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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

© १९७९ संस्कृत साहित्य प्रकाशन संस्करण : २०१६

ISBN : 978-93-5065-223-7 VP : 1750.5H16* संस्कृत साहित्य प्रकाशन के लिए विश्व बुक्स प्राइवेट लि. एम-१२, कनाट सरकस, नई दिल्ली-११०००१ द्वारा वितरित

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अपनी बात मैंने सायण आचार्य के भाष्य पर आधारित ऋग्वेद का अनुवाद किया था. उस समय आशा नहीं थी कि प्राचीन भारतीय संस्कृति को जानने की इच्छा रखने वालों को यह इतना अधिक रुचिकर लगेगा. मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए यह गौरव की बात है. विद्वान्, चिंतक एवं मनीषी पाठकों ने अब तक किसी त्रुटि एवं असंगति का संकेत नहीं किया है, इससे मैं अनुमान लगाने का साहस कर सकता हूं कि इस ग्रंथ का अनुवाद, मुद्रण आदि संतोषजनक है. इस ग्रंथ में ऋग्वेद की ऋचाओं का वह अनुवाद दिया हुआ है, जो अर्थ सायणाचार्य को अभीष्ट था. इस अनुवाद का आधार सायण का भाष्य है. उन्होंने जिस शब्द का जो अर्थ बताया है, वही मैंने इस अनुवाद में देने का प्रयत्न किया है. मैंने अनुवाद करने के लिए चारों वेदों में से ऋग्वेद और ऋग्वेद के अनेक भाष्यों में से सायण भाष्य ही क्यों चुना, इसका उत्तर देने में मुझे संकोच नहीं है. ऋग्वेद भारतीय जनता एवं आर्य जाति की ही प्राचीनतम पुस्तक नहीं, विश्व की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी पुस्तक है. सबसे प्राचीन संस्कृति—वैदिक संस्कृति—के प्राचीनतम लिखित प्रमाण होने के कारण ऋग्वेद की महत्ता सर्वमान्य है. मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता कि ऋग्वेद की ऋचाओं का ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान के रूप में साक्षात्कार किया था या उन्होंने स्वयं इनकी रचना की थी. वैसे ऋग्वेद में समसामयिक समाज का जिस ईमानदारी, विस्तार एवं तन्मयता से वर्णन किया गया है, उससे मेरा व्यक्तिगत विश्वास यही है कि ऋषियों ने समयसमय पर इन ऋचाओं की रचना की होगी. सायण के अतिरिक्त ऋग्वेद पर वेंकट माधव, उद्गीथ, स्कंदस्वामी, नारायण, आनंद तीर्थ, रावण, मुद्गल, दयानंद सरस्वती आदि अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं. इनमें किसी का भाष्य पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है. केवल सायण ही ऐसे विद्वान् हैं, जिन्होंने चारों वेदों पर पूर्ण भाष्य लिखा है और वह उपलब्ध है. सायण का जीवनकाल चौदहवीं शताब्दी है. वह विजयपुर नरेश हरिहर एवं बुक्क के मंत्री रहे थे. प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ 'माधव निदान' लिखने वाले माधव आचार्य इन्हीं के भाई थे. किसी भी शब्द का अर्थ जानने में परंपरागत ज्ञान का बहुत महत्त्व है. सायण को ऋग्वेद के परंपरागत अर्थ को जानने की सुविधा बाद में होने वाले आचार्यों से अधिक थी. यह निर्विवाद है. मंत्री होने के कारण सभी पुस्तकों की प्राप्ति और विद्वानों की सहायता उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

सहज सुलभ थी. सायण ने ऋचाओं के प्रत्येक शब्द का विस्तार से अर्थ किया है. प्रत्येक शब्द की व्याकरणसम्मत व्युत्पत्ति की है तथा उन्होंने निघंटु, प्रातिशाख्य एवं ब्राह्मण ग्रंथों के उदाहरण देकर अपने अर्थ की पुष्टि की है. इस प्रकार सायण का अर्थ निराधार नहीं है. वैदिक मंत्रों के अर्थ जानने के हेतु यास्क आचार्य ने तीन साधन बताए हैं: १. आचार्यों से परंपरा द्वारा सुना हुआ ज्ञान एवं ग्रंथ. २. तर्क. ३. मनन. सायण ने इन तीनों का ही सहारा लेकर अपना भाष्य लिखा है. सायण की कोई धारणा अथवा जिद नहीं जान पड़ती. कुछ अन्य आचार्यों के समान उन्होंने सभी मंत्रों का आधिभौतिक, आध्यात्मिक या आधिदैविक अर्थ नहीं किया है. कुछ आचार्यों का यहां तक विश्वास रहा है कि प्रत्येक वैदिक मंत्र के उक्त तीनों प्रकार के अर्थ संभव हैं. सायण ने प्रसंग के अनुकूल कुछ मंत्रों का मानव जीवन संबंधी, कुछ का यज्ञ संबंधी और कुछ का आत्मापरमात्मा संबंधी अर्थ दिया है. सायण के अनुसार, अधिकांश मंत्रों का अर्थ मानव जीवन संबंधी ही है. शेष दो प्रकार का अर्थ उन्होंने बहुत कम मंत्रों का किया है. इस प्रकार एकमात्र सायण ही ऐसे भाष्यकर्त्ता हैं, जिन्होंने किसी वाद का चश्मा लगाए बिना वैदिक मंत्रों का अर्थ किया है. उनका भाष्य साधारण व्यक्ति को वेदार्थ समझने में भी सहायक है. इन्हीं सब कारणों से मैंने अपने अनुवाद का आधार सायण भाष्य को बनाया है. इस अनुवाद के साथ ऋग्वेद की मूल ऋचाएं भी दी जा रही हैं. हिंदी में ऋग्वेद के अन्य अनुवाद भी हुए हैं, जिन्हें उनके लेखकों ने सायण भाष्य पर आधारित बताया है. मैं यह कहने का साहस तो नहीं कर पाऊंगा कि उन सबके अनुवाद शुद्ध नहीं हैं; हां, यह कहने में मुझे संकोच नहीं है कि मैंने सायण का आशय स्पष्ट करने का पूरा प्रयत्न किया है. ऋग्वेद का विभाजन दस मंडलों में किया गया है. प्रत्येक मंडल में बहुत से सूक्त एवं प्रत्येक सूक्त में अनेक ऋचाएं हैं. मैंने अनुवाद में केवल यही विभाजन दिया है. वैसे प्रत्येक मंडल कुछ अनुवाकों में विभक्त है. अनुवाक सूक्तों में बांटे गए हैं. संपूर्ण ऋग्वेद को चौसठ अध्यायों में विभक्त करके उनके आठ अष्टक बनाए गए हैं. प्रत्येक अष्टक में आठ अध्याय हैं. सायण ने ये सब विभाजन दिए हैं. उनके भाष्य में अष्टकों एवं अध्यायों को ही प्रमुखता दी गई है. एक तो यह विभाजन कृत्रिम है, दूसरे इससे व्यर्थ का भ्रम होता है, इसलिए मैंने इनका उल्लेख नहीं किया है. संहिता अथवा भाष्य में प्रत्येक मंत्र के ऋषि, देवता, छंद और विनियोग का उल्लेख है. ऋषि का तात्पर्य उस मंत्र के निर्माता या द्रष्टा ऋषि से है. देवता का अर्थ है—विषय. यह देवता शब्द के वर्तमान प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न है. ऋग्वेद के देवता सपत्नी (सौत), द्यूत (जुआ), दरिद्रता, विनाश आदि भी हैं. छंद से तात्पर्य उस सांचे या नाप से है जिस में वह मंत्र निर्मित है. विनियोग का तात्पर्य है—प्रयोग. जो मंत्र समयसमय पर जिस काम में आता रहा, ebook converter DEMO Watermarks*

वही उस का विनियोग रहा. वैदिक मंत्रों का अर्थ समझने में देवता (विषय) ही आवश्यक है. इसलिए मैंने केवल देवता का ही उल्लेख किया है. अधिकांश सूक्तों में एक सूक्त का ऋषि एवं छंद एक ही है. कुछ सूक्तों में अलग-अलग मंत्रों के अलग ऋषि एवं छंद भी हैं. सभी वर्णों के पुरुषों के अतिरिक्त कुछ नारियां भी ऋषि हुई हैं. मंत्रों के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र सभी ऋषि के रूप में संबंधित हैं. ब्राह्मण एवं क्षत्रिय ऋषियों की संख्या ही सर्वाधिक है. वैश्य एवं शूद्र ऋषि एकएक ही हैं. वैदिक आर्यों का समाज पूर्णतया विकसित एवं उन्नत समाज था. यदि ऋग्वेद में वर्णित बातों को मानव जीवन संबंधी स्वीकार किया जाए तो आर्यों का जीवन सभी प्रकार से पूर्ण था. ऋग्वेद में कुछ वस्तुओं एवं पशुपक्षियों के नाम एवं वर्णन साक्षात् रूप से आए हैं और कुछ का उल्लेख अलंकार रूप में हुआ है. वर्णन चाहे किसी भी रूप में हो, पर इतना सिद्ध हो जाता है कि ऋग्वेदकाल के लोग इन सब बातों को जानते थे. कुछ बातें उन्होंने प्रत्यक्ष देखी थीं और कुछ की उन्हें कल्पना हो सकती है. कवच, लोहे का द्वार, सोने अथवा लोहे की नकदी, सुसज्जित सेना, ढाल-तलवार, कारावास, हथकड़ी-बेड़ी, आकाश में उड़ने वाला बिना घोड़ों का रथ, सौ पतवारों वाली नाव, लोहे का नकली पैर, अंधे को आंखें मिलना, बूढ़े का दोबारा जवान होना, जुआ खेलना, व्यभिचारिणी स्त्री का दूर जाकर गर्भपात करना, कामुकी नारी का संकेतस्थल पर आना, कन्या के पिता द्वारा कन्या को अलंकृत करना, लकड़ी का संदूक, घोड़ा चलाने का चाबुक, लगाम, अंकुश, सुई, कपड़ा बुनने वाला जुलाहा, घड़ा बनाने वाला कुम्हार, रथकार, सुनार, किसान, तालाब से सिंचाई, हल जोतना आदि ऐसी बातें हैं, जो वैदिक आर्यों को सभी प्रकार विकसित सिद्ध करती हैं. कुछ लोगों का ऋग्वेद में व्यभिचारिणी स्त्री, गर्भपात, प्रेमी और प्रेयसी, कामी पुरुष, कामुकी नारी, कन्या के पिता या भाई द्वारा उत्तम वर पाने हेतु दहेज देना, अयोग्य वर का उत्तम वधू पाने हेतु मूल्य चुकाना, चोर, जुआरी, विश्वासघातक मित्र आदि का उल्लेख अनुचित लग सकता है. इन शब्दों के वे दूसरे अर्थ करेंगे एवं तत्कालीन समाज में इन बातों को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. मैं वास्तविकता बताने के लिए उनसे क्षमा चाहूंगा, मेरा दृढ़ विश्वास है कि एक बुद्धिप्रधान एवं विचारशील विकसित समाज में ये बातें होनी स्वाभाविक हैं. दिनभर जंगल में चरकर घरों को लौटती गाय, रस्सी से बंधे बछड़े का रंभाना, गाय का दूध दुहना, छाछ बिलोना, कच्चे मांस पर मक्खियों का बैठना, चिड़ियों का चहचहाना आदि पढ़कर ऐसा लगता है कि भारत के गांवों में आज भी वैदिक जीवन की झलक मिल जाती है. नागरिकता का विस्तार एवं विज्ञान की पहुंच उसे विकृत कर रही है. आर्य मुख्यतया कृषि जीवी एवं ग्रामों में रहने वाले लोग ही थे. बाद में उन्होंने नगर भी बसाए, पर ऋग्वेद में अधिकांश नगर शत्रु नगरों के रूप में बताए गए हैं. मुझे ऋग्वेद का सायण भाष्यानुसार अनुवाद करने में लगभग ढाई वर्ष लगे. यदि मुझे ebook converter DEMO Watermarks*

सायण के समान विस्तृत भाष्य लिखना पड़ता तो संभवतया चालीस वर्ष लगते. मेरे लिए इस अनुवाद की एकमात्र उपलब्धि यही है कि मैं इस बहाने संपूर्ण ऋग्वेद एवं इसका सायण भाष्य पढ़ सका. यदि किसी अन्य व्यक्ति का इस अनुवाद से कोई प्रयोजन सिद्ध हो सके तो मैं अपना प्रयत्न सफल समझूंगा. मेरे स्वयं के प्रमाद अथवा अज्ञान के कारण अथवा मुद्रण संबंधी कमियों के कारण यदि अब भी कुछ त्रुटियां रह गई हों तो उन्हें मैं आगामी संस्करण में सुधारने हेतु कृतसंकल्प हूं. जो महानुभाव इस ओर मार्गनिर्देशन करेंगे उनका मैं आभार मानूंगा. अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं कि ऋग्वेद की एक बात ने मुझे बहुत चकित किया है. उन्नत समाज, विचारशील लोगों एवं सभ्य परिवारों की सभी सामग्री का उल्लेख होते हुए भी कहीं भी दीपक अथवा किसी कृत्रिम प्रकाशसाधन का नाम नहीं मिला. डा. गंगा सहाय शर्मा

सूक्त विषय मंत्र सं.

प्रथम मंडल सूक्त विषय मंत्र सं. १. अग्नि का वर्णन एवं स्तुति १-९ स्तुति, धन प्राप्ति १-३ देवताओं को तृप्त करना, यशोगान, कल्याणकारी, नमस्कार ४-७ कर्मफलदातृ, प्रार्थना ८-९ २. वायु, इंद्र, वरुण आदि की स्तुति १-९ आह्वान, स्तुति, प्रशंसा १-३ अन्न की प्राप्ति, आह्वान ४-८ बल व कर्म हेतु प्रार्थना ९ ३. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-१२ पालक, बुद्धिमान्, शत्रुनाशक १-३ सोमपान हेतु आह्वान ४-५ अन्न स्वीकार हेतु प्रार्थना ६ विश्वेदेवगण का आह्वान ७-९ सरस्वती का आह्वान, धन्यवाद, स्तुति १०-१२ ४. इंद्र का वर्णन एवं स्तुति १-१० आह्वान, गाय की स्तुति, आह्वान, शरण १-४ देशनिकाला, कृपा ५-६ सोमरस समर्पित ७ इंद्र की स्तुति ८-१० ebook converter DEMO Watermarks*

५. इंद्र की स्तुति १-१० धन-बल, प्रशंसनीय, याचना १-१० ६. इंद्र एवं मरुद्गण की स्तुति १-१० स्तुति, घनिष्ठता, पूजा-अर्चना १-१० ७. इंद्र की स्तुति १-१० स्तुति, सूर्य, पशुलाभ, प्रार्थना १-१० ८. इंद्र की स्तुति १-१० जीतना, ज्ञान व पुत्र प्राप्ति १-६ सोमरस का न सूखना, वाणी, विभूतियां ७-९ मंत्रों के इच्छुक १० ९. इंद्र की स्तुति १-१० शत्रुनाश व कार्य सिद्ध १-२ धन, वर्षा की प्रार्थना, प्रेरणा ३-६ धन याचना, दान, आह्वान, यज्ञ में वास ७-१० १०. इंद्र की स्तुति १-१२ अर्चना, वर्षार्थ मरुद्गण व इंद्र का आना १-२ बुद्धि की कामना, स्तुतिगान ३-५ मैत्री, धन व शक्ति हेतु सामीप्य ६ द्वार खोलने का आग्रह, महिमामंडित, स्तुतियां, धन कामना, आशा ७-१२ ११. इंद्र की स्तुति १-८ बलशाली, नमस्कार, दान के नाना रूप, असुरों को घेरना १-५ दान की महिमा, शुष्ण का नाश, देने का ढंग ६-८ १२. अग्नि की स्तुति १-१२ ebook converter DEMO Watermarks*

देवदूत, आह्वान, स्तुति, रक्षार्थ प्रार्थना, आग्रह १-९ धन, संतान, अन्न की प्राप्ति, देवदूत १०-१२ १३. अग्नि की स्तुति एवं वर्णन १-१२ प्रज्वलित, रक्षक व प्रशंसनीय, स्तुति १-७ अग्नि, सूर्य, इला आदि का आह्वान ८-१२ १४. अग्नि की स्तुति १-१२ इंद्र, सोमपान हेतु आह्वान १-१० आग्रह, घोड़े जोड़ना ११-१२ १५. ऋतु इंद्र व मरुद्गण आदि का वर्णन १-१२ सोमपान, पत्थर १-७ द्रविणोदा, धनदाता, सोमपान ८-११ कल्याण की कामना १२ १६. इंद्र की स्तुति १-९ हरि नामक घोड़े १-४ सोमपानार्थ आग्रह, गाएं व अश्व की कामना ५-९ १७. इंद्र एवं वरुण की स्तुति १-९ रक्षा, धन व अन्न की कामना १-४ धन प्राप्ति, इंद्र व वरुण की उत्तम सेवा व स्तुति ५-९ १८. ब्रह्मणस्पति की स्तुति व इंद्रादि का वर्णन १-९ आग्रह, फलदाता, कृपा याचना १-२ रक्षार्थ, उन्नति, पाप से रक्षा, स्तुति ३-९ १९. अग्नि एवं मरुद्गण की स्तुति १-९ आह्वान १-२ ebook converter DEMO Watermarks*

यज्ञकर्त्ता सर्वश्रेष्ठ, मरुद्गण की स्तुति, प्रशंसा, मधु समर्पित ३-९ २०. ऋभुगण की स्तुति १-८ स्तोत्र, घोड़े, रथ व गाय बनाना १-३ सफलतादायक मंत्र, अर्पण, पात्र तोड़ना, स्वर्ण, मणि आदि की प्राप्ति, यज्ञ भाग ४-८ २१. इंद्र एवं अग्नि का वर्णन १-६ प्रशंसा, आह्वान, संतानहीन, प्रगति १-६ २२. अश्विनीकुमार, मित्र आदि की स्तुति १-२१ आह्वान, स्तुति, निमंत्रण, देवपत्नियां, याचना १-१५ आगमन, परिक्रमा, विष्णु की कृपा से यजमान के व्रत पूर्ण १६-२१ २३. वायु, इंद्र आदि की स्तुति १-२४ सोमरस, रक्षा मांगना, आह्वान, महान् व शत्रुनाशक १-९ संतान, रक्षा कामना, आग्रह, सोमरस की प्राप्ति १०-१४ ऋतुएं, हितकारी जल, कर्त्तव्य, अमृत व ओषधियां १५-२० रोग निवारण, स्तुति २१-२४ २४. अग्नि आदि देवों की स्तुति १-१५ पुकार, धन याचना, प्रशंसा, प्रार्थना १-९ तारों व चंद्रमा का प्रकाशित होना १० आयु याचना, शुनःशेप, पापमुक्त हेतु प्रार्थना ११-१५ २५. वरुण की महिमा का वर्णन १-२१ क्रोध न करने का आग्रह, प्रसन्न होना, जीवनदान, अंतर्यामी वरुण १-११ आयुदाता, कवचधारक यशोगान, हव्य, रथ, प्रकाशकर्त्ता १२-२१ २६. अग्नि की स्तुति १-१० ebook converter DEMO Watermarks*

वस्तु याचना, प्रसन्नता, पूजन, स्तुतियां १-१० २७. अग्नि की स्तुति १-१३ वंदना, याचना, फलकारी, स्तुति १-८ पूजा, प्रार्थना, अनुष्ठान व यज्ञ, प्रजापालक, स्तुति ९-१३ २८. इंद्र आदि की स्तुति १-९ आह्वान, ऊखल, मूशल की स्तुति, पात्र १-९ २९. इंद्र की स्तुति १-७ धन की अभिलाषा १-७ ३०. इंद्र की स्तुति १-२२ सोमरस अर्पित, उदर, प्रार्थना, सोमरस पीने की प्रार्थना, स्तुति, रक्षार्थ बुलाना १-७ स्वर्ग, कृपा, गाय, धन आदि की वृद्धि, रथ, गो प्राप्ति ८-१७ रथ, उषा की स्तुति १८-२२ ३१. अग्नि की स्तुति १-१८ अंगिरागोत्रीय ऋषि, प्रमुखता, किन से स्वर्ग १-७ सुख, अन्न, धन, पुत्र व दीर्घायु की कामना ८-१० पुत्ररक्षा का आग्रह ११-१२ प्रिय द्रव्य १३ ज्ञान व दिशाओं का बोध १४ सुखकारी यज्ञ १५ भूल हेतु क्षमा याचना १६ मनु, अंगिरा, ययाति १७ संपत्ति, अन्न एवं बुद्धि प्राप्ति १८ ३२. इंद्र की स्तुति १-१५ ebook converter DEMO Watermarks*

मार्ग बदला, मेघ, वृत्र, दनु का वध १-१० प्रवाह खोलना, माया को जीतना, निडर, पशु स्वामी ११-१५ ३३. इंद्र की स्तुति १-१५ गो-इच्छा, विनती, अनुचर को मारना १-८ रक्षा ९ जल बरसाना, वृत्रवध, दशद्यु व श्वैत्रेय ऋषि १०-१५ ३४. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-१२ आह्वान, सोमाभिषेक, रथ १-९ हवि व सोमरस लेने का आग्रह, आह्वान १०-१२ ३५. सूर्य की स्तुति १-१२ रक्षार्थ आह्वान, सविता का रथ, सफेद घोड़े, कील, प्रकाशदाता १-५ स्वर्ग व भूलोक पर अधिकार, व्याप्त होना, धन मांगना, रक्षार्थ प्रार्थना ६-११ ३६. अग्नि का वर्णन १-२० अन्न प्राप्ति, देवदूत, शत्रु की हार, धन वर्षा, धुआं, धारण, उन्नत १-१३ पापों, राक्षसों व शत्रुओं से रक्षा, धन प्राप्ति, दमनकर्त्ता, कल्याणकारी, शत्रुनाश १४-२० ३७. मरुतों का वर्णन १-१५ स्तुति, वाहन, चाबुक, तेज, दूध, कंपाना, चाल, आकाश, विस्तार, बादल, प्रेरणा १-१२ पदध्वनि, प्रार्थना, दीर्घायु १३-१५ ३८. मरुतों की स्तुति १-१५ आह्वान, स्तुति, सेवा, वर्षा, सींचना १-९ गरजना, नदी, स्तुति एवं वंदना १०-१५ ebook converter DEMO Watermarks*

३९. मरुतों का वर्णन १-१० समीप जाना, शत्रु संहार, ध्वनि, रक्षार्थ तैयार, क्रोध १-१० ४०. ब्रह्मणस्पति की स्तुति १-८ स्तुतिगान व शत्रुनाशार्थ प्रार्थना १-४ देवनिवास, ब्रह्मणस्पति, शत्रुनाश ५-८ ४१. वरुण मित्र आदि देवों का वर्णन १-९ ज्ञानी से संरक्षण, उन्नति, पापनाश, सुगम मार्ग १-५ धन व संतान की प्राप्ति, स्तोत्र, तृप्ति, निंदा न करना ६-९ ४२. पूषा की स्तुति १-१० मार्ग के पार लगाने, आक्रांताओं को हटाने, सजा देने व शक्ति देने की प्रार्थना १-५ धन प्राप्ति, उत्तरदायित्व, अन्न, धन मांगना ६-१० ४३. रुद्र, वरुण आदि देवों की स्तुति १-९ ओषधि व सुख मांगना १-४ चमकीला, सुखकारी, अन्न व प्रजा कामना ५-९ ४४. अग्नि व मरुद्गण की स्तुति १-१४ धन याचना, सेवन, स्तुति, दीर्घजीवन, प्रार्थना, हितसाधक, लपटें, स्तुति १-१४ ४५. अग्नि की स्तुति १-१० आह्वान, प्रस्कण्व, रक्षा याचना, चमकीली लपटें, फलदाता १-१० ४६. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-१५ अंधकारनाशक, निवासदाता, तापशोषक, स्तुति १-५ दरिद्रता मिटाना ६ रथ, प्रकाश, उदित सूर्य, मार्ग, रक्षा निवास, ७-१३ हवि ग्रहण करने व सुख देने की प्रार्थना १४-१५ ebook converter DEMO Watermarks*

४७. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-१० धन याचना, स्तुति, यज्ञसिद्ध की इच्छा, रक्षार्थ प्रार्थना १-५ सुदास, कुशों पर बैठने व सोमपान का आग्रह ६-१० ४८. उषा का वर्णन १-१६ अन्न व पशु मांगना, पालिका १-५ भिक्षुक व पक्षी, समीप जाना ६-७ शोषकों को भगाना, स्तुति, अन्न याचना ८-१६ ४९. उषा का वर्णन १-४ लाल गाएं, आगमन, कामों में लगाना, अंधकार का नाश १-४ ५०. सूर्य की स्तुति १-१३ सूर्य का जाना, नक्षत्रों का भागना, किरणें, स्वर्गलोक, स्तुति १-७ घोड़े व सात घोड़ियां ८-९ ज्योतियुक्त, रोगनाशार्थ प्रार्थना १०-१३ ५१. इंद्र की स्तुति १-१५ बलवान, रक्षक, वर्षक, स्तुति, मायावियों को हराना, कुत्स, शंबर, वज्र व यज्ञ के विरोधियों का नाश १-८ बभ्रु, घोड़े, शुक्राचार्य, शार्यात, कन्या, अश्व, रथ, धन देना, विजयी बनाना ९-१५ ५२. इंद्र की स्तुति १-१५ रक्षार्थ प्रार्थना, शक्ति व निमंत्रण, पूर्णता, सहायक, घायल वृत्र १-६ त्वष्टा, वृत्रनाश, आकाश में सूर्य, वृत्रवध, बल ७-१२ पालक, अर्चना १३-१५ ५३. इंद्र की स्तुति १-११ धन पर अधिकार १ ebook converter DEMO Watermarks*

कामना पूर्ण हेतु प्रार्थना, गाय घोड़े, मांगना १-५ उपद्रव शांत करना ६ असुर नमुचि, करंज एवं पर्णय, राजा सुश्रवा ७-१० दीर्घजीवन की प्राप्ति ११ ५४. इंद्र की स्तुति १-११ शब्दायमान व वृष्टिकर्त्ता, स्तुति १-३ शंबर, नगरों का विनाश, अतुलनीय, बुद्धिबल, कामनाएं ४-९ पेट में मेघ १० रोग मिटाने, धन, संतान व अन्न देने की प्रार्थना ११ ५५. इंद्र का वर्णन १-८ वज्र रगड़ना, सोमरस के लिए दौड़ना, आगे रहना, स्तुति, श्रद्धा व कर्मों का होना १-८ ५६. इंद्र का वर्णन १-६ सोमपान, स्तोत्र का पहुंचना, शक्तिशाली मेघों से अलग करना १-६ ५७. इंद्र की स्तुति १-६ बल हरना असंभव, इच्छापूरक, शौर्य की स्तुति १-६ ५८. अग्नि का वर्णन १-९ अंतरिक्षलोक, ज्वालाएं, धनदाता, दाहक, डरना १-५ पूजनीय, सुखदायक, धन याचना व पापों से मुक्ति ६-९ ५९. अग्नि की स्तुति १-७ धारक, वनवास १-३ स्तुति ४-७ ६०. अग्नि का वर्णन १-५ ebook converter DEMO Watermarks*

भृगुवंशी, सेवा एवं स्तुति १-५ ६१. इंद्र का वर्णन १-१६ अन्न देना व हव्य विसर्जन १-४ अन्न लाभार्थ मंत्र बोलना ५ वज्र, वृत्रवध, शत्रुनाश, फल मिलना ६-११ पशु काटना, वृत्रवध, प्रशंसा १२-१४ ऋषि नोधा, एतश का रक्षण व ऋषियों की उन्नति १५-१६ ६२. इंद्र का वर्णन १-१३ स्तोत्र, सरमा कुतिया को अन्न मिलना १-३ मेघों का डरना, अंधकार-नाश, नदियां भरना ४-६ वश में करना ७ रात काली व उषा उजली ८ काली व लाल गायों का सफेद दूध ९ स्तुति १०-१३ ६३. इंद्र की स्तुति १-९ भय, रथ, शुष्ण असुर, कुत्स, शत्रु-असुरसंहारक, नाश १-७ धन व अन्न विस्तार हेतु प्रार्थना ८-९ ६४. मरुद्गण का वर्णन १-१५ स्तुतियां, मरुद्गण, कंपन, सज्जित, वश में करना, नाश १-६ लाल घोड़ी, वृक्ष-भक्षण, गर्जन, बैठना, आयुधधारक ७-११ धन व पुत्र-प्राप्ति १२-१५ ६५. अग्नि का वर्णन १-१० समीप आना, रोकना असंभव, प्रकाशमान १-१० ebook converter DEMO Watermarks*

६६. अग्नि का वर्णन १-१० अन्न मांगना, आहुतियां १-१० ६७. अग्नि का वर्णन १-१० कृपा, अग्निप्राप्ति, अन्नस्वामी, पशुप्रिय स्थानों के रक्षार्थ प्रार्थना १-६ स्तुति, पूजा एवं कर्म ७-१० ६८. अग्नि का वर्णन १-१० तेज द्वारा रक्षा १-४ धन व पुत्रकामना, आज्ञापालन ५-१० ६९. अग्नि का वर्णन १-१० तेजस्वी, सुखकारी, आनंदकारी, सुखदाता, हव्य वहन १-१० ७०. अग्नि का वर्णन १-११ अन्न याचना, रक्षण, पालन, सहायक १-११ ७१. अग्नि का वर्णन १-१० सेवा, शक्ति, दूत, कुशल १-५ नमस्कार से अन्न वृद्धि ६-७ प्रेरणा, मित्र व वरुण ८-९ बुढ़ापा भगाने का प्रयत्न १० ७२. अग्नि का वर्णन १-१० अमृत व धन मिलना, मरुद्गण भी दुःखी, नाम व शरीर मिलना १-४ पूजन, रक्षक, हविवहन, भक्षण, जल बहाना, ज्वालाएं फैलाना ५-१० ७३. अग्नि का वर्णन १-१० अन्नदान, दुःखत्राता, धनदाता, दूध पिलाना, निशा, संसार-रक्षक, शत्रुपुत्रों का वध व कामना १-१० ebook converter DEMO Watermarks*

७४. अग्नि का वर्णन १-९ उपस्थित देव, धनरक्षक शोभा बढ़ाना, हव्यदान से धन, अन्न, ऐश्वर्य व शक्ति लाभ १-९ ७५. अग्नि की स्तुति १-५ स्तुति, बंधु, प्रिय मित्र एवं फलदाता १-५ ७६. अग्नि की स्तुति १-५ प्रसन्नता के उपाय, पूजा, यज्ञरक्षा, संतान आदि की याचना १-५ ७७. अग्नि का वर्णन १-५ तेजस्वी, हव्य देना, तेजस्वी, सोम को पीना १-५ ७८. अग्नि की स्तुति १-५ गुणप्रकाशक स्तोत्र, गौतम ऋषि द्वारा स्तुति १-५ ७९. अग्नि का वर्णन १-१२ मेघों का कांपना व बरसना, भिगोना १-३ धन, अन्न व रक्षार्थ याचना ४-१२ ८०. इंद्र की स्तुति १-१६ अहि को पीटना १ श्येन बनने वाली गायत्री २ प्रभुत्व का प्रदर्शन, भयभीत, यज्ञकर्म समर्पित ३-१६ ८१. इंद्र का वर्णन १-९ रक्षार्थ प्रार्थना, सेना के समान, गर्वहंता, अतुलनीय, धन, बुद्धि व शौर्य की याचना १-९ ८२. इंद्र की स्तुति १-६ स्तुति सुनने समीप जाना १-४ ebook converter DEMO Watermarks*

प्रेयसी के पास जाने हेतु आग्रह ५-६ ८३. इंद्र का वर्णन १-६ धन की प्राप्ति १ एक कन्या अनेक वर २ शक्ति मिलना, पूजन, प्रसन्न होना ३-६ ८४. इंद्र का वर्णन १-२० आह्वान, प्रसन्न, घोड़े, धन मिलना, छतरियां कुचलना १-८ अधिकार प्रदर्शन ९-१२ दधीचि १३ अश्वों की प्रशंसा १४-१६ रक्षा व प्रशंसा १७-२० ८५. मरुद्गण का वर्णन १-१२ अलंकार प्रिय, शक्तिशाली होना १-३ बुंदकियों वाली हरिणियां ४-५ घोड़े व निवास स्थल, भय ६-८ वृत्रवध ९ वीणा वादन, गौतम, सुख याचना १०-१२ ८६. मरुद्गण की स्तुति १-१० सोमपान व हव्य वहन १-७ पसीने से नहाना ८ उपद्रव, राक्षसों का नाश ९-१० ८७. मरुद्गण की स्तुति १-६ चमकना, वृष्टि, पर्वत को कंपाना, यज्ञपात्र, धारण, स्थान १-६ ebook converter DEMO Watermarks*

८८. मरुद्गण का वर्णन १-६ अन्न लाना, कल्याण, आयुध, कुआं उठाना, स्तुति १-६ ८९. विश्वेदेव का वर्णन १-१० आयुवृद्धि, धन व ओषधि हेतु याचना, कल्याण १-६ सफेद बूंदों वाले घोड़े व नाना वर्ण की गाएं ७ मानवों की आयु सौ वर्ष तय ८-९ जन्म और उसका कारण १० ९०. विश्वेदेव का वर्णन १-९ गंतव्य, धन व सुख लाभ १-३ मार्ग व मधु वर्षा ४-६ आकाश व देवों द्वारा सुख ७-९ ९१. सोम का वर्णन १-२३ धन, फलदाता, सुधारक १-३ हव्य लेने हेतु प्रार्थना ४-५ जीवनदायिनी ओषधि व धन ६-७ दुःख से बचाने की प्रार्थना ८-९ यज्ञ, संपत्ति की वृद्धि व हृदय में वास १०-१३ अनुग्रही व हितकारी, अन्न कामना १४-१८ पुत्ररक्षक, शास्त्रज्ञ, पुत्रदाता १९-२० शत्रुजेता, अंधकारनाशक, स्वामी २१-२३ ९२. उषा एवं अश्विनीकुमारों का वर्णन १-१८ अंधकारनाशक, पहले तेज पूर्व में १-६ गोयुक्त अन्न-धन की याचना ७-८ ebook converter DEMO Watermarks*

पश्चिम में तेज ९ पक्षियों की हिंसा १० तेज का विस्तार, धन व सौभाग्य मांगना ११-१५ धन व ज्योति मिलना, आरोग्य व सुखदाता १६-१८ ९३. अग्नि एवं सोम की स्तुति १-१२ सुख, गाएं, अश्व, पुत्र-पौत्र की याचना १-३ उपकारी सूर्य ४ नक्षत्र धारण व धरती का विस्तार १-६ अन्न भक्षण, पाप से बचाने की प्रार्थना ७-८ अन्य देवों से अधिक प्रसिद्धि ९ धन मांगना १०-१२ ९४. अग्नि की स्तुति १-१६ कल्याण, ईंधन बटोरना, महान्, पुरोहित, अंधकारनाशक, हिंसा से बचाने की प्रार्थना, वन घेरना, पक्षियों का डरना, संपत्तियों में निवास, आहूत १-१४ समृद्ध बनाना, आयुवृद्धि की कामना १५-१६ ९५. अग्नि का वर्णन १-११ रात-दिन के पुत्र, यशस्वी, व्यापक, ऋतुविभाजक, जल उत्पत्ति का कारण, धरती व आकाश का डरना १-५ बलों का स्वामी, किरण के समान, अन्न व धन की प्राप्ति ६-११ ९६. अग्नि का वर्णन १-९ वायु व जल १ धारण करना २-७ धन व अन्न की कामना ८-९ ebook converter DEMO Watermarks*