ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्य१ः स्मयमानासो अग्निम्. घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः.. (८) जिस प्रकार कल्याणी नारी मुसकुराती हुई तन्मय चित्त से पति की ओर बढ़ती है, उसी प्रकार घी की धाराएं अग्नि की ओर जाती हैं. वे भली प्रकार दीप्त होकर मिलती हैं. अग्नि उन्हें सेवन करता हुआ उनकी कामना करता है. (८) कन्याइव वहतुमेतवा उ अञ्ज्यञ्जाना अभि चाकशीमि. यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभि तत्पवन्ते.. (९) हम देखते हैं कि जिस प्रकार कन्या पति के समीप जाने के लिए शृंगार करती है, उसी प्रकार घृत की धाराएं अग्नि के समीप जाने के लिए अपना रूप निखारती हैं, जिस स्थान पर सोम निचोड़ा जाता है अथवा यज्ञ आरंभ होता है, उसी स्थान की ओर घी की धाराएं चलती हैं. (९) अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त. इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते.. (१०) हे ऋत्विजो! गायों के समीप जाओ एवं उनकी शोभन स्तुति करो. वे हमको कल्याणकारी धन दें एवं हमारे इस यज्ञ को देवों के समीप ले जावें. घृत की धाराएं मधुरतापूर्वक चलती हैं. (१०) धामन्ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्य१न्तरायुषि. अपामनीके समिथे य आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऊर्मिम्.. (११) तुम्हारा तेज सारे विश्व में व्याप्त है. वह सागर में वाडवाग्नि, आकाश में सूर्य, हृदय में वैश्वानर, अन्न में आहार, जलों में विद्युत व संग्राम में वीरता के रूप में है. इस प्रकार सभी प्राणी तुम्हारे तेज के आश्रित हैं. उसकी घृतरूपी धारा का मधुर रस हम चखते हैं. (११) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१ देवता—अग्नि
पंचम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषसम्. यह्वाइव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (१) गाय के समान आने वाली उषा के पश्चात् अध्वर्यु आदि की समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित होते हैं. अग्नि की शिखाएं महान् हैं. अग्नि विस्तृत शाखाओं वाले वृक्ष के समान आकाश की ओर बढ़ते हैं. (१) अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्. समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान्देवस्तमसो निरमोचि.. (२) होता अग्नि देवसंबंधीयज्ञ के निमित्त प्रज्वलित होते हैं. वे प्रातःकाल प्रसन्न मन से ऊपर की ओर उठते हैं. प्रज्वलित अग्नि का तेजस्वी बल दिखाई देता है. इस प्रकार महान् देव तम से मुक्त होते हैं. (२) यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः. आद्दक्षिणा युज्यते वाजयन्त्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३) रस्सी के समान संसार के व्यापारों को रोकने वाले अंधकार को अग्नि जब ग्रहण करते हैं, तब वे दीप्त होकर उज्ज्वल किरणों से संसार को प्रकट करते हैं. इसके बाद अग्नि बढ़ी हुई एवं अन्न की कामना करने वाली घृत धारा से मिलते हैं एवं ऊपर उठकर लपटों से उन्हें पीते हैं. (३) अग्निमच्छा देवयतां मनांसि चक्षूंषीव सूर्ये सं चरन्ति. यदीं सुवाते उषसा विरूपे श्वेतो वाजी जायते अग्रे अह्नाम्.. (४) यजमानों का मन उसी प्रकार अग्नि के सम्मुख जाता है, जिस प्रकार प्राणियों की आंखें सूर्य की ओर जाती हैं. धरती-आकाश जब उषा के साथ अग्नि को उत्पन्न करते हैं, उस प्रातःकाल में अग्नि उत्तमवर्ण वाले घोड़ों के समान उत्पन्न होते हैं. (४) जनिष्ठ हि जेन्यो अग्रे अह्नां हितो हितेष्वरुषो वनेषु. ebook converter DEMO Watermarks*
दमेदमे सप्त रत्ना दधानोऽग्निर्होता नि षसादा यजीयान्.. (५) उत्पन्न करने योग्य अग्नि प्रातःकाल उत्पन्न होते हैं एवं दीप्तिशाली बनकर अपने मित्र वनों में स्थित होते हैं. उसके बाद अग्नि सात सुंदर ज्वालाएं धारण करते हैं एवं प्रत्येक यज्ञशाला में होता तथा यजनीय बनकर बैठते हैं. (५) अग्निहोता न्यसीदद्यजीयानुपस्थे मातुः सुरभा उ लोके. युवा कविः पुरुनिःष्ठ ऋतावा धर्ता कृष्टीनामृत मध्य इद्धः.. (६) अग्नि होता एवं यजनीय के रूप में धरती माता की गोद में बने एवं घृत आदि से सुगंधित वेदी नामक स्थान में बैठते हैं. युवा, कवि एवं अनेक स्थानों वाले अग्नि सबके धारक एवं यज्ञस्वामी बनकर यजमानों के बीच प्रज्वलित होते हैं. (६) प्र णु त्यं विप्रमध्वरेषु साधुमग्निं होतारमीळते नमोभिः. आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्यं मृजन्ति वाजिनं घृतेन.. (७) यजमान मेधावी, यज्ञों का फल देने वाले एवं होता अग्नि की स्तुति वचनों द्वारा प्रशंसा करते हैं. जो अग्नि जल द्वारा नित्य धरती-आकाश का विस्तार करते हैं, यजमान उन अन्नयुक्त-अग्नि की सदा सेवा करते हैं. (७) मार्जाल्यो मृज्यते स्वे दमूनाः कविप्रशस्तो अतिथिः शिवो नः. सहस्रशृङ्गो वृषभस्तदोजा विश्वाँ अग्ने सहसा प्रास्यन्यान.. (८) सबको पवित्र करने वाले अग्नि अपने स्थान में पूजे जाते हैं. कवियों द्वारा प्रशंसित अग्नि हमारे लिए अतिथि के समान पूज्य एवं सुखकर हैं. अग्नि का प्रसिद्ध बल अपरिमित ज्वालाओं वाला, कामवर्षी एवं अन्य सबको पराभूत करने वाला है. (८) प्र सद्यो अग्ने अत्येष्यन्यानाविर्यस्मै चारुतमो बभूथ. ईळेन्यो वपुष्यो विभावा प्रियो विशामतिथिर्मानुषीणाम्.. (९) हे अग्नि! तुम यज्ञ को प्राप्त करके अपने अन्य तेजों को पराजित करते हुए उत्पन्न होते हो. तुम स्तुतियोग्य, दीप्तिकारक, उज्ज्वल, प्राणियों के प्रिय एवं मानवों के अतिथि हो. (९) तुभ्यं भरन्ति क्षितयो यविष्ठ बलिमग्ने अन्तित ओत दूरात्. आ भन्दिष्ठस्य सुमतिं चिकिद्धि बृहत्ते अग्ने महि शर्म भद्रम्.. (१०) हे अतिशय युवा अग्नि! मानव-समूह पास एवं दूर से तुम्हें बलि देते हैं. तुम अतिशय स्तुतिकर्त्ता की स्तुति स्वीकार करते हो. हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख महान् एवं कल्याणकारी है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
आद्य रथं भानुमो भानुमन्तमग्ने तिष्ठ यजतेभिः समन्तम्. विद्वान्पथीनामुरुवं १न्तरिक्षमेह देवान्हविर्द्याय वक्षि.. (११) हे तेजस्वी अग्नि! तुम आज देवों के साथ दीप्तिशाली एवं सर्वांग सुंदर रथ पर चढ़ो. मार्गों को जानने वाले तुम विशाल आकाश में होकर देवों को हव्य भक्षण के लिए यहां लाते हो. (११) अवोचाम कवये मेध्याय वचो वन्दारु वृषभाय वृष्णे. गविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवीव रुक्ममुरुव्यञ्चमश्रेत्.. (१२) हम मेधावी, पवित्र, कामवर्षी व युवा अग्नि के निमित्त वंदनापूर्ण स्तोत्र बोलते हैं. गविष्ठिर ऋषि आकाश में दीप्त एवं विस्तृत गति वाले आदित्य के समान अग्नि के प्रति नमस्कारपूर्ण स्तुति बोलते हैं. (१२) सूक्त—२ देवता—अग्नि कुमारं माता युवतिः समुब्धं गुहा बिभर्ति न ददाति पित्रे. अनीकमस्य न मिनज्जनासः पुरः पश्यन्ति निहितमरतौ.. (१) युवती माता ने कुमार को रास्ते में चलते समय घायल हो जाने पर गुफा में रखा, उसके पिता को नहीं दिया, लोग उसके हिंसित रूप को नहीं देखते हैं, किंतु असुंदर स्थान में रखा हुआ देखते हैं. (१) कमेतं त्वं युवते कुमारं पेषी बिभर्षि महिषी जजान. पूर्वीर्हि गर्भः शरदो ववर्धापश्यं जातं यदसूत माता.. (२) हे युवती! तुम हिंसा करने वाली होकर भी कुमार को क्यों धारण करती हो? पूजनीया अरणि ने अग्निरूपी कुमार को जन्म दिया है. अरणि में गर्भरूप अग्नि कई वर्ष तक बढ़ते रहे. माता ने जिस पुत्र को जन्म दिया, उसे हमने देखा. (२) हिरण्यदन्तं शुचिवर्णमारात्क्षेत्रादपश्यमायुधा मिमानम्. ददानो अस्मा अमृतं विप्रृक्वत्किं मामनिन्द्राः कृणवन्ननुक्थाः.. (३) हमने सुनहरी ज्वालारूपी दांतों वाले, उज्ज्वल-वर्ण एवं आयुधों के समान ज्वालाएं बनाने वाले अग्नि को देखा. हमने अग्नि की अविनाशी एवं सर्वव्यापिनी स्तुति की है. इंद्र के विरोधी एवं स्तुति न करने वाले हमारा क्या कर सकते हैं? (३) क्षेत्रादपश्यं सनुतश्चरन्तं सुमद्यूथं न पुरु शोभमानम्. न ता अगृभ्रन्नजनिष्ट हि षः पलिक्रीरिद्युवतयो भवन्ति.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हमने क्षेत्र में गोसमूह के समान चुपचाप घूमते हुए एवं स्वयं अधिक रूप से सुशोभित अग्नि को देखा है. लोग पिशाची के आक्रमण के समय वाली अग्नि की पीली ज्वालाओं को स्वीकार नहीं करते, अग्नि पुनः उत्पन्न हुए एवं उनकी वृद्धा ज्वालाएं युवा बन गईं. (४) के मे मर्दकं वि यवन्त गोभिर्न येषां गोपा अरणश्चिदास. य ईं जगृभुरव ते सृजन्त्वाजाति पश्च उप नश्चिकित्त्वान्.. (५) हमारे राष्ट्र को गायों से पृथक् किसने किया था? क्या उन गायों के साथ रक्षक नहीं था? हमारे राष्ट्र पर अधिकार करने वाले लोग नष्ट हों. हमारी अभिलाषा को जानने वाले अग्नि हमारे पशुओं को निकट लावें. (५) वसां राजानं वसतिं जनानामरातयो नि दधुर्मर्त्येषु. ब्रह्माण्यत्रे रव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु.. (६) प्राणियों के राजा एवं मानवों के निवासस्वरूप अग्नि को शत्रुओं ने प्रजाओं में छिपाकर रखा है. अत्रिगोत्र वाले वृक्ष के स्तोत्र अग्नि को उजागर करें एवं हमारे निंदक निंदा के पात्र बनें. (६) शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्राद्यूपादमुञ्चो अशमिष्ट हि षः. एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषद्य.. (७) हे अग्नि! तुमने भली प्रकार बंधे हुए शुनःशेप ऋषि को हजारों रूप वाले यूप से छुड़ाया था, क्योंकि उसने तुम्हारी स्तुति की थी. हे होता एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि! इस वेदी पर बैठो एवं हमें सभी बंधनों से मुक्त करो. (७) हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच. इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्.. (८) हे अग्नि! तुम क्रुद्ध होने पर हमारे पास से चले जाते हो. देवों का व्रत पालन करने वाले इंद्र ने हमसे यह कहा था. विद्वान् इंद्र ने तुम्हें देखा था. हे अग्नि! उनके अनुशासन में रहकर हम तुम्हारे समीप आवेंगे. (८) वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा. प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे.. (९) अग्नि महान् तेज द्वारा विशेष प्रकार से चमकते हैं. एवं अपनी महिमा द्वारा सभी पदार्थों को प्रकट करते हैं. वे प्रज्वलित होकर आसुरी दुःखजनक माया को नष्ट करते हैं एवं राक्षसों को नष्ट करने हेतु ज्वलारूपी सींगों को पैना बनाते हैं. (९) उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ. ebook converter DEMO Watermarks*
मदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः.. (१०) शब्द करने वाली अग्नि की ज्वालाएं तीखे आयुधों के समान राक्षसों को नष्ट करने के लिए स्वर्ग में उत्पन्न होती हैं. हर्षित होने पर अग्नि का प्रकाश राक्षसों को पीड़ा देता है. बाधा पहुंचाने वाली असुर-सेना अग्नि को नहीं रोक पाती. (१०) एतं ते स्तोमं तुविजात विप्रो रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्. यदीदग्ने प्रति त्वं देव हर्याः स्वर्वतीरप एना जयेम.. (११) हे अनेकरूप-धारक अग्नि! धीर एवं शोभन कर्म वाले लोग जिस प्रकार रथ बनाते हैं, उसी प्रकार हम स्तोताओं ने तुम्हारे लिए स्तुतियां बनाई हैं. हे अग्नि! यदि तुम इसे स्वीकार कर लो तो हम विस्तृत जय प्राप्त करेंगे. (११) तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्वर्यः समजाति वेदः. इतीममग्निममृता अवोचन्बर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्मते मनवे शर्म यंसत्.. (१२) अनेक ज्वालाओं वाले, कामवर्षी एवं बढ़ते हुए अग्नि अबाध रूप से शत्रु के धन पर अधिकार करते हैं. यह बात देवों ने अग्नि से कही थी. वे यज्ञ करने वाले एवं हवि देने वाले लोगों को सुख दें. (१२) सूक्त—३ देवता—अग्नि त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः. त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे मर्त्याय.. (१) हे अग्नि! तुम उत्पन्न होते ही वरुण, (अंधकार निवारक एवं प्रज्वलित) होकर मित्र (हितकारी) बन जाते हो. सब देवगण तुम्हारे पीछे चलते हैं. हे बल के पुत्र! हव्य देने वाले यजमान के इंद्र तुम्हीं हो. (१) त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यं बिभर्षि. अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्दम्पती समनसा कृणोषि.. (२) हे अग्नि! तुम कन्याओं के लिए अर्यमा (नियमन करने वाले) बनते हो. हे स्वधावान् अग्नि! तुम ही गोपनीय नाम 'वैश्वानर' धारण करते हो. जब तुम पति-पत्नी को एक मन वाला बना देते हो, तब वे तुम्हें मित्र मानकर गाय के दूध-घी से सींचते हैं. (२) तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम्. पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम्.. (३) हे अग्नि! तुम्हारे बैठने के लिए मरुद्गण अंतरिक्ष को साफ करते हैं. हे इंद्र! तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*
निमित्त विष्णु का व्यापक पद निश्चित है, जो विद्युत्संबंधी, चित्रविचित्र, मनोहर एवं अगम्य है, उसी पद पर रहकर तुम गोपनीय नामक उदक धारण करते हो. (३) तव श्रिया सुदृशो देव देवाः पुरू दधाना अमृतं सपन्त. होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्दशस्यन्त उशिजः शंसमायोः.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी समृद्धि के द्वारा ही इंद्र आदि देव दर्शनीय बनते हैं एवं प्रीति धारण करते हुए अमृत प्राप्त करते हैं. ऋत्विज् फल चाहने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त हव्य देते हुए होतारूप अग्नि की सेवा करते हैं. (४) न त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्न काव्यैः परो अस्ति स्वधावः. विशश्च यस्या अतिथिर्भवासि स यज्ञेन वनवद्देव मर्तान्.. (५) हे अग्नि! तुम्हारे अतिरिक्त कोई होता, यज्ञ करने वाला एवं प्राचीन नहीं है. हे अन्न के स्वामी अग्नि! भविष्य में भी कोई तुम्हारे समान नहीं होगा. तुम जिस ऋत्विज् के अतिथि बनते हो. वह यज्ञ करके शत्रुओं को नष्ट कर देता है. (५) वयमग्ने वनुयाम त्वोता वसूयवो हविषा बुध्यमानाः. वयं समर्यै विदथेष्वह्वां वयं राया सहसस्पुत्र मर्तान्.. (६) हे अग्नि! हम तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर शत्रुओं को पीड़ित करेंगे. धन की कामना करने वाले हम तुम्हें हव्य द्वारा प्रज्वलित करते हैं. हम यज्ञों में यश एवं युद्धों में विजय प्राप्त करें. हे बलपुत्र अग्नि! हम धन के साथ पुत्र-पौत्र को प्राप्त करें. (६) यो न आगो अभ्येनो भरात्यधीदघमघशंसे दधात. जही चिकित्वो अभिशस्तिमेतामग्ने यो नो मर्चयति द्वयेन.. (७) जो व्यक्ति हमारे प्रति पाप या अपराध करता है, अग्नि उस पापी व्यक्ति के प्रति बुरा व्यवहार करें. हे जानकार अग्नि! जो पाप या अपराध द्वारा हमारे काम में बाधा डालता है, उसी पापी को नष्ट करो. (७) त्वामस्या व्युषि देव पूर्वे दूतं कृण्वाना अयजन्त हव्यैः. संस्थे यदग्न ईयसे रयीणां देवो मर्तैर्वसुभिरिध्यमानः.. (८) हे दीप्तियुक्त अग्नि! प्राचीन यजमान तुम्हें देवों का दूत बनाते हुए उषाकाल में यज्ञ करते थे. हे अग्नि! हव्य एकत्र हो जाने के बाद तुम तेजस्वी बनते हो एवं निवास देने वाले मानवों द्वारा प्रज्वलित किए जाते हो. (८) अव स्मृधि पितरं योधि विद्वान्पुत्रो यस्ते सहसः सून ऊहे. कदा चिकित्वो अभि चक्षसे नोऽग्ने कदाँ ऋतचिद्यातयासे.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे बलपुत्र अग्नि! जो यजमान तुम्हें पिता जानता हुआ पुत्र के समान तुम्हारे हव्य को धारण करता है, उसे तुम पाप से अलग कर दो. हे जानकार अग्नि! तुम हमें कब देखोगे? हे यज्ञ की प्रेरणा देने वाले अग्नि! तुम हमें अच्छे रास्ते पर जाने की प्रेरणा कब दोगे? (९) भूरि नाम वन्दमानो दधाति पिता वसो यदि तज्जोषयासे. कुविद्देवस्य सहसा चकान: सुम्नमग्निर्वानते वावृधान:.. (१०) हे निवासदाता एवं पालनकर्त्ता अग्नि! तुम हमें कब देखोगे? तुम उस हवि को स्वीकार करते हो जो तुम्हारे नाम की बार-बार वंदना करके दी जाती है. यजमान द्वारा बहुत हवि पाने के इच्छुक एवं बल से युक्त अग्नि वृद्धि पाकर सुख देते हैं. (१०) त्वमङ्ग जरितारं यविष्ठ विश्वान्यग्ने दुरिताति पर्षि. स्तेना अदृश्रन्निपवो जनासोऽज्ञातकेता वृजिना अभूवन्.. (११) हे स्वामी एवं अतिशय युवा अग्नि! तुम स्तुतिकर्त्ता पर अनुग्रह करके उसे सभी पापों से छुड़ा देते हो. उसे चोर दिखाई देने लगते हैं एवं अनजाने चिह्नों वाले शत्रु लोग उससे दूर हो जाते हैं. (११) इमे यामासस्त्वद्रिग्भूवन्वसवे वा तदिदागो अवाचि. नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधान: परा दात्.. (१२) वे स्तुतिसमूह तुम्हारे सामने जाते हैं. निवासदाता अग्नि के सामने अपराध को स्वीकार करते हैं. अग्नि हमारी स्तुति से बढ़ते हुए हमें निंदक अथवा हिंसक के हाथ में न सौंपे. (१२) सूक्त—४ देवता—अग्नि त्वामग्ने वसुपतिं वसूनामभि प्र मन्दे अध्वरेषु राजन्. त्वया वाजं वाजयन्तो जयेमाभि ष्याम पृत्सुतीर्मर्त्यानाम्.. (१) हे संपत्तियों के स्वामी अग्नि! हम तुम्हें लक्ष्य करके यज्ञों में स्तुति करते हैं. हे तेजस्वी अग्नि! हम अन्न के अभिलाषी तुम्हारी कृपा से अन्न प्राप्त करें एवं मानवों की सेना को जीतें. (१) हव्यवाळग्निरजर: पिता नो विभुर्विभावा सुदृशीको अस्मे. सृगार्हपत्या: समिषो दिदीह्यस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि.. (२) हव्य वहन करने वाले अग्नि जरारहित होकर हमारे पालक बनें एवं हमारे प्रति व्यापक, तेजस्वी एवं दर्शनीय हों. हे अग्नि! शोभन गार्हपत्य से युक्त अन्नों को तुम भली प्रकार प्रदान करो तथा हमें प्रचुर मात्रा में अन्न दो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
विशां कविं विशपतिं मानुषीणां शुचिं पावकं घृतपृष्ठमग्निम्. नि होतारं विश्वविदं दधिध्वे स देवेषु वनते वार्याणि.. (३) हे ऋत्विजो! तुम मानवी प्रजाओं के स्वामी, मेधावी, पवित्र, दूसरों को पवित्र करने वाले, प्रदीप्त शरीर, होता एवं सर्वज्ञ अग्नि को धारण करो. वे देवों के संगृहीत धन को हम लोगों में बांटते हैं. (३) जुषस्वाग्न इळया सजोषा यतमानो रश्मिभिः सूर्यस्य. जुषस्व नः समिधं जातवेद आ च देवान्हविर्द्याय वक्षि.. (४) हे अग्नि! तुम धरती के साथ प्रेमयुक्त एवं सूर्यकिरणों के साथ गतियुक्त होकर हमारी स्तुतियां स्वीकार करो. हे जातवेद! हमारे द्वारा दी गई समिधाओं को स्वीकार करो. तुम हव्य- भोजन के निमित्त देवों को बुलाओ एवं हव्यवहन करो. (४) जुष्टो दमूना अतिथिर्र्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्. विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (५) हे अग्नि! तुम महान्, शांतचित्त एवं अतिथि के समान पूज्य बनकर हमारे इस यज्ञ में आओ. हे जानकार अग्नि! तुम सभी शत्रुओं को नष्ट करो एवं शत्रुता करने वालों का धन छीन लो. (५) वधेन दस्युं प्र हि चातयस्व वयः कृण्वानस्तन्वे३स्वायै. पिपर्षि यत्सहसस्पुत्र देवान्त्सो अग्ने पाहि नृतम वाजे अस्मान्.. (६) हे अग्नि! तुम यजमान रूपी पुत्रों को अन्न देते हो एवं शत्रुओं का आयुधों द्वारा विनाश करते हो. हे नेताओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम संग्राम में हमारी रक्षा करो. (६) वयं ते अग्ने उक्थैर्विधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे. अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि.. (७) हे अग्नि! हम लोग स्तोत्र-समूहों एवं हव्य अन्नों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. हे पवित्रकर्त्ता तथा कल्याणकारी प्रकाशयुक्त अग्नि! हमें सबके द्वारा चाहा गया धन दो एवं सभी संपत्तियां हमें प्रदान करो. (७) अस्माकमग्ने अध्वरं जुषस्व सहसः सूनो त्रिषधस्थ हव्यम्. वयं देवेषु सुकृतः स्याम शर्मणा नस्त्रिवरूथेन पाहि.. (८) हे अग्नि! हम लोगों के यज्ञ को स्वीकार करो. हे बल के पुत्र एवं तीन स्थानों में रहने वाले अग्नि! तुम हव्य को स्वीकार करो. हम देवों के मध्य रहकर शोभन कर्म करने वाले बनें. तुम तीन प्रकार के उत्तम सुखों द्वारा हमारी रक्षा करो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुं न नावा दुरिताति पर्षि. अग्ने अत्रिवन्नमसा गृणानोऽस्माकं बोधयविता तनूनाम्.. (९) हे जातवेद अग्नि! जिस प्रकार मल्लाह नाव की सहायता से यात्रियों को नदी के पार ले जाता है, उसी प्रकार तुम हमें समस्त पापों के पार पहुंचाओ. हे अग्नि! अत्रि के समान हमारी स्तुतियों को भी स्वीकार करके तुम हमारे शरीर रक्षकरूप में प्रसिद्ध बनो. (९) यस्त्वा हृदा कीरिणा मन्यमानोऽमर्त्यं मर्त्यो जोहवीमि. जातवेदो यशो अस्मासु धेहि प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम्.. (१०) हे अग्नि! हम मरणशील लोग स्तुतिपूर्ण मन से तुम मरणरहित की स्तुति करते हुए तुम्हें बार-बार बुलाते हैं. हे जातवेद! हमें संतान दो, जिसके अविच्छेद के कारण हम मरणरहित बन सकें. (१०) यस्मै त्वं सुकृते जातवेद उ लोकमग्ने कृणवः स्योनम्. अश्विनं स पुत्रिणं वीरवन्तं गोमन्तं रयिं नशते स्वस्ति.. (११) हे जातवेद अग्नि! तुम जिस उत्तम कर्मशील यजमान के प्रति सुखकारी अनुग्रह करते हो, वह अश्व, पुत्र, वीर्य एवं गायों से युक्त होकर नाशहीन धन पाता है. (११) सूक्त—५ देवता—आप्री सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन. अग्नये जातवेदसे.. (१) हे ऋत्विजो! तुम जातवेद, भली प्रकार प्रज्वलित एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि में पर्याप्त घृत द्वारा हवन करो. (१) नराशंसः सुषूदतीमं यज्ञमदाभ्यः. कविर्हि मधुहस्त्यः.. (२) हिंसा के अयोग्य, मेधावी एवं शोभन हाथों वाले नराशंस नामक अग्नि इस यज्ञ को भली प्रकार प्रेरित करें. (२) ईळितो अग्न आ वहेन्द्रं चित्रमिह प्रियम्. सुखै रथेभिरूतये.. (३) हे स्तुति-विषय अग्नि! हमारी रक्षा के लिए तुम सुखदाता रथ द्वारा सुंदर एवं प्रिय इंद्र को यहां लाओ. (३) ऊर्णम्रदा वि प्रथस्वाभ्य१र्का अनूषत. भवा नः शुभ्र सातये.. (४) हे बर्हि! तुम ऊनी कंबल के समान सुखपूर्वक फैलो. स्तोता तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे ebook converter DEMO Watermarks*
दीप्त! हमें धन दो. (४) देवीर्द्वारो वि श्रयध्वं सुप्रायणा न ऊतये. प्रप्र यज्ञं पृणीतन.. (५) हे द्वार की देवियो! तुम सुखपूर्वक गमन का साधन हो. तुम अलग-अलग होकर हमारी रक्षा के निमित्त यज्ञ को पूर्ण करो. (५) सुप्रतीके वयोवृधा यह्वी ऋतस्य मातरा. दोषामुषासमीमहे.. (६) शोभन रूप वाली, अन्न बढ़ाने वाली, महती एवं यज्ञ का निर्माण करने वाली रात्रि तथा उषा देवियों की हम स्तुति करते हैं. (६) वातस्य पत्मन्नीळिता दैव्या होतारा मनुषः. इमं नो यज्ञमा गतम्.. (७) हे अग्नि एवं आदित्य से उत्पन्न दो होताओ! तुम दोनों स्तुति सुनकर वायु के समान तेज चलते हो. तुम हमारे इस यज्ञ में आओ. (७) इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः. बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः.. (८) इडा, सरस्वती एवं मही तीनों देवियां सुखकारक हैं. वे हिंसारहित होकर इस यज्ञ में बैठें. (८) शिवस्त्वष्टरिहा गहि विभुः पोष उत त्मना. यज्ञेयज्ञे न उदव.. (९) हे त्वष्टा! तुम सुखकर होकर इस यज्ञ में आओ. तुम पोषकरूप में व्याप्त हो. तुम प्रत्येक यज्ञ में हमारी भली प्रकार रक्षा करो. (९) यत्र वेत्थ वनस्पते देवानां गुह्या नामानि. तत्र हव्यानि गमय.. (१०) हे वनस्पति! तुम जिस स्थान में देवों के गोपनीय नामों को जानते हो, उसी स्थान में हव्यों को पहुंचाओ. (१०) स्वाहाग्नये वरुणाय स्वाहेन्द्राय मरुद्भ्यः. स्वाहा देवेभ्यो हविः.. (११) यह हवि अग्नि और वरुण, इंद्र और मरुद्गण तथा समस्त देवों को स्वाहा के रूप में दिया गया है. (११) सूक्त—६ देवता—अग्नि अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः. अस्तमर्वन्त आशवोऽस्तं नित्यासो वाजिन इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हम उस अग्नि की स्तुति करते हैं, जो निवासदाता है, जो घर के समान सबका आश्रय है, जिसे गाएं, शीघ्र चलने वाले घोड़े एवं नित्य हव्य प्रदान करने वाले यजमान प्रसन्न करते हैं. हे अग्नि! तुम स्तोताओं के लिए अन्न दो. (१) सो अग्निर्ग्रो वसुर्गृणे सं यमायन्ति धेनवः. समर्वन्तो रघुद्रुवः सं सुजातासः सूरय इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (२) वह ही अग्नि है, जिसकी स्तुति निवासदाता के रूप में की जाती है. गाएं, तेज चलने वाले घोड़े एवं उत्तम कुल में उत्पन्न मेधावी जन जिसके समीप जाते हैं. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (२) अग्निर्हि वाजिनं विशे ददाति विश्वचर्षणिः. अग्नी राये स्वाभुवं स प्रीतो याति वार्यमिषं स्तोतृभ्य आ भर.. (३) सबके यज्ञकर्मों को देखने वाले अग्नि यजमानों को अन्नसहित पुत्र देते हैं. अग्नि प्रसन्न होकर ऐसा धन देने के लिए जाते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त एवं सबका प्रिय है. हे अग्नि! तुम स्तुतिकर्त्ताओं के लिए अन्न लाओ. (३) आ ते अग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्. यद्ध स्या ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवीषं स्तोतृभ्य आ भर.. (४) हे दीप्तिशाली एवं जलरहित अग्नि! हम तुम्हें सभी प्रकार से प्रज्वलित करते हैं. तुम्हारी स्तुति के योग्य दीप्ति स्वर्ग में प्रकाशित होती है. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (४) आ ते अग्न ऋचाः हविः शुक्रस्य शोचिषस्पते. सुश्चन्द्र दस्म विश्पते हव्यवाट् तुभ्यं हूयत इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (५) हे दीप्ति के स्वामी, आह्लाद देने वाले, शत्रुनाशक, प्रजाओं के पालक एवं हव्यवहन करने वाले अग्नि! तुम्हारे उद्देश्य से मंत्रों के साथ हव्य का होम किया जाता है. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (५) प्रो त्ये अग्नयोऽग्निषु विश्वं पुष्यन्ति वार्यम्. ते हिन्विरे त इन्विरे त इषण्यन्त्यानुषगिषं स्तोतृभ्य आ भर.. (६) ये लौकिक अग्नि गार्हपत्य आदि अग्नियों में समस्त आवश्यक संपत्तियों को पोषित करते हैं. ये अग्नि प्रसन्न करते हैं, चारों ओर व्याप्त होते हैं एवं लगातार अन्न की इच्छा करते हैं. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (६) तव त्ये अग्ने अर्चयो महि व्राधन्त वाजिनः. ebook converter DEMO Watermarks*
ये पत्वभिः शफानां व्रजा भुरन्त गोनामिषं स्तोतृभ्य आ भर.. (७) हे अग्नि! तुम्हारी ये ज्वालाएं अत्यधिक रूप में अन्न स्वामिनी होकर बढ़ें. ये ज्वालाएं पतन के द्वारा खुरों वाली गायों की इच्छा करें. हे अग्नि! तुम स्तुतिकर्त्ताओं के लिए अन्न लाओ. (७) नवा नो अग्न आ भर स्तोतृभ्यः सुक्षितीरिषः. ते स्याम य आनृचुस्त्वादूतासो दमेदमेषं स्तोतृभ्य आ भर.. (८) हे अग्नि! तुम हम स्तोताओं को नए घरों के साथ ही अन्न भी दो. हम लोग प्रत्येक यज्ञशाला में तुम्हारी पूजा करते हुए तुम्हें दूत के रूप में पा सकें. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (८) उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीष आसनि. उतो न उत्पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (९) हे प्रसन्नताकारक अग्नि! तुम अपने मुख में घी से भरे हुए दो चमस धारण करते हो. हे बल के पुत्र अग्नि! तुम यज्ञों में हम लोगों को सफल बनाओ. हे अग्नि! तुम स्तुतिकर्त्ताओं के लिए अन्न लाओ. (९) एवाँ अग्निमजुर्य्यमुर्गीर्भिर्यज्ञेभिरानुषक्. दधदस्मे सुवीर्यमुत त्यदाश्वश्व्यमिषं स्तोतृभ्य आ भर.. (१०) इस प्रकार भक्तजन स्तुतियां एवं यज्ञ लेकर अग्नि के पास जाते हैं तथा उन्हें स्थापित करते हैं. अग्नि हमें उत्तम पुत्र-पौत्रादि सहित तेज चलने वाले घोड़े दें. हे अग्नि! तुम स्तुति करने वालों के लिए अन्न लाओ. (१०) सूक्त—७ देवता—अग्नि सखायः सं वः सम्यञ्चमिषं स्तोमं चाग्नये. वर्षिष्ठाय क्षितीनामूर्जो नप्त्रे सहस्वते.. (१) हे मित्ररूप ऋत्विजो! तुम यजमानों के कल्याण के निमित्त अत्यंत वृद्धिप्राप्त, बल के पुत्र एवं शक्तिशाली अग्नि के लिए अन्न एवं स्तुति प्रदान करो. (१) कुत्रा चिद्यस्य समृत्तौ रण्वा नरो नृषदने. अर्हन्तश्चिद्यमिन्धते सञ्जनयन्ति जन्तवः.. (२) वे अग्नि कहां हैं, जिन्हें यज्ञशाला में पाकर ऋत्विज् प्रसन्न हो जाते हैं, जिन्हें पूजा करके प्रज्वलित किया जाता है एवं जिनके हेतु जंतुओं को उत्पन्न किया जाता है? (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सं यदिषो वनामहे सं हव्या मानुषाणाम्. उत द्युम्नस्य शवस ऋतस्य रश्मिमा ददे.. (३) जब हम अग्नि को अन्न देते हैं एवं वे हमारा हव्य स्वीकार करते हैं, तब वे तेजस्वी अन्न की शक्ति द्वारा जल ग्रहण करने वाली किरणों को अपनाते हैं. (३) स स्मा कृणोति केतुम नक्तं चिद्दूर आसते. पावको यद्वनस्पतीन्प्र स्मा मिनात्यजरः.. (४) जब पवित्र करने वाले एवं जरारहित अग्नि वनस्पतियों को जलाते हैं, तब वे रात में दूर तक के लोगों को ज्ञान करा देते हैं. (४) अव स्म यस्य वेषणे स्वेदं पथिषु जुह्वति. अभीमह स्वजेन्यं भूमा पृष्ठेव रुरुहुः.. (५) अग्नि की सेवा के समय गिरी हुई घी की बूंदों को अध्वर्यु लोग ज्वालाओं में डाल देते हैं. पुत्र जिस प्रकार पिता की गोद में चढ़ जाता है, उसी प्रकार घी की धाराएं अग्नि पर चढ़ती हैं. (५) यं मर्त्यः पुरुस्पृहं विदद्विश्वस्य धायसे. प्र स्वादनं पितूनामस्ततातिं चिदायवे.. (६) यजमान बहुत लोगों द्वारा अभिलषित, सबको धारण करने वाले, अन्नों का भली प्रकार स्वाद लेने वाले एवं यजमानों को निवास देने वाले अग्नि को जानते हैं. (६) स हि ष्मा धन्वाक्षितं दाता न दात्या पशुः. हिरिश्मश्रुः शुचिदन्नुर्भुरनिभृष्टतविषिः.. (७) अग्नि घास खाने वाले पशुओं के समान जलहीन एवं घास, लकड़ी आदि से भरे हुए स्थान को छिन्न करते हैं. अग्नि सुनहरी दाढ़ी वाले, उज्ज्वल दांतों वाले, महान्, बाधा रहित एवं शक्तिशाली हैं. (७) शुचिः ष्म यस्मा अत्रिवत्प्र स्वधितीव रीयते. सुषूरसूत माता क्राणा यदानशे भगम्.. (८) वे अग्नि प्रज्वलित होते हैं, जिनके लिए यजमान अत्रि ऋषि के समान हवि देने जाते हैं एवं जो फरसे के समान वृक्षों का नाश करते हैं. अरणिरूपी माता ने उन अग्नि को जन्म दिया था जो संसार का उपकार करते हैं एवं अन्न ग्रहण करते हैं. (८) आ यस्ते सर्पिरासुतेऽग्ने शमस्ति धायसे. ebook converter DEMO Watermarks*
ऐषु द्युम्नमुत श्रव आ चित्तं मर्त्येषु धाः.. (९) हे घृतभोजी अग्नि! हमारी स्तुतियां सबके पालक तुम्हें सुख दें. तुम स्तुतिकर्त्ताओं को धन, अन्न एवं शांति प्रदान करो. (९) इति चिन्मन्युमङ्गिरस्त्वादामता पशुं ददे. आदग्ने अपृणतोऽत्रिः सासह्वादस्यून्निषः सासह्यान्नॄन्.. (१०) हे अग्नि! इस प्रकार दूसरों द्वारा न करने योग्य स्तुतियों का उच्चारण करने वाले ऋषि तुम्हारी कृपा से पशु प्राप्त करते हैं. हव्यदान करने वाले ऋषि अत्रि तुम्हारी कृपा से दस्युओं एवं विरोधियों को बार-बार पराजित करें. (१०) सूक्त—८ देवता—अग्नि त्वामग्न ऋतायवः समीधिरे प्रतनं प्रत्नास ऊतये सहस्कृत. पुरुश्चन्द्रं यजतं विश्वधायसं दमूनसं गृहपतिं वरेण्यम्.. (१) हे बल द्वारा उत्पन्न पुरातन अग्नि! पुराने यज्ञकर्त्ता आश्रय पाने के लिए तुम्हें भली प्रकार प्रज्वलित करते हैं. तुम अतिशय आह्लादक, यज्ञ के योग्य, विविध अन्नों के स्वामी, गृहपति एवं वरण करने योग्य हो. (१) त्वामग्ने अतिथिं पूर्व्यं विशः शोचिष्केशं गृहपतिं नि षेदिरे. बृहत्केतुं पुरुरूपं धनस्पृतं सुशर्माणं स्ववसं जरद्विषम्.. (२) हे अतिथि के समान पूज्य, प्राचीन, दीप्तज्वालारूपी केशों वाले, अनेक रूपों वाले, धनदाता, सुख देने वाले, भली-भांति रक्षा करने वाले एवं पुराने वृक्षों को नष्ट करने वाले अग्नि! यजमानों ने तुम्हें गृहपति के रूप में स्थान दिया है. (२) त्वामग्ने मानुषीरीळते विशो होत्राविदं विविचिं रत्नधाततम्. गुहा सन्तं सुभग विश्वदर्शतं तुविष्वणसं सुयजं घृतश्रियम्.. (३) हे शोभन धन वाले, यज्ञ के ज्ञाता, सत्-असत् के विवेचक रत्न देने वालों में उत्तम, गुहा में स्थित, सबके दर्शनीय, अधिक शब्द करने वाले, शोभन-यज्ञकर्त्ता एवं घी का आश्रय लेने वाले अग्नि! यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) त्वामग्ने धर्णसिं विश्वधा वयं गीर्भिर्गृणन्तो नमसोप सेदिम. स नो जुषस्व समिधानो अङ्गिरो देवो मर्त्यस्य यशसा सुदीतिभिः.. (४) हे सबको धारण करने वाले अग्नि! हम अनेक प्रकार के स्तोत्रों एवं नमस्कारों द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हुए तुम्हारे समीप जाते हैं. तुम धन देकर हमें प्रसन्न करो. हे अंगिरापुत्र ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि! तुम अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के यश के द्वारा प्रसन्न बनो. (४) त्वमग्ने पुरुरूपो विशोविशे वयो दधासि प्रत्नथा पुरुष्टुत. पुरूण्यन्ना सहसा वि राजसि त्विषिः सा ते तित्त्विषाणस्य नाधृषे.. (५) हे अनेक रूपधारी अग्नि! तुम प्राचीन काल के समान सभी यजमानों को धन देते हो. हे बहुतों द्वारा स्तुत अग्नि! तुम अपनी शक्ति से ही बहुत से अन्नों के स्वामी बनते हो. तुझ दीप्तिशाली की दीप्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता. (५) त्वामग्ने समिधानं यविष्ठ्य देवा दूतं चक्रिरे हव्यवाहनम्. उरुञ्जयसं घृतयोनिमाहुतं त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्मति.. (६) हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित बनो. देवों ने तुम्हें अपना हव्य वहन करने वाला दूत बनाया था. देवों तथा मानवों ने परम गतिसंपन्न, घृत से उत्पन्न एवं भली प्रकार बुलाए गए अग्नि को दीप्तिशाली नेत्र के समान धारण किया था. (६) त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतैः सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे. स वावृधान ओषधीभिरुक्षितोऽभि ज्यांसि पार्थिवा वि तिष्ठसे.. (७) हे अग्नि! प्राचीन तथा सुख चाहने वाले यजमान तुम्हें घी के द्वारा बुलाकर उत्तम समिधाओं से प्रज्वलित करते हैं. तुम बढ़ने पर ओषधियों द्वारा सींचे जाते हो एवं पार्थिव अन्नों को प्रकट करके वर्तमान रहते हो. (७) सूक्त—९ देवता—अग्नि त्वामग्ने हविष्मन्तो देवं मर्तास ईळते. मन्ये त्वा जातवेदसं स हव्या वक्ष्यानुषक्.. (१) हे दीप्तिशाली अग्नि! मनुष्य हव्य लेकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे जातवेद! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हवन की सामग्री को सदा वहन करते हो. (१) अग्निहोता दास्वतः क्षयस्य वृक्तबर्हिषः. सं यज्ञासश्चरन्ति यं सं वाजासः श्रवस्यवः.. (२) जिन अग्नि के साथ सभी यज्ञ चलते हैं एवं यजमान को कीर्ति दिलाने वाला हव्य जिन्हें प्राप्त होता है. वह हव्य सामग्री देने वाले एवं कुश उखाड़ने वाले यजमान के यज्ञ के लिए देवों को बुलाते हैं. (२) उत स्म यं शिशुं यथा नव जनिष्टारणी. धर्तारं मानुषीणां विशामग्निं स्वध्वरम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
भोजन के पाक द्वारा मानवों का पोषण करने वाले एवं यज्ञ को सुशोभित करने वाले अग्नि को दोनों अरणियां नए बालक के समान जन्म देती हैं. (३) उत स्म दुर्गीभीयसे पुत्री न ह्रार्याणाम्. पुरू यो दग्धासि वनाग्ने पशुर्न यवसे.. (४) हे अग्नि! जिस प्रकार टेढ़ी चाल वाले सांप का बच्चा कठिनाई से पकड़ा जाता है, उसी प्रकार तुम्हें पकड़ना भी कठिन है. घास में छोड़ा हुआ पशु जैसे घास खाता है, उसी प्रकार तुम वनों को जला देते हो. (४) अध स्म यस्यार्चयः सम्यक्संयन्ति धूमिनः., यदिमह त्रितो दिव्युप ध्मातेव धमति शिशीते ध्मातरी यथा.. (५) जिस धूमयुक्त अग्नि की लपटें भली प्रकार सब ओर फैलती हैं, तीन स्थानों में रहने वाले वे अग्नि अपने आप अपनी लपटें आकाश में इस तरह बढ़ाते हैं, जैसे लोहार धौंकनी के द्वारा आग भड़काता है. अग्नि धौंकनी वाले लोहार के समान अपने को तेज करते हैं. (५) तवाहमग्न ऊतिभिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभिः. द्वेषोयुतो न दुरिता तुर्याम मर्त्यानाम्.. (६) हे मित्र अग्नि! हम तुम्हारे द्वारा की गई रक्षा एवं तुम्हारी स्तुतियों की सहायता से शत्रु मनुष्यों के पापरूपी कार्यों से पार हो जावें. (६) तं नो अग्ने अभी नरो रयिं सहस्व आ भर. स क्षेपयत्स पोषयद्भवद्वाजस्य सातय उतैधि पृत्सु नो वृधे.. (७) हे शक्तिशाली एवं हव्यवाहक अग्नि! तुम प्रसिद्ध धन हमारे समीप लाओ एवं हमारे शत्रुओं को पराजित करके हम लोगों का पोषण करो. तुम हमें अन्न दो एवं युद्ध में हमें समृद्ध बनाओ. (७) सूक्त—१० देवता—अग्नि अग्न ओजिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमध्रिगो. प्र नो राया परीणसा रत्स वाजय पन्थाम्.. (१) हे अबाध गति वाले अग्नि! तुम हमारे लिए सबसे उत्तम धन लाओ. हमें सर्वत्र व्याप्त धन से मिलाओ एवं हमारे लिए अन्न पाने का मार्ग बनाओ. (१) त्वं नो अग्ने अद्भुत क्रत्वा दक्षस्य मंहना. त्वे असुर्र्यं१ मारुहत्क्राणा मित्रो न यज्ञियः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे आश्चर्य रूप अग्नि! तुम हमारे यज्ञादि कर्मों से प्रसन्न होकर हमारे लिए धन का दान करो. तुम में शत्रुनाश का बल स्थित है. तुम सूर्य के समान हमारे यज्ञ पूर्ण करो. (२) त्वं नो अग्न एषां गयं पुष्टिं च वर्धय. ये स्तोमेभिः प्र सूरयो नरो मघान्यानशुः.. (३) हे अग्नि! विद्वान् लोगों ने तुम्हारी स्तुतियां करके उत्तम धन प्राप्त किया था. तुम हम स्तुतिकर्त्ताओं के धन एवं पुष्टि को बढ़ाओ. (३) ये अग्ने चन्द्र ते गिरः शुम्भन्त्यश्वराधसः. शुष्मेभिः शुष्मिणो नरो दिवश्चिद्देषां बृहत्सुकीर्तिर्बोधति त्मना.. (४) हे आह्लादकारक अग्नि! तुम्हारी शोभन स्तुति करने वाले लोग अश्वरूपी धन प्राप्त करते हैं एवं शक्तिशाली बनकर अपने बल से शत्रुओं को नष्ट करके कीर्तिलाभ करते हैं. वह कीर्ति स्वर्ग से भी विशाल है. गय ऋषि तुम्हें स्वयं जगाते हैं. (४) तव त्ये अग्ने अर्चयो भ्राजन्तो यन्ति धृष्णुया. परिज्मानो न विद्युतस्वानो रथो न वाजयुः.. (५) हे अग्नि! तुम्हारी अत्यंत प्रगल्भ किरणें दीप्ति वाली बनकर बिजली की तरह शब्द करते हुए रथ की तरह एवं अन्न चाहने वालों के समान सब जगह जाती हैं. (५) नू नो अग्न ऊतये सबाधसश्च रातये. अस्माकासश्च सूरयो विश्वा आशास्तरीषणि.. (६) हे अग्नि! तुम हमारी शीघ्र रक्षा करो एवं दरिद्रता मिटाने के लिए हमें धन दान करो. हमारी संतान एवं हमारे मित्र भी तुम्हारी स्तुति से अपनी अभिलाषाएं पूर्ण करें. (६) त्वं नो अग्ने अङ्गिरः स्तुतः स्तवान आ भर. होतर्विभ्वासहं रयिं स्तोतृभ्यः स्तवसे च न उतैधि पृत्सु नो वृधे.. (७) हे अंगिरावंशीय ऋषियों द्वारा स्तुत अग्नि! पुराने ऋषियों ने तुम्हारी स्तुति की थी एवं नए भी कर रहे हैं. महान् व्यक्तियों को पराजित करने वाला धन हमें दो. हे देवों के होता अग्नि! तुम अपने स्तोताओं अर्थात् हमें स्तुति करने की शक्ति दो एवं युद्धों में हमें समृद्ध बनाओ. (७) सूक्त—११ देवता—अग्नि जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे. घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्भि भाति भरतेभ्यः शुचिः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
लोगों की रक्षा करने वाले, सदा जागरणशील एवं सबके द्वारा प्रशंसनीय शक्ति वाले अग्नि ने दूसरों के नवीन कल्याण के हेतु जन्म लिया है. घृत के कारण प्रज्वलित शरीर वाले, अधिक तेज से युक्त एवं शुद्ध अग्नि ऋत्विजों के लिए दीप्तिशाली बनते हैं. (१) यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समीधिरे. इन्द्रेण देवैः सरथं स बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः.. (२) ऋत्विजों ने यज्ञ का संकेत करने वाले, यजमानों द्वारा सर्वश्रेष्ठ स्थान में स्थापित एवं इंद्र आदि के समान अग्नि को तीन स्थानों में प्रज्वलित किया था. उत्तम कर्म वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि बिछे हुए कुशों पर यज्ञ पूरा करने के लिए बैठे थे. (२) असंमृष्टो जायसे मात्रोः शुचिर्मन्द्र कविरुदतिष्ठो विवस्वतः. घृतेन त्वावर्धयन्नग्न आहुप धूमस्ते केतुरभवद्दिवि श्रितः.. (३) हे अग्नि! तुम अरणियोंरूपी माताओं से निर्बाध जन्म लेते हो. तुम पवित्र, सबके द्वारा प्रशंसित, विद्वान, यजमानों द्वारा प्रज्वलित एवं पूर्ववर्ती-ऋषियों द्वारा घी की सहायता से बढ़ाए गए हो. हे आहुतिपूर्ण अग्नि! तुम्हारा धुआं तुम्हारे झंडे के रूप में आकाश में स्थित है. (३) अग्निर्नो यज्ञमुप वेतु साधुयाग्निं नरो वि भरन्ते गृहेगृहे. अग्निर्दूतो अभवद्धव्यवाहनोऽग्निं वृणाना वृणते कविक्रतुम्.. (४) समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में आवें. लोग घर-घर में अग्नि को धारण करते हैं. हव्य वहन करने वाले अग्नि देवों के दूत हुए थे. लोग यज्ञ पूर्ण करने वाले के रूप में अग्नि का आदर करते हैं. (४) तुभ्येदमग्ने मधुमत्तमं वचस्तुभ्यं मनीषा इयमस्तु शं हृदे. त्वां गिरः सिन्धुमिवावनीर्महीरा पृणन्ति शवसा वर्धयन्ति च.. (५) हे अग्नि! तुम्हारे लिए ये मधुरतम स्तुति वाक्य हैं. ये स्तुतियां तुम्हारे हृदय में सुख उत्पन्न करें. जिस प्रकार महान् नदियां सागर को पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार ये स्तुतियां तुम्हें शक्तिशाली बनाकर बढ़ावें. (५) त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने. स जायसे मथ्यमानः सहो महत्तवामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः.. (६) हे गुफा में छिपे हुए एवं वनवृक्षों के बीच अवस्थित अग्नि! तुम्हें अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने प्राप्त किया था. हे अंगिरा ऋषियों से संबंधित अग्नि! तुम अधिक शक्ति द्वारा अरणि मंथन करने से उत्पन्न होते हो, इसलिए सब तुम्हें शक्तिपुत्र कहते हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
सूक्त—१२ देवता—अग्नि प्राग्नये बृहते यज्ञियाय ऋतस्य वृष्णे असुराय मन्म. घृतं न यज्ञ आस्ये३ सुपूतं गिरं भरे वृषभाय प्रतीचीम्.. (१) महान्, यज्ञ के योग्य, जल बरसाने वाले, शक्तिशाली एवं कामना पूर्ण करने वाले अग्नि के मुख में यज्ञ करते समय जो घृत डाला है, हमारी स्तुतियां अग्नि को उसी के समान प्रसन्न करें. (१) ऋतं चिकित्त्व ऋतमिच्चिकिद्ध्युतस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः. नाहं यातुं सहसा न द्वयेन ऋतं सपाम्यरुषस्य वृष्णः.. (२) हे अग्नि! हमारे द्वारा की गई स्तुति जानो, इन्हें स्वीकार करो तथा जल बरसाने के लिए हमारे अनुकूल बनो. हम बल द्वारा यज्ञकर्म का विध्वंस नहीं करते और न कोई वेद-विरुद्ध कार्य करते हैं. हम दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि की स्तुति करते हैं. (२) कया नो अग्न ऋतयन्नृतेन भुवो नवेदा उचथस्य नव्यः. वेदा मे देव ऋतुपा ऋतूनां नाहं पतिं सनितुरस्य रायः.. (३) हे अग्नि! तुम जल की वर्षा करते हुए किस शक्ति से हमारे यज्ञकर्म को जान लेते हो? ऋतुओं की रक्षा करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि हमें जानें. अग्नि मुझ भक्त के पशु आदि के स्वामी हैं. इस बात को क्या मैं नहीं जानता? (३) के ते अग्ने रिपवे बन्धनासः के पायवः सनिषन्त द्युमन्तः. के धासिमग्ने अनृतस्य पान्ति क आसतो वचसः सन्ति गोपाः.. (४) शत्रुओं का बंधन करने वाले, लोकरक्षक, दानशील एवं दीप्तिसंपन्न लोग कौन हैं? ये सब अग्नि के सेवक हैं. असत्य धारण करने वाले का रक्षक एवं दुर्वचनों को आश्रय देने वाला कौन है? अर्थात् अग्नि का कोई भक्त इस प्रकार का नहीं है. (४) सखायस्ते विषुणा अग्न एते शिवासः सन्तो अशिवा अभूवन्. अधूर्षत स्वयमेते वचोभिर्ऋजूयते वृजिनानि ब्रुवन्तः.. (५) हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता सब जगह फैले हुए हैं. ये पहले दुःखी थे, अब सुखी हुए हैं. हम सरल आचरण करने वालों को जो दुर्वचन कहता था, वह हमारा शत्रु स्वयं नष्ट हो गया. (५) यस्ते अग्ने नमसा यज्ञमीट ऋतं स पात्यरुषस्य वृष्णः. तस्य क्षयः पृथुरा साधुरेतु प्रसर्साणस्य नहुषस्य शेषः.. (६) हे दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाला तथा तुम्हारे निमित्त यज्ञ ebook converter DEMO Watermarks*