ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
रक्षा, अभिलाषी, गय ऋषि, प्रभुता १४-१७ ६५. विभिन्न देवों का वर्णन १-१५ पूर्ण करना, बढ़ाना, मैत्री, स्तुति, याचना, स्तुति, निकालना, व्याप्त, आह्वान, धन याचना, कार्य, विष्णाप्व १-१२ सरस्वती, स्तुतियां, अन्न याचना १३-१५ ६६. विभिन्न देवों का वर्णन १-१५ आह्वान, तैयारी, अभ्युदय, बुलाना, मकान मांगना, इच्छापूरक, पूजन, जलरचना, पूर्ण करना १-९ स्वर्गधारक, स्तुति व स्तोत्र सुनने की प्रार्थना, सेवा, धन मांगना वंदना १०-१५ ६७. बृहस्पति का वर्णन १-१२ अयास्य ऋषि, सरल मन, स्तुति, गाएं निकालना, गरजना, रुलाना, स्तोत्रस्वामी, सहयोगी १-८ बढ़ाना, स्तुति, प्रसन्नतादाता, नदी प्रवाहित करना ९-१२ ६८. बृहस्पति का वर्णन १-१२ स्तुति, प्रकाश पहुंचाना, गाय निकालना, पणि, बल राक्षस, वध, भेदन १-७ गाएं देखना, उषा प्राप्ति, असमर्थता, प्रकाश धारण, नमस्कार ८-१२ ६९. अग्नि की स्तुति व वर्णन १-१२ वध्यश्व ऋषि, दीप्त होना, सुमित्र ऋषि, रक्षार्थ प्रार्थना, शत्रुजेता, हितकारी, आच्छादित, सुमित्रवंशी, महिमा १-९ शत्रुवध, संहार, स्तुत्य १०-१२ ७०. अग्नि, यज्ञशाला, ऋत्विज्, होता आदि की स्तुति १-११ उत्तरवेदी, स्तुत्य, रथ, प्रसन्नचित्त, अधिष्ठित, देवगण, यज्ञपात्र, हव्य सेवन १-८ देवभाग, रशना, स्वाहा ९-११ ७१. भाषा का वर्णन १-११ ebook converter DEMO Watermarks*
सरस्वती, भाषा, छंद, विसर्जन, मायारूपिणी धेनु, त्यागना, भाव, विचार १-८ हल चलाना, पाप दूर होना, प्रायश्चित्त ९-११ ७२. देवों की उत्पत्ति का वर्णन १-९ स्तोत्र, उत्पत्ति, भूमि, अदिति व बंधु देवों का जन्म, धूल उड़ना १-६ सूर्य, स्थिर, अदिति का जाना ७-९ ७३. इंद्र एवं मरुतों की स्तुति व वर्णन १-११ प्रशंसा, वर्षा जल, धारण करना, मित्रता, माया का नाश, शत्रुसंहार १-६ नमुचि, शक्तिमान्, चक्र, जन्म, बुद्धि याचना ७-११ ७४. मरुतों का वर्णन १-६ धनदान, प्रकाश करना, रत्नदाता स्तुति, शरण, वृत्रनाशक १-६ ७५. नदियों के जल का वर्णन १-९ सिंधु, मार्ग बनाना, गरजना, सहायक नदी, गोमती, तुष्टामा, सुसर्त आदि नदियां, दर्शनीय, सिंधु, बहना, ढका रहना, रथ १-९ ७६. सोमरस निचोड़ने में सहायक पत्थर की स्तुति १-८ उषा, धनदाता, मनु, धन मांगना, सुधन्वा, सोम निचोड़ना, मुखशुद्धि, दिव्य धाम १-८ ७७. मरुतों का वर्णन व स्तुति १-८ जनक, आक्रमणशील, शत्रुघाती, अन्नदाता, श्येन पक्षी, पथिक, धन, सोमपान, आना १-८ ७८. मरुतों का वर्णन व स्तुति १-८ गृहस्वामी, सुशोभित, दानी, दीपयुक्त, सामगान, दीप्तिशाली, पथिक, रत्नदान १-८ ७९. अग्नि का वर्णन १-७ भक्षण, नमस्कार, जलाना, ज्ञानी, ज्वालाएं, हरितवर्ण, रस्सी १-७ ८०. अग्नि का वर्णन १-७ ebook converter DEMO Watermarks*
वीरप्रसविनी, प्रेरणा, जरुथ, रूप धरना, घिरना, गंधर्ववचन, स्तुति रचना १-७ ८१. सृष्टिक्रम का वर्णन १-७ आच्छादन, विश्वकर्मा, निर्माण, भुवन, परम धाम, स्वर्गफलदाता, सुखोत्पादक १-७ ८२. सृष्टिक्रम का वर्णन १-७ भाग, सप्तर्षि, भुवन, धन व्यय, ईश्वर, ब्रह्मांड, स्तुतियां १-७ ८३. क्रोध की स्तुति १-७ उत्पादक, मन्यु, शक्तिशाली, सहनशील आह्वान, बंधु, होम १-७ ८४. क्रोध की स्तुति १-७ नेता, धन मांगना, उग्र बल, शत्रुजेता, स्तोत्र, तेजधारक, अन्न याचना १-७ ८५. सोम की स्तुति एवं वर्णन १-४७ रोकना, नक्षत्रों के निकट, पीसना, सुरक्षित, वर्षरक्षक, वस्त्र गाथा, कोष, अग्रगामी, रथमार्ग १-११ गाड़ी, दहेज, समर्थन, रथचक्र, पहिया, नमस्कार, ऋतुनिर्माण, चिरजीवन देना, अमृत स्थान, स्तुति, पूजन १२-२२ अर्यमा देव, स्थापना, सौभाग्य, पूषा, समृद्ध बनने का आग्रह, प्रवेश, श्रीहीन, रोग, शत्रु, रक्षार्थ प्रार्थना, आशीर्वाद, वधूवस्त्र, सूर्या, गृहस्थ धर्म, कल्याणी बनाने की प्रार्थना, संतानरहित पति २३-३८ शतायु की कामना, तीसरा पति, धन व पुत्र मिलना, पुत्र व नाती, कल्याणकारक बनने की कामना, वीरजननी, वधू व महारानी बनने का आशीर्वाद, हृदयों को मिलाने हेतु प्रार्थना ३९-४७ ८६. इंद्र एवं इंद्राणी का संवाद १-२३ वृषाकपि, सोमरस, अन्नदाता, कुत्ता, दुष्कर्मी उत्तम इंद्र, प्रिय वचन, वीरपत्नी, सखा, आदर पाना १-१० बुढ़ापा, समीप जाना, हवि, बैल पकाना, दधिमंथन, समर्थ-असमर्थ, गाड़ी, दास व आर्य ११-१९ दूरी, आह्वान, पुत्र जनना २०-२३ ebook converter DEMO Watermarks*
८७. अग्नि की स्तुति १-२५ हवन, मांसभक्षी, दीप्त अग्नि, बाण झुकाना, मांसाहारी, जातवेद, ऋष्टियां, तेज, अनुकूल, तीन मस्तक, जलने की प्रार्थना, दध्यङ् अथर्वा ऋषि १-१२ क्रोध, शोकमन, झूठा, दूध चुराना, मानवदर्शक, असार अंश, दिव्य आयुध, किरणें, सखा १३-२१ मेधावी धर्षक, वध प्रार्थना, प्रशंसा, नाश का आग्रह २२-२५ ८८. अग्नि व सूर्य की स्तुति एवं वर्णन १-१९ बढ़ाना, प्रसन्न होना, विस्तार, संसार, तेज चलना, अंगरक्षक, चिंतन, तृप्त करना, विभाजन १-१० स्थापना, उत्पत्ति, तपना, दो मार्ग, ठहरना, विवाद, स्पर्धा नहीं, पास बैठना ११-१९ ८९. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-१८ हराना, घुमाना, मित्र, स्तुतियां, समानता नहीं, तोड़ना, लोप, वज्र, आह्वान, नदियां, वध हेतु आग्रह १-१२ अनुगमन, छेदन, ज्योति वाली रात, आह्वान, स्तुति, बुलाना १३-१८ ९०. विराट् पुरुष के रूप में ईश्वर का वर्णन १-१६ हजार शीर्ष, अमृत, ब्रह्मांड, ऊपर उठना, विस्तार, वेदोत्पत्ति, ऋतु बनाना, पशु उत्पत्ति, संकल्प, ब्राह्मण, वर्णों की उत्पत्ति १-१२ चंद्रमा व सूर्य आदि की उत्पत्ति, परिधियां, उपासक १३-१६ ९१. अग्नि का वर्णन व स्तुतियां १-१५ व्यवहार, आश्रय, धन बढ़ाना, विमल, उन्मुक्त, जन्म, दहन, वरण, द्रव्य, नेष्टा, दूत १-११ वृद्धि, स्पर्श, स्तुति, उत्तम यश १२-१५ ९२. नाना देवों का वर्णन व स्तुतियां १-१५ सोना, चूमना, अमरता, नमस्कार, सींचना, रुद्रपुत्र, सहायक, डरना १-८ नमस्कार, यज्ञ जानना, पूजन, बुद्धिमान्, अन्न, अदिति, वर्षा ९-१५ ebook converter DEMO Watermarks*
९३. विभिन्न देवों का वर्णन १-१५ रक्षायाचना, परिचर्या, धन, हवि स्वामी, समान धनी, बचना, अन्नस्वामी, सामगान १-८ स्तुति, अन्न याचना, सिद्धि, स्तोत्र पाठ, पृथवान्, गो याचना ९-१५ ९४. सोमरस निचोड़ने में सहायक पत्थर का वर्णन १-१४ स्तुति का आग्रह, हव्य भक्षण, सोमपान, अचल रहना, धारण, सोमरस टपकाना, ग्रहण, अंश, शक्ति दिखाना १-९ यज्ञसेवन, शक्तिशाली, पूर्ण करना, शब्द करना १०-१४ ९५. पुरूरवा व उर्वशी का संवाद १-१८ मन, दुष्प्राप्य, सिंहनाद, रमणसुख, शयनकक्ष, सुजूर्णि, श्रेणि आदि, बढ़ाना, भागना, संपर्क बनाना, दीर्घायु, पुत्ररूप में होना १-११ ससुराल, अज्ञानी, दीनता, मैत्री, विचरना, वासदाता, आनंद प्राप्ति १२-१८ ९६. इंद्र एवं उनके घोड़ों का वर्णन १-१३ प्रशंसा, बुलाना, धनी, दीप्ति, सुंदर, स्तुत्य, स्थित होना १-७ हरी दाढ़ी, सोमपान, अन्न देना, पूर्ण करना, साधन, सवन ८-१३ ९७. ओषधियों की स्तुति व वर्णन १-२३ उत्पत्ति, सौ कर्मों वाली, जयशील, घोड़ा, गाय आदि देना, अधिकारिणी, रोगनाशक, स्तुति, इष्कृति, रोगनाश, आत्मा १-११ चोर, बाज, वायु, वचन व रोग से बचाने की प्रार्थना, पाश, कथन, शांति व शक्ति मांगना, जीव १२-२० शक्ति हेतु प्रार्थना, वार्तालाप २१-२३ ९८. नाना देवों का वर्णन व स्तुति १-१२ राजा शांतनु, स्तुति, निर्दोष, देवापि, वर्षा, स्तोत्र, शक्ति प्राप्ति, जलाना, दक्षिणा १-९ शूर, मार्गज्ञान, वर्षा याचना १०-१२ ebook converter DEMO Watermarks*
९९. इंद्र का वर्णन व स्तुति १-१२ धन देना, सामगीत सुनना, हराना, बहाना, छीनना, वध, नाश, भेदन, लोहमय पीठ १-८ शुष्ण, उशना, अरूरु का वध, ऋजिश्व्रा, वज्र ऋषि ९-१२ १००. विभिन्न देवों की स्तुतियां १-१२ वरण, दूध पीना, ऋजुकामी, सोम, धारण, सेव्य, वासदाता, पाप नाशार्थ प्रार्थना, पालक १-९ ओषधि, रक्षक, दुवस्यु ऋषि १०-१२ १०१. विभिन्न विषयों का वर्णन १-१२ आह्वान, नख बनाने, बैल जोड़ने व बरतन बनाने का आग्रह १-८ दूध, बरतन, पहिए, बुलाना ९-१२ १०२. इंद्र का वर्णन व स्तुति १-१२ धन कामना, मुद्गलानी, दास, आर्य, प्रहार, मुद्गल, अनुगमन, बांधना, उद्धार १-८ द्रुघण, विजयी, अन्न याचना, धनदाता ९-१२ १०३. इंद्र का वर्णन एवं स्तुति १-१३ जीतना, युद्धकर्त्ता, शत्रुनाशक, बुलाना, उत्तम वीर, जयशील, यज्ञस्वामी, देवसेना १-८ जलवर्षक, रथ, विजय याचना, अप्वा, कल्याणार्थ प्रार्थना ९-१३ १०४. इंद्र का वर्णन एवं स्तुति १-११ सोमपानार्थ अनुरोध, भेंट देना, उशिजवंशी, रक्षा, दान, धनयुक्त १-७ बढ़ाना, वृत्रवध, स्तुति, बुलाना ८-११ १०५. इंद्र का वर्णन एवं स्तुति १-११ नालियां, बुलाना, थकना, बटोरना, भोजन मांगना, ऋभु, हरी दाढ़ी १-७ स्तुतिहीन, उद्धार, मधु लेना, रक्षा ८-११ ebook converter DEMO Watermarks*
१०६. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-११ बढ़ाना, आना, देवपूजा, आह्वान, स्थित, हंता, रथ प्राप्ति १-७ धनरक्षक, सुनना, दूध भरने हेतु प्रार्थना, भूतांश ऋषि ८-११ १०७. दक्षिणा का वर्णन १-११ मार्ग, अमरता, देवपूजा, अधिकारी, मुखिया, सामगायक १-६ रक्षासाधन, व्यथा, वधू, घर, रक्षा ७-११ १०८. सरमा कुक्कुरी व पणियों का संवाद १-११ अभिलाषा, निधि, दूती, रोक न पाना, आयुध, पददलित १-७ सुरक्षित, अयास्य व नवगु ऋषि, भाग देना, संबंध, सत्याश्रित पर्वत ८-११ १०९. बृहस्पति द्वारा पत्नी त्याग का वर्णन १-७ संतान, लाना, दूत, पहुंचाना १-४ प्राप्ति, ब्रह्मपत्नी, पापहीन बनाना ५-७ ११०. अग्नि, होता, यूप की स्तुति व वर्णन १-११ कार्यकुशल, भोजन, ज्वाला, प्रार्थनीय, फैलाना, शरीर दर्शाना, दीप्ति वाली, प्रकाश, बुलाना १-८ त्वष्टा देव, शमिता, भक्षणार्थ आग्रह ९-११ १११. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-१० बुलाना, व्याप्त, सनातन, बल संचार, धारण १-५ माया का नाश, शोभा प्राप्ति, दूर जाना, बहाना, जलस्वामी ६-१० ११२. इंद्र की स्तुति १-१० वीरता, आह्वान, श्रेष्ठरूप, बुलाना, स्तुति, पात्र प्राप्ति १-६ बुलाना, प्रशंसा, कुशल, धन मांगना ७-१० ११३. इंद्र की स्तुति १-१० ebook converter DEMO Watermarks*
रक्षा याचना, वृत्रवध, महिमा, वृष्टि, वज्र, क्रोध १-६ वीरता, भक्षण, दभीति, धन याचना ७-१० ११४. विविध विषयों का वर्णन १-१० व्याप्त करना, व्रत, भाग प्राप्ति, प्रवेश, बारह पात्र, रथ १-६ विभूतियां, वाणी, पुरोहित, श्रम निवारण ७-१० ११५. अग्नि का वर्णन एवं स्तुति १-९ दूत, हव्य भक्षण, स्तुति, अजर, आश्रय, होनहार १-६ शत्रुनाश, बलपुत्र, वषट्कार ७-९ ११६. इंद्र की स्तुति १-९ वृष्टि याचना, उत्तरवेदी, शत्रु-संहार, वृष्टि व शक्तिदाता १-५ शरीर, द्रव्य, अभिलाषाएं, धनदाता ६-९ ११७. दान का वर्णन १-९ मृत्यु, भिखारी, खोजना, दाता, जाना १-५ पापी, दानी, धन मांगना, दान ६-९ ११८. अग्नि की स्तुति १-९ पवित्र व्रत, सुच, घृतसिंचन, प्रशंसित, अमर, दीप्तिधारक, अद्वितीय तेज, स्तुति १-९ ११९. इंद्र द्वारा अपना वर्णन १-१३ सोमपान, कंपाना, ऊपर उठाना, स्तुतियां, स्थान बनाना, पंचजन, हराना, धरती रखना १-९ जलाना, स्वर्ग, महान्, सुशोभित १०-१३ १२०. इंद्र का वर्णन १-९ स्वागत, डराना, नाती, प्रसन्न होना, प्रेरणा १-५ विश्वसनीय, कर्म, जीतना, शक्ति ६-९ ebook converter DEMO Watermarks*
१२१. प्रजापति का वर्णन १-१० पुरोडाश, सेवा, पूजा, भुजाएं, आदित्य, प्रजापति, रक्षक १-७ एकमात्र देव, आनंदवर्धक, हवन ८-१० १२२. अग्नि की स्तुति १-८ होता, कर्त्तव्य, धन याचना, बलदाता, भृगुवंशी ऋषि १-५ आचरण, दूत, स्तुति ६-८ १२३. राजा वेन का वर्णन व स्तुति १-८ अर्चना, अनुचर, शब्द, जलस्वामी १-४ कक्ष, भर्त्ता, चमकना, जल निर्माण ५-८ १२४. देवों के प्रति अग्नि का कथन १-९ नियामक, अरणि, जाना, रक्षा, राष्ट्र १-५ द्रव्य, निकलना, वृत्र, प्रशंसा ६-९ १२५. वाणी देवी द्वारा परमात्मा का वर्णन १-८ घूमना, धन देना, आविष्ट, बात बताना, सेवित १-५ व्याप्त, विस्तृत होना, विशाल ६-८ १२६. विभिन्न देवों का वर्णन १-८ बचाना, रक्षा व सुख याचना १-४ आह्वान, शत्रु रक्षार्थ प्रार्थना व आयु याचना ५-८ १२७. रात्रि का वर्णन १-८ शोभा प्राप्ति, बाधा, हानि, शयन, बाज, चोर, अंधकार, स्तोत्र भेंट १-८ १२८. विभिन्न देवों का वर्णन १-९ अध्यक्ष, अभिलाषा, संतान, आशीर्वाद, मनोरथ, छह देवियां, बुद्धि, स्तुति, सुख याचना, सर्वज्ञ १-९ ebook converter DEMO Watermarks*
१२९. प्रलय की दशा का वर्णन १-७ अभाव, ब्रह्मा, प्रलयदशा, विचारना, कामना, कारण खोजना, निकृष्ट अन्न, देवगण, बोध न होना १-७ १३०. प्रजापति द्वारा सृष्टि का विस्तार १-७ विश्वप्राण, साममंत्र, यज्ञ, कल्पना, यज्ञ पूर्ण करना, अनुसरण १-७ १३१. इंद्र एवं अश्विनीकुमारों का वर्णन १-७ सुख, भोजन, मित्रता, सहायता, शत्रु, बल व कृपा याचना १-७ १३२. मित्र व वरुण की स्तुति १-७ बढ़ाना, मित्रता, हव्य, भिन्न, शरीर रक्षा व धन याचना, नृमेध १-७ १३३. इंद्र की स्तुति १-७ डोरियां, स्तुति, दानशीलता, बाधक, शत्रु, नाशार्थ व दूध हेतु याचना १-७ १३४. इंद्र की स्तुति १-७ उत्पत्ति, माता, अन्न मांगना, रक्षासाधन, दुर्बुद्धि, ज्ञानी, यज्ञ पूर्ण करना १-७ १३५. नचिकेता एवं यम का संवाद १-७ इच्छा, अनुराग, रथ, उपदेश, शर्त, बांसुरी १-७ १३६. अग्नि, सूर्य एवं वायु का वर्णन १-७ सूर्य, गति, शरीर, प्रियमित्र मुनि १-४ सागर में निवास, आनंददाता, वाणी ५-७ १३७. विभिन्न विषयों का वर्णन १-७ रक्षा व शक्ति याचना, देवदूत, शक्तियुक्त, प्राणी, ओषधि, छूना १-७ १३८. इंद्र की स्तुति १-६ कुत्स, दीप्तिशाली, पिप्रु, धन छीनना, गाड़ी चलाना, रथचक्र १-६ १३९. सविता, विश्वावसु व सोम का वर्णन १-६ ebook converter DEMO Watermarks*
रक्षक, प्रकाशक, सत्यधर्मा, ऊपर आना, बुद्धि, बल मांगना १-६ १४०. अग्नि की स्तुति १-६ अन्न व बल देना, खेलना, बलपुत्र, यज्ञ छूना, धन याचना १-६ १४१. विभिन्न देवों की स्तुति १-६ प्रजास्वामी, सरस्वती, आह्वान, बुलाना, प्रेरणा १-६ १४२. अग्नि की स्तुति व वर्णन १-८ दुःखी, चलना, धरती, सफाई, चढ़ना, वासदाता, आधार, सागर १-८ १४३. अश्विनीकुमारों की स्तुति व वर्णन १-६ अत्रि, कक्षीवान्, मुक्त, सुंदर, स्तुतियां, नौका, गोधन १-६ १४४. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-६ सोमरस, ऋभु, वंश, सुपर्ण, आयु याचना, रक्षा करना १-६ १४५. सौत की पीड़ा का वर्णन १-६ प्रेम, ओषधि, प्रधान, दूर भेजना, शक्तिहीन, मन १-६ १४६. विशाल वनों का वर्णन १-६ निर्भय, यश, गाड़ियां, शब्द, फल, स्तुति १-६ १४७. इंद्र की स्तुति १-५ कांपना, प्रशंसा, पूजा, अन्न याचना १-५ १४८. इंद्र की स्तुति १-५ स्तुति, जीतना, अर्पण, स्तोत्र, स्तुति १-५ १४९. सविता का वर्णन १-५ बांधना, विस्तार पाना, गरुड़, पत्नी, सावधान १-५ १५०. अग्नि की स्तुति व वर्णन १-५ आह्वान, बुलाना, प्रियव्रत, अग्नि, सुख मांगना, अत्रि, भरद्वाज, कण्व आदि १-५ ebook converter DEMO Watermarks*
१५१. श्रद्धा की स्तुति व वर्णन १-५ जानना, मनचाहा फल, निश्चय, सेवा, बुलाना १-५ १५२. इंद्र की स्तुति १-५ शत्रुशक्षक, अभयकर्त्ता, अप्रिय शत्रु, अंधकार, आयुध १-५ १५३. इंद्र की स्तुति १-५ शोभनधन, अभिलाषा, टिकाना, धारण, अधिकार १-५ १५४. मृत व्यक्ति का वर्णन व यम की स्तुति १-५ घृत, तप करना, दक्षिणा, उत्तम कर्म, सूर्यरक्षक १-५ १५५. दरिद्रता की निंदा १-५ शिरिंबिष्ठ, दरिद्रता, तैरना, सोना, अन्न देना १-५ १५६. अग्नि की स्तुति १-५ धन जीतना, रक्षासाधन, धन मांगना, प्रकाशक, ज्ञाता १-५ १५७. इंद्र एवं अन्य देवों का वर्णन १-५ सुख याचना, प्रजारक्षण, रक्षक, अमरता, वर्षा देखना १-५ १५८. सूर्य की स्तुति १-५ रक्षा व नेत्र याचना, देखना १-५ १५९. शची का आत्मवर्णन १-६ वश में करना, हराना, कीर्ति, शत्रुहीन, तेज, अधिकार १-६ १६०. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-५ सोमरस, स्तुतियां, धनदाता, धनी, आह्वान १-५ १६१. इंद्र द्वारा रोगी को सांत्वना १-५ यक्ष्मा निवारणार्थ प्रार्थना, निर्ऋति, पार ले जाना, रोगनाश, शतायु याचना, लौटना १-५ ebook converter DEMO Watermarks*
१६२. गर्भ की रक्षा हेतु सांत्वना १-६ राक्षसहंता, स्तुति मंत्र, भगाना, जांघें फैलाना, संतान नाशक को भगाना १-६ १६३. यक्ष्मा के नाश हेतु सांत्वना १-६ यक्ष्मा निकालना, रोग भगाना, बाहर करना, सभी भागों से निकालना, जोड़ १-६ १६४. बुरे स्वप्नों के नाश हेतु सांत्वना १-५ निर्ऋति, मनोरथ, नेत्र, पाप, प्रचेता, पापहीन १-५ १६५. विभिन्न प्राणियों का वर्णन १-५ दूत, दूर ले जाने व पाप से बचाने की प्रार्थना, कल्याण, नमस्कार, अन्न १-५ १६६. इंद्र से शत्रुनाश के लिए प्रार्थना १-५ जेता, अहिंसित, बांधना, छीनना, बोलना १-५ १६७. इंद्र की स्तुति १-४ स्वर्गजय, शरण, सोमपान, स्तुति १-४ १६८. वायु की महिमा का वर्णन १-४ धूल उड़ाना, भुवनस्वामी, जलमित्र, पूजन १-४ १६९. गायों के महत्त्व का वर्णन १-४ रक्षार्थ प्रार्थना, गाय की उत्पत्ति, शरीर देना, बछड़े १-४ १७०. सूर्य का वर्णन व स्तुति १-४ प्रजा रक्षा, तेज, विस्तार, भरना १-४ १७१. इंद्र की स्तुति १-४ त्यट् ऋषि, घर जाना, अस्वबुधन, ले जाना १-४ १७२. उषा की स्तुति व वर्णन १-४ गायों का चलना, यज्ञ की समाप्ति, पूजा, अंधकार नाश १-४ १७३. राजा की स्तुति एवं राज्याभिषेक का वर्णन १-६ ebook converter DEMO Watermarks*
अधिकार, राष्ट्र, आशीर्वाद, अविचल, ध्रुव रूप, भक्त १-६ १७४. राजा की स्तुति १-५ राज्यप्राप्ति, द्वेषी व दानरहित, आश्रय, यज्ञ, स्वामी १-५ १७५. सोमरस निचोड़ने में सहायक पत्थर की स्तुति १-४ कर्म, ओषधितुल्य, प्रयोग, यजमान १-४ १७६. ऋभुगण एवं अग्नि का वर्णन १-४ दुग्धपान, दिव्य स्तोत्र, हव्यवाहक, आयुवृद्धि १-४ १७७. माया का वर्णन १-३ जीवात्मारूपी पक्षी, रक्षक वाणी, सूर्य १-३ १७८. गरुड़ का वर्णन १-३ बुलाना, द्यावा-पृथिवी, विस्तार १-३ १७९. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-३ भाग, उपासना, दानी १-३ १८०. इंद्र की स्तुति १-३ धन मांगना, आना, तेजसहित जन्म १-३ १८१. विभिन्न विषयों का वर्णन १-३ पृथु, सुप्रथ, सुरक्षित, साममंत्र लाना, प्राप्ति १-३ १८२. बृहस्पति एवं अग्नि से रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ शत्रुनाशार्थ प्रार्थना, दुर्बुद्धि, अमंगल नाश हेतु प्रार्थना १-३ १८३. यजमान, यजमानपत्नी व उसके गर्भ की रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ पुत्र व गर्भाधान की कामना, जन्म देना १-३ १८४. गर्भ की सुरक्षा हेतु प्रार्थना १-३ भाग, गर्भधारण हेतु प्रार्थना, आह्वान १-३ ebook converter DEMO Watermarks*
१८५. आदित्य व वरुण से जीवन रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ रक्षार्थ प्रार्थना, दबाना असंभव, ज्योति देना १-३ १८६. जीवन को अमृतमय बनाने की वरुण से प्रार्थना १-३ दीर्घायु हेतु प्रार्थना, यज्ञ का आग्रह, अमृत याचना १-३ १८७. अग्नि से शत्रुओं से बचाने की प्रार्थना १-५ स्तुति, आना, रक्षा याचना, एक-एक कर देखना, रक्षार्थ प्रार्थना १-५ १८८. अग्नि से प्रार्थना १-३ ज्ञानी, स्तुति, रक्षा की प्रार्थना १-३ १८९. सूर्य की महिमा का वर्णन १-३ जाना, व्याप्त करना, शोभा पाना १-३ १९०. सृष्टिक्रम की उत्पत्ति का वर्णन १-३ तप से यज्ञ, सत्य, रात-दिन की उत्पत्ति, सागर, सवंत्सर, सूर्य, चंद्रमा, द्युलोक, पृथिवी व अंतरिक्ष की सृष्टि १-३ १९१. अग्नि से कल्याण एवं धन की प्रार्थना १-४ धन याचना, मिलकर भोगने का आग्रह, अभिमंत्रित करना, संगठित रहने का आग्रह १-४ ebook converter DEMO Watermarks*
प्रथम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतारं रत्नधातमम्.. (१) मैं अग्नि की स्तुति करता हूं. वे यज्ञ के पुरोहित, दानादि गुणों से युक्त, यज्ञ में देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञ के फल रूपी रत्नों को धारण करने वाले हैं. (१) अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत. स देवाँ एह वक्षति.. (२) प्राचीन ऋषियों ने अग्नि की स्तुति की थी. वर्तमान ऋषि भी उनकी स्तुति करते हैं. वे अग्नि इस यज्ञ में देवों को बुलावें. (२) अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे. यशसं वीरवत्तमम्.. (३) अग्नि की कृपा से यजमान को धन मिलता है. उन्हीं की कृपा से वह धन दिनदिन बढ़ता है. उस धन से यजमान यश प्राप्त करता है एवं अनेक वीर पुरुषों को अपने यहां रखता है. (३) अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि. स इद्देवेषु गच्छति.. (४) हे अग्नि! जिस यज्ञ की तुम चारों ओर से रक्षा करते हो, उस में राक्षस आदि हिंसा नहीं कर सकते. वही यज्ञ देवताओं को तृप्ति देने स्वर्ग जाता है. (४) अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः. देवो देवेभिरा गमत्.. (५) हे अग्नि देव! तुम दूसरे देवों के साथ इस यज्ञ में आओ. तुम यज्ञ के होता, बुद्धिसंपन्न, सत्यशील एवं परमकीर्ति वाले हो. (५) यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि. तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः.. (६) हे अग्नि! तुम यज्ञ में हवि देने वाले यजमान का जो कल्याण करते हो, वह वास्तव में तुम्हारी ही प्रसन्नता का साधन बनता है. (६) उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम्. नमो भरन्त एमसि.. (७)
हे अग्नि! हम सच्चे हृदय से तुम्हें रात-दिन नमस्कार करते हैं और प्रतिदिन तुम्हारे समीप आते हैं. (७) राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्. वर्धमानं स्वे दमे.. (८) हे अग्नि! तुम प्रकाशवान्, यज्ञ की रचना करने वाले और कर्मफल के द्योतक हो. तुम यज्ञशाला में बढ़ने वाले हो. (८) स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव. सचस्वा नः स्वस्तये.. (९) हे अग्नि! जिस प्रकार पुत्र पिता को सरलता से पा लेता है, उसी प्रकार हम भी तुम्हें सहज ही प्राप्त कर सकें. तुम हमारा कल्याण करने के लिए हमारे समीप निवास करो. (९) सूक्त—२ देवता—वायु आदि वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः. तेषां पाहि श्रुधी हवम्.. (१) हे दर्शनीय वायु! आओ, यह सोमरस तैयार है, इसे पिओ. हम सोमपान के लिए तुम्हें बुला रहे हैं. तुम हमारी यह पुकार सुनो. (१) वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः. सुतसोमा अहर्विदः.. (२) हे वायु! अग्निष्टोम आदि यज्ञों के ज्ञाता ऋत्विज् तथा यजमान आदि हम संस्कार द्वारा शुद्ध सोमरस के साथ तुम्हारी स्तुति करते हैं. (२) वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे. उरूची सोमपीतये.. (३) हे वायु! तुम सोमरस की प्रशंसा करते हुए उसे पीने की जो बात कहते हो, वह बहुत से यजमानों के पास तक जाती है. (३) इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतं. इन्दवो वामुशन्ति हि.. (४) हे इंद्र और वायु! तुम दोनों हमें देने के लिए अन्न लेकर आओ. सोमरस तैयार है और तुम दोनों की अभिलाषा कर रहा है. (४) वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू. तावा यातमुप द्रवत.. (५) हे वायु और इंद्र! तुम दोनों यह जान लो कि सोमरस तैयार है. तुम दोनों अन्नयुक्त द्रव्य में रहने वाले हो. तुम दोनों शीघ्र ही यज्ञ के समीप आओ. (५) वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्. मक्ष्वित्था धिया नरा.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वायु और इंद्र! सोमरस देने वाले यजमान ने जो सोमरस तैयार किया है, तुम दोनों उसके समीप आओ. हे दोनों देवो! तुम्हारे आने से यह यज्ञकर्म शीघ्र पूरा हो जाएगा. (६) मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताचीं साधन्ता.. (७) मैं पवित्र बल वाले मित्र तथा हिंसकों का नाश करने वाले वरुण का यज्ञ में आह्वान करता हूं. ये दोनों धरती पर जल लाने का काम करते हैं. (७) ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा. क्रतुं बृहन्तमाशाथे.. (८) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों यज्ञ के वर्धक और यज्ञ का स्पर्श करने वाले हो. तुम लोग हमें यज्ञ का फल देने के लिए इस विशाल यज्ञ को व्याप्त किए हुए हो. (८) कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया. दक्षं दधाते अपसम्.. (९) मित्र और वरुण बुद्धिमान् लोगों का कल्याण करने वाले और अनेक लोगों के आश्रय हैं. ये हमारे बल और कर्म की रक्षा करें. (९) सूक्त—३ देवता—अश्विनीकुमार अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती. पुरुभुजा चनस्यतम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी भुजाएं विस्तीर्ण एवं हवि ग्रहण करने के लिए चंचल हैं. तुम शुभ कर्म के पालक हो. तुम दोनों यज्ञ का अन्न ग्रहण करो. (१) अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया. धिष्ण्या वनतं गिर:.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक कर्म वाले, नेता और बुद्धिमान् हो. तुम दोनों आदरपूर्ण बुद्धि से हमारी स्तुति सुनो. (२) दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः. आ यातं रुद्रवर्तनी.. (३) हे शत्रु विनाशक, सत्यभाषी और शत्रुओं को रुलाने वाले अश्विनीकुमारो! सोमरस तैयार करके बिछे हुए कुशों पर रख दिया गया है. तुम इस यज्ञ में आओ. (३) इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (४) हे विचित्र प्रकाश वाले इंद्र! ऋषियों की उंगलियों द्वारा निचोड़ा गया, नित्य शुद्ध यह सोमरस तुम्हारी इच्छा कर रहा है. तुम इस यज्ञ में आओ. (४) इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम हमारी भक्ति से आकर्षित होकर इस यज्ञ में आओ. ब्राह्मण तुम्हारा आह्वान कर रहे हैं. तुम सोमरस लिए हुए वाघत नामक पुरोहित की प्रार्थना सुनने के लिए आओ. (५) इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः.. (६) हे अश्व के स्वामी इंद्र! तुम हमारी प्रार्थना सुनने के लिए शीघ्र आओ और सोमरस से युक्त इस यज्ञ में हमारा अन्न स्वीकार करो. (६) ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत. दाश्वांसो दाशुषः सुतम्.. (७) हे विश्वेदेवगण! तुम मनुष्यों के रक्षक एवं पालन करने वाले हो. हव्यदाता यजमान ने सोमरस तैयार कर लिया है, तुम इसे ग्रहण करने के लिए आओ. तुम लोगों को यज्ञ का फल देने वाले हो. (७) विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः. उस्रा इव स्वसराणि.. (८) हे वृष्टि करने वाले विश्वेदेवगण! जिस प्रकार सूर्य की किरणें बिना आलस्य के दिन में आती हैं, उसी प्रकार तुम तैयार सोमरस को पीने के लिए जल्दी आओ. (८) विश्वे देवासो अस्रिध एहिमायासो अद्रुहः. मेधं जुषन्त वह्नयः.. (९) विश्वेदेवगण नाशरहित, विस्तृत बुद्धि वाले तथा वैर से हीन हैं. वे इस यज्ञ में पधारें. (९) पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. यज्ञं वष्टु धियावसुः.. (१०) देवी सरस्वती पवित्र करने वाली तथा अन्न एवं धन देने वाली हैं. वे धन साथ लेकर हमारे इस यज्ञ में आएं. (१०) चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्. यज्ञं दधे सरस्वती.. (११) सरस्वती सत्य बोलने की प्रेरणा देने वाली हैं तथा उत्तम बुद्धि वाले लोगों को शिक्षा देती हैं. वे हमारा यह यज्ञ स्वीकार कर चुकी हैं. (११) महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना. धियो विश्वा वि राजति.. (१२) सरस्वती नदी ने प्रवाहित होकर विशाल जलराशि उत्पन्न की है. साथ ही यज्ञ करने वाले लोगों में उन्होंने ज्ञान भी जगाया है. (१२) सूक्त—४ देवता—इंद्र सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस प्रकार ग्वाला दूध दुहने के लिए गाय को बुलाता है, उसी प्रकार हम भी अपनी रक्षा के लिए सुंदर कर्म करने वाले इंद्र को प्रतिदिन बुलाते हैं. (१) उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद्वेवतो मदः.. (२) हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए हमारे त्रिषवण यज्ञ के पास आओ. तुम धन के स्वामी हो. तुम्हारी प्रसन्नता गाय देने का कारण बनती है. (२) अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३) हे इंद्र! हम सोमपान करने के पश्चात् तुम्हारे अत्यंत समीपवर्ती एवं शोभन-बुद्धि वाले लोगों के बीच रहकर तुम्हें जानें. तुम भी हमें छोड़कर दूसरों को दर्शन मत देना. तुम हमारे समीप आओ. (३) परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४) हे यजमान! बुद्धिमान् एवं हिंसारहित इंद्र के पास जाकर मुझ बुद्धिमान् होता के विषय में पूछो. वे तुम्हारे मित्रों को उत्तम धन देते हैं. (४) उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद्दुवः.. (५) सदा इंद्र की सेवा करने वाले हमारे पुरोहित इंद्र की स्तुति करें. इंद्र की निंदा करने वाले लोग इस देश के अतिरिक्त अन्य देशों से भी निकल जावें. (५) उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम्हारी कृपा से शत्रु और मित्र दोनों हमें सुंदर धन वाला कहते हैं. हम इंद्र की कृपा से प्राप्त सुख से जीवन बितावें. (६) एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७) यह सोमरस तुरंत नशा करने वाला एवं यज्ञ की शोभा है. यह मनुष्यों को मस्त करने वाला, कार्यसाधक और आनंददाता इंद्र का मित्र है. यज्ञ में व्याप्त इंद्र को यह सोमरस दो. (७) अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इसी सोमरस को पीकर तुमने वृत्र आदि शत्रुओं का नाश किया था और युद्धक्षेत्र में अपने योद्धाओं की रक्षा की थी. (८) तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९) eBook converter DEMO Watermarks*