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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६३६ शोष ( बुढ़ापे में होनेवाला क्षय ) भयंकर राजयक्ष्मा मेढ्रेन्द्रियकी शिथिलता, और नपुंसकता, कास, भयंकर श्वास, अर्श रोग, अग्निमान्द्य, ग्रहणी, पाण्डु- रोग, कामलारोग, उरःक्षत ( फुप्फुस में क्षय होने के कारण मुख से खून निकलना ) आदि रोग निश्चित ही शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥ १७६-१८१ ॥ वक्तव्य—इस रसायन को दिन में एक या दो बार सेवन कराना चाहिए और रोगों के विभिन्न प्रकार के अनुपान भी स्वयं ही निर्धारित करने चाहिए । उरःक्षत आदि रोगों में यदि पिप्पली और मरिच अनुकूल न आते हों तो वासास्वरस, लाक्षास्वरस, पेटास्वरस आदि के साथ वंशलोचन, प्रवालपिष्टी आदि मिलाकर सेवन कराना चाहिये । अथ सूर्यकान्तस्य नामानि सूर्यकान्तः सूर्यमणिस्तथा सूर्योपलाह्वयः । दीप्तोपलो वह्निगर्भो तथैव ज्वलनोपलः ॥ १८२ ॥ भा.टी.—सूर्यकान्त, सूर्यमणि, सूर्योपल, दीप्तोपल, वह्निगर्भ तथा ज्वल- नोपल, ये सब नाम सूर्यकान्तमणि अर्थात् आतशीशीशे के कहे जाते हैं ।१८२। ग्राह्यसूर्यकान्तस्य लक्षणम् विमलो निस्तुषः स्निग्धो घृष्टो व्यामसुनिर्मलः । मसृणो निर्व्रणश्चैव जात्यः सूर्योपलः स्मृतः ॥ १८३ ॥ अथ सूर्यकान्तपरिचयः—ग्राह्य सूर्यकान्तस्य लक्षणं विमलो निस्तुष इति । उक्तञ्चान्यत्र—"शुद्धः स्निग्धो निर्व्रणो निस्तुषोऽन्त्यो निर्घृष्टोऽत्यन्तनैर्मल्य- मेति । यः सूर्याशुस्पर्शान्निस्त्यूतवह्निर्जात्यः सोऽयं कथ्यते सूर्यकान्तः " इति। १८३। भा.टी.—उत्तम सूर्यकान्तमणि, स्वच्छ और तुष रहित अर्थात् भीतर से श्वेत वर्ण की तुष जैसी रेखाओं से युक्त नहीं होना चाहिए । यह बाह्यस्पर्श में स्निग्ध और घिसने पर भी स्वच्छ चमकवाली और व्रण ( गढे ) रहित होती है ॥ १८३ ॥ सूर्यकान्तस्य परीक्षणम् यस्तु सूर्याशुसंस्पृष्टः प्रसूते दहनप्रभाम् । स एक जात्यः कथितः सूर्यकान्तः परीक्षकैः ॥ १८४ ॥ भा.टी.—जो सूर्यकान्त सूर्यकिरणों के स्पर्श से अग्नि उत्पन्न करके उसके आगे रखी हुई वस्तु को ( रुई तिनका आदि ) जला देता हो, उसे ही उत्तम सूर्यकान्त समझना चाहिये ॥ १८४ ॥

६४० रसतन्त्रसङ्ग्रहणी सूर्यकान्तस्य गुणाः सूर्यकान्तो मतो मेध्य उष्णश्चैव रसायनः । बलासवातशमनो विशेषेण च कीर्तितः ॥ १८५ ॥ सूर्यकान्तश्च मेध्योष्णत्वादिगुणः । उक्तं हि—"रविकान्तो भवेदुष्णो निर्मलश्च रसायनः । वातश्लेष्महरो मेध्यः सृजनाद्रवितुष्टिदः” इति । बलासः कफः । १८५ ॥ भा.टी.—सूर्यकान्त, मेधावर्धक उष्णगुण और रसायन गुण करनेवाला होता है । यह विशेषरूप से कफ तथा वात प्रकोप शामक होता है ॥ १८५ ॥ सूर्यकान्तस्य मारणम् सूर्यकान्तः सुसम्पिष्टः शिलाबलिसमन्वितः । सप्तधा पुटितो यत्नान्म्रियते नात्र संशयः ॥ १८६ ॥ भा.टी.—सूर्यकान्त को अच्छी तरह खरल में पीसकर समभाग शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक मिलाकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस प्रकार सात पुट मैनसिल और गन्धक के साथ देने से सूर्यकान्त की भस्म हो जाती है ॥ १८६ ॥ अथ चन्द्रकान्तस्य नामानि चन्द्रकान्तश्चन्द्रमणिस्र्तथा चन्द्रोपलाह्वयः । शशिकान्तश्चेन्दुकान्तः स एव परिकीर्तितः ॥ १८७ ॥ भा.टी.—चन्द्रकान्त, चन्द्रमणि, चन्द्रोपल, शशिकान्त, इन्दुकान्त, ये सब नाम चन्द्रकान्त के कहे जाते हैं ॥ १८७ ॥ जात्यचन्द्रकान्तस्य लक्षणम् यन्निर्मलं सुमसृणं शिशिरं च पीतं स्निग्धं परं सुविशदं परमं पवित्रम् । स्रावं स्रवत्यथ परं तुहिनांशुसंगा- ञ्चन्द्रोपलं खलु तदेव मतं तु जात्यम् ॥ १८८ ॥ चन्द्रकान्तपरिचयः—जात्यचन्द्रकान्तस्वरूपं यन्निर्मलेत्यादिना । उक्तञ्चा- भियुक्तैः—"स्निग्धं शीतं पीतामवासमन्तर्धत्ते चित्ते स्वच्छतां यन्मुनीनाम् । यच्च स्रावं याति चन्द्रांशुसङ्गात् जात्यं रत्नं चन्द्रकान्ताख्यमेतत्” इति ॥१८८॥ भा.टी.—जो चन्द्रकान्त साफ, चमकीला, स्पर्श में शीत और पीले रंग का, चिकनास्पर्श, विशद और पवित्र हो तथा चन्द्रमा के स्पर्श से उसमें से जलसदृश स्राव होने लगता हो, उसे उत्तम चन्द्रकान्त समझना चाहिये। १८८।

४१ त्रयोविंशस्तरङ्गः ६४१ चन्द्रकान्तस्य गुणाः चन्द्रकान्तोऽतिशिशिरः स्निग्धः पित्तापहः परम् । रक्तपित्तप्रशमनस्तथा दाहनिषूदनः ॥ १८९ ॥ चन्द्रकान्तश्चातिशिशिरादिगुणः । तथा चोक्तमन्यत्र —“चन्द्रकान्तस्तु शिशिरः स्निग्धः पित्तास्रतापनुत् । शिवप्रीतिकरः स्वच्छो ग्रहालक्ष्मीविनाशनः॥” इति । चन्द्रकान्तमारणं मनःशिलाहिङ्गुलाभ्यां सम्पाद्यम् ॥ १८९ ॥ भा.टी.—चन्द्रकान्त अत्यन्त शीत, स्निग्ध और उत्तम, पित्तप्रकोप- शामक, रक्तपित्त-रोग-शामक तथा सर्वाङ्गीण दाहनाशक होता है ॥ १८९ ॥ चन्द्रकान्तस्य मारणम् कुनटीहिंगुलोपेतः कन्यानीरेण पेषितः । चन्द्रकान्तः सुपुटितो म्रियते नात्र संशयः ॥ १९० ॥ भा. टी.—चन्द्रकान्त में समभाग शुद्ध मैनसिल तथा हिंगुल मिलाकर अच्छी तरह पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देने से इसकी भस्म हो जाती है ॥ १९० ॥ अथ राजावर्तस्य नामानि राजावर्तो नृपावर्त्त आवर्त्तमणिरित्यपि । नृपोपलश्च नीलाश्मा स एव परिकीर्तितः ॥ १९१ ॥ भा.टी.—राजावर्त, नृपावर्त, आवर्तमणि, नृपोपल, नीलाश्मा, ये सब नाम राजावर्त ( लाजवर्द ) के कहे जाते हैं ॥ १९१ ॥ जात्यराजावर्तस्य स्वरूपम् यन्निर्मलः सुमसृणः खलु गारशून्यः स्निग्धश्च शारदनिराभ्रनिभः सुनीलः । कृष्णो गुरुश्च शिखिकण्ठसमप्रकाशो राजोपलः खलु स एव मतस्तु जात्यः ॥ १९२ ॥ अथ राजावर्तस्य परिचयः—ग्राह्यराजावर्तरूपं यन्निर्मल इत्यादिना । गार- शून्यः मलरहितः । शिखी मयूरस्तस्य कण्ठसमः प्रकाश आभा यस्य सः । उक्त- ञ्चान्यत्रापि—“निर्गारमसितमसृणं नीलं गुरु निर्मलं बहुच्छायम् । शिखिकण्ठ- समं सौम्यं राजावर्तं वदन्ति जात्यमणिम्” इति ॥ १९२ ॥ भा.टी.—जो लाजवर्द स्वच्छ, चमकीला और मलरहित, स्निग्ध (चिकना) और शरद कालीन बादल रहित आकाश के समान नीलवर्ण,कृष्ण, गुरुभार और मोरकण्ठ के सदृश प्रकाशवाला हो,उसे उत्तम लाजवर्द समझना चाहिए ॥१९२॥

६४२ रसतरङ्गिणी राजावर्तस्य प्रथमः शोधनप्रकारः सगव्यमूत्रः सक्षारो निम्बूकद्रवयोगतः । स्विन्नो नृपोपलो यामं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १६३ ॥ राजावर्तशोधनं गोमूत्रक्षारनिम्बूजलेन कार्यम् ॥ १६३ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में गोमूत्र तथा निम्बूस्वरस और यवक्षार डालकर उसमें लाजवर्द की पोटली को लटकाकर तीन घण्टे तक स्वेदन करने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १६३ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निम्बूकाम्लसमायुक्तः सजलः क्षारसंयुतः । नृपोपलः परिस्विन्नो विशुद्ध्यति न संशय ॥ १६४ ॥ निम्बूकाम्लं प्रागुक्तपरिभाषम्, तेन समायुक्तः ॥ १६४ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में निम्बूस्वरस, यवक्षार और जल भरकर उसमें लाजवर्द को तीन घंटे तक स्वेदन करने से भी वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥१६४॥ तृतीयः शोधनप्रकारः शिरीषपुष्पस्वरसैः स्वेदितस्तु नृपोपलः । दोलायन्त्रे याममात्रं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १६५ ॥ शिरीषपुष्पस्वरसैर्वा दोलायन्त्रे स्वेदनाच्छुद्ध्यति ॥ १६५ ॥ भा.टी.—शिरीष पुष्प के स्वरस में दोलायन्त्र विधान से लाजवर्त को ३ घंटे तक स्वेदन करने से उत्तम शुद्धि हो जाती है ॥ १६५ ॥ राजावर्तस्य मारणम् विचूर्णितं नृपोपलं विशुद्धगन्धकान्वितम् । नवेन निम्बुकाम्बुना सुपेषयेद् दिनत्रयम् ॥ १६६ ॥ विशोषितञ्च विन्यसेच्छुरावसम्पुटस्थितम् । विधाय सन्धिलेपनं पुटेत्पुटे गजाह्वये ॥ १६७ ॥ विपक्त्वतः सुवर्त्मना ह्यनेन नागवारकम् । नृपोपलोऽविलम्बितं समेति पञ्चतामलम् ॥ १६८ ॥ एतन्मारणञ्च गन्धकयोगेन निम्बूकद्रवैः सुपेषणमन्वष्टधा पुटनात् साध्यम् ।१६८॥ भा.टी.—शुद्ध लाजवर्द को खरल में अच्छी तरह चूर्ण करके उसमें सम- भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर इसको ताजे नींबू के रस के साथ तीन दिन तक मर्दन करें और धूप में रखकर अच्छी तरह सुखा लें। अब इसको शरावसम्पुट में

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६४३ बन्द करके अच्छी तरह सन्धिलेप करके सुखा लें । अन्त में गजपुट में फूँक देवें। इस विधि से अच्छी तरह आठ बार गजपुट में फूँक देने से लाजवर्द की निश्चित भस्म हो जाता है ॥ १६६-१६८ ॥ मृतराजावर्तस्य गुणाः नृपोपलः कटुस्तिक्तो दीपनः पाचनस्तथा । शिशिरः पित्तशमनो बृंहणोऽतिरसायनः ॥ १६६ ॥ पाण्डुप्रमेहहरणः क्षयशोषणिबर्हणः । मदात्ययात्ययकरश्छर्दिहिक्कानिवारणः ॥ २०० ॥ मृतश्चायं कटुतिक्तादिगुणः । अन्यत्राप्युक्तं—"राजावर्तः कटुः स्निग्धः शिशिरः पित्तनाशनः ।” इति ॥ १६६, २०० ॥ भा.टी.—राजावर्त कटु और तिक्तरस, दीपक और पाचक तथा शिशिर गुण, युक्त होता है। इसके सेवन से पित्तप्रकोप शान्त होता है और शरीर में मांसादि धातुओं की वृद्धि होने से मोटापा आता है और जरा-व्याधि का नाश होता है। यह पाण्डुरोग तथा प्रमेह, क्षय और शोष रोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से पुरातन मदात्ययरोगजन्य उपद्रव शान्त हो जाते हैं और वमन तथा हिक्का रोग नष्ट होते हैं ॥ १६६, २०० ॥ मृतराजावर्तस्य आमयिकः प्रयोगः नृपोपलः सममृततारताप्यसमन्वितः । विपक्वो गव्यहविषा सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ २०१ ॥ निषेवितो निहन्त्याशु सर्वानैव मदात्ययान् । रससिन्दूरताम्राढ्यः सुमृतस्तु नृपोपलः ॥ २०२ ॥ यष्टीमधुकचूर्णेन सितामध्वाज्यसंयुतः । निषेवितो निहन्त्याशु सर्वानैवमदात्ययान् ॥ २०३ ॥ मृताभ्रसत्त्वकान्ताभ्यां सुमृतस्तु नृपोपलः । मधुना शीलितं हन्ति प्रमेहादिकमुल्बणम् ॥ २०४ ॥ भा.टी.—लाजवर्द की भस्म में समभाग रजतभस्म और स्वर्णमाक्षिक भस्म मिलाकर गोघृत में अच्छी तरह पका लें। अब इस चूर्ण में खांड, शहद और गोघृत मिलाकर उचित मात्रा में सेवन कराने से सब प्रकार के मदात्यय रोग और उपद्रव नष्ट हो जाते हैं। इसी तरह लाजवर्द भस्म में रससिन्दूर, ताम्रभस्म और मुलेठी चूर्ण मिलाकर इसको उचित मात्रा में लेकर खांड शहद

६४४ रसतरङ्गिणी और गोघृत के साथ सेवन करने से सब प्रकार के मदात्यय रोग नष्ट हो जाते हैं। लाजवर्द की भस्म में समभाग अभ्रकसत्त्वभस्म और कान्तलोहभस्म मिला- कर कुछ दिन निरन्तर शहद के साथ सेवन करने से भयंकर प्रमेहादि रोग नष्ट हो जाते हैं । । २०१-२०४ ॥ राजावर्तस्य सत्त्वपातनं मारणञ्च मनःशिलाज्यसंयुक्तं नृपोपलं विचूर्णितम् । पचेत्तु लोहभाजनेऽथ सैरिभीसुदुग्धतः ॥ २०५ ॥ समित्रपञ्चकस्ततो विमर्द्य गोलकीकृतः । सुतीक्ष्णखादिराग्निना विपाचितस्ततस्त्वयम् ॥ २०६ ॥ स्वकीयसत्त्वमुत्तमं विमुञ्चतीह सत्वरम् । ततः सलोङ्गन्धकं विपक्वेति पञ्चताम् ॥ २०७ ॥ राजावर्तस्य सत्त्वपातनं तन्मारणञ्चाह मनःशिलेति-सैरिभी महिषी । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ २०५-२०७ ॥ भा.टी.-राजावर्त के चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिलचूर्ण और गोदुग्ध मिलाकर इसमें भैंस का दूध डाल दें और इन सबको एक लोहे के पात्र में अच्छी तरह पकाकर खुश्क कर लें। अब इसमें समभाग पूर्वोक्त मित्र पञ्चक द्रव्य मिलाकर अच्छी तरह घोटकर गोलियाँ बना लें। अब इन गोलियों को एक बड़ी-मूषा में रखकर तीव्र अग्नि में पकायें तो मूषा में इसका शीघ्र ही उत्तम सत्त्व निकल आता है। इस लाजवर्द सत्त्व में समभाग शुद्धगन्धक मिला बिजौरा नींबू के रस में घोटकर पुट में फूँक देने से लाजवर्द-सत्त्व की भस्म हो जाती है ॥ २०५-२०७ ॥ अथ पेरोजकस्य नामानि पेरोजश्च पेरोजं रसज्ञैः परिकीर्तितम् । भस्माङ्गं हरितं चेति द्विविधं तत् प्रकीर्तितम् ॥ २०८ ॥ भा.टी.-पेरोजक तथा पेरोज, ये दो नाम फिरोजा के कहे जाते हैं। फिरोजा के दो भेद माने जाते हैं। १-भस्मांग (राख जैसे रंग का), २-हरित (हरे रंग का) ॥ २०८ ॥ पेरोजकस्य शोधनमारणे शोधनं मारणञ्चैव पेरोजस्य विशेषतः । नृपोपलसमं ख्यातं रसत्तन्त्रविशारदैः ॥ २०६ ॥ पेरोजकपरिचयः-पेरोजकञ्च द्विविधं भस्माङ्गं हरितञ्च। तस्य शोधनमारणे

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६४५ राजावर्तवत्, तच्च सुमृतं मधुरादिगुणम् । उक्तञ्च—'पेरोजं हरिताश्मा च भस्माङ्गं हरितं द्विधा । पेरोजं सुकषायं स्यात् मधुरं दीपनं सरम् ॥ स्थावरं जङ्ग- मञ्चैव संयोगाच्चापि यद्विषम् । तत्सर्वं नाशयेच्छीघ्रं मूलभूतदिदोषजम्' इति ॥ २०६ ॥ भा.टी.—पिरोजा का शोधन और मारण विधान विशेषरूप से लाजवर्द के शोधन और मारण के समान ही समझना चाहिए ॥ २०६ ॥ मृतपेरोजकस्य गुणाः पेरोजकं सुतुवरं मधुरं च सुदीपनम् । शूलदूषि विषघ्नञ्च चराचरविषापहम् ॥ २१० ॥ भा.टी.—पिरोजा कषाय और मधुर रस और अग्निदीपक होता है । इसके सेवन से उदर-शूल, शरीरगत पुराना विषप्रभाव तथा स्थावर और जंगम सब प्रकार के विषोंका प्रभाव नष्ट हो जाता है ॥ २१० ॥ अथ स्फटिकस्य नामानि स्फटिकः स्फटिकं चैव स्फाटिकं स्फटिकदृषत् । स्फाटीकं स्फटिकाश्मा च तथैव स्फटिकोपलः ॥ २११ ॥ शालिपिष्टं धौतशिलं शिवरत्नं शिवप्रियम् । सितोपलोऽमलमणिः स एव परिकीर्तितः ॥ २१२ ॥ भा.टी.—स्फटिक, स्फाटिक, स्फटिकदृषत्, स्फाटीक, स्फटिकाश्मा, स्फटि- कोपल, शालिपिष्ट ( पिसे हुए चावलों के सदृश वर्ण ), धौतशाली ( धुले हुए चावलों के समान सफेद ), शिवरत्न, शिवप्रिय, सिद्धोपल (सफेद मिश्री जैसा), अमल मणि, ये सब नाम स्फटिक (बिल्लौर) के कहे जाते हैं ॥२११, २१२॥ जात्यस्फटिकस्य स्वरूपम् शीतं स्निग्धं निस्तुषं नेत्रहृद्यं घृष्टं धत्ते स्वच्छतां पूर्वतुल्याम् । स्वच्छच्छायं यच्च शुद्धान्तरालं तन्निर्दिष्टं शैवरत्नं तु जात्यम् ॥ २१३ ॥ अथ स्फटिकपरिचयः—शीतं स्निग्धमिति ग्राह्यस्फटिकलक्षणात् । उक्तञ्चा- न्यत्र—"यद् गङ्गातोयबिन्दुच्छविरिव विमलं निस्तुषं नेत्रहृद्यं स्निग्धं शुद्धं तरल- मधुरं पित्तदाहास्त्रहारि । पाषाणैर्यन्निघृष्टस्फुटितमपि निजं स्वच्छतां नैव जह्यात्त- ज्जात्यं जात्यलभ्यं शुभमुपतनूते शैवरत्नं विचित्रम् ॥ २१३ ॥ भा.टी.—जो स्फटिकमणि शीतस्पर्श, स्निग्ध, निस्तुष ( तुष सदृश रेखा रहित ), अत्यन्त दर्शनीय हो और घिसने पर भी उसकी अपनी पहिली स्वच्छता

६४६ रसतरङ्गिणी ( पारदर्शकता ) न मिटे और जिसके भीतर और कोई अन्यवर्ण वस्तु आदि न हो तो उसे उत्तम स्फटिकमणि समझना चाहिए ॥ २१३ ॥ स्फटिकस्य शोधनमारणे शोधनं मारणञ्चैव शिवरत्नस्य सर्वदा । राजावर्तमणेस्तुल्यं जानीयाद्रसकोविदः ॥ २१४ ॥ भा.टी.-रसतन्त्रज्ञ वैद्य को स्फटिकमणि का शोधन तथा मारण-विधान सदा राजावर्तमणि के समान ही समझना और करना चाहिए ॥ २१४ ॥ मृतस्फटिकस्य गुणाः स्फटिको मधुरो बल्यस्तुषारसमशीतलः । रक्तपित्तप्रशमनो ज्वरदाहादिनाशनः ॥ २१५ ॥ इति रत्नादिविज्ञानीयो नाम त्रयोविंशस्तरङ्गः स्फटिकगुणा निगदव्याख्याताः । अथात्र प्रसङ्गात् सर्वेषां सामान्यतो लक्षण- निर्देशः- "श्यामः स्यादिन्द्रनीलस्त्वतिमसृणयुतश्चाथ गारुत्मतः स्यात् नीलच्छा- योऽतिदीप्तोऽप्यथ मिहिरमणिः सूर्यतप्तोऽग्निमुक् स्यात् । चन्द्रांशुस्पर्शतोग्भः स्रवति शशिमणिः पुष्परागस्तु पुष्पमुख्यः श्रीवज्रमुच्चैर्धनसममिह तं संविशेल्लो- हपिण्डे ॥ वैदूर्यं यद् विडालेक्षणरुचिगदितं स्याच्च गोमेदरत्नं गोमूत्राभं विधूम- ज्वलदनलनिभं पद्मरागं वदन्ति । मुक्ताशङ्खप्रवालं सरिदधिपतिजं विश्वविख्या- तमेतद् राजावर्तन्तु पीतारुणमृदुसुरभिम्लोष्ठिभागोत्थमाहुः ॥" इति ॥ २१५ ॥ भा.टी.-स्फटिकभस्म मधुररस, शारीरिक बलवर्धक, बरफ के समान शीतल गुणवाली होती है । इसके प्रयोग से रक्तपित्त प्रकोप शान्त हो जाता है और पित्तप्रकोप जन्य ज्वर, दाह, तृषा आदि सब उपद्रव मिट जाते हैं ॥ २१५ ॥ यह रत्नादिविज्ञानीय नाम तेइसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ ।

अथ विषोपविषादिविज्ञानीयश्चतुर्विंशस्तरङ्गः विषपदस्य निर्वचनम् दृष्ट्वै तद् यद्विषीदन्ति जनास्तस्माद्विषं मतम् । नरं वा विषणीत्येतन्मृत्युपाशैस्ततो विषम् ॥ १ ॥ विषोपविषाणाम्भूयसा रसयोगेषूपयोगात् परिशेषात् विषोपविषाणामपि परिच- यावकाशः । रससंस्कारोपयोगाच्च । अथ विषं कस्मात् इति चेत् ? तत्राह-दृष्ट्वै- तदिति । नरमप्युपलक्षणं इतरप्राणिनामपि । विषांपयोगाद्विषाददर्शनात् । तथा

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६४७ चाहुः—"म्रियन्ते मक्षिकाः, प्राश्य काकः क्षामस्वरो भवेत्" इत्यादिना अपि च स्मरन्ति हि—"पुरा खल्वमृतार्थं सुरासुरैः सलिलनिधेर्मथ्यमानात् क्रोध इव रूपवान् सत्त्वं समुद्बभूव कृष्णमनलनयनमूर्ध्वप्रदीप्तकेशं दंष्ट्राकरालं भैरवारावरू- पम् । तद्दर्शनादेव यतो देवा दानवाश्च विषण्णास्तस्मात्तद्विषसंज्ञामवाप । तत्स- हसैव सर्वभूतानि निर्दग्धुकाममुपयोगविशेषैर्विषममृततां विनयमानो ब्रह्मानुनीयौ- षधिषु न्यस्तवान् । तत्तत्स्थावरासु मूर्तिष्वधिवसनात् स्थावरमित्युच्यते । जाङ्गमं पुनः पृथिव्या भारावतारार्थमुरगादिरूपेण श्रीविष्णुर्निर्ममे" इति ॥ १ ॥ भा.टी.- संखिया, सक्तुक, हालाहल, आदि द्रव्यों को इसलिए विष कहा जाता है कि इनको देखने से ही मनुष्य तथा पक्षी और पशु अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं। अथवा यह विष मनुष्य को मृत्युपाश द्वारा (बन्धन) नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ॥१॥ वक्तव्य—चरकादि ग्रन्थों में भी "विष" की यही निरुक्ति लिखी है कि जब सुर और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र का मंथन किया, तो अमृत निकलने से पूर्व एक ऐसा पदार्थ उसमें से प्राप्त हुआ जिसको देखकर वहाँ उपस्थित सब देवता और असुर विषण्ण (अत्यन्त दुःखी) और शिथिल- देह हो गये । अतएव यह तब से "विष" शब्द से कहा जाने लगा । "जगद्वि- षण्णं तं दृष्ट्वा तेनासौ विषसंज्ञकः । दर्शनादेव यतो देवा दानवाश्च विषण्णा- स्तस्मात्तद्विषसंज्ञामवाप" । विषस्य नामानि तद्वैविध्यञ्च विषं दवेडञ्च गरालं कालकूटञ्च तन्मतम् । स्थावरं जङ्गमञ्चेति द्विविधं विषमुच्यते ॥ २ ॥ विषनामानि तन्त्रव्यवहृतानि, तच्च द्विविधं स्थावरजङ्गमप्रभेदादिति । स्थावरं दशविधमधिष्ठानभेदात् । स्मरन्ति हि—"स्थावरं मूलपुष्पफलदलत्व- क्सारनिर्यासद्वीरधातुकन्दभेदाद्दशाधिष्ठानम्" इति । मूलादिविषाणां परिचय- विस्तरस्त्वाकरेभ्य एव अगदोहत्यावलोकनीय इत्यत्र विस्तरभयाद् विरमामः ॥२॥ भा.टी.—विष के दवेड, गरल, कालकूट, ये नाम कहे जाते हैं । यह विष स्थावर (वनस्पति आदि में होनेवाला) और जंगम (सर्प, बिच्छू, चूहा, मकड़ी आदि में होनेवाला ) भेद से दो प्रकार का होता है ॥ २ ॥ स्थावरजङ्गमविषयोः स्वरूपम् खन्यौषधाश्रयं यत्तु विषं तत्स्थावराह्वयम् । सर्पादिजन्तुप्रभवं विषं जङ्गमसंज्ञकम् ॥ ३ ॥

६४८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—खानों से प्राप्त होनेवाले संखिया, हरताल, मैनसिल, पारद, ताम्र आदि को तथा वनौषधियों से प्राप्त होनेवाले वत्सनाभ, शृंगिक, कुचला आदि को स्थावर विष कहा जाता है और सर्प, बिच्छू, मकड़ी, बावलाकुत्ता आदि के विष को जंगम विष कहा जाता है ॥ ३ ॥ स्थावरविषस्य भेदाः अधिष्ठानविभेदेन विषं स्थावरसंज्ञकम् । समाख्यातं दशविधं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥ ४ ॥ भा.टी.—स्थावर संज्ञक विष अधिष्ठान (आश्रय) भेद से दस प्रकार का रसतन्त्रज्ञों ने माना है ॥ ४ ॥ स्थावरविषस्य अधिष्ठानानि कन्दः सारोऽथ निर्यासः पुष्पं मूलं फलं दलम् । त्वक् क्षीरं खनिरित्यस्य ह्यधिष्ठानानि वै दश ॥ ५ ॥ भा.टी.—कन्द, सार, निर्यास (गोंद), पुष्प, मूल, फल, पत्र, त्वचा, दूध, तथा खान; ये दश स्थावर विष के आश्रय हैं ॥ ५ ॥ प्रकारान्तरेण स्थावरविषस्य द्वैविध्यम् विषं चोपविषं चेति द्विविधं स्थावरं विषम् । प्रथमं वत्सनाभादि द्वितीयं तिन्दुकादिकम् ॥ ६ ॥ अपि च स्थावरं विषं विषोपविषभेदादपि द्विविधमाचख्युः प्राज्ञाः । तदेत- दाह प्रथमं वत्सनाभादीति ॥ ६ ॥ भा.टी.—स्थावर विष के भी विष (प्रधान विष) तथा उपविष (अप्र- धान विष) भेद से दो भेद होते हैं। विषों में वत्सनाभ, शृंगक, कालकूट, हलाहल, संखिया आदि लिये जाते हैं। उपविषों में तिन्दुक (कुचला), कनेर, गुञ्जा, अफीम कलिहारी आदि लिये जाते हैं ॥ ६ ॥ विषस्य नव भेदाः हालाहलः कालकूटः शृङ्गकश्च प्रदीपनः । सौराष्ट्रिको ब्रह्मपुत्रो हारिद्रः सक्तुकस्तथा ॥ ७ ॥ वत्सनाभ इति ज्ञेया विषभेदा अमी नव । रसे रसायनादौ च वत्सनाभः प्रशस्यते ॥ ८ ॥

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विषाणां सक्तुकान्तानां प्रयोगो नेह दृश्यते । अतस्तेषां विषाणां तु स्वरूपं न प्रदर्शितम् ॥ ६ ॥ अपि च स्थावरं विषं नवधा विभजन्ति पुराविदः । हालाहलः कालकूट इत्यादिना । हालाहलादिविषाणां तन्त्रान्तरोक्तानि लक्षणानि—"गोस्तनाभफलो गुच्छस्तालपत्रच्छदस्तथा । तेजसा यस्य दह्यन्ते समीपस्था द्रुमादयः ॥ असौ हालाहलो ज्ञेयः किष्किन्धायां हिमालये । दक्षिणाब्धितटे देशे कोङ्कणेऽपि च जायते ॥ देवासुररणे देवैर्हतस्य पृथुमालिनः । दैत्यस्य रुधिराजातस्तरुश्चत्थस- न्निभः ॥ निर्यासः कालकू टोऽस्य मुनिभिः परिकीर्तितः । सोऽहिच्छत्रे शृङ्गवेरे कोङ्कणे मलये भवेत् ॥ यस्मिन् गोशृङ्गके बद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । स शृङ्गक इति प्रोक्तो द्रव्यतत्त्वविशारदैः ॥ प्रदीप्लोहितो यः स्याद्दीप्तिमान् दहनप्रभः । महादाहकरः पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ॥ सुराष्ट्रविषये यः स्यात् स सौराष्ट्रिक उच्यते ॥ वर्णातः कपिलो यः स्यात् तथा भवति सारकः । ब्रह्मपुत्रः स विज्ञेयो जायते मलयाचले ॥ हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः । यद्ग्रन्थिः सक्तु- केनैव पूर्णमन्यः ससक्तुकः ॥" तदेत्कन्दजातीयमेव नवधा प्रकाशितं विषम् । वाग्भटेन कन्दविषेष्वेषां परिगणनात् । यद्यपि च—"साक्तुकं मुस्तकं शृङ्गी बालकं सर्पपाह्वयम् । वत्सनाभञ्च कर्मण्यं विषं स्निग्धं घनं गुरु ॥ न जात्वन्यत् प्रयोक्तव्यं कालकूटं विशेषतः ॥" इत्युक्तमभियुक्तैः, तथापि वत्सनाभातिरिक्त- मुस्तकादिविषाणां परिचयानुपलम्भात् तदलभ्यत्वाद्वा प्रयोगो नेहोपलभ्यमानत- न्त्रेषु दृश्यते । तदेतदाह-रसे रसायनादौ च वत्सनाभः प्रशस्यते ॥७-६॥ भा.टी.—प्राचीन शास्त्रकारों ने स्थावर विष के नौ भेद माने हैं । १— हालाहल, २—कालकूट, ३—शृंगक, ४—प्रदीपन, ५—सौराष्ट्रिक, ६—ब्रह्म- पुत्र, ७—हारिद्र, ८—सक्तुक, ६—वत्सनाभ । इन नौ विषों में से वत्सनाभ विष रस क्रिया तथा रसायन प्रयोग में सर्वोत्तम माना जाता है । किन्तु सक्तुक पर्यन्त विषों का प्रयोग नहीं पाया जाता है । अतएव इन सक्तुक, हारिद्र आदि विषों का स्वरूप भी पूर्णरूप से नहीं दिखाया गया है ॥७-६॥ वत्सनाभक्षुपस्य परिचयः सिन्दुवारदलः पार्श्वे तरुवृद्धिविवर्जितः । नीलपुष्पः कन्दविषो क्षुपो हस्तद्वयोच्छ्रितः ॥१०॥ वत्सनाभ इति ख्यातो रसतान्त्रविचक्षणैः । गढपाले च काश्मीरे नेपालादौ च जायते ॥ ११ ॥

६५० रसतरङ्गिणी तत्र वत्सनाभक्षुपस्य परिचयः शिष्यमतिवैशद्यार्थः। अस्य पत्राणि सिन्दुवा- रपत्रतुल्यानि परं पञ्चाङ्गुलवत् अस्योपरितनभागश्छिन्नमिव भवति ॥१०, ११॥ भा.टी.-वत्सनाभ पौधे के पत्ते सम्भालू के पत्तों से मिलते-जुलते होते हैं। और पाँच-पाँच के ग्रूप ( झुण्ड ) में जुड़े होते हैं । इसके आस-पास के वृक्ष बढ़ने नहीं पाते हैं। इसके पुष्प नीले रंग के निकलते हैं। इसके क्षुप की ऊँचाई दो हाथ के करीब होती है। वह कन्द जातीय क्षुप होता है। इसी के कन्द को रसशास्त्रज्ञ "वत्सनाभ" शब्द से कहा करते हैं। यह क्षुप प्रायः गढ़- वाल, काश्मीर तथा नेपाल आदि पाँच हजार से अधिक ऊँचाईवाले शीत पर्वतीय प्रान्तों में पाया जाता है ॥ १०, ११ ॥ वत्सनाभस्य परिचयः दैर्घ्ये तु पञ्चाङ्गुलतः परं सप्ताङ्गुलोन्मितः । व्यासे चैकाङ्गुलात् सार्द्धद्वयङ्गुलप्रमितस्तथा ॥ १२ ॥ आमूलचूलं क्रमशः स्थूलश्च पाण्डुरप्रभः । कन्दोऽस्य भिषजां वयैर्वत्सनाभ इति स्मृतः ॥१३॥ दीर्घमूलं स्थूलकन्दं वत्सनाभविषक्षुपम् । उत्पाट्य शीतसमये वसन्ते वा समाहरेत् ॥१४॥ शीतसमये वसन्ते वा समाहरणं पूर्णवीर्य्यत्वात्तदानीमस्येति भावः॥१२-१४॥ भा.टी.-वत्सनाभ-कन्द प्रायः पाँच अंगुल से लेकर सात अंगुल तक लम्बा होता है। इसकी मोटाई या व्यास एक अंगुल से लेकर ढाई अंगुल तक होती है। यह मूल की तरफ से शिखा की तरफ मोटा होता है और वर्ण में पांडुर अर्थात् पीत श्वेत वर्ण मिश्रित होता है। इसी कन्द को वैद्य लोग वत्स- नाभ ( बछड़े की नाभि के आकार का होने से ) कहते हैं। क्योंकि इसके कन्द में शीतऋतु अथवा वसन्त ऋतु में पूर्ण वीर्य-शक्ति प्राप्त हो जाती है, अतः लम्बी मूलवाले स्थूल ( मोटा ) कन्द वत्सनाभ क्षुप को उखाड़ कर वसन्त या शीत ऋतु में वत्सनाभ विष का सञ्चय करना चाहिए ॥ १२-१४ ॥ वत्सनाभस्य भेदाः कृष्णाभः कपिशः पाण्डुर्वर्णातस्त्रिविधो मतः । वत्सनाभो विशेषेण क्रमेण गुणवत्तमः ॥१५॥ कृष्णाभ इति तस्य त्रैविध्यम् । कृष्णापेक्षया कपिशः कपिशापेक्षया च पाण्डुरो गुणवान् इति ॥१५॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५१ भा.टी.-वत्सनाभ का कन्द वर्ण ( रंग ) भेद से तीन प्रकार का पाया जाता है । १-कृष्णाभ ( कुछ काले रंग का ), २-कपिश ( पीला सफेद भूरे रंग का ), ३-पाण्डु ( पीला सफेद ) । इनमें से कृष्णवर्ण वत्सनाभ की अपेक्षा कंपिश और कपिश की अपेक्षा पाण्डुर वर्ण वत्सनाभ गुणों में उत्तम माना जाता है ॥१५॥ वत्सनाभस्य नामानि वत्सनाभो वत्सनागः दवेडोऽङ्गी च विषं मतम् । अमृतञ्च तदेवोक्तं रसतन्त्रविशारदैः ॥१६॥ रसशास्त्रज्ञ लोग, वत्सनाभ विष को वत्सनाभ, वत्सनाग, दवेड, विष तथा अमृत शब्द से व्यवहार करते हैं ॥ १६ ॥ ग्राह्यवत्सनाभस्य स्वरूपम् स्थूलं स्निग्धं गुरु नवं फलपाकोत्तरोद्धृतम् । कीटाद्यभक्षितञ्चैव विषं ग्राह्यमिहोच्यते ॥१७॥ भा.टी.-औषधिकार्य में लिया जानेवाला वत्सनाभ कन्द मोटा, बाहर से चिकना स्पर्श, गुरुभार, नवीन और फलों ( वत्सनाभ फल ) के जाने के बाद उखाड़ा हुआ तथा घुन आदि लगने से रहित होना चाहिए ॥१७॥ वत्सनाभसंशोधनस्य प्रयोजनम् अविशुद्धं विषं दाहं मोहं हृद्गतिरोधनम् । मृत्युञ्च विदधात्याशु तस्मात्तं परिशोधयेत् ॥१८॥ भा.टी.-बिना शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ विष सेवन करने या कराने से शरीर में दाह, मूर्च्छा तथा हृदयगति का अवरोध करता है, जिससे कई बार इसके अशुद्ध और अधिक प्रयोग से शीघ्र ही मनुष्य की मृत्यु हो जाया करती है । अतः इन दोषों या विकारों को दूर करने के लिए इसको सदा शुद्ध करके प्रयोग करना चाहिए ॥१८॥ वत्सनाभस्य प्रथमः शोधनप्रकारः यथोक्तगुणसंपन्नं वत्सनाभं समाहरेत् । ततश्चणकसंस्थानं खण्डशः कारयेद्भिषक् ॥१६॥ पाषाणचषके वापि मृत्तिकाभाजने ततः । गोमूत्रेण समाप्लाव्य स्थापयेत्प्रखरातपे ॥२०॥ प्रत्यहं पूर्वनिक्षिप्तं गोमूत्रमपनीय तु । दत्त्वा च नूतनं मूत्रं तीव्रघर्मे तु विन्यसेत् ॥२१॥

६५२ रसतरङ्गिणी एवं दिनत्रयं कृत्वा त्वचामपनयेत्ततः । शोषयेच्च विषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२२॥ यथोक्तगुणसम्पन्नमिति प्रथमः शोधनप्रकारः । यथोक्ता गुणाः स्थूलस्निग्ध- त्वादयः । संस्थानं आकृतिम् ॥१६-२२॥ भा.टी.-उक्त गुण (स्थूल, नव, पूर्ण रस वीर्य ) सम्पन्नवत्सनाभ विष को लेकर उसको चने के बराबर छोटे-छोटे टुकड़े कर लें । अब इन वत्सनाभ के टुकड़ों को किसी पत्थर के पात्र अथवा मिट्टी के पात्र में डालकर उसमें ताजा गोमूत्र भर दें और पात्र को तेज धूप में रख दें । प्रतिदिन प्रातःकाल पुराना पहिले का गोमूत्र निकालकर फिर उसी समय इस पात्र में नया गोमूत्र भरकर धूप में रख दें । इस प्रकार तीन दिन नया मूत्र डाल धूप में रखने के बाद इसको गोमूत्र से बाहर अलग निकालकर इसकी बाहरी त्वचा को धीरे-धीरे किसी चाकू आदि से छिल कर अलग कर दें और भीतर के शुद्ध विष को धूप में रख- कर सुखा लें । इस विधि से वत्सनाभ विष उत्तमरूप से शुद्ध हो जाता है ॥१६-२२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः विषं चणकसंस्थानं कृत्वा पोट्टलिकागतम् । सुरभीपयसा चेह दोलिकायन्त्रयोगतः ॥२३॥ यामद्वयं वा यामैकं स्वेदयेदतियत्नतः । संशोधितं विषं त्वेवं विशुद्ध्यति न संशयः ॥२४॥ गोदुग्धेन अजादुग्धेन वा दोलाया यामं स्वेदनादपि शुद्धयति ॥२३, २४॥ भा.टी.-वत्सनाभ विष को चने के बराबर टुकड़े करके एक स्वच्छ कपड़े में बाँधकर इसको पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गाय का दूध भरकर उसमें लटका दें और दोलायन्त्र को चूल्हे पर रखकर तीन अथवा छः घंटे तक पकायें इस विधि से भी वत्सनाभ की शुद्धि हो जाती है ॥२३, २४॥ वक्तव्य-दोलायन्त्र में गोदुग्ध से स्वेदन करने के बाद विष को गरम जल से धोकर सुखा लेना चाहिए । तृतीयः शोधनप्रकारः खण्डीकृतो वत्सनाभः पोट्टलीगर्भसंस्थितः । अजादुग्धेन सुस्विन्नो यामतः शुद्धिमाप्नुयात् ॥२५॥ भा.टी.--वत्सनाभविष के छोटे-छोटे टुकड़े करके उनको एक कपड़े की

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५३ पोटली में बाँधकर बकरी के दूध के द्वारा दोलायन्त्र में तीन घण्टे तक स्वेदन करने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ अथ वत्सनाभस्य गुणाः विषं तु कटुकं तिक्तमुष्णं चैव कषायकम् । योगवाहि परं चेतन्महोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २६ ॥ त्रिदोषघ्नं विशेषेण मतं वातबलासनुत् । दीपनं शीतशमनं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ २७ ॥ अग्निमान्द्यप्रशमनं प्लीहोदरनिबर्हणम् । वातरक्तापहं चैव श्वासकासविधूननम् ॥ २८ ॥ गुदामयग्रहणिाकागुल्मनिर्दलनं परम् । कुष्ठपाण्डुज्वरहरं त्वामवातप्रणाशनम् ॥ २६ ॥ विनिहन्ति विशेषेण तिमिरं च निशान्धताम् । अभिष्यन्दं नेत्रशोथं कर्णशोथञ्च दारुणम् ॥ ३० ॥ कर्णशूलं शिरःशूलं गृध्रसीं कटिवेदनाम् । आखुवृश्चिकसर्पाणां विषं चैवाविलम्बितम् ॥ ३१ ॥ विषन्तु कटुकमिति वत्सनाभस्य गुणाः । बृंहणं शरीरधातुवृद्धिकरम् । गुदामयाः अर्शांसि ॥ २६–३१ ॥ भा.टी—वत्सनाभ कटु तिक्त और कषायरस उष्ण गुण और उत्तम योग- वाही धर्मवाला होता है । यह विधिपूर्वक सेवन करने से श्रेष्ठ रसायन गुण करता है । यह अन्त:प्रयोग में त्रिदोष ( पित्त तथा कफ ) नाशक है, किन्तु विशेष रूप से वात और कफनाशक है । इसके सेवन से अग्नि वृद्धि होती है और शीत-प्रभाव शान्त हो जाता है । शरीर में पुष्टिके साथ बल की वृद्धि होती है । इसके सेवन से अग्निमान्द्यरोग, प्लीहोदररोग, वातरक्तरोग तथा श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको बवासीर, संग्रहणी और गुल्महर योगों में मिला- कर देने से उक्त व्याधियों को समूल नाश करता है। इसके सेवन से कुष्ठ (त्वचा के रोग), पाण्डु तथा ज्वर और आमवात रोगों में आराम आता है । इसके निरन्तर उपयोग से तिमिर तथा रात्र्यन्धता में विशेष रूप से आराम आता है । नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, कर्णशोथ, कर्णशूल, गृध्रसी तथा कटिवेदना में इसका प्रयोग सुखजनक होता है । इसीतरह बाह्य प्रयोग में यह चूहा, बिच्छू तथा सर्प विषों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥ २६–३१ ॥

६५४ रसतरङ्गिणी वत्सनाभस्य विशिष्टा गुणाः विषं प्राणप्रदमलं विधिना परिशीलितम् । तदेवाविधिना युक्तं मतं प्राणहरं परम् ॥ ३२ ॥ तस्माद्विषविधानज्ञो रोगाणां लक्षणानि तु । विमृश्य सूक्ष्मया बुद्ध्या प्रयुञ्जीत प्रयत्नतः ॥ ३३ ॥ विषं विशेषतो वातवेदनाहरमुत्तमम् । मूत्रलं स्वेदजननं शूलनिर्मूलनं परम् ॥ ३४ ॥ प्रवृद्धतापशमनं तथा शोथानिषूदनम् । तत्तद्धेतुप्रवृद्धाया हृद्गतेश्च नियामकम् ॥ ३५ ॥ स्वेदसञ्जनकान्येषाम् भेषजानामपेक्षया । परं तु तापशमनं न चार्त्तिस्वेदकृत्तथा ॥ ३६ ॥ प्रवृद्धरक्तसञ्चारसुसंयमनसंविधौ । अमोघाख्यमिदं ख्यातं सर्वोत्कृष्टं महौषधम् ॥ ३७ ॥ रसतंत्राच्चिकित्सायां बाहुल्येन निरूपिते । विषप्रयोगे भूम्ना तु प्रवृत्ते सति भारते ॥ ३८ ॥ पूर्वाचार्यविनिर्दिष्टं रक्तनिर्हरणादिकम् । इदानीमत एवेह तिरोभूतं तु निर्भरम् ॥ ३९ ॥ विशोधितं खलु विषं मात्रया परिशीलितम् । हृदयस्य गतिं नैवावसादयति कर्हिचित् ॥ ४० ॥ मस्तिष्कदेशे संवृद्धां रक्तसञ्चरणक्रियाम् । नाशयत्याशु मस्तिष्के जातं वा रक्तसञ्चयम् ॥ ४१ ॥ फुप्फुसच्छदशोथघ्नस्तथा फुप्फुसशोथनुत् । तथा शोथसमुद्भूतविविधज्वरवेगजित् ॥ ४२ ॥ शोथं विनाशयत्याशु हृदयावरणोत्थितम् । तथान्त्रावरणोद्भूतं ज्वरञ्च विनिहन्त्यलम् ॥ ४३ ॥ फुप्फुसच्छदशोथादिरोगाणां प्रक्रमे विषम् । प्रयुक्तं निरुणद्ध्येतत् केषांचिद्विषजां मतम् ॥ ४४ ॥ गलशोथं तुण्डिकेरीं तथैव गलशुण्डिकाम् । अन्यांशच तरुणान् कण्ठरोगानाशु निहन्त्यलम् ॥ ४५ ॥ तत्तन्स्थानसमुद्भूतं त्वभिघातादिहेतुजम् ।

बाह्यमाभ्यन्तरं रक्तस्रावं ह्रासयति द्रुतम् ॥ ४६ ॥ सदाहं सज्वरं तीव्रशिरोवेदनयान्वितम् । सदाहं भ्रूयुगं हन्ति प्रतिश्यायं नवोत्थितम् ॥ ४७ ॥ सकफां बहुरक्तां वा स्वल्परक्तामुपक्रमे । प्रवृद्धमलवेगाढ्यां विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ ४८ ॥ ऊर्ध्वजत्रुगता या तु नाडिका पञ्चमो मता । शूलं तदुत्थितं शीघ्रं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ४९ ॥ बहुवेगं वाल्पवेगं प्रगाढरक्तलोहितम् । ज्वरान्वितं तूर्ध्वगतं रक्तपित्तं व्यपोहति ॥ ५० ॥ तावदेव प्रयोक्तव्यं विषं होरात्रयोत्तरम् । गात्रतापं भवेन्नेह यावत् खलु शतांशिकम् ॥ ५१ ॥ अन्तर्दाहसमायुक्तं द्रुतं प्रबलनाडिकम् । पिपासया परिगतं द्रुतहृद्गतिसंयुतम् ॥ ५२ ॥ अजीर्णाध्मानसंयुक्तं तथैव स्वेदवर्जितम् । अतिमात्राभिसंवृद्धगात्रतापांशसंगतम् ॥ ५३ ॥ कासकम्पशिरःशूलैः पर्याकुलमनारतम् । अस्थैर्य्यारतिवैचित्यभयोद्वेगादिसंयुतम् ॥ ५४ ॥ वातवेदनयाक्रान्तं त्वारक्तमुखमण्डलम् । शुष्कोष्णचर्मसंस्पर्शं प्रगाढारक्तमूत्रकम् ॥ ५५ ॥ शीतपूर्वं तु दाहान्तं ज्वरं विविधहेतुजम् । विषं विधिप्रयुक्तं तु नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ ५६ ॥ त्रिविधोत्थानसंभूतान् विविधस्थानसंस्थितान् । निहन्ति तरुणानाशु शोथांस्तु विविधाकृतीन् ॥ ५७ ॥ विविधस्थानसंस्थानां त्वसह्यत्वप्रकाशिकाम् । स्पर्शासहां गात्रभवां वेदनाञ्च निहन्त्यलम् ॥ ५८ ॥ तत्तद्रागघ्नभैषज्ययुतं तु विमलं विषम् । योगवाहितया हन्ति सर्वानैव महामयान् ॥ ५९ ॥ नानारसप्रयोगेण शान्ति यान्ति न ये गदाः । विषप्रयोगेण तु ते शाम्यन्ति हि न संशयः ॥ ६० ॥ अथास्य भूयः गुणवर्णनं विस्तरेण यथानुभवमाह-यस्माद्विषमविधिना युक्तं

६५६ रसतरङ्गिणी मृत्युकरं तस्मात् सम्यग्विचार्य प्रयत्नतो युञ्जीतेति समन्वयः। यत्नश्च वृद्धवाग्- भटोक्तोऽप्यनुसन्धेयः। तथाहि—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशुद्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः ॥ ग्रीष्मेऽप्यात्ययिके व्याधौ।" इति। तथा—"अभ्यस्तेऽपि विषे यत्नात् वर्जनीयान् विवर्जयेत्। कट्वम्ल- तैललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा। दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् ॥ विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्यु- मेव त्वजीर्णतः" इति। प्रवृद्धस्तापः त्वगुष्मेति यावत्, तस्य शमनम्। पूर्वा- चार्यैः सुश्रुतवाग्भटादिभिः। अत एवेति हेतुसमुच्चयः। यस्माद्विषं रक्तगति- नियामकं तस्मादित्यर्थः। शुद्धं हृदयस्य गतिं नैवावसादयति। अशुद्धमतिमात्रं वा शीलितन्तु हृदयावसादकरमस्त्येवेत्यर्थः। फुप्फुसच्छदशोथः “Pleurisy” इत्याङ्गलभाषायाम्, तस्य विनाशकः। फुप्फुसशोथस्तु “Pneumonia” इत्याख्यायते पाश्चात्यभिषक्तन्त्रेषु। हृदयावरणोत्थितः शोथः “Pericarditis” इति। अन्त्रावरणोद्भूतं ज्वरमिति तत्र शोथहेतुतया जातमिति यावत्। अयं हि “Peritonitis” इत्याख्यया प्रसिद्धः। प्रक्रम इति प्रारम्भकाले। तुण्डिकेरी गलरोगविशेषः "शोथः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी श्लेष्मासृग्भ्यां तुण्डिकेरी मता तु” इत्युक्तलक्षणः। जत्रूर्ध्वगता पञ्चमी नाडिका “Fifth cranial Nerve” “Trigeminal Nerves” वा कथ्यते। अन्तर्दाहसमायुक्तमित्यादिना ज्व- रस्य सोपद्रवस्य आवस्थिकस्य विस्तरेण वर्णनम्। सत्स्वेषु लक्षणेषु विधिप्रयुक्तं विषं ज्वरं हन्ति। तरुणान् बलवतो नवीनानिति विशेषः। न संशय इति निश्चितानुभवप्रकाशनम् ॥ ३२-६० ॥ भा.टी.—यदि वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन किया जाय तो यह अत्यन्त हृद्य और बल्य होता है और यदि अविधिपूर्वक (मात्रा, देश, काल, अवस्था आदि का बिना विचार किये ही) सेवन किया जाय तो वही प्राणघातक भी हो जाता है। अतः विषप्रयोगज्ञ वैद्य को चाहिए कि वह रोगी के लक्षणों का सूक्ष्म बुद्धि से विचार करके बड़ी सावधानी के साथ विष का अन्तःप्रयोग करें। वत्सनाभ विशेष रूप से वातिक वेदनाओं के शान्त करने में उत्तम औषधि है। इसके प्रयोग से मूत्र और पसीना अधिक मात्रा में आता है। इसके सेवन से वातिकशूल तथा आमवातशूल शान्त हो जाते हैं। ज्वरों में बढ़े हुए ताप को शान्त करने के लिए इसका सेवन कराया जाता है। यह हृदयविकृति के कारण उत्पन्न शोथ को शान्त करता है। अधिक परिश्रम आमवात, फिरंग, अति तीक्ष्ण उष्ण द्रव्य सेवन चिरकाल

४२ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५७

तक तीव्रज्वर आदि कारणों से बढ़ी हुई हृदय की गति (Pulpitation) को यह नियमित करता है । अन्य स्वेदजनक औषधियों की अपेक्षा (जो कि पसीना लाकर ज्वर को कम करती हैं) यह उत्तम ज्वरशामक है और अधिक मात्रा में पसीना भी नहीं लाता है। अति अधिक बढ़े हुए रक्तसञ्चार (Blood presure) को घटाने और नियमित करने में यह वत्सनाभ अचूक और सर्वोत्कृष्ट महौ- षधि है । रक्तभाराधिक्य को कम करने के लिये आजकल भारतवर्ष में अत्य- धिक रूप से रसचिकित्सा में विष का प्रयोग होने के कारण हीं रक्तनिर्हरण (फस्त खोलना) विरेचक रक्त के दबाव को कम करनेवाले उपचार प्रायः लुप्त-से हो गये हैं । अर्थात् एकमात्र वत्सनाभ प्रयोग से फस्त खोलने आदि उपचारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है । क्योंकि शुद्ध वत्सनाभ मात्रापूर्वक सेवन करने पर कभी हृदय-गति को मन्द नहीं करता है और नहीं उसमें अनि- यमितता को उत्पन्न करता है। शुद्ध वत्सनाभ का प्रयोग मस्तिष्क में बढ़ी हुई रक्तसञ्चारण क्रिया तथा मस्तिष्क में होनेवाले रक्तसञ्चय को शीघ्र ही दूर कर देता है । शुद्ध वत्सनाभ अन्तःप्रयोग में फुप्फुसच्छदशोथ (Pleurisy) तथा फुप्फुसशोथ (Pneumonia) और शोथजन्य विविधप्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है वत्सनाभ प्रयोग से हृदयावरणजन्यशोथ (Pericarditis) तथा अन्त्रावरण शोथजन्य ज्वर (Perilenitis) नष्ट हो जाते हैं । कई चिकित्सकों का मत है कि प्लुरिसी, निमोनिया आदि रोगों के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से इन रोगों की वृद्धि रुक जाती है । गले में होनेवाले गलशोथ, तुण्डिकेरी तथा गलशुण्डिका आदि अन्यान्य कंठरोगों में विष प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । बाह्याभ्यन्तर शरीर के किसी स्थान से किसी अभि- घात आदि के कारण होनेवाले रक्तस्राव को रोकने में वत्सनाभ का प्रयोग किया जाता है । शुद्ध वत्सनाभ के प्रयोग से तीव्र शिरोवेदना, छींक, दाह तथा आँखों के दोनों भौंओं में दाह के साथ होनेवाले नूतन प्रतिश्याय में आराम आता है । कफयुक्त अधिक रक्त या अल्परक्त सहित अत्यधिक मल और वेग- युक्त प्रवाहिका के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से रोग भयंकर रूप धारण नहीं कर सकता है और शान्त हो जाता है । जत्रु ऊर्ध्वगामी जो पञ्चमी नाड़ी (Fifth cranial Nerve or Trigeminal Nerves) है उसमें होनेवाले शूल को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र ही शांत कर देता है । तीव्रवेग या अल्पवेग अत्यधिक गाढ़े लाल रंग के ज्वर सहित ऊर्ध्वगत रक्तपित्त में वत्स- नाभ का प्रयोग शीघ्र लाभ पहुँचाता है। तापांश को कम करने के लिये वत्सनाभ

६५८ रसतरङ्गिणी को तब तक हर तीसरे घण्टे बाद प्रयोग करना चाहिये जब तक कि शारीरिक ताप १०० डिग्री तक न आ जाय । १०० सौ डिग्री से कम ताप हो जाने पर विष का प्रयोग नहीं करना चाहिये । विभिन्न कारणों से उत्पन्न होनेवाले शीतपूर्व और दाहान्त अर्थात् प्रायः मलेरिया (जिसमें भीतर अधिक गर्मी मालूम पड़ती हो, नाड़ी बहुत तेज चलती हो, अत्यधिक प्यास और हृदय की गति बहुत तेज हो, पेट में अफारा और अजीर्ण हो, पसीना न आता हो और शारी- रिक तापांश बहुत बढ़ा हुआ अर्थात् १०५-१०७ डिग्री हो, रोगी कास, हस्त- पादकम्प और शिरःशूल से बहुत बेचैन हो और रोगी को किसी तरह शान्ति, चैन न आता हो और उसे बहुत घबड़ाहट और मृत्यु का डर हो, सारे शरीर में वातिक वेदनायें होती हों, मुखमण्डल लाल हो रहा हो, शारीरिक त्वचा खुश्क और गर्म हो और गाढे लाल रंग का मूत्र आ रहा हो) में तो वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन कराने से शीघ्र ही सब लक्षण और उपद्रव शान्त हो जाते हैं । शरीर के विविध स्थानों में विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाले अनेक तरुण ( नूतन) शोथों में वत्सनाभ शीघ्र लाभ पहुँचाता है। विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाली विभिन्न लक्षणोंवाली, स्पर्शासह, ( असहनीय ), रात्रि में होनेवाली शारीरिक वेदना को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र शान्त कर देता है। विष के गुणों के विषय में संक्षेप में यह समझना चाहिये कि शुद्ध वत्सनाभ को तत्तद् रोग- नाशक औषधियों के साथ मिला कर प्रयोग करने से यह योगवाहि धर्मके कारण सब प्रकार के भयंकर रोगों को नष्ट करता है। तत्तद् रोग नाशक प्रधान-प्रधान रसों के सेवन कराने से जो रोग नष्ट नहीं हो पाते हैं, वे रोग विधिपूर्वक विषके प्रयोग से शान्त हो जाते हैं ॥ ३२-६० ॥ वक्तव्य—वृद्धवाग्भट में विषसेवन के विषय में किन २ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये, उनको इस प्रकार से लिखा है—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशु- द्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः॥ ग्रीष्मेप्यात्ययिके व्याधौ" तथा "अभ्यस्तेऽपि विषे यस्मात् वर्जनीयान् विवर्जयेत् । कट्वम्लतै- ललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा । दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् । विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्युमेव त्वजीर्णतः ॥" इत्यादि । बहिः प्रयोग में वत्सनाभ स्थानिक संज्ञावाहिनियों को आरम्भ में थोड़ा सा उत्तेजित कर फिर संज्ञा रहित कर देता है, जिससे उस स्थान में होनेवाली पीडा शान्त हो जाती है । यह पराश्रयी जीवाणुहर भी है। थोड़ी मात्रा में मुख द्वारा