संग्रह पर लौटें




















रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
DevanagariHindipublished362 पृष्ठ
पृष्ठ 37स्थायी लिंक
[ १९ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| प्राणनाथरसः | ४३० | वातार्शोलक्षणम् | ४५२ |
| वज्ररसः | ४३१ | अर्शःकुठाररसः | ४५३ |
| महावीररसः | ४३३ | पित्तार्शोहररसः | ४५४ |
| अरुचिस्तस्या निदानम् | ४३५ | सर्व्वलोकाश्रयरसः | ४५५ |
| अरुचेः सलक्षणभेदाः | ,, | अर्शोघ्नवटकम् | ४५६ |
| अरुचि-चिकित्सा | ,, | अर्शोघ्नी वटिका | ४५७ |
| यवानीखाण्डवचूर्णम् | ,, | मूलकुठाररसः | ४५८ |
| छर्द्दिरोगः | ४३६ | महोदयप्रत्ययसाररसः | ४६१ |
| वान्तिचिकित्सायां मातुलुङ्गादि योगः- | ४३७ | कनकसुन्दररसः | ४६२ |
| रजन्यादियोगः | ,, | भर्कैशः | ४६४ |
| सुगन्धालककयोगौ | ४३८ | तीक्ष्णमुखरसः | ४६६ |
| हृदयरोगः | ४३८ | अर्शःकुठाररसः | ४६७ |
| हृदयरोग-चिकित्सा | ,, | त्रैलोक्यतिलकरसः | ४६८ |
| दशमूलादिक्वाथः | ,, | सामान्योपचाराः | ४७२ |
| ककुभाद्यं चूर्णम् | ,, | वचादिमोदकः | ,, |
| हृदयार्णवोरसः | ४४० | लौहादिचूर्णम् | ,, |
| नागार्जुनाभ्रम् | ,, | श्लेष्मार्शसि औषधविशेषनिर्देशः | ४७३ |
| पञ्चाननरसः | ४४१ | अर्शोहरयोगः | ,, |
| तृष्णारोगः | ,, | देवदाल्दादिलेपः | ,, |
| तृष्णाहररसः | ४४२ | अर्शःकुठारलेपः | ४७४ |
| मदात्ययरोगः | ,, | अर्शोघ्नशौचः | ,, |
| राजावर्त्तरसः | ४४४ | दुर्नामहरलेपः | ,, |
| द्वितीयराजावर्त्तरसः | ,, | अर्शोघ्नीवर्तिः | ,, |
| भैरवनाथी पञ्चामृतपर्पटी | ४४५ | अर्कक्षीरादिलेपः | ४७५ |
| पञ्चदशोऽध्यायः। | ४५० | शिग्रुमूलादिलेपः | ,, |
| अर्शः | ,, | षोडशोऽध्यायः। | ४७६ |
| पित्तार्शोलक्षणम् | ४५१ | उदावर्त्तः | ,, |
पृष्ठ 38स्थायी लिंक
[ २० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| उदावर्त्तहरघृतम् | ४७७ | सामान्योपायाः | ५०४ |
| अतिसारः | ४७९ | वह्यादिचूर्णम् | ,, |
| दर्दुररसः | ४८० | दग्धशम्बूकादियोगः | ,, |
| द्वितीयदर्दुररसः | ४८१ | अन्योपायः | ५०५ |
| आनन्दभैरवरसः | ,, | अजीर्णम् | ,, |
| सुधासाररसः | ४८२ | अजीर्णकण्टकरसः | ५०६ |
| रसोत्तमः | ४८४ | विध्वंसरसः | ,, |
| स्वेदनीयन्त्रलक्षणम् | ४८५ | विसूचीविजयरसः | ५०७ |
| लोकेश्वररसः | ,, | अग्निकुमाररसः | ,, |
| लोकनाथरसः | ४८६ | वडवाग्निरसः | ५०८ |
| नागसुन्दररसः | ,, | वैश्वानरपोटलीरसः | ५०९ |
| षणिष्कतैलम् | ४८८ | चराचरवटी लक्षणम् | ५१० |
| सङ्ग्रहणी | ४८६ | श्रेष्ठमध्यमाधमवराटिकायालक्षणम् | ५११ |
| वज्रकपाटरसः | ,, | पुंवराटलक्षणं तस्य दोषाश्च | ,, |
| अग्निकुमाररसः | ४९० | वडवामुखी गुटी | ,, |
| कनकसुन्दररसः | ४९१ | क्रव्यादरसः | ५१२ |
| ग्रहणीहररसः | ४९२ | राजशेखरवटी | ५१४ |
| चण्डसङ्ग्रहगदैककपाटरसः | ,, | अग्निकुमाररसः | ५१५ |
| लघुसिद्धाभ्रकरसः | ४९३ | अमृतवटी | ५१६ |
| सर्वरोगरसः | ४९४ | राक्षसनामारसः | ५१७ |
| ग्रहणीगजकेसरीरसः | ४९७ | जीवननामारसः | ५१८ |
| शीघ्रप्रभावरसः | ४९९ | वडवानलरसः | ५१९ |
| पोट्टलीरसः | ५०० | अग्निजननीवटी | ५२० |
| वह्निज्वालावटोरसः | ५०१ | सर्वरोगान्तका वटी | ,, |
| वज्रधररसः | ५०२ | सामान्योपायः | ५२१ |
| ग्रहणीकपाटरसः | ,, | सप्तदशोऽध्यायः । | |
| सौवर्चलादिचूर्णम् | ५०३ | मूत्रकृच्छ्राश्मर्यादिचिकित्सनम् | ५२३ |
| मुस्तादिचूर्णम् | ५०४ |
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[ २१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पाषाणभेदीरसः | ५२६ | सञ्जीवन रसः | ५५१ |
| द्वितीयपाषाणभेदीरसः | ५२७ | मेहमर्दनरसः | ५५२ |
| गोक्षुरादिचूर्णम् | ५२८ | रामबाणरसः | ५५३ |
| त्रिविक्रमरसः | ,, | राजमृगाङ्करसः | ५५५ |
| आनन्दभैरवी वटी | ५२९ | मेहहररसः | ५५७ |
| अश्मरीहरयोगः | , | उदयभास्कररसः | ५५८ |
| यवक्षारप्रयोगः | ५३० | हिमांशुरसः | ५६० |
| हरिद्राप्रयोगः | ,, | वसन्तकुसुमाकररसः | ५६१ |
| शिवोक्तयोगः | ,, | सर्वमेहान्तकरसः | ५६३ |
| लघुलोकेश्वररसः | , | मेहारिरसः | ,, |
| सामान्योपायः | ५३१ | मेहबद्धरसः | ५६६ |
| गोक्षुरप्रयोगः | ,, | हरिशङ्कररसः | ,, |
| पाण्डूरादियोगः | ,, | वङ्गेश्वरो रसः | ५६७ |
| शुक्लपिण्याकादियोगः | ५३२ | गुडमार्कण्डी | ,, |
| मूत्रकृच्छ्रान्तको रसः | ,, | ताम्रयोगः | ५६८ |
| विदार्यादिकषायः | ,, | रक्तमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| क्षारप्रयोगः | ५३३ | शुक्रमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| प्रमेहः | ,, | मधुमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| चन्द्रप्रभावटी | ५३९ | शाल्मलिप्रयोगः | ५६९ |
| प्रमेहगजसिंहरसः | ५४० | रक्तमेहे बोलबद्धरसोपदेशः | ,, |
| महाविद्यागुटी | ५४१ | श्लेष्मातकक्वाथः | ,, |
| मेहध्वान्तविवस्वान् रसः | ५४२ | कुष्माण्डस्वरसप्रयोगः | ,, |
| उमाशम्भुरसः | ५४४ | स्त्रीणांरक्तस्रावे तौवरयोगः | ५७० |
| रसेन्द्रनागरसः | ५४६ | मेहकुठारो रसः | ,, |
| अष्टादशोऽध्यायः । | |||
| मेहशत्रुरसः | ५४७ | विद्रधिः | ५७१ |
| कासीसबद्धरसः | ५४८ | सर्वेश्वरपोटलीरसः | ५७२ |
| भोमपराक्रमरसः | ५५० |
पृष्ठ 40स्थायी लिंक
[ २२ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सर्वामयहरो रसः | ५७५ | देवदार्वादिचूर्णम् | ५९३ |
| वरुणकषायः | ५७७ | देवदालीपञ्चाङ्गचूर्णम् | ,, |
| शोभाञ्जनादिक्वाथः | ,, | तक्रासवः | ,, |
| वृद्धिचिकित्सा | ५७८ | एरण्डक्षारम् | ५९४ |
| वातारिरसः | ,, | शरपुङ्खादियोगः | ५९५ |
| सामान्योपायः | ५७९ | वज्रक्षारप्रयोगः | ,, |
| दार्वीप्रयोगः | ,, | काञ्चनीप्रयोगः | ,, |
| वातारिरसस्य प्रयोगोपदेशः | ,, | प्लीहिरक्तमोक्षणोपदेशः | ,, |
| तैलाईर्द्रकप्रयोगः | ५८० | शूलचिकित्सा | ५९६ |
| आन्त्रवृद्धौ पानीयतैलम् | ,, | अग्निमुखरसः | ,, |
| आन्त्रवृद्धौ पानीयतैलान्तरघृतञ्च | ,, | त्रिनेत्ररसः | ५९८ |
| अन्त्रवृद्धौ मांसरसः | ५८१ | सौभाग्ययोगः | ५९९ |
| अन्त्रवृद्धौ द्वितीयमांसरसः | ,, | चिन्तामणिरसः | ,, |
| गुल्मः | ५८२ | शूलकेसरीरसः | ६०० |
| गन्धकादिपोट्टलीरसः | ,, | मृतोत्थापनरसः | ६०१ |
| गन्धकादिपोट्टल्याः प्रयोगान्तरम् | ५८३ | क्षारताम्ररसः | ६०३ |
| वज्रेश्वररसः | ५८४ | शूलान्तकरः | ६०४ |
| शिखिवाडवरसः | ५८५ | द्वितीयोऽग्निमुखरसः | ६०५ |
| दीप्तामररसः | ५८६ | द्वितीयत्रिनेत्ररसः | ६०६ |
| विद्याधररसः | ,, | उदयभास्कररसः | ६०७ |
| रक्तोदरकुठाररसः | ५८७ | शूलगजकेसरीरसः | ६०८ |
| वैश्वानररसः | ५८८ | द्वितीयक्षारताम्रम् | ६०९ |
| अग्निकुमाररसः | ५८९ | ताम्राष्टकम् | ६१० |
| सर्वाङ्गसुन्दररसः | ,, | वडवानलगुटिका | ,, |
| गुल्मनाशनरसः | ५९२ | अग्निकुमाररसः | ६११ |
| सामान्योपायः | ५९३ | शूलहरक्षारः | ६१३ |
| तिलकक्वाथः | ,, | क्षारवटी | ६१४ |
पृष्ठ 41स्थायी लिंक
$$[ \text{ २३ } ]$$
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सामान्योपायः | ६१४ | वातोदरलक्षणम् | ६३२ |
| शम्बूकादिलौहम् | ,, | उदरघ्नरसः | ६३३ |
| अथेन्द्रवारुणिकादिचूर्णम् | ६१५ | विनोदविद्याधररसः | ,, |
| भूदार्वादियोगः | ,, | सुरेचनकररसः | ६३४ |
| सद्यःशूलहरोयोगः | ,, | मृत्युञ्जयरसः | ,, |
| सद्यःशूलहरयोगद्वयम् | ६१६ | उदरे विरेचनविधिः | ६३६ |
| कार्श्य-चिकित्सा | ,, | त्रैलोक्यसुन्दररसः | ,, |
| अमृतार्णवरसः | ,, | महावह्निरसः | ६३७ |
| पूर्णचन्द्ररसः | ६१७ | गुडनागरप्रयोगः | ६३८ |
| स्थौल्यचिकित्सा | ६१८ | वैश्वानररसः | ,, |
| वडवाग्निमुखरसः | ,, | उदयमार्त्तण्डरसः | ६३९ |
| स्थौल्ये पूर्वकृत्यनिर्देशः | ,, | सूर्यप्रभागुटिका | ६४० |
| मध्वार्द्रकप्रयोगः | ,, | वज्रक्षारम् | ,, |
| अग्निकुमाररसः | ,, | सामान्योपायाः | ६४२ |
| अम्लपित्त-चिकित्सा | ६२३ | खदिरादियोगः | ,, |
| तत्रादौ अम्लपित्तलक्षणम् | ,, | पिप्पलीप्रयोगः | ,, |
| लीलाविलासरसः | ,, | पाण्डुरोगः | ६४३ |
| ताम्रद्रुतिरसः | ६२५ | हंसमण्डूरः | ,, |
| कुष्माण्डखण्डलेहः | ६२७ | कालविध्वंसनरसः | ६४४ |
| सामान्योपायः | ६२८ | पञ्चाननरसः | ६४६ |
| वमनयोगः | ,, | आरोग्यसागररसः | ६४८ |
| विरेचनयोगः | ६२९ | पाण्डुपङ्कशोषणरसः | ६५० |
| पित्तरोग-चिकित्सा | ,, | पित्तपाण्ड्वरिरसः | ,, |
| पित्तान्तरसः | ,, | त्रैलोक्यसुन्दररसः | ६५१ |
| दशसारचूर्णम् | ६३० | त्रिनेत्राख्यरसप्रयोगः | ,, |
| एकोनविंशोऽध्यायः । | जयपालरसः | ,, | |
| उदरादिचिकित्सा | ६३१ | देवदालीचूर्णम् | ६५२ |
| जलोदरलक्षणम् | ,, |
पृष्ठ 42स्थायी लिंक
[ २४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पाण्डुहारीहरीतकी | ६५० | कुष्ठजिद्रसः | ६६९ |
| विजयावटिका | ६५३ | तालेश्वररसः | ,, |
| टङ्कणादियोगः | ६५४ | महातालेश्वररसः | ६७१ |
| कामला | ,, | ककनसुन्दररसः | ६७२ |
| कामलाप्रणुद्रसः | ,, | हरिबोलाङ्कुशरसः | ६७३ |
| त्रयोनिरसः | ६५५ | त्रिपुरान्तकरसः | ,, |
| कामेश्वररसः | ६५६ | विश्वहितरसः | ६७४ |
| सिन्दूरभूषणरसः | ६५७ | व्योषादिगुटिका | ६७५ |
| सुधापञ्चकरसः | ६५८ | कुष्ठकुठाररसः | ६७६ |
| मुस्तादिचूर्णम् | ,, | वज्रशेखररसः | ६७७ |
| सामान्योपायः | ६५९ | दद्रुकुष्ठविद्रावणरसः | ६७९ |
| विंशोऽध्यायः । | माणिक्यतिलकरसः | ,, | |
| विसर्पजिद्रसः | ६६० | परहितरसः | ६८० |
| विसर्पनाशनतैलम् | ६६१ | तालकेश्वररसः | ६८२ |
| विसर्पहरतैलम् | ,, | खगेश्वररसः | ६८४ |
| कुष्ठरोगः | ६६२ | कुष्ठनाशनरसः | ६८५ |
| गलत्कुष्ठलक्षणम् | ,, | आरोग्यवर्धिनी गुटिका | ,, |
| श्वित्रकुष्ठलक्षणं भेदाश्च | ,, | नारायणरसः | ६८७ |
| वातकुष्ठहररसः | ६६३ | मेदिनीसाररसः | ६८८ |
| पित्तकुष्ठहररसः | ,, | जन्तुघ्नीगुटिका | ६९० |
| कफकुष्ठहररसः | ६६४ | धन्वन्तरिरसः | ६९१ |
| सन्निपातकुष्ठहररसः | ,, | वज्रधाररसः | ६९२ |
| विजयरसः | ६६५ | महातालेश्वररसः | ,, |
| सर्वेश्वररसः | ६६६ | कुष्ठकुठाररसः | ६९४ |
| सप्तकुष्ठारिरसः | ६६७ | स्वर्णक्षीररसः | ६९५ |
| प्रतापलङ्केश्वरः | ६६८ | त्रैलोक्यविजयतैलम् | ६९६ |
| कुष्ठनाशनरसः | ,, | कुष्ठान्तपर्पटीरसः | ,, |
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[ २५ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| कासीसबद्धरसः | ६९७ | श्वेतकुष्ठहरचूर्णम् | ७१४ |
| सर्वेश्वररसः | ६९८ | सामान्योपायः | ७१५ |
| योगराजगुग्गुलुप्रयोगोपदेशः | ६९९ | सिध्मेगन्धपाषाणलेपः | ” |
| श्वित्रारिरसः | ” | सिध्मे वराटिकालेपः | ” |
| चन्द्रप्रभावटिका | ७०० | दद्रुकुष्ठे मयूरक्षारादिलेपः | ७१६ |
| किलासनाशनरसः | ७०१ | चर्मकुष्ठे पर्पटरसप्रयोगविधिः | ” |
| उदयादित्यरसः | ” | मेघनादाद्युद्वर्त्तनम् | ” |
| अल्पश्वित्रे शिलादिलेपः | ७०३ | निर्गुण्ड्यादिप्रलेपः | ७१७ |
| अङ्कोलतैलादिलेपद्वयम् | ” | गुञ्जाद्युद्वर्त्तनम् | ” |
| श्वित्रान्तकरसः | ७०४ | काञ्चन्यादिप्रयोगः | ७१८ |
| श्वेतारियोगः | ७०५ | कुमार्यादिलेपः | ” |
| कृष्णीकरणयोगः | ” | महामुण्डीलेपः | ” |
| श्वित्रकुष्ठारिरसः | ७०६ | कण्डूव्रणादिहरः शिलादिप्रलेपः | ” |
| स्नुह्यादितैलम् | ” | गन्धकादिप्रयोगः | ७१९ |
| आरग्वधादितैलम् | ” | कुष्ठविध्वंसनो लेपः | ” |
| गन्धपिष्टीतैलम् | ७०७ | कृमिचिकित्सा | ७२० |
| सर्वकुष्ठान्तकृत्तैलम् | ७०८ | कृमिलक्षणम् | ” |
| कुष्ठविद्रावणतैलम् | ” | अग्नितुण्डरसः | ” |
| वज्रतैलम् | ७०९ | कृमिज्वरे आखुपर्णीप्रयोगः | ७२१ |
| महाभल्लाततैलम् | ७१० | क्रिमौ पर्पटीप्रयोगोपदेशः | ” |
| महामार्त्तण्डतैलम् | ” | कीटमर्दनरसः | ” |
| श्वित्रारितैलम् | ७१२ | कृमिघ्नरसः | ७२२ |
| कुष्ठारितैलम् | ” | क्रिमिहररसः | ” |
| कुष्ठामयघ्नगणः | ७१३ | कृमिशूलहरो रसः | ७२३ |
| महानिम्बादिचूर्णम् | ” | सूतभस्मप्रयोगः | ” |
| सर्वकुष्ठाङ्कुशचूर्णम् | ७१४ | एकविंशोऽध्यायः। | |
| श्वित्रनाशनचूर्णम् | ” | अष्टो महारोगाः | ७२४ |
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[ २६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शीतवातलक्षणम् | ७२४ | रक्तवातेऽपथ्यम् | ७३६ |
| वातारिरसः | ७२५ | आमवातः | ” |
| विजयागुटिकाप्रयोगोपदेशः | ” | आमवातेवातारिरसप्रयोगोपदेशः | ” |
| शीतारिरसः | ७२६ | अनिलारियोगः | ७३७ |
| स्पर्शवातः | ” | आमवातेऽरण्डतैलप्रशंसा | ” |
| सर्वेश्वररसः | ७२७ | अपस्मारः | ” |
| अर्केश्वररसः | ७२८ | पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ७३८ |
| स्पर्शवातघ्नरसः | ” | ब्राह्म्यादिनस्यम् | ” |
| गन्धाश्मगर्भरसः | ७२९ | गवाक्ष्यादिनस्यम् | ” |
| द्वितीयगन्धाश्मगर्भरसः | ७३० | श्वेतापराजितादिनस्यम् | ७३९ |
| स्पर्शवातारिरसः | ७३१ | अपस्मारहरनस्यम् | ” |
| स्पर्शवातान्तकृद्वटी | ” | अपस्मारहरो योगः | ” |
| स्पर्शवातारितैलम् | ७३२ | उन्मादः | ७४० |
| स्पर्शवाते राजवृक्षप्रयोगः | ७३३ | माहेश्वरधूपः | ” |
| स्पर्शवाते चक्रमर्दादिः | ” | उन्मादे पर्पटीरसप्रयोगोपदेशः | ७४१ |
| अस्पर्शवाते त्रिगन्धप्रयोगः | ७३४ | उन्मादे उपचारविशेषाः | ” |
| अस्पर्शवाते हियावलीप्रयोगः | ” | एकाङ्गवातः | ७४२ |
| यवानीघृतम् | ” | वडवानलरसः | ” |
| स्पर्शान्तकरोऽर्कदुग्धप्रयोगः | ” | मार्त्तण्डेश्वररसः | ७४३ |
| स्पर्शान्तको हल्यादियोगः | ७३५ | चतुःसुधारसः | ७४५ |
| स्पर्शवाते रसेन्द्रलेपः | ” | सर्ववातारिरसः | ७४७ |
| रक्तवात-चिकित्सा | ” | वातविध्वंसनरसः | ७४९ |
| रक्तवातलक्षणम् | ” | वृकोदरगुटिका | ७५१ |
| सामान्योपायाः | ” | प्रभावती वटी | ७५२ |
| त्रियोनिरसप्रयोगः | ” | स्वच्छन्दभैरवरसः | ७५३ |
| कोकिलाक्षादिकषायः | ७३६ | स्वच्छन्दभैरवरसः | ७५४ |
| संशोधनोपदेशः | ” | वडवानलरसः | ” |
पृष्ठ 45स्थायी लिंक
[ २७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| त्र्यम्बकेश्वररसः | ७५५ | अमृतप्राशचूर्णम | ७६८ |
| गगनगर्भा वटी | ७५६ | ऐलेयकतैलम् | ७७० |
| वातगजाङ्कुशरसः | ” | ऐलेयसर्पिः | ७७१ |
| शतावरी गुग्गुलुः | ७५७ | ऐलेयकप्रयोगः | ७७२ |
| योगराज गुग्गुलुः | ७५८ | द्वाविंशोऽध्यायः । | |
| द्वितीयो योगराजगुग्गुलुः | ७६० | वन्ध्यादिचिकित्सा | ७७३ |
| षडङ्गगुग्गुलुः | ७६१ | वन्ध्यादोषभेदादिकथनम् | ” |
| विजयभैरवतैलम् | ७६२ | जयसुन्दररसः | ७७५ |
| द्वितीयविजयभैरवतैलम् | ” | रत्नभागोत्तररसः | ७७७ |
| सूततैलम् | ७६३ | चक्रिकावन्चरसः | ७७८ |
| एरण्डतैलत्रिफलादिसिद्धघृतवानन्द-भैरवोपदेशश्च | ७६४<br>” | वर्धमानरसः | ७८० |
| सामान्योपायाः | ” | द्रुतिसाररसः | ७८३ |
| पर्पटरसप्रयोगविधिः | ” | सामान्योपायाः | ७८५ |
| सर्जतैलम् | ७६५ | देवदालीप्रयोगः | ” |
| एकाङ्गवाते पर्पटीरसप्रयोगविध्यन्तरम् | ”<br>” | शरपुङ्खाप्रयोगः | ७८६ |
| धूमसारादिषडङ्गप्रयोगः | ” | रुद्राक्षादिप्रयोगः | ” |
| निर्गुण्डीप्रयोगः | ७६६ | श्वेतकण्टकारीप्रयोगः | ” |
| रक्तैरण्डप्रयोगः | ” | विष्णुक्रान्ताप्रयोगः | ७८७ |
| इन्द्रवारुणीप्रयोगः | ” | अश्वगन्धाप्रयोगः | ७८८ |
| सर्वाङ्गैकाङ्गवातारिरसः | ” | शिवोक्ततान्त्रिकप्रयोगः | ” |
| वातरक्तः | ७६७ | मृतवत्सालक्षणम् | ” |
| अधिकारान्तरोक्तौषधप्रयोगोपदेशः | ” | शङ्खरोक्तदेवव्यपाश्रयचिकित्सा | ” |
| वातरक्तादिसर्वरोगे सर्वेश्वरी पर्पटी | ” | युक्तिव्यपाश्रये वन्ध्याकर्कटकीप्रयोगः | ७९१ |
| पित्तरोग-चिकित्सा | ” | गर्भिणीरोगः | ” |
| चन्द्रावलेहः | ” | गर्भिणीरोगापनयन-गर्भपोषण-सामान्योपायाः | ” |
पृष्ठ 46स्थायी लिंक
[ २८ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| प्रथममासे पद्माकादिकल्कः | ७९१ | गर्भिण्या वातरोगे बालबिल्वादिसाधितक्षीरप्रयोगः | ७९७ |
| द्वितीयमासे नीलोत्पलादिकल्कः | ,, | गर्भिण्या मूत्ररोगे श्वदंष्ट्रादिकषायः | ,, |
| तृतीयमासे श्रीखण्डादिकल्कः | ७९२ | गर्भिण्या मासानुमासिकयोगः | ,, |
| तृतीयमासे नीलोत्पलादिकल्कान्तरम् | ,, | मूढगर्भचिकित्सा | ८०० |
| गर्भिणीज्वरहरः पाठादिकषायः | ,, | अन्तर्मृतापत्याया लक्षणम् | ,, |
| गर्भिणीज्वरहरश्छिन्नादिकषायः | ७९३ | मूढगर्भाया असाध्यलक्षणम् | ,, |
| गर्भिणीज्वरहरः पयस्यादिकषायः | ,, | गर्भप्रसवसामान्योपायाः | ८०१ |
| गर्भिणीज्वरहानिः | ७९४ | तत्र करञ्जबीजादिप्रलेप अहिन्निर्मोकस्नुहीक्षीरौ च | ,, |
| गर्भिण्यतीसारहरो वृक्षकत्वगादिकषायः | ,, | हलिनीप्रयोगः | ,, |
| गर्भिण्यतिसारहरौ श्रीपर्ण्यादिबलादिक्वाथौ | ,, | यष्टिकादिकल्कः | ,, |
| गर्भिण्युदावर्त्तादिहरः पुनर्नवादिकषायः | ,, | लाङ्गल्यादिलेपः | ८०२ |
| गर्भिण्याः शोथहरोऽपायः | ७९५ | मातुलुङ्गीरम्भाप्रयोगौ | ,, |
| गर्भिणीशोथहरः पुनर्नवादिलेपः | ,, | सिद्धार्थादिवस्तिः | ,, |
| गर्भिण्युदावर्त्तादिहरोवर्षाभूक्वाथः | ,, | सिद्धार्थकानुवासनम् | ,, |
| गर्भिण्याः पित्तार्त्तिहरोयष्टिकादिक्वाथः | ,, | सूतिका-चिकित्सा | ८०३ |
| गर्भिण्याः श्वासकासहरस्तिक्तकादिकषायः | ७९६ | पर्पटीरसः | ,, |
| गर्भिणीकासे मरिचप्रयोगः | ,, | सूतिकारोगनाशनरसः | ,, |
| गर्भिण्या वान्तौ लाजादिकषायः | ,, | सौभाग्यशुण्ठी | ,, |
| गर्भिण्या हिक्कायां बालबिल्वादिक्वाथः | ,, | सामान्योपायाः | ८०५ |
| गर्भिण्या अग्निमान्द्ये अजमोदादिचूर्णम् | ,, | तत्रादौ कौरण्टकादिक्वाथः | ,, |
| पञ्चमूलक्वाथः | ,, | ||
| भूनिम्बादितैलम् | ,, | ||
| योनिव्यापच्चिकित्सा | ८०६ | ||
| योनिशूलहरोनिर्गुण्ड्यादिप्रयोगः | ,, | ||
| प्रधंसिन्यां कारलीकन्दप्रयोगः | ,, |
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[ २९ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शिथिलयोनौ इन्द्रगोपप्रयोगः | ८०६ | गुदपाकचिकित्सा | ८१४ |
| विवृतायां माकन्दमूलादिलेपः | ” | मुखपाकचिकित्सा | ८१५ |
| श्रीपर्णीतैलम् | ८०७ | नाभिपाकचिकित्सा | ” |
| बालरोगः | ” | कुण्डलचिकित्सा | ” |
| माहेश्वरधूपः | ” | बालपञ्चामृतम् | ८१६ |
| विजयधूपः | ८०८ | तिक्ताद्यं घृतम् | ” |
| ग्रहनाशिनीगुटिका | ” | राजीकुष्ठादि लेपः | ” |
| सामान्योपायाः | ८०९ | छिन्नातैलम् | ८१७ |
| कणास्वर्णप्रयोगः | ” | स्फूर्जकादितैलम् | ” |
| सद्योजातबालस्य संज्ञाजननोपायः | ” | निम्बादिघृतं क्षीरञ्च | ” |
| सद्योजातबालस्य ज्वरादिनिवारणोपायः | ” | त्रयोविंशोऽध्यायः ।<br>उन्मादरोगः | ८१८ |
| पित्तज्वरे रोहिणीक्षीरम् | ” | उन्मादस्य निदानसम्प्राप्ती | ” |
| पित्तज्वरे अश्वत्थक्षीरम् | ८१० | उन्मादलक्षणम् | ८१९ |
| गन्धोत्पलजटादिकल्कः | ” | उन्मादचिकित्सा | ” |
| सहदेव्यादिचूर्णम् | ” | ग्रहघ्नधूपः | ” |
| न्यग्रोधादिक्वाथः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| रक्तातिसारहरचूर्णम् | ८११ | अर्कमूर्तिरसस्यप्रयोगविधिः | ” |
| सक्षीरबोलप्रयोगः | ” | निर्गुण्डिकादितैलम् | ८२० |
| मूत्रविङ्ग्रहहरं मधुकादि | ” | अपस्मारः | ” |
| यष्ट्यादिघृतम् | ” | अपस्मारसम्प्राप्तिलक्षणे | ” |
| शङ्खनाभ्यादिवर्तिः | ८१२ | अपस्मारचिकित्सा | ८२१ |
| अश्वगन्धाघृतम् | ” | अपस्मारनाशनरसः | ” |
| तालुकण्टलक्षणम् | ” | नवाङ्गवटिका | ८२२ |
| तालुकण्टकचिकित्सा | ८१३ | सूतकप्रत्ययः | ” |
| गुदकीटस्य निदानलक्षणे | ” | सर्वेश्वररसः | ८२३ |
| गुदकीटचिकित्सा | ८१४ | धूस्तूरपञ्चाङ्गघृतम् | ८२४ |
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[ ३० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| चूर्णाञ्जनम् | ८२४ | पित्ताभिष्यन्दे तीक्ष्णादिवर्तिः | ८३७ |
| मसीयोगः | ” | पित्ताभिष्यन्दे नागादिवर्तिः | ” |
| तिलजदीपाञ्जनम् | ८२५ | ताम्रादिवर्तिः | ” |
| चण्डभैरवरसः | ” | पारदादिवर्तिः | ८३८ |
| पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८२६ | एकत्रिशाङ्गवर्तिः | ” |
| पर्पटीरसस्य प्रकारान्तरेण सेवनोपदेशः | ” | षडङ्गवर्तिः | ८३९ |
| नेत्ररोगाणां संख्या | ” | द्वादशाङ्गवर्तिः | ” |
| नेत्ररोग-चिकित्सा | ८२७ | पटलहरेन्द्ररसः | ८४० |
| ताम्रवर्तिः | ” | खर्णादिवर्तिः | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | विशायाञ्जनम् | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | पुष्पहराञ्जनम् | ८४१ |
| ताम्रद्रुतिः | ८२९ | शिग्रुमूलाद्याश्च्योतनम् | ” |
| गन्धकद्रुतिः | ८३० | नेत्रशूलघ्नमाश्च्योतनम् | ” |
| गरुडाञ्जनम् | ८३१ | पौनर्नवाञ्जनम् | ” |
| तिमिरहराञ्जनम् | ८३२ | नेत्रजलस्रावहरोयोगः | ” |
| पटलहराञ्जनम् | ” | वक्ररोमहराञ्जनञ्च | ” |
| रक्ताञ्जनम् | ८३३ | नृकपालाञ्जनम् | ८४२ |
| शम्बूकादिवर्तिः | ” | काचान्धह्राञ्जनम् | ” |
| नक्तान्ध्ये पञ्चाङ्गगुटिका | ” | राज्यन्धहराञ्जनम् | ” |
| नवनेत्रदात्रीवर्तिः | ८३४ | अभिष्यन्दहरो योगः | ८४३ |
| नयनरोगहरा वर्तिः | ” | राज्यन्धे व्योषाञ्जनम् | ” |
| शिग्रुतैलम् | ८३५ | राज्यन्धे मरिचाञ्जनम् | ” |
| नागादिवर्तिः | ” | तिमिरहराञ्जनम् | ” |
| वाताभिष्यन्दे इन्द्रादिवर्तिः | ” | चतुर्विंशोऽध्यायः । | ८४५ |
| श्लेष्माभिष्यन्दे शुल्वादिवर्तिः | ८३६ | कर्णरोगः | ” |
| त्रिदोषाभिष्यन्दे रसेन्द्रवर्तिः | ” | कर्णरोगनामानि | ” |
| कर्णरोगचिकित्सा | ८४६ |
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[ ३१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कर्णरोगहरी वज्रादिवटिका | ८४६ | धातुबद्दरसगुटिका | ८५३ |
| कर्शामयघ्नतैलम् | ” | महासरस्वतीचूर्णम् | ८५५ |
| क्रिमिकर्णारितैलम् | ८४७ | मुखरोगादिगलगण्डमालारोगाणां सामान्योपायाः | ” |
| सामान्योपायाः | ” | गलकीलके आमलकप्रयोगः | ” |
| कर्णशूले लवणाद्रकप्रयोगः | ” | विषतिन्दुकादि वटी च | ” |
| कर्णशूले तिलपर्णीप्रयोगः | ” | गलकीलके सैन्धवप्रयोगः | ८५६ |
| अर्कपत्रप्रयोगः | ” | गलकीलके भल्लातकप्रयोगः | ” |
| लशुनरसप्रयोगः | ” | दन्तदार्ढ्यंकरोजिह्वापूतिगन्धहरश्च जयाप्रयोगः | ” |
| पूयहरो मेघनाद स्वरसः | ८४८ | मुखपाके पर्पटीरसः | ” |
| बाधिर्यहरं रुषल्यादिचूर्णम् | ” | मुखशोषे महाराष्ट्री गुटिका | ८५७ |
| कर्णमूलस्फोटहरः केतकादिलेपः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| कर्णगलादिस्फोटहरः पुत्रजीवलेपः | ” | मुखवैवर्ण्ये पुनर्नवायुद्वर्तनम् | ” |
| गोमक्षिकानिःसारणार्थं तगरचर्वणादिकम् | ” | नीलिकायां रजन्यादिलेपः | ” |
| कर्णपालीवर्धको मुषलीप्रयोगः | ८४९ | मुखवैवर्ण्ये वङ्गभस्मप्रयोगः | ८५८ |
| कर्णवर्धकचर्मचेटप्रयोगः | ” | मुखवैवर्ण्यदौ मातुलुङ्गादिप्रलेपः | ” |
| कर्णवृद्धिकरोवराहतैलप्रलेपः | ” | मञ्जिष्ठादिप्रलेपः | ” |
| नासारोगाः | ८५० | मुखदौर्गन्ध्यनाशिनी कुष्ठादिवटी | ” |
| मणिपर्पटीरसः | ” | मुखदौर्गन्ध्ये गृहधूमक्वाथः | ८५९ |
| पूयास्रलक्षणम् | ८५१ | मुखदौर्गन्ध्ये पथ्यादि वटिका | ” |
| सामान्योपायः | ” | मुखवैरस्ये लाजादिचूर्णम् | ” |
| कुङ्कुमादिनस्यम् | ८५२ | उपजिह्वायां निर्गुण्ड्यादियोगः | ” |
| कामलाहराञ्जनम् | ” | कृमिदन्ते अभयादिगुटिका | ८६० |
| कामलाहरमञ्जनान्तरम् | ” | कृमिदन्ते वासीसादिगुटिका | ” |
| मुखरोगः | ” | कृमिदन्ते विशालाधूमः | ” |
| मुखरोग-चिकित्सा | ८५३ | चलदन्ते जात्यादिदन्तधावनम् | ” |
| ताप्यादिवटी | ” |
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[ ३२ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्कः | विषयाः | पृष्ठाङ्कः |
|---|---|---|---|
| चलदन्ते मूलकबीजप्रयोगः | ८६१ | इन्द्रलुप्ते भल्लातादिलेपः | ८६७ |
| मुखवैरस्ये आरनालगण्डूषः | ” | इन्द्रलुप्ते गुञ्जाप्रयोगः | ८६८ |
| सुखदो गण्डूषः | ” | सूर्यावर्तादौ अभ्रादिवटिका | ” |
| कण्ठशालूकादौ पारदादिप्रलेपः | ” | पलितादौ कटुतैलनस्यम् | ८६९ |
| गलकीले सैन्धवप्रयोगः | ८६२ | खालित्ये स्नुह्यादितैलं विषतैलञ्च | ” |
| गलरोगे मण्डूरलेपः | ” | व्रणस्यभेदनिर्देशः | ८७० |
| अपचीगण्डमालाचिकित्सा | ” | जात्यादिघृतम् | ” |
| गण्डमालायां ब्रह्मदण्डीमूलप्रयोगः | ८६३ | सामान्योपायाः | ८७१ |
| गण्डमालायां गन्धकादिप्रयोगः | ” | व्रणशोधनरोपणार्थंशुल्बादिप्रयोगः | ” |
| गण्डमालायां जैपालप्रयोगः | ” | व्रणरोपणार्थं पटोलादिलेप | ” |
| चलदन्ते हेमतारादिगुटिका | ८६४ | व्रणरोपणार्थं निम्बपत्रादिप्रयोगः | ” |
| चलदन्ते धातुवद्धरसगुटिकोपदेशः | ” | व्रणरोपणे अपामार्गप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगाणां नामानि | ” | व्रणरोपणे गुडटङ्कणवर्तिः | ८७२ |
| शिरोरोगचिकित्सा | ८६५ | दुषितव्रणलेखनार्थं पारदादिप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगारिरसः | ” | भग्नस्य भेदनिर्देशः | ” |
| मस्तकरोगाणां सामान्योपायाः | ” | भग्नेपर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८७३ |
| अर्द्धावभेदके गिरिकर्णीप्रयोगः | ” | भग्ने वज्रीलेपः कान्तपाषाणलेपश्च | ” |
| गुडादिनस्यम् | ” | भगन्दरलक्षणम् | ” |
| मरिचप्रयोगः | ” | भगन्दरस्य निरुक्तिः | ” |
| शिरः शूले कुङ्कुमादिनस्यम् | ८६६ | रविताण्डवरसः | ८७४ |
| अर्धशूले मरिचप्रयोगः | ” | सामान्योपायाः | ८७५ |
| यूकालिक्षायां पारदप्रयोगः | ” | कर्तव्यनिर्देशः | ” |
| दारुणतैलम् | ” | लाङ्गल्यादिप्रलेपः | ” |
| केशपाते हरिद्रादिलेपः | ८६७ | कालाग्निरसः | ” |
| दृढकेशकरो जातिपुष्पादिप्रलेपः | ” | चक्रिकाबद्धरसप्रयोगोपदेशः | ” |
| केशपाते भृङ्गचादितैलम् | ” | स्फोटने चतुरङ्गलेपः | ८७६ |
| स्फोटने हरिद्रादिप्रलेपः | ” |
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[ ३३ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शोषणे नरास्थितैलप्रयोगः | ८७६ | पञ्चविंशोऽध्यायः । | |
| शोधनरोपणे ताम्रभस्मप्रयोगः | ८७७ | क्षुद्ररोगाणां नामानि | ८८५ |
| रोपणे मार्जारस्थिप्रलेपः | ,, | क्षुद्ररोगे पर्पटोप्रयोगविधिः | ८९५ |
| भगन्दरव्रणक्षालने त्रिफलाकषायः | ८७७ | व्यङ्गे शशरुधिरप्रयोगः-जातिफलप्रयोगश्च | ,, |
| भूतलोत्थचूर्णप्रयोगः | ,, | व्यङ्गे इङ्गुदीमज्जप्रयोगः | ,, |
| कुक्कुरास्थिलेपः | ,, | कुनखे स्नुहीक्षीरादिप्रलेपः | ,, |
| ग्रन्थिलक्षणं व्युत्पत्तिश्च | ८७८ | कुनखे अभयाप्रयोगः | ८९६ |
| मेदोग्रन्थौ अरिमेदादिभस्मलेपः | ,, | कुनखे कुष्ठादिप्रलेपप्रयोगः | ,, |
| मेदोवृद्धौ गुडूच्यादिः | ,, | कुनखे पुत्रजीवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायामुदयभास्करः | ,, | कक्षाग्रन्थौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| कालस्फोटादौ पुत्रजीवप्रलेपः | ८७९ | कक्षाग्रन्थौ विषादिलेपः | ,, |
| सन्धिग्रन्थौ रक्तस्रावविधिः | ,, | स्तनविद्रधौ क्रियाक्रमः | ,, |
| कक्षग्रन्थ्यादौ पुत्रजीवप्रयोगः | ८८० | स्तनविद्रधिस्फोटने एकवीरप्रयोगः | ८९७ |
| कालस्फोटै गुञ्जापत्रादिचूर्णम् | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे यष्ट्यादिचूर्णम् | ,, |
| कालस्फोटे विष्णुक्रान्तादिप्रलेपः | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे दारुवर्त्तिः | ,, |
| ग्रन्थ्यादौ पुनर्नवादिप्रलेपः | ,, | लिङ्गरोग-चिकित्सा | ८९८ |
| अर्बुदभेदः | ८८१ | बोलप्रयोगः | ,, |
| अर्बुदहररसः | ,, | लिङ्गपाके उडुम्बरादिक्षालनम् | ,, |
| सामान्योपायाः | ,, | लिङ्गपाके जीरकप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालापचीलक्षणम् | ८८२ | लिङ्गपाके महाशङ्खप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सुरवारुण्यादियोगः | ८८३ | लिङ्गपाके घोण्टादिलेपः | ,, |
| गण्डमालायामर्कक्षीरादिलेपः | ,, | लिङ्गपाके गन्धप्रयोगः | ८९९ |
| अपच्यां गिरिकर्णिकाप्रयोगः | ८८४ | लिङ्गपाके निम्बादिचूर्णम् | ,, |
| गण्डमालायां छुछून्दरी तैलम् | ,, | लिङ्गव्रणरोपणे सैन्धवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सहदेवीप्रयोगः | ,, | लिङ्गवगादौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| अपच्यादौ गुञ्जादिलेपः | ,, |
४
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[ ३४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| लिङ्गादिग्रन्थौ कुष्ठादिलेपः | ८९९ | भस्मकलक्षणम् | ९०७ |
| गुह्यादिगतपीटिकायामश्वत्थादिप्रलेपः | ९०० | श्लीपदस्य सम्प्राप्तिलक्षणे | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां वाकुचीचित्रकप्रयोगः | ,, | श्लीपदहररसः | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां सर्पाक्षीप्रयोगः | ,, | श्लीपदहरलेपः | ९०८ |
| उपदंशहरो धूपः | ,, | वल्मीकेपित्तलभस्मप्रयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ काञ्चनीप्रयोगः | ९०१ | स्थौल्ये विडङ्गादिचूर्णम् | ९१० |
| पामायां शाखोटकक्वाथः | ९०२ | स्थौल्ये त्रिफलादिपत्रादिकषायौ | ,, |
| पादकण्डूहरो योगः | ,, | विपरीतरतिजन्यव्याधिलक्षणम् | ,, |
| पाददाहे तिलादिचूर्णम् | ,, | विपरीतरतिजन्याधिप्रतीकारः | ९११ |
| पादकण्डूहरं प्रयोगान्तरम् | ,, | उपदंशादिप्रतीकारः | ,, |
| पादस्फुटने पथ्यामर्दनम् | ,, | सर्वरक्तविकारे उपायः | ९१२ |
| कदरे यवचिञ्चादिकषायः | ९०३ | अस्थिभग्ने लाक्षादिप्रलेपः | ,, |
| विपादिकायां गुड़ादिप्रलेपः | ,, | स्नायुके अस्पर्शारिप्रयोगोपदेशः | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापन्निदानम् | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापत्सु पिष्टीयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ रसादिप्रलेपः | ,, | योनिशूले निम्बादिगोलकम् | ९१३ |
| स्वरभङ्गे धात्रीफलस्वरसप्रयोगः | ९०४ | योनिरोगे सोमराज्यादिप्रलेपः | ,, |
| स्वरभङ्गे देवदार्वादिचूर्णम् | ,, | योनिकृमिशूले रसोनादिप्रलेपः | ,, |
| गलदाहे सैन्धवादि चूर्णम् | ९०५ | मञ्जिष्ठादिघृतम् | ,, |
| गलदाहे करञ्जमज्जापथ्याप्रयोगः | ,, | रजोनाशे त्रियोनिरसप्रयोगविधिः | ९१४ |
| स्तनवर्द्धने स्नेहनस्यम् | ,, | पुष्परोधहरयोगत्रयम् | ,, |
| स्तनव्रणे कुरूबकतैलम् | ९०६ | पुष्परोधरक्तगुल्महरयोगद्वयम् | ९१५ |
| स्तनविद्रधौ शुल्वप्रयोग | ,, | पुष्परोधे चणकप्रयोगः | ,, |
| स्नायुके कुम्भीप्रयोगः | ९०७ | पुष्परोधे गुढव्योषादिचूर्णम | ,, |
| गर्भाजनने धुस्तूरप्रयोगः | ९१६ | ||
| गर्भाजनने सैन्धवप्रयोगः | ,, | ||
| गर्भस्रावणे चूर्णप्रयोगः | ,, |
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[ ३५ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| गर्भस्रावे एरण्डप्रयोगः | ९१६ | तार्क्ष्यसूतः | ९२४ |
| गर्भस्रावे चित्रकप्रयोगः | ,, | विषहररसः | ,, |
| अतिरक्तस्रावेशरपुङ्खाप्रयोगः | ,, | षड्विंशोऽध्यायः । | |
| अतिरक्तस्रावे अर्कमूर्त्तिरसप्रयोगविधिः | ,, | जरारोग-चिकित्सा | ९२५ |
| योनिशूलहरयोगद्वयम् | ९१८ | रसायनगुणाः | ,, |
| रजोदोषे व्योषादितैलम् | ,, | जरायानिदानम् | ,, |
| पुष्यानुगं चूर्णम् | ,, | वार्धक्यहररसायनम् | ,, |
| विविधविषनिर्देशः | ९१९ | उदयादित्यरसः | ९२६ |
| विष-चिकित्सा | ,, | सर्वरोगहररसायनम् | ९२७ |
| मेघनादप्रयोगः | ,, | मासिकरसायनम् | ,, |
| सूतशतावरीयोगः | ,, | षाण्मासिकरसायनम् | ९२८ |
| सूतसोमराजीयोगः | ९२० | पाक्षिकरसायनम् | ९२९ |
| अभ्रकादिप्रलेपः | ,, | हेमादिरसायनम् | ,, |
| लूताविषेसूतभस्मप्रयोगः | ,, | पिप्पल्यादिरसायनम् | ,, |
| महासर्पविषे नागदमनप्रयोगः | ९२१ | अष्टमासिकरसायनम् | ९३० |
| पञ्चाङ्गशिरीषप्रयोगः | ,, | त्रिवार्षिकरसायनम् | ९३१ |
| अश्वगन्धावन्ध्याप्रयोगौ | ,, | षष्ठ्यधिकत्रिशतवर्षायुष्कर-रसायनम् | ९३२ |
| वृश्चिकविषेव्योषादितैलम् | ,, | सहस्रवर्षायुष्कररसायनम् | ,, |
| मृतसञ्जीवनम् | ,, | त्रिफलारसायनम् | ९३३ |
| आखुविषेशिरीषप्रयोगः | ९२२ | द्वितीयत्रिफलारसायनम् | ,, |
| सर्पविषे देवदार्यादियोगः | ,, | तृतीयत्रिफलारसायनम् | ९३४ |
| सर्पविषे टङ्कणप्रयोगः | ,, | षडङ्गरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे मनोहादिगुलिका | ९२३ | वार्षिकरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे पलाशबीजगुलिका | ,, | कुष्ठादिहररसायनम् | ९३५ |
| गरविषे कनकादिवटी | ,, | ज्योतिष्मतीतैलरसायनम् | ,, |
| सविषान्ने वृक्षामादियोगः | ,, | सर्वरोगान्तकरसायनम् | ९३६ |
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[ ३६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कान्तरसायनम् | ९३६ | उमापतिरसः | ९५९ |
| अन्यत् त्रिफलारसायनम् | ९३७ | महाकनकसुन्दररसः | ९६० |
| द्वितीयकान्तरसायनम् | ९३८ | अमृतार्णवरसः | ९६१ |
| तृतीयकान्तरसायनम् | ” | मदनसञ्जीवनरसः | ९६४ |
| कान्ताभ्रकरसायनम् | ९३९ | पुष्पधन्वारसः | ९६५ |
| पाठादिघृतम् | ९४० | रसेन्द्रचूडामणिः | ९६६ |
| ताप्यादिवटकः | ” | पूर्णचन्द्ररसः | ९६८ |
| कमलाविलासरसः | ९४१ | महाकल्कः | ” |
| लक्ष्मीविलासरसः | ९४२ | मदनमोदकः | ९७२ |
| सौश्रुतनारिकेलप्रयोगः | ९४३ | कामेश्वरमोदकः | ९७३ |
| सप्तविंशोऽध्यायः । | वाजीकरणे सामान्योपायाः | ९७४ | |
| वाजीकरणम् | ९४५ | मधुकप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणगुणाः | ” | शृङ्गीप्रयोगः | ९७५ |
| वाजीकरणस्य निरुक्तिः | ” | स्वयङ्गुप्तादिचूर्णंम् | ” |
| शुक्रक्षयस्य निदानम् | ” | तिलप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणयोगादेशे प्रतिज्ञा | ” | सिन्दूररसः | ” |
| वाजीकरणप्रयोगे पूर्वकृत्यम् | ९४६ | कार्य्यहरयोगः | ९७६ |
| कामकलाख्यरसः | ” | कार्य्यहरयोगत्रयम् | ” |
| कामदेवरसः | ९४७ | लिङ्गलेपाः, द्रावणश्च | ९७७ |
| मदनसुन्दररसः | ९४८ | द्रावणे सूतप्रयोगः | ” |
| पूर्णचन्द्ररसः | ९४९ | सिन्दूरमधुलेपः | ” |
| मदनसुन्दररसः | ” | स्तम्भने कुकवाकुप्रयोगः | ” |
| कुसुमायुधः | ९५१ | कर्पूरादिप्रलेपः | ९७८ |
| सूतेन्द्ररसः | ९५३ | पुण्डरीकप्रयोगः | ” |
| मदनकामदेवरसः | ९५४ | मदनजीवनः | ” |
| कामधेनुरसः | ९५६ | अष्टविंशोऽध्यायः । | |
| महाभ्रसत्त्वम् | ९५८ | लोहकल्पः | ” |
पृष्ठ 55स्थायी लिंक
[ ३७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| रसस्य प्राधान्यकीर्तनम् | ९७९ | प्रथमद्वितीयलोहकल्पौ | ९९६ |
| रसभेदाः | ,, | तृतीयलौहकल्पः | ,, |
| पानीयकषायविधिः | ,, | चतुर्थोलौहकल्पः | ९९७ |
| स्वर्णरौप्यशोधनम् | ,, | पञ्चमो लौहकल्पः | ,, |
| ताम्रशोधनम् | ,, | षष्ठलौहकल्पः | ,, |
| वङ्गनागयोः शोधनम् | ९८० | शूले सप्तमलौहकल्पः | ९९८ |
| कान्तलौहस्य लक्षणम् | ,, | जीर्णज्वरादौ अष्टमोलौहकल्पः | ,, |
| कान्तलौहस्य शोधनम् | ,, | क्षयादौनवमो लौहकल्पः | ९९९ |
| धातूनां सामान्यमारणम् | ९८१ | विविधरोगे दशमोलौहकल्पः | ,, |
| स्वर्णमारणम् | ,, | यक्ष्मादौ एकादशोलौहकल्पः | ,, |
| रौप्यताम्रमारणम् | ,, | गरादौ द्वादशत्रयोदशलौहकल्पौ | १००० |
| वङ्गसीसकमारणम् | ८२९ | अम्लपित्तादौ चतुर्दशोलौहकल्पः | ,, |
| सीसकस्यमारणान्तरम् | ,, | ग्रहण्यादौ पञ्चदशो लौहकल्पः | ,, |
| लौहमारणम् | ९८३ | सर्वरोगेषु षोडशो लौहकल्पः | १००१ |
| असम्यङ्मारितलौहस्यलक्षणम् | ,, | कुष्ठे सप्तदशो लौहकल्पः | १००२ |
| निरुत्थलौहस्य लक्षणम् | ,, | मेदः प्रभृतिरोगेषु अष्टादशोलौहकल्पः | ,, |
| निरुत्थलौहस्य परीक्षा | ९८४ | कुष्ठे एकोनविंशो लौहकल्पः | ,, |
| अनिरुत्थलौहस्य मारणम् | ,, | सर्वरोगेषु विशतितमो लौहकल्पः | ,, |
| मृत्युहारी रसः | ,, | नेत्ररोगे कान्तनागाख्येकविंशलोहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पः | ९८६ | रसायने द्वाविंश लौहकल्पः | १००४ |
| लोहमारणप्रकारः | ९८७ | अरिष्टलक्षणे त्रयोविंश लौहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पः | ९८८ | जरादौ चतुर्विंश लौहकल्पः | ,, |
| लोहकल्पे दन्त्यादिगणः | ९९४ | पञ्चविंशादिलौहकल्पचतुष्टयम् | ,, |
| ताम्रद्रुतिसंज्ञको लोहकल्पः | ,, | रसायने षड्विंश लौहकल्पः | १००५ |
| क्षयादौ खण्डखाद्याख्यो लोहकल्पः | ९९५ | मृतलौहानां रसस्वकथनम् | ,, |
| धातुभस्मनां पृथक्पृथक् तत्तद्रोगेषु प्रयोगः | ९९६ |
पृष्ठ 56स्थायी लिंक
[ ३८ ]
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| विषकल्पः | १००६ | जीर्णज्वरे विषकल्पः | १०१६ |
| विषोत्पत्तिस्तद्भेदाश्च | ,, | जीर्णज्वरादौ विषकल्पः | ,, |
| स्थावरविषाणां जातिभेदाः | ,, | विषमज्वरे विषकल्पः | ,, |
| कन्दविषाणां नामानि | १००८ | रक्तपित्ते विषकल्पः | ,, |
| कर्कटादिकन्दविषाणां लक्षणम् | ,, | श्वासकासे विषकल्पः | ,, |
| श्वेतादिवर्णभेदेन विषाणां जातिभेदः | ,, | श्वासहिक्कयोर्विषकल्पः | १०१७ |
| वर्णभेदेन विषाणां क्रियाभेदः | १००९ | छर्द्यां विषकल्पः | ,, |
| विषामृतयोः तुल्ययोनित्वनिर्देशः | ,, | क्षये विषकल्पः | ,, |
| रसायनार्थं विषप्रयोगे विधिः | ,, | ग्रहण्यां विषकल्पः | ,, |
| विषप्रयोगार्हपुरुषकालयोर्निर्देशः | १०१० | मूत्रकृच्छ्रे विषकल्पः | १०१८ |
| विषे निषिद्धद्रव्याणि | ,, | उदावर्त्ताश्मर्योः विषकल्पः | ,, |
| अवस्थाविशेषे विषस्यापकारत्वनिर्देशः | ,, | अश्मर्यां विषकल्पः | ,, |
| विषविद्रावणघृतम् | १०११ | गुल्मे विषकल्पः | ,, |
| चित्रारितैलम् | ,, | शूले विषकल्पः | ,, |
| सूर्यप्रभावर्त्तिः | १०१२ | गुल्मप्लीह्नोः विषकल्पः | ,, |
| विषादिगुटिका | १०१३ | प्लीह्नि विषकल्पः | १०१९ |
| जयागुटी | ,, | कुष्ठे विषकल्पः | ,, |
| द्वितीया जयागुटी | ,, | अन्यो विषकल्पः | ,, |
| तृतीया जयागुटी | १०१४ | कुष्ठघ्नो लेपः | ,, |
| विषस्य मात्रानिर्देशः | ,, | विचर्चिकादौ विषकल्पः | ,, |
| प्रयोगकालभेदेन विषस्यक्रियाविशेषः | ,, | विचर्चिकादौ विषकल्पः | १०२० |
| विषशोधनप्रयोगः | १०१५ | कुष्ठे विषकल्पः | ,, |
| नवज्वरे विषकल्पः | ,, | विषतैलम् | ,, |
| कुष्ठहरतैलम् | १०२१ | ||
| कुष्ठादौ चन्दनादितैलम् | ,, | ||
| श्वित्रादौ विषकल्पः | १०२२ | ||
| अन्योयोगः | ,, | ||
| वाते विषकल्पः | १०२३ |