ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे बृहस्पति! देवों को न मानने वाला जो व्यक्ति मन से हमारी हिंसा करता है एवं असुरों
का नाश करने वाले हम लोगों को मारना चाहता है, उसका आयुध हमें छू भी न सके. हम
उस शक्तिशाली एवं दुष्ट शत्रु का क्रोध समाप्त कर दें. (१२)
भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम्.
विश्वा इदर्यो अभिदिप्सो३ मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँ इव.. (१३)
बृहस्पति युद्धकाल में आह्वान करने एवं नमस्कार सहित पूजा करने योग्य हैं. वे संग्राम
में भक्त की सहायता के लिए जाते तथा सब प्रकार का धन देते हैं. जिस प्रकार युद्ध में
शत्रुओं के रथों को नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति विजय की इच्छुक शत्रु
सेनाओं को नष्टभ्रष्ट कर देते हैं. (१३)
तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम्.
आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं१ बृहस्पते वि परिरपो अर्दय.. (१४)
हे बृहस्पति! जिन राक्षसों ने युद्धों में तुम्हारा पराक्रम देखकर भी तुम्हारी निंदा की है,
अत्यंत तीव्र एवं संतापकारिणी तलवार द्वारा उन राक्षसों को संतप्त करो, अपने प्राचीन
प्रशंसा योग्य बल को प्रकट करो तथा निंदकों का नाश करो. (१४)
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु.
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१५)
हे यज्ञ से उत्पन्न बृहस्पति! हमें श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूज्य, दीप्त एवं ज्ञान से युक्त,
यज्ञकर्त्ताओं में सुशोभित तेज तथा दीप्तियुक्त विचित्र धन प्रदान करो. (१५)
मा नः स्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः.
आ देवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः.. (१६)
हे बृहस्पति! हमें चोरों, द्रोह करके प्रसन्न होने वालों, शत्रुओं, पराए धन के इच्छुकों एवं
देवस्तुति एवं यज्ञ विरोधियों के हाथ में मत सौंपना. (१६)
विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नः साम्नः कविः.
स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि.. (१७)
हे बृहस्पति! त्वष्टा ने तुम्हें समस्त संसार से उत्तम बनाया है. तुम समस्त साममंत्रों के
ज्ञाता हो. बृहस्पति यज्ञ आरंभ करने वाले यजमान का समस्त ऋण स्वीकार करके उसे
उतारते हैं. वे यज्ञ के विद्रोही को नष्ट कर देते हैं. (१७)
तव श्रिये व्यजिहीत पर्वतो गवां गोत्रमुदसृजो यदङ्गिरः.
इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम्.. (१८)
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ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
हे अंगिरावंशोत्पन्न बृहस्पति! गायों को छिपाने वाला पर्वत तुम्हारे कल्याण के लिए खुल
गया और गाएं बाहर आ गईं. उस समय तुमने इंद्र की सहायता से वृत्र द्वारा रोकी गई
जलधारा को नीचे की ओर बहाया था. (१८)
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा:.. (१९)
हे संसार के नियामक ब्रह्मणस्पति! इस सूक्त को जानो एवं हमारी संतान की रक्षा करो.
देवगण जिसकी रक्षा करते हैं, वह सभी कल्याण प्राप्त करता है. हम शोभन पुत्र एवं पौत्र
प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१९)
सूक्त—२४ देवता—बृह्मणस्पति
सेमामविद्धि प्रभृतिं य ईशिषेऽया विधेम नवया महा गिरा.
यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव बृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम्.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम इस विश्व के स्वामी हो. तुम हमारी स्तुति को भली प्रकार जानो.
इस नवीन एवं विशाल स्तुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करते हैं. हम तुम्हारे मित्र हैं, इसलिए
हमें मनोवांछित फल प्रदान करो तथा हमारी स्तुति को सफल करो. (१)
यो नन्त्वान्यनमन्न्योजसोतादर्दर्मन्युना शम्बराणि वि.
प्राच्यावयदच्युता ब्रह्मणस्पतिरा चाविशद्वसुमन्तं वि पर्वतम्.. (२)
बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दमनीय राक्षसों को वश में किया, क्रोध करके शंबर
असुर का नाश किया, स्थिर जल को नीचे की ओर गिराया एवं गोरूपी धन से पूर्ण पर्वत में
प्रवेश किया. (२)
तद्देवानां देवतमाय कृत्वमश्रन्थन्दृळ्हाव्रदन्त वीळिता.
उद्गा आजदभिनद्ब्रह्मणा वलमगूहत्तमो व्यचक्षयत्स्वः.. (३)
इंद्रादि देवों में श्रेष्ठ बृहस्पति के कर्म से दृढ़ पर्वत शिथिल हुए थे एवं स्थिर वृक्ष टूट गए
थे. बृहस्पति ने गायों का उद्धार किया, मंत्र रूपी शक्ति द्वारा बल असुर को समाप्त किया एवं
अंधकार को समाप्त करके सूर्य को प्रकाशित किया. (३)
अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत्.
तमेव विश्वे पपिरे स्वर्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम्.. (४)
बृहस्पति ने पत्थर के समान दृढ़ मुख वाले एवं झुके हुए मेघ को शक्ति द्वारा नष्ट किया.
सूर्य किरणों ने उसका जल पिआ. उन्होंने बादल के साथ ही वर्षा द्वारा अधिक मात्रा में
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सिंचन किया. (४)
सना ता का चिद्भवना भवीत्वा माद्भिः शरद्भिरुद्नरो वरन्त वः.
अयतन्ता चरतो अन्यदन्यदिद्या चकार वयुना ब्रह्मणस्पतिः.. (५)
हे ऋत्विजो! तुम्हारे कल्याण के लिए ही बृहस्पति ने नित्य एवं विचित्र ज्ञान से प्रतिमान
और प्रतिवर्ष होने वाली जलवर्षा का द्वार भिन्न किया था. बृहस्पति ने इस ज्ञान को मंत्र का
विषय बनाया, जिससे धरती और आकाश एक-दूसरे को प्रसन्न करते रहें. (५)
अभिनक्षन्तो अभि ये तमानशुर्निधिं पणीनां परमं गुहा हितम्.
ते विद्वांसः प्रतिचक्ष्यानृता पुनर्यत उ आयन्तदुदीयुरराविशम्.. (६)
अंगिरागोत्रीय विद्वान् ऋषियों ने चारों ओर घूमते हुए पणियों द्वारा गुफा में छिपाए हुए
गोरूपी धन को प्राप्त किया. वे असुरों की माया को देखकर जिस स्थान से निकले थे, वहीं
प्रवेश कर गए. (६)
ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः.
ते बाहुभ्यां धमितमग्निमश्मनि नकिः षो अस्त्यरणो जहुर्हि तम्.. (७)
सत्यवादी एवं क्रांतदर्शी अंगिरागोत्रीय ऋषि राक्षसों की माया को देखकर वहां आने की
इच्छा से फिर प्रधान मार्ग पर पहुंच गए. उन्होंने हाथों द्वारा प्रज्वलित अग्नि को पर्वत पर
फेंका. इससे पहले वे अग्नि वहां नहीं थे. (७)
ऋतज्येन क्षिप्रेण ब्रह्मणस्पतिर्यत्र वष्टि प्र तदश्नोति धन्वना.
तस्य साध्वीरिषवो याभिरस्यति नृचक्षसो दृशये कर्णयोनयः.. (८)
ब्रह्मणस्पति सत्यरूप ज्या वाले धनुष से जो चाहते हैं, वही पा लेते हैं. वे कान से
उत्पन्न, दर्शनीय एवं कार्य साधन में कुशल बाणों को फेंकते हैं. (८)
स संनयः स विनयः पुरोहितः स सुष्टुतः स युधि ब्रह्मणस्पतिः.
चाक्ष्मो यद्वाजं भरते मती धनादित्सूर्यस्तपति तप्यतुर्वृथा.. (९)
देवों द्वारा आगे स्थापित बृहस्पति अलग-अलग पदार्थों को मिलाते और मिले हुए को
भिन्न-भिन्न करते हैं एवं युद्ध में प्रकट होते हैं. वे सर्वद्रष्टा जिस समय अन्न एवं धन धारण
करते हैं, उस समय सूर्य अनायास ही चमक उठते हैं. (९)
विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतो बृहस्पतेः सुविद्त्राणि राध्या.
इमा सातानि वेन्यस्य वाजिनो येन जना उभये भुञ्जते विशः.. (१०)
वर्षा करने वाले बृहस्पति का धन व्याप्त, प्रौढ़, मुख्य एवं सुलभ है. यह धन सुंदर एवं
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अन्नस्वामी बृहस्पति ने प्रदान किया है. स्तोता एवं यजमान दोनों प्रकार के मनुष्य ध्यानमग्न
होकर उस धन को भोगते हैं. (१०)
योऽवरे वृजने विश्वथा विभुर्महामु रण्वः शवसा ववक्षिथ.
स देवो देवान्प्रति पप्रथे पृथु विश्वेदु ता परिभूर्ब्रह्मणस्पतिः.. (११)
सब प्रकार व्याप्त एवं स्तुतियोग्य बृहस्पति अति बलवान् एवं निर्बल दोनों प्रकार के
स्तोताओं की रक्षा अपनी शक्ति से करते हैं. वे समस्त देवों के प्रतिनिधि रूप में परम प्रसिद्ध
हैं एवं सबके स्वामी हैं. (११)
विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्न प्र मिनन्ति व्रतं वाम्.
अच्छेन्द्राब्रह्मणस्पती हविर्नोऽन्नं युजेव वाजिना जिगातम्.. (१२)
हे धनस्वामी इंद्र एवं बृहस्पति! तुम्हारी सभी स्तुतियां सत्य हैं. तुम्हारे व्रत को जल नष्ट
नहीं कर सकता, रथ में जुते हुए घोड़े जिस प्रकार घास की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार तुम
हमारे हवि के सम्मुख आओ. (१२)
उताशिष्ठा अनु शृण्वन्ति वह्नयः सभेयो विप्रो भरते मती धना.
वीळुद्वेषा अनु वश ऋणमाददिः स ह वाजी समिथे ब्रह्मणस्पतिः.. (१३)
ब्रह्मणस्पति के शीघ्रगामी घोड़े हमारे स्तोत्र को सुनते हैं. सभ्य एवं बुद्धिमान् अध्वर्यु
सुंदर स्तोत्रों द्वारा हव्य प्रदान करते हैं. वह प्रबल राक्षसों से द्वेष करने वाले, अपनी इच्छा से
ऋण स्वीकार करने एवं अन्न के स्वामी हैं. वे युद्ध में हमारा हव्य स्वीकार करें. (१३)
ब्रह्मणस्पतेरभवद्यथावशं सत्यो मन्युर्महि कर्मा करिष्यतः.
यो गा उदाजत्स दिवे वि चाभजन्महीव रीतिः शवसासरात्पृथक्.. (१४)
महान् कर्म करने वाले ब्रह्मणस्पति का मंत्र उनकी इच्छा के अनुसार सत्य होता है.
उन्होंने गायों को बाहर करके आकाश का विभाग किया है. जिस प्रकार नदियों का जल
विभिन्न धाराओं में नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार गाएं अपनी शक्ति के अनुसार विभिन्न
देवों के घर गईं. (१४)
ब्रह्मणस्पते सुयमस्य विश्वहा रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः.
वीरेषु वीराँ उप पृङ्धि नस्त्वं यदीशानो ब्रह्मणा वेषि मे हवम्.. (१५)
हे ब्रह्मणस्पति! हम ऐसे धन के स्वामी बनें जो सदा नियंत्रित एवं अन्नयुक्त हो. तुम
सबके ईश्वर हो, इसलिए हमारे वीर पुत्रों को पौत्रयुक्त करो. तुम हवि एवं अन्न के साथ-साथ
हमारी स्तुति को जानो. (१५)
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
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सूक्त—२५ देवता—ब्रह्मणस्पति
विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा:.. (१६)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम इस विश्व का नियंत्रण करने वाले हो. तुम इस सूक्त को जानो एवं
हमारी संतान को प्रसन्न करो. देवगण जिसकी रक्षा करते हैं, वह सभी कल्याण प्राप्त करता
है. हम शोभन पुत्र एवं पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१६)
सूक्त—२५ देवता—ब्रह्मणस्पति
इन्धानो अग्निं वनवद्धनुष्यतः कृतब्रह्मा शूशुवद्वातहव्य इत्.
जातेन जातमति स प्र सर्सृते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (१)
यज्ञ अग्नि को प्रज्वलित करता हुआ यजमान हिंसक शत्रुओं का नाश करे. स्तोत्र पढ़ने
वाले एवं हव्य देने वाले यजमान वृद्धि प्राप्त करें. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र
के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र के पुत्र अर्थात् पौत्र से भी अधिक दिन तक
जीता है. (१)
वीरेभिर्वीरान्वनवद्वनुष्यतो गोभी रयिं पप्रथद्बोधति त्मना.
तोकं च तस्य तनयं च वर्धते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (२)
यजमान अपने वीर पुत्रों की सहायता से हिंसक शत्रुओं की हिंसा करे. वह गायरूप धन
का विस्तार करता है एवं स्वयं ही सब कुछ समझता है. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को
मित्र के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र तथा पौत्र से भी अधिक दिन तक जीता है.
(२)
सिन्धुर्न क्षोदः शिमीवाँ ऋघायतो वृषेव वध्रीँ रभि वष्ट्योजसा.
अग्नेरिव प्रसितिर्नाह वर्तवे यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (३)
बृहस्पति की सेवा करने वाला यजमान किनारों को तोड़ने वाली सरिता एवं साधारण
बैलों को हराने वाले सांड के समान शत्रुओं को अपनी शक्ति से पराजित करता है.
ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं, वह प्रज्वलित अग्नि
के समान रोका नहीं जा सकता. (३)
तस्मा अर्षन्ति दिव्या असश्चतः स सत्वभिः प्रथमो गोषु गच्छति.
अनिभृष्टतविषिर्हन्त्योजसा यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (४)
स्वर्गीय जल उसके पास न रुकने वाली सरिता के समान आता है, वह सभी सेवकों से
पहले गायें प्राप्त करता है एवं अपने अकरणीय बल से शत्रुओं को नष्ट करता है, जिसे
ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (४)
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सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति
तस्मा इद्विश्वे धुनयन्त सिन्धवोऽच्छिद्रा शर्म दधिरे पुरूणि.
देवानां सुप्रे सुभगः स एधते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः.. (५)
उसी की ओर सभी नदियां बहती हैं, वह अविच्छिन्न रूप से समस्त सुख प्राप्त करता है
एवं सौभाग्यशाली देवों द्वारा प्रदत्त सुख पाकर बढ़ता है. जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर
स्वीकार कर लेते हैं. (५)
सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति
ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत्.
सुप्रावीरिद्वनवत्पृत्सु दुष्टरं यज्छेदयज्योर्वि भजाति भोजनम्.. (१)
ब्रह्मणस्पति का सरल चित्त स्तोता के शत्रुओं का विनाश करे. देवों का वह भक्त
देवविरोधियों को पराजित करे. ब्रह्मणस्पति को तृप्त करने वाला याज्ञिक युद्ध में अदमनीय
शत्रुओं का नाश करके यज्ञविरोधियों के धन का उपभोग करे. (१)
यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये.
हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे.. (२)
हे वीर! ब्रह्मणस्पति की स्तुति करो. अभिमानी शत्रुओं के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान
करो एवं शत्रुनाशक संग्राम में अपना मन दृढ़ करो. ब्रह्मणस्पति के निमित्त हव्य तैयार करो.
इससे तुम्हें सौभाग्य मिलेगा. हम उनसे रक्षा की याचना करते हैं. (२)
स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः.
देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम्.. (३)
जो श्रद्धालु यजमान देवों के पालक ब्रह्मणस्पति की सेवा हव्य द्वारा करता है, वह
अपने आत्मीयजनों, पुत्रों एवं परिचारकों सहित अन्न और धन प्राप्त करता है. (३)
यो अस्मै इव्यैर्घृतवद्भिर्विधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः.
उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषोंऽहोश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः.. (४)
जो यजमान घृतयुक्त हव्यों से ब्रह्मणस्पति की सेवा करता है, उसे वे प्राचीन सरल मार्ग
से ले जाते हैं, पाप, शत्रुओं तथा दरिद्रता से रक्षा करते हैं और अद्भुत उपकार करते हैं. (४)
सूक्त—२७ देवता—आदित्यगण
इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि.
शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः.. (१)
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मैं सुंदर आदित्यों के लिए घृत टपकाने वाले ये स्तुति रूपी वचन सदा प्रस्तुत करता हूं.
मित्र, अर्यमा, भग, अनेक देशों में उद्भूत वरुण, दक्ष एवं अंश मेरा वचन सुनें. (१)
इमं स्तोमं सक्रतवो मे अद्य मित्रो अर्यमा वरुणो जुषन्त.
आदित्यासः शुचयो धारपूता अवृजिना अनवद्या अरिष्टाः.. (२)
दीप्यमान्, पवित्र, सब पर अनुग्रह करने वाले, अनिंदनीय, दूसरों द्वारा अहिंसित एवं
समान कार्य करने वाले मित्र, अर्यमा एवं वरुण नामक अदितिपुत्र आज मेरे इस स्तोत्र को
सुनें. (२)
त आदित्यास उरवो गभीरा अदब्धासो दिप्सन्तो भूर्यक्षाः.
अन्तः पश्यन्ति वृजिनोत साधु सर्व राजभ्यः परमा चिदन्ति.. (३)
महान्, गंभीर, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, शत्रुनाश के अभिलाषी तथा अमित तेजस्वी
अदितिपुत्र प्राणियों के अंतःकरण में रहने के कारण उनके पापपुण्यों को देखते हैं.
प्रकाशमान आदित्यों के लिए दूर की वस्तु भी पास ही है. (३)
धारयन्त आदित्यासो जगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः.
दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि.. (४)
स्थावर एवं जंगम को धारण करते हुए आदित्य देव संपूर्ण संसार की रक्षा करते हैं.
विशाल यज्ञों के स्वामी वे आदित्य प्राण के हेतु जल की रक्षा करते हैं. वे सत्ययुक्त एवं
स्तोताओं को ऋणरहित बनाने वाले हैं. (४)
विद्यामादित्या अवसो वो अस्य यदर्यमन्भय आ चिन्मयोभु.
युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम्.. (५)
हे आदित्यगण! हम तुम्हारी रक्षा प्राप्त करें. तुम्हारा सहारा भय उपस्थित होने पर सुख
देता है. हे अर्यमा, मित्र और वरुण! जिस प्रकार रास्ता चलने वाले गड्ढों को छोड़ देते हैं,
उसी प्रकार तुम्हारे अनुगामी बनकर हम पापों का त्याग कर दें. (५)
सुगो हि वो अर्यमन्मित्र पन्था अनृक्षरो वरुण साधुरस्ति.
तेनादित्या अधि वोचता नो यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म.. (६)
हे अर्यमा, मित्र एवं वरुण! तुम्हारा पथ सुगम, निष्कंटक एवं सुंदर है. हे आदित्यगण!
हमें उसी मार्ग से ले चलो, मधुर वचन बोलो तथा हमें अविनाशी सुख प्रदान करो. (६)
पिपर्तु नो अदिति राजपुत्राति द्वेषांस्यर्यमा सुगेभिः.
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य शर्मोप स्याम पुरुवीरा अरिष्टाः.. (७)
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मित्र आदि सुंदर पुत्रों की माता अदिति हमें शत्रुओं को पराभव करने वाले मार्ग से ले
चलें. हम अनेक वीर पुत्रों से युक्त एवं अन्यों द्वारा अहिंसित होकर मित्र तथा वरुण का सुख
प्राप्त करें. (७)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीँरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम्.
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन्वरुण मित्र चारु.. (८)
अदितिपुत्र धरती, आकाश, स्वर्ग तीनों लोकों एवं अग्नि, वायु, सूर्य तीनों तेजों को
धारण करते हैं तथा इनके यज्ञों में तीन व्रत स्थिर हैं. हे आदित्यो! यज्ञ से तुम्हारी महिमा बढ़ी
है. हे अर्यमा, वरुण एवं मित्र! तुम्हारा महत्त्व सुंदर है. (८)
त्री रोचना दिव्या धारयन्त हिरण्ययाः शुचयो धारपूताः.
अस्वप्नजो अनिमिषा अदब्धा उरुशंसा ऋजवे मर्त्याय.. (९)
स्वर्णाभूषण धारण करने वाले, दीप्तियुक्त, पवित्र, निद्रारहित, निमेषहीन, असुरों द्वारा
अहिंसित एवं सब लोगों द्वारा स्तुति योग्य अदितिपुत्र सरल मनुष्यों के लिए अग्नि, वायु एवं
सूर्य तीन तेज धारण करते हैं. (९)
त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः.
शतं नो रास्व शरदो विचक्षेऽश्यामायूंषि सुधितानि पूर्वा.. (१०)
हे वरुण! चाहे असुर हों, देव हों अथवा मनुष्य हों, तुम सबके राजा हो. हमें सौ वर्ष तक
देखने की शक्ति दो. हम पूर्वजों द्वारा भोगी हुई अवस्था को प्राप्त करें. (१०)
न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा.
पाक्या चिद्वसवो धीर्या चद्युष्मांनीतो अभयं ज्योतिरश्याम्.. (११)
हे वासदाता अदितिपुत्रो! हम दायां, बायां, सामने, पीछे कुछ भी नहीं जानते. मुझ
अपरिपक्व ज्ञान एवं धैर्यरहित को यदि तुम उत्तम मार्ग से ले जाओगे तो मैं भयरहित ज्योति
पाऊंगा. (११)
यो राजभ्य ऋतनिभ्यो ददाश यं वर्धयन्ति पुष्टयश्च नित्याः.
स रेवान्याति प्रथमो रथेन वसुदावा विदथेषु प्रशस्तः.. (१२)
जो यजमान सुशोभित एवं यज्ञ के नेता आदित्यों को हव्य देता है तथा पोषक आदित्य
जिसको नित्य बढ़ाते हैं, वही धन का स्वामी, प्रसिद्ध, धन दान करने वाला एवं सब लोगों की
प्रशंसा करके रथ के द्वारा यज्ञस्थल में आता है. (१२)
शुचिरपः सूयवसा अदब्ध उप क्षेति वृद्धवयाः सुवीरः.
नकिष्टं घ्नन्त्यन्तितो न दूराद्य आदित्यानां भवति प्रणीतौ.. (१३)
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जो यजमान आदित्यों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह शुचि, शत्रुओं द्वारा अहिंसित,
अधिक अन्न का स्वामी, शोभन पुत्रों वाला एवं सुंदर फसलों का मालिक बनकर जल के
समीप निवास करता है. समीप या दूर रहने वाला कोई भी शत्रु उसकी हिंसा नहीं कर सकता.
(१३)
अदिते मित्र वरुणोत मृळ यद्वो वयं चकृमा कच्चिदागः.
उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्त्राः.. (१४)
हे अदिति, मित्र एवं वरुण! यदि हम तुम्हारे प्रति कोई अपराध करें तो उससे हमारी रक्षा
करना. हे इंद्र! हम विस्तृत एवं भयरहित ज्योति प्राप्त करें. अंधेरी रात हमें व्याप्त न करे.
(१४)
उभे अस्मै पीपयतः समीची दिवो वृष्टिं सुभगो नाम पुष्यन्.
उभा क्षयावाजयन्याति पृत्सूभावर्धौ भवतः साधू अस्मै.. (१५)
जो यजमान अदितिपुत्रों के मार्ग पर चलता है, उसकी वृद्धि धरती-आकाश दोनों
मिलकर करते हैं. वह भाग्यशाली आकाश का जल प्राप्त करके वृद्धि करता है एवं युद्ध में
शत्रुओं को हरा कर अपने और उनके दोनों निवासस्थान प्राप्त करता है. संसार के चर और
अचर दोनों भाग उसके लिए मंगलकारक होते हैं. (१५)
या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः.
अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम.. (१६)
हे यज्ञ योग्य आदित्यो! तुमने जो माया द्रोहकारी राक्षसों के लिए एवं जो पाश शत्रुओं
के लिए बनाए हैं, हम उन्हें अश्वारोही के समान रथ से लांघ जावें. हम शत्रुओं द्वारा अहिंसित
होकर महान् सुख प्राप्त करें. (१६)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१७)
हे वरुण! मैं किसी धनी एवं अधिक दानी व्यक्ति के सम्मुख अपनी दरिद्रता की बात न
कहूं. हे दीप्तिमान् वरुण! हमें कभी भी आवश्यक धन की कमी न रहे. हम शोभन धन प्राप्त
करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (१७)
सूक्त—२८ देवता—वरुण
इदं कवेरादित्यस्य स्वराजो विश्वानि सान्त्यभ्यस्तु मह्ना.
अति यो मन्द्रो यजथाय देवः सुकीर्तिं भिक्षे वरुणस्य भूरेः.. (१)
यह हव्य क्रांतदर्शी एवं स्वयं शोभित आदित्य के लिए है. वे अपने महत्त्व से सभी
प्राणियों को पराजित करते हैं. तेजस्वी वरुण यजमान को प्रसन्न करते हैं. मैं वरुण से अधिक
कीर्ति की याचना करता हूं. (१)
तव व्रते सुभगासः स्याम स्वाध्यो वरुण तुष्टुवांसः.
उपायन उषसां गोमतीनामग्नयो न जरमाणा अनु द्यून्.. (२)
हे वरुण! हम भली प्रकार ध्यान, तुम्हारी स्तुति एवं सेवा करते हुए सौभाग्य प्राप्त करें.
जिस प्रकार किरणों वाली उषाओं के आने पर अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार हम
प्रतिदिन तुम्हारी स्तुति करते हुए दीप्तिसंपन्न हों. (२)
तव स्याम पुरुवीरस्य शर्मन्नुरुशंसस्य वरुण प्रणेतः.
यूयं नः पुत्रा अदितेरदब्धा अभि क्षमध्वं युज्याय देवाः.. (३)
हे विश्वनायक, अनेक वीरों से युक्त एवं बहुत से लोगों द्वारा स्तुत्य वरुण! हम तुम्हारे गृह
में निवास करें. हे शत्रुओं द्वारा अहिंसित अदितिपुत्रो! अपना मित्र बनाते समय हमारे सभी
अपराधों को क्षमा कर देना. (३)
प्र सीमादित्यो असृजद्विधर्ता ऋतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति.
न श्राम्यन्ति न वि मुचन्त्येते वयो न पप्तू रघुया परिज्मन्.. (४)
विश्वधारक एवं अदितिपुत्र वरुण ने जल बनाया है. उन्हीं के महत्त्व से नदियां बहती हैं.
नदियां न कभी विश्राम करती हैं और न पीछे लोटती हैं. ये शीघ्रगामिनी नदियां पक्षियों के
समान वेग से धरती पर बहती हैं. (४)
वि मच्छ्रथाय रशनामिवाग ऋध्याम ते वरुण खामृतस्य.
मा तन्तुश्छेदि वयतो धियं मे मा मात्रा शार्यपसः पुर ऋतोः.. (५)
हे वरुण! पाप ने मुझे रस्सी के समान बांध लिया है. मुझे इससे छुड़ाओ. हम तुम्हारी
जलपूर्ण नदी को प्राप्त करें. यज्ञकर्म करते समय मेरा कार्य रुके नहीं. यज्ञ समाप्ति से पहले
मेरा शरीर कभी शिथिल न हो. (५)
अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत्सम्राळ्ऋतावोऽनु मा गृभाय.
दामेव वत्साद्वि मुमुग्ध्यंहो नहि त्वदारे निमिषश्चनेशे.. (६)
हे वरुण! भय को मेरे पास से हटाओ. हे शोभासंपन्न एवं सत्ययुक्त! मुझ पर अनुग्रह
करो. जिस प्रकार बंधे हुए बछड़े को रस्सी से छुड़ाते हैं, उसी प्रकार मुझे पाप से छुड़ाओ.
तुमसे दूर रहकर कोई एक पल के लिए भी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता. (६)
मा नो वधैर्वरुण ये त इष्टावेनः कृण्वन्तमसुर भ्रीणन्ति.
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त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८)
मा ज्योतिषः प्रवस्थानि गन्म वि षू मृधः शिश्रथो जीवसे नः.. (७)
हे प्राणरक्षक वरुण! तुम्हारे जो आयुध यज्ञविरोधियों का विनाश करते हैं, वे हमें न मारें.
हम सूर्य के प्रकाश से दूर न रहें. हमारे जीवन के हिंसकों को हमसे दूर हटाओ. (७)
नमः पुरा ते वरुणोत नूनमुतापरं तुविजात ब्रवाम.
त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८)
हे अनेक प्रदेशों में प्रकट होने वाले वरुण! हमने भूतकाल में तुम्हें नमस्कार किया है,
वर्तमान काल में करते हैं और भविष्यत् काल में करेंगे. हे हिंसा के अयोग्य वरुण! तुम में
पर्वत के समान अच्युत शक्तियां व्याप्त हैं. (८)
पर ऋणा सावीरध मत्कृतानि माहं राजन्नन्यकृतेन भोजम्.
अव्युष्टा इन्तु भूयसीरुषास आ नो जीवान्वरुण तासु शाधि.. (९)
हे राजा वरुण! हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा लिए गए ऋणों से हमें छुटकारा दिलाओ. मैंने
वर्तमान काल में जो ऋण लिया है, उससे भी मुझे छुड़ाओ. मैं दूसरे के उपार्जित धन से
जीवनयात्रा न करूं. ऋण के कारण ऋणकर्त्ता के लिए मानो उषाओं का उदय होता ही नहीं.
ऐसी आज्ञा दो, जिससे हम उन सब उषाओं में जाग्रत रहें. (९)
यो मे राजन्युज्यो वा सखा वा स्वप्ने भयं भीरवे मह्यमाह.
स्तेनो वा यो दिप्सति नो वृको वा त्वं तस्माद्वरुण पाह्यस्मान्.. (१०)
हे राजा वरुण! मुझ भीरु को स्वप्न की भयानक बातें कहने वाले मित्र से बचाओ. मुझे
हिंसा करने वाले चोर एवं भेड़िए से बचाओ. (१०)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (११)
हे वरुण! मुझे किसी धनी एवं दानी पुरुष के सामने अपनी निर्धनता न बतानी पड़े. हे
राजन्! मेरे पास जीवन के लिए आवश्यक धन की कमी न हो. हम शोभन पुत्र-पौत्रों को
प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (११)
सूक्त—२९ देवता—विश्वेदेव
धृतव्रता आदित्या इषिरा आरे मत्कर्त रहसूरिवागः.
शृण्वतो वो वरुण मित्र देवा भद्रस्य विद्वाँ अवसे हुवे वः.. (१)
हे व्रतधारी, सबके प्रार्थनीय एवं शीघ्रगामी अदितिपुत्रो! जिस प्रकार व्यभिचारिणी
गुप्तरूप से जन्म लेने वाले बालक को दूर फेंक देती है, उसी प्रकार तुम मेरा पाप मुझसे दूर
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हटा दो. हे मित्र और वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा किए हुए मंगल कार्यों को जानता हूं. मैं तुम्हें रक्षा
के लिए बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. (१)
यूयं देवाः प्रमतिर्यूयमोजो यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोत.
अभिक्षत्तारो अभि च क्षमध्वमद्या च नो मृळयतापरं च.. (२)
हे देवो! तुम उत्तम बुद्धि एवं बलसंपन्न हो. तुम हमारे विरोधियों को गुप्त स्थान में ले
जाओ. हे शत्रुनाशक देवो! तुम भी हमारे शत्रुओं को हराओ एवं आज तथा आने वाले कल में
सुखी करो. (२)
किमूं नु वः कृणवामापरेण किं सनेन वसव आप्येन.
यूयं नो मित्रावरुणादिते च स्वस्तिमिन्द्रामरुतो दधात.. (३)
हे देवो! हम आज या आने वाले दिनों में तुम्हारा कौन सा कार्य कर सकते हैं? अर्थात्
कोई नहीं. हम सनातन प्राप्तव्य कार्य द्वारा भी कुछ नहीं कर सकते. हे मित्र, वरुण, अदिति,
इंद्र एवं मरुद्गण! हमारा कल्याण करो. (३)
हये देवा यूयमिदापयः स्थ ते मृळत नाधमानाय मह्यम्.
मा वो रथे मध्यमवाळ्ते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म.. (४)
हे देवो! तुम्हीं हमारे बांधव हो. प्रार्थना करने वाले हम लोगों को तुम सुख दो. हमारे यज्ञ
में आते समय तुम्हारे रथ की गति मंद न हो. तुम बांधवों के होते हुए हम परेशान न हों. (४)
प्र व एको मिमय भूर्यागो यन्मा पितेव कितवं शशास.
आरे पाशा आरे अघानि देवा मा माधि पुत्रे विमिव ग्रभीष्ट.. (५)
हे देवगण! मैंने मनुष्य होते हुए भी तुम लोगों के बीच रहकर अपने बहुत से पाप नष्ट
किए हैं. जिस प्रकार पिता कुमार्गगामी पुत्र को रोकता है, उसी प्रकार तुमने मुझे अनुशासन
में रखा है. हे देवो! मुझे बंधन और पाप से दूर रखो. व्याध जिस प्रकार पुत्र के सामने पक्षी
पिता को मारता है, उसी प्रकार मुझे मत मारना. (५)
अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्ययेयम्.
त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्राः.. (६)
हे यज्ञ योग्य देवो! इस समय हमारे सामने आओ. मैं डरता हुआ तुम्हारे हृदय में आश्रय
पाऊं. हे देवो! भेड़िए की हिंसा से हमें बचाओ. हे यज्ञपात्रो! हमें विपत्ति में डालने वालों से
बचाओ. (६)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (७)
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सूक्त—३० देवता—इंद्र आदि
हे राजा वरुण! मुझे किसी धनी एवं दानी पुरुष के सामने अपनी निर्धनता न कहनी
पड़े. मेरे पास जीवन के लिए आवश्यक धन की कमी न हो. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके
इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (७)
सूक्त—३० देवता—इंद्र आदि
ऋतं देवाय कृण्वते सवित्र इन्द्राय़ाहिघ्ने न रमन्त आपः.
अहरहर्यात्यक्तुरपां कियात्या प्रथमः सर्ग आसाम्.. (१)
वर्षा करने वाले, गतिमान, सबको प्रेरणा देने वाले एवं वृत्रनाशकर्त्ता इंद्र के यज्ञ के लिए
पानी कभी नहीं रुकता. जल का प्रवाह प्रतिदिन उसी प्रकार बहता है, जिस प्रकार वह अपनी
पहली सृष्टि में हुआ था. (१)
यो वृत्राय सिनमत्राभरिष्यत्प्र तं जनित्री विदुष उवाच.
पथो रदन्तीरनु जोषमस्मै दिवेदिवे धुनयो यन्त्यर्थम्.. (२)
जिस व्यक्ति ने इस पाकशाला में वृत्र असुर को अन्न दिया था, माता अदिति ने उसके
विषय में इंद्र को बता दिया. इंद्र की इच्छा के अनुसार नदियां अपना रास्ता बनाती हुई
प्रतिदिन समुद्र के पास जाती हैं. (२)
ऊर्ध्वो ह्यस्थादध्यन्तरिक्षेऽधा वृत्राय प्र वधं जभार.
मिहं वसान उप हीमदुद्रोत्तिग्मायुधो अजयच्छत्रुमिन्द्रः.. (३)
इस वृत्र ने आकाश में ऊपर उठकर सब पदार्थों को ढक लिया था, इसलिए इंद्र ने उसके
ऊपर वज्र फेंका. मेघ से ढका हुआ वृत्र इंद्र की ओर दौड़ा तभी तीखे आयुध वाले इंद्र ने उसे
हरा दिया. (३)
बृहस्पते तपुषाश्वेव विध्य वृकद्द्वरसो असुरस्य वीरान्.
यथा जघन्थ धृषता पुरा चिदेवा जहि शत्रुमस्माकमिन्द्र.. (४)
हे बृहस्पति! वज्र के समान संतापकारी एवं अस्त्र के द्वारा बंद करने वाले असुर के पुत्रों
का नाश करो. हे इंद्र! तुमने प्राचीनकाल में हमारे शत्रुओं को जिस प्रकार नष्ट किया था, उसी
प्रकार इस समय शत्रुओं का नाश करो. (४)
अव क्षिप दिवो अश्मानमुच्चा येन शत्रुं मन्दसानो निजूर्वाः.
तोकस्य सातौ तनयस्य भूरेरस्माँ अर्धं कृणुतादिन्द्र गोनाम्.. (५)
हे ऊपर निवास करने वाले इंद्र! तुमने स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर आकाश से भी
पाषाण तुल्य कठिन वज्र फेंककर शत्रु को नष्ट किया था, उसी वज्र को नीचे की ओर फेंको.
हमें ऐसी समृद्धि दो, जिससे हम अधिक मात्रा में पुत्र-पौत्र तथा गाएं प्राप्त कर सकें. (५)
प्र हि क्रतुं वृहथो यं वनुथो रध्रस्य स्थो यजमानस्य चोदौ.
इन्द्रासोमा युवमस्माँ अविष्टमस्मिन्भयस्थे कृणुतमु लोकम्.. (६)
हे इंद्र व सोम! तुम जिस बैरी की हिंसा करो, उसका भली-भांति उच्छेद कर दो तथा
सेवक यजमानों के शत्रुओं के प्रेरक बनो. तुम दोनों हमारी रक्षा करो एवं इस भयानक युद्ध में
हमारे स्थान को निर्भर बनाओ. (६)
न मा तमन्न श्रमन्नोत तन्द्रन्न वोचाम मा सुनोतेति सोमम्.
यो मे पृणाद्यो ददद्यो निबोधाद्यो मा सुन्वन्तमुप गोभिरायत्.. (७)
इंद्र मुझे न कष्ट दें, न थकावें, न आलसी बनावें और न हमसे यह कहें कि सोमाभिषव
मत करो. वे मेरी इच्छाओं को पूर्ण करते हुए, दान करते हुए, हमारे यज्ञ को जानते हुए एवं
गायों को साथ लेते हुए सोमरस निचोड़ने वाले के पास जावें. (७)
सरस्वति त्वमस्माँ अविड्ढि मरुत्वती धृषती जेषि शत्रून्.
त्यं चिच्छर्धन्तं तविषीयमाणमिन्द्रो हन्ति वृषभं षण्डिकानाम्.. (८)
हे सरस्वती! तुम हमें बचाओ एवं मरुद्गणों से युक्त होकर शत्रुओं को दबाती हुई
पराजित करो. इंद्र ने षंडों के प्रधान षंडामर्क को मार डाला. वे स्वयं को शूर समझते थे एवं
इंद्र से स्पर्धा करने लगे थे. (८)
यो नः सनुत्य उत वा जिघत्नुर्अभिख्याय तं तिगितेन विध्य.
बृहस्पत आयुधैर्जैषि शत्रून्द्रुहे रीषन्तं परि धेहि राजन्.. (९)
हे बृहस्पति! जो चोर छिपकर हमारी हत्या करना चाहता है, उसे खोजकर तीखे
आयुधों से छिन्नभिन्न करो तथा अपने आयुधों से हमारे शत्रुओं को जीतो. हे राजन!
द्रोहकारियों के ऊपर हिंसक वज्र चारों ओर से फेंको. (९)
अस्माकेभिः सत्वभिः शूर शुरैर्वीर्या कृधि यानि ते कर्त्वानि.
ज्योग्भूवन्ननुधूपितासो हत्वी तेषामा भरा नो वसूनि.. (१०)
हे शूर इंद्र! हमारे शत्रुनाशक वीर पुरुषों के साथ मिलकर अपने कर्त्तव्य कार्यों को पूरा
करो. तुम बहुत दिनों से घमंडी बने हुए हमारे शत्रुओं को नष्ट करके उनका धन हमें दो. (१०)
तं वः शर्धं मारुतं सुम्नयुर्गिरोप ब्रुवे नमसा दैव्यं जनम्.
यथा रयिं सर्ववीरं नशामहा अपत्यसाचं श्रुत्यं दिवेदिवे.. (११)
हे मरुद्गण! हम सुख की इच्छा से नमस्कार द्वारा तुम्हारी दिव्य, उत्पन्न तथा सम्मिलित
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सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
शक्ति की प्रशंसा करते हैं. हम उससे वीर संतान पाकर प्रतिदिन उत्तम धन का उपभोग कर
सकें. (११)
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
अस्माकं मित्रावरुणावतं रथमादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा.
प्र यद्द्यो न पप्तन्वस्मनस्परि श्रवस्यवो हृषीवन्तो वनर्षदः.. (१)
हे मित्र एवं वरुण! जब हमारा रथ अन्न के इच्छुक, हर्षयुक्त एवं वनवासी पक्षियों के
समान हमारे निवासस्थान से दूसरे स्थान को जाये, तब तुम आदित्यों, रुद्रों तथा वसुओं के
साथ मिलकर उस रथ की रक्षा करना. (१)
अध स्मा न उदवता सजोषसो रथं देवासो अभि विक्षु वाजयुम्.
यदाश्वः पद्भाभिस्तिष्ठतो रजः पृथिव्याः सानौ जङ्घनन्त पाणिभिः.. (२)
हे समान रूप से प्रसन्न देवो! इस समय जनपदों में अन्न की खोज में गए हुए हमारे रथ
को गतिशील बनाओ, क्योंकि इस रथ में जुड़े हुए घोड़े अपनी गतियों से मार्ग तय करते हैं एवं
उठी हुई धरती पर अपने खुरों से बहुत तेज चलते हैं. (२)
उत स्य न इन्द्रो विश्वचर्षणिर्दिवः शर्धेन मारुतेन सुक्रतुः.
अनु नु स्थात्यवृकाभिरूतिभी रथं महे सनये वाजसातये.. (३)
अथवा समस्त लोक को देखने वाले एवं मरुद्गण की शक्ति से उत्तम कर्म करने वाले
इंद्र हिंसारहित रक्षासाधनों के साथ स्वर्ग से आकर अधिक धन और अन्न को पाने के लिए
अनुकूल बनें. (३)
उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम्.
इळा भगो बृहद्दिवोत रोदसी पूषा पुरन्धिरश्विनावधा पती.. (४)
अथवा संपूर्ण विश्व के पूज्य त्वष्टा देव देवपत्नियों के साथ मिलकर प्रेमपूर्वक हमारे उक्त
रथ को आगे बढ़ावें. इड़ा, परम तेजस्वी भग, धरती आकाश, परमबुद्धियुक्त पूषा एवं सूर्या के
पति अश्विनीकुमार हमारा रथ चलाएं. (४)
उत त्ये देवी सुभगे मिथूदृषोषासानक्ता जगतामपीजुवा.
स्तुषे यद्वां पृथिवि नव्यसा वचः स्थात्तुश्च वयस्त्रिवया उपस्तिरे.. (५)
अथवा प्रसिद्ध देवियां, सुंदर, एक-दूसरे को देखने वाली एवं चलने वाले जीवों की प्रेरक
उषा और निशा हमारे रथ को चलावें. हे धरती और आकाश! मैं तुम्हारी नवीन वचनों से
स्तुति करता हूं एवं ओषधि, सोम तथा पशु तीन प्रकार के अन्नों के साथ स्थावर हव्य प्रदान
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करता हूं. (५)
उत वः शंसमुशिजामिव श्मस्यहिर्बुध्न्यो३ज एकपादुत.
त्रित ऋभुक्षाः सविता चनो दधेऽपां नपादाशुहेमा धिया शमि.. (६)
हे देवो! हम तुम्हारी स्तुति करने के इच्छुक हैं. तुम हमारी स्तुति को पंसद करो.
अहिर्बुध्न्य, अजएकपात, सविता, ऋभुक्षा एवं त्रित हमें अन्न दें. जल के नाती, शीघ्रगामी
अग्नि हमारे यज्ञकर्म से प्रसन्न हों. (६)
एता वो वश्म्युद्यता यजत्रा अतक्षन्नायवो नव्यसे सम्.
श्रवस्यवो वाजं चकानाः सप्तिर्न रथ्यो अह धीतिमश्याः.. (७)
हे यज्ञ के योग्य देवो! तुम स्तुतियोग्यों की अन्न और बल की इच्छा करने वाले हम स्तुति
करना चाहते हैं. रथ के घोड़े के समान तुम्हारा बल हमें प्राप्त हो. (७)
सूक्त—३२ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि
अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः.
ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे.. (१)
हे द्यावापृथ्वी! यज्ञ करने के इच्छुक एवं तुम्हें प्रसन्न करने के लिए प्रयत्नशील मुझ
स्तोता की रक्षा करो. सबकी अपेक्षा उत्कृष्ट अन्न वाले एवं अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित तुम्हारी
स्तुति मैं अन्नप्राप्ति की अभिलाषा से विशाल स्तोत्रों द्वारा करूंगा. (१)
मा नो गुह्या रिप आयोरहन्भन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः.
मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे.. (२)
हे इंद्र! शत्रुजनों की गुप्त माया हमें रात में अथवा दिन में कभी भी नष्ट न करे. हमें दुःख
देने वाली शत्रु सेनाओं के वश में मत होने देना. हमारी मित्रता अपने मन से अलग मत करना.
हम तुमसे यही कामना करते हैं कि अपने मन में हमारा सुख चाहते हुए हमारी मित्रता को
याद रखना. (२)
अहेळता मनसा श्रुष्टिमावह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम्.
पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा.. (३)
हे इंद्र! क्रोधरहित मन से सुखकारी, दुधारू, मोटी एवं दृढ़ांग गाय लेकर आना. हे
बहुजनों द्वारा बुलाए गए शीघ्रगामी एवं जल्दी-जल्दी बोलने वाले इंद्र! मैं प्रतिदिन तुम्हारी
स्तुति करता हूं. (३)
राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना.
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सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (४)
मैं उत्तम स्तुतियों द्वारा आह्वान के योग्य राका देवी को बुलाता हूं. वह सुभगा हमारी
पुकार सुनें एवं हमारा अभिप्राय स्वयं जान लें. वह छेदरहित सूई से हमारे कर्मों को बुनती हुई
हमें वीर एवं बहुदानदाता पुत्र दें. (४)
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि.
ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा.. (५)
हे राका देवी! तुम्हारी जो शोभन रूप वाली उत्तम बुद्धियां हैं एवं जिनके द्वारा तुम
यजमान को धन देती हो, आज प्रसन्नचित्त होकर उसी बुद्धि के साथ पधारो. हे सुभगा राका!
तुम हजारों प्रकार से हमारा पोषण करती हो. (५)
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः.. (६)
हे मोटी जंघाओं वाली सिनीवाली! तुम देवों की बहिन हो. हमारा दिया हुआ हव्य
स्वीकार करो एवं संतान दो. (६)
या सुबाहुः स्वङ्गुरिः सुषूमा बहुसूवरी.
तस्यै विशपत््न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन.. (७)
जो सिनीवाली सुंदर बाहुओं एवं सुंदर उंगलियों वाली, शोभन पुत्रों वाली तथा अनेक
की जन्मदात्री है, उसी विश्वरक्षिका देवी के उद्देश्य से हव्य प्रदान करो. (७)
या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती.
इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये.. (८)
मैं अपनी रक्षा एवं सुख के लिए कई सिनीवाली, राका, सरस्वती, इंद्राणी और वरुणानी
को बुलाता हूं. (८)
सूक्त—३३ देवता—रुद्र
आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्यस्य सन्दृशो युयोथाः.
अभि नो वीरा अर्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः.. (१)
हे मरुतों के पिता रुद्र! तुम्हारा दिया हुआ सुख हमें मिले. हमें सूर्य के दर्शन से अलग
मत करना. हमारे शक्तिशाली पुत्र युद्ध में शत्रुओं को हरावें. हे रुद्र! हम पुत्र-पौत्र आदि से
बहुत बनें. (१)
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त्वादत्तेभी रुद्र शन्तमेभिः शतं हिमा अशीय भेषजेभिः.
व्य१स्मद्द्वेषो वितरं व्यंहो व्यमीवाश्चातयस्वा विषूचीः.. (२)
हे रुद्र! हम तुम्हारी दी हुई सुखकारी ओषधियों की सहायता से सौ वर्ष तक जीवित रहें.
हमारे शत्रुओं का विनाश करो, हमारे पाप को दूर करो एवं हमारे शरीर में फैली बीमारियों को
मिटाओ. (२)
श्रेष्ठो जातस्य रुद्र श्रियासि तवस्तमस्तवसां वज्रबाहो.
पर्षि णः पारमंहसः स्वस्ति विश्वा अभीती रपसो युयोधि.. (३)
हे रुद्र! तुम ऐश्वर्य से सब प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो. हे वज्रबाहु! तुम बढ़े हुए लोगों में
अतिशय उन्नत हो. हमें कुशलता के साथ पाप के उस पार ले जाओ एवं सभी पापों को हमसे
दूर ले जाओ. (३)
मा त्वा रुद्र चुक्रुधामा नमोभिर्मा दुष्टुती वृषभ मा सहूती.
उन्नो वीराँ अर्पय भेषजेभिर्भिषक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि.. (४)
हे अभिलाषापूरक रुद्रो! हम विधिविरुद्ध नमस्कारों, अशोभन स्तुतियों एवं अन्य देवों के
साथ आह्वान द्वारा तुम्हें क्रोधित न करें. हमारे पुत्रों को अपनी ओषधियों द्वारा उत्तम बनाओ.
हमने सुना है कि तुम वैद्यों में सबसे श्रेष्ठ हो. (४)
हवीमभिर्हवते यो हविर्भिरेव स्तोमेभी रुद्रं दिषीय.
ऋदूदरः सुहवो मा नो अस्यै बभ्रुः सुशिप्रो रीरधन्मनायै.. (५)
जो रुद्र हव्य के साथ-साथ आह्वानाें से बुलाए जाते हैं, उनका क्रोध मैं स्तोत्रों द्वारा मिटा
दूंगा. कोमल उदर वाले, शोभन आह्वान से युक्त, पीले रंग वाले एवं सुंदर नाक वाले रुद्र मेरे
प्रति हिंसा बुद्धि न रखें. (५)
उन्मा ममन्द वृषभो मरुत्वान्त्वक्षीयसा वयसा नाधमानम्.
घृणीव च्छायामरपा अशीया विवासेयं रुद्रस्य सुम्नम्.. (६)
मैं कामवर्षक एवं मरुतों से युक्त रुद्र से प्रार्थना करता हूं कि वे मुझे उत्तम अन्न से तृप्त
करें. धूप से व्याकुल व्यक्ति जिस प्रकार छाया में प्रवेश करता है, उसी प्रकार पापरहित होकर
रुद्र द्वारा दिए हुए सुख को भोगने के लिए मैं उनकी सेवा करूंगा. (६)
क्व१स्य ते रुद्र मृळयाकुर्हस्तो यो अस्ति भेषजो जलाषः.
अपभर्ता रपसो दैव्यस्याभी नु मा वृषभ चक्षमथाः.. (७)
हे रुद्र! तुम्हारा वह सुखदाता हाथ कहां है, जो सबको सुख पहुंचाने वाली दवाएं बनाता
है? हे कामवर्षक रुद्र! तुम देवकृत पाप का विनाश करते हुए मुझे जल्दी क्षमा करो. (७)
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प्र बभ्रवे वृषभाय श्वितीचे महो महीं सुष्टुतिमीरयामि.
नमस्या कल्मलीकिनं नमोभिर्गृणीमसि त्वेषं रुद्रस्य नाम.. (८)
मैं पीले रंग वाले, कामवर्षी एवं श्वेत आभायुक्त रुद्र के प्रति परम महान् स्तुतियां बार-
बार बोलता हूं. हे स्तोता! नमस्कार द्वारा तेजस्वी रुद्र की पूजा करो. मैं रुद्र का उज्ज्वल नाम
संकीर्तन करता हूं. (८)
स्थिरेभिरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः.
ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद्रुद्रादसुर्यम्.. (९)
दृढ़ अंग वाले, बहुरूप, तेजस्वी एवं पीले रंग वाले रुद्र चमकीले तथा सोने के बने
आभूषणों से सुशोभित हैं. संपूर्ण भुवनों के स्वामी एवं भर्ता रुद्र का बल कभी अलग नहीं
होता. (९)
अर्हन्बिभर्षि सायकानि धन्वार्हन्निष्कं यजतं विश्वरूपम्.
अर्हन्निदं दयसे विश्वमभ्यं न वा ओजीयो रुद्र त्वदस्ति.. (१०)
हे पूज्य रुद्र! तुम बाण और धनुष धारण करते हो. हे पूजा योग्य! तुमने पूजनीय एवं
बहुरूप वाले हार को धारण किया है. तुम इस विस्तृत संसार की रक्षा करते हो. तुम्हारी
अपेक्षा अधिक शक्तिशाली कोई नहीं है. (१०)
स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्.
मृळा जरित्रे रुद्र स्तवानोऽन्यं ते अस्मन्नि वपन्तु सेनाः.. (११)
हे स्तोता! प्रसिद्ध, रथ पर बैठे हुए, युवा, पशु के समान भयानक, शत्रुनाशक तथा उग्र
रुद्र की स्तुति करो. हे रुद्र! हम स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा करो. तुम्हारी सेना हमारे अतिरिक्त
अन्य लोगों का संहार करे. (११)
कुमारश्चित्पितरं वन्दमानं प्रति नानाम् रुद्रोपयन्तम्.
भूरेर्दातारं सत्पतिं गृणीषे स्तुतस्त्वं भेषजा रास्यस्मे.. (१२)
हे रुद्र! जिस प्रकार पुत्र आशीर्वाद देने वाले पिता को नमस्कार करता है, उसी प्रकार
आते हुए तुमको हम नमस्कार करें. हम अधिक दान करने वाले एवं सज्जन के बालक
तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें ओषधि दो. (१२)
या वो भेषजा मरुतः शुचीनि या शन्तमा वृषणो या मयोभु.
यानि मनुरवृणीता पिता नस्ता शं च योश्च रुद्रस्य वश्मि.. (१३)
हे अभीष्टवर्षक मरुद्गण! तुम्हारी जो ओषधियां शुद्ध एवं अत्यधिक सुख देने वाली हैं,
जिन्हें हमारे पिता मनु ने पसंद किया था, रुद्र की उन्हीं सुखदायक व भयनाशक ओषधियों
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की हम इच्छा करते हैं. (१३)
परि णो हेती रुद्रस्य वृज्याः परि त्वेषस्य दुर्मतिर्मही गात्.
अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृळ.. (१४)
रुद्र का आयुध हमारा त्याग कर दे. रुद्र की दुःखकारिणी विशाल भावना भी हमसे दूर
रहे. हे अभिलाषापूरक रुद्र! अपने धनुष की कठोर डोरी यजमान के प्रति ढीली करो एवं
हमारे पुत्र-पौत्रों को सुख दो. (१४)
एवा बभ्रो वृषभ चेकितान यथा देव न हृणीषे न हंसि.
हवनश्रुन्नो रुद्रेह बोधि बृहद्वदेम विदथे सुवीराः. (१५)
हे पीले रंग वाले, कामवर्षक, सर्वज्ञ, तेजस्वी एवं पुकार सुनने वाले रुद्रदेव! इस यज्ञ में
ऐसा विचार बनाओ कि तुम हमारे प्रति न कभी क्रोध करो और न हमें मारो. हम उत्तम पुत्र-
पौत्र पाकर इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१५)
सूक्त—३४ देवता—मरुद्गण
धारावरा मरुतो धृष्णवोजसो मृगा न भीमास्तविषीभिरर्चिनः.
अग्नयो न शुशुचाना ऋजीषिणो भूमिं धमन्तो अप गा अवृण्वत.. (१)
स्थिर वृक्ष आदि को चंचल करने वाले, अपनी शक्ति से सबको पराजित करने वाले, पशु
के समान भयानक, अपने बल द्वारा समस्त संसार को व्याप्त करने वाले, अग्नि के समान
दीप्त एवं जल से युक्त मरुद्गण घूमने वाले बादलों को छिन्न-भिन्न करके जल बरसाते हैं. (१)
द्यावो न स्तृभिश्चित्यन्त खादिनो व्य१ भ्रिया न द्युतयन्त वृष्टयः.
रुद्रो यद्वो मरुतो रुक्मवक्षसो वृषाजनि पृश्न्याः शुक्र ऊधनि.. (२)
हे सीने पर दीप्त आभरणों वाले मरुद्गण! कामवर्षक रुद्र ने तुम्हें पृश्नि के निर्मल उदर
से पैदा किया है. तुम अपने आभूषणों से उसी प्रकार शोभा पाते हो, जिस प्रकार आकाश
तारागण से शोभित होता है. शत्रुक्षक एवं जलवर्षक मरुद्गण बादलों में बिजली के समान
प्रकाशित होते हैं. (२)
उक्षन्ते अश्वाँ अत्याँ इवाजिषु नदस्य कर्णैस्तुरयन्त आशुभिः.
हिरण्यशिप्रा मरुतो दविध्वतः पृक्षं याथ पृषतीभिः समन्यवः. (३)
जिस प्रकार घोड़े युद्ध में पसीने से धरती सींच देते हैं, उसी प्रकार संसार को सींचने
वाले मरुद्गण घोड़े पर चढ़कर गर्जन करते हुए बादल के कान के पास से जल्दी से निकल
जाते हैं. सोने के टोप वाले, समान क्रोध वाले एवं वृक्ष कंपित करने वाले मरुतो! तुम काली
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