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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

२४४ | रसरत्नसमुच्चये—

शब्दवेधलक्षणम्—

मुखस्थितरसेनाल्पलोहस्य धमनात्खलु ।
स्वर्णरूप्यत्वजननं शब्दवेधः स कीर्त्तितः ॥ ९५ ॥

किसी लौह आदि धातु के कुछ भाग को अग्नि पर विद्रुत कर उसको मुख में रखे हुए पारद ( वेधसमर्थपारद गोली ) से एकनली के द्वारा फूंक के जोर से धमने से वह धातु स्वर्ण या रौप्य के रूप में परिवर्तित हो जाती है इसको शब्दवेध कहते हैं ॥ ९५ ॥


उद्घाटनलक्षणम्—

सिद्धद्रव्यस्य सूतेन कालुष्यादिनिवारणम् ।
प्रकाशनं च वर्णस्य तदुद्घाटनमीरितम् ॥ ९६ ॥

मृत किये हुए ( भस्म किये हुए ) लोहादिक द्रव्यों की कलुषता (मालिन्य) विशेष रूप से सिद्ध पारद के द्वारा दूर की जाती है और उस मृत लोहादिक के रङ्ग को भी पारद उत्कृष्ट करता है इस को उद्घाटन कहते हैं ॥ ९६ ॥


स्वेदनलक्षणम्—

क्षाराम्लैरौषधैः सार्द्धं भाण्डं रुद्ध्वाऽतियत्नतः ।
भूमौ निखन्यते यत्नात्स्वेदनं सम्प्रकीर्त्तितम् ॥ ९७ ॥

क्षार, अम्ल, ( काञ्जी ) तथा और भी अन्य औषधियों को भाण्ड में भरकर उसमें पारद या अन्य लोह इत्यादि धातु को रख करके भाण्ड का मुख सकोरे से ढक कर कपड़ मिट्टि करके बन्द करदेते हैं फिर उस भाण्ड को पृथ्विी में गाड़ देते हैं, इस को भी स्वेदन यन्त्र कहते हैं । क्योंकि भूमि की आन्तरिक उष्णता से स्वेदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ॥ ९७ ॥


संन्यासलक्षणम् ।

रसस्यौषधयुक्तस्य भाण्डरुद्धस्य यत्नतः ।
मन्दाग्नियुतचुल्ल्यन्तः क्षेपः संन्यास उच्यते ॥ ९८ ॥

किसी भाण्ड में क्षार तथा अम्ल भरकर उसमें पारद रख देते हैं । फिर उस भाण्ड के मुख को कपड़मिट्टी से बन्द कर के मन्द २ आंच वाले चूल्हे के उपर रख देते हैं उसको सन्यास कहते हैं ॥ ९८ ॥

अष्टमोऽध्यायः । २४५

रसस्वेदसंन्यासगुणाः ।

द्वावेतौ स्वेदसंन्यासौ रसराजस्य निश्चितम् ।
गुणप्रभावजनकौ शीघ्रव्याप्तिकरौ तथा ॥ ९९ ॥

स्वेद और सन्यास इन दोनों विधियों से पारद के अन्दर गुण और देह-सिद्धिजनक प्रभाव उत्पन्न होते हैं तथा ये दोनों संस्कार पारद को शरीर में शीघ्र ही व्याप्त होने योग्य बना देते हैं ॥ ९९ ॥


अथ परिभाषाऽऽवश्यकता—

रसनिगममहाब्धेः सोमदेवः समन्तात्
स्फुटतरपरिभाषानामरत्नानि हृत्वा ।
व्यरचयदतियत्नात्तैरिमां कण्ठमालां
कलयतु भिषगग्र्यो मण्डनार्थे सभायाम् ॥ १०० ॥

सोमदेव नामक रसशास्त्र के विशेषज्ञ ने रसशास्त्र रूपी समुद्र से प्रयत्न पूर्वक समग्ररूप से अत्यन्त स्पष्टार्थ बोधक परिभाषाओं की संज्ञा रूपी रत्नों को निकालकर उनकी कण्ठमाला (अर्थात् कण्ठस्थ करने योग्य परिभाषाएं) बनाई है। इस माला को रस शास्त्र के पण्डित सभा में स्वविषय का प्रतिपादन करने के लिये धारण करें ॥ १०० ॥


अध्यायपठनफलम्—

भवेत्पठितवारोऽयमध्यायो रसवादिनाम् ।
रसकर्माणि कुर्वाणो न स मुह्यति कुत्रचित् ॥ १०१ ॥

इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसपरिभाषाकथनं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

रस शास्त्र के आचार्यों के मत से परिपूर्ण इस अध्याय का जो विद्वान् बार-म्बार अभ्यास (आवृत्ति) करेगा, वह रस कर्म को करता हुआ किसी विषय में व्यामोहित (किंकर्त्तव्यमूढ) नहीं होगा। अर्थात् वह किसी प्रकार से रसप्रक्रिया में भ्रमित नहीं होता है ॥ १०१ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसपरिभाषा-
कथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

१४६ रसरत्नसमुच्चये—

नवमोऽध्यायः ।

अथ यन्त्राणि—

अथ यन्त्राणि वक्ष्यन्ते रसतन्त्राण्यशेषतः ।
समालोच्य समासेन सोमदेवेन साम्प्रतम् ॥ १ ॥

श्री सोमदेव ने सम्पूर्ण रसशास्त्र के भिन्न २ तन्त्रों का अवलोकन करके जो यन्त्र बनाने की विधि कही है, उस विधि से प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों का इस स्थान पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥

यन्त्रशब्दनिरुक्तिः—

स्वेदादिकर्मनिर्मातुं वार्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः ।
यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥ २ ॥

पारद का स्वेदन, मूर्च्छन, मर्दन आदि अनेक संस्कार करने के लिये जिस उपाय से रस को नियन्त्रित किया जाता है उसको रसपरिभाषाकारक आचार्यों ने यन्त्र कहा है ॥ २ ॥

अथ दोलायन्त्रम्—

द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ ३ ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बद्ध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४ ॥

काञ्जी, निम्बूस्वरस, क्षार, या जयन्ती आदि स्वेदन करने में उपयुक्त ओषधियों के क्वाथ या स्वरस से एक मिट्टी की हण्डिका को आधी भर करके उस हण्डिका के किनारों पर एक दूसरे के सामने दो छिद्र युक्ति से बनाकर उन में एक लकड़ी लगा देना चाहिये फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोटली या अन्य स्वेदनीय धातु उपधातु तथा रत्नों की पोटली बांध कर उस द्रव में लटका देते हैं, फिर अग्नि जलाकर चूल्हे पर हण्डिका को रखकर उस पोटली के अन्दर स्थित पदार्थ को स्वेदित करते हैं, इस को दोलायन्त्र कहते हैं । अर्थात् रसादिक की पोटली डोले (झूले) के समान दण्ड में बांधकर लटका दी जाती है, अतः दोलायन्त्र कहा गया है ॥ ३-४ ॥

नवमोऽध्यायः । २४७

स्वेदनीयन्त्रम्—

साम्बुस्थालीमुखे बद्धवस्त्रे पाक्यं निवेशयेत् ।
पिधाय पच्यते यत्र स्वेदनीयन्त्रमुच्यते ॥ ५ ॥

जल अथवा अन्य ओषधियों के स्वरस से हण्डिका को भरकर उसके मुख पर एक वस्त्र बांध देते हैं, फिर उस वस्त्र के अवकाशयुक्त भाग में किसी धातु रत्न या पारद को रखकर ऊपर से सकोरे द्वारा बन्द करके अग्नि द्वारा पाक किया जाता है उसको स्वेदनी यन्त्र कहते हैं ॥ ५ ॥

अथ पातनायन्त्रम्—

अष्टाङ्गुलपरीणाहमोनाहेन दशाङ्गुलम् ।
चतुरङ्गुलकोत्सेधं तोयाधारं गलादधः ॥ ६ ॥
अधोभाण्डेमुखं तस्य भाण्डस्योपरि वर्त्तिनः ।
षोड़शाङ्गुलविस्तीर्णपृष्ठस्यास्ये प्रवेशयेत् ॥ ७ ॥
पार्श्वयोर्माहिषीक्षीरचूर्णमण्डूरफाणितैः ।
लिप्त्वा विशोषयेत्सन्धि जलधारे जलं क्षिपेत् ।
चुल्ल्यामारोपयेदेतत्पातनायन्त्रमुच्यते ॥ ८ ॥

आठ अङ्गुल चौड़ा ( विस्तृत ), दस अङ्गुल ऊंचा ( लम्बाई में ) और चार अङ्गुल मोटा ( स्थूल ) एक मिट्टी का भाण्ड लेकर उसको जल से भर दें, फिर इस जल से भरे नीचे के भाण्ड के मुख को गर्दन ( किनारे ) तक एक दूसरे १६ अङ्गुल चौड़ो पीठ ( पृष्ठभाग ) वाले ( जिसके भीतर की तली में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप सन्धिबन्धन करने के पहिले किया जा चुका हो ) ऊपर के मिट्टी के भाण्ड के मुख में प्रविष्ट कर देना चाहिए । फिर ( उन दोनों भाण्डों के मुखों को परस्पर मिलादेने से डमरू के समान रचना हो जाती है ) उन दोनों की मुखसन्धि को अगल बगल चारों तरफ भैंस के दुग्ध में चूने की बुकनी, मण्डूर की बुकनी और फाणित ( गुड़ की विकृति राब ) को घोट कर उससे लेप कर के सुखा देवे । फिर इस को चूल्हे पर चढ़ाकर अग्नि जला देनी चाहिए । ऊपर के भाण्ड की पीठपर एक जलाधार ( आलवाल ) या थाला ( उड़दी के ओर से ) बनाकर ठण्डाजल भरना चाहिए । ५ मिनिट बाद प्रथम गर्म हुए जलको निकाल कर दूसरा ठण्डा जल भरना चाहिए । यदि आलवाल न बना सके तो एक बा-

२४८ रसरत्नसमुच्चये—

ल्टी में जलभर कर कपड़े को चारवार मोड़ कर लत्ते बनाकर जल में भिगो कर ऊपरी भाण्ड के पृष्ठ पर रखो कुछ देर बाद इनको बदलते रहना चाहिए । इसी को पातना यन्त्र कहते हैं ॥ ६-८ ॥

अथ अधःपातनयन्त्रम्— अथोर्ध्वभाजने लिप्तस्थापितस्य जले सुधीः । दीप्तैर्वनोत्पलैः कुर्यादधःपातं प्रयत्नतः ॥ ९ ॥

उपर्युक्त विधि से बने हुए पातन यन्त्र के ऊपर वाले भाण्ड में सन्धि बन्धन करने के पहिले निम्बूरस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप कर सुखा लेना चाहिए फिर सन्धिवन्धन करके ऊपर के भाण्ड में एक थाला या पाली बनाकर जङ्गली उपलों को उस पाली में रखकर जला देने चाहिए । इस तरह अग्निके कारण पारद निकल कर नीचे के जल से भरे भाण्ड में गिर जाता है इसको अधः पातन यन्त्र कहते हैं ॥९॥

अथ कच्छपयन्त्रम्— जलपूर्णपात्रमध्ये दत्त्वा घटखर्परं सुविस्तीर्णम् । तदुपरि बिडमध्यगतः स्थाप्यः सूतः कृतः कोष्ठ्याम् ॥ १० ॥ लघुलोहकटोरिकया कृतषण्मृत्सन्धिलेपयाऽऽच्छाद्य । पूर्वोक्तघटखर्परमध्येऽङ्गारैः खदिरकोद्भवैः ॥ ११ ॥ स्वेदनतो मर्दनतः कच्छपयन्त्रस्थितो रसो जरति । अग्निबलेनैव ततो गर्भे द्रवन्ति सर्वसत्त्वानि ॥ १२ ॥

एक जल से भरे हुए पात्र ( नाद ) के मध्य भाग में बड़ा कूंड़ा या घट का गहरा कपाल रख कर उसमें मूषायंत्र को पारे से भर कर रख देना चाहिए। फिर मूषा के ऊपर एक छोटी लोहे की कटोरी ढक कर उसके चारों ओर ६ वार कपड़मिट्टी कर देनी चाहिये । फिर उस घटखर्पर ( कूण्ड या कपाल के खाली भाग में ) में खदिर या बैर ( बदरी काष्ठ ) की लकड़ी के कोयले भर कर अग्नि जला दें, इस तरह स्वेदन और मर्दन दोनों संस्कार होकर इस यन्त्र में रखे हुए पारद का जारण हो जाता है, इसी यन्त्र से अन्य धातुओं का सत्त्वपातन भी करते हैं । इसको कच्छपयन्त्र कहते हैं ॥ १०-१२ ॥

अथ दीपिकायन्त्रम्— कच्छपयन्त्रान्तर्गतमृण्मयपीठस्थदीपिकासंस्थः ।

नवमोऽध्यायः ।

नवमोऽध्यायः । २४९

यस्मिन्निपतति सूतः प्रोक्तं तद्दीपिकायन्त्रम् ॥ १३ ॥

उपर्युक्त विधि से कच्छप यंत्र बनाकर उसमें एक मिट्टी का खर्पर रख कर उसमें एक दीपिका या मूषा अथवा सकोरा रख देना चाहिए, इस सकोरे में पारद भर दें, फिर अग्नि के प्रभाव से पारद उस दीपिका से कच्छप यंत्र में उड़ कर गिर जाता है, इसको दीपिकायंत्र कहते हैं ॥ १३ ॥

अथ ढेकीयन्त्रम्—

भाण्डकण्ठादधश्छिद्रे वेणुनालं विनिक्षिपेत् ।
कांस्यपात्रद्वयं कृत्वा सम्पुटं जलगर्भितम् ॥ १४ ॥
नलिकास्यं तत्र योग्यं दृढं तच्चापि कारयेत् ।
युक्तद्रव्यैर्विनिक्षिप्तः पूर्वं तत्र घटे रसः ॥ १५ ॥
अग्निना तापितो नालात्तोये तस्मिन् पतत्यधः ।
यावदुष्णं भवेत्सर्वं भाजनं तावदेव हि ।
जायते रससन्धानं ढेकीयन्त्रमितीरितम् ॥ १६ ॥

एक मिट्टी के बड़े भाण्ड में या घड़े में कुछ (स्वेदनोपयोगी) औषधियों (क्षार, अम्ल इत्यादि) के साथ घोटे हुए पारद का लेप करके उस भाण्ड को सुखा लेना चाहिए । पश्चात् उस भाण्ड की ग्रीवा से कुछ नीचे (पास ही) एक छिद्र बनाकर उसमें बांस की नली का एक भाग प्रविष्ट कर भाण्ड का मुख तथा छिद्र के आस पास कपड़मिट्टी कर देना चाहिए । फिर दो कांस्य के पात्रों (कटोरों) का परस्पर सन्धिबन्धन करके ऊपर के पात्र में एक छिद्र बनाकर इसमें उस बांस की नली का दूसरा भाग प्रविष्ट करके मजबूती से सन्धिबन्धन कर देना चाहिए, फिर इस भाण्ड को आसानी से चूल्हे पर चढाकर नीचे आग जलादे, अग्नि के ताप से भाण्ड के अन्दर औषधियों के साथ घोटकर लिप्त किया हुआ पारद उड़कर उस बांस की नलिका में होता हुआ कांसे के पात्र के जल में गिर जायगा । सम्पूर्ण भाण्ड के प्रतप्त हो जाने पर प्रायः सब पारा उड़ जाता है, इसको ढेकी यन्त्र कहते हैं ॥ १४-१६ ॥

अथ जारणायन्त्रम्—

लोहमूषाद्वयं कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः ।
ईषच्छिद्रान्वितामेकां तत्र गन्धकसंयुताम् ॥ १७ ॥

२५० रसरत्नसमुच्चये—

मूषायां रसयुक्तायामन्यस्यां तां प्रवेशयेत् । तोयं स्यात्सूतकस्याध ऊर्ध्वाधो वह्निदीपनम् ॥ १८ ॥

१२ अङ्गुल लम्बी दो लोहे की मूषा बना कर एक मूषा में कुछ छिद्र बनवा कर उस में गन्धक भर दें, फिर इस गन्धक युक्त मूषा को पारद से भरी हुई द्वितीय मूषा के अन्दर रख देवे ( पारद जिसमें भरना हो उसको कुछ बड़ी बनवाना चाहिए ) पश्चात् इन दोनों मूषा को एक जल से भरे हुए भाण्ड में रख कर उस भाण्ड को चूल्हे पर चढाकर अग्नि जला देना चाहिए । इसको जारणा यंत्र कहते हैं ॥ १७-१८ ॥

अथ जारणायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—

रसोनकरसं भद्रे यत्नतो वस्त्रगालितम् । दापयेत्प्रचुरं यत्नादाप्लाव्य रसगन्धकौ ॥ १९ ॥ स्थालीकायां पिधायोर्ध्वं स्थालीमन्यां दृढां कुरु । सन्धिं विलेपयेद्यत्नान्मृदा वस्त्रेण चैव हि ॥ २० ॥ स्थाल्यन्तरे कपोताख्यं पुटं कर्षाग्निना सदा । यन्त्रस्याधः करीषाग्निं दद्यात्तीव्राग्निमेव वा ॥ २१ ॥ एवं तु त्रिदिनं कुर्यात्ततो यन्त्रं विमोचयेत् । तप्तोदके तप्तचुल्ल्यां न कुर्याच्छीतलां क्रियाम् ॥ २२ ॥ न तत्र क्षीयते सूतो न च गच्छति कुत्रचित् । अनेन च क्रमेणैव कुर्याद्गन्धकजारणम् ॥ २३ ॥

हे पार्वति ! एक स्थाली के अन्दर पारद और गन्धक दोनों भर कर वस्त्र से छाने हुए लहसुन के पानी (स्वरस) से उन दोनों को खूब भिगोना ( आप्लावित करना) चाहिए । फिर एक शराव से रस तथा गन्धक को बन्द करके ऊपर एक और स्थाली ढककर दोनों स्थालियों की वस्त्र तथा कपड़मिट्टि से सन्धि अच्छी तरह बन्दकर के यंत्र के नीचे तेज आंच दें तथा यंत्र के ऊपर की स्थाली के ऊपर भी उपलों की आंच से कपोत (१)पुट देना चाहिए, इस तरह तीन दिन


( १ ) कपोतपुटलक्षणम्—
यत्पुटं दीयते खाते अष्टसङ्ख्यैर्वनोपलैः ।
कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ॥ १ ॥

नवमोऽध्यायः । २५१

तक अग्नि देना चाहिए । तीसरे दिन के पश्चात् उष्ण चूल्हे पर गरम जल में यन्त्र को रख कर खोलना चाहिए । यंत्र को शीतल करके नहीं खोलें। इसी क्रम से पारद के साथ गन्धक का जारण करना चाहिए । यह जारणयंत्र का दूसरा स्वरूप है ॥ १९-२३ ॥

अथ विद्याधरयन्त्रम्— यन्त्रं विद्याधरं ज्ञेयं स्थालीद्वितयसम्पुटात् । चुल्लीं चतुर्मुखीं कृत्वा यन्त्रभाण्डं निवेशयेत् ॥ २४ ॥ तत्रौषधं विनिक्षिप्य निरुन्ध्याद्भाण्डकाननम् । यन्त्रं विद्याधरं नाम तन्त्रज्ञैः परिकीर्त्तितम् ॥ २५ ॥

दो मिट्टी की स्थालियों को परस्पर कपड़मिट्टी द्वारा बन्द करने की क्रिया को विद्याधर यंत्र कहते हैं। विधि-एक चार मुख वाला चूल्हा बना कर उस पर औषधादिक से भरा हुआ एक मिट्टी का भाण्ड रखना चाहिए, फिर इस भाण्ड पर एक दूसरा भाण्ड रखकर नीचे के भाण्ड के मुख को ऊपर रखे हुए भाण्ड के तल के साथ कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देते हैं, फिर अग्नि जलाते हैं। इसको रसशास्त्र के पण्डितों ने विद्याधरयंत्र कहा है ॥ २४-२५ ॥

अथ सोमानलयन्त्रम्— ऊर्ध्वं वह्निरधश्चापो मध्ये तु रससङ्ग्रहः । सोमानलमिदं प्रोक्तं जारयेद्गगनादिकम् ॥ २६ ॥

एक स्थाली के अन्दर जल भर कर उसमें पारद से युक्त मूषा रखकर उस स्थाली के मुख को शराव से बन्द करके कपड़मिट्टी कर देते हैं । पश्चात् उस शराव पर उपलों की आँच देते हैं, इस यंत्र को सोमानल यंत्र कहते हैं। क्यों के नीचे सोम (जल) भरा रहता है, बीच में मूषा के अन्दर रस का संग्रह रहता है, ऊपर अग्नि जलाते हैं अतः इसका नाम सोमानल यंत्र है। पारद के साथ मूषा में अभ्रक आदि रखकर इससे जारण करते हैं ॥ २६ ॥

अथ गर्भयन्त्रम्— गर्भयन्त्रं प्रवक्ष्यामि पिष्टिकाभस्मकारकम् । चतुरङ्गुलदीर्घाञ्च त्र्यङ्गुलोन्मितविस्तराम् ॥ २७ ॥ मृण्मयीं सुदृढां मूषां वर्तुलां कारयेन्मुखम् ।

२५२ रसरत्नसमुच्चये—

लोणस्य विंशतिर्भागा भाग एकस्तु गुग्गुलाः ॥ २८ ॥
सुश्लक्ष्णं पेषयित्वा तु वारं वारं पुनः पुनः ।
मूषालेपं दृढं कृत्वा लवणाङ्घ्रीमृदम्बुभिः ॥ २९ ॥
कर्षेत्तुषाग्निना भूमौ स्वेदयेन्मृदु मानवित् ।
अहोरात्रं त्रिरात्रं वा रसेन्द्रो भस्मतां व्रजेत् ॥ ३० ॥

नष्टपिष्ट किये हुए पारद की भस्म बनाने के लिये गर्भ यंत्र का वर्णन करते हैं। चार अङ्गुल लम्बी और तीन अङ्गुल चौड़ी मिट्टी की गोल मुखकी दृढ मूषा बनवानी चाहिए, फिर बीस भाग नमक और एक भाग गुग्गुल, दोनों को नमक से आधे भाग मिट्टी तथा जल के साथ घोटकर उस मूषा में लेप करना चाहिए, फिर उस मूषा के अन्दर पारद डालकर उसका मुख बन्दकर देवे। सूखनेके बाद मूषा को पृथ्वी में गाड़कर उसके ऊपर जंगली उपलों की अग्नि देकर एक दिन तक अथवा तीन दिन तक स्वेदन करना चाहिए। प्रायः अग्नि यदि तीन दिन तक देना हो तो मृदु अग्नि जलावे। और यदि एक दिन रात में पाक करना हो तो तीव्र आंच देवे, इस को गर्भयंत्र कहते हैं ॥ २७-३० ॥

अथ हंसपाकयन्त्रम्—

खर्परं सिकतापूर्णं कृत्वा तस्योपरिन्यसेत् ।
अपरं खर्परं तत्र शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ३१ ॥
पञ्चक्षारैस्तथा मूत्रैर्लवणं च विडं ततः ।
हंसपाकं समाख्यातं यन्त्रं तद्वार्त्तिकोत्तमैः ॥ ३२ ॥

एक मिट्टीके खर्पर (कुण्डा) को वालुका (रेते) से भरकर ऊपरसे दूसरा खर्पर रख कर ढक देते हैं, और इस में पारद को (१)पांचोक्षार, आठों (२)प्रकार के मूत्र तथा लवण विशेष कर विड़लवण इत्यादि पदार्थों के साथ पाक करते हैं। इस यंत्र को रसपरिभाषाकार पण्डितों ने हंसपाक यन्त्र कहा है ॥ ३१-३२ ॥


( १ ) यवमुष्ककसर्जानीं पलाशतिलयोस्तथा ।
क्षारैस्तु पञ्चभिः प्रोक्तः पञ्चक्षाराभिधोगणः ॥
( २ ) सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् ।
मूत्राणीति भिषग्वर्यै र्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥

नवमोऽध्यायः । २५३

नवमोऽध्यायः । २५३

अथ बालुकायन्त्रम्—

सरसां गूढवक्त्रां मृद्वस्त्राङ्गुलघनावृताम् ।
शोषितां काचकलशीं त्रिषु भागेषु पूरयेत् ॥ ३३ ॥
भाण्डे वितस्तिगम्भीरे वालुकासुप्रतिष्ठिता ।
तद्भाण्डं पूरयेत्त्रिभिरन्याभिरवगुण्ठयेत् ॥ ३४ ॥
भाण्डवक्त्रं मणिकया सन्धिं लिम्पेन्मृदा पचेत् ।
चुल्ल्यां तृणस्य चादाहान्मणिकापृष्ठवर्त्तिनः ॥
एतद्धि बालुकायन्त्रं तद्यन्त्रं लवणाश्रयम् ॥ ३५ ॥

प्रथम एक आतसी शीशी को मुल्तानीमिट्टी के अन्दर लिप्त किये हुये वस्त्रों की एक तह (आवरण) चढाकर सुखा लेवे, इस तरह शीशी को सुखा कर सात बार कपड़ मिट्टी लगाकर उसे एक अङ्गुल मोटी बना लेवे' इस आतसी शीशी का मुख पतला होना चाहिए, फिर इसके तीन भाग को रस (पारदकज्जली) से भर कर तीन भाग में बालुका से भरी हुई एक नांदमें (लोहे की या मिट्टी की हो) आतसी शीशी को रख कर उस नांद को शराव अथवा अन्य बड़े कुण्डे से ढक कर सन्धि को कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देना चाहिए, पश्चात् इस यंत्र को चूल्हे पर चढा कर पाक करे' । जब उस शराव पर तृणों को रखने से वे जलने लगें तब पाक हुआ समझना चाहिए । इसको बालुकायंत्र कहते हैं । यदि रेत के स्थान में लवण भर दिया जाय तो उसे लवण यंत्र कहते हैं ॥ ३३-३५ ॥

अथ बालुकायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—

पञ्चाढवालुकापूर्णभाण्डे निक्षिप्य यत्नतः ।
पच्यते रसगोलाद्यं बालुकायन्त्रमीरितम् ॥ ३६ ॥

किसी एक भाण्ड में ५ आढक रेती भर कर उसके अन्दर ही शराव में सम्पुटित हुए पारद को रखकर पकाते हैं, इसको भी बालुका यंत्र कहते हैं ॥ ३६ ॥

अथ लवणयन्त्रम्—

एवं लवणनिक्षेपात्प्रोक्तं लवणयन्त्रकम् ॥ ३७ ॥

इसी तरह यदि बालू के स्थान में लवण भर दिया जाय तो वह लवण यंत्र कहलाता है ॥ ३७ ॥

२५४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ प्रकारान्तरम्—

अन्तः कृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धिं भाण्डतलस्य च ॥ ३८ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य क्षारैर्वा पूर्ववत्पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद्रसकर्मणि शस्यते ॥ ३९ ॥

किसी एक ताम्र के पात्र के अन्दर औषधों के साथ पारद को घोट कर लेप करके उस पात्र को सुखाकर एक मिट्टी के अन्दर औंधा करके रख दें । फिर उस ताम्रपात्र के मुख को उस भाण्ड या कूण्डे की तली के साथ मिट्टी तथा लवण की पिष्ठी बनाकर उससे उन दोनों का सन्धिवन्धन करना चाहिए । फिर उस भाण्ड तथा ताम्र पात्र को वालुका अथवा क्षार या लवण से भर कर पकाना चाहिए । इसको भी लवणयंत्र कहते हैं । इस तरह का लवणयंत्र रसकर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३८-३९ ॥

अथ नालिकायन्त्रम्—

लोहनालगतं सूतं भाण्डे लवणपूरिते ।
निरुद्धं विपचेत्प्राग्वन्नालिकायन्त्रमीरितम् ॥ ४० ॥

एक लोह की नली बनवाकर उसमें उपयुक्त औषधों के साथ पारद को भर कर उसका मुख बन्द कर के लवण यंत्र के मध्य में गाड़ दें । फिर लवण यंत्र के मुख को सकोरे द्वारा कपड़मिट्टी से बन्द करके पकाना चाहिए । इसको नालिकायंत्र कहते हैं ॥ ४० ॥

अथ भूधरयन्त्रम्—

वालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद्यन्त्रं तद्भूधराह्वयम् ॥ ४१ ॥

पृथ्वी में एक हाथ गहरा गड्ढा खोद कर उसको वालुका से आधा भर दें, फिर उस वालुका पर औषध युक्त पारद से भरी हुई मूषा रख दें । मूषाका मुख बन्द कर के ऊपर से उस मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों को जला देना चाहिए, इसको भूधर यंत्र कहते हैं ॥ ४१ ॥

अथ पुटयन्त्रम्—

शरावसम्पुटान्तःस्थं करीषेष्वग्निमानवित् ।
पचेच्चुल्ल्यां द्वियामं वा रसं तत्पुटयन्त्रकम् ॥ ४२ ॥

नवमोऽध्यायः । २५५

नवमोऽध्यायः । २५५

एक सकोरे के अन्दर औषधमिश्रित पारद भर कर उस सकोरे को दूसरे सकोरे के साथ सम्पुट करके कपड़मिट्टी कर सुखा लेवे, फिर उस सम्पुट को उपलों की आँच अथवा चूल्हे पर रखकर यथाप्रमाण के अनुकूल समय तक या दो प्रहर तक पकाना चाहिए । इसको पुटयंत्र कहते हैं ॥ ४२ ॥

अथ कोष्ठीयन्त्रम्—

षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्त्वनिपातार्थं कोष्ठीयन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४३ ॥

सोलह अङ्गुल चौड़ी और एक हाथ भर लम्बी तथा समान आकार की एक मूषा बनवाना चाहिए । इसको कोष्ठीयंत्र कहते हैं । यह यंत्र धातु तथा रत्न इत्यादि के सत्त्वों को निकालने के लिये उत्तम होता है ॥ ४३ ॥

अथ वलभीयन्त्रम्—

यत्र लोहमये पात्रे पार्श्वयोर्वलयद्वयम् ।
तादृक् स्वल्पतरं पात्रं वलयप्रोतकोष्ठकम् ॥ ४४ ॥
पूर्वपात्रोपरि न्यस्य स्वल्पपात्रे परिक्षिपेत् ।
रसं सम्मूर्च्छितं स्थूलपात्रमापूर्य काञ्जिकैः ॥ ४५ ॥
द्वियामं स्वेदयेदेवं रसोत्थापनहेतवे ।
एतत्स्याद्वलभीयन्त्रं रसे षाड्गुण्यकारकम् ॥
सूक्ष्मकान्तमये पात्रे रसः स्याद्गुणवत्तरः ॥ ४६ ॥

एक बड़े आकार का कान्तलौह का पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके भीतर की ओर किनारों से कुछ नीचे दोनों पाश्र्वों में दो कड़े लगवा देना चाहिये । फिर एक दूसरा छोटा पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके बाह्य भाग के बीच में दोनों ओर दो कड़े लगवा देना चाहिए, इस छोटे पात्र को बड़े पात्र के अन्दर रख कर दोनों के कड़ों को परस्पर जञ्जीर से बांध दें । बड़े पात्र में काञ्जी और छोटे पात्र में सम्मूर्च्छित पारद डाल कर ऊपर से ढक देना चाहिये । फिर इस यंत्र को चूल्हे पर चढ़ा कर दो प्रहर तक स्वेदन करते हैं इस तरह के स्वेदन से संमूर्च्छित पारद फिर अपने रूप को प्राप्त हो जाता है । यह वलभीयंत्र कहा जाता है । इससे स्वेदित पारदके अन्दर ६ प्रकारके विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता, क्रिया आदि गुण उत्पन्न होते हैं । साधारण लौहे की अपेक्षा सूक्ष्म कान्तलौह

२५६ रसरत्नसमुच्चये—

के बने हुए पात्रमें रसका स्वेदन करने से वह अधिक गुणों वाला हो जाता है॥४४-४६॥

अथ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—

क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुड्यन्तरे खलु ॥ ४७ ॥
तत्र रुध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥ ४८ ॥
इतरस्मिन्घटे तोयं प्रक्षिपेत्स्वादु शीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥ ४९ ॥

एक मिट्टी के घड़े में रस रखकर उसकी ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घड़े के मध्यभाग में छिद्र बनाकर उसमें प्रविष्ट कर देवें। फिर दोनों घड़ों के मुख तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर देना चाहिए। पश्चात् जिस घड़े में पारद रखा हो उसके नीचे अग्नि जला देवें और दूसरे पात्र के ऊपर शीतल जल डालते रहना चाहिए अथवा इस घड़े में मुखबन्धन के पूर्व ही थोड़ा सा शीतल जल भर देना चाहिए। इस तरह अग्नि के ताप से पूर्व घट से पारद उड़ कर तिर्यक् नली के द्वारा वह दूसरे घट के अन्दर पानी में गिर जाता है। वार्त्तिककारों ने इस यन्त्र को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है ॥ ४७-४९ ॥

अथ पालिकायन्त्रम्—

चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोध्वर्दण्डकम् ।
एतद्धि पालिकायन्त्रं बलिजारणहेतवे ॥ ५० ॥

लोहे का एक गोल चषक (प्याला) बनाकर उसके किनारे के पास ही अग्र-भाग में झुका हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ एक दण्ड लगवा देना चाहिए। इसको पालिकायंत्र कहते हैं। यह यंत्र गन्धक के जारण करने में उपयोगी होता है ॥५०॥

अथ घटयन्त्रम्—

चतुष्प्रस्थजलाधारश्चतुरङ्गुलिकाऽऽननः ।
घटयन्त्रमिदं प्रोक्तं तदाप्यायनकं स्मृतम् ॥ ५१ ॥

एक ऐसा घट लेना चाहिए जिसमें चार प्रस्थ (६४ पल) पानी का समा-

-- नवमोऽध्यायः । २२७ --

वेश हो सके तथा चार अङ्गुल चौड़ा जिसका मुख हो, इस प्रकार के घट को घट-यन्त्र कहते हैं तथा इसका दूसरा नाम आप्यायनक भी है। इस यंत्र के द्वारा रसादिक का तर्पण (प्लावन) करते हैं ॥ ५१ ॥

अथ इष्टिकायन्त्रम्—

विधाय वर्त्तुलं गतं मल्लमात्रं निधाय च ।
विनिधायेष्टकां तत्र मध्यगर्तवतीं शुभाम् ॥ ५२ ॥
गर्तस्य परितः कुर्यात्पालिकामङ्गुलोच्छ्रयाम् ।
गर्ते सूतं विनिक्षिप्य गर्तास्ये वसनं क्षिपेत् ॥ ५३ ॥
निक्षिपेद्गन्धकं तत्र मल्लेनाऽऽस्यं निरुध्य च ।
मल्लपालिकयोर्मध्ये मृदा सम्यङ् निरुध्य च ॥ ५४ ॥
वनोत्पलैः पुटं देयं कपोताख्यं न चाधिकम् ।
इष्टिकायन्त्रमेतत्स्याद्गन्धकं तेन जारयेत् ॥ ५५ ॥

पृथ्वी में एक गोलाकार गड्ढा खोदकर उसमें लोहे का अथवा मिट्टी का १ मजबूत सकोरा रख देवें। फिर उस सकोरे पर बीच में छिद्र की हुई एक इष्टिका (ईंट) रखकर उस इष्टिका के छिद्र के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंचाई वाली पाली (थाला या आलवाल) बना करके उस ईंट के छिद्र में पारद डालकर छिद्र के मुख पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए। उस वस्त्र पर गन्धक बिछा कर एक दूसरे सकोरे से उसका मुख बन्दकर देना चाहिए। ईंट के छिद्र के चारों ओर बनाई हुई पालिका तथा उस पर ढके हुए मल्ल (कटोरी या सकोरा) इन दोनों के बीच के अवकाश को ठीक तरह से कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर जंगली उपलों की आंच से कपोत पुट देना चाहिए, ज्यादा आंच नहीं देना चाहिए। इसको इष्टिकायंत्र कहते हैं। इससे पारद इत्यादि धातुओं के साथ गन्धक का जारण करते हैं ॥५२-५५॥

अथ हिङ्गुलाकृष्टिविद्याधरयन्त्रम्—

स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं सम्यङ् निरुध्य च ।
ऊर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥
एतद्विद्याधरं यन्त्रं हिङ्गुलाकृष्टिकहेतवे ॥ ५६ ॥

एक हण्डिका (जो कि भीतर से चौड़ी हो और जिसके भीतरी भाग में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप किया हुआ होना चाहिए) के ऊपर दूसरी

रस० १७

२५८ रसरत्नसमुच्चये—

-हण्डिका रख कर नीचे की हण्डिका के मुख को ऊपर रखी हुई हण्डिका के पृष्ठ भाग के साथ अच्छी तरह कपड़मिट्टी से बन्द कर के फिर ऊपर की हण्डिका में जल भर देते हैं और चूल्हे पर चढ़ाकर नीचे की हण्डिका को आंच पहुंचाते हैं। इसको विद्याधरयंत्र कहते हैं। इस यंत्र का उपयोग हिंगुल से पारद को निकालने के लिये करते हैं ॥ ५६ ॥

अथ डमरुयन्त्रम्—

यन्त्रस्थाल्युपरि स्थालीं न्युब्जां दत्त्वा निरुन्धयेत्।
यन्त्रं डमरुकाख्यं तद्रसभस्मकृते हितम् ॥ ५७ ॥

एक मिट्टी की हण्डिका लेकर इसके मुख को दूसरी हण्डिका के मुख के साथ सन्धिबन्धन कर देते हैं। इस यंत्र की आकृति डमरू के समान हो जाती है इस लिये इसको डमरूयंत्र कहते हैं। यह डमरूयंत्र पारद की भस्म करने के लिये उपयोगी होता है ॥ ५७ ॥

अथ नाभियन्त्रम्—

मल्लमध्ये चरेद्गर्तं तत्र सूतं सगन्धकम्।
गर्तस्य परितः कुड्यं प्रकुर्यादङ्गुलोच्छ्रितम् ॥ ५८ ॥
ततश्चाऽऽच्छादयेत्सम्यग्गोस्तनाकारमूषया।
सम्यक् तोयमृदा रुद्ध्वा सम्यगत्राच्यमानया ॥ ५९ ॥

एक सकोरे के भीतर गड्ढा बना कर उसमें गन्धक और पारद भर देवे। फिर उस गड्ढे के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंची पाली (अलवाल या मेड़ के समान) बना कर उस पाली को गाय के स्तन की आकृति वाली मूषा से (औंधाकर) ढक करके अच्छी प्रकार बनाई हुई तोयमृत्तिका से अच्छी तरह पाली तथा मूषा की सन्धि या अवकाश को बन्दकर देना चाहिए इसी को नाभियन्त्र कहते हैं ॥ ५८–५९ ॥

तत्र तोयमृल्लक्षणम्—

लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम्।
जीर्णकिट्टरजः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम्।
इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥ ६० ॥

पुराणे लोहकिट्ट के चूर्ण (मण्डूर चूर्ण) को चूना और गुड़ के साथ मिला-

  • नवमोऽध्यायः । २५९

कर इन तीनों को बबूल के क्वाथ से खूब घोटकर लेह के समान बना लेते हैं। इसको जलमृत्तिका कहते हैं। इस मृत्तिका से सन्धिवन्धन करने से जलादिक से यह सन्धि की मिट्टी नहीं छूट सकती है ॥ ६० ॥

तत्र वह्निमृत्स्ना—

खटिकापटुकित्तैश्च महिषीदुग्धमर्दितैः ।
वह्निमृत्स्ना भवेद्घोरवह्नितापसहा खलु ॥ ६१ ॥
एतया मृत्स्नया रुद्धो न गन्तुं क्षमते रसः ।
विदग्धवनिताप्रौढप्रेम्णा रुद्धः पुमानिव ॥ ६२ ॥

खड़िया, निमक और मण्डूर के चूर्ण को भैंस के दुग्ध से अच्छी प्रकार घोटकर वह्निमृत्स्ना बनाई जाती है, यह वह्निमृत्तिका अत्यन्त तेज अग्नि के ताप को सहन कर सकती है। इस मृत्तिका से कपरोटी करके रोका हुआ पारद अत्यन्त तेज आंच लगने पर भी हावभाव कटाक्षादि करने में चतुर नायिका के प्रगाढ प्रेम से रुके हुए पुरुष की तरह कहीं उड़कर नहीं जा सकता है ॥ ६१-६२ ॥

शेषनाभियन्त्रवर्णनम्—

नन्दी नागार्जुनश्चैव ब्रह्मज्योतिर्मुनीश्वरः ।
वेत्ति श्रीसोमदेवश्च नापरः पृथिवीतले ॥ ६३ ॥
ततो जलं विनिक्षिप्य वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
नाभियन्त्रमिदं प्रोक्तं नन्दिना सर्ववेदिना ॥
अनेन जीर्यते सूतो निर्धूमः शुद्धगन्धकः ॥ ६४ ॥

इस यंत्र की विधि को नन्दी, नागार्जुन, ब्रह्मज्योति, मुनीश्वर और सोमदेव ये ही पांचों रस-शास्त्र के आचार्य जानते हैं। इसको इस पृथ्वी में दूसरा कोई नहीं जानता है। फिर इस प्रकार उस यन्त्र को चूल्हे पर चढा कर के आलवाल तथा मूषा के चारों तरफ़ के बचे हुए सकोरे के अवकाश में जलभर के नीचे आग जला देनी चाहिए। सर्व प्रकार की रस की क्रियाओं के ज्ञाता नन्दी ने इसको नाभियंत्र कहा है। इस यंत्र के द्वारा शुद्धगन्धक के साथ पारद का निर्धूम जारण हो जाता है ॥ ६३-६४ ॥

अथ ग्रस्तयन्त्रम्—

मूषां मूषोदराविष्टामारद्यन्तःसमवर्तुलाम् ।

२६० रसरत्नसमुच्चये—

चिपिटां च तले प्रोक्तं ग्रस्तयन्त्रं मनीषिभिः ॥
सूतेन्द्ररन्धनार्थं हि रसविद्भिरुदीरितम् ॥ ६५ ॥

प्रारम्भ से अन्त तक एक समान लम्बी, चौड़ी और गोल तथा तल भाग में कुछ चिपटी हो ऐसी एक मूषा बनवा कर उसमें पारद इत्यादि को भर कर ऐसी ही एक दूसरी मूषा के साथ सन्धिवन्धन कर देना चाहिए। इसको रसशास्त्र के पण्डित ग्रस्तयंत्र कहते हैं। इस यंत्र से पारद का पाक या भस्म करते हैं ॥ ६५ ॥

अथ स्थालीयन्त्रम्—

स्थाल्यां ताम्रादि निक्षिप्य मल्लेनाऽस्यं निरुध्य च ।
पच्यते स्थालिकाधस्तात्स्थालीयन्त्रमिदं स्मृतम् ॥ ६६ ॥

एक मिट्टी की हण्डिका में ताम्र अथवा अन्य धातु भरकर (अम्लरस या क्वाथ के साथ) सकोरे से हण्डिका का मुख कपड़मिट्टी से अच्छी तरह बन्दकर के हण्डिका के नीचे अग्नि जलाते हैं। इसको स्थालीयन्त्र कहते हैं ॥ ६६ ॥

अथ धूपयन्त्रम्—

विधायाष्टाङ्गुलं पात्रं लौहमष्टाङ्गुलोच्छ्रयम् ।
कण्ठाधो द्व्यङ्गुले देशे गलाधारे हि तत्र च ॥ ६७ ॥
तिर्यग्लोहशलाकाश्च तन्वीस्तिर्यग्विनिक्षिपेत् ।
तनूनि स्वर्णपत्राणि तासामुपरि विन्यसेत् ॥ ६८ ॥
पत्राधो निक्षिपेद्धूमं वक्ष्यमाणमिहैव हि ।
तत्पात्रं न्युब्जपात्रेण च्छादयेदपरेण हि ॥ ६९ ॥
मृदा विलिप्य सन्धिञ्च वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
तेन पत्राणि कृत्स्नानि हतान्युक्तविधानतः ॥ ७० ॥
रसश्चरति वेगेन द्रुतं गर्भे द्रवन्ति च ।
गन्धालकशिलानां हि कज्जलया वा मृताहिना ॥ ७१ ॥
धूपनं स्वर्णपत्राणां प्रथमं परिकीर्त्तितम् ।
तारार्थं तारपत्राणि मृतवङ्गेन धूपयेत् ॥ ७२ ॥
धूपयेच्च यथायोग्यैरन्यैरुपयसैरपि ।
धूपयन्त्रमिदं प्रोक्तं जारणाद्रवसाधने ॥ ७३ ॥

आठ अङ्गुल चौड़ा और आठ ही अङ्गुल ऊंचा एक लोह का पात्र बनवा कर

नवमोऽध्यायः । २६१

नवमोऽध्यायः । २६१

उसके कण्ठ के नीचे दो अङ्गुल चौड़े स्थान में एक आधार बनवा कर उस में पतली और तिरच्छी लोहे की शलाकाओं को टेढ़ी रख देनी चाहिए । फिर उन शलाकाओं के ऊपर छोटे २ कण्टक वेध्य सोने के पत्र रखकर प्रथम पत्रों के नीचे गन्धक हरताल आदि की कज्जली लौहपात्र में डालकर उसपात्र को एक दूसरे नीचे मुखवाले पात्र से ढककर कपड़मिट्टी (या जलमृत्तिका) से सन्धिबन्धन करके चूल्हे पर चढ़ा कर नीचे आग जलाना चाहिए । इस तरह पात्र में रखी हुई कजली के धूम से सोने के पत्र काले पड़ जाते हैं तथा मृत भी हो जाते हैं । इस तरह से मृत सुवर्णपत्रों को पारद तुरन्त ही भक्षण कर जाता है और वे भक्षण किये हुए पत्र पारद में शीघ्र हो द्रुत हो जाते है । गन्धक, हरताल, मनःशिला, इनकी कज्जली से अथवा मृतनाग से स्वर्णपत्रों को प्रथम धूपित करना चाहिए । चांदी के पत्रों को धूपित करने के लिये उन पत्रों को मृतवङ्ग से धूपित करना चाहिए । अन्य यथायोग्य उपरसों से भी तारपत्रों को धूपित करते हैं । (जिस वस्तु से पत्रों को धूपित करना हो उस वस्तु की कजली बनाकर पत्रों के नीचे लोह पात्र में रख देनी चाहिए) इसको धूपयन्त्र कहते हैं । इस यंत्र को जारण करने योग्य द्रव्यों कि सिद्धि करने के लिये प्रयुक्त करते है ॥ ६७-७३ ॥

अथ कन्दुकयन्त्रम्—

स्थूलस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा वासो बध्वा मुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य तन्मुखं प्रपिधाय च ॥ ७४ ॥
अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यन्त्रं तत्कन्दुकाभिधम् ।
स्वेदनीयन्त्रमित्यन्ये प्राहुश्छेदं मनीषिणः ॥ ७५ ॥

एक बड़े मिट्टी के भाण्ड में जल अथवा किसी औषधि का स्वरस अथवा क्वाथ भर कर उस का मुख एक मजबूत वस्त्र से बांध कर उस वस्त्र पर स्वेदन करने की वस्तु रख कर उस भाण्ड के मुख को सकोरे द्वारा ढक कर कपड़मिट्टी से बन्द कर देवें । फिर चूल्हे पर चढ़ा कर नीचे अग्नि जलानी चाहिए । इस को कन्दुकयन्त्र कहते हैं । अन्य रस शास्त्र के पण्डितों ने इस को स्वेदनीयन्त्र भी कहा है ॥ ७४-७५ ॥

अथ प्रकारान्तरम्—

यद्वा स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा तृणं क्षिप्त्वा मुखोपरि ।
स्वेद्यद्रव्यं परिक्षिप्य पिधानं प्रविधाय च ।

१६२रसरत्नसमुच्चये—

अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यन्त्रं तत्कन्दुकं स्मृतम् ॥ ७६ ॥

अथवा भाण्ड के भीतर जलादिक भर करके मुख पर वस्त्र नहीं लगा कर तृण ( घास फूस ) भर देते हैं और उन तृणों पर स्वेदत करने योग्य वस्तु को रख कर सकोरे से मुख बन्द करके कपड़ मिट्टी से सन्धि बन्धन कर देते हैं तथा नीचे अग्नि जला देते हैं। इसको भी कन्दुक यन्त्र कहते हैं ॥ ७६ ॥

अथ खल्लयन्त्रम्—

खल्लयोग्या शिला नीला श्यामा स्निग्धा दृढा गुरुः ।
षोडशाङ्गुलकोत्सेधा नवाङ्गुलकविस्तरा ॥ ७७ ॥
चतुर्विंशाङ्गुला दीर्घा घर्षणी द्वादशाङ्गुला ।
विंशत्यङ्गुलदीर्घा वा स्यादुत्सेधे दशाङ्गुला ॥
खल्लप्रमाणं तज्ज्ञेयं श्रेष्ठं स्याद्रसकर्मणि ॥ ७८ ॥

खरल बनाने के लिये नीली अथवा कालेरंग की चिकनी, मजबूत ओर भारी शिला ( पत्थर ) लेनी चाहिए। ऐसी शिला से १६ अङ्गुल ऊंची, ९ अङ्गुल चौड़ी और २४ अङ्गुल लम्बी खरल तथा उसमें घोटने की १२ अङ्गुल लम्बी घर्षणी बनवानी चाहिए। अथवा १० अङ्गुल ऊंची और २० अङ्गुल लम्बी खरल बनवाना चाहिए। इस तरह का खरल की लम्बाई चौड़ाई का प्रमाण पारद आदि के शोधन मर्दन संस्कारों के लिये ठीक होता है ॥ ७७-७८ ॥

अथ खल्लयन्त्रस्य त्रैविध्यनिर्देशः—

खल्लयन्त्रं त्रिधा प्रोक्तं रसादिसुखमर्दने ॥ ७९ ॥

रस आदि पदार्थों को अच्छी तरह सुखपूर्वक घोटने के लिये ३ प्रकार के खल्ल यन्त्र कहे गये हैं ॥ ७९ ॥

द्विविधखल्लयोः सामान्यलक्षणम् ।

निरुद्गारौ सुमसृणौ कार्यों पुत्रिकया युतौ ॥ ८० ॥

उनमें से दो प्रकार की खरलें स्पर्श में स्निग्ध तथा उनमें रखी हुई वस्तु घोटने से बाहर न गिर सकें, ऐसी होनी चाहिएं। साथ में घोटने की घर्षणी ( बत्था ) भी चिकनी और योग्य प्रमाण की होनी चाहिए ॥ ८० ॥

अर्धचन्द्राकृतिकखल्लनिर्देशः—

उत्सेधे स दशाङ्गुलः खलु कलातुल्याङ्गुलायामवान्
विस्तारेण दशाङ्गुलो मुनिमितैर्निम्नस्तथैवाङ्गुलैः ।

नवमोऽध्यायः । २६३

पाल्यां द्व्यङ्गुलविस्तरश्च मसृणोऽतीवार्द्धचन्द्रोपमो
घर्षो द्वादशकाङ्गुलश्च तदयं खल्लो मतः सिद्धये ॥ ८१ ॥
अस्मिन्पञ्चपलः सूतो मर्दनीयो विशुद्धये ।
तत्तदौचित्ययोगेन खल्लेष्वन्येषु योजयेत् ॥ ८२ ॥

१० अङ्गुल ऊंची, १६ अङ्गुल लम्बो, १० अंगुल चौड़ो और ७ अङ्गुल गहरी तथा किनारों की बनावट दो अङ्गुल चौड़ी और अर्ध चन्द्र के आकार की चिकनी खरल बनवावे तथा उसकी घर्षणी (मूसली) १२ अङ्गुल की बनवाना चाहिए। इस खरल को अर्धचन्द्र खरल कहते हैं। यह खरल रसादिकों की सिद्धि के लिये उत्तम है। इस खरल में शुद्धि के लिये ५ पल (२० तो०) पारद डालकर घोटना चाहिए। इसी तरह पारद की मात्रा के अनुसार छोटे या बड़े खरल बनवा कर उनमें योग्य मात्रानुसार पारद घोटना चाहिए ॥ ८१-८२ ॥

वर्तुलखलनिर्देशः ।

द्वादशाङ्गुलविस्तारः खल्लोऽतिमसृणोपलः ।
चतुरङ्गुलनिम्नश्च मध्येऽतिमसृणीकृतः ॥ ८३ ॥
मर्दकश्चिपिटोऽधस्तात्सुग्राह्यश्च शिखोपरि ।
अयं तु वर्तुलः खल्लो मर्दनेऽतिसुखप्रदः ॥ ८४ ॥

१२ अंगुल लम्बी और चौड़ी तथा ४ अंगुल गहरी, अत्यन्त चिकने पत्थर की और विशेष कर बीच के भाग में अत्यन्त चिकनी खरल बनवानी चाहिए तथा उसकी घर्षणी (मूसली) नीचे से चिपटी और ऊपर के भाग में उत्तम प्रकार से पकड़ने योग्य होनी चाहिए। इस को वर्तुलखल्ल कहते हैं। रसादिकों के घोटने में यह अत्यन्त उत्तम है ॥ ८३-८४ ॥

अथ तप्तखलप्रमाणनिर्देशः—

लौहो नवाङ्गुलः खल्लो निम्नत्वे च षडङ्गुलः ।
मर्दकोऽष्टाङ्गुलश्चैव तप्तखल्लाभिधोऽप्ययम् ॥ ८५ ॥

९ अङ्गुल लम्बी चौड़ी, ६ अङ्गुल गहरी लोहे की खरल और उसकी घर्षणी ८ अङ्गुल की बनवानी चाहिए। इसको तप्तखल्ल कहते हैं ॥ ८५ ॥

अथ तप्तखलविधिः—

कृत्वा खल्लाकृतिं चुल्ली मङ्गारैः परिपूरिताम् ।