ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
डाला. हे अध्वर्युगण! इसी शोभन हनु वाले एवं वीर इंद्र को वह माधुर्ययुक्त सोमरस पीने को दो. (१४) पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्रं वज्रेण मन्दसानः. गन्ता यज्ञं परावतश्चिदच्छा वसुर्धीनामविता कारुधायाः.. (१५) इंद्र इस निचोड़े हुए सोमरस को पिएं एवं प्रसन्न होकर वज्र द्वारा वृत्र को मारें. सबको घर देने वाले, स्तोताओं के यज्ञकर्म के रक्षक एवं यजमानों के पालक इंद्र दूर देश से भी हमारे यज्ञ में आवें. (१५) इदं त्यत्पात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपायि. मत्सद्यथा सौमनसाय देवं व्य१स्मद्द्वेषो युयवद्वयंहः.. (१६) सोमरस इंद्र का प्रिय, अनुकूल एवं पीने योग्य है. इस अमृतरूप सोमरस को पीकर इंद्र प्रसन्न हों तथा हमारे ऊपर कृपा करके हमारे शत्रुओं एवं पापों को दूर भगावें. (१६) एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्. अभिषेणाँ अभ्या३ देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च.. (१७) हे धनस्वामी इंद्र! इस सोमरस को पीकर तुम प्रसन्न बनो एवं हमारे निकटवर्ती एवं दूरवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो. हे इंद्र! जो शत्रु सैनिक हमारे सामने आकर बार-बार हथियार डाल देते हैं, उन्हें हमसे दूर करके नष्ट करो. (१७) आसु ष्मा णो मघवन्निन्द्र पृत्स्व१ स्मभ्यं महि वरिवः सुगं कः. अपां तोकस्य तनयस्य जेष इन्द्र सूरीन्कृणुहि स्मा नो अर्धम्.. (१८) हे धनस्वामी इंद्र! इन सभी संग्रामों में हमें महान् धन की प्राप्ति सरल बनाओ. तुम हम स्तोताओं को जल, पुत्र, पौत्र की जय के निमित्त समृद्ध बनाओ एवं शत्रुनाश की शक्ति दो. (१८) आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः. अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु.. (१९) हे इंद्र! तुम्हारे अभिलाषापूरक अपने आप रथ में जुड़ने वाले, अभिलाषापूरक रथ को ढोने वाले, ढीली लगामों वाले, नित्यगतिशील, हमारे सामने आने वाले, सदायूवा, वज्र ढोने वाले एवं भली प्रकार रथ में जुड़े हुए घोड़े नशीले सोम को पीने के लिए तुम्हें यहां लावें. (१९) आ ते वृषन्वृषणो द्रोणमस्थुर्धृतपृषो नोर्मयो मदन्तः. इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम्.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे जल बरसाने वाले युवा घोड़े पानी फैलाने वाली सागर तरंगों के समान प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हैं. हे कामवर्षी एवं युवा इंद्र! अध्वर्युगण तुम्हें पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया सोमरस भेंट करते हैं. (२०) वृषासि दिवो वृषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्. वृष्णे ते इन्दुर्वृषभ पीपाय स्वादू रसो मधुपेयो वराय.. (२१) हे इंद्र! तुम हव्यों द्वारा स्वर्ग को तृप्त करने वाले, धरती के अभिलाषापूरक, वर्षा द्वारा नदियों को भरने वाले एवं स्थावरजंगम सकल विश्व के कामपूरक हो. हे अभिलाषापूरक एवं वर्षाकारक इंद्र! तुम्हारे लिए ही मधुर सोमरस तैयार किया गया है. (२१) अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तभायत्. अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादशिवस्य माया:.. (२२) दीप्तिशाली सोम ने अपने मित्र इंद्र के साथ जन्म लेकर पणि को बलपूर्वक रोक लिया था. इसी सोमरस ने गोरूप धन को पर्वतों में छिपाकर रखने वाले अकल्याणकारी पणियों की माया एवं आयुध बेकार किए थे. (२२) अयमकृणोदुषसः सुपत्नीरयं सूर्ये अदधाज्ज्योतिरन्तः. अयं त्रिधातु दिवि रोचनेषु त्रितेषु विन्ददमृतं निगूळ्हम्.. (२३) इसी सोमरस ने उषाओं के शोभनपालक सूर्य को सुशोभित किया था एवं सूर्य मंडल के बीच में ज्योति की स्थापना की थी. तीनों सवनों में तीन प्रकार से वर्तमान इसी सोमरस ने तेजस्वी तीनों लोकों के बीच छिपे हुए अमृत को पाया था. (२३) अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्. अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रामुत्सम्.. (२४) इसी सोमरस ने धरती-आकाश को अपने स्थान पर स्थित किया था. इसी ने सात किरणों वाला रथ तैयार किया था. इस सोम ने ही गायों के मध्य अपने आप निर्मित होने वाले एवं अनेक धाराओं वाले दूध को धारण किया था. (२४) सूक्त—४५ देवता—इंद्र व बृहस्पति य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्. इन्द्रः स नो युवा सखा.. (१) जो इंद्र! अपनी उत्तम नीति द्वारा तुर्वश एवं यदु नामक राजाओं को दूर से लाए, वे युवा इंद्र हमारे मित्र हों. (१) अविप्रे चिद्ध्यो दधदनाशुना चिदर्वता. इन्द्रो जेता हितं धनम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र स्तुति न करने वाले को भी अन्न देते हैं एवं धीमी चाल वाले घोड़े पर चढ़कर शत्रुओं के छिपे धन को जीतते हैं. (२) महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः. नास्य क्षीयन्त ऊतयः.. (३) इंद्र की उत्तम नीतियां महान् एवं स्तुतियां अनेक हैं. इंद्र के रक्षासाधन कभी समाप्त नहीं होते. (३) सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत. स हि नः प्रमतिर्मही.. (४) हे मित्ररूप स्तोताओ! मंत्रों द्वारा बुलाने योग्य इंद्र की पूजा एवं स्तुति करो. वे हमें उत्तम बुद्धि देते हैं. (४) त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि. उतेदृशे यथा वयम्.. (५) हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम एक या दो स्तोताओं के रक्षक हो. हमारे जैसे लोगों की तुम्हीं रक्षा करते हो. (५) नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः. नृभिः सुवीर उच्यसे.. (६) हे इंद्र! द्वेष करने वालों को हमसे दूर करो एवं हम स्तोताओं को समृद्ध बनाओ. मनुष्य शोभनपुत्र देने वाले इंद्र की स्तुति करते हैं. (६) ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं गीर्भिः सखायमृग्मियम्. गां न दोहसे हुवे.. (७) मैं गाय के समान अभिलाषारूप दूध दुहने के लिए इंद्र को स्तुतियों द्वारा बुलाता हूं. इंद्र महान्, स्तुतियां स्वीकार करने वाले एवं मित्र हैं. (७) यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता. वीरस्य पृतनाषहः.. (८) ऋषि लोगों ने कहा था कि शत्रुसेना को हराने वाले वीर इंद्र के दोनों हाथों में सभी प्रकार की संपत्तियां हैं. (८) वि दृळ्हानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते. वृह माया अनानत.. (९) हे वज्रधारी एवं यज्ञ के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुओं के दृढ़ नगरों को भग्न करो. हे न झुकने वाले इंद्र! तुम शत्रुओं की माया को समाप्त करो. (९) तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते. अहुमहि श्रवस्यवः.. (१०) हे सत्यस्वभाव, सोम पीनेवाले एवं धनों के स्वामी इंद्र! हम अन्न की अभिलाषा से तुम्हें बुलाते हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने. हव्यः स श्रुधी हवम्.. (११) हे इंद्र! तुम प्राचीन काल में पुकारने योग्य थे एवं वर्तमान काल में शत्रुओं के छिपे हुए धन को पाने के लिए बुलाए जाते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारी पुकार सुनो. (११) धीभिर्विद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्. त्वया जेष्म हितं धनम्.. (१२) हे इंद्र! हमारी स्तुतियां सुनकर तुम प्रसन्न होते हो. तुम्हारी कृपा से हम अपने घोड़ों द्वारा शत्रुओं के घोड़ों, उत्तम अन्नों एवं छिपे हुए धन को जीतने योग्य बनते हैं. (१२) अभूरू वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते. भरे वितन्तसाय्यः.. (१३) हे वीर, स्तुति योग्य एवं महान् इंद्र! तुम शत्रुओं के छिपे हुए धन के निमित्त होने वाले युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले हो. (१३) या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति. तया नो हिनुही रथम्.. (१४) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपनी अतिशय तीव्रगति से हमारे रथ को शत्रुविजय के निमित्त आगे बढ़ाओ. (१४) स रथेन रथीतमॊऽस्माकेनाभियुग्वना. जेषि जिष्णो हितं धनम्.. (१५) हे रथ स्वामियों में श्रेष्ठ एवं जयशील इंद्र! तुम हमारे शत्रुपराजयकारी रथ द्वारा शत्रुओं के छिपे धन को जीतते हो. (१५) य एक इत्तम ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः. पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः.. (१६) उन्हीं एकमात्र इंद्र की स्तुति करो जो प्रजाओं के स्वामी, विशेष द्रष्टा एवं वर्षा करने वाले के रूप में उत्पन्न हुए थे. (१६) यो गृणतामिदासिखापिरूती शिवः सखा. स त्वं न इन्द्र मृळय.. (१७) हे रक्षा द्वारा सुखदाता एवं सखा इंद्र! प्राचीन काल में तुम हम स्तोताओं के बंधु थे. तुम अब भी हमें सुखी करो. (१७) धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः. सासहीष्ठा अभि स्पृधः.. (१८) हे वज्रधारी इंद्र! तुम राक्षसों को मारने के हेतु वज्र धारण करते हो एवं विरोध करने वाली असुर सेनाओं को हराते हो. (१८) प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम्. ब्रह्मवाहस्तमं हुवे.. (१९) मैं सबके आदि, धन प्राप्त करने वाले, सखा, स्तोताओं को प्रोत्साहित करने वाले एवं ebook converter DEMO Watermarks*
मंत्रों के द्वारा बुलाने योग्य इंद्र को बुलाता हूं. (१९) स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते. गिर्वणस्तमो अध्रिगुः.. (२०) अतिशय स्तुतिपात्र एवं अबाध गति वाले इंद्र ही धरती के सब धनों के एकमात्र स्वामी हैं. (२०) स नो नियुद्भि पृण कामं वाजेभिरश्विभिः. गोमद्भिर्गोपते धृषत्.. (२१) हे गोपालक इंद्र! तुम घोड़ियों के साथ आकर हमारी अभिलाषा अन्न, घोड़ों एवं गायों से भली-भांति पूरी करो. (२१) तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (२२) हे स्तोताओ! गाय को जैसे घास सुख देती है, उसी प्रकार सोमरस इंद्र को सुखी बनाता है. सोमरस निचुड़ जाने पर यह स्तोत्र बहुतों द्वारा बुलाए गए, शत्रुनाशक एवं दानशील इंद्र के लिए सुखकर होता है. तुम लोग इंद्र को बुलाओ. (२२) न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत्सीमुप श्रवद्गिरः.. (२३) निवासस्थान देने वाले इंद्र तब हमें अनेक गायों सहित अन्न देते हैं, जब वे हमारी स्तुतियां सुनते हैं. (२३) कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत्. शचीभिरप नो वरत्.. (२४) दस्युवधकर्त्ता इंद्र कुवित्स की अनगिनत गायों वाली गोशाला में गए. इंद्र ने अपनी बुद्धि से उन छिपी हुई गायों को प्रकट किया. (२४) इमा उ त्वा शतक्रतोऽभि प्र णोनुवुर्गिरः. इन्द्र वत्सं न मातरः.. (२५) हे सैकड़ों प्रकार के यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाएं बछड़ों के पास बार-बार जाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. (२५) दूणाशं सख्यं तव गौरसि वीर गव्यते. अश्वो अश्वायते भव.. (२६) हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता नष्ट नहीं हो सकती. तुम गाय चाहने वाले को गाय देने वाले एवं घोड़ा चाहने वालों को घोड़ा देने वाले बनो. (२६) स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे. न स्तोतारं निदे करः.. (२७) हे इंद्र! महान् धन के उद्देश्य से दिए हुए सोमरस से तुम प्रसन्न बनो तथा अपने स्तोता को निंदक के अधिकार में मत करो. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः. वत्सं गावो न धेनवः.. (२८) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय इंद्र! प्रत्येक बार सोमरस निचुड़ जाने पर हमारी स्तुतियां उसी प्रकार तुम्हारे पास पहुंचती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाएं बछड़ों के पास जाती हैं. (२८) पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि. वाजेभिर्वाजयताम्.. (२९) हे अनेक शत्रुओं के नाशक इंद्र! विविध स्तुतियों वाले यज्ञ में हम स्तोताओं की स्तुतियां हव्यान्नों द्वारा तुम्हें बलवान् बनावें. (२९) अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः. अस्मान्प्रये महे हिनु.. (३०) हे इंद्र! हमारी परम उन्नतिकारक स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. तुम हमें महान् धन पाने के लिए प्रेरित करो. (३०) अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्. उरुः कक्षो न गाङ्गयः.. (३१) बृबु पणियों के बीच इतने ऊंचे स्थान पर बैठा था, जितना ऊंचा गंगा का तट होता है. (३१) यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी. सद्यो दानाय मंहते.. (३२) बृबु ने मुझ धन चाहने वाले को एक हजार गाएं हवा के समान तेज गति से प्रदान की थीं. (३२) तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः. बृबुं सहस्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम्.. (३३) हम स्तोता सदा उन्हीं श्रेष्ठ बृबु की स्तुति करते हैं. वे हमें हजार गाएं देने वाले, विद्वान् एवं हजारों स्तुतियों के पात्र हैं. (३३) सूक्त—४६ देवता—इंद्र त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः. त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१) हे इंद्र! हम स्तोता अन्न प्राप्ति के कारण तुम्हें बुलाते हैं. अन्य लोग तुझ सज्जन पालक को घोड़ों वाले संग्राम में विजय पाने के लिए बुलाते हैं. (१) स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः. गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले, वज्र के स्वामी, शत्रुनाशक एवं महान् इंद्र! युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले को तुम जिस प्रकार बहुत सा अन्न देते हो, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें गाएं व रथ खींचने में कुशल घोड़े दो. (२) यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्. सहस्रमुष्क तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे.. (३) जो इंद्र प्रबल शत्रुओं को मारने वाले एवं सबको देखने वाले हैं, उन्हें हम बुलाते हैं. हे हजार शेपों (लिंगों) वाले, बहुधनसंपन्न एवं सज्जन पालक इंद्र! युद्धों में तुम हमें समृद्ध बनाओ. (३) बाधसे जनान् वृषभेव मन्युना घृषौ मीळ्ह ऋचीषम. अस्माकं बोधयविता महाधने तनूष्वप्सु सूर्ये.. (४) हे ऋचाओं के अनुकूल रूप वाले इंद्र! तुम शत्रुबाधक युद्ध में बैल के समान क्रोध में भरकर हमारे शत्रुओं को पीड़ित करो. धन-निमित्तक महायुद्ध में तुम हमारे रक्षक बनो. हम संतान, जल एवं सूर्यदर्शन प्राप्त करें. (४) इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः. येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्रा:.. (५) हे विचित्र, हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! जिस अन्न के द्वारा तुम स्वर्ग एवं धरती का पोषण करते हो, हमें वही अधिक प्रशंसनीय, परम बलकारक एवं पुष्टिकारक अन्न दो. (५) त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन्देवेषु हूमहे. विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान्सुसहान्कृधि.. (६) हे तेजस्वी, देवों में सर्वाधिक उग्र एवं शत्रुओं को हराने वाले इंद्र! हम अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हें बुलाते हैं. हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! तुम सब राक्षसों को दूर भगाओ एवं हमारे शत्रुओं को सरलता से हराने योग्य बनाओ. (६) यदिन्द्र नाहुषीष्वाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु. यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या.. (७) हे इंद्र! मानव प्रजाओं में जो बल एवं धन है अथवा पांच वर्णों में जो अन्न है, वह सब महान् शक्तियों के साथ हमें दो. (७) यद्वा तुक्षौ मघवन् द्रुह्यावा जने यत्पूरौ कच्च वृष्ण्यम्. अस्मभ्यं तद्रिरीहि सं नृषाह्येऽमित्रान्पृत्सु तुर्वणे.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमें तृक्षु, द्रुह्यु एवं पुरु नामक राजाओं का समस्त बल दो. इस प्रकार हम युद्ध आरंभ होने पर शत्रुओं को जीत सकेंगे. (८) इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्. छर्दियच्छ मघवद्द्रयश्व मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (९) हे इंद्र! हव्यरूप धन वाले लोगों तथा हमारे लिए तीन धातुओं से बना हुआ, तीन कष्टों से बचाने वाला, विनाशरहित एवं छाया करने वाला घर दो. शत्रुओं के आयुध हमसे दूर करो. (९) ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया. अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (१०) हे धनस्वामी एवं स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! जिन शत्रुओं ने हमारी गाएं छीनने की इच्छा से आक्रमण किया है अथवा जो बलपूर्वक हम पर प्रहार करते हैं, तुम उनसे हमारे एकमात्र रक्षक बनो. (१०) अध स्मा नो वृधे भवेन्द्र नायमवा युधि. यदन्तरिक्षे पतयन्ति पर्णिनो दिद्यवस्तिग्ममूर्धानः.. (११) हे इंद्र! इस समय तुम हमारे वृद्धिकर्त्ता बनो. जब आकाश में पंखों वाले, तेज नोक वाले एवं चमकीले बाण गिरते हैं, उस समय जो हमारी रक्षा करता है, तुम उसकी रक्षा करो. (११) यत्र शूरासस्तन्वो वितन्वते प्रिया शर्म पितॄणाम्. अध स्मा यच्छ तन्वे३ तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः.. (१२) जब युद्ध में शूर शत्रुओं को अपने शरीर का बल दिखाते हैं एवं शत्रुओं से उनके पूर्वजों के प्रिय स्थान को छीनते हैं, उस समय तुम हमारी और हमारी संतान की शरीर-रक्षा के लिए आयुध-रक्षक कवच चुपचाप दे देना. तुम हमारे शत्रुओं को भगाओ. (१२) यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयासे महाधने. असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येनाँ इव श्रवस्यतः.. (१३) हे इंद्र! महान् धन के निमित्त संग्राम आरंभ होने पर हमारे घोड़ों को ऊंचे-नीचे रास्ते पर इस प्रकार आगे बढ़ाना, जिस प्रकार कुटिल पथ पर मांस का इच्छुक बाज बढ़ता है. (१३) सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो यदि क्लोशमनु ष्वणि. आ ये वयो न वर्वृत्तत्यामिषि गृभीता बाह्वोर्गवि.. (१४) हे इंद्र! जब हमारे घोड़े भय के कारण जोर से हिनहिनाएं, उस समय तुम भुजाओं द्वारा eBook converter DEMO Watermarks*
लगाम के सहारे पकड़े हुए हमारे घोड़ों को प्रेरित करो. जिससे वे गो निमित्तक संग्राम में नीचे बहने वाली सरिताओं अथवा मांस के अभिलाषी बाज के समान आगे बढ़ें. (१४) सूक्त—४७ देवता—सोम, पृथ्वी आदि स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्. उतो न्व१स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (१) यह निचोड़ा हुआ सोमरस स्वादिष्ट, मधुर, तीव्र एवं रसवाला है. इसे पीने वाले इंद्र के सामने युद्धों में कोई ठहर नहीं सकता. (१) अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद. पुरूणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो३ हन्.. (२) यह सोमरस इस यज्ञ में बहुत मदकारक था. वृत्रहनन के समय इंद्र इसी से मदमत्त हुए थे. इसी ने शंबर की निन्यानवे नगरियों तथा सेनाओं का नाश किया था. (२) अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः. अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे.. (३) यह सोमरस पीने पर मेरी वाणी को तेज करता है एवं मनचाही बुद्धि प्रदान करता है. इसी धीर सोमरस ने छः अवस्थाओं को बनाया है. कोई भी प्राणी इससे दूर नहीं रह सकता. (३) अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः. अयं पीयूषं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्.. (४) इस सोमरस ने धरती का विस्तार और स्वर्ग की दृढ़ता की है. इसी ने ओषधि, जल और गो—तीन उत्तम आधारों में रस धारण किया है. यही विस्तृत आकाश को धारण करता है. (४) अयं विदच्चित्रदृशीकमर्णः शुक्रसद्मनामुषसामनीके. अयं महान्महता स्कम्भनेनोद् द्यामास्तभ्नाद् वृषभो मरुत्वान्.. (५) उज्ज्वल आकाश में रहने वाली उषाओं से पहले सोमरस ही विचित्र प्रकाश वाले सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है. यह जल बरसाने वाला सोम मरुतों से मिलकर महान् बल के द्वारा मजबूत खंभों के सहारे स्वर्ग को धारण करता है. (५) धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्. माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिस्थानो रयिमस्मासु धेहि.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शूर इंद्र! तुम कलश में रखा हुआ सोमरस पिओ और धन निमित्तक युद्ध में शत्रुओं का नाश करो. हे धनपात्र इंद्र! दोपहर के यज्ञ में सोमरस से अपना पेट भरो एवं हमें धन दो. (६) इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ. भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनीतिरुत वामनीतिः.. (७) हे इंद्र! आगे चलने वाले मार्गदर्शक के समान हमको देखो, हमारे सामने उत्तम धन लाओ तथा हमें दुःखों एवं शत्रुओं से पार करो. तुम उत्तम नेता बनकर हमें धन की ओर चलाओ. (७) उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति. ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणां बृहन्ता.. (८) हे विद्वान् इंद्र! हमें विस्तीर्ण स्वर्ग में ले चलो. वह स्वर्ग प्रकाशपूर्ण एवं भयरहित है. हे शक्तिशाली इंद्र! हम तुम्हारी सुंदर एवं दृढ़ भुजाओं पर अपनी रक्षा के लिए भरोसा करते हैं. (८) वरिष्ठे न इन्द्र वन्धुरे धा वहिष्ठयोः शतावन्नश्वयोरा. इषमा वक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तारीन्मघवन्नायो अर्यः.. (९) हे सैकड़ों संपत्तियों के स्वामी इंद्र! वहन करने में कुशल घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले विस्तृत रथ पर हमें बैठाओ. तुम हमारे लिए भांति-भांति के अन्नों में से उत्तम अन्न दो. हे धनस्वामी इंद्र! धन के विषय में कोई भी हमसे आगे न निकल सके. (९) इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ चोदय धियमयसो न धाराम्. यत्किञ्चाहं त्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम्.. (१०) हे इंद्र! मुझे सुखी बनाओ, मेरे दीर्घ जीवन की इच्छा करो एवं मेरी बुद्धि को तलवार की धार के समान तेज करो. तुम्हें अपना बनाने के लिए मैं जो कुछ कर रहा हूं, उसे समझो एवं मुझे देवरूपी रक्षकों से युक्त करो. (१०) त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्. ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः.. (११) मैं शत्रुओं से रक्षा करने वाले तथा अभिलाषापूरक इंद्र को बुलाता हूं. मैं शोभन आह्वान वाले एवं शूर इंद्र को बुलाता हूं. मैं सर्वकार्यसमर्थ एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र को बुलाता हूं. धनस्वामी इंद्र मुझे कल्याण दें. (११) इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः. ebook converter DEMO Watermarks*
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१२) भली-भांति रक्षा करने वाले एवं धनस्वामी इंद्र अपने रक्षा-साधनों से मुझे सुखदाता हों. सब कुछ जानने वाले इंद्र हमारे शत्रुओं को मारें एवं हमें अभय बनावें. हम इंद्र की कृपा से शोभन वीरों के स्वामी बनें. (१२) तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम. स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (१३) हम यज्ञपात्र इंद्र की शोभन-अनुग्रह-बुद्धि एवं कल्याणकारी-मित्रता-भाव के पात्र बनें. शोभन, रक्षक और धनवान् इंद्र द्वेष करने वालों को हमसे दूर करें. (१३) अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते. ऊरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून्.. (१४) हे इंद्र! जलसमूह जिस प्रकार निचले स्थान की ओर बहता है, उसी प्रकार स्तोताओं की स्तुतियां, सोमरूप स्तोत्र विशाल धन व विस्तृत सोमरस तुम्हारे पास जाते हैं. हे वज्रधारी इंद्र! तुम सोमरस में गोरस एवं जल भली प्रकार मिलाते हो. (१४) क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्. पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः.. (१५) कौन इंद्र की स्तुति कर सकता है, कौन इन्हें प्रसन्न कर सकता है एवं कौन इनका यज्ञ कर सकता है? इंद्र अपने को सदा उग्र जानते हैं. इंद्र मार्ग में आगेपीछे पड़ने वाले पैरों के समान स्तोता को अपनी बुद्धि द्वारा कभी अपने आगे और कभी अपने पीछे रखते हैं. (१५) शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमयन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः. एधमानद् विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्.. (१६) इंद्र प्रबलशत्रु का दमन करते हुए एवं स्तोताओं के लिए बार-बार स्थान बदलते हुए वीर के रूप में प्रसिद्ध होते हैं. सोमरस न निचोड़ने वाले उन्नत लोगों के द्वेषी तथा दिव्य-पार्थिव दोनों संपत्तियों के स्वामी इंद्र अपने सेवकों को रक्षा के लिए बार-बार बुलाते हैं. (१६) परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति. अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति.. (१७) इंद्र प्राचीन यज्ञकर्त्ताओं की मित्रता त्याग देते हैं एवं उनकी हिंसा करते हुए साधारण यज्ञकर्त्ताओं के मित्र बनते हैं. इंद्र परिचर्यरहित प्रजाओं को छोड़कर स्तोताओं के साथ अनेक वर्ष तक रहते हैं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय. इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश.. (१८) इंद्र देवों के प्रतिनिधि बनकर भिन्न-भिन्न देवों का रूप धारण करते हैं. इनका एक रूप अन्य देवों के दर्शन के लिए होता है. इंद्र माया द्वारा अनेक रूप बनाकर यजमानों के सामने आते हैं. इंद्र के रथ में एक हजार घोड़े जोड़े जाते हैं. (१८) युजानो हरिता रथे भूरि त्वष्टेह राजति. को विश्वाहा द्विषतः पक्ष आसत उतासीनेषु सूरिषु.. (१९) इंद्र अपने रथ में घोड़े जोड़ते हुए तीनों लोकों में अनेक जगह शोभा पाते हैं. इंद्र के अतिरिक्त ऐसा कौन है जो स्तोताओं के बीच जाकर इनके शत्रुओं के पास खड़ा रह सके. (१९) अगव्यूति क्षेत्रमागन्म देवा उर्वी सती भूमिरंहूरणाभूत्. बृहस्पते प्र चिकित्सा गविष्टावित्था सते जरित्र इन्द्र पन्थाम्.. (२०) हे देवो! हम घूमतेघूमते गो-संचाररहित स्थान में आ गए हैं. यहां की विस्तृत धरती दस्युजनों को आनंद देती है. हे बृहस्पति! तुम गायों को खोजने में हमें प्रेरणा दो. हे इंद्र! इस प्रकार दुःख अनुभव करते हुए स्तोता को मार्ग बताओ. (२०) दिवेदिवे सदृशीरन्यमर्धं कृष्णा असेधदप सद्मनो जाः. अहन्दासा वृषभो वसन्यन्तोद्व्रजे वर्चिनं शम्बरं च.. (२१) इंद्र आकाश के एक भाग से सूर्य रूप में प्रकट होकर बाद वाला आधा भाग प्रकाशित करने के लिए प्रतिदिन समानरूप वाली काली रात को समाप्त करते हैं. वर्षा करने वाले इंद्र ने 'उदवज्र' नामक स्थान में धन चाहने वाले दासों—शंबर एवं वर्ची को मारा था. (२१) प्रस्तोक इन्नु राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दश वाजिनोऽदात्. दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म.. (२२) हे इंद्र! प्रस्तोक ने तुम्हारे स्तोताओं अर्थात् हमें दस घोड़े और सोने से भरे दस कोश दिए थे. अतिथिग्व ने शंबर को जीतकर जो धन पाया था, वही हमने दिवोदास से ग्रहण किया. (२२) दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना. दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम्.. (२३) मैंने दिवोदास से दस घोड़े, सोने के दस कोश, दस प्रकार के भोजन, वस्त्र एवं सोने के दस पिंड प्राप्त किए थे. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*
दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः. अश्वथः पायवेऽदात्.. (२४) अश्वत्थ ने वायु को घोड़ों सहित दस रथ एवं अथर्व गोत्र वाले ऋषियों को सौ गाएं दी थीं. (२४) महि राधे विश्वजन्यं दधानान्. भरद्वाजान्तसार्ज्यो अभ्ययष्ट.. (२५) सबकी भलाई के लिए महान् धन धारण करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों की सृंजयपुत्र पुस्तोक ने पूजा की थी. (२५) वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः. गोभिः सन्नद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (२६) हे काष्ठ द्वारा निर्मित रथ! तुम दृढ़ अवयवों वाले बनो. तुम हमारे मित्र उन्नतिकारक एवं शोभन वीरों से युक्त बनो. तुम गोचर्म से बंधे हो, हमें दृढ़ बनाओ. तुम्हारा भरोसा करने वाले रथी वीर शत्रुओं को जीतें. (२६) दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भुतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः. अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज.. (२७) हे अध्वर्युगण! स्वर्ग एवं धरती पर साररूप अंश से बने हुए, वनस्पति के दृढ़ अंश से निर्मित, जल की गति से युक्त, गाय के चमड़े से ढके हुए एवं इंद्र के वज्र के समान रथ को लक्ष्य करके यज्ञ करो. (२७) इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः. सेमां ना हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (२८) हे दिव्य रथ! तुम इंद्र के वज्र, मरुतों के आगे चलने वाले, मित्र के गर्भ एवं वरुण की नाभि हो. इस यज्ञ में तुम यज्ञक्रिया देखते हुए हव्य स्वीकार करो. (२८) उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्. स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (२९) हे दुंदुभि! धरती और आकाश को शब्दपूर्ण कर दो. चर और अचर प्राणी तुम्हारे शब्द को जान लें. तुम इंद्र तथा अन्य देवों के साथ मिलकर हमारे शत्रुओं को बहुत दूर भगाओ. (२९) आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि सुरिता बाधमानः. अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व.. (३०) हे दुंदुभि! हमारे शत्रुओं को रुलाओ एवं हमें ओज तथा बल दो. तुम शत्रुओं को बाधा ebook converter DEMO Watermarks*
पहुंचाते हुए शब्द करो. हमारा दुःख जिनके सुख का कारण है, ऐसे लोगों को भगाओ. तुम इंद्र की मुष्टिका हो. तुम हमें दृढ़ता दो. (३०) आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद् दुन्दुभिर्वावदीति. समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु.. (३१) हे इंद्र! शत्रुओं द्वारा रोकी गई हमारी गायों को ले आओ. सबको ज्ञान कराने के लिए यह दुंदुभि बार-बार बज रही है. हमारे सैनिक घोड़ों पर चढ़कर घूम रहे हैं. हे इंद्र! हमारे रथ पर बैठे सैनिक जय पावें. (३१) सूक्त—४८ देवता—अग्नि यज्ञाज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे. प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम्.. (१) हे स्तोताओ! तुम सभी यज्ञों में प्रवृद्ध अग्नि की स्तोत्रों द्वारा बार-बार प्रशंसा करो. हम मरणरहित, जातवेद व मित्र के समान प्रिय अग्नि की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१) ऊर्जो नपातं स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये. भुवद् वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम्.. (२) हम अपने ऊपर वास्तव में प्रसन्न एवं बलपुत्र अग्नि की प्रशंसा करते हैं. देवों के लिए हव्यवहन करने वाले अग्नि को हम हव्य देते हैं. अग्नि युद्ध में हमारे रक्षक, उन्नतिकारक एवं हमारे पुत्रों के त्राणकर्त्ता हों. (२) वृषा ह्यग्ने अजरो महान्विभास्यर्चिषा. अजस्रेण शोचिषा शोशुचच्छुचे सुदीतिभिः सु दीदिहि.. (३) हे अभिलाषापूरक, जरारहित एवं महान् अग्नि! तुम दीप्ति से प्रकाशित होते हो. हे तेजस्वी एवं नित्यदीप्ति से दीप्तियुक्त अग्नि! तुम अपनी शोभन दीप्तियों द्वारा हमें प्रकाशित करो. (३) महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना. अर्वाचः सीं कृणुह्यग्नेऽवसे रास्व वाजोत वंस्व.. (४) हे अग्नि! तुम महान् देवों का यज्ञ करने वाले हो, इसलिए हमारे यज्ञ में भी देवों की सतत पूजा करो तथा हमारी रक्षा के लिए देवों को हमारे सामने लाओ. तुम हमें हव्य अन्न दो एवं हमारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करो. (४) यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति. ebook converter DEMO Watermarks*
सहसा यो मथितो जायते नृभिः पृथिव्या अधि सानवि.. (५) हे यज्ञ के गर्भ अग्नि! जल, पत्थर एवं अरणि रूप काष्ठ तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. तुम मनुष्यों द्वारा बलपूर्वक मथे जाते हो एवं धरती के उच्च स्थान में प्रकट होते हो. (५) आ यः पप्रौ भानुना रोदसी उभे धूमेन धावते दिवि. तिरस्तमो ददृश ऊर्म्यास्वा श्यावास्वरुषो वृषा श्यावा अरुषो वृषा.. (६) जो अग्नि अपनी दीप्ति से धरती-आकाश को पूर्ण करते हैं, धुएं के साथ आकाश में दौड़ते हैं, वे ही दीप्तिसंपन्न एवं अभिलाषापूरक अग्नि काली रातों में अंधकार मिटाते हुए देखे जाते हैं. वे ही अग्नि रात्रियों के ऊपर स्थित हैं. (६) बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा. भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि.. (७) हे अतिशय युवा एवं दीप्तियुक्त अग्नि देव! तुम भरद्वाज द्वारा प्रज्वलित होकर अपनी विशाल किरणों द्वारा हमारे लिए धन दो एवं जलो. हे शुद्ध करने वाले अग्नि! तुम जलो. (७) विश्वासां गृहपतिर्विशामसि त्वमग्ने मानुषीणाम्. शतं पूर्भिर्यविष्ठ पाह्यंहसः समेद्धारं शतं हिमाः स्तोतृभ्यो ये च ददति.. (८) हे अग्नि! तुम समस्त मानव प्रजाओं के गृहपति हो. हे अतिशय युवा अग्नि! मैं तुम्हें सौ वर्ष तक प्रज्वलित रखूंगा. तुम अपने सैकड़ों रक्षा साधनों द्वारा मुझे तथा हव्य देने वाले स्तोताओं को पाप से बचाओ. (८) त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधांसि चोदय. अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः.. (९) हे विचित्र तथा निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम रक्षासाधनों के साथ धनों को हमारी ओर प्रेरित करो. तुम्हीं इस धन के नेता हो. हमारी संतान को शीघ्र ही प्रतिष्ठा दिलाओ. (९) पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्ट्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः. अग्ने हेळांसि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि ह्वरांसि च.. (१०) हे अग्नि! तुम अपने एकत्रित एवं हिंसारहित रक्षासाधनों द्वारा हमारे पुत्र-पौत्रों का पालन करो. देवों का क्रोध हमारे पास से हटाओ एवं हमारी मानवबाधा दूर करो. (१०) आ सखायः सबर्दुघां धेनुमजध्वमुप नव्यसा वचः. सृजध्वमनपस्फुराम्.. (११) हे मित्रो! तुम नई स्तुतियां बोलते हुए दुधारू गाय के पास पहुंचो. उसके दूधपीते बछड़ों को उससे इस प्रकार अलग करो कि उसे हानि न हो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
या शर्धाय मारुताय स्वभानवे श्रवोऽमृत्यु धुक्षत. या मृळीके मरुतां तुराणां या सुम्नैरेवयावरी.. (१२) हे मित्रो! उस गाय के पास जाओ जो सहनशील, स्वाधीन, तेज एवं वेगशाली मरुतों को अमर बनाने के लिए दूधरूपी अन्न देती है एवं सुखकारक वर्षाजलों के साथ आती है. (१२) भरद्वाजाय़ाव धुक्षत द्विता. धेनुं च विश्वदोहसमिषं च विश्वभोजसम्.. (१३) हे मरुतो! तुम भरद्वाज के लिए दो प्रकार के सुख का प्रबंध करो. पर्याप्त दूध देने वाली गाय एवं सबके खाने योग्य अन्न दो. (१३) तं व इन्द्रं न सुकृतं वरुणमिव मायिनम्. अर्यमणं न मन्द्रं सुप्रभोजसं विष्णुं न स्तुष आदिशे.. (१४) हे मरुतो! मैं धन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम इंद्र के समान शोभन कर्म वाले, वरुण के समान बुद्धिमान्, सूर्य के समान स्तुतिपात्र एवं विष्णु के समान धनदाता हो. (१४) त्वेषं शर्धो न मारुतं तुविष्वण्यनर्वाणं पूषणं सं यथा शता. सं सहस्रा कारिषच्चर्षणिभ्य आँ आविर्गूळ्हा वसू करत्सुवेदा नो वसू करत्.. (१५) मैं शत्रुओं द्वारा अपराजेय एवं पोषक मरुद्बल की इसलिए स्तुति करता हूं कि वे मुझे एक साथ ही हजारों प्रकार की संपत्तियां दें. मरुद्गण छिपा हुआ धन हमारे लिए प्रकट करें एवं हमें धन का ज्ञान करावें. (१५) आ मा पूषन्नुप द्रव शंसिषं नु ते अपिकर्ण आघृणे. अघा अर्यो अरातयः.. (१६) हे पूषा! तुम जल्दी से मेरे पास आओ. हे दीप्तिसंपन्न! मैं तुम्हारे कान के समीप स्तुति करता हूं. तुम आक्रमण करने वाले शत्रुओं को भगाओ. (१६) मा काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः. मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा आदधते वेः.. (१७) हे पूषा! तुम काकों का भरण करने वाले वृक्षों को नष्ट मत करो, अपितु मेरी निंदा करने वालों को मिटाओ. जैसे बहेलियां चिड़ियों को फंसाने के लिए जाल फैलाता है, उसी प्रकार कोई शत्रु मुझे न बांध सके. (१७) दृतेरिव तेऽवृकमस्तु सख्यम्. अच्छिद्रस्य दधन्वतः सुपूर्णस्य दधन्वतः.. (१८) हे पूषा! तुम्हारी मित्रता दही से भरे हुए एवं छिद्ररहित चर्मपात्र के समान बाधारहित हो. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*
परो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया. अभि ख्यः पूषन् पृतनासु नस्त्वमवा नूनं यथा पुरा.. (१९) हे पूषा! तुम धन के द्वारा मनुष्यों से ऊंचे एवं देवों के समान हो. युद्धों में हमारी ओर कृपादृष्टि रखना. प्राचीन काल के समान ही तुम इस समय हमारी रक्षा करना. (१९) वामी वामस्य धूतयः प्रणीतिरस्तु सूनृता. देवस्य वा मरुतो मर्त्यस्य वेजानस्य प्रयज्यवः.. (२०) हे कंपाने वालो एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम्हारी जो सत्यरूपी एवं धन की प्रेरणा देने वाली वाणी यजमानों को मनचाहा धन देती है, वही वाणी हमारी मार्ग-दर्शिका बने. (२०) सद्याश्चिद्यस्य चर्कृतिः परि द्यां देवो नैति सूर्यः. त्वेषं शवो दधिरे नाम यज्ञियं मरुतो वृत्रहं शवो ज्येष्ठं वृत्रहं शवः.. (२१) जिन मरुतों के असीमित कार्य सूर्य के समान आकाश में विस्तृत हो जाते हैं, वे दीप्त, यज्ञ के योग्य एवं शत्रुनाशक बल धारण करते हैं. उनका शत्रुनाशक बल सबसे उत्तम है. (२१) सकृद्ध द्यौरजायत सकृद्भूिमरजायत. पृश्न्या दुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते.. (२२) एक बार स्वर्ग उत्पन्न हुआ. एक ही बार धरती बनी. मरुतों की माता पृश्नि से एक बार दूध काढ़ा गया. इसके बाद कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ. (२२) सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव स्तुषे जनं सुव्रतं नव्यसीभिर्गीर्भिर्मित्रावरुणा सुम्नयन्ता. त आ गमन्तु त इह श्रुवन्तु सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१) मैं नई स्तुतियों द्वारा शोभन-कर्म वाले देवों की प्रशंसा करता हूं. मैं स्तोताओं के सुख की अभिलाषा करने वाले मित्र व वरुण की स्तुति करता हूं. शोभनबलसंपन्न मित्र, वरुण एवं अग्नि यहां आवें और मेरी स्तुतियां सुनें. (१) विशोविश ईड्यमध्वरेष्वदृप्तक्रतुमर्तिं युवत्योः. दिवः शिशुं सहसः सूनुमग्निं यज्ञस्य केतुमरुषं यजध्यै.. (२) मैं समस्त प्रजाओं के यज्ञों में स्तुति के योग्य, दर्परहित कर्म वाले, स्वर्ग एवं धरती के स्वामी, स्वर्ग एवं शक्ति के पुत्र व यज्ञ के केतु अग्नि का यज्ञ करने के लिए यजमान की प्रेरणा देता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अरुषस्य दुहितरा विरूपे स्तृभिरन्या पिपिशे सूरो अन्या. मिथस्तुरा विचरन्ती पावके मन्म श्रुतं नक्षत ऋच्यमाने.. (३) चमकते हुए सूर्य की रात-दिनरूपी दो विपरीत रूपवाली कन्याएं हैं. उन में एक तारों से सुशोभित है और दूसरी सूर्य से. एक दूसरी का विरोध करके घूमती हुई एवं पवित्र करने वाली रात-दिन की जोड़ी हमारी स्तुतियां सुनकर प्रसन्न हों. (३) प्र वायुमच्छा बृहती मनीषा बृहद्रयिं विश्ववारं रथप्राम्. द्युतद्यामा नियुतः पत्यमानः कविः कविमियक्षसि प्रयज्यो.. (४) हमारी महान् स्तुति महान् धन के स्वामी, सबके आदरणीय एवं अपने रथ को पूर्ण करने वाले वायु के सामने उपस्थित हो. हे अतिशय यज्ञपात्र, दीप्तिसंपन्न रथ वाले, रथ में जुते हुए घोड़ों को वश में रखने वाले एवं दूरदर्शी वायु! तुम मेधावी स्तोता की धन से पूजा करो. (४) स मे वपुश्छदयदश्विनोर्यो रथो विरुक्मान्मनसा युजानः. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तियाथस्तनयाय त्मने च.. (५) अश्विनीकुमारों का वह रथ मेरे शरीर को अपने तेज से ढक ले, जो विशेष तेजस्वी है एवं सोचने मात्र से जिस में घोड़े जुड़ जाते हैं. हे नेता अश्विनीकुमारो! उसी रथ के द्वारा तुम स्तोता एवं उसके पुत्र-पौत्रों की अभिलाषा पूर्ण करने जाओ. (५) पर्जन्यवाता वृषभा पृथिव्याः पुरीषाणि जिन्वतम्प्यानि. सत्यश्रुतः कवयो यस्य गीर्भिर्जगतः स्थातर्जगदा कृणुध्वम्.. (६) हे वर्षिकारक पर्जन्य एवं वायु! आकाश से प्राप्त करने योग्य एवं पूरक जल बरसाओ. हे स्तोत्र सुनने वाले एवं मेधावी मरुतो! तुम जिसके स्तोत्र सुनकर प्रसन्न बनो, उसको धनसंपन्न करना. (६) पावीरवी कन्या चित्रायुः सरस्वती वीरपत्नी धियं धात्. ग्नाभिरच्छिद्रं शरणं सजोषा दुराधर्षं गृणते शर्म यंसत्.. (७) पवित्र बनाने वाली, विचित्र रूपवाली, विचित्र गतिवाली एवं वीर-पत्नी सरस्वती हमारे यज्ञरूप कर्म को पूरा करे. वह देवपत्नियों के साथ प्रसन्न होकर स्तोता को दोषरहित तथा ठंड एवं हवा की गति से रहित घर एवं सुख दे. (७) पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानळर्कम्. स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधियं सीषधाति प्र पूषा.. (८) अभिलषित फल पाकर वश में होने वाला स्तोता सभी मार्गों के स्वामी एवं पूजनीय सूर्य के सामने स्तुतियों सहित उपस्थित हो. पूषा हमें सोने के सींग वाली गाएं दें एवं हमारे सभी ebook converter DEMO Watermarks*
कामों को पूरा करें. (८) प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम्. होता यक्ष्यजतं पस्त्यानामग्निस्त्वष्टारं सुहवं विभावा.. (९) देवों को बुलाने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि सबके प्रथम विभागकर्त्ता, प्रसिद्धि एवं अन्न- धारण करने वाले, सुंदर हाथों वाले, दानशील, शोभन-बाहुओं वाले, भासमान, गृहस्थों द्वारा यजनीय एवं सुखपूर्वक बुलाने योग्य त्वष्टा का यज्ञ करें. (९) भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ. बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नमृधग्घुवेम कविनेषितासः.. (१०) हे स्तोता! इन स्तोत्रों द्वारा रात-दिन लोकपालक रुद्र की वृद्धि करो. हम बुद्धिमान् रुद्र द्वारा प्रेरित होकर महान्, दर्शनीय, जरारहित एवं शोभन-सुख वाले रुद्र का हवन समृद्धि के साथ करें. (१०) आ युवानः कवयो यज्ञियासो मरुतो गन्त गृणतो वरस्याम्. अचित्रं चिद्धि जिन्वथा वृधन्त इत्था नक्षन्तो नरो अङ्गिरस्वत्.. (११) हे अतिशय युवा, ज्ञानसंपन्न एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम यजमान की सुंदर स्तुति के समीप आओ. हे नेताओ! तुम इस प्रकार वृद्धि पाकर एवं गतिशील किरणों के समान व्याप्त होकर विलक्षण वृक्षों वाले स्थान को वर्षा द्वारा सींचो. (११) प्र वीराय प्र तवसे तुरायाजा यूथेव पशुरक्षिरस्तम्. स पिस्पृशति तन्वि श्रुतस्य स्तृभिर्न नाकं वचनस्य विपः.. (१२) हे स्तोता! अतिशय वीर, शक्तिशाली एवं गतिशील मरुतों के लिए इस प्रकार स्तुति करो, जिस प्रकार ग्वाला पशुओं को हांकता है. आकाश में जिस प्रकार तारे होते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण बुद्धिमान् स्तोता की सुनने योग्य स्तुतियों को अपने शरीर पर धारण करें. (१२) यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुर्मनवे बाधिताय. तस्य ते शर्मन्नुपदद्यमाने राया मदेम तन्वा३ तना च.. (१३) हे स्तोता! जिन विष्णु ने कष्ट में पड़े मनु के कल्याण के निमित्त तीनों लोकों को तीन चरणों के द्वारा नाप लिया था, वह ही तुम्हारी यज्ञशाला में दिव्यस्थान में निवास करें एवं हम पुत्र-पौत्रों सहित धन से प्रसन्न हों. (१३) तन्नोऽहिर्बुध्न्यो अद्भिर्कैस्तत्पर्वतस्तत्सविता चनो धात्. तदोषधीभिरभि रातिषाचो भगः पुरन्धिर्जिन्वतु प्र राये.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
हमारे स्तुतियां सुनकर प्रातः जागने वाले अग्नि, पर्वत एवं सविता हमें जल के साथ अन्न दें. विश्वेदेव ओषधियों के साथ हमें वही अन्न दें. अधिक बुद्धि वाले भग नामक देव हमें धन की प्रेरणा दें. (१४) नू नो रयिं रथ्यं चर्षणिप्रां पुरुवीरं मह ऋतस्य गोपाम्. क्षयं दाताजरं येन जनान्त्स्पृधो अदेवीरभि च क्रमाम विश आदेवीर्ऋभ्य१ श्रवाम.. (१५) हे विश्वेदेव! तुम हमें रथयुक्त अनेक प्रजाओं को पूर्ण करने वाला अनेक पुत्रों सहित क्षयरहित एवं महान् यज्ञ का साधन धन अन्न एवं घर दो. इसके द्वारा हम देवयज्ञ न करने वाले शत्रुओं को पराजित करें एवं देवयज्ञ करने वालों को सहारा दें. (१५) सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव हुवे वो देवीमदितिं नमोभिर्मृळीकाय वरुणं मित्रमग्निम्. अभिक्षदामर्यमणं सुशेवं त्रातृन्देवान्त्सवितारं भगं च.. (१) हे देवो! मैं सुख पाने की इच्छा से स्तुतियों के द्वारा अदिति, वरुण, मित्र, अग्नि, शत्रुहंता एवं सेवायोग्य अर्यमा, सविता, भग एवं रक्षा करने वाले सभी देवों को बुलाता हूं. (१) सुज्योतिषः सूर्य दक्षपितॄननागास्त्वे सुमहो वीहि देवान्. द्विजन्मानो य ऋतसापः सत्याः स्वर्वन्तो यजता अग्निजिह्वाः.. (२) हे शोभनदीप्ति वाले सूर्य! दक्ष से उत्पन्न एवं सुंदर प्रकाश वाले देवों को हमारे अनुकूल बनाओ. वे देव दो जन्म वाले, यज्ञ को प्यार करने वाले, सत्य बोलने वाले, धनसंपन्न, यज्ञ के पात्र एवं अग्निजिह्व हैं. (२) उत द्यावापृथिवी क्षत्रमुरु बृहद्रोदसी शरणं सुषुम्ने. महस्करथो वरिवो यथा नोऽस्मे क्षयाय धिषणे अनेहः.. (३) हे स्वर्ग और धरती! तुम हमें अधिक बल दो. हे स्वर्ग एवं धरती! हमारे उत्तम सुख के लिए हमें बड़ा घर दो. ऐसा प्रयत्न करो, जिससे हमारे पास विशाल संपत्ति हो जाए. हे धारणशील धरतीस्वर्ग! हमें पापरहित बनाने के लिए घर दो. (३) आ नो रुद्रस्य सूनवो नमन्तामद्या हूतासो वसवोऽधृष्टाः. यदीमर्भे महति वा हितासो बाधे मरुतो अह्वाम देवान्.. (४) हे निवासस्थान देने वाले एवं पराजित न होने वाले रुद्रपुत्र मरुद्गण! इस समय बुलाने पर तुम हमारे पास आओ. वे युद्ध में महान् सुख देने वाले हैं. इस कारण हम उन्हें बुलाते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*