ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—२० देवता—ऋभुगण
मरुद्गणों के साथ आओ. (९)
सूक्त—२० देवता—ऋभुगण
अयं देवाय जन्मने स्तोमो विप्रेभिरासया. अकारि रत्नधातमः.. (१)
जिन ऋभुओं ने जन्म धारण किया था, उन्हीं को लक्ष्य करके बुद्धिमान् ऋत्विजों ने
पर्याप्त धन देने वाला यह स्तोत्र अपने मुख से उच्चारण किया. (१)
य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी. शमीभिर्यज्ञमाशत.. (२)
जिन ऋभुओं ने इंद्र को प्रसन्न करने के लिए अपने मन से ऐसे घोड़े बनाए हैं, जो आज्ञा
पाते ही रथ में जुत जाते हैं. वे ही शमी वृक्ष से निर्मित चमस आदि लेकर इस यज्ञ में आवें.
(२)
तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम्. तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम्.. (३)
ऋभुओं ने दोनों अश्विनीकुमारों के लिए रथ बनाया, जिसकी गति सर्वत्र समान थी तथा
उन्होंने दूध देने वाली एक गाय उत्पन्न की. (३)
युवाना पितरा पुनः सत्यमन्त्रा ऋजूयवः. ऋभवो विष्ट्यक्रत.. (४)
छलरहित और सर्वकार्यसाधक ऋभुओं के मंत्र सदा सफलता प्राप्त करते हैं. उन्होंने
अपने माता-पिता को दोबारा युवा बना दिया था. (४)
सं वो मदासो अग्मतेन्द्रेण च मरुत्वता. आदित्येभिश्च राजभिः.. (५)
हे ऋभुगण! मरुद्गण सहित इंद्र और प्रकाशमान सूर्य के साथ तुम्हें सोमरस दिया जा
रहा है. (५)
उत त्यं चमसं नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम्. अकर्त चतुरः पुनः.. (६)
त्वष्टा द्वारा निर्मित, सोमधारण में समर्थ चमस नाम का नया काष्ठपात्र बिलकुल तैयार
हो गया था. ऋभुओं ने उसके चार टुकड़े कर दिए. (६)
ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते. एकमेकं सुशस्तिभिः.. (७)
हे ऋभुगण! तुम हमारी सुंदर स्तुतियों को सुनकर सोमरस निचोड़ने वाले हमारे यजमान
को एक-एक करके स्वर्ण, मणि, मुक्ता—तीनों रत्न प्रदान करो. तुम दर्शपौर्णिमासादि सात
कर्मों के तीनों वर्गों को पूरा करो. (७)
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सूक्त—२१ देवता—इंद्र एवं अग्नि
अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया. भागं देवेषु यज्ञियम्.. (८)
यज्ञ के लिए उपयोगी चमस आदि का निर्माण करने के कारण ऋभुगण मरणधर्मा होने
पर भी अमर बन गए हैं. वे अपने सत्कर्मों के कारण देवों के मध्य बैठकर यज्ञ का भाग प्राप्त
करते हैं. (८)
सूक्त—२१ देवता—इंद्र एवं अग्नि
इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुशमसि. ता सोमं सोमपातमा.. (१)
मैं इस यज्ञ में इंद्र और अग्नि को बुलाता हूं एवं इन्हीं दोनों की स्तुति करने की इच्छा
रखता हूं. सोमपान करने के अत्यंत इच्छुक वे दोनों सोमरस पिएं. (१)
ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नर:. ता गायत्रेषु गायत.. (२)
हे मनुष्यो! इस यज्ञ में उन्हीं इंद्र और अग्नि की प्रशंसा करो एवं उन्हें अनेक प्रकार से
सुशोभित करो. गायत्री छंद का सहारा लेकर उन्हीं दोनों की स्तुतियां गाओ. (२)
ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे. सोमपा सोमपीतये.. (३)
हम मित्र देव की प्रशंसा के लिए इंद्र और अग्नि को इस यज्ञ में बुला रहे हैं. वे दोनों
सोमरस पीने वाले हैं. हम उन्हीं दोनों को सोमरस पीने के लिए बुला रहे हैं. (३)
उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम्. इन्द्राग्नी एह गच्छताम्.. (४)
हम शत्रुनाशन में क्रूर उन्हीं दोनों को इस सोमरसपूर्ण यज्ञ में बुला रहे हैं. वे इंद्र और
अग्नि इस यज्ञ में आवें. (४)
ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम्. अप्रजा: सन्त्वत्रिण:.. (५)
वे गुणसंपन्न एवं सभापालक इंद्र और अग्नि राक्षस जाति की क्रूरता समाप्त कर दें.
नरभक्षण करने वाले राक्षस उन दोनों के प्रभाव से संतानहीन हो जावें. (५)
तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे. इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम्.. (६)
हे इंद्र और अग्नि! जो स्वर्गलोक हमारे कर्मफलों को प्रकाशित करने वाला है, वहीं से
तुम इस यज्ञ के निमित्त जाओ और हमें सुख प्रदान करो. (६)
सूक्त—२२ देवता—अश्विनीकुमार आदि
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प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम्. अस्य सोमस्य पीतये.. (१)
हे अध्वर्यु! प्रातःसवन नामक यज्ञ से संबंधित अश्विनीकुमारों को जगाओ. वे सोमपान
करने के लिए इस यज्ञ में आवें. (१)
या सुरथा रथीतमॊभा देवा दिविस्पृशा. अश्विना ता हवामहे.. (२)
हम अश्विनीकुमारों को यज्ञ में बुलाते हैं. उनका रथ सुंदर है और वे रथियों में अत्यंत
श्रेष्ठ हैं. (२)
या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती. तया यज्ञं मिमिक्षतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे चाबुक से घोड़ों के पसीने की गंध आती है और वह शब्द के
साथ चोट करता है. ऐसे चाबुक से घोड़ों को हांकते हुए तुम यज्ञ में शीघ्र आकर इसे सोमरस
से सींच दो. (३)
नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः. अश्विना सोमिनो गृहम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ में बैठकर सोमरस पीने के लिए यजमान के जिस घर
की दिशा में जा रहे हो, वह घर दूर नहीं है. (४)
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये. स चेत्ता देवता पदम्.. (५)
सूर्य के हाथ में स्वर्ण है. मैं उन्हें रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे सूर्य देव यजमान को प्राप्त
होने वाला पद बता देंगे. (५)
अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि. तस्य व्रतान्युश्मसि.. (६)
सूर्य जल को सुखा देता है. अपनी रक्षा के लिए उस सूर्य की स्तुति करो. हम सूर्य के
लिए यज्ञ करना चाहते हैं. (६)
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः. सवितारं नृचक्षसम्.. (७)
सूर्य धन में निवास करते हैं. वे सुवर्ण, रजतादि रूप धन यजमानों में उचित रूप से
बांटते हैं. हम मनुष्यों को प्रकाश देने वाले सूर्य का आह्वान करते हैं. (७)
सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः. दाता राधांसि शुम्भति.. (८)
हे मित्रो! चारों ओर ठीक से बैठ जाओ. हमें शीघ्र ही सूर्य की स्तुति करनी है. धन देने
वाले सूर्य सुशोभित हो रहे हैं. (८)
अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप. त्वष्टारं सोमपीतये.. (९)
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हे अग्नि देव! देवों की कामना करने वाली पत्नियों को इस यज्ञ में ले आओ. तुम
सोमपान करने के लिए त्वष्टा को यहां ले आओ. (९)
आ ग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम्. वरूथ्रीं धिषणां वह.. (१०)
हे अग्नि! हमारी रक्षा के लिए देवपत्नियों को यहां ले आओ. हे अत्यंत युवा अग्नि! हमें
ऐसी वाणी दो, जिससे हम देवों को बुला सकें एवं निष्ठापूर्वक सत्य भाषण कर सकें. (१०)
अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः. अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम्.. (११)
मनुष्यों का पालन करने वाली एवं शीघ्रगामिनी देवियां रक्षा एवं परम सुख देने के लिए
हम पर प्रसन्न हों. (११)
इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणाणीं स्वस्तये. अग्नायीं सोमपीतये.. (१२)
हम अपने कल्याण के लिए एवं सोमपान करने के लिए इंद्रपत्नी, वरुणपत्नी एवं
अग्निपत्नी को बुलाते हैं. (१२)
मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (१३)
विशाल द्युलोक और पृथ्वी इस यज्ञ को रस से सींच दें और पोषण करके हमें पूर्ण
बनावें. (१३)
तयोरिद्घृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः. गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे.. (१४)
बुद्धिमान् लोग अपने कर्मों के द्वारा आकाश और पृथ्वी के बीच में घी की तरह जल
पीते हैं. वह अंतरिक्ष गंधर्वों का निश्चित निवासस्थान है. (१४)
स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी. यच्छा नः शर्म सप्रथः.. (१५)
हे पृथ्बी! तुम विस्तृत, कंटकरहित और निवास के योग्य बनो. तुम हमें पर्याप्त शरण दो.
(१५)
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे. पृथिव्याः सप्त धामभिः.. (१६)
विष्णु ने अपने गायत्री आदि सातों छंदों से जिस पृथ्वी पर कई कदम डाले थे, उसी
पृथ्वी से देवता हमारी रक्षा करें. (१६)
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूळ्हमस्य पांसुरे.. (१७)
विष्णु ने इस जगत् की परिक्रमा की. उन्होंने तीन प्रकार से कदम रखे. उनके धूलि
धूसरित चरणों में सारा जगत् छिप गया. (१७)
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त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (१८)
विष्णु जगत् की रक्षा करने वाले हैं. कोई उन पर प्रहार नहीं कर सकता. उन्होंने संपूर्ण
धर्मों को धारण करते हुए तीन डगों में जगत् की परिक्रमा की. (१८)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (१९)
विष्णु की कृपा से उनके भरोसे यजमान अपने व्रत पूरे करते हैं. विष्णु के कार्यों को
देखो. वे इंद्र के उपयुक्त सखा हैं. (१९)
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (२०)
आकाश के चारों ओर फैली हुई आंखें जिस प्रकार देखती हैं, उसी प्रकार विद्वान् भी
विष्णु के स्वर्ग नामक परमपद पर दृष्टि रखते हैं. (२०)
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (२१)
बुद्धिमान्, विशेष रूप से स्तुति करने वाले एवं जागरूक लोग विष्णु के उस परम पद से
अपने हृदय को प्रकाशित करते हैं. (२१)
सूक्त—२३ देवता—वायु आदि
तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे. वायो तान्प्रस्थितान्पिब.. (१)
हे वायु! यह तीखा और संतोष देने वाला सोमरस तैयार है. तुम आओ और लाए हुए
सोमरस का पान करो. (१)
उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (२)
मैं आकाश में रहने वाले इंद्र और वायु दोनों देवों को यह सोमरस पीने के लिए बुलाता
हूं. (२)
इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये. सहस्राक्षा धियस्पती.. (३)
वायु मन के समान गतिशील एवं इंद्र हजार आंखों वाले हैं. बुद्धिमान् लोग इन्हें अपनी
रक्षा के लिए बुलाते हैं. (३)
मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये. जज्ञाना पूतदक्षसा.. (४)
मित्र और वरुण यज्ञ में प्रकट होने वाले एवं शुद्धबलसंपन्न हैं. हम उन्हें सोमरस पीने के
लिए बुलाते हैं. (४)
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ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती. ता मित्रावरुणा हुवे.. (५)
मित्र और वरुण सत्य के द्वारा यज्ञकर्म की वृद्धि करते हैं. और वास्तविक प्रकाश के
पालनकर्त्ता हैं. मैं इन दोनों का आह्वान करता हूं. (५)
वरुणः प्राविता भुवान्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (६)
वरुण और मित्र सभी प्रकार से हमारी रक्षा करते हैं. वे हमें पर्याप्त संपत्ति दें. (६)
मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये. सजूर्गणेन तृम्पतु.. (७)
हम सोमरस पीने के लिए मरुद्गण के साथ इंद्र का आह्वान करते हैं. वे इंद्र मरुद्गणों
के साथ तृप्त हों. (७)
इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूषरातयः. विश्वे मम श्रुता हवम्.. (८)
हे मरुद्गणो! तुम लोगों में इंद्र सबसे महान् हैं. पूषा नाम के देव तुम्हारे दाता हैं. आप
सब हमारा आह्वान सुनें. (८)
हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा. मा नो दुःशंस ईशत.. (९)
हे शोभन एवं दानशील मरुद्गणो! बलवान् एवं योग्य इंद्र की सहायता से तुम शत्रु का
विनाश करो. वह दुष्ट शत्रु हमारा स्वामी न हो जाए. (९)
विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये. उग्रा हि पृश्निमातरः.. (१०)
हम सोमरस पीने के लिए संपूर्ण मरुद्देवों को बुलाते हैं. वे पृश्नि अर्थात् पृथ्वी की
संतान हैं और उनके बल को शत्रु सहन नहीं कर सकता. (१०)
जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया. यच्छुभं याथना नरः.. (११)
विजयी लोग जिस प्रकार हर्षनाद करते हैं, उसी प्रकार हे शोभन यज्ञ में आने वाले
मरुद्गणो! आप भी दर्प के साथ गर्जन करते हो. (११)
हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः. मरुतो मृळयन्तु नः.. (१२)
चमकने वाली विद्युत से उत्पन्न मरुद्गण हमारी रक्षा करें और हमारे सुख बढ़ावें. (१२)
आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः. आजा नष्टं यथा पशुम्.. (१३)
हे प्रकाशवान् एवं गतिशील सूर्य! लोग जिस प्रकार खोए हुए पशुओं को जंगल से ढूंढ
लाते हैं, उसी प्रकार यज्ञ धारण करने वाले एवं विचित्र कुशों से युक्त सोमरस को तुम आकाश
से खोज लाओ. (१३)
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पूषा राजानमाघृणि॒रप॑गूळ्हं॒ गुहा हितम्. अविन्दच्चित्रबर्हिषम्.. (१४)
प्रकाशवान् सूर्य ने गुफा में छिपाकर रखा हुआ, विचित्र कुशों से युक्त एवं तेजसंपन्न सोमरस प्राप्त किया. (१४)
उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्. गोभिर्यवं न चर्कृषत्.. (१५)
जिस प्रकार किसान बैलों के द्वारा बार-बार खेत जोतता है, उसी प्रकार सूर्य मेरे लिए क्रम से छः ऋतुएं लाए थे. ये ऋतुएं सोमरस से युक्त थीं. (१५)
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्. पृञ्चतीर्मधुना पयः.. (१६)
जल हम यज्ञ की इच्छा करने वालों के लिए माता के समान हैं. वे हमारे हितकारी बंधु हैं. वे जल यज्ञमार्ग से जा रहे हैं. वे दूध को मीठा बनाते हैं. (१६)
अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (१७)
जो संपूर्ण जल सूर्य के समीप वर्तमान हैं अथवा सूर्य जिन जलों के समीप रहते हैं, वे सब जल हमारे यज्ञ का हित करें. (१७)
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः. सिन्धुभ्यः कत्वं हविः.. (१८)
हमारी गाएं जिस जल को पीती हैं, उसी का हम आह्वान कर रहे हैं. जो जल नदी के रूप में बह रहा है, उसे हवि देना हमारा कर्त्तव्य है. (१८)
अप्स्व१न्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये. देवा भवत वाजिनः.. (१९)
जल के भीतर अमृत और ओषधियां वर्तमान हैं, हे ऋत्विजो! उत्साहपूर्वक उस जल की प्रशंसा करो. (१९)
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा.
अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः.. (२०)
सोम ने मुझसे कहा है कि जल में ओषधियां हैं, संसार को सुख प्रदान करने वाली अग्नि है और सभी प्रकार की जड़ीबूटियां हैं. (२०)
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३मम. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (२१)
हे जल! मेरे शरीर के लिए रोग नष्ट करने वाली ओषधियां पूर्ण करो. जिससे मैं बहुत समय तक सूर्य के दर्शन कर सकूं. (२१)
इदमपः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि.
यद्द्राहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्.. (२२)
मेरे भीतर जो कुछ बुराइयां हैं, मैंने दूसरों के साथ जो द्रोह किया है, दूसरों को जो
दुर्वचन कहे हैं या जो असत्य भाषण किया है, हे जल! उन सबको धो डालो. (२२)
आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि.
पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा.. (२३)
मैं आज स्नान के लिए जल में प्रवेश करता हूं. मैं आज जल के रस से मिल गया हूं. हे
जल में निवास करने वाली अग्नि! आओ और मुझे अपने तेज से भर दो. (२३)
सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः.. (२४)
हे अग्नि! मुझे तेज, संतान और आयु दो, जिससे देवगण, इंद्र और ऋषि-समूह मेरे यज्ञ
को जान सकें. (२४)
सूक्त—२४ देवता—अग्नि आदि
कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम.
को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च.. (१)
मैं देवताओं में से किस श्रेणी के किस देवता का सुंदर नाम पुकारूं? कौन देवता मुझ
मरने वाले को विशाल धरती पर रहने देगा? जिससे मैं अपने माता-पिता को देख सकूं? (१)
अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम.
स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च.. (२)
मैं देवताओं में सबसे पहले अग्नि का नाम पुकारता हूं. वे मुझे इस विशाल धरती पर
रहने देंगे, जिससे मैं अपने माता-पिता को देख सकूं. (२)
अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम् सदावन्भागमीमहे.. (३)
हे सदा रक्षा करने वाले सूर्य देव! तुम उत्तम धन के स्वामी हो, इसलिए मैं तुमसे उपभोग
करने योग्य धन मांगता हूं. (३)
यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः. अद्वेषो हस्तयोर्दधे.. (४)
हे सूर्य! तुम अपने दोनों हाथों में उपभोग के योग्य धन को धारण करते हो. वह सबके
द्वारा प्रशंसित है. उससे कोई द्वेष नहीं रखता. (४)
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भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा. मूर्धानं राय आरभे.. (५)
हे सूर्य देव! तुम धन के स्वामी हो. यदि तुम रक्षा करो तो हम धन की उन्नति करने में
लग जावें. (५)
नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः.
नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम्.. (६)
हे वरुण देव! आकाश में उड़ने वाले पक्षियों में भी तुम्हारे समान शक्ति और पराक्रम
नहीं है. इन्हें तुम्हारे बराबर क्रोध भी नहीं मिला है. सर्वदा चलने वाली वायु और बहने वाला
जल तुम्हारी गति से आगे नहीं बढ़ सकता. (६)
अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः.
नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः.. (७)
शुद्ध बल के स्वामी वरुण मूलरहित आकाश में ठहर कर उत्तम तेज के समूह को ऊपर
ही ऊपर धारण करते हैं. उस तेजसमूह की किरणों का मुख नीचे और जड़ें ऊपर हैं. उन्हीं के
कारण हममें प्राण स्थित रहते हैं. (७)
उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ.
अपदे पादा प्रतिधातवे ऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्.. (८)
राजा वरुण ने सूर्य के उदय से अस्त तक चलने के लिए मार्ग का विस्तार किया है.
उसने आकाश में बिना पैरों वाले सूर्य के चलने के लिए मार्ग बनाया है. वे मेरे हृदय का भेदन
करने वाले शत्रु का नाश करें. (८)
शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु.
बाधस्व दूरे निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (९)
हे राजा वरुण! आपकी ओषधियां सैकड़ों-हजारों हैं. आपकी उत्तम बुद्धि विस्तृत और
गंभीर हो. तुम हमारा अनिष्ट करने वाले पापों को हमसे दूर रखो. हमने जो पाप किए हैं, उन्हें
नष्ट कर दो. (९)
अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दि्वेयुः.
अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति.. (१०)
ऊंचे आकाश में जो सप्तर्षि नामक तारे स्थित हैं, वे रात में दिखाई देते हैं, पर दिन में
कहां चले जाते हैं? वरुण देव के कार्यों में कोई बाधा नहीं डाल सकता. वरुण की आज्ञा से ही
रात में चंद्रमा प्रकाशित होता है. (१०)
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तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः.. (११)
हे वरुण! यजमान हव्य के द्वारा तुमसे जिस आयु की याचना करते हैं, मैं शक्तिशाली
स्तोत्र के द्वारा तुम्हारी स्तुति करके उसी परम आयु की याचना करता हूं. तुम इस विषय में
लापरवाही न करके ठीक से ध्यान दो. अगणित लोग तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. तुम मुझसे मेरी
आयु मत छीनो. (११)
तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे.
शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान् राजा वरुणो मुमोक्तु.. (१२)
कर्त्तव्य को जानने वाले लोगों ने रात में और दिन में मुझसे यही कहा है. मेरे हृदय से
उत्पन्न ज्ञान भी यही सलाह देता है. शुनःशेप ने सूर्य से बंधकर जिनको पुकारा था, वे ही राजा
वरुण हमें बंधन से मुक्त करें. (१२)
शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः.
अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विदाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान्.. (१३)
लकड़ी के तीन यूपों से बंधे हुए शुनःशेप ने अदिति के पुत्र वरुण का आह्वान किया था,
इसलिए विद्वान् एवं दयालु राजा वरुण ने शुनःशेप को बंधन से छुड़ा दिया था. (१३)
अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः.
क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि.. (१४)
हे वरुण! हम नमस्कार करके एवं यज्ञों में हवि प्रदान करके तुम्हारे क्रोध को समाप्त
करते हैं. हे अनिष्ट का नाश करने वाले बुद्धिमान् वरुण! हमारे कल्याण के लिए इस यज्ञ में
निवास करो और हमारे पापों को कम करो. (१४)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय.
अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (१५)
हे वरुण! मेरे सिर में बंधे हुए फंदे को ऊपर से और पैरों में बंधे हुए फंदे को नीचे से
खोल दो तथा कमर में बंधे हुए फंदे को बीच में ढीला कर दो. हे अदितिपुत्र वरुण! हम तुम्हारे
यज्ञ में सतत संलग्न रहकर पापमुक्त हो जाएंगे. (१५)
सूक्त—२५ देवता—वरुण
यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्. मिनीमसि द्यविद्यवि.. (१)
हे वरुण देव! संसार के विद्वान् तुम्हारे व्रत का अनुष्ठान करने में जिस प्रकार भूलें करते
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हैं, उसी प्रकार हमसे भी प्रतिदिन प्रमाद होता रहता है. (१)
मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः. मा हृणानस्य मन्यवे.. (२)
हे वरुण! जो तुम्हारा अनादर करता है, तुम उसके लिए घातक बन जाते हो. तुम हमारा
वध मत करना. तुम हमारे ऊपर क्रोध मत करना. (२)
वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न सन्दितम्. गीर्भिर्वरुण सीमहि.. (३)
हे वरुण देव! जिस प्रकार रथ का मालिक थके हुए घोड़े को स्वस्थ करता है, उसी
प्रकार हम भी स्तुतियों द्वारा तुम्हारा मन प्रसन्न करते हैं. (३)
परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये. वयो न वसतीरुप.. (४)
जिस प्रकार चिड़ियां अपने घोंसलों की ओर तेजी से उड़ती हैं, उसी प्रकार हमारी
क्रोधरहित विचारधाराएं जीवन प्राप्त करने के लिए दौड़ रही हैं. (४)
कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे. मृळीकायोरुचक्षसम्.. (५)
हम शक्तिशाली नेताओं तथा अगणित लोगों पर दृष्टि रखने वाले वरुण को इस यज्ञ में
ले आवेंगे. (५)
तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः. धृतव्रताय दाशुषे.. (६)
मित्र और वरुण हव्य देने वाले यजमान पर प्रसन्न होकर हमारे द्वारा दिया हुआ
साधारण हवि स्वीकार कर लेते हैं. वे कभी भी उसका त्याग नहीं करते. (६)
वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्. वेद नावः समुद्रियः.. (७)
वरुण आकाश में उड़ने वाले पक्षियों और सागर में चलने वाली नौकाओं का मार्ग
जानते हैं. (७)
वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः. वेदा य उपजायते.. (८)
वरुण उक्त महिमा को धारण करके समय-समय पर उत्पन्न होने वाले बारह महीनों को
जानते हैं और तेरहवें मास को भी जानते हैं. (८)
वेद वातस्य वर्तनिमुरोर्ऋष्वस्य बृहतः. वेदा ये अध्यासते.. (९)
वरुण विस्तार से संपन्न, दर्शनीय और अधिक गुण वाली वायु का मार्ग जानते हैं. वे
आकाश में निवास करने वाले देवों से भी परिचित हैं. (९)
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्या३स्वा. साम्राज्याय सुक्रतुः.. (१०)
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व्रत धारण करने वाले एवं उत्तम कर्म करने वाले वरुण दैवी प्रजाओं पर साम्राज्य करने
के लिए आकर बैठे थे. (१०)
अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति. कृतानि या च कत्वा.. (११)
बुद्धिमान् मनुष्य वरुण की अनुकंपा से वर्तमान काल और भविष्यत् काल की सारी
आश्चर्यजनक घटनाओं को देख लेते हैं. (११)
स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्. प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (१२)
शोभन बुद्धि वाले वे ही अदितिपुत्र वरुण हमें सदा उत्तम मार्ग पर चलने वाला बनावें
एवं हमारी आयु को बढ़ावें. (१२)
बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्. परि स्पशो नि षेदिरे.. (१३)
वरुण सोने का कवच धारण करके अपने बलिष्ठ शरीर को ढकते हैं. उसके चारों ओर
सुनहरी किरणें फैलती हैं. (१३)
न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्. न देवमभिमातयः.. (१४)
हिंसा करने वाले लोग भयभीत होकर वरुण की शत्रुता छोड़ देते हैं. मनुष्यों को पीड़ा
पहुंचाने वाले लोग उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाते. पाप करने वाले लोग उनके प्रति पाप का
आचरण त्याग देते हैं. (१४)
उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या. अस्माकमुदरेष्वा.. (१५)
वरुण ने मनुष्यों की उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त अन्न पैदा किया है. वे विशेष रूप से
हमारी उदरपूर्ति करते हैं. (१५)
परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु. इच्छन्तीरुरुचक्षसम्.. (१६)
बहुत से लोगों ने वरुण के दर्शन किए हैं. जिस प्रकार गाएं गोशाला की ओर जाती हैं,
उसी प्रकार कभी पीछे न लौटने वाली मेरी विचारधारा वरुण की ओर अग्रसर होती है. (१६)
सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्. होतेव क्षदसे प्रियम्.. (१७)
हे वरुण! मधुर रस वाला मेरा हव्य तैयार है. तुम होता के समान उस हव्य का भक्षण
करो. इसके पश्चात् हम लोग आपस में बातें करेंगे. (१७)
दर्शं नु विश्वदर्शिनं दर्शं रथमधि क्षमि. एता जुषत मे गिरः.. (१८)
सब लोग जिन वरुण के दर्शन करते हैं, उन्हें मैंने देखा है. मैंने कई बार धरती पर चलता
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हुआ उनका रथ देखा है. वरुण ने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है. (१८)
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय. त्वामवस्युरा चके.. (१९)
हे वरुण देव! आज मेरी पुकार सुनो. आज मुझे सुख प्रदान करो. मैं अपनी रक्षा की
इच्छा से तुम्हें बुला रहा हूं. (१९)
त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि. स यामनि प्रति श्रुधि.. (२०)
हे बुद्धिमान् वरुण! आकाश, धरती एवं समस्त संसार में तुम्हारा प्रकाश फैला हुआ है.
तुम हमारी प्रार्थना सुनकर हमारी रक्षा करने का वचन दो. (२०)
उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत. अवाधमानि जीवसे.. (२१)
हमारे सिर वाले फंदे को ऊपर से और कमर के फंदों को बीच से खोल दो, जिससे हम
जीवन धारण कर सकें. (२१)
सूक्त—२६ देवता—अग्नि
वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते. सेमं नो अध्वरं यज.. (१)
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के योग्य एवं अन्नों के पालक हो. तुम अपना तेज धारण करो
और हमारे इस यज्ञ को पूरा करो. (१)
नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः. अग्ने दिवित्मता वचः.. (२)
हे अग्नि! तुम सदा युवा, कमनीय एवं तेजस्वी हो. हम यज्ञ संपन्न करने वाले एवं
ज्ञानपूर्ण वाक्यों से तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यहां बैठो. (२)
आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये. सखा सख्ये वरेण्यः.. (३)
हे श्रेष्ठ अग्नि! जिस प्रकार पिता पुत्र को, भाई भाई को और मित्र मित्र को अभीष्ट
वस्तुएं देता है, उसी प्रकार तुम भी मुझे इच्छित वस्तुएं दो. (३)
आ नो बर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा. सीदन्तु मनुषो यथा.. (४)
हे अग्नि देव! शत्रुओं का नाश करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमा जिस प्रकार मनु के
यज्ञ में आए थे, उसी प्रकार तुम भी हमारे यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर बैठो. (४)
पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च. इमा उ षु श्रुधी गिरः.. (५)
हे पूर्वज एवं यज्ञ संपन्नकर्त्ता अग्नि! हमारे इस यज्ञ और हमारी मित्रता से तुम प्रसन्न हो
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जाओ. हमारे इन स्तुति-वचनों को सुनो. (५)
यच्चिद्धि शश्वता तना देवन्देवं यजामहे. त्वे इद्धूयते हवि:.. (६)
यद्यपि नित्य एवं विस्तृत हव्य द्वारा हम भिन्न-भिन्न देवताओं का पूजन करते हैं, पर हे
वरुण! वह भी तुम्हें ही प्राप्त होता है. (६)
प्रियो नो अस्तु विशपतिर्होता मन्द्रो वरेण्य:. प्रिया: स्वग्नयो वयम्.. (७)
प्रजापालक, यज्ञसंपादक, प्रसन्न और श्रेष्ठ अग्नि हमारे लिए प्रिय हों. हम भी शोभन
अग्नि के सहयोग से उनके प्रिय बनें. (७)
स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च न:. स्वग्नयो मनामहे.. (८)
शोभन अग्नि से युक्त एवं तेजस्वी ऋत्विजों ने हमारे उत्तम द्रव्य को धारण किया है,
इसलिए हम शोभन अग्नि के समीप पहुंचकर याचना करते हैं. (८)
अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्. मिथ: सन्तु प्रशस्तय:.. (९)
हे अग्नि! तुम अमर हो और हम मनुष्य मरणधर्मा हैं. हम लोग एक-दूसरे की प्रशंसा
करें. (९)
विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वच:. चनो धा: सहसो यहो.. (१०)
हे बल के पुत्र अग्नि! तुम सब अग्नियों के साथ आकर हमारा यह यज्ञ और हमारी
स्तुतियां स्वीकार करके हमें अन्न दो. (१०)
सूक्त—२७ देवता—अग्नि
अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभि:. सम्राजन्तमध्वराणाम्.. (१)
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के सम्राट् एवं पूंछ वाले घोड़े के समान हो. हम स्तुतियों के द्वारा
तुम्हारी वंदना करते हैं. (१)
स घा न: सूनु: शवसा पृथुप्रगामा सुशेव:. मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्.. (२)
अग्नि शक्ति के पुत्र और शीघ्र गमन करने वाले हैं, वे हमारे ऊपर प्रसन्न होकर हमें सुख
दें और हमारी अभिलाषाओं की वर्षा करें. (२)
स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायो:. पाहि सदमिद्विश्वायु:.. (३)
हे अग्नि! तुम सर्वत्र गमन करने में समर्थ हो. तुम हमारा अनिष्ट करने वाले पापाचारी
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मनुष्यों से दूर एवं समीप देश में हमारी रक्षा करो. (३)
इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्. अग्ने देवेषु प्र वोचः.. (४)
हे अग्नि! इस यज्ञ में उपस्थित हवि और नवीनतम गायत्री छंद में रचित स्तोत्र के विषय
में देवों को बताना. (४)
आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु. शिक्षा वस्वो अन्तमस्य.. (५)
हे अग्नि! हमें दिव्यलोक तथा अंतरिक्षलोक का अन्न सब ओर से प्राप्त कराओ. तुम
हमें भूलोक संबंधी धन भी प्रदान करो. (५)
विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ. सद्यो दाशुषे क्षरसि.. (६)
हे विलक्षण प्रकाश वाले अग्नि देव! जिस प्रकार सिंधु की लहरें जल को सभी पर्वतों,
नालियों आदि में भर देती हैं, उसी प्रकार तुम भी लोगों में धन का विभाग करने वाले हो. द्रव्य
देने वाले यजमान को तुम कर्म का फल शीघ्र दो. (६)
यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः.. (७)
हे अग्नि देव! युद्धक्षेत्र में तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो और तुम्हारी प्रेरणा से जो
युद्धक्षेत्र में जाता है, वह नित्य ही अन्न प्राप्त करता रहेगा. (७)
नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्. वाजो अस्ति श्रवाय्यः.. (८)
हे अग्नि देव! तुम शत्रुओं का दमन करने वाले हो. तुम्हारे भक्त यजमान पर कोई
आक्रमण नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास विशेष प्रकार की शक्ति है. (८)
स वाजं विश्वचर्षणिर्वाद्भिरस्तु. तरुता विप्रेभिरस्तु सनिता.. (९)
सारे मनुष्य अग्नि की पूजा करते हैं. उसने घोड़ों की सहायता से हमें युद्ध में सफलता
दिलाई है. वह बुद्धिमान् ऋत्विजों को यज्ञकर्म का फल देने वाला हो. (९)
जराबोध तद्विविद्धि विशेविशे यज्ञियाय. स्तोमं रुद्राय दृशीकम्.. (१०)
हे अग्नि देव! हम प्रार्थना के द्वारा तुम्हें जगाते हैं. तुम भिन्नभिन्न यजमानों पर कृपा
करके यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण करने के लिए यज्ञ में आओ. तुम क्रूर हो. यजमान सुंदर स्तोत्रों से
तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१०)
स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः. धिये वाजाय हिन्वतु.. (११)
अग्नि देव सीमारहित धूमकेतु वाले तथा महान् हैं. उनकी ज्योति विशाल है. वह हमारे
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यज्ञ और अन्न के लिए प्रसन्न हों. (११)
स रेवाँ इव विशपतिर्देव्यः केतुः शृणोतु नः. उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः.. (१२)
अग्नि प्रजापालक, देवताओं के होता, दूत के समान देवताओं का ज्ञापन करने वाले एवं
स्तुति सुनने वाले हैं. उसी प्रकार अग्नि हमारी स्तुति सुनें. (१२)
नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः.
यजाम देवान्यदि शन्कवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः.. (१३)
बड़े, बालक, युवा एवं वृद्ध सभी देवताओं को हम नमस्कार करते हैं. यदि संभव होगा
तो हम देवताओं की पूजा करेंगे. हम कहीं विशिष्ट गुणसंपन्न देवों की स्तुति करना न छोड़ दें.
(१३)
सूक्त—२८ देवता—इंद्र आदि
यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे.
उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (१)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए भारी जड़ वाला पत्थर उठाया जाता है
और ओखली की सहायता से सोमरस तैयार किया जाता है, वहां सोमरस अपना जानकर
पिओ. (१)
यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता.
उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (२)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता को निचोड़ने के लिए दोनों फलक जांघों के समान फैल
गए हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (२)
यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते.
उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (३)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में यजमान की पत्नियां भीतर घुसती और बाहर निकलती रहती हैं,
उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (३)
यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव.
उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (४)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता मंथन करने का दंड घोड़े की लगाम के समान बांधा जाता
है, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (४)
यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे.
इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः.. (५)
हे ऊखल! यद्यपि घर-घर में तुम्हारा प्रयोग किया जाता है, पर इस यज्ञ में तुम उसी
प्रकार ध्वनि करते हो, जिस प्रकार विजयी लोग दुंदुभी बजाते हैं. (५)
उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्.
अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल.. (६)
हे ऊखल रूप काष्ठ! तुम्हारे ही सामने होकर हवा चलती है, इसलिए हे ऊखल! इंद्र
देवता के पान के लिए सोमरस तैयार करो. (६)
आयजी वाजसातमा ता ह्यु१च्चा विजर्भृतः.
हरी इवान्धांसि बप्सता.. (७)
हे ऊखल और मूसल! तुम दोनों सभी प्रकार यज्ञ के साधन एवं प्रभूत अन्न देने वाले हो.
जिस प्रकार इंद्र के दोनों घोड़े अपना खाद्य चना आदि चबाते समय ध्वनि करते हैं, उसी
प्रकार तुम भी तुमुल ध्वनि के साथ परस्पर प्रहार करते हो. (७)
ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः.
इन्द्राय मधुमत्सुतम्.. (८)
हे ऊखल और मूसल रूप दोनों काष्ठो! तुम दोनों देखने में परम सुंदर हो. शोभन
अभिनव मंत्रों के सहयोग से तुम दोनों इंद्र के लिए मधुर सोमरस तैयार करो. (८)
उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज. नि धेहि गोरधि त्वचि.. (९)
सोमरस निचोड़ने वाले फलकों से बचे हुए सोम को उठाकर पवित्र कुशों के ऊपर रखो.
इसके बाद उसे गोचर्म से बनाए हुए पात्र में रखो. (९)
सूक्त—२९ देवता—इंद्र
यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (१)
हे इंद्र! तुम सोमपानकर्त्ता एवं सत्यवादी हो. हम कोई प्रसिद्ध व्यक्ति नहीं हैं. हे अनंत
धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों और अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (१)
शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (२)
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हे शक्तिशाली, सुंदर ठोड़ी वाले एवं अन्नों के पालक इंद्र! हम पर सदा तुम्हारा अनुग्रह
रहे. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान्
बनाओ. (२)
नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (३)
तुम परस्पर मिलकर देखने वाली यमदूतियों को भली-भांति सुला दो. वे सदा बेहोश
रहें, कभी न जागें. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा
उत्तम धनवान् बनाओ. (३)
ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (४)
हे शूर! हमारे शत्रु असावधान रहें और हमारे मित्र सावधान रहें. अनंत धनशाली इंद्र!
हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (४)
समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (५)
हे इंद्र! यह गधे के रूप वाला हमारा बैरी निंदा रूपी वचनों से आपकी बदनामी कर रहा
है. इसे मार डालो. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा
उत्तम धनवान् बनाओ. (५)
पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (६)
हमारे प्रतिकूल वायु कुटिल गति से चलती हुई वन से दूर चली जाए. हे अनंत धनशाली
इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा धनवान् बनाओ. (६)
सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (७)
तुम हमारे प्रति क्रोध करने वालों का नाश करो, हमारी हिंसा करने वालों को मार डालो.
हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ.
(७)
सूक्त—३० देवता—इंद्र
आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्. मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः.. (१)
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हे यजमानो एवं ऋत्विजो! जिस प्रकार कुएं को जल से भर देते हैं, उसी प्रकार हम अन्न
की इच्छा से हजार यज्ञ करने वाले एवं महान् इंद्र को सोमरस से सींच देते हैं. (१)
शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्. एदु निम्नं न रीयते.. (२)
जिस प्रकार पानी अपने आप नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र सैकड़ों संख्या
वाले विशुद्ध सोमरस एवं हजारों संख्या वाले आशीर मिश्रित सोमरस के समीप आते हैं. (२)
सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे. समुद्रो न व्यचो दधे.. (३)
पहले बताया हुआ सोमरस बलशाली इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एकत्रित हुआ है.
इसके द्वारा इंद्र का सागर के समान विस्तृत उदर भर जाता है. (३)
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (४)
हे इंद्र! जिस प्रकार कबूतर गर्भ धारण करने की इच्छुक कबूतरी को प्राप्त करता है,
उसी प्रकार तुम अपने इस सोमरस को ग्रहण करो. इसी सोमरस के कारण हमारी प्रार्थनाएं
भी स्वीकार करो. (४)
स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (५)
हे धन के रक्षक एवं उत्तम वचनों द्वारा स्तुति किए गए वीर इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति करते
हैं. यह स्तुति तुम्हारी विभूति से संपन्न एवं सत्य हो. (५)
ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये स्मिन्वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (६)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इस संग्राम में हमारी रक्षा करने के लिए तत्पर रहो. दूसरे
कार्यों के विषय में हम और तुम मिलकर बातचीत करेंगे. (६)
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७)
हम प्रत्येक यज्ञ के आरंभ में एवं अपने यज्ञों में विघ्न डालने वाले विभिन्न संग्रामों में
परम शक्तिशाली इंद्र को अपनी रक्षा के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार कोई अपने
मित्र को बुलाता है. (७)
आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः. वाजेभिरुप नो हवम्.. (८)
इंद्र यदि हमारी पुकार सुनेंगे तो यह निश्चय है कि वे हजारों पालनशक्तियों एवं अन्नों के
साथ हमारे निकट आवेंगे. (८)
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्. यं ते पूर्वं पिता हुवे.. (९)
इंद्र बहुत से यजमानों के पास जाते हैं. मैं उनके प्राचीन निवासस्थान स्वर्ग से उन्हें
बुलाता हूं. इससे पूर्व मेरे पिता भी उन्हें बुला चुके हैं. (९)
तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत. सखे वसो जरितृभ्यः.. (१०)
हे सबके प्रिय इंद्र! अगणित लोग तुम्हें अपने यज्ञों में बुलाते हैं. तुम्हें सब मित्र के समान
प्रेम करते हैं. तुम सबको स्वर्ग में स्थान देते हो. मैं प्रार्थना करता हूं कि तुम स्तुति करने वालों
पर कृपा करो. (१०)
अस्माकं शिपिरिणीनां सोमपाः सोमपान्वाम्. सखे वज्रिन्तसखीनाम्.. (११)
हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम सबके मित्र और वज्रधारी हो. हम तुम्हारे मित्र और
सोमपान करने वाले हैं. तुम हमारी लंबी नाक वाली गायों की वृद्धि करो. (११)
तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु. यथा त उश्मसीष्टये.. (१२)
हे इंद्र! तुम सोमरस पीने वाले, सबके मित्र और वज्रधारी हो. तुम इस प्रकार के कार्य
करो कि हम अपनी अभिलषित वस्तुएं पाने के लिए तुम्हें प्रेम करें. (१२)
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः. क्षुमन्तो याभिर्मदेम.. (१३)
जब इंद्र हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाएंगे तो हमारी गाएं अधिक दूध देने वाली एवं
शक्तिसंपन्न बनेंगी. उन गायों से भोजन प्राप्त करके हम प्रसन्न होंगे. (१३)
आ घ त्वावान्त्मनाप्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः. ऋणोरक्षं न चक्रयोः.. (१४)
हे साहसी इंद्र! तुम्हारी कृपा से हमें तुम्हारे ही समान कोई देवता अनायास मिल
जाएगा. हम उसकी स्तुति करेंगे, उससे मांगेंगे, तो वह अवश्य ही हमें मनचाही संपत्ति देगा.
जिस प्रकार घोड़े रथ के दोनों पहियों के अरों को घुमाते हैं, उसी प्रकार वे धन को हमारी ओर
प्रेरित करेंगे. (१४)
आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्. ऋणोरक्षं न शचीभिः.. (१५)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाड़ी के आगे बढ़ने से पहियों के अरे अपने
आप घूमते हैं, उसी प्रकार हम स्तुति करने वालों को इच्छानुसार धन दो. (१५)
शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि.
स नो हिरण्यरथं दंसनावान्त्स नः सनिता सनये स नोऽदात्.. (१६)
घास खा लेने के पश्चात् इंद्र के घोड़े शब्द करते हुए हिनहिनाते हैं और जोरजोर से सांस
लेते हैं. इंद्र ने उन्हीं की सहायता से सदा शत्रुओं की संपत्ति को जीता है. इंद्र कर्मपरायण एवं
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