ सोलह प्रकार के चार ७६ ग्रंथ मान्यता की याचना ... ६५ त्रिखंडा की रेखा और कला . ८० वैराज्यप्रासाद ... ६५ रेखा सत्या . ८१ फालना के भेद ... ६५ मडोवर और शिखर का उदयमान ८१ भ्रमणी ( परिक्रमा ) ... ६६ शिखर विधान . ८१ १ वैराज्य प्रासाद ... ६६ ग्रीवा, आमलसार और कलश का मान . ८२ वैराज्यादि जातिका प्रासाद चित्र शुकनास का उदय . ८२ नागर जातिका कलामय मंडोवर चित्र सिंह स्थान . ८२ दिशा के द्वारका नियम ... ६७ कपिली ( कोली ) का स्थान .. ८३ २ नन्दन प्रासाद ... ६८ कपिली का मान . ८३ ३ सिंह प्रासाद ... ६६ छह प्रकार की कपिली .. ८३ ४ श्रीनन्दन, ५ मदिर और ६ मलयप्रासाद ६६ प्रासाद के अंडक और आभूषण ८४ ७ विमान, ८ विशाल, ६ त्रैलोक्य भूषण प्रासाद १०० शिखर के नमन का विभाग ८४ १० माहेन्द्र प्रासाद, ११ रत्नशीर्ष आमलसार का मान सचित्र . ८४ १२ सितशृंग प्रासाद ... १०१ आमलसार के नीचे शिखर के कोणरूप ८५ १३ भूधर, १४ भुवन मडन, १५ त्रैलोक्य विजय, सुवर्णपुरुष ( प्रासादपुरुष ) की स्थापना . . ८६ १६ क्षिति वल्लभ, १७ महीधर प्रासाद .. १०२

३१ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ १८ कैलास प्रासाद ... १०३ जिनप्रासाद के मण्डप ११७ १९ नवमंगल, २० गंधमादन, २१ सर्वांगसुन्दर, मडप के पाच मान . ११८ २२ विजयानन्द प्रासाद १०३ प्रासाद और मंडपका तलदर्शन . ११८ २३ सर्वा गतिक, २४ महा भोग, २५ मेरु प्रासाद प्रासाद और मंडपोका उदय चित्र और प्रासाद प्रदक्षिणा का फल १०४ प्रासाद के मानसे मडप का नाप ... ११९ घूमट का घटा कलश और शुकनासका मान. .. ११९ छठा अध्याय मडप के समविषमतल .... ११९ केसरी आदि, २५ प्रासादो का नाम . १०६ मुख मण्डप .. १२० पचीस प्रासादो की शृंगसंख्या . १०६ स्तभका विस्तार मान . १२१ अष्टविभागीय तलमान १०७ आकृति से स्तभसज्ञा . १२१ दश और बारह विभागीय तलमान १०७ प्राग्रीव मण्डप १२२ चौदह और सोलह विभागीय तलमान १०७ आठ जाति के गूढ मण्डप " १२२ अठारह, बीस और बाईस विभागीय सर्वांगपूर्ण सागोपाग वाला प्राचीन देवालयका चित्र तलमान .. १०८ आमेर के जगतशरणजी के मन्दिर का चित्र तलो के क्रम से प्रासाद सख्या .... १०८ प्राचीन स्तभोका रेखा चित्र .... १२३ निरधार प्रासाद . ११० आठ गूढ मडपो का रेखा चित्र ... १२४ प्रासाद तलाकृति ... ११० आबू मन्दिर के मण्डप, स्तभ और तोरण का चित्र लम्ब चौरस प्रासाद १११ गूढमडप की फालना १२५ गोल, लबगोल और अष्टास्रप्रासाद ... १११ घूमट के उदय का तीन प्रकार .. १२५ नागरप्रासाद .. १११ घूमटका न्यूनाधिक उदय फल १२६ द्राविड प्रासाद ... ११२ बारह चौकी मडप १२६ भूमिज प्रासाद .. ११२ बारह चौकी मडप का रेखा चित्र . १२७ लतिन, श्रीवत्स और नागरप्रासाद ११२ सप्तविंशति मडपका रेखा चित्र . . १२८ मेरु प्रासाद ११२ नृत्यमडप .... १२९ द्राविडजातिका गोपुर प्रासाद चित्र सप्तविंशति मण्डप .. १३० विमान नागर प्रासाद ... ११३ अष्टास्र और षोडशाल का मान १३० १ श्रीमेरु २ हेमशीर्षमेरु, ३ सुरवल्लभ क्षिप्त वितान का चित्र मेरु प्रासाद .... ११३ उत्क्षिप्त वितान का चित्र ४ भुवनमण्डन, ५ रत्नशीर्ष, ६ किरणोद्भव वितान का प्रकार १३१ ७ कमल हंस मेरुप्रासाद .. ११४ वितान के थर ... १३१ ८ स्वर्णकेतु और ९ वृषभध्वज मेरुप्रासाद .. ११५ वितान संख्या १३२ समतल-वितान मे नृसिंहावतार का चित्र सातवां अध्याय वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान १३३ मडपविधान ११७ रगभूमि . १३४ गर्भाश्रमण्डप ११७ बलाराक का स्थान १३४

३२ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ बलाएक का मान . .. १३४ छाया भेद .... १५० प्रसाद के मान से बलाएक का मान .... १३४ देवपुर, राजमहल और नगर का मान .... १५० उत्तरग का पेटा भाग .. १३५ राजनगर मे देव स्थान ....' १५० पाच प्रकार के बलाएक ... १३५ आश्रम और मठ .... १५१ सवरणा .. १३६ स्थान विभाग .... १५१ प्रथम सवरणा का रेखा चित्र .. १३७ प्रतिष्ठा मुहूर्त .... १५१ दूसरी संवरणा का चित्र .... १३८ प्रतिष्ठा के नक्षत्र .... १५२ पचीस सवरणा के नाम . १३६ प्रतिष्ठा मे वर्जनीय तिथि .... १५२ प्रथम पुष्पिका संवरणा . १३६ प्रतिष्ठा मण्डप .... १५२ १८ वी शताब्दी से आधुनिक समय की यज्ञ कुण्ड का मान .... १५३ सवरणा का रेखा चित्र .. १४० आहुति सख्या से कुण्ड मान .. १५३ जैसलमेर जैन मन्दिर की संवरणाचित्र दिशानुसार कुण्डो की आकृति .... १५३ कीर्ति स्तभ का चित्र मण्डल .... १५४ दूसरी नन्दिनी संवरणा . १४१ ऋत्विजसंख्या .... १५५ प्राचीन संवरणा का चित्र .... १४२ देवस्नान विधि ... १५५ आठ वां अध्याय देवशयन .... १५५ रत्नन्यास .... १५६ शिवलिंग का न्यूनाधिक मान ... १४३ धातुन्यास .... १५६ वास्तुदोष ... १४३ औषधिन्यास .... १५६ निषेधवास्तु द्रव्य . : १४३ धान्यन्यास .... १५७ शिवालय उत्थापन दोष .... १४४ आचार्य और शिल्पियो का सन्मान .... १५७ जीर्णोद्धार का पुण्य ... १४४ प्रासाद के अंगो मे देव न्यास .... १५८ जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप . १४४ प्रतिष्ठत देव का प्रथम दर्शन .. १५६ दिट् मूढ दोष . : १४४ सूत्रधार पूजन .... ५६० दिङ् मूढ का परिहार ... १४५ देवालय निर्माण का फल .... १६० अव्यक्त प्रासाद का चालन . : १४५ सूत्रधार का आशीर्वाद .... १६० महापुरुष स्थापित देव १४५ आचार्य पूजन . १६० जीर्णवास्तु पातन विधि .... १४६ जिनदेवप्रतिष्ठा .. १६१ महादोष ... १४६ जलाशय प्रतिष्ठा .. १६२ शिष्टेष्ट महा दोष . १४६ जलाशय बनाने का पुण्य .... १६२ भिन्न और अभिन्न दोष १४७ वास्तु पुरुषोत्पत्ति .. १६२ दोषो के भिन्नदोष . १४७ वास्तुपुरुष के ४५ देव . १६४ व्यक्ताव्यक्त प्रासाद . १४८ वास्तुमंडल के कोने की आठ देवी .. १६६ मग्रमर्म दोष १४८ शास्त्र प्रशंसा .. १६६ अन्य दोषो का फल ... १४६ अन्तिममंगल . १६७

८ अमृतोद्भव प्रासाद . १७३ १२ पृथ्विजय प्रासाद ... १७५ (in image: पृथ्विजय, not पृथ्वीजय) १९ वज्रक प्रासाद .... १७९ २३ पक्षिराज (गरुड) प्रासाद .. १८१ (in image: गरुड, with ड) मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल . १८३ ९ पुष्टि वर्द्धन प्रासाद . १९० (in image: पुष्टि वर्द्ध न) ११ श्रीवल्लभप्रासाद १९१ १२ चन्द्रप्रभजिन प्रासाद " १९१ (in image: double quotes/ditto mark '"') १५ पुष्पदतजिन प्रासाद १९३ (in image: पुष्पदतजिन) १९ श्रे यासजिनवल्लभ प्रासाद . १९५ (in image: श्रे यास...) ३३ कु थुनाथ जिनवल्लभ प्रासाद .. २०१ (in image: कु थुनाथ...)

Everything is verified and ready.३३ परिशिष्ट नं० १ विषय पृष्ठ केसरी आदि २५ प्रसादो का नाम .... १६८ १ केसरी प्रासाद ... १६९ २ सर्वतोभद्र प्रासाद .... १७० [

३८ ⋯ पृष्ठ विषय पृष्ठ ⋯ २०३ ५२ सुतुङ्ग प्रासाद .. २०८ ⋯ २०४ ५३ पार्श्वनाथ जिन वल्लभ प्रासाद .... २०८ ⋯ २०४ ५४ पद्मावती प्रासाद ... २०९ ⋯ २०४ ५५ रूप वल्लभ प्रासाद ... २०९ ⋯ २०४ ५६ महावीर जिन प्रासाद .... २१० ⋯ २०५ ५७ अष्टापद प्रासाद .... २१० ⋯ २०५ ५८ तुष्टि पुष्टि प्रासाद .... २११ ⋯ २०६ जिन प्रासाद प्रशंसा .. २११ ⋯ २०६ शब्दों का अकारादिक्रम .... २१३ ⋯ २०७ शुद्धि पत्रक ... २२६ ⋯ २०७ अनुवाद के सहायक ग्रन्थ ... २२८ ⋯ २०८ ———

लताश्रृंगवाला विमान नागर जाति का प्रासाद (पीठ मडोवर और शिखर का सर्वाङ्गपूर्ण दृश्य) - उदयपुर-मेवाड़

प्राग्ग्रीव मंडप वाला नागर जाति का निरधार प्रासाद खजुराहो (मध्यप्रदेश)

ॐ णमो जिणाणं मण्डनसूत्रधारविरचितम् प्रासादमण्डनम् टीकाकारका मंगलाचरण— "परं परमेष्ठिनं जिनं नत्वा करोम्यहम् । प्रासादमण्डनप्रबो-धाय भाषां सुबोधिनीम् ॥" श्रेष्ठ जो पञ्च परमेष्ठी जिनदेव है, उनको नमस्कार करके प्रासाद मंडन नाम के शिल्प- शास्त्र को अच्छी तरह समझने के लिये सुबोधिनी नामकी टीका करता हूं । ग्रन्थकार का मंगलाचरण— गणेशाय नमस्तस्मै निर्विघ्नसिद्धिहेतवे । आदिगौरीसमुद्भूत-तेजसा सम्भूताय¹ वै ॥१॥ निर्विघ्न रूप से अपने कार्य की सिद्धि के लिए महामाया पार्वतीदेवी के अद्भुत तेज से उत्पन्न हुए श्री गणेश देव को नमस्कार है ॥१॥ महामायेति या गीता चिन्मयी मुनिसत्तमैः । तनोतु² वाग्विलासं मे जिह्वायां सा सरस्वती ॥२॥ महान् ऋषियों ने जिनकी स्तुति की है, ऐसी ज्ञानमयी महामाया सरस्वती देवी मेरी जिह्वा मे निवास करके वाणी का विस्तार करें ॥२॥ सृष्ट्याद्यसूत्रधारस्य प्रसादाद् विश्वकर्मणः । प्रासादमण्डनं ब्रूते सूत्रधारेषु मण्डनः ॥३॥ सृष्टि के आद्य सूत्रधार श्री विश्वकर्मा की कृपा से सूत्रधारो मे श्रेष्ठ भूषण रूप 'मण्डन' नाम का सूत्रधार प्रासादमण्डन नामका यह ग्रन्थ कहता है ॥२॥ गृहेषु यो विधिः प्रोक्तो त्रिनिवेशप्रवेशने । स एव विधिना³ कार्यो देवतायतनेष्वपि ॥४॥ (१) सम्भवाय (२) करोतु (३) विदुषा

२ प्रासादमण्डने घर बनाने की तथा उसमे प्रवेश करने की जो विधि वास्तुशास्त्र में विद्वानों ने बतलायी है, उस विधि के अनुसार देवालय मे भी कार्य करे ॥४॥ देवपूजित शिवस्थान— हिमाद्रेरुत्तरे पार्श्वे चारुदारुवनं परम् । पावनं शङ्करस्थानं तत्र सर्वैः शिवोऽर्चितः ॥५॥ हिमालय पर्वत के उत्तर दिशा में एक बडा मनोहर देवदारु वृक्षों का सुन्दर वन है, यह महादेवजी का पवित्र तीर्थस्थान है। वहां सब देव और दैत्य आदि ने मिलकर महादेव की पूजा की ॥५॥ प्रासादों की जाति— प्रासादाकारपूजाभिर्देवदैत्यादिभिः क्रमात् । चतुर्दश समुत्पन्नाः प्रासादानां सुजातयः² ॥६॥ देव और दैत्य आदि सब देवो ने अनुक्रम से प्रासाद के आकार वाली शंकर की अनेक प्रकार से पूजा की, जिसके चौदह लोक के देवों द्वारा भिन्न भिन्न रूप से पूजित होने से चौदह प्रकार की प्रासाद की जाति उत्पन्न हुई ॥६॥ प्रासादोत्पत्ति की चौदह जाति— “यत्र येषां कृता पूजा तत्र तन्नामकास्तु ते । प्रासादानां समस्तानां कथयिष्याम्यनुक्रमम् ॥ सुरैस्तु नागराः ख्याता द्राविडा दानवेन्द्रकैः । लतिनाश्चैव गन्धर्वै-र्यक्षैश्चापि विमानजाः ॥ विद्याधरैर्मिश्रकाश्च वसुभिश्च वराटकाः । सान्धाराश्चोरगैः ख्याताः नरेन्द्रै¹र्भूमिजास्तथा ॥ विमाननागरच्छन्दाः सूर्यलोकसमुद्भवाः । नक्षत्राधिपलोकोक्ताश्छन्दा विमानपुष्पकाः ॥ पार्वतीसम्भवाः सेना वलभ्याकारसंस्थिताः । हरसिद्ध्यादिदेवीभिः कार्याः सिंहावलोकनाः ॥ व्यन्तरस्थितदेवैस्तु फासनाकारिणो मताः । इन्द्रलोकसमुद्भूता रथाश्च विविधा मताः ॥” अपराजितपृच्छा सू० १०६ (१) देवगुरु (२) 'च'

प्रथमोऽध्यायः ३

'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद उत्पन्न हुए, उनको अनुक्रम से कहूँगा (१) देवो के पूजन से नागर जाति, (२) दानवो के पूजन से द्राविडजाति, (३) गन्धर्वो के पूजन से लतिनजाति, (४) यक्षों के पूजन से विमानजाति, (५) विद्याधरों के पूजन से मिश्रजाति, (६) वसु देवो के पूजन से वराटकजाति, (७) नागदेवो के पूजन से सान्धार जाति, (८,) नरेन्द्रो के पूजन से भूमिजजाति, (६) सूर्यदेवो के पूजन से विमान- नागर जाति, (१०) चन्द्रमा के पूजन से विमानपुष्पक जाति, (११) पार्वती के पूजन से वलभी जाति, (१२) हरसिद्धि आदि देवियों के पूजन से सिंहावलोकन जाति, (१३) व्यन्तर स्थित देवों के पूजन से फांसी के आकार वाली जाति, १४-और इन्द्रलोक के देवो के पूजन से रथारूढ़ (दारुजादि) जाति, ये चौदह जाति के प्रासाद उत्पन्न हुए। आठ जाति के उत्तम प्रासाद— नागरा द्राविडाश्चैव भूमिजा लतिनास्तथा । सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाङ्किताः' ॥७॥ मिश्रकास्तिलकैः २ शृङ्गैरुत्तै जातिषु चोत्तमाः । सर्वदेवेषु कर्त्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ॥८॥ चौदह जाति के प्रासादों मे (१) नागर, (२) द्राविड, (३) भूमिज, (४) लतिन, (५) सावं- धार (सांधार केसरी आदि), (६) विमान नागर, (७) विमान पुष्पक, और (८) शृङ्ग और तिलक वाला मिश्र, ये आठ जाति के प्रासाद उत्तम हैं। इसलिये सब देवो के लिये यही बनाने चाहिये, उनमे भी विशेषकर महादेवजी के लिये बनाना श्रेयस्कर है ॥७-८॥ प्रासादानां च सर्वेषां जातयो देशभेदतः । चतुर्दश प्रवर्त्तन्ते ज्ञेया लोकानुसारतः ॥६॥ सब प्रासादो के भेद देशो के भेद के अनुसार होते है। इनके मुख्य चौदह भेद है, वे अन्य अपराजित पृच्छा सूत्र ११२ आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥६॥ लक्ष्यलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्गानुसारतः । प्रासादभवनादीनां सर्वज्ञानमवाप्यते ॥१०॥ प्रासाद और गृह आदि बनाने के लिये सब प्रकार का शिल्पज्ञान, उसके लक्ष्य और लक्षण के अभ्यास से एवं गुरुशिक्षा के अनुसार प्राप्त करना चाहिये ॥१०॥

(१) पुष्पकान्विता (२) प्रासादमिश्रकारश्चैव

४ प्रासादमण्डने प्रासाद का निर्माण समय— शुभलग्ने सुनक्षत्रे¹ पञ्चग्रहबलान्विते । माससंक्रान्तिवत्सादि-निषिधकालवर्जिते ॥११॥ शुभ लग्न और शुभ नक्षत्र मे, पांच ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ) के बलवान् होने पर, तथा मास, संक्रान्ति और दत्त आदि के निषेध समय को छोड़ कर प्रासाद बनाना आरंभ करे ॥११॥ भूमि परीक्षा— सर्वदिक्षु प्रवाहो वा प्रागुदक्शङ्करप्लवम् । भूमि परीक्ष्य संसिञ्चेत् पञ्चगव्येन कोविदः ॥१२॥ मणिसुवर्णरूप्येण विद्रुमेण फलेन वा । प्रथम प्रासाद, बनाने की भूमि की परीक्षा करनी चाहिये । जिस भूमि पर चारों दिशाओं मे पानी का प्रवाह चलता हो अर्थात वह चारों दिशाओं मे नीची हो और बीच मे ऊंची हो, अथवा पूर्व, उत्तर और ईशान कोनों मे नीची हो, अर्थात् इन तीन दिशाओं मे पानी का प्रवाह जाता हो तो ऐसी भूमि शुभदायक है । विशेष जानने के लिये देखें अपराजित पृच्छा सूत्र० ५१. इस प्रकार भूमिकी परीक्षा करके विद्वान् जन पञ्च गव्य ( गाय का दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर ) से उस भूमि पर छिड़काव करें तथा मणि, सोना, रूपा, मूंगा और फलो से भूमि को पवित्र करे ॥१२॥ वास्तुमंडल लिखने का पदार्थ— चतुःषष्टिपदैर्वास्तुं लिखेद्वापि शतांशकैः ॥१३॥ पिष्टेन वाक्षतैः शुद्धैस्ततो² वास्तुं समर्च्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन बलिपुष्पैश्च³ पूजयेत् ॥१४॥ प्रासाद के आरभ होने से समाप्त होने तक उतने समय मे सात अथवा चौदह बार चौसठ पद का अथवा एकसौ पद का वास्तुमण्डल* पूजा जाता है । यह शुद्ध आटा अथवा शुद्ध चावलो मे बनाना चाहिये । पश्चात् उसे पूर्वाचार्यो द्वारा बतलाई गई विधि के अनुसार बलि और पुष्प आदि से पूजना चाहिये ॥१३॥१४॥ (१) शुभर्चे च (२) ऊर्ध्वं (३) बलिपुष्पादिपूजनैः

  • विशेष जानने के लिये देखें स्वयंद्वारा अनुदित राजवल्लभमंडन में दूसरा अध्याय ।

प्रथमोऽध्यायः ५ आठ दिक्पाल— इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत् । कुवेर ईशः पतयः पूर्वांदीनां दिशां क्रमात् ॥१५॥ इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईश, ये आठ देव अनुक्रम से पूर्वादि दिशाओ के अधिपति है ॥१५॥ कार्यारम्भ के समय पूजनीय देव— दिक्पालाः क्षेत्रपालाश्च गणेशश्चण्डिका तथा । एतेषां विधिवत् पूजां कृत्वा कर्म समारभेत्¹ ॥१६॥ दिक्पाल, क्षेत्रपाल, गणेश और चण्डिका देवी आदि देव देवियो की विधि पूर्वक पूजा करके कार्य आरंभ करे ॥१६॥ निषेध समय— धनुर्मीनस्थिते सूर्ये गुरौ शुक्रेऽस्तगे विधौ । वैधृतौ व्यतिपाते च दग्धायां न कदाचन ॥१७॥ धन और मीन संक्रांति का सूर्य हो, गुरु शुक्र और चन्द्रमा ये अस्त हो, वैधृति और व्यतिपात के योग हो, तथा दग्धा तिथि हो, तब कभी भी नवीन कार्य का आरंभ नही करना चाहिये ॥१७॥ वत्समुख— कन्यादित्रित्रिभे² सूर्ये द्वारं पूर्वादिषु त्यजेत् । सृष्ट्या वत्समुखं तत्र स्वामिनो हानिकृद्यतः ॥१८॥ कन्या आदि तीन तीन राशि पर सूर्य हो, तब अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओ में द्वार आदि का कार्य नही करना चाहिये । क्योकि उन दिशाओ में सृष्टिक्रम से अर्थात् पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशा मे वत्सका मुख रहता है। यह कार्य कराने वाले स्वामी को हानिकारक है । जैसे-कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर सूर्य हो तब वत्स का मुख पूर्व दिशा मे, धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में, मीन मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा मे; मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा मे रहता है । ॥१८॥ (१) समाचरेत् (२) त्रित्रिगे

६ प्रासादमण्डने जिस दिशा में वत्स का मुख हो, उस दिशा में तथा मुख के सामने वाली दिशा में खात, देव प्रतिष्ठा, द्वार प्रतिष्ठा आदि कार्य करना शास्त्र मे वर्जित है, परन्तु वत्समुख एक दिशा में तीन तीन मास तक रहता है। इसलिये तीन मास तक उक्त कार्य को नही रोकने के लिये ठक्कुर फेरु कृत 'वत्थुसार पयरण' प्र० १ गाथा २० में विशेष रूप से बतलाया है कि— “गिहभूमि सत्तभाए पण दह तिहि तीस तिहि दहक्क कमा इम्र दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमकि वच्छठिई ॥” घर या प्रासाद की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात सात भाग करना, उनमे अनुक्रम से प्रथम भाग में पांच दिन, दूसरे में दस दिन, तीसरे में पंद्रह दिन, चौथे में तीस दिन, पांचवें मे पंद्रह दिन, छठे में दस दिन और सातवे भाग में पांच दिन वत्स का मुख रहता है। इस प्रकार भूमि की चारो दिशाओं मे दिन संख्या समझना चाहिये। जिस अंक पर वत्स का मुख हो, उसी अंक के सामने वाले बराबर के अंक पर वत्स की पूंछ रहती है। इस प्रकार की वत्स की स्थिति है। [चक्र: उत्तर— वायव्य

प्रथमोऽध्यायः ७ वत्सके सिर के भाग में और उनके सामने के भाग मे देव मंदिर अथवा मनुष्य के घर नही बनावे, यदि बनावेगे तो मृत्यु, रोग और भय हमेशा बना रहेगा। इसलिये वत्स की कुक्षि में कार्य करना अच्छा है। विशेष उक्त ग्रंथ मे देखें । आयादिका विचार— आयो व्ययर्द्ध्मंशस्य भित्तिवाह्ये सुरालये । ध्वजायो देवनक्षत्रं व्ययांशौ प्रथमौ शुभौ ॥१६॥ आय, व्यय, नक्षत्र और अंश आदि की गणना देवालय मे दीवार के बाहर के भाग से होती है। देवालय मे ध्वज आय, देव नक्षत्र, प्रथम व्यय और प्रथम अंश ये शुभ है ॥१६॥ केषाञ्चिन्मरुतां¹ गेहे वृषसिंहगजाः शुभाः । आयादूने² व्ययः श्रेष्ठः पिशाचस्तु समोऽधिकः ॥२०॥ देवालयों मे वृष, सिंह और गज आय भी श्रेष्ठ है। अपराजित पृच्छा सूत्र ६४ में भी कहा है कि—'ध्वजः सिंहो वृषगजो शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।' आय से व्यय कम हो तो श्रेष्ठ है। सम व्यय हो तो पिशाच और अधिक व्यय हो तो राक्षस नाम का व्यय माना जाता है ॥२०॥ देवालय में विचारणीय— देवतानां गृहे चिन्त्य-मायाद्यङ्गचतुष्टयम् । नवाङ्गं नादीवेधादि-स्थापकामरयोर्मिथः ॥२१॥ देवालय मे आय, व्यय, अंश और नक्षत्र इन चार अंगों का, तथा स्थापक (देव स्थापन करने वाले ) और देव इन दोनो के परस्पर नाडीवैध, योनि, गण, राशि, वर्ण, वश्य, तारा, वर्ग और राशिपति, इन नव अङ्गों का विचार करना चाहिये ॥२१॥ आयादिचिन्तनं भूमि-लक्षणं वास्तुमण्डलम् । मासनक्षत्रलग्नादि-चिन्तनं पूर्वशास्त्रतः ॥२२॥ आय आदिका विचार, भूमिका लक्षण, वास्तु मण्डल, मास, नक्षत्र और लग्न आदिका विचार, ये सब राजवल्लभ मंडन और अपराजित पृच्छा आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥२२॥ आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार— “व्यासे दैर्घ्यगुणेऽष्टभिर्विभजिते शेषो ध्वजाद्यायको, ऽष्टघ्ने तद्गुणिते च धिष्ण्यभजिते साहक्षमश्वादिकम् । (१) केपा च (२) हीन आय.द

८ प्रासादमण्डने नक्षत्रे वसुभिर्व्ययोऽपि भजिते हीनस्तु लक्ष्मीप्रदः, तुल्यायश्च पिशाचको ध्वजमृते संवर्द्धितो राक्षसः ॥” राज व० अ० ३ प्रासाद अथवा गृह बनाने की भूमि की लंबाई और चौड़ाई के नाप का गुणाकार करने से जो गुणनफल हो, वह क्षेत्रफल कहा जाता है । इसको आठ से भाग देने से जो शेष बचे, वह ध्वज आदि आय कहलाती है । क्षेत्रफल को आठ से गुणा करके, गुणनफल को सत्ताईस से भाग दे जो शेष बचे वह अश्विनी आदि नक्षत्र होता है । नक्षत्र की जो संख्या आवे, उसमे आठ का भाग देने से जो शेष बचे वह व्यय कहलाता है । आय से व्यय कम हो तो लक्ष्मी को प्राप्त करने वाला है । आय और व्यय दोनों बराबर हो तो पिशाच नाम का व्यय और ध्वज आय को छोड़कर दूसरी आयों से व्यय अधिक हो तो वह राक्षस नाम का व्यय कहलाता है । आयों की संज्ञा और दिशा— “ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरो गजः । ध्वांक्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राचादिषु प्रदक्षिणाः ॥” अप० सू० ६४ ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज और ध्वांक्ष, ये आठ आयों के नाम है। वे अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी हैं । प्रासाद के प्रशस्त आय— ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यते सुरवेश्मनि । अधमानां खरध्वांक्ष-धूम्रश्वानाः सुखावहाः ॥” अप० सू० ६४ ध्वज, सिंह, वृष और गज ये चार आय देवालय में शुभ हैं । तथा खर, ध्वांक्ष, धूम और श्वान ये चार आय अधम जातिवालों के घरों मे सुखकारक है¹ । व्यय संज्ञा— “शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः । श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ · समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसास्तु व्ययोऽधिकः । व्ययो यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥” अप० सू० ६६ शान्त, पौर, प्रद्योत, श्रियानन्द, मनोहर, श्रीवत्स, विभव और चिन्तात्मा, ये व्ययों के आठ नाम हैं । आय और व्यय समान हो तो पिशाच नाम का व्यय, आय से व्यय अधिक हो तो राक्षस नाम का व्यय और आय से व्यय कम हो तो यक्ष नाम का व्यय होता है । यह, धन धान्य की वृद्धि करने वाला है । (१) विशेष जानने के लिये देखो मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ

प्रथमोऽध्यायः ६ राशि, योनि, नाड़ी, गण आदि जानने का शतपद्‌चक्र—

संख्यानक्षत्रअक्षरराशिवर्णवश्ययोनिराशीशगणनाडीचन्द्रव्यय
अश्विनिचू. चे.<br>चो. ला.मेषक्षत्रियचतुष्पदअश्वमंगलदेवआद्यउत्तरशान्त
भरणीली. लू.<br>ले. लो.मेषक्षत्रियचतुष्पदगजमंगलमनुष्यमध्यउत्तरपीर
कृत्तिकाअ. इ.<br>उ. ए.१ मेष<br>२ वृष१ क्षत्रिय<br>३ वैश्यचतुष्पदबकरा१ मंगल<br>३ शुक्रराक्षसअन्त्यपूर्वप्रद्योत
रोहिणीओ. वा.<br>वी. वु.वृषवैश्यचतुष्पदसर्पशुक्रमनुष्यअन्त्यपूर्वश्रियानंद
मृगशिरवे. वो.<br>का. की.२ वृष<br>२ मिथुन२ वैश्य<br>२ शूद्र२ चतुष्पद<br>२ मनुष्यसर्प२ शुक्र<br>२ बुधदेवमध्यपूर्वमनोहर
आर्द्राकु. घ.<br>ङ. छ.मिथुनशूद्रमनुष्यश्वानबुधमनुष्यआद्यपूर्वश्रीवत्स
पुनर्वसुके. को.<br>हा. ही.३ मिथुन<br>१ कर्क३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ जलचरमार्जार३ बुध<br>१ चन्द्रदेवआद्यपूर्वविभव
पुष्यहू. हे.<br>हो. डा.कर्कब्राह्मणजलचरबकराचन्द्रमादेवमध्यपूर्वचिन्तात्म
आश्लेषाडी. डू.<br>डे. डो.कर्कब्राह्मणजलचरमार्जारचन्द्रमाराक्षसअन्त्यपूर्वशान्त
१०मघामा. मी.<br>मु. मे.सिंहक्षत्रियवनचरचूहासूर्यराक्षसअन्त्यदक्षिणपीर
११पूर्वा फा०मो. टा<br>टी. टू.सिंहक्षत्रियवनचरचूहासूर्यमनुष्यमध्यदक्षिणप्रद्योत
१२उत्तरा फा.टे. टो.<br>पा. पी.१ सिंह<br>३ कन्या१ क्षत्रिय<br>३ वैश्य१ वनचर<br>३ मनुष्यगो१ सूर्य<br>३ बुधमनुष्यआद्यदक्षिणश्रियानन्द
१३हस्तपु. षा.<br>ण. ठ.कन्यावैश्यमनुष्यभैंसबुधदेवआद्यदक्षिणमनोहर

१० प्रासादमण्डने

संख्यानक्षत्रअक्षरराशिवर्णवश्ययोनिराशीशगणनाडीचन्द्रव्यय
१४चित्रापे. पो<br>रा. री.२ कन्या<br>२ तुला२ वैश्य<br>२ शूद्रमनुष्यवाघ२ बुध<br>२ शुक्रराक्षसमध्यदक्षिणश्रीवत्स
१५स्वातिरु. रे.<br>रो. ता.तुलाशूद्रमनुष्यभैंसशुक्रदेवअंत्यदक्षिणविभव
१६विशाखाती. तु.<br>ते. तो.३ तुला<br>१ वृश्चिक३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ कीडाव्याघ्र३ शुक्र<br>१ मंगलराक्षसअंत्यदक्षिणचिन्तात्मा
१७अनुराधाना. नी.<br>नु. ने.वृश्चिकब्राह्मणकीडाहीरणमंगलदेवमध्यपश्चिमशान्त
१८ज्येष्ठानो या.<br>यी. यु.वृश्चिकब्राह्मणकीडाहीरणमंगलराक्षसआद्यपश्चिमपौर
१९मूलये. यो.<br>भा. भी.धनक्षत्रियमनुष्यकुक्कुरगुरुराक्षसआद्यपश्चिमप्रद्योत
२०पूर्वाषाढाभु. धा.<br>फ. ढा.धनक्षत्रियमनुष्य<br>चतुष्पदवानरगुरुमनुष्यमध्यपश्चिमश्रियानन्द
२१उत्तराषाढाभे. भो.<br>जा. जी.१ धन<br>३ मकर१ क्षत्रिय<br>३ वैश्यचतुष्पदन्योला१ गुरु<br>३ शनिमनुष्यअंत्यपश्चिममनोहर
२२श्रवणखी. खू.<br>खे खो.मकरवैश्यचतुष्पद<br>जलचरवानरशनिदेवअंत्यपश्चिमश्रीवत्स
२३धनिष्ठागा. गी.<br>गु गे.२ मकर<br>२ कुम्भ२ वैश्य<br>२ शूद्र२ जलचर<br>२ मनुष्यसिंहशनिराक्षसमध्यउत्तरविभव
२४शतभिषागो. सा.<br>सी. सुकुम्भशूद्रमनुष्यघोडाशनिराक्षसआद्यउत्तरचिन्तात्मा
२५पूर्वा भाद्रसे. सो.<br>दा. दी३ कुम्भ<br>१ मीने३ शूद्र<br>१ ब्राह्मण३ मनुष्य<br>१ जलचरसिंह३ शनि<br>१ गुरुमनुष्यआद्यउत्तरशान्त
२६उत्तराभाद्रदु. थ.<br>झ. ञ.मीनब्राह्मणजलचरगौगुरुमनुष्यमध्यउत्तरपौर
२७रेवतीदे. दो.<br>चा ची.मीनब्राह्मणजलचरहाथीगुरुदेवअंत्यउत्तरप्रद्योत

प्रथमोऽध्यायः ११ ध्वजाय और देवगणनक्षत्रवाले समचोरस क्षेत्र का माप— गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र गज - इच नक्षत्र १-१ मृगशीर ७-२१ रेवती १५-१ अनुराधा १-३ रेवती ७-२३ मृगशीर १५-६ रेवती १-५ मृगशीर ८-७ अनुराधा १५-१६ पुष्य १-१३ अनुराधा ८-१५ रेवती १६-३ रेवती १-२१ रेवती ८-२३ पुष्य १६-११ अनुराधा २-५ पुष्य ९-१ पुष्य १६-१६ मृगशीर २-७ पुष्य ९-६ रंवती १६-२१ रेवती २-१५ रेवती ९-१७ अनुराधा १७-१३ रेवती २-२३ अनुराधा १०-१ मृगशीर १७-१५ रेवती ३-७ मृगशीर १०-३ रेवती १७-२३ पुष्य ३-६ रेवती १०-५ मृगशीर १८-१ पुष्य ३-११ मृगशीर १०-१३ अनुराधा १८-६ रेवती ३-१६ अनुराधा ११-५ पुष्य १८-१७ रेवती ४-३ रेवती ११-७ पुष्य १९-१ मृगशीर ४-११ पुष्य ११-१५ रेवती १९-३ रेवती ४-१३ पुष्य ११-२३ अनुराधा १९-५ मृगशीर ४-२१ रेवती १२-७ मृगशीर १९-२१ रेवती ५-५ अनुराधा १२-६ रेवती १९-२३ पुनर्वसु ५-१३ मृगशीर १२-११ मृगशीर २०-५ पुष्य ५-१५ रेवती १२-१६ अनुराधा २०-७ पुष्य ५-१७ मृगशीर १३-३ रेवती २०-१५ रेवती ६-१ अनुराधा १३-११ पुष्य २०-१६ हस्त ६-६ रेवती १३-१३ पुष्य २०-२३ अनुराधा ६-१७ पुष्य १३-२१ रेवती २१-७ मृगशीर ६-१६ पुष्य १४-५ अनुराधा २१-६ रेवती ७-३ रेवती १४-१३ मृगशीर २१-११ मृगशीर ७-११ अनुराधा १४-१५ रेवती २१-१६ अनुराधा ७-१६ मृगशीर १४-१७ मृगशीर २१-२३ मृगशीर

१२ प्रासादमण्डने अंश लाने का प्रकार— "तन्मूले व्ययहर्म्यनामसहिते भक्ते त्रिभिस्त्वंशकः, स्यादिन्द्रो यमभूपती क्रमवशाद् देवे सुरेन्द्रो हितः । वेश्यामेष यमस्तु पण्यभवने नागे तथा भैरवे, राजांशो गजवाजियाननगरे राज्ञां गृहे मन्दिरे ॥" राज० अ० ३ मूलराशि (क्षेत्रफल) मे व्यय की संख्या और घरके नामाक्षर की संख्या जोड़ करके उसमें तीन से भाग दें । जो एक शेष बचे तो इन्द्रांश, दो शेष बचे तो यमांश और तीन (शून्य) शेष बचे तो राजांश जाने । इन्द्र का अंश-देवालय और वेदी में शुभ है । यमका अंश-दुकान, नागदेव और भैरव के प्रासाद में शुभ है । राजा का अंश-गजशाला, अश्वशाला, वाहन, नगर, राजमहल और साधारण घर मे शुभ है । दिक् साधन— रात्रौ दिक्साधनं कुर्याद् दीपसूत्रध्रुवैक्यतः । समे भूमिप्रदेशे तु शङ्कुना दिवसेऽथवा ॥२३॥ घर और देवालय आदि बराबर वास्तविक दिशा में न होने से दिङ् मूढदोष माना जाता है । इसलिये गृह आदि बराबर ठीक दिशा मे रखने के लिये दिक् साधन करना जरूरी है । रात्रि मे दिशा का साधन दीपक, सूत और ध्रुव से किया जाता है और दिन मे दिशा का साधन समतल भूमि के ऊपर शंकु रखकर किया जाता है ॥२३॥ "प्राची मेषतुलारवेरुदयतः स्याद् वैष्णवे वह्निभे, चित्रास्वातिभमध्यगा निगदिता प्राची बुधैः पञ्चधा । प्रासादं भवनं करोति नगर दिङ्मूढमर्थक्षयं, हर्म्ये देवगृहे पुरे च नितरामायुर्धनं दिङ्मुखे ॥" राज० अ० १ मेष और तुला संक्रान्ति को सूर्य का उदय पूर्व दिशा मे होता है । श्रवण और कृत्तिका नक्षत्र का उदय पूर्व दिशा मे होता है । चित्रा और स्वाति नक्षत्र के मध्य में पूर्व दिशा मानी जाती है । विद्वानो ने कहा है कि इन पांच प्रकार से पूर्व दिशा को जानें । प्रासाद गृह और नगर को दिङ् मूढ करने से धन का नाश होता है । यदि ये वास्तविक दिशा मे हो तो हमेशा आयु और धन की वृद्धि होती है । रात्री में और दिन में दिक्साधन— "तारे मार्कटिके ध्रुवस्य समतां नीतेऽवलम्बे नते, दीपाग्रेण तदैक्यतश्च कथिता सूत्रेण सा सौम्या दिशा ।